G7 Invite to PM Modi: Respect or Insult? | Shravan Garg Ki Kharee Kharee

简要总结

本视频讨论了印度总理莫迪受邀参加G7峰会一事,以及其中涉及的复杂国际关系。重点包括:

  • 莫迪受邀参加G7峰会,打破了此前关于他可能不会出席的传言。
  • 邀请背后可能涉及印度与加拿大之间的紧张关系,以及对印度外交政策的考验。
  • 特朗普也接受了中国的访问邀请,显示了国际政治中的微妙平衡。
  • 莫迪在G7峰会期间与其他国家领导人的双边会谈机会,以及印度能否在国际舞台上为巴基斯坦的恐怖主义问题争取更多支持。

引言

节目介绍了 श्रवण गर्ग जी 对当前政治局势的评论,并引出了关于印度总理莫迪受邀参加G7峰会的问题。此前有报道称,由于印度与加拿大之间的紧张关系,莫迪可能不会接受邀请。

G7峰会邀请的背景

讨论了印度总理莫迪受邀参加G7峰会一事,并分析了邀请函背后的复杂国际关系。重点提到,在加拿大新总理上任前,由于加拿大指责印度与卡利斯坦领导人尼贾尔被杀事件有关,两国关系紧张。尽管加拿大对此事展开调查,但新总理否认邀请与此事有关。

两个邀请函:印度与美国

分析指出,莫迪接受G7峰会邀请与特朗普接受中国访问邀请具有相似之处,都发生在两国关系紧张的背景下。特朗普接受中国国家主席习近平的邀请,承诺改善两国关系。莫迪和特朗普几乎在同一时间宣布接受邀请,显示了国际政治中的微妙平衡。

印度外交面临的挑战

讨论了印度在国际舞台上所面临的挑战,包括在 पहलगाम 袭击事件后,国际社会对印度的态度,以及印度在反恐问题上未能获得足够支持。尽管印度总理经常出访各国,但在关键问题上,印度未能获得一致支持。

G7峰会的意义

解释了G7峰会的重要性,以及莫迪参加峰会的意义。G7成员国包括美国、加拿大、德国、法国、意大利、日本和英国,以及欧盟。这些国家都是主要的工业化国家,对全球经济和政治具有重要影响力。莫迪可以通过峰会与各国领导人会晤,讨论重要议题。

印度能否在G7峰会上取得突破

分析了印度在G7峰会上可能面临的挑战,包括能否与其他国家领导人进行有效的双边会谈,以及能否在巴基斯坦的恐怖主义问题上争取更多支持。尽管发生了 पहलगाम 袭击事件,但没有国家公开谴责巴基斯坦。此外,联合国和国际货币基金组织等机构在印度反对的情况下,仍然对巴基斯坦采取了支持措施。

对莫迪G7峰会之行的展望

总结指出,印度应该关注莫迪在G7峰会上的成果,特别是在巴基斯坦问题上是否能取得突破。尽管受邀参加峰会缓解了国内的紧张气氛,但真正的考验在于莫迪能否在国际舞台上为印度争取更多支持。节目最后表示,将继续关注事态发展。

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文字稿

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0:00 [संगीत] [संगीत] नमस्कार, मैं हूं आशुतोष और आप देख रहे हैं सत्य हिंदी। सत्य हिंदी के विशेष कार्यक्रम श्रवण गर्ग की खरीखरी में आपका स्वागत है। यह हमारा वह कार्यक्रम है जिसमें देश के जानेमाने पत्रकार संपादक श्रवण गर्ग जी अपनी तीखी टिप्पणी करते हैं मौजूदा राजनीतिक माहौल पर और उनकी तीखी टिप्पणियों से ना तो सत्ता पक्ष बचता है ना ही विपक्ष और दोनों ही तिलमिला के रह जाते हैं। आज फिर रूबरू होंगे समर जी से और जानेंगे कि जी7 में जी7 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जो निमंत्रण मिला है और उस निमंत्रण को जिस तरीके से

0:47 उन्होंने स्वीकार किया है उसका क्या अर्थ है? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि कुछ दिनों पहले एक अखबार में खबर छपी थी बल्कि मैं ये कहूं इस खबर को प्लांट किया गया था कि जी7 की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अगर इनविटेशन मिला तो भी शायद वो नहीं जाएंगे। हालांकि उस खबर का लंबो लुबाब यह था कि कर की जो कनाडा है जहां पे जी7 की मीटिंग हो रही है उसमें और भारत के बीच में अनबन थी और थी भी जब नए वहां प्रधानमंत्री बने उनके पहले जो पुराने प्रधानमंत्री थे जस्टिन ट्रूडो उनके और भारत के बीच में काफी तल्खी थी काफी नुक्ता चीनी भी थी और एक दूसरे को लेकर काफी तीखी टिप्पणियां भी की गई थी और उसका एक बड़ा कारण ये था क्योंकि खस्तानी नेता निजर की हत्या को लेकर कनाडा ने भारत के

1:33 ऊपर गंभीर आरोप लगाए थे और यहां तक कहने की जरूरत की थी कि दरअसल यह सब कुछ भारत के या भारत के सरकार से जुड़े हुए लोगों की वजह से हुआ है। यह एक आरोप था और उसके बाद दोनों देशों के बीच में जमकर जमकर तल्खी हुई। जमकर एक दूसरे के ऊपर गंभीर आरोप लगाए गए। तो उस संदर्भ में इसको देखा गया। अब कनाडा के अंदर चुनाव हो चुके हैं। वहां नए व्यक्ति प्रधानमंत्री बन चुके हैं। लेकिन वह तल्खी शायद बरकरार थी और शायद भारत को या भारत सरकार को इस बात का अंदाजा था कि कनाडा की तरफ से उनको शायद निमंत्रण ना मिले। तो उस खबर को उसी संदर्भ के अंदर देखना चाहिए। अब क्योंकि निमंत्रण मिल गया है। वहां के प्रधानमंत्री ने खुद फोन करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बोला है, निमंत्रित किया है। लेकिन उसके बावजूद भी

2:20 तमाम तरीके की अटकलें अभी भी लग रही है और उसका विश्लेषण बहुत जरूरी है। शवर जी आपका बहुत-बहुत स्वागत है। आपको क्या लगता है? यह पूरा घटनाक्रम क्या दर्शाता है? देखिए हमको दो निमंत्रणों की बात करना चाहिए क्योंकि ये दुनिया एक नहीं दो निमंत्रण पत्रों पर टिकी हुई थी। इस दुनिया की पीस स्टेबिलिटी और हमारे शासना अध्यक्षों की मानसिक शांति उनका [संगीत] तनाव उनमें एक देश तो है भारत। दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातांत्रिक देश और दूसरा देश है अमेरिका और कोई संयोग मानिए आशुतोष जी कि

3:05 दोनों देशों के शासनाध्यक्षों को जी दो निमंत्रण पत्रों की अलग-अलग जगह से प्रतीक्षा थी और लगभग दोनों को एक साथ प्राप्त हुए अब हम उस बात पर आते हैं कि वो दो निमंत्रण पत्र क्या है और दो कैसे प्राप्त हुए हमको कल्पना करना चाहिए आशुतोष जी कि जो हमारे देश के प्रधानमंत्री हैं वो जो साल में लगभग 13 यात्राएं 14 यात्राएं यानी हर महीने एक डेढ़ यात्रा करते हैं विदेशों की उनको और सब दुनिया के सारे फोरम्स में मतलब बड़ी-बड़ी शिखर वार्ताओं में जो जाते

3:52 रहे हैं मतलब मतलब उनके बारे में जो कहा जाता था कि वो भारत कभी यात्रा पर आने वाले हैं। हम वो अगर 15 से 17 जून तक कनाडा में हो रहे शिखर सम्मेलन में अगर मोदी जी को नहीं बुलाया जाता तो आप कल्पना कीजिए कि बीजेपी को सरकार को और मोदी जी को किस तरह के तनाव से गुजरना पड़ता। आप सोचिए कि शिखर वार्ता 15 तारीख से होने वाली है। इसी 15 से होने वाली है। जी मोदी जी को सिर्फ नौ दिन पहले बुलाया गया है। मतलब आप सोचिए कि इस बीच में क्या-क्या गुजरा होगा। मतलब दोनों देशों के बीच या जो आयोजन समिति है

4:40 उसके और भारत के बीच या कुछ लोगों ने क्या मजद की होगी हम्म। और अगर नहीं बुलाया जाता तो पीएम और सरकार क्या इस ये जो तनाव है वो कितना झेल पाते क्योंकि ये कोई जैसा आपने भी कहा सोशल मीडिया पर प्लेटफॉर्म्स पर कई तरह की कहानियां चल रही थी जी उनको नहीं बुलाने को लेकर या आमंत्रण नहीं भेजने को लेकर और इसमें एक चीज जो आपने बताया वो खस्तानी जो वहां की पपुलेशन है, लोग हैं, नेता हैं, उनका दबाव नई सरकार पर बताया जा रहा था कि वो उनके पीछे थे। निंजर की

5:26 हत्या के बाद और पन्नू पर जो अमेरिका में हत्या के प्रयास हुए उसको लेकर यह बात कही जा रही थी कि उसमें भारत की या भारत सरकार की भूमिका को लेकर आरोप लगाए जा रहे थे। एक चीज पर गौर करना चाहिए कि प्रधानमंत्री जो है भारत के हम वो शायद आखरी बड़े नेता रहे होंगे इस शिखर वार्ता में आमंत्रित किए जाने वाले मतलब ऐसा बहुत कम होता है कि शिखर वार्ताओं के नौ दिन पहले किसी को बुलाया जाए। अगर आप राष्ट्रीय अध्यक्षों के टूर प्रोग्राम्स को देखें तो उनकी तारीखें काफी पहले से तय होती है। आपने यह भी देखा कल कल की बात है शुक्रवार

6:13 की बात है कि मोदी जी ने तुरंत स्वीकार कर लिया उसको और जैसा आपने कहा कि कहा जा रहा था कि स्वीकार नहीं करेंगे। अब कांग्रेस या किसी अन्य विपक्षी दल की तरफ से हमको इस आरोप की प्रतीक्षा करना चाहिए कि इस आमंत्रण को प्राप्त करने के लिए उसी तरह की कोशिशें की गई होंगी या नहीं की गई होंगी। जैसे कि ट्रंप के इनोगेशन के लिए मोदी जी की प्रेजेंस को लेकर कहा गया था कि जो हमारे विदेश मंत्री हैं वो गए हैं अमेरिका गए और ये तमाम चीजें की। राहुल गांधी ने आरोप लगाए। फिर जयशंकर

7:00 ने उसका खंडन किया। देखिए इसमें जो एक चीज है कि कनाडा के नए प्रधानमंत्री ने इस चीज को का खंडन कर दिया है कि खाली नेता निज की हत्या में भारत की कथित भूमिका को लेकर का निमंत्रण से कोई संबंध है उन्होंने कहा कि कनाडा में इस मामले की कानूनी जांच चल रही है। इन्वेस्टिगेशन चल रहा है। और इसका उससे कोई संबंध नहीं है। अब मैंने कहा था कि जो शुरू में अपनी भूमिका में कि हमको एक निमंत्रण पत्र की बात नहीं करना चाहिए, दो की करना चाहिए।

7:46 तो वो दूसरा निमंत्रण पत्र इसलिए जरूरी है कि उसका जिक्र इसलिए जरूरी है कि इस समय दुनिया भर में केवल दो नेता चर्चा में है। एक तो मोदी जी है और एक ट्रंप है। आपने गौर किया होगा आशुतोष जी कि जिस तरह से मोदी जी ने स्वीकार किया कनाडा यात्रा का निमंत्रण उसी तरह से ट्रंप ने चीन यात्रा का निमंत्रण पत्र निमंत्रण तुरंत स्वीकार किया। मतलब जो चीन के साथ तनावपूर्ण संबंध चल रहे हैं अमेरिका के ट्रेड को लेकर और तमाम चीजों को लेकर। इस बीच यह खबर आती है कि ट्रंप की और शी की बीच कोई डेढ़ दो

8:32 घंटे की मुलाकात बातचीत हुई फोन पर और उसमें चीन के राष्ट्रपति ने ट्रंप को आने का निमंत्रण दिया और ट्रंप को अपनी पत्नी मलेना के साथ और ट्रंप ने उसको स्वीकार कर लिया तुरंत और बड़ी उम्मीदें जगाई है कि इससे अ दोनों देशों के बीच बीच में बहुत अच्छे संबंध बनने वाले हैं। अब यह भी एक है कि दोनों के जो घोषणाएं हैं मोदी जी को निमंत्रण की और ट्रंप को निमंत्रण की अगर आप उनकी तारीखें देखें उनका समय देखें तो लगभग आसपास का समय है। एक चीज और मैं कहना चाहता हूं कि जो

9:18 जिस तरह के तनाव से देश और सरकार और मोदी जी गुजर रहे हैं। उसमें हम ये मान के चल सकते हैं कि मोदी जी का इस समय विदेश यात्रा पर जाना बहुत जरूरी हो गया था। जैसे हमारे यहां कहते हैं ना कि थोड़ा सा कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति तनाव में हो तो कहते हैं थोड़ा घूम। 22 अप्रैल को जो घटना हुई पनामा ये पहलगाम की और ऑपरेशन सिंदूर उसके बाद हुआ और उस दौरान दुनिया भर के देशों ने जिस तरह का रुख हमारे प्रति अपनाया जिसको देखकर हम लोगों ने दुनिया ने आश्चर्य

10:04 किया उसके बाद निश्चित ही हमारी पूरे के पूरी डिप्लोमेसी को पीएम की प्रतिष्ठा को फॉरेन अफेयर्स के डिपार्ट को विदेश विभाग को बहुत धक्का लगा है। और यह अगर निमंत्रण जो मिला है जैसा मैंने कहा है कि प्रधानमंत्री अपने कार्यकाल के पूरे दौरान 11 साल के दौरान करीबन 150 देश 150 बार विदेश यात्राओं पर गए हैं। तब 80 90 देशों की यात्राओं पर गए। और पहलगाम वाली घटना के दिन भी प्रधानमंत्री अह सऊदी अरेबिया में थे। जेद्दा में

10:51 थे। इसी साल मतलब 2025 की अगर बात करें तो इसी साल प्रधानमंत्री ने फ्रांस की, अमेरिका की, मॉरीशस की, थाईलैंड की और श्रीलंका की यात्राएं की थी। तो उस लिहाज से अगर कहें कि भाई प्रधानमंत्री दो महीने से कहीं नहीं गए क्योंकि कनाडा जाएंगे तब तक लगभग दो महीने होने आ जाएंगे मतलब 22 अप्रैल से 15 जून तक के बीच में। अब हम इस बात पर आते हैं कि जी7 में जाने का क्या अर्थ है? मतलब जी7 में कि जाना क्यों जरूरी है प्रधानमंत्री के लिए? ये जी7 का जो शिखर सम्मेलन है आशुतोष जी ये इसके जो राष्ट्र

11:39 हैं सात जो बड़े राष्ट्र हैं अमेरिका है, कनाडा है, जर्मनी है, फ्रांस है, इटली है, जापान है और अ इंग्लैंड है, ब्रिटेन है जिसको कहते हैं। ये तो साथ हैं और यूरोपियन यूनियन की भी इसमें भागीदारी होती है। और जितने बड़े ये इनको औद्योगिक देश कहा जाता है, औद्योगिक राष्ट्र कहा जाता है। और उसके अलावा वर्ल्ड बैंक, एशियन डेवलपमेंट बैंक और आईएमएफ वगैरह के जो चीफ होते हैं, वह भी होते हैं। आपने एक जिक्र किया था भूमिका में तो मैं उसमें कनाडा के साथ संबंधों को लेकर मैं एक चीज का जिक्र करना चाहता हूं कि हमारा जो ये सर्वदलीय

12:26 प्रतिनिधिमंडल सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल जो सात प्रतिनिधिमंडल थे वो कई देशों की यात्रा पर गए थे। कनाडा उसमें नहीं था। मतलब उसमें अमेरिका था, जर्मनी था, फ्रांस था, इटली था, जापान था और यूनाइटेड किंगडम था। हमारे इतने खराब संबंध या तनावपूर्ण संबंध रहे हैं कि हम हमने उसमें जा कनाडा को शामिल नहीं किया था। और अब ये जी7 की जो शिखर वार्ता है कनाडा में हो रही है और इसी का जो निमंत्रण है वो हमको बहुत मतलब काफी इसको कहना चाहिए कि सांस रुकवाई गई

13:12 इसमें पूरे हमारे राष्ट्र के कि वो मिलेगा कि नहीं मिलेगा। दूसरा मुद्दा यह है आशुतोष जी कि यह जो प्रतिनिधिमंडल गए थे दुनिया के मुल्कों में इसमें अगर अमेरिका को छोड़ दें कि ये लोग जब थरूर और उनके लोग जब लौटे कोलंबिया से और पनामा वगैरह से अमेरिका आए। सबसे पहले न्यूयॉर्क गए थे। जहां नाइन 11 की के को श्रद्धा के स्थल को जीरो ग्राउंड जीरो पर श्रद्धांजलि अर्पित करने के बाद यह चले गए थे। दूसरे देशों में अब ये अगर इनकी उपराष्ट्रपति

14:01 वंस से मुलाकात नहीं होती थरूर की के प्रतिनिधिमंडल की। तो यह कह सकते हैं कि यह जो सातों प्रतिनिधिमंडल गए थे इनकी किसी भी देश में उच्च स्तरीय जिसको टॉप पे कहते हैं वहां के शासनाध्यक्षों के स्तर पर कहीं बातचीत नहीं हुई। तब डेनमार्क में तो कहा जाता है कि सारे भूतपूर्व लोगों से इनकी बातचीत होगी। अब यह जो मोदी जी को पहली बार यह मौका मिलने वाला है इस शिखर वार्ता के जरिए कि इतने बड़े राष्ट्रों के साथ उनके राष्ट्रीय अध्यक्षों के साथ वो एक तो मुलाकात करेंगे मतलब सामूहिक

14:48 रूप से फोटो अपॉर्चुनिटी जिसको कहते हैं हमारे लिए इसमें जो देखने की बात है और दुनिया भर के लिए देखने की बात है कि 15 से 17 जून के बीच में मोदी जी को कितना मौका मिल पाता है कि वो वन इन वन बातचीत मतलब अह शिखर वार्ता की साइड लाइन पर जिसको कहते हैं जो सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा होता है बटरल टॉक्स का उसमें मोदी जी कितने लोगों से बातचीत कर पाते हैं। यह बड़ा इंपॉर्टेंट है। और उसमें सबसे भी इंपॉर्टेंट जैसे ये सारे

15:35 देशों ने किसी ने भी पाकिस्तान के आतंकवाद की निंदा नहीं की। मतलब पहलगाम की घटना पर तो दुख व्यक्त किया। पर पाकिस्तान की के दोषी है इस पूरे घटनाक्रम के लिए। वो उसकी निंदा नहीं की और उन सब देशों के साथ प्रधानमंत्री की मुलाकात होने वाली है और उसमें कनाडा भी है। हमको इसमें से यह पॉइंट देखना है कि प्रधानमंत्री बातचीत कर पाते हैं क्या? या यह लोग बातचीत का टाइम देते हैं क्या?

16:21 या यह कहते हैं कि भाई बातचीत नहीं हो पाई या समय नहीं मिल पाया क्योंकि यह इंपॉर्टेंट क्या है कि यूएन सिक्योरिटी काउंसिल ने इस बीच ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान को तालीबान सेंशन कमेटी का प्रमुख नियुक्त कर दिया। उसके बाद एंटी टेररिस्ट कमेटी का उप प्रमुख बना दिया। उसके बाद आईएमएफ ने भारत के विरोध की अनदेखी कर पाकिस्तान को एक अरब डॉलर का लोन दे दिया। यह सब अभी की घटना

17:08 है। वर्ल्ड बैंक ने पाकिस्तान को 40 अरब डॉलर दे दिए और 1 जून को प्रधानमंत्री एडीबी के प्रेसिडेंट से मिलते हैं और 3 जून को एडीबी $0 करोड़ डॉलर पाकिस्तान को दे देता है। ये सब जो चीजें हैं ये काफी बड़े इंडिकेटर्स हैं कि हम लोग एक इतने बड़े 140 करोड़ के राष्ट्र के रूप में इतनी बड़ी डेमोक्रेटिक कंट्री के रूप में एक इतने बड़े नेता जो 11 साल से

17:57 हमको कुछ बता रहे थे कि वह क्या हैं और दुनिया को बता रहे हमको बता रहे थे। उनके होते हुए यह सब हुआ है। हमको प्रतीक्षा क्या करना चाहिए? वह यह करना चाहिए कि प्रधानमंत्री जब लौटते हैं 17 तारीख के बाद 18 को लौटते हैं तो पाकिस्तान के खिलाफ इस शिखर वार्ता में किस उपलब्धि को लेकर वापस आते हैं और कुछ उपलब्धि होती है कि नहीं होती जिसमें जिसके इंडिकेटर्स कई तरह के हो

18:44 सकते हैं कि कोई देश हमारे पक्ष में खड़ा होकर कहे कि हां हम आपके साथ हैं और पाकिस्तान का विरोध करते हैं। क्या आपको लगता है या दर्शकों को लगता है या जो विशेषज्ञ हैं फॉरेन पॉलिसी के उनको लगता है कि अह कोई यह जो यात्रा है किसी बड़ी सफलता में बदलेगी और क्या यह लगता है [संगीत] कि जिस तरह का रवैया दुनिया के देशों ने हमारे साथ किया पूरे घटनाक्रम के दौरान तो क्या हम प्रधानमंत्री की यात्रा

19:31 की समाप्ति के बाद यह कहेंगे कि प्रधानमंत्री अगर कनाडा नहीं जाते तो ज्यादा ठीक रहता। तो हमको शायद प्रतीक्षा करना चाहिए प्रधानमंत्री के जाने की और उनके लौटने की। पर निश्चित रूप से यह जो आमंत्रण हुआ है मिला है इससे देश ने एक राहत की सांस ली है कि अह एक जो तनाव था कि प्रधानमंत्री को नहीं बुलाया और कई तरह की कहानियां गड़ी जा रही थी। तो वह थोड़ा सा एक कुछ समय के लिए उस पर विराम लगा है। अब वह विराम कब तक कायम रहता है यह हम प्रतीक्षा करेंगे। तो हम आज की चर्चा को आशुतोष जी इसी नोट पर समाप्त

20:18 करते हैं। जी थैंक यू सर। थैंक यू। [संगीत] अंडर सेक्शन ऑफ़ द कॉपीराइट एक्ट 1976। परपस क्रिटिस रिपोर्टिंग स्कॉलरशिप एंड रिसर्च पर कॉपीराइट बीज

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