Arnab Goswami announces campaign journalism on prime Time show , Modi-Shah scared| LIVE

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简要总结

本视频讨论了阿纳布·戈斯瓦米(Arnab Goswami)的转变,他宣布将进行“运动新闻”,这与他过去亲政府的立场大相径庭。嘉宾们分析了这种转变背后的可能原因,包括收视率的竞争、政府的授意以及对社会舆论变化的反应。

  • 阿纳布·戈斯瓦米宣布进行“运动新闻”,引发对其动机的质疑。
  • 嘉宾们认为,这可能是为了提高收视率、响应政府指示或适应社会舆论的变化。
  • 讨论还涉及媒体的独立性以及阿纳布·戈斯瓦米的转变是否会影响莫迪政府的未来。

介绍

视频介绍了阿纳布·戈斯瓦米,他最近一直备受关注。人们对他的变化感到好奇,想知道他到底发生了什么。在昨天的黄金时段节目中,观众纷纷提问,质疑他为何开始报道对政府不利的新闻。阿纳布与一位主持人一同出镜,主持人转达了Twitter和其他平台上人们的疑问,询问阿纳布对此有何看法。

阿纳布·戈斯瓦米宣布“运动新闻”

阿纳布·戈斯瓦米在他的黄金时段节目中宣布,他将进行“运动新闻”,并强调这种新闻形式的重要性。这对于莫迪和沙阿来说是一个巨大的警钟,因为“运动新闻”意味着以运动的形式提出公众关心的问题。这种新闻形式可能非常危险,尤其是对于像阿纳布·戈斯瓦米这样以对政府忠诚而闻名的人。他曾被认为是亲政府的,甚至是莫迪最喜欢的媒体人之一。然而,他现在却宣布要进行“运动新闻”,强调提升公众的声音至关重要。

观众的质疑和阿纳布的回应

节目展示了阿纳布·戈斯瓦米节目的截图,该节目名为“人民的力量”。他在社交媒体上的收视率和受欢迎程度大幅上升。观众在X平台上提问,质疑他为何在一个月内改变了对现任政府的叙述。阿纳布回应说,将新闻报道视为亲政府或反政府是完全错误的。他认为,除非发起运动,否则国家不会改变;如果不呐喊,就不会被听到。新闻报道需要有目的性,而他最近强烈地感受到这一点。他强调,公众的监督至关重要,并以阿拉瓦利(Aravalli)案件为例,指出其中存在错误,无关乎亲政府或反政府,只关乎对与错。

阿纳布对阿拉瓦利案件的看法

阿纳布·戈斯瓦米表示,他认为阿拉瓦利案件中,法院于12月20日做出的搁置命令是错误的。他不在乎是否有人因此感到不安,并指出首席大法官也意识到这个问题是错误的。他并不想因此获得任何赞扬,也不希望最高法院或印度政府因此给予共和国电视台任何荣誉。他相信,法院和政府都明白对与错的区别,而有人将此事公之于众,他们只是选择这样做。他宣布进行“运动新闻”,并表示公众的监督至关重要。

阿纳布转变的影响和质疑

阿纳布·戈斯瓦米的转变引发了一个问题:如果他开始进行“运动新闻”,莫迪是否会面临媒体审判?古吉拉特邦的游说团体是否会将阿纳布赶出权力中心?这种“运动新闻”是否会真正为人民发声,还是仅仅是另一种策略?主持人指出,他们过去也曾进行过类似的报道,无论是在曼莫汉·辛格政府时期还是在莫迪政府时期,都曾提出过质疑。

嘉宾讨论:动机和影响

嘉宾们讨论了阿纳布·戈斯瓦米的转变,分析了其背后的动机。有人认为这是一种“变心”,也有人认为这是一种“觉醒”,意识到“人民的力量”的重要性。嘉宾们还提到了阿纳布过去的一些争议性报道,以及他与一些激进分子的合作。他们质疑,阿纳布的转变是否与收视率竞争、经济利益或对人道主义的追求有关。

媒体策略和政府影响

嘉宾们认为,阿纳布·戈斯瓦米的转变可能与政府的策略有关。他们指出,由于印度媒体被批评为“顺从媒体”,政府可能希望通过阿纳布等人来改善其形象。此外,这种转变也可能是一种“安全阀”,以缓解公众的不满情绪。嘉宾们质疑,阿纳布是否会真正提出尖锐的问题,还是只会提出一些无伤大雅的问题。他们还提到了其他媒体人,如鲁比卡·利亚卡特和安贾纳·奥姆·卡什亚普,他们也开始提出质疑。

对阿纳布转变的怀疑和潜在原因

嘉宾们对阿纳布·戈斯瓦米的转变表示怀疑,认为这可能是出于自私的动机,或是为了自保。他们指出,阿纳布过去一直为纳伦德拉·莫迪辩护,现在突然站在人民一边,令人难以置信。嘉宾们认为,这可能是政府的指示,旨在改善莫迪政府的国际形象。另一种可能是,阿纳布意识到公众对政府的不满情绪日益高涨,担心自己也会受到牵连。

阿纳布的商业考量和市场策略

嘉宾指出,阿纳布·戈斯瓦米是一位精明的商人,他的转变可能与商业考量有关。他意识到,印度有很大一部分人口并不支持印度人民党(BJP),而他需要为这部分人提供产品。嘉宾认为,阿纳布正在与尼卢·维亚斯、拉维什·库马尔和德鲁夫·拉蒂等媒体人竞争,争夺这部分市场。他强调,社交媒体的重要性日益凸显,而阿纳布正在努力提升自己在社交媒体上的影响力。

最终评论和结论

嘉宾们总结了他们的观点,认为阿纳布·戈斯瓦米的转变是出于自私的动机,或是为了自保。他们强调,阿纳布过去一直为政府辩护,现在突然改变立场,令人难以信服。嘉宾们认为,阿纳布可能会继续玩弄“好警察坏警察”的游戏,提出一些无伤大雅的问题,以维持自己的地位。他们还讨论了阿纳布是否会采访拉胡尔·甘地,以及这是否会影响莫迪政府的未来。总的来说,嘉宾们对阿纳布的转变持怀疑态度,认为这更多的是一种策略,而不是真正的改变。

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文字稿

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0:17 नमस्कार स्वागत है आपका पब्लिक इंडिया पर। मैं हूं नीलू व्यास। आज बात करते हैं अर्नभ गोस्वामी की जो कि लगातार सुर्खियों में बने हुए हैं। अर्नभ के बारे में लोग सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर उनको क्या हो गया और हम भी कई बार इस पर कार्यक्रम कर चुके हैं कि आखिर अर्नभ को हुआ क्या है? लेकिन कल के प्राइम टाइम प्रोग्राम में जिसकी क्लिप मैं आपको दिखाऊंगी उसके स्क्रीनशॉट्स और उसमें व्यूअर्स उनसे सवाल करते हुए नजर आ रहे हैं। व्यूअर्स पूछ रहे हैं कि अर्नभ व्हाई आर यू डूइंग स्टोरीज अगेंस्ट द गवर्नमेंट? और अर्नभ एक और अपने को एंकर के साथ बैठे हुए हैं। एंकर यह पूछ रहा है कि लोग Twitter पर सवाल कर रहे हैं। लोग कई जगह सवाल कर रहे हैं। और इस पर अर्नभ का क्या कहना है? उस पर एक शो किया गया था। तो अब आप यह सोच लीजिए कि कैंपेन जर्नलिज्म का ऐलान

1:06 अर्नभ गोस्वामी ने अपने प्राइम टाइम शो में किया। यह कहते हुए कि कैंपेन जर्नलिज्म जरूरी है। अब आप यह सोच लीजिए कि मोदी साहब और शाह जी की के लिए खतरे की कितनी बड़ी घंटी है। क्योंकि कैंपेन जर्नलिज्म जब होता है तो आप जनता के मुद्दे एक अभियान के रूप में उठाते हैं और यह जो अभियान वाली पत्रकारिता है यह वाकई में खतरनाक हो सकती है और खासकर अर्नभ गोस्वामी जो कि अपने सत्ता के प्रति कमिटमेंट के लिए जाने जाते थे। यह कहा जाता था कि वो सत्ता के प्रति नतमस्तक है। मोदी जी के प्रति नतमस्तक है। इनफ मोदी जी के लाडले एंकर्स में वो माने जाते थे। आज उन्होंने प्राइम टाइम प्रोग्राम में ऐलान किया कि वो कैंपेन जर्नलिज्म करेंगे। पब्लिक की आवाज उठानी जरूरी है। अब मैं

1:52 आपको स्क्रीनशॉट दिखाती हूं उस कार्यक्रम का और उसके बाद मैं कोड ग्राफिक्स के जरिए आपको बताऊंगी कि अर्नभ गोस्वामी ने क्या कहा है। ये देखिए पावर टू द पीपल ये कार्यक्रम था और उनकी जो टीआरपी रेटिंग्स है सोशल मीडिया पर उनकी लोकप्रियता बहुत ज्यादा बढ़ गई है। दिस वास अ लास्ट नाइट्स प्रोग्राम उसका मैं आपको स्क्रीनशॉट दिखा रही हूं। पावर टू द पीपल। अब ये एक्स पर वो उन्होंने सवाल उठाए थे और एक्स पर कई लोग उनसे सवाल पूछ रहे थे कि हाउ कम सिंस अ मंथ योर नैरेटिव हैज़ चेंज टुवर्ड्स द करंट गवर्नमेंट। आप देख रहे हैं साइट की स्क्रीन पर ये स्क्रीनशॉट है रिपब्लिक टीवी का जो मैं आपको दिखा रही हूं। ऑडियंस ने उनसे सवाल किया है। पावर टू द पीपल उसका नाम है। अर्नव इस टेकिंग क्वेश्चंस ऑन ट्वीट फ्रॉम द पीपल ऑन Twitter। ही इस टेकिंग क्वेश्चंस ऑन द सोशल मीडिया। उनको नॉर्मल जो रिपब्लिक टीवी पर सवाल लोग लिख

2:40 रहे हैं तो ये दो एंकर्स एक को एंकर है उनके और अर्नभ से ये सवाल किया जा रहा है। अब मैं आपको बताती हूं कि अर्नव ने क्या कहा है। अब उसकी मैंने कोड ग्राफिक्स बनवाई है। कोड ग्राफिक्स के जरिए मैं आपको दिखाऊंगी कि उन्होंने क्या लिखा है? क्या बोला है। इनफैक्ट इट इज कंप्लीटली रोंग टू लुक अपॉन दिस एस प्रो गवर्नमेंट और एंटी गवर्नमेंट। द फैक्ट ऑफ़ द मैटर इज दैट अनलेस यू कैंपेन दिस कंट्री यू वोंट चेंज। इफ यू डोंट शाउट यू विल नॉट बी हर्ड। यू नीड टू हैव अ पर्पस टू योर जर्नलिज्म एंड आई हैव स्ट्रांगली फेल्ट ऑफ लेट। आई एम गोइंग टू अंडरलाइन इंडिविजुअल तौर पर मैं इस लाइन को अंडरलाइन कर रही हूं कि आई हैव स्ट्रांगली फेल्ट ऑफ लेट। यानी कि ये चेंज रीसेंट है। यह खुद एकनॉलेज कर रहे हैं।

3:26 एंड आई हैव स्टोंगली फल्ट ऑफ लेट एंड ओवर अ लोंग पीरियड ऑफ़ टाइम दैट दिस क्रूटनी ऑफ़ द पीपल इज द मोस्टेंट थिंग। वी वांट पीपल टू बी एमावर्ड। नाउ व्हाट हैपन इन द अरावली केस वाज़ रोंग। देयर इज नो प्रो और एंटी गवर्नमेंट। देयर इज ओनली राइट एंड रोंग। एक-एक लाइन उनकी ध्यान से सुनिएगा। आगे चलते हैं। दूसरा प्लेट देखिए इसका। एंड आई फ्ट दैट द अरावली केस आई एम सॉरी वि द ग्रेटेस्ट ऑफ रेस्पेक्ट टू द जजेस द दिसंबर 20थ ऑर्डर व्हिच द कोर्ट्स हैव बीन कंपेल्ड टू पुट इन एबियंस वास रोंग आई कुडंट केयरलेस हु गेट्स अपसेट बाय मी सेइंग देट इज़ रोंग एंड सीजेआई आल्सो रियलाइज़ेस देट दिस मैटर वास रोंग। आई डिड नॉट वांट क्रेडिट। आई डोंट वांट द रिपब्लिक टू बी गिवेन क्रेडिट बाई द सुप्रीम कोर्ट ओर द गवर्नमेंट ऑफ इंडिया। समवेयर आई बिलीव कोर्ट एंड द गवर्नमेंट्स

4:13 अंडरस्टैंड द डिफरेंस बिटवीन द राइट एंड रोंग इज दैट द समवन पुट इट आउट फॉर द पीपल एंड वी चूज टू डू सो यानी कि कैंपेन पत्रकारिता का ऐलान उन्होंने कहा कि पब्लिक की स्क्रूटनी जरूरी है। यह बहुत महत्वपूर्ण बात है। उन्होंने जो बोली और यह बिल्कुल उसके उलट है जो अर्नभ गोस्वामी अभी तक करते हुए दिख रहे थे। अभी तक हमने नहीं देखा था कि उन्होंने सरकार से बहुत ज्यादा सवाल किए हो। लेकिन अब वो कैंपेन जर्नलिज्म की बात कर रहे हैं कि जो इश्यूज है उस पर पब्लिक की स्क्रूटनी बहुत जरूरी है और उस प्रोग्राम का जो हेडिंग था वो पावर टू द पीपल था। यानी कि अब उन्होंने एक तरीके से कह दिया है कि जनता की मुद्दे वो उठाएंगे और अभियान के रूप में उठाएंगे। कैंपेन के रूप में उठाएंगे। अर्नभ गोस्वामी का जो ये चेंज है इससे एक दूसरा

5:01 सवाल खड़ा होता है कि अगर इस तरीके की कैंपेन पत्रकारिता शुरू होगी। कैंपेन जर्नलिज्म एंड पावर टू द पीपल की बात अगर अर्नभ गोस्वामी जैसा लोकप्रिय एंकर करेगा जो कि हम करते ही आ रहे हैं। हम तो पिछले 11 सालों से कर रहे हैं। 12 सालों से इस तरीके की पत्रकारिता हम लगातार या उसके पहले से भी हमेशा से ही हम सब ने और इनफैक्ट जितने स्क्रीन्स पर आप लोग देख रहे हैं सबने उस तरीके की पत्रकारिता की है और हमेशा चाहे वो मनमोहन सिंह की सरकार हो चाहे फिर मोदी सरकार की क्यों ना हो मनमोहन सिंह के समय में भी हम लोगों ने उतने ही सवाल उठाए थे। चाहे वो आदर्श स्कैम हो, चाहे कोल स्कैम हो, 2G हो, कॉमनव्थ हो, सब जगह हमने सवाल किए थे। डिफेंस प्रक्योरमेंट्स को लेकर सवाल किए थे। याद करिए वो दिन जब संसद के अंदर इस तरीके की खबरें आती थी। पेपर कटिंग बीजेपी

5:47 जब विपक्ष में थी वो फ्लैश करती थी और हमारे लिए वो एक बड़ी खबर बन जाती थी। हम उसको हेडलाइन बनाते थे। उस पर प्रोग्राम्स करते थे। प्राइम टाइम पर सवाल पूछा जाता था और मनमोहन जी का मीडिया ट्रायल हुआ था। मीडिया ट्रायल ऑफ डॉ. मनमोहन सिंह जो उस समय की सरकार थी। तो अगर अर्नभ गोस्वामी आज कैंपेन जर्नलिज्म की बात कर रहे हैं तो क्या मोदी जी का मीडिया ट्रायल अब शुरू हो जाएगा और उससे मोदी जी नहीं बच सकते तो गुजरात लॉबी को क्या अब अरनव सत्ता से बाहर करेंगे ये एक सवाल है और आज इसी सवाल के साथ अपनी चर्चा को शुरू करती हूं अपने खास मेहमानों के साथ अनुमा विंग कमांडर अनुमा आचार्य कांग्रेस की नेता प्रवक्ता हमारे साथ हैं। अनुमा जी आपका स्वागत है। हमारे साथ मीनू जैन जी हैं। वरिष्ठ पत्रकार पॉलिटिकल कमेंटेटर आपका स्वागत

6:33 है। विवेक देश पांडे वरिष्ठ पत्रकार पिटिकल कमेंटेटर हमारे साथ हैं। आपका स्वागत है और सिद्धार्थ शर्मा इंडिपेंडेंट मीडिया एनालिस्ट भी हमारे साथ है। सिद्धार्थ आपका स्वागत है। थैंक यू सो मच फॉर जॉइनिंग। और अनुमा जी से शुरू करती हूं कि अनुमा जी ये जो चेंज ऑफ हार्ट इसे कहेंगे या ये एक रियलाइजेशन कहेंगे कि भाई पावर टू द पीपल की बात कर रहे हैं और कैंपेन जर्नलिज्म की बात कर रहे हैं। जो अभी तक ये कहा जाता था और हमारे जैसे जर्नलिस्ट या आप लोग जो स्क्रीन पर उनके देखा जाता है कि अरे ये तो इन लोगों ने तो कांग्रेस से दलाली की है और कांग्रेस का एजेंडा उठाते हैं। लेकिन आज अर्नभ गोस्वामी ऐसे एंकर को भी समझ में आ रहा है कि जो हम या मीनू जैन या विवेक देश पांडे अगर हम पत्रकारिता की बात करते हैं तो वो स्पीक द ट्रुथ टू द पावर आस्क क्वेश्चन।

7:20 आज वो बात 11 सालों बाद अर्नभ गोस्वामी के मुंह से सुनाई पड़ रहा है। ये तो मैं उसे बहुत एक फ्रेश लीज ऑफ लाइफ की तरह देखूंगी बिना उनको कंडेम किए। लेकिन आपका क्या मानना है ये कैंपेन जर्नलिज्म अब क्या मोदी जी को सत्ता से बाहर करेगा? जी आपको आपके सभी दर्शकों को और साथी पैनलिस्ट को नमस्कार। अगर यह हमें अर्नभ गोस्वामी का हृदय परिवर्तन समझना है तो ऑफकोर्स समझने में बुराई नहीं है। लेकिन मुझे वो अर्नभ गोस्वामी भी याद है जिसका हमेशा मारूफ रजा के साथ जब भी डिफेंस की कोई बात होती थी तो मारूफ रजा के साथ बड़ा बैलेंस्ड एक उनकी रिपोर्टिंग होती थी। उनकी डिस्कशंस होते थे। पर धीरे-धीरे जैसे

8:06 जैसे ही उन्होंने 2017 में अपना चैनल बनाया मारूफ एक या दो प्रोग्राम में आए लेकिन उसके बाद यह नैरेटिव जर्नलिज्म की तरफ अर्नभ गोस्वामी शिफ्ट होते चले गए। एक सेना अधिकारी का बेटा जिसके पिता कर्नल होकर रिटायर्ड हुए। बाद में बीजेपी में चले गए। 98 में उन्होंने एक चुनाव भी लड़ा था असम में और वो हारे थे। कांग्रेस के प्रत्याशी थे और फिर धीरे-धीरे वो उस लाइन से अलग होते गए। तो अर्नव का कहीं ना कहीं रुझान भारतीय जनता पार्टी की तरफ था। लेकिन जो 269 वाला जो एक उनकी रिपोर्टिंग थी जो कि बहुत खतरनाक रिपोर्टिंग थी जिसमें उसका फायदा पाकिस्तान के लोगों को मिला क्योंकि लाइव बताने के चक्कर में अर्नव ने हमारी

8:51 सेनाओं को कहीं ना कहीं डायरेक्टली इनडायरेक्टली नुकसान पहुंचाया। लेकिन बाद में अर्नभ को यह मानने लगे थे लोग कि नेशन वांट्स टू नो एक बहुत ही जिम्मेदार पत्रकार होंगे। उन्होंने 2017 में अपना रिपब्लिक चैनल आने के बाद से इन सब चीजों को पूरी तरह से खत्म किया कि वो एक अच्छे जर्नलिस्ट थे। हमने देखा कि अब वो मेजर गौरव आर्य के साथ उन्होंने टाई अप किया जो कि एक बहुत ही उग्रतावादी एक जबरदस्ती लोगों में उन्माद पैदा करने वाला पूर्व सैनिक अधिकारी जिसने छ साल सेना में काम किया तो उसके साथ आने लगे और तब से सब कुछ बिगड़ा राष्ट्रवाद के नाम पर इन्होंने जनरल जी डी बक्शी जैसे लोगों से पता नहीं किस तरह की भाषा बुलवाई उनको एनकरेज किया

9:39 वैसी भाषा बोलने के लिए ऐसे में नरेटिव जर्नलिज्म से कैंपेन जर्नलिज्म की तरफ अर्नव शिफ्ट होना चाहते हैं। आश्चर्य तो है लेकिन यह भी समझ में आता है जो कि हम देख रहे हैं। टीआरपी की भी बहुत बड़ी लड़ाई है। मुझे यह मालूम है कुछ ब्रिगेडियर्स ऐसे हैं। कुछ कर्नल ऐसे हैं। एक तो जनरल भी ऐसे हैं जिन्होंने अर्नभ गोस्वामी के गेस्ट कोऑर्डिनेटर को एक बार कहा था कि उन्होंने जब पूछा आप हमारे प्रोग्राम में आएंगे तो बोले भाई मुझे थोड़ा बहुत मेरा जमीर बाकी है जो मैं तुम्हारे प्रोग्राम में क्यों आऊंगा? मेरा जमीर बाकी है मेरे अंदर। तो बात सीधी-सीधी यह है कि हो सकता है कि अर्नभ गोस्वामी को कहीं से सत्ता की तरफ से जो आर्थिक लाभ

10:26 मिलता होगा वो नहीं मिल रहा है। या फिर क्या हम यह माने कि वो खुद व्यक्ति जो एक ऑक्सफोर्ड से एंथ्रोपोलॉजी किया हुआ है। क्या वो अब मानवीयता की तरफ जा रहा है। तो बड़ा ऐसा शबेच है ये कि इसको मैं इतनी गूढ़ समझ नहीं रखती हूं कि मैं ये मान लूं कि वो अब कैंपेन जर्नलिज्म की तरफ जा रहे हैं। इतने बरसों तक नरेटिव जर्नलिज्म किया। आपको याद होगा कुणाल कांबरा का वो एपिसोड जनवरी 2020 में जब एयरक्राफ्ट में जो झड़प हुई थी उसके बाद सत्ता का इतना आशीर्वाद था अर्नभ गोस्वामी को कि छ महीने के लिए कुणाल कांबरा को इंडिगो की फ्लाइट से डी बार किया गया था। बार कर दिया गया था। तो अर्नभ गोस्वामी कैंपेन जर्नलिज्म की तरफ आ रहे हैं। इसके पीछे कोई ना कोई

11:12 उनका स्वार्थ है। मैं नहीं समझती कि राष्ट्र से जुड़ा या देश से कोई अच्छाई उनके अंदर अचानक पनप गई होगी। मैं यह नहीं मानती। ये कुछ समय की बात है। कल तो हमने अंजना ओम कश्यप को भी देखा कि वो सुधांशु त्रिवेदी को आड़े हाथों ले रही थी और ऑडियंस को उनके खिलाफ तालियां बजवा रही थी। यह सब चीजें टीआरपी से रिलेटेड है। इनका इंसान के व्यक्तित्व से कोई संबंध मुझे तो नहीं लगता है। जी आपने अंजना और कश्यप की बात की। अभी तो रूबिका लियाकत भी आजकल सवाल पूछती हुई नजर आ रही है। अब मैं मीनू जी के पास आती हूं कि मीनू जी इन जनरल अर्नभ गोस्वामी तो बदले हुए नजर आ ही रहे हैं। काफी बदले हैं और उनका ये कहना स्कूटनी ऑफ़ द पीपल इस वेरीेंट। ये बात 11

11:58 सालों में अर्नभ गोस्वामी को नजर नहीं आई। लेकिन उनका ये कहना आप ये देखिए ये लाइन मैं फिर से दोहरा रही हूं इन लाइंस को। इट इज कंप्लीटली रोंग टू लुक अपॉन दिस एस प्रो गवर्नमेंट और एंटी गवर्नमेंट द फैक्ट ऑफ़ द मैटर इज़ देट अनलेस यू कैंपेन दिस कंट्री यू वोंट चेंज। इफ यू डोंट शाउट यू विल नॉट बी हर्ट। यू नीड टू हैव अ पर्पस टू योर जर्नलिज्म एंड आय हाव स्ट्रोंगली फेल्ट ऑफ़ लेट। हैंड ओवर अ लोंग पीरियड ऑफ़ टाइम दट दिस स्क्रूटनी ऑफ़ द पीपल इज़ द मोस्ट इंपोर्टेंट थिंग। मीनू जी मैं चाहती हूं आप इस लाइन पर जरूर कमेंट करें क्योंकि उन्होंने ये कहा कि भाई पीपल की जो स्क्रूटनी है लोगों की जनता की स्क्रूटनी बहुत जरूरी है और ये ऑफ लेट उन्होंने रियलाइज किया तो उन्होंने क्यों रियलाइज किया क्या रवश कुमार जैसे लोग या ध्रुव राठी जैसे लोगों की लोकप्रियता देखकर उनको लगा कि भाई हमें तो कोई देखेगा

12:46 ही नहीं इससे अच्छा है कि अब हम जनता के इश्यूज उठा ले और उसमें हमारा बिजनेस भी संभल जाएगा और हमारी लोकप्रियता भी बनी रहेगी। तो क्या यह एक सेफ स्ट्रेटजी है अर्नभ गोस्वामी की? जी जी देखिए इसमें अर्नभ गोस्वामी से ज्यादा सरकार की स्ट्रेटजी है जो मुझे समझ में आता है। जो सोशल मीडिया पे बातें हो रही है उसमें तो ये कहा जा रहा है कि भाई पुतिन का इंटरव्यू लेने के लिए अर्नभ को डेजिग्नेट नहीं किया गया। उसमें तो अंजना ओम कश्यप समाधा जर्नलिस्ट उनको कहा गया। उससे अर्नव नाराज है या उनको लगा कि यार मैं इस लायक नहीं समझा गया या फिर जो सुधीर चौधरी को दूरदर्शन ने कमीशन किया है यह प्रोग्राम एक देने के लिए और उसके लिए 15 करोड़

13:33 सालाना की जो पैकेज दिया गया है उससे भी अर्नभ गोस्वामी को थोड़ा जेलसी या इस तरीके की कॉम्पिटिटिवनेस या अराइवलरी कही है वो फीलिंग है और उसके लिए वो यहां वो जो आप कह रही है जो कि नैरेटिव जर्नलिज्म से कैंपेन जर्नलिज्म की तरफ आ रहे हैं वो देखिए मैं ऐसा नहीं मानती हूं हालांकि कि अर्नव ने जो अपना करियर शुरू किया और उसके बाद जो अर्नव जो नेशनल सीन पे छा गए वो 2014 तक का जो अर्नव का जर्नलिज्म था वो डेफिनेटली हम भी बहुत उसको बड़े इंतजार के साथ देखा करते थे 9 बजे अर्नभ के शो को टाइम्स नाउ पे लेकिन उसके बाद जब से मोदी सरकार आई है और उसके बाद जो अर्नभ का ये रुख बदलना शुरू हुआ है और आप देख रहे हैं ना केवल अर्नव बल्कि पूरा जितना भी मेन

14:18 स्ट्रीम मीडिया है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्रिंट मीडिया सब जिस एक तरफ से सब के सब सरकार के चरणों में झुके हुए हैं तो उसमें अर्नव भी शामिल है और अर्नव तो सबसे ज्यादा जोर शोर से क्योंकि ये चिल्लाते बहुत है तो चिल्ला चिल्ला के ओवरपावर करते हैं। ऑडियंस के माइंड को भी कैप्चर करते हैं और पैरालिस्ट के माइंड को भी कैप्चर करते हैं। तो वो उनका रवैया उसमें पूरी तरह चल रहा है। लेकिन मेरा मानना ऐसा है कि यह रोल जो है इनको सरकार ने दिया है। क्यों दिया है? नंबर एक दुनिया भर में गोदी मीडिया की ठूठू हो रही है कि इंडिया का जो मीडिया है वो इंडिपेंडेंट मीडिया नहीं है और पूरी तरह सरकार का भू है दरबारी है। जो भी आप नाम दे दे जो दिए जा रहे हैं उनको सोशल मीडिया में उनका मजाक उड़ता है हमारे सोशल मीडिया का जो सॉरी

15:05 मेन स्ट्रीम मीडिया का तो उस इमेज से उबारने के लिए सरकार ने सरकार अपनी इमेज बनाना चाहती है इनके जरिए उसमें रूबिका लियाकत हो या जिनका जिक्र अभी आप कर रहे हैं अंजना ओम कश्यप वगैरह कि वो भी बोलने लगे उनको कहा गया है और दो नंबर दो कि जजी के अंदर कोई आक्रोश अगर उबल रहा हो तो उसको आप सेफ्टी वाल्व देंगे वहां वहां से आप निकालिए ताकि जैन जी को लगे कि यस हमें बोलने की जरूरत नहीं है अपना टाइम खोटी नहीं करने का ये बोल रहा है अरनव बोल रहा है हमारी तरफ से रूबिका लियाकत बोल रही है और आपका ये स्वामी बोल रहा है गोस्वामी बोल रहा है तो अच्छा है वहां से ही जजी का जो आक्रोश है वो निकल जाएगा तो सरकार के दोनों जो मोट जो मिशन है जो जो पपस है वो सर्व होते हैं

15:52 बड़े आराम से गोदी मीडिया की इमेज का मेकओवर हो जाता है कि भाई बड़े इंडिपेंडेंट है। सरकार से पूछ रहे हैं। अब हम और आप भी एकदम से टेकन अ बैक। अरे अरे अर्नभ तो वापस आ गए। बड़े सही हो गए। सुधर गए। जैसा कहते हैं ना कि भाई वो शाम सुबह का भूला शाम को घर आ गया। ऐसा नहीं है। इसमें सरकार ने जो जिम्मेदारी दी है। उन्होंने जिम्मेदारी ये दी है कि आप ऐसा दिखाएं कि देखिए ये लोग भी सरकार से सवाल करते हैं। लेकिन सरकार से सवाल करिए तो हल्के सवाल करिए। बहुत हल्के हैं। ऐसे कि जो हार्मलेस सवाल है आप मैंने देखिए यह शो मैंने पूरा मैंने तो देखा नहीं है जो आपने मुझे कटिंग भेजी वो जो क्लिपिंग भेजी है उसी में मैंने अंदाजा लगाया बट आई डोंट नो कि वहां पर कौन-कौन से सवालों के जवाब दिए हैं। बट अगर उसमें अर्नव ने अभी लेटेस्ट

16:38 जो इशू चल रहा है अभी उन्नाव की पीड़िता का जो इशू है और उसमें जो रवैया है सरकार का भी और कोर्ट्स का भी उस पर सवाल उठाए हैं क्या अर्नव ने? अंकिता भंडारी को लेकर सवाल उठाए हैं क्या अर्नव ने? जो एंजेल चकमा की जो रेशियल जो स्लर की वजह से और उसके ऊपर उसको जो नर्थ ईस्ट की जो एक फेशियल फीचर्स होते हैं उनको ले जो मजाक उड़ाया और उसकी मार मार कर लिंचिंग कर करके हत्या कर दी गई उस पर सवाल उठाया क्या अरनव ने जबकि सर ये जो चकमा थे जो एंजेल चकमा थे वो तो अर्नभ के ही रीजन से आते हैं। अर्नव आई गेस सो की ही इस फ्रॉम आसाम। तो वहां पे उन्होंने सवाल उठाया क्या? और उससे पहले देखिए छ सात दिन से चल रहा है इनका यह जो नया अवतार है अर्नभ का उस पर उन्होंने वोट चोरी पर सवाल उठाया क्या उन्होंने वंदे मातरम के मुद्दे पर

17:25 सवाल उठाया क्या जो सरकार ने बेतुका मुद्दा एक सरकार उछाल के डाल दिया दुनिया के दुनिया के बीच में उन्होंने मनरेगा के ऊपर उठाया फाइल के ऊपर उठाया कौन सा मुद्दा ऐसा जिससे कि सरकार सवालों के घेरे में आती है उन्होंने क्या उठा रहे हैं अरावली का मुद्दा ऐसा हालत सा मुद्दा क्योंकि आप देखेंगे कि इंडिया की पब्लिक ही इंटरेस्टेड नहीं है अरावली के मुद्दे में। आपने भी शो किए उसमें आपने देखा होगा कि लोग देखने ही नहीं आए। मतलब उनको इंटरेस्ट ही नहीं है। कोई कुछ लोगों को थोड़े बहुत एक मिनस्क्यूल है पापुलेशन का जो देखता है। तो उसमें अर्नव ने ये जो अर्नभ है या रूबिका है या जितने भी है उनको जो जिम्मा दिया गया वो अपना ड्यूटी निभा रहे हैं। वो हल्के फुल्के सवाल सरकार से करते रहेंगे। मैं भी आप भी खुश होंगे।

18:11 हम भी खुश रहेंगे कि अर्नव का मेकओवर हो गया है क्या? और एक और इसमें थोड़ा सा एक और इंपॉर्टेंट चीज है कि क्योंकि जो आप जैसे जो यूर्स है जो YouTube पत्रकार हैं उन्होंने जिस तरीके का एक सवाल का सिलसिला लगाया हुआ है और सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं और उसके जरिए पब्लिक को अवेयर कर रहे हैं। एक जागरूकता और पब्लिक को एमावर कर रहे हैं नॉलेज से कि देखिए यह गलत हो रहा है आपके साथ। यह आप सवाल उठाइए यह मांग करिए। वो चीज जो दिखाई दे रही है उससे इनकी क्रेडिबिलिटी बिल्कुल जीरो हो गई है। तो अब इनको लगा कि भ हमें भी Facebook के सवाल लेने चाहिए। हमें भी YouTube से सवाल लेने चाहिए। आप देखेंगे उसमें वो मतलब ऑनलाइन सवाल ले रहे हैं अरनव जी। तो वो ये तरीका और इसमें शूट अप

18:57 भी हुआ है। जैसा बताते हैं कि छ दिन पहले भी उनकी 550% जो उछाल आया है पॉपुलरिटी में तो और अब भी आएगा। लोग देखेंगे क्या हुआ नया। अरे अभी तक चल रहा है तो लोग वहां पहुंचेंगे। एक बार इस्टेब्लिश हो जाने दीजिए अर्नभ को सोशल मीडिया पे फिर आप देखेंगे कि वो ही विल कम बैक कम बैक टू स्क्वायर वन फिर वही होगा अभी इस पे सवाल तो जो उठाएंगे वो हल्के फुल्के उठाए जाएंगे अभी अभी स्किल इंडिया का इतना बड़ा स्कैम हुआ है उस पर सवाल उठाए अरनव ने नहीं चुप है बिल्कुल वो जो अर्नव वो सवाल उठाएंगे जो बिल्कुल हल्के फुल्के हैं और सरकार के ऊपर कोई जवाबदेही आती नहीं है बिल्कुल नहीं आती है तो हम इस मुकालते में ना रहे और देखिए जो यह सरकार जिस तरीके की सरकार है विच हंटिंग करने वाली सरकार हंडिंग करने वाली

19:44 सरकार इसमें मुझे नहीं लगता कि अर्नभ तो क्या कोई भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वाला हिम्मत नहीं कर सकता कि सरकार के खिलाफ बोले या सरकार के खिलाफ आवाज भी उठाए भूल जाइए इसको अच्छे-अच्छे धुरंधर गुफाओं में घुस गए हैं डर के मारे तो मुझे नहीं लगता कि अर्नभ आवाज आपको ध्यान होगा अर्नभ को जब टीआरपी के मामले में जेल हुई थी तो कितना घबराया हुआ था तो वो व्यक्ति आवाज उठा आएगा नेवर। जी ओके मैं अब विवेक के पास आती हूं कि विवेक एक एंकर अपने आप में एक न्यूज़ बन गया है। हालांकि बड़ा हास्यास्पद है। आज हम सब उस व्यक्ति को डिस्कस कर रहे हैं जिस व्यक्ति ने 11 साल में अपना परिचय इस बात के लिए दिया कि वो सत्ता के प्रति कितना नतमस्तक हो सकता है। वो कितनी ज्यादा तारीफ कर

20:31 सकता है। लेकिन अचानक से यह कहा जाता है कि शायद उनका हृदय परिवर्तन हो गया या फिर उनके पास बिजनेस कंपल्शंस है। टीआरपी कंपल्शंस है। लेकिन क्या अर्नभ अब वाकई में ऐसी जमीन तलाश रहे हैं जिस जमीन को रवश ने या ध्रुव राठी ने या आप जैसे या हमारे जैसे प्लेटफॉर्म्स ने जिस जमीन को बनाया है क्या उस जमीन में अब मट्ठा डालने का काम अब अर्नभ गोस्वामी कर रहे हैं जी नीलू ये हृदय परिवर्तन वगैरह नहीं लगता है इसलिए के इतने सालों से वो जिस तरह की पत्रकारिता कर रहे अब सडनली वो कह रहे हैं कि लोग जिस बात की स्क्रुटि करे उसके तरफ ध्यान देना बहुत जरूरी है। ये वो कह रहे हैं। इतने सालों

21:17 से लोग कई चीजों की स्क्रूटिनी कर रहे थे तो आप कहां थे? हृदय परिवर्तन वाले मतलब अनुमा जी ने कहा कि वो हार्व के एंथ्रोपोलॉजी के ग्रेजुएट है। तो ये अभी तक तो एंथ्रो एपोलॉजिस्ट थे। वो सडनली एंथ्रोपोलॉजिस्ट कैसे हो गए? तो ये जो उनका जर्नी है एंथ्रो अपोलॉजी से एंथ्रोपोलॉजी तक यह बिल्कुल इसमें मैं मीनू जी से सहमत हूं कि बहुत सारी ऐसी चीजें हैं जो सीधीसीधी दिख रही है। मतलब कहीं ना कहीं कुछ तो ऐसी बात है जिससे वो मोदी सरकार से खफा है। वो पब्लिक से उनको कुछ मोहब्बत हो गई है। सडनली लोगों की भावनाओं की उनको

22:02 कदर डेवलप हो गई है। ऐसा कुछ लगता नहीं है मुझे। वो इतने सालों से एक व्यक्ति के फेवर में जर्नलिज्म कर रहे हैं जिसका नाम है नरेंद्र मोदी। अब सडनली वो इस देश की जो करोड़ों जनता है, आम जनता है, उनके तरफ से हो जाए। यह बहुत ही आश्चर्यजनक है। तो कहीं ना कहीं यह मुझे इसमें दो पॉसिबिलिटीज है। एक जो मीनू जी कह रही है वो पॉसिबिलिटी है कि कहीं ना कहीं सरकार की तरफ से ये शायद दिशा निर्देश आया हो कि भाई आप एक एंटी एस्टैब्लिशमेंट जर्नलिज्म जो जर्नलिज्म का स्टैंडर्ड डेफिनेशन है। पत्रकारिता क्या है? पत्रकारिता सरकार से सवाल पूछना ये है। हालांकि ये सारे लोग अपोजिशन से सवाल पूछते रहे। इन्होंने दे

22:48 हैड टर्न जर्नलिज्म ऑन इट्स हेड बाय आस्किंग क्वेश्चंस ऑफ द अपोजिशन एंड नॉट ऑफ द गवर्नमेंट। तो ये इन्होंने पत्रकारिता की डेफिनेशन ही उलट कर दी थी। तो अब जनता के प्रश्न हम उठाएंगे और सरकार से सवाल पूछेंगे। इस तरह का अगर कोई रुख इन्होंने अख्तियार किया है तो हो सकता है कि सरकार की तरफ से इनको बताया गया हो। यह एक पॉसिबिलिटी है ताकि कहीं ना कहीं दुनिया में यह मोदी सरकार की इमेज बन जाए कि देखिए भारत में पत्रकार जो है वो सरकार से सवाल पूछते हैं और जो पत्रकार मतलब अर्नभ गोस्वामी जैसा पत्रकार भी सरकार से सवाल पूछ रहा है। ये एक सरकार की इमेज दुनियावी बन जाए ये हो सकता है। ये फेस्ट लगता है थोड़ा सा लेकिन इसकी मोदी की जमाने में

23:36 कोई चीज फेस्ट नहीं है। कुछ भी हो सकता है। दूसरा यह हो सकता है कि कहीं ना कहीं इन लोगों को इस बात का अंदेशा हुआ है। पहली बार भारत के इतिहास में जो सरकार जो किसानों की जो किसानों का जो एजिटेशन हुआ था वो भी कंप्लीटली अपॉलिटिकल था। वो किसी पॉलिटिकल पार्टी ने लीड नहीं किया था। किसानों ने खुद किसानों की संगठनाओं ने खुद उसको आगे बढ़ाया था। उस समय अर्नभ गोस्वामी को शायद उनकी आंख नहीं खुली थी। उस समय वो किसानों की तरफ से बात नहीं कर रहे थे। सडनली अभी ऐसा है कि पब्लिक की जो स्क्रूटिनी है उसको अहमियत देनी है तो फिर आपने किसानों का जो आंदोलन है तो किसानों की तरफ से बात क्यों नहीं की? आप सडनली ये जो अरावली वाला मामला है उसमें पब्लिक का

24:23 एजिटेशन देखते हुए आप सरकार से सवाल पूछ रहे हैं। ये ये जो दो केसेस है दो केसेस में आपने जो आपके कंडक्ट का फर्क है वो कैसे आप एक्सप्लेन करेंगे? ऐसा लग रहा है मुझे कि कहीं एक तो सरकार के दिशा निर्देश से हुआ हो या फिर कहीं ना कहीं सरकार से वह नाराजगी है वो आप जब किसी एक सरकारी पत्रकार जो राज्यसभा टीवी या लोकसभा दूरदर्शन का जो है वो जिसको हमेशा ही जिसके तिहाड़ के वो कारनामे बताकर ही जिसका डिस्क्रिप्शन किया जाता है सुधीर चौधरी वो उसके 15 करोड़ का आप मेंशन क्यों क्यों कर रहे हैं? 15 करोड़ दिए। 15 करोड़ दिए। भाई आपको नहीं दिए। ये आपका प्रॉब्लम है क्या? आप सुधीर चौधरी के जर्नलिज्म के

25:10 बारे में बोलिए ना। आप उनके 15 करोड़ से क्यों नाराज है? क्या आपको 15 करोड़ चाहिए थे। आपको नहीं मिले उनको मिले। ऐसा तो नहीं है। मतलब जब आप उनके 15 करोड़ का मेंशन करते हैं तो आपका गिवस क्या है? इसके बारे में डाउट पैदा होता है। तो यह कहीं ना कहीं ऐसा है कि सरकार का जो फेवर जितना मिलना चाहिए उतना नहीं मिल रहा है। ऐसा है कि शायद सैलरीज पे करने के लिए आपके पास पैसा नहीं हो। यह भी हो सकता है। तो पैसा कहां से आएगा? सरकार की एडवर्टाइजमेंट्स नहीं मिल रही हो। ये भी हो सकता है। इसलिए सडनली सरकार पर दबाव बनाना है। तो ये पब्लिक स्क्रूटिनी वाला मामला कैंपेन जर्नलिज्म। अब क्या होता है कैंपेन जर्नलिज्म? मुझे तो नैरेटिव जर्नलिज्म और कैंपेन मेरे लिए नई टर्म्स

25:56 है। मुझे जर्नलिज्म का एक ही डेफिनेशन मालूम है कि स्पीकिंग ट्रुथ टू पावर। यह इसको जर्नलिज्म बोलते हैं। जो सत्ता में है उससे सवाल पूछो। हम यही जर्नलिज्म है। दूसरा कुछ नहीं है। दुनिया भर में जर्नलिज्म का स्टैंडर्ड डेफिनेशन यह है। अब कैंपेन जर्नलिज्म क्या होता है? हालांकि मैं यह मानता हूं कि जब से मोदी सरकार या इस तरह की रिजीम जब सत्ता में आती है तो आप जर्नलिज्म की स्टैंडर्ड डेफिनेशन को चिपके रहेंगे तो वो बेअसर साबित होती है। आप बहुत ही ज्यादा न्यूट्रल बहुत ही ज्यादा हम किसी का साइड नहीं लेते वाली जर्नलिज्म करोगे तो उससे ना जर्नलिज्म बचेगा ना देश बचेगा। देश नहीं बचेगा तो जर्नलिज्म कहां से बचेगा? तो ऐसे समय में थोड़ा सा एक्टिविस्टिक टोन आपके जर्नलिज्म में आना जरूरी है। जब मोदी

26:44 सरकार जैसी सरकार सत्ता में हो इस तरह के लोग सत्ता में हो तो जर्नलिज्म को एक थोड़ा सा एक्टिविस्टिक टोन लाना जरूरी है। हालांकि मैं जर्नलिज्म एक्टिविज्म के बिल्कुल खिलाफ हूं। जर्नलिज्म शुड बी वेरी स्टेट एंड बोरिंग। इट शुड नॉट हैव एनी एक्टिविस्टिक टोन। इट मस्ट ओनली टेल द ट्रुथ। लेकिन आज का समय ऐसा है कि जर्नलिज्म को थोड़ा क्विक करना जरूरी है और आपको एक कैंपेन के मोड में एक एक्टिविज्म के मोड में जर्नलिज्म करना बहुत जरूरी है। वरना ना देश बचेगा ना जर्नलिज्म बचेगा। तो ये आज की स्थिति अलग है। हालांकि जर्नलिज्म का स्टैंडर्ड डिप्शन यही है कि आप न्यूट्रली हर चीज को जांचे और सरकार से सवाल पूछे। अब ये जो जनाब है अर्नभ गोस्वामी मुझे एक बार इनके

27:29 चैनल से इनवाइट आया तो मैंने कहा कि मैं इतना बड़ा पत्रकार तो नहीं हूं कि अरणभ नहीं आपको अर्नभ जी के साथ में नेशनल प्राइम टाइम में बैठने का मौका मिलेगा। मैं बोला नहीं मैं इतना पत्रकार इतना बड़ा पत्रकार हूं ही नहीं कि मैं उनके साथ बैठ पाऊं। तो मुझे माफ कर दीजिए। मैं नहीं गया वहां पर। तो अब अब ऐसा है कि ये जो जर्नलिज्म है पब्लिक स्क्रूटिनी वाला जर्नलिज्म ये सडनली क्यों कर रहे हैं ये? तो इसके दो तीन संभाव्य कारण जो नीरू जी ने एक बताया वो दूसरा यह कि जो अरावली वाला एजिटेशन है और सिंगर वाला एजिटेशन है आप ध्यान में रखिए कि ये कंप्लीटली पब्लिक ड्रिवन पीपल ड्रिवन एजिटेशन है। ये किसी ने भी कोई लीड नहीं कर रहा है इसको ना कांग्रेस लीड कर रही है। कहां है कांग्रेस

28:16 सनगर के प्रकरण में कांग्रेस कहां एजिटेशन में आया है? अरवली के मामले में लोग उस तरीके से अपने आप ही सड़क पर आए हैं। मतलब एनवायरमेंट के कारण से एनवायरमेंट के कारण के लिए इतना बड़ा एजिटेशन इस देश में शायद पहली बार ये देखा है क्योंकि अत्याचार ही इतना बड़ा है कि लोग उस अत्याचार के खिलाफ उठ खड़े हुए हैं। सगर वाला प्रकरण इतना भयंकर है कि जिससे आपकी गर्दन आपको भारतीय होने पर शर्म महसूस हो। इतना भयंकर प्रकरण वो है तो उसके खिलाफ अगर जनता सड़क पर आई है तो वह उस्त तरीके से स्वयं आई है। अब जब जनता गुस्सा कर रही है तो शायद इनको कहीं से इस बात का अंदेशा आया है कि जब

29:02 जनता सरकार के खिलाफ गुस्से में खड़ी हो जाए तो हम जनता की तरफ से बात ना करें और हम सरकार की तरफ से बात करें तो मार तो हम भी खाएंगे। कहीं ना कहीं यह बदलती बदलती जो हवा है हवा का रुख जो बदला है सरकार के खिलाफ उसका एक उससे लेसन ये लोग ले रहे हैं और वक्त रहते ही संभल जाए नहीं तो जो बांग्लादेश में जिस तरह से न्यूज़ पेपर के ऑफिससेस पे हमला हुआ है उस तरह का अगर हम अरवली पर्वत अरवली के मामले में सरकार की बाजू ले अगर हम सनगर प्रकरण में सरकार की बाजू ले तो हो सकता है मार हमें भी खानी पड़े यह ना हो इससे बचा जाए। वक्त रहते ही सब मोदी सरकार के खिलाफ जनमत और जनता का

29:47 आक्रोश बढ़ रहा है। यह कहीं ना कहीं इसका अंदेशा उनको आया है और हो सकता है वो भी एक कारण हो क्योंकि अगर हम इसी तरह का जर्नलिज्म करते रहे तो कल मोदी सरकार के साथ हम भी मार खाएंगे। तो वक्त रहते ही संभल जाओ। यह भी एक भूमिका हो सकती है। ऐसे अलग-अलग दो तीन कारण इसके लिए हो सकते हैं। लेकिन सिंसियरली वो कहीं उनका मत परिवर्तन हुआ है। हृदय परिवर्तन हुआ ये बकवास है। ये बोगस बात है। ऐसा बिल्कुल नहीं हो सकता। ऐसा नहीं हो सकता। अब मैं सिद्धार्थ के पास आती हूं कि सिद्धार्थ आज अर्नभ की जगह मैं अपने आप को भी रख के देख रही हूं कि मान लीजिए कि हमारा हृदय परिवर्तन हो जाए और मोदी मोदी जी की हम जम के तारीफ करने लगे। वाह मोदी जी जय जय बीजेपी। अगर हम करने लगेंगे आई एम श्योर मेरी ट्रोलिंग तो होगी साथ में लोग यह भी कहेंगे कि अरे लगता है इसको

30:32 पैसे मिल गए बीजेपी से लगता है मोदी जी ने इनकी झोली भर दी है करोड़ों रुपए इनको दे दिए गए हैं और अब ये इनका हृदय परिवर्तन हो गया आज वही चीज अर्नभ के साथ भी मैं उनको एक बेनिफिट ऑफ डाउट यहां पर नहीं दे रही हूं लेकिन ये समझने की कोशिश कर रही हूं कि अगर कैंपेन जर्नलिज्म का अनाउंसमेंट उन्होंने अपने प्राइम टाइम टीवी पर किया और ये बताते हुए कि ऑफ लेट आई हैव फेल्ट दैट द स्क्रूटनी ऑफ़ द पीपल इज वेरीेंट। तो एक सवाल तो ये लोग पूछेंगे कि भाई आप 11 सालों से आप पब्लिक स्क्रूटनी की बात नहीं कर रहे थे। अचानक से ये पब्लिक स्क्रूटनी की और कैंपेन जर्नलिज्म याद आ गया जो बात अभी मीनू जी ने और अनुमा जी ने भी अपने सबमिशन में कही कि भाई नैरेटिव जर्नलिज्म से अब जो पूरी जर्नी जहां क्या कैंपेन जर्नलिज्म पर अब अगर खत्म हो रही है तो कारण तो जरूर ढूंढे

31:19 जाएंगे आज अर्नभ गोस्वामी के कि आखिर कैंपेन जर्नलिज्म का अनाउंसमेंट उन्होंने अपने प्राइम टाइम टीवी पर किया है तो अब मैं उसी सवाल को पूछूंगी सेकंड राउंड में भी कि क्या अब अर्नव मोदी जी को सत्ता से बाहर करने का प्रण उठा खा चुके हैं। जी जी अर्नभ गोस्वामी हमें पता है ऑक्सफोर्ड में पढ़े हुए हैं और कोई भी अंग्रेज जो होता है वो बहुत नवांस होता है। इंग्लिश में उसे नंस कहा जाता है। हिंदी में उसको बारीक कहा जाता है। अंग्रेज बहुत बारीक होते हैं। बहुत नवांस होते हैं। इसीलिए दो साल तक भारत के ऊपर उन्होंने राज भी किया। तो आप जब अभी स्टेटमेंट दिखा रहे थे अर्नभ गोस्वामी का जो आपके पर्दे पर चल रहा था। उन्होंने बहुत चिकनाई से कहीं पर भी भाजपा सरकार को गलत नहीं कहा। एक बार भी बीजेपी

32:05 गवर्नमेंट का नाम नहीं लिया। गवर्नमेंट को क्रिटिसाइज नहीं किया। उल्टा अरावली के मुद्दे पर कोर्ट को गलत कहा और जनता को सही कहा। पावर टू द पीपल जब वो बोल रहे हैं तो जनता को सही कह रहे तो बड़े मजेदार जगह वो खड़े हैं। वो कोर्ट को तो गलत बोल रहे इस देश में आज तक भारत में न्यायपालिका एक ऐसी चीज है जिसके बारे में साधारणतया लोग न्यायपालिका को बहुत ज्यादा आलोचना नहीं करते हैं क्योंकि उनको पता है कि न्यायपालिका में अगर नीचे के कोर्ट में न्याय नहीं भी मिला तो ऊपर के कोर्ट में मिल जाता है। ऊपर के कोर्ट में भी अगर नहीं मिला तो कहीं ना कहीं कोई संविधान पीठ बैठ जाता है। तो न्यायपालिका की जल्दी कोई आलोचना नहीं करता। लेकिन ये आपका जो आपके सामने अर्पण गोस्वामी का स्टेटमेंट है यह बताता है कहीं पर भी उन्होंने भाजपा सरकार को गलत नहीं कहा लेकिन अरावली के मुद्दे पर कोर्ट को गलत कहा और जनता को

32:53 सही कहा और कहा कि पावर टू द पीपल और उन्होंने यह भी कहा कि ऑफ लेट उनको रियलाइजेशन आया है। इसका मतलब हिंदी में वो एक तरह से कह रहे हैं कि देर आया हूं। लेकिन मान लो भैया कि दुरुस्त आ गया हूं। अब वो जब पावर टू द पीपल की बात कर रहे हैं तो भाजपा सरकार तो लोगों का पावर कम किया। भाजपा सरकार में तो सत्ता का केंद्रीकरण इस देश में सबसे ज्यादा अगर किसी किसी कालखंड में हुआ है तो वो तो भाजपा सरकार में हुआ है। बहुत ज्यादा पावर का सेंट्रलाइजेशन हुआ है। पावर का इतना सेंट्रलाइजेशन हुआ है कि कल परसों तक मनरेगा जो कि ग्राम सभा निर्णय करती थी कि हमारे गांव में किसको मनरेगा की नौकरी देनी है। कोई भी ग्रामवासी अपने ग्राम सभा को लिख के देता था कि हमको नौकरी दो। तो 15 दिन के अंदर ग्राम सभा उसको नौकरी देती थी। वो जो ग्राम सभा नौकरी देती थी

33:39 मनरेगा की वो अब नए मनरेगा कानून में तो केंद्र सरकार देगी कि केंद्र सरकार कहेगी कि किस गांव में किसको कितनी नौकरी देनी है। तो यह जो पावर सेंट्रलाइजेशन है जो कि बीजेपी का अपने आप में सबसे बड़ा यूएसपी है। उसका उदाहरण भी है। बीजेपी में कोई आपने देखा है आज तक कोई भारत के पर्यावरण मंत्री का नाम बता सकता है। दो तीन रक्षा मंत्री और वित्त मंत्री और विदेश मंत्री को छोड़ के कोई भी भारत के इतना बड़ा कैबिनेट है। उसमें कौन किस चीज का मंत्री है। किसी को नहीं पता। कोयला मंत्री कौन है? बता सकते हैं क्या? स्टील का मंत्री कौन है? बता सकते हैं क्या? जहाज रानी का मंत्री कौन है? बता सकते हैं क्या? दो तीन मंत्रालय छोड़ के। तो मतलब यह है कि भाजपा को हमें पता है कि भाजपा पूरा का पूरा पावर सेंट्रलाइजेशन करती है। नरेंद्र मोदी जी अकेले हैं। वही चेहरा है, वही सब कुछ है। यत्र तत्र सर्वत्र वही छाए रहते हैं।

34:26 ऐसे में जब अर्नभ गोस्वामी पावर टू द पीपल की बात करते हैं। लेकिन वो बोलते समय कहीं भी भाजपा का भाजपा की आलोचना नहीं करते। इसका मतलब बहुत चिकनाई से वो इस चीज को खेल रहे हैं। क्योंकि अर्नभ गोस्वामी दूसरे पत्रकारों जैसे सिर्फ पत्रकार नहीं है। अर्नभ गोस्वामी दूसरे एंकरों जैसे सिर्फ एक एंकर नहीं है। अर्नभ गोस्वामी भारत के शायद एकमात्र एंकर पत्रकार हैं जो विशुद्ध अपने आप में उद्योगपति भी है। वो किसी चैनल के लिए 15 करोड़ के वेतन पर काम नहीं करते। उनका अपना खुद का चैनल है जिसका सालाना 400 करोड़ का टर्नओवर है और 40 करोड़ तो सालाना उसकी विशुद्ध है। उसकी कंपनी भी है एआरजी आउट मीडिया नाम से वो उनकी पारिवारिक कंपनी है। उसके 85% शेयर उनके परिवार में ही है। 1200 उनके पास

35:12 स्टाफ है। और ये अर्नभ गोस्वामी एंकर भी है। आप ऐसा समझिए कि एक फिल्म है जिसके प्रोड्यूसर भी अर्नभ है, डायरेक्टर भी अर्नभ है, संगीतकार भी अर्नभ है, गीतकार भी अर्नभ है और हीरो भी अर्नभ है। तो अर्नभ का रिपब्लिक चैनल जो है वो अपने आप में एक मीडिया हाउस है। एक उद्योग है वो अपने आप को अर्नभ गोस्वामी को गलतफहमी में भी हम लोग एक एंकर या पत्रकार माने तो गलत हो जाएगा। वह विशुद्ध रूप से उद्योगपति है और उनके चार में से दो चैनल उनके आज चार चैनल चलते हैं। रिपब्लिक इंग्लिश में चलता है। रिपब्लिक भारत हिंदी में चलता है। रिपब्लिक बांग्ला बंगाल में चलता है। रिपब्लिक कन्नडा कर्नाटक में चलता है। और इनके चार में से दो चैनल बंगाली और कन्नड़ भाषा में और संजोग से दोनों जगह पर गैर भाजपा की सरकार है। और किसी भी चैनल को

35:57 हमें पता है आर्थिक लाभ दर्शकों से नहीं मिलता। एडवर्टाइजमेंट से मिलता है कोई अखबार आपको जो सड़क पर अखबार तीन में मिलता है 25 पेज का अखबार आपको लगता है ₹ में वो अखबार चल पाता है उसमें एडवर्टाइजमेंट रहता है इसीलिए तो चलता है तो एडवर्टाइजमेंट ही कोई भी मीडिया हाउस का कोई भी टेलीविजन चैनल का जो लाभ है तो किसी भी चैनल को जो आर्थिक लाभ है वो दर्शकों से नहीं मिलता वो एडवर्टाइजमेंट से आता है और इस देश में यह बताइए कि सबसे ज्यादा पैसा तो सरकारों के पास होता है आप किसी भी बस के पीछे देखिए पेट्रोल पंप पंप पर कहीं भी देखिए सरकारों का कहीं हर जगह तो मोदी जी यत्र तत्र सर्वत्र छाए रहते हैं। कहीं पर उज्जवला गैस योजना छपी रहती है। कहीं आयुष्मान भारत छपा रहता है। बस के पीछे सबसे ज्यादा इस देश में इश्तहार कौन चलाता है? तो सरकारें चलाती है और

36:43 डाटा यह बताता है कि इस देश के वोट शेयर में जब यह देश साधारणत वोट करता है तो दो तिहाई वोट शेयर भाजपा को नहीं पड़ता है। मतलब 33 लोग 100 में से 33 लोग ही भाजपा को वोट देते हैं। 66 लोग भाजपा को वोट नहीं देते और भारत की लोकसभा में भी भाजपा बहुमत में नहीं है। अल्पमत में है। भारत की राज्यसभा में भी भाजपा बहुमत में नहीं है। अल्पमत में है। और कुल भारत में जितने विधानसभा है सबके मिलाकर एमएलए की गिनती कीजिए तो 4200 के आसपास एमएलए हैं। उसमें भी भाजपा के पास केवल एक त है 1400 है। 2600 एमएलए तो गैर भाजपाई है। तो अर्नभ गोस्वामी के साथ उनके ऊपर अब एक व्यापारिक दबाव है। जनता का भी दबाव है कि वो अब अपने व्यापार को अगर उनको बढ़ाना है तो

37:29 उनको भाजपा के नीतियों के खिलाफ बोलना पड़ेगा। क्योंकि इस देश की दो तिहाई जनता इस देश के दो तिहाई से ज्यादा जनप्रतिनिधि दोनों ही गैर भाजपाई हैं। तो गैर भाजपाई एक अर्नभ गोस्वामी एक प्रोडक्ट बना रहे हैं। अर्नभ गोस्वामी को फिर से मैं कहता हूं हम गलती से भी उनको पत्रकार ना माने उनको एंकर नहीं माने। वो एक व्यापारी है और इतना बड़ा जो डिमांड है, इतना बड़ा जो क्लाइंट बेस है, इतना बड़ा जो कंज्यूमर है, जिसको वो कुछ भी दे ही नहीं पा रहे हैं। उस कंज्यूमर के लिए वो प्रोडक्ट ही नहीं दे पा रहे हैं। इस देश के दो तिहाई जनता के लिए उनके पास कोई प्रोडक्ट नहीं है। क्योंकि दो तिहाई जनता भाजपा को जय भाजपा तय भाजपा नहीं चाह रही है। वो भाजपा सरकार की आलोचनाएं चाह रही है। वो भाजपा सरकार की अंदर आने की असलियत जानना चाह रही है। तो कल तक तो अर्नव गोस्वामी वो नहीं दे पा रहे थे। वो तो भाजपा तय भाजपा

38:14 वो कर रहे थे। तो वो अकेले कहां कर रहे बाकी सब लोग भी कर रहे थे। तो नकारखाने में तूती कौन सुनेगा साहब? नकारखाने में तूती कोई नहीं सुनता है। तो वो नकारखाने से बाहर आ गए हैं। अब यहां पर बाहर आकर तूती बजा रहे हैं। ताकि ये जो बाहर का एक दो तिहाई भारत का जो जनसंख्या है जो कि भाजपा को वोट नहीं डालता है। भारत में से भारत में 100 10 लोग 100 में से 66 लोग दो तह लोग तीन में से दो लोग कभी भी भाजपा को वोट नहीं डालते। वो भाजपा विरोधी रहते हैं। भले वो किसी क्षेत्रीय दल को चला जाए। क्षेत्रीय दल हो सकता है भाजपा के साथ चला जाए लेकिन वो खुद भाजपाई नहीं होते तो दो तिहाई लोग जो कि भाजपाई नहीं है उसके उतना बड़ा जो एक दर्शक संख्या है जिस दर्शक संख्या को आज नीलू व्यास ने पकड़ लिया है पब्लिक इंडिया के माध्यम से

39:00 रवश कुमार ने पकड़ लिया है अपने YouTube चैनल के माध्यम से ध्रुव राठी ने पकड़ लिया है अपने tिटर हैंडल के माध्यम से इतना बड़ा जो ग्राहक संख्या है उसमें अर्नभ गोस्वामी कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं वहां पर सबसे ज्यादा पैसा वहां पर सबसे ज्यादा रेवेन्यू है। वहां पर सबसे ज्यादा दर्शक है। तो अब अर्नभ गोस्वामी मेरे ख्याल से नीलू व्यास के साथ कंपटीशन में उतरना चाह रहे हैं। और रवश कुमार के साथ कंपटीशन में उतरना चाह रहे हैं। वो ध्रव राठी के साथ कंपटीशन में उतरना चाह रहे हैं सोशल मीडिया पर। लेकिन मुझे नहीं लगता कि वो वहां पर उन रवश कुमार हो या ध्रोव राठी हो या नीलू व्यास से आगे चले जाएंगे क्योंकि मान लीजिए आप दिल्ली से आगरा किसी को जाना है आपके पास Mercedes बेंस कार भी है लेकिन मैं अगर तीन घंटा पहले निकल चुका हूं किसी एक खटारा कार से भी तो मैं इतना

39:47 दूर आगे चला गया हूं कि आप पीछे से 140 के स्पीड में भी गाड़ी चला के आएंगे तो मुझे नहीं पकड़ सकते ये स्वाभाविक बात है क्योंकि सोशल मीडिया एक ऐसी चीज है जिसमें कि पिछले तीन चार सालों में खास करके 2024 का चुनाव में अपने यहां पे बताता है कि सारा का सारा गोदी मीडिया जितना भी गोदी मीडिया चैनल था सब लोग एक ही डंका बजा रहे थे। इस बार 400 पार, इस बार 400 पार, इस बार 400 पार। यहां तक कि जब क्या कहते हैं? एग्जिट पोल भी आया तो कई चैनलों ने सच में 400 पार दे भी दिया। लेकिन असल में आया कितना? 240। इसका मतलब क्या है? इस देश की ज्यादा जनता किसको देख रही थी? वो मोदी मीडिया को नहीं देख रही थी। वो तो पब्लिक इंडिया को देख रही थी। वो पब्लिक इंडिया को देख रही थी। पब्लिक इंडिया कभी नहीं बोल रहा था कि 400 पार आएगा। पब्लिक इंडिया तो बोल रहा था बैसाखी पर आएगा। बैसाखी पर आ गया। तब अर्नभ गोस्वामी को भी पता है इस देश की जनता अब भाजपा के पक्ष

40:33 में एक पक्षीय मूड में नहीं रही और उस उन लोगों के बीच में अर्नभ गोस्वामी की कोई अलग से पहुंच नहीं है क्योंकि वो जहां पर जय भाजपा तय भाजपा कर रहे हैं वहां पर और भी लोग कर रहे हैं बाकी चैनल भी कर रहे हैं सुदेश चौधरी भी कर रही है सारे चैनल तो जय भाजपा तय भाजपा कर रहे हैं तो नकाराने में मैं तूती बजाऊंगा कोई सुनेगा नहीं तो मैं कम से कम नकाराने से बाहर आके तूती बजाऊंगा तो मेरी सोशल मीडिया पर भी प्रेजेंस पड़ेगी मैंने कहीं पर रिसर्च किया था। मैंने शायद आपको वो डाटा भेजा भी था कि अर्नभ गोस्वामी का टीआरपी जितना घट रहा है एक इंग्लिश में कहा जाता है के शेप ग्राफ के शेप ग्राफ होता है जिसमें कि एक ग्राफ ऊपर चला जाता है एक ग्राफ नीचे चला जाता है अर्नभ गोस्वामी का ये डाटा बता रहा है कि अर्नभ गोस्वामी का टीआरपी टीआर टीआरपी का मतलब आपके घर के अंदर जो

41:20 टेलीविजन लगा हुआ है घर के दीवार पर लगा हुआ है या पुराना टीवी सेट टेबल पर रखा हुआ है वो होता है टीआरपी और सोशल मीडिया होता है जो आपके फोन के ऊपर आप YouTube देख लेते हैं, सोशल मीडिया देख लेते हैं। तो अर्नभ गोस्वामी आज तक आपके घर के दीवार के टीवी पर थे। उस पर उनका टीआरपी था। टीआरपी घट रहा है क्योंकि सिर्फ अर्नभ गोस्वामी का नहीं घट रहा है। लोग टीवी पर न्यूज़ कम देख रहे हैं। अपने फोन पर देख रहे हैं और उसके चलते अर्नभ गोस्वामी का सोशल मीडिया पर ग्राफ बढ़ रहा है। इसका मतलब ही है कि अर्नभ गोस्वामी का ये पूरा का पूरा जो काम है इसका कहीं पत्रकारिता से लेना देना नहीं है। इसका कहीं सच्चाई से लेना देना नहीं है। ये सच को उजागर करने के लिए ये काम नहीं कर रहे हैं। अपना व्यापार विशुद्ध रूप से बढ़ा रहे हैं। अपने ग्राहकों को बढ़ा रहे हैं। एक ऐसा

42:05 ग्राहक वर्ग जहां तक जहां पर कल तक इनका प्रोडक्ट नहीं पहुंचा था वहां पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। इतनी सी बात है। ठीक है। अब मैं फाइनल राउंड ऑफ क्वेश्चन के लिए आऊंगी। एक एक मिनट में अगर सब अपनी बात कह दे मैं मीनू जी के पास आती हूं सबसे पहले और उसी सवाल के साथ कि क्या अब अरनव अगर कैंपेन जर्नलिज्म करेंगे तो मोदी जी का सत्ता से बाहर होना तय आप ये सोचिए याद करिए 2010 2011 2009 से जो शुरुआत हुई थी और जिस तरह से मीडिया डॉक्टर मनमोहन सिंह की सरकार के पीछे पड़ गया था पीछे क्या मतलब सरकार ने मीडिया सवाल ही पूछ रहा था उस समय भी आज का मीडिया सवाल नहीं पूछ रहा है लेकिन अगर कैंपेन जर्नलिज्म वाकई में शुरू शुरू होता है और उन मुद्दों पर जहां पर चीजें मैटर करती है तो क्या मोदी जी का सत्ता से बाहर

42:51 होना तय है? जी देखिए क्योंकि बहुत हमने चारों ने बहुत हर एंगल से इसके विवेचना जिसको बोलते हैं हिंदी में हमने कर ली है कि क्या वजह हो सकती है तो उसमें से अब दर्शकों के विवेक के ऊपर है कि वो इसमें से कौन सी विवेचना को हमारे कौन से पॉइंट्स को मानते हैं कि ये ये वजह है अर्नभ बदल गए हैं या ये फसाड है झूठ बोल रहे हैं कुछ और है अंदर पीछे चल रहा है और ये तो सरकार का ही एजेंडा है कि सवाल करो हल्के फुलके लेकिन आपने पूछा कि क्या मोदी जी के को सत्ता से हटा देंगे जैसे कि इन्होंने मनमोहन सिंह का एक के बाद एक के बाद एक एवरीडे कुछ ना कुछ वो अगेंस्ट सरकार के तब भी वो एक तरीके का उनका नरेटिव चल रहा था नरेटिव आज जाके वो प्रूव हुआ है कि वो फॉल्स नैरेटिव थे इनफ

43:36 जो आपका 2G है कोल है सब कुछ बाद में किसी के ऊपर भी कोई कोई कन्विक्शन नहीं हुआ किसी का भी लेकिन क्या मोदी जी की सत्ता को पलट देंगे हटा देंगे मोदी जी को सत्ता से हर मुझे तो ऐसा लगता है देखिए जो ये मैं ये नहीं कह रही हूं कि ऐसा है। मतलब मैं भी अटकल लगा रही हूं। आपने मुझे कहा है कि अटकल लगाइए। तो हो सकता है अर्नभ गोस्वामी के कुछ लोगों से लिंक हो ओवरसीज और वहां से उनको खबर आई हो कि मोदी जी तो अब जाने वाले हैं सत्ता से। तो कहते हैं ना कि सबसे पहले वो चूहे जो है वो जंप करते हैं शिप शिप को। तो उनको बिफोर एंड खबर आ गई है। एंड ही स्मार्ट इनफ। उनको लगा कि भाई अब तो चलाचली की बेला है। चलिए अब तो बेटर है कि पहले ही आ जाए गुड बुक्स

44:21 में आने वाली सत्ता की अब जो भी आएगा तो ये मुझे लगता है अदर देन दैट तो मैं कुछ और नहीं कर पा रही हूं। बाकी सुनना चाहूंगी मेरे और साथी क्या बोलते हैं। आपने जो बात कही उसी बात को मैं आगे बढ़ाऊंगी और अनुमा जी से पूछूंगी। आप याद करिए किस तरीके से भ्रामक तरीके से उन्होंने राहुल गांधी का एक इंटरव्यू किया था। राहुल गांधी की छवि को कैसे पप्पू साबित किया। फिर वो बात दूसरी थी कि राहुल गांधी ने इतनी मेहनत की पार्टी को अपने दम पर वो आगे लेकर गए कि आज पार्टी फिर से वापस कम से कम 99 100 सीटों पर आज लोकसभा में खड़ी है और राहुल गांधी लीडर ऑफ द अपोजिशन है। एक सवाल पूछूंगी आप निजी तौर पर उसको बताइएगा। मैं ये नहीं कह रही हूं कि आपको पार्टी लाइन फॉलो करनी है। लेकिन अगर आज अपने हृदय परिवर्तन के बाद अर्नभ गोस्वामी कांग्रेस से रिक्वेस्ट करते हैं दैट आई वांट टू डू एन इंटरव्यू वि राहुल गांधी। विल द पार्टी अलव दैट? क्या राहुल

45:10 गांधी का इंटरव्यू अर्नव दोबारा करेंगे? क्या पार्टी उनको अनुमति देगी? रिजल्ट भी कर सकते हैं। नहीं करेंगे भाई। क्या करोगे तुम मेरा? पार्टी उनको पार्टी कराएगी राहुल का इंटरव्यू? मैं ना मीनू जी की बात से, विवेक जी की बात से, सिद्धार्थ जी की बात से सहमत हूं और मुझे भी यही लगता है कि गुड कॉप बैड कॉप खेल रहे हैं। सत्ता प्रायोजित कुछ एंकर बना दिए गए हैं कि जो सत्ता का विरोध दिखाएंगे और वो सत्ता से सत्ता से तो सवाल नहीं पूछेंगे लेकिन ऐसे मुद्दों पर जो कि न्यूट्रल टाइप के मुद्दे हैं जिस पे बोलना ऐसा लगता है कि वो सत्ता को बहुत ज्यादा हानि नहीं पहुंचाएगा। उस पर बोलते रहेंगे। अर्नव गोस्वामी वो व्यक्ति है जिसने अपने रिपब्लिक टीवी के जरिए अब तो खैर उसके पास सारे स्टेक्स

45:56 उसके पास है पर पहले जब राजीव चंद्रशेखर के पास स्टेक्स थे उसके और इसने हमारे एक मेजर गौरव आर्य को लेके एक द पेट्रियट वि मेजर गौरव आर्य और चेकमेट जैसे बहुत ही बड़े नरेटिव प्रोग्राम शुरू किए थे। ऐसे व्यक्ति का हृदय परिवर्तन तो हो नहीं सकता। लेकिन अपना आपका जो सवाल कांग्रेस एक ऐसी पार्टी है जो जर्नलिज्म में भरोसा रखती है और अर्नभ गोस्वामी का जो एजेंडा है एजेंडा के साथ आएंगे तो नेचुरली पार्टी जो दूध का जला है वो तो छाछ को फूंक कर पिएगा लेकिन जिस तरह की हमारी पार्टी है वो किसी से रार नहीं ठानती किसी के खिलाफ लगातार एक जैसा भाव मन में नहीं रखती अगर वह व्यक्ति उसे

46:43 बदला हुआ लगता है तो यह प्योरली राहुल गांधी के ऊपर है जिन्होंने नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान खोली है और इस वक्त राहुल गांधी जानते हैं कि नरेटिव्स किस तरह से बिल्ड अप होते हैं। तो मुझे नहीं लगता कि पार्टी कभी मना करेगी। लेकिन अर्नभ गोस्वामी में ये पूछने की रीड की हड्डी बाकी है क्या कि वो राहुल जी का इंटरव्यू लेना चाहते हैं? अगर वो रीड की हड्डी बाकी है। मुझे नहीं लगता कि है और जो हम उनके इस प्रोग्राम से दिख रहा है कि टीआरपी के लिए पगला रहे हैं वो। उनको मालूम है कि उनका चैनल कोई देखता नहीं है। उसको प्रोपोगेंडा चैनल माना जाता है। उसको देखकर लोगों का ब्लड प्रेशर हाई हो जाता है और उसकी कोई जरूरत नहीं है। तो मुझे नहीं लगता कि अर्नभ गोस्वामी में इतनी हिम्मत है कि वो आकर राहुल गांधी से दोबारा इंटरव्यू मांगे। लेकिन अगर

47:28 मांगेंगे तो मैं जितना राहुल जी को और कांग्रेस पार्टी को जानती हूं वो इससे मना करेंगे लेकिन एजेंडा में नहीं फसेंगे इस बार। ओके ओके। ठीक है। भगवान ना करे कि ऐसा मेरा हृदय परिवर्तन हो कि हम मोदी जी की जय जयकार करने लगे और भगवान करे कि मुझे इतनी ताकत हमेशा भगवान देता रहे कि कोई भी सत्ता में हो हम सवाल वैसे ही पूछे जैसे आज हम मोदी जी से पूछ रहे हैं या कल को किसी की भी सरकार आएगी हम सवाल उसी तरह से पूछे अंत में बहुत संक्षेप में एक-एक कमेंट बहुत संक्षेप में क्योंकि अगला लाइव लगा हुआ है। विवेक आपके पास आऊंगी और फिर सिद्धार्थ के पास क्या कहेंगे अंत में? जी अनम्यूट कर लीजिए। अनम्यूट कर लीजिए विवेक। हां। यह यह जो बदलाव है यह पूरी तरह से स्वार्थ से प्रेरित है या फिर स्वयं रक्षा से

48:14 प्रेरित है। जैसे मैंने पहले कहा स्वार्थ यह हो सकता है कि टीआरपी जैसा सिद्धार्थ जी ने कहा टीआरपी बढ़ाना है या फिर सरकार के दिशा निर्देश पर ही यह चल रहा है या फिर कहीं ना कहीं यह अंदेशा हो रहा है कि पब्लिक ओपिनियन सरकार के खिलाफ बहुत जबरदस्त तरीके से असंतोष बढ़ रहा है और हो सकता है कल उसका खामियाजा हमको भी भुगतना पड़े। ऐसे कई कारण है इसमें स्वार्थ की है। दूसरा कुछ इसमें हृदय परिवर्तन वगैरह नहीं है। इसके बारे में कोई मेरे मन में कोई शंका नहीं है। और ये ऐसे लोग जो है वो गिरगिट जैसा रंग बदलते हैं। ऐसे आप कल देखिए कल अगर सत्ता बदल जाए तो हो सकता है कि ये कांग्रेस की तरफ से बात करने लगे। तो ये रियल जर्नलिज्म करने वाले लोग तो है नहीं। अगर होते तो इस

49:00 तरह से 11 साल में सरकार की इतनी पैरवी नहीं करते। तो यह स्वाद से प्रेरित है या फिर किसी डर से प्रेरित है कि हो ना हो कल अगर कुछ गड़बड़ हो जाए मोदी सरकार के खिलाफ एक जन आंदोलन की लहर देश में उड़ जाए तो उसमें हमारा भी नुकसान हो जाए और फिर यह मुश्किल होगा इस तरह का कोई भी स्टैंड लेना कि जनता का जो आंदोलन है वो गलत है। ऐसा कहना बहुत मुश्किल हो जाएगा। इसलिए अभी ही अभी से ही अगर इस तरह का कुछ संदेशा मिल रहा है तो थोड़ा सा टैकफुली अपने आप को बदल दो और उसमें टीआरपी भी बढ़ रहा है और हो सकता है कि आप जनता के साथ जाते हुए दिखे तो उसमें एक सुरक्षा भी स्वयं की सुरक्षा भी हो जाए। ऐसा कुछ मुझे लगता है कंबाइंड एक एप्रोच से ये काम कर रहे हैं।

49:46 ठीक है। सिद्धार्थ क्या कहेंगे? कंक्लूडिंग जी जब अर्नभ गोस्वामी पावर टू द पीपल की बात करते हैं और वो खुल के आप आपके कार्यक्रम में अभी आप जब वो दिखा रहे थे उनके स्टेटमेंट्स को जब वो पावर टू द पीपल की बात करते हैं तो अगर अगर गोस्वामी इसी लाइन पर रहे तो वो धीरे-धीरे तंत्र को कमजोर करने के बदले लोक को मजबूत करने की बात करेंगे। वो किसी से बीजेपी से सीधेसीधे रा नहीं ठानेंगे। वो तंत्र को कमजोर करने की बात कम करेंगे। वो लोग को मजबूत करने की बात ज्यादा करेंगे। तो मेरे ख्याल से वो जितना होगा तो उससे कुछ समाज का भला ही होगा। उससे कुछ बुरा नहीं होगा। क्योंकि सत्ता केंद्रीकरण जो भाजपा का मेन मॉडल है वो ना तो नैसर्गिक है और ना ही

50:33 संवैधानिक है। भारत के संविधान की शुरुआत ही होती है। इंडिया इस यूनियन ऑफ स्टेट। 274 संशोधन 74 संशोधन के बाद तो ग्रामभा तक को आप सत्ता विकेंद्रीकरण की बात करते हैं। तो वैसे में जो भाजपा पूरी की पूरी सत्ता एक देश एक वन नेशन वन इलेक्शन वन लीडर ये सब जो बात करती है उसके सीधे भाजपा के खिलाफ नहीं भी बोलेंगे लेकिन पावर टू द पीपल की बात करेंगे तो इसका मतलब है आप जनता को मजबूत करने की बात कर रहे हैं तो सफलता की संभावना ज्यादा होती है क्योंकि जो भी सत्ता विकेंद्रीकरण की वकालत करता है उसकी सफलता की संभावना ज्यादा होती है 2011 से 2012 के बीच में जो भारत में सिविल सोसाइटी का आंदोलन हुआ था उसकी भी खास बात यह थी कि कभी उसने मनमोहन सिंह जी से प्रधानमंत्री से सीधे इस्तीफा नहीं मांगा था। कई बार तो उस समय

51:19 के जो लीडर थे वो कहते थे प्रधानमंत्री जी ठीक है। हम कहीं पर सरकार की से इस्तीफा नहीं मांग रहे हैं। हम केवल सिविल सोसाइटी की भागीदारी ज्यादा होने की बात कर रहे हैं। अब वो सही है गलत है अलग बात है। लेकिन उसको ट्रैक्शन मिलता है। ट्रैक्शन तब मिलता है जब आप कुछ क्रिएटिव बात करते हैं। आप कुछ रचनात्मक बात करते हैं। केवल और केवल एक क्रिकेट जैसा है। केवल और केवल आप बैटिंग करके रन बनाना काफी नहीं होता है। सामने वाले को बिंग करके आउट भी करना होता है। तो यहां पर केवल और केवल बीजेपी या भाजपा सरकार की आलोचना कर करके कोई सत्ता में नहीं आ सकता। केवल आलोचना नहीं काम करेगी। आपको उसके बदले रचनात्मक ढंग से विधायक विधायिक ढंग से क्रिएटिव और कंस्ट्रक्टिव भी कुछ ना कुछ ऑप्शन रखना पड़ेगा। मेरे ख्याल से अर्नभ गोस्वामी

52:05 ऑक्सफोर्ड के पड़े हुए हैं। खुद आधे अंग्रेज हैं। अंग्रेजी में अगर अगर ऑक्सफोर्ड में पड़े हुए हैं तो अंग्रेज हैं। मानना पड़ेगा और अंग्रेज जो होते हैं बहुत चिकने होते हैं। बहुत ही बारीक होते हैं। वो इस चीज को जान रहे हैं। इसीलिए बीजेपी के खिलाफ कोई मोर्चा खोलने खोलने के बदले वो जनता के पक्ष में अपने यहां एक मोर्चा खोलने की चालाकी कर रहे हैं। ऐसा मुझे लगता है। लेकिन इससे मुझे कोई घाटा होते हुए नहीं दिख रहा है। क्योंकि इरादा कुछ भी हो। मैं मान लीजिए नीलू जी सड़क पर जा रहा हूं और फिसल के गिर गया और कोई आदमी आकर कहा कि चलो मैं तुमको अस्पताल ले जाता हूं तो मैं उसको ये थोड़े पूछूंगा कि तुम्हारा कैरेक्टर कैसा है? तुम अच्छे आदमी हो या बुरे आदमी हो। अरे कुछ कैसा भी आदमी मुझे अस्पताल ले जा रहा है तो मुझे नीति जो आदमी अगर इस देश की स्थिति आज ऐसी है कि कोई भी व्यक्ति अगर सत्ता विकेंद्रीकरण की बात करता है। इस तंत्र को

52:51 कमजोर करने के लिए कुछ भी करता है तो वो स्वागत योग्य कदम है। वो कितने दिन तक करेगा? इसमें बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह है। हो सकता है कल सुबह आपको पता लगे कि वो वापस पलटी मार के कबड्डी जैसा इस कोर्ट से वापस उस कोर्ट में चले गए। उनका सांस कबड्डी में होता है ना इतने देर में आपका सांस फूल जाता है तो आप वापस चले जाते हो अपने कोर्ट में तो जा भी सकते हैं। ऐसा नहीं है। लेकिन जितनी देर भी वो इस कोर्ट में रहेंगे खेल बहुत रोचक होगा। इसमें कोई दो राय नहीं है। चलिए देखेंगे अर्नभ गोस्वामी जी कुछ कहना चाह रही है। अनम्यूट कर लीजिएगा मैम। बहुत बहुत संक्षेप में हां जी अनम्यूट हां सॉरी आपने अनु जी से पूछा कि राहुल गांधी अपना इंटरव्यू देंगे क्या अर्नभ गोस्वामी को या किसे देंगे तो देखिए मेरे हिसाब से राहुल गांधी जो है अगर इंटरव्यू देंगे तो ओल्ड स्कूल ऑफ जर्नलिज्म से जो जर्नलिस्ट आते हैं उन्हें

53:37 तो बिल्कुल नहीं देंगे किसी हाल में नहीं देंगे जो जजी जनरेशन के जो कोई नए जर्नलिस्ट उभर के आ रहे हैं जो कि नए नजरिए से दुनिया को देखते हैं और नया जिनका आउटलुक है उसको देंगे इंटरव्यू तो वो तो सब भूल जाए कि किसी पुराने जर्नलिस्ट को इंटरव्यू दिया जाएगा। नो चलिए इस चर्चा को खत्म करते हैं। आप सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया। मीनू जी, अनुमा जी, सिद्धार्थ, विवेक थैंक यू सो मच फॉर। थैंक यू।

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