Modi's Shocking Move: 'यसमैन' या संघ का अंत?| Nitin Nabin New BJP Chief | मोदी ने भागवत को चौंकाया!

简要总结

本视频讨论了印度人民党(BJP)新任主席的选举,以及这一选举可能对印度人民党与国民志愿服务团(RSS)之间关系的影响。主要观点包括:

  • 印度人民党选择了一位相对缺乏经验的领导人,引发了关于该党是否正在摆脱国民志愿服务团影响的疑问。
  • 印度人民党内部可能存在权力斗争,阿米特·沙阿的影响力似乎正在增强。
  • 国民志愿服务团可能对印度人民党的组织结构失去控制感到担忧,并试图通过公开活动来维护其影响力。

引言

视频主持人介绍了印度人民党选举新主席的背景,并提出了几个关键问题:莫迪总理是否已经使印度人民党强大到不再需要国民志愿服务团的支持?新主席的选举是否证明了这一点?选择一个看似不合格的候选人,国民志愿服务团是否同意?莫迪和沙阿是否已经完全孤立了国民志愿服务团?印度人民党是否会完全按照莫迪的指示行事?

对新主席选举的反应

评论员对印度人民党选择尼廷·纳宾作为其新任主席表示惊讶。萨蒂什·K·辛格提到,在过去48小时内,似乎已经任命了三位主席,包括国家执行主席以及北方邦和比哈尔邦的主席,表明快速的变化正在发生。他认为,虽然印度人民党不太可能完全忽视国民志愿服务团,但莫迪的团队现在有能力按照自己的意愿行事,国民志愿服务团可能会退居幕后。辛格还指出,阿米特·沙阿的影响力似乎已经超过了莫迪,尤其是在比哈尔邦选举结果和选择尼廷·纳宾担任主席方面。

国民志愿服务团的同意与权力动态

评论员推测,国民志愿服务团可能已经同意了尼廷·纳宾的任命,因为他符合50岁以下的年龄标准,这被认为是党和整个国民志愿服务团家族未来的一个重要因素。然而,他们认为,这个提议很可能来自印度人民党,国民志愿服务团只是默许了。评论员还提到,尼廷·纳宾与比哈尔邦首席部长尼蒂什·库马尔之间存在过节,这可能是他获得奖励的原因。

对印度人民党内部权力转移的分析

评论员维韦克·德什潘德认为,选择尼廷·纳宾表明莫迪和沙阿成功地任命了一个“应声虫”作为印度人民党主席,这表明国民志愿服务团未能阻止这一任命。他认为,这反映了国民志愿服务团的失败。

对印度人民党和国民志愿服务团之间关系的看法

评论员们认为,印度人民党主席的选举之所以拖延,是因为印度人民党与国民志愿服务团之间未能达成共识。他们认为,国民志愿服务团可能已经表示,他们不赞成印度人民党的选择,并警告说,他们将对由此产生的任何后果不承担责任。评论员们还指出,虽然印度人民党中有许多有经验的领导人,但选择尼廷·纳宾表明,莫迪和沙阿正在优先考虑他们自己的议程,并可能试图边缘化国民志愿服务团。

尼廷·纳宾面临的挑战与印度人民党的战略

评论员拉杰什·乔希认为,印度人民党内的决策过程非常明确,纳伦德拉·莫迪是党的领导者,并带领党走向胜利。他认为,尼廷·纳宾的优势在于,他从30岁起就一直关注纳伦德拉·莫迪,并且以其组织能力而闻名。乔希还指出,尼廷·纳宾面临的挑战包括即将到来的西孟加拉邦选举,这将考验他的组织能力。他认为,尼廷·纳宾目前正在接受“学徒期”,就像纳达一样,他的表现将受到密切关注。

对印度人民党和国民志愿服务团之间互动的理解

评论员强调,重要的是要理解印度人民党和国民志愿服务团的运作方式,而不是简单地认为两者之间存在分裂。他们认为,国民志愿服务团的梦想尚未实现,因此他们不会采取任何可能危及政府或纳伦德拉·莫迪的行动。评论员们还认为,尼廷·纳宾可能是一个“妥协候选人”,因为他与国民志愿服务团有着密切的联系,并且不太可能与该组织发生冲突。

对印度人民党内部权力动态的进一步分析

评论员们讨论了纳达在2024年选举中发表的声明,该声明暗示印度人民党不再需要国民志愿服务团。他们认为,这反映了莫迪在古吉拉特邦边缘化国民志愿服务团和VHP的策略。评论员们还认为,国民志愿服务团可能会继续支持印度人民党的议程,但他们希望保持对该组织的控制。

阿米特·沙阿的影响力与未来政治

评论员萨蒂什·K·辛格强调,阿米特·沙阿的影响力正在增强,并可能超过莫迪。他指出,沙阿在北方邦和比哈尔邦的参与表明,他正在巩固自己的权力。辛格还对印度政治的未来以及选举的公平性表示担忧。他认为,如果国民志愿服务团和印度人民党继续合作,他们可能会对宪法和议会制度进行改变。

国民志愿服务团的组织力量与意识形态

评论员维韦克·德什潘德认为,国民志愿服务团与印度人民党之间的冲突不是意识形态上的,而是关于组织控制权的。他认为,国民志愿服务团的基本原则是“组织中才有力量”,他们不会允许自己的组织被削弱。德什潘德还指出,国民志愿服务团的负责人越来越多地出现在公共场合,以表明该组织仍然具有影响力。

对印度人民党和国民志愿服务团之间关系的总结

评论员们一致认为,印度人民党和国民志愿服务团之间的关系是复杂的,并且受到权力斗争的影响。他们认为,莫迪和沙阿正在试图控制印度人民党,并可能边缘化国民志愿服务团。评论员们还认为,国民志愿服务团可能会继续支持印度人民党的议程,但他们希望保持对该组织的控制。

对未来政治的推测

评论员们对印度政治的未来以及国民志愿服务团和印度人民党之间的关系提出了各种推测。他们认为,印度政治正处于一个关键时刻,选举的公平性和宪法的未来都存在不确定性。评论员们还认为,国民志愿服务团可能会继续与印度人民党合作,或者他们可能会试图制造内部冲突。

对尼廷·纳宾任命的最终思考

评论员们对尼廷·纳宾是否会被提升为印度人民党主席表示怀疑。他们认为,莫迪和沙阿可能会改变他们的决定,并任命其他人担任该职位。评论员们还认为,国民志愿服务团的意识形态强调组织的重要性,而不是个人,这可能会导致与莫迪和沙阿发生冲突。

结论

评论员们总结说,印度人民党和国民志愿服务团之间的关系是复杂的,并且受到权力斗争的影响。他们认为,莫迪和沙阿正在控制印度人民党,并可能边缘化国民志愿服务团。评论员们还认为,国民志愿服务团可能会继续支持印度人民党的议程,但他们希望保持对该组织的控制。

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文字稿

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0:01 नमस्कार द डेली शो में आपका स्वागत है। मैं हूं मुकेश कुमार। दोस्तों ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी ने जेपी नड्ढा के बयान को सही साबित कर दिया है। 204 के लोकसभा चुनाव के दौरान नड्डा ने कहा था कि बीजेपी अब सक्षम हो चुकी है। अपने पैरों पर खड़ी हो चुकी है और उसे आरएसएस की जरूरत नहीं है। तो क्या मोदी ने बीजेपी को उसके पांव पर खड़ा कर दिया है और अब उसे आरएसएस की जरूरत नहीं है? नए बीजेपी अध्यक्ष का चुनाव उन्होंने जिस तरह से किया है क्या वो इसका प्रमाण है? मोदी शाह ने एक ऐसे व्यक्ति को बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया है जो किसी भी लिहाज से उसके योग्य नहीं दिखता। हालांकि मोदी समर्थक इसे जनरेशनल शिफ्ट कहकर तालियां

0:47 बजा रहे हैं। मगर क्या बीजेपी के पास ऐसा कोई युवा नेता नहीं था जिसका राष्ट्रीय स्तर पर कोई अनुभव हो, थोड़ा पढ़ा लिखा हो और संगठन के लिए जिसने काम किया हो? जाहिर है कि ऐसे नेताओं की बीजेपी में भरमार है। लेकिन उन्होंने चुना एक नेपो किट को। पूर्व बीजेपी नेता नवल किशोर सिन्हा के बेटे नितिन नवीन सिन्हा को। नितिन पांच बार के विधायक होने के साथसाथ कुछ समय तक छत्तीसगढ़ के प्रभारी थे। बस इतनी ही उनकी योग्यता है। लेकिन हैरत की बात है कि इसके लिए क्या संघ प्रमुख मोहन भागवत पे सहमति ली गई होगी या उन्होंने दी होगी? कहीं वे भी तो इस घोषणा से सदमे में नहीं है। पिछले डेढ़ साल से बीजेपी अध्यक्ष के मुद्दे पर उनकी मोदी के साथ ठनी हुई थी।

1:34 मगर अब एक ऐसा नाम सामने आया है जो माना जाता है कि उनका तो नहीं ही होगा। अगर ऐसा है तो क्या मोदी शाह ने आरएसएस को पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया है? क्या अब बीजेपी पूरी तरह से मोदी के इशारों पर चलेगी? क्या अब वे आरएसएस का इस्तेमाल केवल चुनाव के लिए करेंगे या फिर वोट चोरी के जरिए उन्होंने उसके सहयोग के बिना भी जीतने का इंतजाम कर डाला है। आज की चर्चा इन्हीं सब सवालों पर केंद्रित होगी और इसमें हिस्सा लेने के लिए जो मेहमान हमारे साथ जुड़ गए हैं। आप देख रहे हैं स्क्रीन पर तीन वरिष्ठ पत्रकार हमारे साथ हैं। हमारे साथ विवेक देश पांडे हैं। राजेश जोशी हैं और सतीश के सिंह है। आप सबका कार्यक्रम में बहुत-बहुत स्वागत है। सतीश

2:20 जी आपसे शुरू करते हैं। जी ये झटका आपको कैसे लगा? इतने सारे नाम चल रहे थे और ये कहां से ढूंढकर मोदी जी ले आए? शाह साहब ढूंढ कर ले आए और ऐसा नहीं लगता कि मोहन भागवत को इसका कोई अंदाजा रहा होगा। देखिए सवाल का कैनवास आपका बहुत बड़ा है लेकिन इतना आपको याद रखना चाहिए या हमें यह तो याद है कि आपके शो पर मैंने दो बार कहा था उस समय कि अगर अगले दो दिन में यह घोषणा नहीं हुई तो बिहार के बिहार के चुनाव के बाद होगा क्योंकि वहीं के टॉप सोर्स ने हमें यह बात कही थी कि उस समय मोहन भागवत जी का प्रवास था दिल्ली में

3:05 अगले उस दो दिन में नहीं हुआ नहीं हुआ उनका अनुमान मान था कि दो दिन में शायद हो जाए तो नहीं हुआ तो अब चुनाव बिहार में इस तरह बंपर जीत हुआ उसके बाद तो अब जो चाहे ये लोग करेंगे और उन्होंने यह किया है तो पिछले 48 घंटे में लगता है कि तीन अध्यक्ष तो मिल ही गए एक राष्ट्रीय कार्यकारी और यूपी बिहार के भी मिल गए तो ये धड़ाधड़ परिवर्तन हो रहे हैं। अ आपने अपने प्रस्तावना में कई सारी बातें कही कि क्या संघ से अलग संघ से अलग होने का सवाल नहीं। मुझे नहीं लगता कि यह संघ संघ अब तो अमित शाह अब तो अमित शाह संघ प्रमुख के मंच पे साथ-साथ देखे जा रहे हैं और संघ प्रमुख

3:53 उनकी उनके उनका वेलकम कर रहे हैं। ये परसों तरसों का मैंने एक वीडियो देखा है। तो बात यह है कि अब ये स्थिति में मोदी साहब की टीम है कि वो जो चाहे वो कह के करा ले कर लेगी। उसमें शायद संघ थोड़ा पीछे हट जाएगी। ये हो सकता है लेकिन संघ को दरकिनार करना तो मुझे नहीं लगता कि संभव है। एक बात और जो आपके प्रस्तावना से निकला जो आपके इंट्रोडक्शन में कि मोदी जी की मतलब पूरी चलती है। मैं इसमें एक परिवर्तन कर रहा हूं। मुझे साफसाफ दिखाई पड़ रहा है कि अमित शाह का बोलबाला अभी इस वक्त सबसे ऊपर चला गया है। शायद मोदी जी से भी ऊपर और अमित शाह जी की छाप बिहार के

4:41 नतीजों में बिहार के चुनाव में प्रबंधन में उनका वहां बसे रहना और इसके बाद यह अध्यक्ष नितिन नवीन को चुन लेना। ये बड़ा ही चौंकाने वाला तो फैसला है ही स्तब्ध कर देने वाला भी फैसला है। हालांकि नितिन नवीन से मैं परिचित हूं और नितिन नवीन के मेरे जो मेरा शहरी आवास है जो घर है उसी जगह से एमएलए रहे हैं। ये पांचवी बात इनके पिताजी को भी जानता था। उनका नाम नवीन किशोर सिन्हा था। अचानक उनका निधन हो गया। तब वो बाय डिफॉल्ट अनुकंपा के आधार पर राजनीति में नितिन नवीन जी आए थे। लेकिन बड़ी मृदु स्वभाव के हैं। आप कभी भी उनको फोन करिए, कभी मिलना चाहिए, मिल लीजिए। यह सब है और संगठन की दृष्टि से छत्तीसगढ़

5:28 में वाकई उनका काम बहुत अच्छा था। किसी को यकीन नहीं था कि छत्तीसगढ़ में बीजेपी जीत जाएगा। लेकिन यह किसी को यकीन नहीं होगा कि नितिन नवीन जी देश के भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष बनाए गए हैं। कार्यकारी अध्यक्ष अगर यह अध्यक्ष में तब्दील हो जाता है तो और बड़ी बात हो जाएगी। होना ही चाहिए। तो यह है चौंकाने वाला फैसला है और यह भी हमको लगता है ये दूसरे नितिन हो गए। एक नितिन गडकरी थे तो हमको लगता है एक एक नितिन गडकरी के बाद दूसरे नितिन जी आ गए हैं। तो पहले वाले नितिन गडकरी जी को भी एक इशारा होगा। उनका भी नाम चला। क्या सतीश जी आपको लगता है कि मोहन भागवत की इसमें सहमति रही होगी? पूरी तरह से

6:14 उनको कन्वस किया गया होगा या मोहन भागवत को सरेंडर करना पड़ा है। उनको जानकारी दी गई होगी कि ये बन रहे हैं। आप स्वीकार कीजिए। हमको लगता है इनके तरफ से प्रस्ताव आया होगा क्योंकि एक बात जो चल रही थी जो लोग कह रहे थे जो चर्चा में आई बात कि एक फार्मूला आया था कि 50 के उम्र के नीचे वाले को बनाया जाए अध्यक्ष क्योंकि पार्टी के और पूरे संगठन का पूरे संघ परिवार के भविष्य का सवाल है। तो -50 में नितिन नवीन जी फिट हो गए। नितिन नवीन जी हो गए होंगे। संघ ने नाम तो प्रस्ताव नहीं किया होगा। प्रस्ताव तो इधर से ही आया

6:59 होगा जिसमें संघ ने मौस स्वीकृति दे दी होगी। यह हुआ होगा क्योंकि चर्चा तो पहले भी चल रही थी किसी महिला को बनाने का। ये धर्मेंद्र भूपेंद्र का नाम भी बहुत चला कि अमित शाह चाहते थे। तो कोई ना कोई बातचीत तो हुई होगी। ये तो आप कह सकते हैं। एक और बात जोड़ जोड़ लीजिए। मुकेश जी कि नितिन नवीन वो व्यक्ति है जिनका विधानसभा में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से बड़ा जबरदस्त झगड़ा टाइप का हो गया था। आपको याद रखना होगा क्योंकि उसमें कहा था नीतीश कुमार ने झल्ला के चुप रहो चुप रहो। तुमको तो हम ही बनाए थे। तुम्हारे पिताजी का देहांत हो गया था। 18% वोट हुआ था। हमने तुम्हारा

7:46 मैनेज किया था। इस तरह से उसको उनको शांत किए थे। तो एक ये इस प्रकार का एक अदावत है। दूसरा ये भी है कि ये भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा चल रही है कि नितिन नवीन द्वारा एक इश्तहार छपवाया छपवाया गया था जब मोदी जी प्रधानमंत्री तब नहीं बने थे। उनके नाम से शायद इश्तहार था या उन्होंने ही छपवाया था। और उसी के बाद नीतीश कुमार ने उस इश्तहार से जो एडवर्टाइजमेंट था उससे नाराज होकर थाली छीन ली थी मोदी जी की तो हो सकता है इनाम तो मिलता है कोई लॉयलिस्ट हो तो इनाम मिलता है लेकिन आपका मूल प्रश्न वही है जो

8:32 पहले का और उसका उत्तर तो ये है कि एकदम अचंभा में डालने वाला चॉइस है। अचंभा में बिलकुल विवेक देश विवेक जी ये हम सब जानते हैं कि लगातार बहुत सारे नाम चले अच्छे-अच्छे नाम चले और देश में 50 से नीचे वालों की संख्या बीजेपी में ही अच्छे नेताओं की कमी नहीं है लेकिन ये चुने गए तो ये मोटे तौर पर ये अनुमान है कि एक तो यस मैन चाहिए था और जो भागवत साहब थे वो यस मैन को नहीं बनने देना चाहते थे बीजेपी का अध्यक्ष लेकिन नरेंद्र मोदी या शाह या दोनों इसमें कामयाब हो गए तो ये तो भागवत का एक फेलर हुआ।

9:20 मुकेश जी बिल्कुल आपने सही दिशा में इसका एनालिसिस किया है। पिछले लगभग एक डेढ़ साल से यह सब अह प्रलंबित था मामला। बीजेपी का अध्यक्ष चुना जाना है और फिर उसके लिए कौन होगा? उसकी अटकलें लगाई जा रही थी और ये क्यों इतना प्रलंबित हो रहा है? इसके पीछे एक जो कारण था वो यही था कि संघ के साथ में बीजेपी का कुछ एक मतलब नहीं हो रहा है कि किसको बनाना है। इसमें तो कोई शक ही नहीं। वरना इतना लंबा चलने का कोई कारण दूसरा तो था ही नहीं। अच्छा ये जो नितिन नवीन जो जो कोई भी है ये तो छत्तीसगढ़ का चुनाव तो 2023 में हुआ। उसके बाद से यह अभी तक

10:06 ये तो छत्तीसगढ़ में इन्होंने क्या रंग लाया बीजेपी के लिए तो सबको पता है। सिक्किम में ये नॉर्थ ईस्ट में थे सिक्किम में इन्होंने बीजेपी के लिए बहुत कुछ किया ऐसा बताया जा रहा है। तो इनका रिकॉर्ड तो पहले से ही है। तो पिछले दो साल में ऐसा उन्होंने और क्या कर दिखाया है कि नहीं नहीं ये अपना अह अध्यक्ष बनेगा। ऐसा ऐसा डिसाइड किया गया। तो ऐसा है कि जनरेशन शिफ्ट वगह कुछ नहीं है। जनरेशन शिफ्ट तो आरएसएस ने करवाया था 2009 में नितिन गडकरी को भेजा था। तो क्यों उसको नकार दिया बीजेपी ने उस समय है ना? तो आरएसएस का जनरेशन शिफ्ट आपको नहीं चलता और बीजेपी का जनरेशन शिफ्ट आरएसएस को चले। ऐसा आपका आग्रह है क्या? यह भी एक सवाल पैदा होता है। ऐसा है कि यह मुझे बिल्कुल नहीं लगता कि इसमें कहीं आरएसएस की मंजूरी

10:54 ली गई होगी। आरएसएस ने शायद हो सकता है कि यह कह दिया हो कि भाई आप जाने और आपका अध्यक्ष जाने बाद में हमको मत कहना। हमने अपनी तरफ से आपको सुलझाया था। आप एक्सेप्ट करने के लिए तैयार नहीं है। आप अपना अध्यक्ष को चुनिए और उसके बाद जो भी नतीजे होंगे आप उसके लिए तैयार रहिए। इस तरह की कुछ एक बात आरएसएस की तरफ से बीजेपी को कही गई होगी। या फिर यह भी हो सकता है कि सडनली सरप्राइज के तौर पर नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने एक सरप्राइज सबको दिया होगा। अब ये किसी के लिए सरप्राइज है बहुतों के लिए तो शॉक है। बीजेपी के अंदर भी बहुतों के लिए शॉक होगा क्योंकि ऐसा है कि बीजेपी में इतने अनुभवी नेता है जो चारचार पांचप दशक से बीजेपी में काम कर

11:41 रहे हैं। नितिन गडकरी लगभग 70 के करीब अभी उनकी उम्र 69 साल के है शायद वो अभी तो 70 के करीब है। तो ऐसे सारे जो बड़े-बड़े नेता हैं वह क्या अभी डिक्टट लेंगे नितिन नवीन से और ऐसा ये किसी एक राज्य का मुख्यमंत्री बनाने वाला इशू नहीं है। आपने मोहन यादव को बना दिया मध्य प्रदेश में सबको आश्चर्य लगा। आपने वो शर्मा जी है। कोई वो पहली बार ही चुनकर आए थे। उनको राजस्थान का मुख्यमंत्री बना दिया। एक एक प्रदेश में इस तरह का कोई एक सरप्राइज देना ये ये ठीक है। ये आपने एक्सपेरिमेंट किया कुछ स्टेट्स में वो ठीक है। लेकिन पूरे देश के लेवल पर जहां पर आपको सारे देश के बीजेपी के बड़े-बड़े नेताओं के साथ उस व्यक्ति को डील करना है आए दिन जो

12:28 अध्यक्ष बनेगा वो व्यक्ति उस तरह का होना चाहिए जिसने पूरे देश में प्रवास किया है। पूरे देश में कई कई अलग-अलग जगह पर उसने अलग-अलग जिम्मेदारियों का निर्वाहन किया है और जिसने पूरे देश में अपनी अपना कॉमटेंस सिद्ध किया है केवल बिहार केवल छत्तीसगढ़ और सिक्किम में नहीं पूरे देश में कुछ उन्होंने ऑ्गेनाइजेशन के लेवल पर कुछ कर दिखाया है। ऐसा कोई अगर व्यक्ति उन्होंने चुना होता वो अगर आरएसएस के सम्मति से भी नहीं चुना होता तो भी माना जा सकता था। लेकिन यह क्या है कि किसी बिहार का कोई एक नोवस जिसको कोई पहचानता नहीं है बिहार के बाहर किसी को पता नहीं है। बिहार के अंदर भी कितने लोग पहचानते हैं मुझे पता नहीं। उसको चुनना ये यस मैन को चुनने चुनने के बराबर ही है। मुझे नहीं लगता कि वो कोई

13:15 नड्डा भी कौन से नो मैन है। वो भी तो यस मैन ही है। लेकिन कम से कम वो सेंट्रल मिनिस्ट्री में मिनिस्टर के तौर पर उनको देश जानता था और वो उम्र के हिसाब से भी बड़े थे। तो और एक्सपीरियंस के हिसाब से भी वो बड़े थे। तो ये जनरेशनल शिफ्ट के नाम पे अपने मन की अपने मन का चॉइस पार्टी पर थोपना ये जो है ये हुआ है मुझे लगता है और प्रत्यक्ष में तो काम तो अमित शाह ही करेंगे। सारे डिसीजन तो अमित शाह ही लेंगे। नितिन नबीन ज्यादा से ज्यादा क्या कर सकते हैं? सजेशंस दे सकते हैं कि भाई हम क्या ऐसा कर सकते हैं? लेकिन अंतिम निर्णय तो नरेंद्र मोदी और अमित शाह का ही होगा। तो ये यस मैन चुनना है और आरएसएस को

14:01 एक तरह से दरकिनार करने का ही यह प्रयोग है। ऐसा मुझे लगता है। इसके अब ये वर्किंग प्रेसिडेंट बनाए गए हैं। नेचुरल इनका ट्रेजरी जो है वो इनको रेगुलर प्रेसिडेंट बनाने की दिशा में होना चाहिए। मुझे लग रहा है कि मोदी और शाह की जोड़ी ने एक प्रयोग के तौर पर इनका नाम सामने किया है। और जब प्रत्यक्ष इनको इनका एलिवेशन करने की बारी आएगी उस दौरान उससे पहले संघ की तरफ से क्या रिएक्शन आता है? बीजेपी के अंदर से क्या रिएक्शन आता है? इसका थोड़ा सा एक असेसमेंट यह दोनों करेंगे और कहीं अंदर से इस तरह का कोई एक विचार सामने आता है या फिर कोई कोई अनबन सामने आती है तो

14:49 हो सकता है कि इनको वर्किंग प्रेसिडेंट ही रखा जाएगा और प्रेसिडेंट किसी और को मनोनीत किया जाएगा। यह भी हो सकता है उसको अभी इनको पूरी तरह से फॉर्मली बीजेपी का प्रेसिडेंट बनने तक के हमें इंतजार करना होगा कि टर्न ऑफ इवेंट्स क्या होता है और ये सचमुच प्रेसिडेंट बनते हैं फाइनली या नहीं इसका इंतजार करना होगा उसके बाद ही सारी स्थिति मुझे लगता है पूरी तरह से स्पष्ट होगी जी आमतौर पर तो जो कार्यकारी अध्यक्ष बनता है वही अध्यक्ष भी बनता है ऐसा हुआ नहीं है अभी तक कि कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद फिर कोई दूसरा अध्यक्ष ले आया जाए ये बीजेपी की परंपरा रही है। लेकिन लेकिन नहीं लेकिन लेकिन मोदी शाह का कोई भरोसा नहीं। वो सरप्राइज देने में माहिर

15:34 है। हो सकता है कि वो इनको वर्किंग प्रेसिडेंट ही रखेंगे और किसी और को ये भी वो कुछ भी कर सकते हैं। जी जी राजेश जी बीजेपी हमेशा कहती है कि वो दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है। इतना विस्तार हो गया। इतनी बड़ी पार्टी है और एक बौने से व्यक्ति को राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया। इसे कैसे देखेंगे? छत्तीसगढ़ की उपलब्धि क्या इतनी बड़ी उपलब्धि ऐसी उपलब्धि वाले तो दर्जनों नेता होंगे बीजेपी में जो इधरउधर इस तरह की उपलब्धि उन्होंने हासिल की होगी। नितिन नवीन क्यों चुने गए? देखिए मुकेश जी आप भारतीय जनता पार्टी में जो फैसला करने की प्रक्रिया होती है उसको

16:22 हम लोग थोड़ा समझे उसको नजरअंदाज ना करें। फैसला जो भारतीय जनता पार्टी करती है इसमें बहुत साफ-साफ है कि चाहे अध्यक्ष कोई भी होगा पार्टी का नेतृत्व नरेंद्र मोदी कर रहे हैं। इसमें कोई शक नहीं है। पार्टी को जीत की तरफ ले जाने वाला एक ही चेहरा है नरेंद्र मोदी का। इनकी खासियत क्या है? अब ये इस पर बात किया जाए कि इनकी जगह किसी और को बैठा देते। उनके पास भी आप जिनका कोई नाम लोग नहीं जानते कुछ नहीं करते थोड़ा युवा होते तो वो भी आ सकते थे। इनकी खासियत क्या है? जब ये 30 साल के थे तब से ये नरेंद्र मोदी पर नजर रखे हुए और नरेंद्र मोदी इन सहित तमाम और दूसरे जो युवा नेतृत्व है उन पर भी नजर रखे हुए हैं। 30 साल के जब ये थे

17:07 तो इन्होंने अभी बात की सतीश जी ने नरेंद्र मोदी के पोस्टर्स लगवाए। आप इनको कभी किसी विवाद में इनका नाम आपने सुना है? आपने कभी सुना है कि सोशल मीडिया पर यह इन्होंने कहा हो कि हलाल खाना चाहिए या झटका खाना चाहिए। इस तरह के जो बयान देते हैं भारतीय जनता पार्टी के बहुत सारे नेता इनकी ऑर्गेनाइजेशनल स्किल्स जो है वो स्ट्रेटजी इसको माना जाता है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि भारतीय जनता पार्टी में और ऐसे कोई नेता नहीं है। ये अकेले एकमात्र नेता है। भारतीय जनता पार्टी में सेकंड रंग लीडरशिप बहुत स्ट्रांग है। उसको डेवलप करने की भी कोशिश कर रही है। पार्टी जो आप कह रहे हैं कि ये मतलब राजनीतिक कद इनका उतना ज्यादा नहीं है। आप बताइए जो दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं उनका राजनीतिक कद कितना था? राजस्थान से लेके मध्य प्रदेश

17:55 से लेकर के अभी चर्चा हुई है। मनोहर लाल खट्टर को हरियाणा में तब चीफ मिनिस्टर बना दिया था जब यह कहा जाता था कि हरियाणा में तो जाट ही मुख्यमंत्री होगा। मतलब ये आप यह बताइए के जो भी कास्ट इक्वेशन है जो भी कन्वेंशनल अंडरस्टैंडिंग है। उसके खिलाफ जाकर के मोदी और शाह की जोड़ी ने तमाम पिटिकल पंडित्स को उनके स्पेकुलेशन को जी विवेक जी ने अभी कहा भी कि ये एक प्रदेश का मामला होता तो ये प्रयोग चलिए ठीक है कर लिया गया राष्ट्रीय स्तर पर मैं उसी पे आ रहा हूं के नेतृत्व जो है दरअसल नरेंद्र मैंने पहला सेंटेंस जो कहा नेतृत्व नरेंद्र मोदी का है उनके पोस्टर से उनके चेहरे से भारतीय जनता पार्टी

18:41 चुनाव जीतती है इनके सामने जो अभी नवनियुक्त कार्यकारी अध्यक्ष हैं। उनके सामने अभी बंगाल का चुनाव होने वाला है। उनकी ऑर्गेनाइजेशनल स्किल्स जो है वहां सामने आएगी। किस तरह से पार्टी को वो कैसे कोऑर्डिनेट करते हैं। नेशनल लेवल पर कैसे कोऑर्डिनेट करते हैं। इसीलिए इनको अभी अप्रेंटिसशिप में रखा गया है। जैसे नड्डा को रखा गया था। और ये ग्रूमिंग का भी हिस्सा है। अप्रेंटिसशिप का मतलब ये है इनके सामने जो चैलेंजेस आएंगे उनको ये कैसे बिना किसी विवाद में पड़े पार्टी को आगे ले जा सकते हैं इस पर नजर बहुत बारीक होगी। एक बहुत महत्वपूर्ण सवाल यह है कि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस नियुक्ति में दोनों के बीच में किस तरह की बातचीत हुई होगी? मैं

19:26 मेरी किसी से बात नहीं हुई है तो मैं यह नहीं कह सकता हूं आई हैव हर्ड इट फ्रॉम द हॉेज माउथ। मेरी जितनी समझ है उसके हिसाब से हमें हमें यह समझना पड़ेगा कि ये जो हम लोग या पत्रकार या एनालिस्ट जो है ना एक बाहर से छोटी सी कोई चीज होती है कहते अरे अब तो संघ और भाजपा के बीच में दो फाड़ हो गया है। अब तो नरेंद्र मोदी ने नाक रगड़वा दी है संघ को। हम इनकी कार्यप्रणाली को समझना बहुत इंपॉर्टेंट है। देखिए कांग्रेस का जो सपना था महात्मा गांधी का, मौलाना आजाद का, नेहरू का इन सबका 15 अगस्त 1947 को पूरा हो गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सपना अभी पूरा नहीं हुआ है। 100 साल से इंतजार करके वो अपने

20:12 रास्ते पे हैं। वो कोई ऐसी अड़चन नहीं डालेंगे जिससे कि यह सरकार मुश्किल में पड़े। नरेंद्र मोदी मुश्किल में पड़े। मुझे लगता है कि यह कॉम्प्रोमाइज कैंडिडेट रहे होंगे। यह क्योंकि इनका गर्भनाल का संबंध है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद संघ के स्टेबल से निकल के आए हैं। उसके बगैर तो आ ही नहीं सकता है। संघ के स्टेबल से निकल के आए हैं। कभी संघ से कोई खटपट की बात भी कम से कम मैंने नहीं सुनी है। तो इस पर यह हो सकता है कि संघ को कोई ऐतराज ना हो। दूसरी बात दो मैसेजेस भी दिए हैं नरेंद्र मोदी के नेतृत्व ने। एक तो मैसेजेस जो पावर सेंटर्स है बीजेपी के अंदर ही जो बहुत ही डिमिनिश भी हो चुके हैं लेकिन फिर भी पावर सेंटर्स हैं। कभी-कभी नितिन गडकरी कुछ उछाले मारते हैं कभी कुछ है या

21:00 पत्रकार जो है वो राजनाथ सिंह का कुछ नाम लेते हैं। इनको भी मैसेज देना चाहते हैं नरेंद्र मोदी कि यह जो हम लोग तय कर रहे हैं यह पार्टी की बेहतरी के लिए है और पार्टी में बिना किसी विवाद के इस बात को स्वीकार करना होगा। यह मैसेज कांग्रेस और जनता को भी दिया गया है कि जब आपके यहां कांग्रेस को यह है जब आपके यहां अध्यक्ष की बात होती है तो मोहल्ले में खड़े होकर के आप एक दूसरे को गाली देते हैं। टेलीविजन कैमरों के सामने आप लड़ाई करते हैं। हमारे यहां सब कुछ बिल्कुल नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अमित शाह के नेतृत्व में संघ के आशीर्वाद से हो रहा है और यह नेतृत्व नया आ रहा है। अभी आज ही इंडिया गठबंधन का जो है वह मैं अभी खबर पढ़ रहा था कि जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री जो है उससे इंडिया गठबंधन से पल्ला झाड़ लिया

21:47 है। ये पॉलिटिकल मैसेजिंग जो है ना इलेक्शन से पहले कि यहां पर इस पोस्ट में किसी को भी रखें आपको जो जो मोबिलाइजेशन है वो नरेंद्र मोदी के पीछे ही होना होगा और संघ को जब तक नरेंद्र मोदी आरएसएस का एजेंडा को आगे ले जा रहे हैं। जब तक उत्तराखंड के मुख्यमंत्री आजकल नए उभरते सितारे हैं। वो धामी वो आरएसएस के एजेंडा को आगे ले जा रहे हैं। तब तक आरएसएस को कोई ज्यादा एतराज नहीं होगा। आरएसएस का ये कहना है कि हमारे एजेंडा को आप आगे ले जाइए एजुकेशन में, क्या बोलते हैं अपना हिस्ट्री में और तमाम सोसाइटी में, मंदिरों में तब हम आपको नहीं करेंगे। लेकिन आप यह घमंड भरे जो है बयान ना दीजिए कि अब हम इतने बड़े हो गए हैं कि अब हमें आरएसएस की जरूरत नहीं है। 204 में आरएसएस के

22:34 कार्यकर्ता ने हाथ खींच लिया। 240 तक आ गए। अब इनके सामने चैलेंज ये है नए अध्यक्ष के सामने कि अगले छ महीने में आठ महीने में अपने आप को सिद्ध करें कि उनके पास उनके जो खजाने में क्या नई चीज है ऐसी क्या स्ट्रेटजी है वो उनको क्या सिद्ध करना जब आप ही कह रहे हैं कि मोदी शाह को ही देखना है तो उनको सिद्ध नहीं करना है सिद्ध तो मोदी शाह को करना है कि हमने जिसको चुना है वो काबिल है वही सिद्ध करेंगे मोदी शाह ने तो सिद्ध कर दिया अपनी नेतृत्व को तीन बार सिद्ध कर दिया उससे पहले मोदी ने तो अपने नेतृत्व को सिद्ध कर दिया है। इनको सिद्ध करना है कि इनके जो इनके इनकी क्या प्लस पॉइंट क्या माना जाता है कि खामोशी से स्ट्रेटजी बनाते हैं। तो इनको ये पब्लिक के सामने सिद्ध नहीं करना। इनको रिजल्ट ओरिएंटेड नरेंद्र मोदी को

23:20 रिजल्ट चाहिए। रिजल्ट ओर कौन सी ऐसा खजाने में से चीज निकालेंगे? कौन सी ऐसी स्ट्रेटजी लगाएंगे कि ममता बनर्जी हार जाए। हारेगी वो अगर अगर ममता बनर्जी हारी अगर हारी तो श्रेय तो उसका नरेंद्र मोदी को जाएगा। मुझे लगता है राजेश जी आप बहुत ज्यादा महत्व दे रहे हैं नितिन नवीन को कि ये स्ट्रेटजी बनाएंगे और ममता को हराएंगे। नहीं मैंने कहा अगर मैंने कहा नहीं नहीं मैं क्या कह रहा हूं इस बात को समझना जरूरी है मैं ये कह रहा हूं कि इनके सामने चुनौतियां आने वाले कुछ ही महीनों में आने वाली है सबसे बड़ी चुनौती वेस्ट बंगाल की है। ने कहा अगर ये हराने में कामयाब हुए तो अगर कहा मतलब ये तो हाइपोथेटिकल है ना तो इनकी इन पर नजर रखी जाएगी ये

24:08 बिल्कुल सतीश जी ये देखिए 2024 के चुनाव में नट्ठा का एक बयान आया था जिसको लेकर काफी तूफान मचा था वो बयान मुझे लग रहा है आज की स्थिति से जुड़ता है नरेंद्र मोदी गुजरात में भी आरएसएस को किनारे लगा चुके थे। बीएचपी को भी किनारे लगा चुके थे। यह उनका उनका उनके राजनीति का ढंग रहा है। आरएसएस रहेगा उसकी मदद लेंगे। उसके एजेंडे को पूरा करेंगे। हिंदू राष्ट्र बनाने की तरफ जाएंगे। वो सब करेंगे। लेकिन इन संगठनों को उनको हैसियत में रख देंगे। तो क्या यह यह जो जिस तरह से चयन किया गया है वो भी यही है। आरएसएस को भागवत को बता दिया गया कि आप आरएसएस

24:55 प्रमुख है। आप बढ़िया प्रवचन दीजिए, उपदेश दीजिए। हिंदू राष्ट्र के बारे में इधर-उधर ज्ञान देते रहिए। लेकिन बीजेपी अब आप छोड़ दीजिए बीजेपी। देखिए मैंने आपसे एक चीज कहा कि अगर यह पहले आराम से सुचारू रूप से तय सीमा में हो जाता तो मानते लेकिन ये तो एक रुका हुआ फैसला था ना और बिहार के चुनाव का इंतजार किया जा रहा है। वो हो सकता है जिस समय आरएसएस से टकराव जैसी स्थिति बनी हुई थी उस समय ऐसा होगा कि आरएसएस बहुत चाहता होगा कि उसका अध्यक्ष हो। तो लगातार तो यह चुनाव में जीत रहे हैं। तो अब उतना प्रेशर शायद आरएसएस का नहीं रहा होगा। तो मुझे लगता है कि प्रस्ताव इसी तरफ से आया होगा।

25:43 मौका ताड़ के ये प्रस्ताव डाल दिया गया होगा और उस पे शायद आरएसएस ने कह दिया होगा। ठीक है भाई ये ये इस तरह की बात हो सकती है। आपने कहा कि 2024 के चुनाव की बात मैं राजेश जी की एक आध बात से सहमत हूं। बाकी सारी बातों उससे मैं असहमति जता रहा हूं। देखिए कोई चुनौती नहीं है। बंगाल में यह हार जाते हैं, रणनीति बनाते हैं, कुछ भी करते हैं। इसका कोई मायने मतलब इस वक्त है नहीं। इसको समझ लिया जाए। एकदम आप बढ़िया से इसको समझ लीजिए। ये क्या है? बंगाल में हार जाएंगे तो मुझे नहीं लगता है कि कोई बहुत बड़ी हार होने वाली है इनकी। वो उसको यह हार मानेंगे भी नहीं। आपको मैं बताऊंगा

26:28 मेरी आप बात समझे तो। लेकिन क्या है कि बात है कि जो सत्ता चल रही है और भारतीय जनता पार्टी में जो नेतृत्व है जो कमांड है जो लॉबी है उस वो बिल्कुल अक्षुण रहना चाहिए। यह पूरा मकसद इसमें यह सिद्ध जरूर होता है कि नितिन नवीन जी कोई ऐसा तो नहीं है कि योगी जी जैसा व्यक्ति है कि जो दहाड़ भी सकते हैं, जनता भी जुटा सकते हैं, कहीं भी चले जाए भीड़ आ जाती है। तो वैसे व्यक्ति की तो जरूरत है नहीं। नितिन और स्ट्रेटजी बनाने की बात कहते हैं तो स्ट्रेटजी तो आजकल भारतीय जनता पार्टी में कोई भी बैठकर बना सकता है। किसी व्यक्ति खास की जरूरत नहीं

27:13 है कि नितिन नवीन जी ही है जो सब स्ट्रेटजी बना देंगे। उसके लिए तो एक अकेला अमित शाह काफी है। आजकल स्ट्रेटजी में भी तो कई तरह की स्ट्रेटजी है ना भाई। पैसा कहां से नितिन नवीन लाएंगे? वो तो सीधे 10 के 20,000 25,000 दे दिया जाएगा चुनाव के बीच में हो गया काम। है कि नहीं? मान लेते हैं। बाकी तो तरह-तरह के आरोप लगते हैं। मैं उसमें नहीं जा रहा हूं। मोटी बात यह है कि यस मैन चाहिए। मोटी बात यह है कि अगर वो व्यक्ति थोड़ा विचारधारा के हिसाब से भी आगे बढ़ता है तो ऐसा व्यक्ति चाहिए। एक लिपिक सॉर्ट ऑफ आदमी चाहिए। जो कि कंप्लायंट रहे। नड्डा साहब ने अगर बयान दिया था 24 से पहले तो क्या लगता है आपको कि जेपी नड्डा साहब का

27:58 वो अपने का बयान था। उनका इंडिविजुअल बयान था। था क्या? उसके बाद की क्या-क्या घटना हुई? हो सकता है देश पांडे जी को मालूम हो। हमें तो मालूम है कि क्या-क्या घटनाएं हुई। तो बात उस समय सच में तल्खी हो गई थी। बड़ी बड़ी बेकार सी स्थिति हो गई थी। कई तरह की बातें हैं। तो मालूम है लेकिन वहां अब कहना उचित नहीं है। लेकिन यह है कि बात यह है कि यह रसाकशी भी चल रही थी और सबने अपना जगह जो है थोड़ा बदला। इस चीज को देखें हम कि थोड़ा दोनों तरफ से लोग आए कि भाई मोदी जी नागपुर गए। कई बार तारीफ की। कुछ लेख लिखा। यह सारी चीजें हुई। अमित

28:44 शाह भी आजकल सर संचालक के मंच पर देखे जा रहे हैं। यह तो हमें इधर बहुत दिनों के बाद शायद हमने यह पहली बार देखा इस तरह से और सर संचालक जो है उनका वेलकम कर रहे हैं। तो यह सब हो रहा है। उसमें यह हुआ होगा कि भाई उसमें ये भी तो आ रही थी कि मोदी जी हटा दिए जाएंगे। संघ की राय नहीं ली गई। ये वो संघ ने हराया 2024 में 90 95 सीटें इसमें आंशिक सच्चाई भी हो सकती है। मैं आपको बताऊं। तो उसके बाद से तल्खी को दूर करने के लिए यह रास्ता हुआ कि देखिए रेखा गुप्ता संघ की चॉइस है। चीफ मिनिस्टर देवेंद्र फडनवीस पर कितने लोग रजामंद थे मुझे मालूम नहीं लेकिन संघ के वो चॉइस थे वो मुख्यमंत्री बने। भजन लाल शर्मा के

29:30 बारे में भी यही बात कही जाती है। तो ये तीन चार जगह हो गए लोग। तो यह संघ की बात सुनी गई तो संघ की सुनी अनसुनी जो कर दी गई थी बातें वह सुनना पड़ा लेकिन अब जब लगातार जीत रहे हैं तो एक टकराव तो रहता है रुका हुआ फैसला था अब तो यह भी कहेंगे भाई देखो तो हम तो लगातार जीत रहे हैं आप हमको चलाने दीजिए आपके जो एजेंडे है हम उसको भी लागू करेंगे और लागू हो भी रहे हैं और यह भी बात आई कि मुझे जो मेरे तक जो बात आई थी वह इसमें यह बात सुनने में आया था कि मोहन भागवत जी से मोदी जी के घर पर मुलाकात हुई थी और अश्विनी वैष्णव साहब शायद लाने गए थे झंडेवाला से। यह है कहानी और जो मुलाकात हुई थी उसके हिसाब से जो

30:15 चर्चा चल रही थी कि मोदी जी हटाए जाएंगे 75 के हो रहे हैं। उसमें भी हमने देखा कि भागवत जी ने बयान दे दिया कि हमने इस तरह की तो बात कुछ नहीं कही थी। तो बात यह है कि जब तक है तब तक इस ढंग से सरकार के समानांतर कोई संगठन का मुखिया ना हो और ऐसा एक प्रयास दिखता है और दूसरा अभी कह रहे थे कि नरेंद्र मोदी नरेंद्र मोदी की बात मेरी एक बात को आप लोग मानिए मैं लगातार पिछले छ महीने से वॉच कर रहा हूं और तरह-तरह की चीजें वॉच कर रहा हूं जिसका जिक्र करने में बहुत समय आपका निकल जाएगा। इसलिए मैं आपको कह रहा हूं अमित शाह का बोलबाला बहुत बढ़ गया है और यह लगातार बढ़ रहा है

31:01 और हमको तो लगता है कि बहुत ऊपर चला गया है। इसमें कौन-कौन लोग पीछे छूट रहे हैं यह तरह से आप कहिए तो पूरी तरह से मेरे ख्याल से पूरी तरह से ध्यान रखिए इस बात को जब वो अमित शाह उत्तर प्रदेश में जाके योगी के प्रदेश में नौकरी के लेटर बांट रहे हो तो आप समझिए चीजें कहां जा रही है तो और देखा बिहार में किस तरह से वहां पूरा बिस्तर ले सवाल पूछना चाहता हूं सतीश जी कि यूपी में भी जिस तरह से प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। उसके पहले योगी और भागवत की मीटिंग होती है और फिर इधर से एक ऐसा अध्यक्ष बनाया जाता है जो योगी की पसंद का नहीं और ये और जो योगी के समर्थक उनकी नाराजगी

31:49 से आप और अच्छे से समझ सकते हैं। तो ये जो एक के बाद एक फैसले हो रहे हैं इसमें संघ को कितना विश्वास में लिया जा रहा होगा। मुझे तो यह लग रहा है कि संघ से अब पूछा भी नहीं जा रहा है। नियुक्तियां हो रही है धड़ाधड़। देखिए अब चुनावों में जीतने के बाद यह चीजें तो होंगी। बहुत लाजमी सी बात है क्योंकि अब वो दो 240 वाला दंश भी नहीं है। तो अभी आपने देखा जब ध्वज फहराया गया राम मंदिर के ऊपर अयोध्या में तो मोहन भागवत जी और मोदी जी साथ-साथ थे। लेकिन इसका मतलब यह थोड़ी होता है कि जो संघ कहे वही अब यह लोग भी कह रहे हैं बीच में ऐसी स्थिति आई थी जो बहुत टकराव बढ़ गया था उसमें बदलाव हुआ है। इन बदलावों के बीच

32:35 में मैं जो एक बात जोर देके कहना चाह रहा हूं इसको थोड़ा सा आप नोट करिए कि अमित शाह बहुत प्रभावी होते जा रहे हैं। अमित शाह अमित शाह हां ऐसा लग रहा है कि अब तो अह मोदी जी के बाद जो बात चल रही थी कि कौन होगा मोदी जी रहेंगे उसके बाद किस ये सब कुछ नहीं है सीधासीधा सब कुछ कंट्रोल अमित शाह के हाथ में आ चुका है पूरी तरह से आ चुका है जी विवेक जी क्या ये एक तरह की जीत के बाद बुलडोजर चल रहा है मोदी जी का आप अ बीजेपी और आरएसएस का करनाल का संबंध है वो तो हम

33:20 जानते हैं हमेशा से रहा है वो रहेगा वो टूटेगा भी नहीं लेकिन बीजेपी को इंडिपेंडेंट करने की जो इच्छा थी जो पिछले चुनाव के दौरान जाहिर की गई थी क्या अब उसको अमल में लाया जा रहा है जी मुकेश जी बीजेपी और आरएसएस के बीच में जो संबंध है। उसका बेसिक जो प्रिंसिपल है वह समझना बहुत जरूरी है। आरएसएस का बीजेपी से कोई टकराव नहीं। आरएसएस बीजेपी को हमेशा ही मदद करने की स्थिति में रहेगा। चाहेगा कि अब बीजेपी सत्ता में रहे। इसमें कोई शक नहीं। आरएसएस का जो झगड़ा है वो बीजेपी के अंदर के कुछ नेताओं के साथ है। वो बीजेपी के साथ नहीं

34:07 है। आरएस ये आरएसएस वर्सेस बीजेपी नहीं है। यह आरएसएस वर्सेस मोदी शाह है। 2000 1999 से 2004 तक जो था वो वो जो झगड़ा था जिस समय आरएसएस के सारे नेता टूट पड़े थे सुदर्शन जी से लेकर खगड़ी और मुरली मनोहर जोशी के ऊपर भी उसका हमला हुआ था वो जो सारा खेल था वो आरएसएस का एजेंडा इंप्लीमेंट नहीं कर रहे थे इसलिए था लेकिन अब तो मोदी जी आरएसएस का एजेंडा इम्लीमेंट कर रहे हैं। फिर अब झगड़ा क्या है? अब झगड़ा यह है कि ऑर्गेनाइजेशन पर आरएसएस की पकड़ अब बीजेपी ढीली नरेंद्र मोदी और अमित शाह ढीली करना चाहते हैं। वह ऑर्गेनाइजेशन पर बीजेपी के ऑ्गेनाइजेशन पर अपनी पकड़ ज्यादा मजबूत करना चाहते हैं और आरएसएस को

34:54 उस मामले में वो दरकिनार करना चाहते हैं। ये आरएसएस का प्रॉब्लम है। और आरएसएस का बेसिक जो आईडियोलॉजी का प्रिंसिपल है, सबसे फंडामेंटल प्रिंसिपल ये है कि ऑर्गेनाइजेशन संगठन में ही शक्ति है। वह संगठन को किसी भी कॉस्ट पर वह वीक नहीं होने देगा आरएसएस और बीजेपी बीजेपी नहीं नरेंद्र मोदी और अमित शाह का जो पॉलिटिक्स है बीजेपी के अंदर का पॉलिटिक्स संघ परिवार के अंदर का पॉलिटिक्स बाहर के पॉलिटिक्स से तो उनको कोई प्रॉब्लम नहीं है। वो एजेंडा इंप्लीमेंट कर रहे हैं और जो अपोजिशन के साथ जो भी वो कर रहे हैं वो उससे कोई आरएसएस को कोई प्रॉब्लम नहीं है। आरएसएस को प्रॉब्लम है। बीजेपी संघ परिवार के अंदर जो उनका रुतबा बढ़ा है, उनका उनका

35:41 वजन बढ़ा है, जिससे आरएसएस जो है वो दरकिनार हो गया है। आप आप यह समझिए कि पिछले लगभग एक दो साल से आरएसएस के प्रमुख जितने ज्यादा पब्लिक फंक्शनंस में दिखे गए हैं। उतना आरएसएस के इतिहास में कभी नहीं हुआ है। क्यों आरएसएस मोहन भागवत बार-बार पब्लिक फंक्शन में जा रहे हैं। बार-बार उनके स्टेटमेंट्स वो मीडिया में छा गए हैं। क्यों छा गए हैं? क्योंकि वह यह दिखाना चाहते हैं कि बीजेपी बीजेपी से ऊपर हम है। यह आरएसएस को पब्लिक लाइमलाइट में बीजेपी के बराबरी में बीजेपी से ज्यादा आरएसएस को पब्लिक लाइमलाइट में लाने का यह पूरा प्रयास है मोहन भागवत का। वरना आरएसएस की ये ट्रेडिशन नहीं है कि आरएसएस का प्रमुख इतनी इतने ज्यादा प्रमाण

36:28 में पब्लिक के बीच में देखा जाए। पब्लिक स्टेटमेंट्स करें, प्रेस के साथ बात करें, लोगों के साथ बात। ये जो पब्लिक आउटच है, आउटरीच है, यह पब्लिक आउटरीच इसीलिए है कि बीजेपी बहुत ज्यादा पावरफुल हो गई थी। यहां तक के नड्डा यह भी कहे गए कि अभी हमको आरएसएस की जरूरत नहीं है। तो तभी वो जो स्नैप होता है वो स्नैप वही हो गया था। तो वहां पर ट्रिगर आ गया था और उसके बाद से फिर हमने देखा है कि मोहन भागवत किस तरह से नरेंद्र मोदी को टोंट्स भी लगा रहे थे टीका भी कर रहे थे और जब ये बीजेपी को समझ नरेंद्र मोदी और अमित शाह को समझ में आया कि बगैर आरएसएस के हम इनकंप्लीट है उनका जो भी अहम रहा

37:14 होगा जो अहंकार है उनका वो 2024 में पूरी तरह से धूमिल हो गया। उसके बाद से वो उन्होंने रैप अप्रोचमा शुरू किया। बीजेपी की तरफ वो थोड़े से नरम हुए। उसके बाद 10 साल के बाद पहली बार संघ के हेड क्वार्टर में मोदी जी आए तब तक वो नागपुर में चार बार आ चुके थे और उनको बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं ने नागपुर की यह भी कहा था कि आप आए हैं आप दीक्षाभूमि आए हैं तो आप संघ भूमि आइए। वहां उस पर उन्होंने उनको जवाब दिया था। मैं इस काम के लिए नागपुर नहीं आया हूं। तो यह यह बीजेपी के अंदर से आई हुई बात है। तो सवाल यह है कि जब 2024 में उनको आरएसएस ने झटका दिया जैसा 2004 में आडवाणी वाजपेयी को दिया था। वो हारे आरएसएस की वजह से ही थे। इस बात को समझना बहुत जरूरी है। तो यह जो है

37:59 उसके बाद से फिर नरेंद्र मोदी नर्म हो गए और अभी जब वो फिर एक बार फिर से ताकतवर हो गए हैं और यह जो अध्यक्ष वाला मामला है उसमें वो कहीं से भी आरएसएस का सजेस्ट किया हुआ चेहरा एक्सेप्ट करने की स्थिति में नहीं है। मैं ये बार-बार कह चुका हूं कि पहले संजय जोशी का नाम आया था और मेरा ऐसा अंदाज है कि संजय जोशी एक स्ट्रेटेजिक नाम आगे कर दिया था आरएसएस ने कि उसको नरेंद्र मोदी नकारेंगे यह पक्का उनको मालूम था और उसके बाद फिर उन्होंने दूसरा अपना ट्रंप कार्ड खेला जिसको नकारना बीजेपी के लिए मुश्किल हो जाएगा क्योंकि एक तो हमारा कैंडिडेट आप एक्सेप्ट नहीं कर रहे दूसरा भी नहीं कर रहे ऐसा नहीं होगा ऐसा आरएसएस को लग रहा था लेकिन दूसरा चेहरा भी उस उसी तरह का था जिस तरह का

38:46 संजय जोशी था कि वो नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए अड़चन पैदा करने वाला चेहरा रहा होगा। मुझे अंदाज इस बात का आ रहा है कि वो नितिन गडकरी का चेहरा हो सकता है। नाम सजेस्ट किया हो सकता है और वो भी उनको एक्सेप्टेबल नहीं है। इसलिए आखिरकार अभी मोदी और शाह के जोड़ी ने यह निर्णय लिया है कि नहीं अभी हम अपना ही निर्णय लेते हैं। जो होगा वो देखा जाएगा। इस तरह से कुछ बात हुई है। वरना ये जो नितिन नवीन है आप यह भी समझिए ये ओरिजिनल आरएसएस के नहीं है। ये एमबीवीपी वाले हैं। ये जब कॉलेज में गए तब ये एबीवीपी में ज्वाइन हुए। ये बचपन से संघ में गए हुए नहीं है। और संघ जो है किसको मुख्यमंत्री बनाना है इसमें संघ कभी इंटरेस्ट नहीं लेगा। लेकिन ऑर्गेनाइजेशन में की पोजीशंस पर बीजेपी के

39:34 कौन रहेंगे यह संघ हमेशा डिसाइड करता है। उसके लिए संघ हमेशा आग्रह करता है। इसीलिए प्रेसिडेंट ऑर्गेनाइजिंग सेक्रेटरी और बीजेपी के संगठन में सबसे की पोजीशंस पे संघ के ही लोग क्यों रहते हैं? क्योंकि यह संघ का आग्रह होता है और वही जो स्ट्रेंगल होल्ड संघ का है उसको नरेंद्र मोदी और अमित शाह ढीला करना चाहते हैं। इसीलिए यह झगड़ा चल रहा है। बाकी बीजेपी और आरएसएस के बीच में कोई तानतनाव नहीं है। यह पर्सनल है। नरेंद्र मोदी, अमित शाह वर्सेस आरएसएस। बीजेपी को तो हमेशा ही वो मदद करने के लिए तैयार रहेगा। अगर बीजेपी के ऑर्गेनाइजेशनल स्ट्रक्चर में आरएसएस का कंट्रोल रहे। वो कंट्रोल अगर वो अगर उस कंट्रोल से उनको बाहर कर दिया जाता

40:19 है तो वो आरएसएस को जो करना है वो बराबर करेंगे। 204 में किया उन्होंने। जी राजेश जी आपने ठीक कहा कि गर्मनाल का संबंध है बीजेपी आरएसएस का। लेकिन मोदी शाह की पॉलिटिक्स अलग है। वो सारे हथियार सारे अधिकार अपनी मुट्ठी में रखते हैं। चाहे संगठन के हो चाहे सरकार के हो। गुजरात मॉडल ही यहां भी वो रेप्लिकेट कर रहे हैं। पार्टी एक तरह से हाईजक कर चुके हैं नरेंद्र मोदी पूरी तरह से नियंत्रण में और आरएसएस का कोई से पार्टी में रह गया है ऐसा लगता नहीं है। जैसा विवेक जी ने भी बताया। संघ की तड़प यही है कि पार्टी अब उसके हाथ में नहीं। अब और भी नहीं होगी। अब पूरी तरह से पार्टी संघ से

41:06 मुक्त करने की दिशा में बढ़ गए मोदी इस नियुक्ति के साथ। देखिए पावर सेंटर्स जब अलग-अलग हो तो क्लश होना जो है वह लाजमी है और अगर दोनों पावर सेंटर्स जो पैरेलल पावर सेंटर्स हैं वो एक ही गोल के लिए अगर काम कर रहे हो तो भी क्लशेस हो सकते हैं लेकिन वो क्लशेस इस स्थिति तक नहीं पहुंचेंगे कि उसमें ब्रेक हो जाए। जब ब्रेक जब जब ब्रेक होने की स्थिति आएगी जब जब स्नैप होने की स्थिति आएगी तबत अप्रोच मार्क करेंगे क्योंकि संघ परिवार को समझना जरूरी है। संघ परिवार का एक बाह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद है तो एक बा बीजेपी है। संघ परिवार के यानी आरएसएस के नजरिए में उस बीजेपी ने एक ऐसे लीडरशिप को ग्रो किया है या थ्रो अप किया है जो नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे तो

41:53 जाहिर सी बात है जब एक आदमी बार-बार लगातार किसी संगठन को चुनाव जितवा रहा है तो वो हर बार नागपुर जाकर के साष्टांग करे यह नहीं हो सकता है। आप याद कीजिए अटल बिहारी वाजपेयी और सुदर्शन जी के बीच में जो जो अह तनाव था वह संघ के एजेंडा को लेकर के ही था। अभी विवेक जी ने भी कहा संघ के एजेंडा को लेकर के था। लेकिन उसमें पावर सेंटर्स भी अटल बिहारी वाजपेयी की अपनी जबरदस्त हैसियत थी। नेशनल लीडर थे वो और सुदर्शन जी से शायद वो सीनियर थे। अगर मैं गलत नहीं कह रहा हूं तो। तो वो क्लशेस भी फिर वहां कॉम्प्रोमाइज हुआ है। वहां पर जब नागपुर में मुझे याद है नागपुर में एक कॉम्प्रोमाइज का ये हुआ था। जब बहुत ही क्लैश बढ़ गया था तब सुदर्शन जी और इनके

42:39 बीच में तमाम मध्यस्थों से बात हुई थी और सुदर्शन जी ने कहा कि डिस्टर्बलाइज नहीं करना है सरकार को। इसी तरह से 2024 में संघ का कार्यकर्ता खामोश हो जाता है। संघ कोई बयान नहीं देता है। संघ का कार्यकर्ता खामोश हो जाता है। अब आप ये बताइए कि क्या बिहार में चुनाव में क्या आरएसएस का जो कार्यकर्ता है जो गांवगांव में है क्या वो खामोश हो गया था? क्या उसने विड्र कर लिया था? नहीं क्योंकि क्योंकि एक एक सहमति बन गई थी कि जिस गोल के लिए हम जा रहे हैं इस इस वक्त भी हम मुझे ऐसा लगता है ये मेरी मेरी समझ है कि हम दो अलग-अलग खेमों में देखते हैं चीजों को ब्लैक और वाइट में कि एक तरफ नरेंद्र मोदी है तलवार लिए हुए दूसरी तरफ मोहन भागवत है संघ परिवार में इस तरह से चीजें नहीं होती है। ईगो क्लैश

43:26 करते हैं। एक दूसरे को वन अप मैनशिप भी होती है। कौन संगठन मंत्री बनेगा? कौन कहां जाएगा? संघ कभी यह टोलरेट नहीं कर सकता है कि कोई भी उसका अनुसांगिक संगठन उस का कद उसके ऊपर हो जाए। वो थोड़ा कॉम्प्रोमाइज करके कभी जब उसका एजेंडा चल रहा हो तो वो रहेगा। लेकिन मोदी सबके ऊपर नहीं हो गए क्या? संगठन को छोड़ दीजिए। मोदी सबके ऊपर हो गए। जी मोदी की हैसियत सुनिए। मोदी की हैसियत हो गई है। किस वजह से हुई है? क्योंकि मोदी लगातार चुनाव जितवा रहे हैं भारतीय जनता पार्टी को। मोदी लगातार जितना संघ चाहता है उससे 10 गुना ज्यादा स्पीड से संघ के एजेंडा को इंप्लीमेंट कर रहे हैं। उससे 10 गुना ज्यादा स्पीड से इसलिए उनका कद

44:12 स्वीकार करना ये भी संघ की मजबूरी है। लेकिन संघ कभी आज मोहन भागवत है ना कल हो सकता है होश वाले बन जाए। संगठन तो वही रहेगा। संगठन की सुप्रीमसी वही रहेगी। संगठन की सुप्रीमसी खत्म नहीं होगी। संगठन चाहता है कि उसका आदमी भारतीय जनता पार्टी में किस-किस पोजीशन में जाए। अब आज की जो ये बात है कि अभी जो नियुक्ति हुई है मैं शुरुआत भी मेरी समझ से मैं ये कह रहा हूं कि ये एक कॉम्प्रोमाइज कैंडिडेट हो सकते हैं। संघ ने इस पर ऐसा नहीं है कि अपना अंगद का पैर रख दिया हो और कहा हो कि नहीं इसको तो बिल्कुल नहीं होगा और हम जो कहेंगे वो कॉम्प्रोमाइज कैंडिडेट हो सकता है क्योंकि उनको मालूम है कि पार्टी चलानी है नरेंद्र

44:58 मोदी अमित शाह को और पार्टी चलाने के रास्ते में कोई ऐसा बहुत उनके रथ के पहिए में ऐसा फ्चर ना फंसा दे कि पूरा उनका ही अपल कार्ड उलट जाए। ये ये मेरी बात है। जी सतीश जी आगे का आगे क्या होगा? यह संबंध इसी तरह से चलते रहेंगे। खट्टा मीठा कभी नरम गरम यही होगा या अब ये ये एक संकेत है कि आरएसएस को थोड़ा सा आइसोलेट कर रहे हैं। बीजेपी से अलग कर रहे हैं। संगठन अब पूरी तरह से अमित शाह जो आपने तीन बार नाम देकर मुझे बोला था ये नाम याद रखिए। अमित शाह के मुट्ठी में है बीजेपी।

45:43 बिल्कुल है। इसमें कहीं दो राय नहीं है कि नहीं है। बिल्कुल है। एकदम साफ है। क्लियर है। इसमें कोई किसी को इफ एंड बट होना भी नहीं चाहिए। आप फचर मार सकते हैं उनके इरादों में उनके काम में वो वो कर सकते हैं। लेकिन पूरा ग्रिप उनका है पूरी तरह से। लेकिन मैं दो गंभीरता से बात कहना चाहता हूं मुकेश जी। अमित शाह जी का ग्रिप है। हो सकता है मोदी जी के मिलके ही सारा ग्रिप हो। हो सकता है अलग से भी ग्रिप हो। यह मैं जानता नहीं। मैं सिर्फ कयास लगा रहा हूं। लेकिन गंभीरता से जो दो बात कहने के लिए हाथ उठाया वो मैं आपसे कहना चाहता हूं। देश की राजनीति बहुत ही बहुत ही बहुत ही गजब के मोड़ पर आकर खड़ी होगी। क्या किस प्रकार

46:32 की राजनीति होगी? कैसे चुनाव होंगे? क्या मतलब नियम कानून रहेंगे? क्या व्यवस्थाएं? यह एक प्रश्न है। दूसरा जो है अगर आरएसएस और बीजेपी और सरकार मिलजुल के एकदम पूरा चल रही है तो उनके एजेंडा में बहुत सारी चीजें हो सकती है। जिसमें व्यवस्था जिसमें संसदीय प्रणाली जिसमें कुछ संविधान के हिस्से ये सब कुछ हो सकते हैं। अभी तो चुनाव पे ही सवाल खड़े हो रहे हैं। विपक्ष खड़ा कर रहे हैं। तो आगे आने वाले दिनों में क्या होगा यह हम सिर्फ सोच सकते हैं। बता कुछ नहीं सकते। अभी जिस

47:18 प्रकार से मेरे मेरे दिमाग में बहुत जोर कर रहा है और मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि अभी जो महात्मा गांधी जी के नाम पर एक रोजगार कार्यक्रम गारंटी एक्ट वाला है। गारंटी चलता है मनरेगा के नाम से। उसका नाम बदलने का पढ़ा अखबारों में और उसका नाम क्या रखे रखा जाना है? जी राम जी। आप समझ रहे हैं तो मतलब अभी एजेंडे पर क्या-क्या है कह नहीं सकते। वन नेशन वन इलेक्शन है। बहुत तरह की चीजें हो सकती है जो हमारे आपके दिमाग में भी नहीं आएगा और उस लिहाज से देखना है। तो इसमें दो संभावना है। या तो पूरी तरह से जिस प्रकार से मोदी जी ने संघ को इग्नोर करते-करते

48:04 अपना एकदम नतमस्तक हो गए। वह उस आधार पर दोनों मिलकर एजेंडा लागू करें या या यह भी जोर देकर कहना चाहता हूं कि या कि अगर मान लीजिए कोई अंदर-अंदर टकराव भी संघ पैदा कर रहा हो तो आप इस निश्चित दिशा भी देख सकते हैं कि अगर यह नितिन नवीन का फैसला संघ के बिना रजामंदी से हुआ है। उनके मौन स्वीकृति या हां की स्वीकृति जो भी नहीं भी हुआ है तो आप समझ सकते हैं कि किस किस दिशा में चीजें बढ़ सकती है या बढ़ाई जा सकती है जरूरत पड़ने पर तो बहुत बहुत ही एक बड़ा ही नाटकीय मोड़ पर सारी चीजें पहुंच गई है। ठीक कहा विवेक जी ने या किसी और ने कहा राजेश जी ने कहा कि देखना होगा

48:50 कि नितिन नवीन को अह एलिवेट किया जाता है अध्यक्ष के रूप में कि नहीं और क्या अध्यक्ष पद को लेकर के जो फुल टर्म है नितिन जी बन जाते हैं नितिन नवीन जी तब तो खैर बात और हो जाएगी लेकिन अगर नहीं क्या अगर जो फुल टर्म अध्यक्ष के बारे में उस समय कोई बात दूसरी चीज हो गई तो वह भी एक बहुत बहुत ही नाटकीय मोड़ होगा। विवेक जी क्या आपको लग रहा है कि नरेंद्र मोदी जैसा आदमी एक व्यक्ति को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर और फिर वो फैसला बदलेगा? यह एक तो मैसेज चला गया कि ये अध्यक्ष ही बनाकर लाए हैं। जिस तरह से अमित शाह ने

49:36 स्वागत किया दफ्तर में जाकर वो अपने आप में पर्याप्त मैसेज है कि नहीं यही अध्यक्ष होने हैं। कार्यकारी अध्यक्ष भले ही हो अध्यक्ष भी है यू टेस्टिंग वेस्टिंग नहीं करते हैं मोदी जी फैसले लेते हैं। नहीं मैं इस बात की कोई गारंटी नहीं लेता कि अभी इनको ही अध्यक्ष बनाया जाएगा क्योंकि ये लोग कुछ भी कर सकते हैं। यह अपना निर्णय कुछ भी बदल सकते हैं, कुछ भी ले सकते हैं। किसी भी तरह का निर्णय ले सकते हैं। ऐसा तो वरना मुझे बताइए कि इनको सीधे-सीधे अध्यक्ष क्यों नहीं बनाया? कार्यकारी अध्यक्ष क्यों बनाया? और अध्यक्ष बनाने के लिए और एक महीना, दो महीना क्यों ले रहे हैं? मतलब उससे उससे क्या हासिल होने वाला है? क्या अभी कोई इलेक्शन है? कोई चुनाव है? वो चार महीने के बाद है। तो क्या ऐसा ये हो सकता है कि

50:24 चार महीने तक नड्डा जी फिर एक बार अध्यक्ष ही बने रहेंगे। जब वह अप्रैल में चुनाव होने हैं चार राज्यों के और उसके बाद फिर जब चुनाव के नतीजे आएंगे उसमें इनको काम दिया जाएगा। इनको फिर एक बार बैप्टिज्म बाय फायर होगा कि चलो आप सिद्ध करो और फिर आपको अध्यक्ष बनाएंगे। ये भी हो सकता है। लेकिन कार्यकारी अध्यक्ष बनाने का कारण क्या है? सीधे तौर पर अध्यक्ष क्यों नहीं बनाया? ये मतलब इससे पहले इसका एक रीजन ये हो सकता है संगठन के चुनाव हो रहे हैं। वो कई राज्यों के हो चुके हैं। वहां से बाकायदा पूरी वो जो एक प्रक्रिया है वो पूरी करके घोषित कर दिया जाएगा कि अब ये निर्वाचित अध्यक्ष है। अभी आप बताइए कि जब संगठन के चुनाव होने ये कारण तो बहुत दिनों से बताया जा रहा

51:10 है। संगठन के चुनाव अगर है तो उसमें क्या मतदान होगा? किसी के नाम पर इनके नाम पर मतदान होगा। उन चुनाव का इस आदमी के चयन से क्या संबंध है? इस आदमी का चयन तो तभी फाइनल होना चाहिए। तो अगर जो स्थानीय इकाइयों के जो चुनाव है वो अगर नहीं हुए हैं तो फिर इनको किस बेसिस पे चुना गया? हम तो इनके लिए कोई मतदान हुआ है? नहीं हुआ है। तो इनको तो नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने अपने मन से चुना है। फिर क्या इसके बाद इनके लिए मतदान होगा और फिर जाकर ये अध्यक्ष बनेंगे। ऐसा होने वाला है क्या? क्या है? मतलब इसमें कोई क्लेरिटी नहीं है। एक एक आखरी बात ये कह के मैं खत्म करूंगा। ऐसा है संघ परिवार संघ की जो आईडियोलॉजी है उसको बहुत फंडामेंटली समझने की जरूरत है। वो आईडियोलॉजी ये है कि

51:56 संगठन से सब चलेगा। व्यक्ति से नहीं चलेगा। मतलब संगठन जो है सारे जो व्यक्ति है वो संगठन के लिए सब सर्विएंट रहेंगे। संगठन एक व्यक्ति को सबसर्विएंट नहीं बनेगा। ऐसा जब हो जाएगा तो संघ का प्रोजेक्ट खत्म हो जाएगा। यह संघ का डर है। वो वो संघ का एजेंडा इंप्लीमेंट कर रहे हैं वगह सब ठीक है। उसके लिए उनके मन में कोई प्रॉब्लम नहीं है। लेकिन पूरा संघ परिवार जब एक व्यक्ति या दो व्यक्ति के के इर्दगिर्द घूमने लगे उनको सब्सबिएंट हो जाए और वो जो कहेंगे वही होगा। तो ऑर्गेनाइजेशन की जो ताकत है ऑर्गेनाइजेशन से 100 साल चले हैं वो ऑर्गेनाइजेशन को सुप्रीम रखने के बाद ही वो 100 साल टिके हैं। जब व्यक्ति केंद्रीय हो जाता है ऑर्गेनाइजेशन तो ऑर्गेनाइजेशन की ताकत

52:44 कमजोर हो जाती है। ऑर्गेनाइजेशन कमजोर हो जाता है। यह आरएसएस का डर है। आरएसएस को और आगे 100 साल जीना है। वो कोई मोदी जी को प्रधानमंत्री बनने के लिए ये कोई आरएसएस का प्रोजेक्ट नहीं है कि इसको प्रधानमंत्री बनाना है। उसको अध्यक्ष बनाना है। उसके लिए थोड़ी आरएसएस है। आरएसएस का जो प्रोजेक्ट है वह अपने आप में एक बड़ा प्रोजेक्ट है जिसके लिए बहुत सारे लोग उनको लगेंगे। आज मोदी जी कल कोई और परसों कोई और वो सारे संघ के प्रति शरणम गच्छामि होने चाहिए। ऐसा ना हो कि संघ परिवार मोदी जी को शरण जा रहा है और अमित शाह को शरण जा रहा है और वो जो कह रहे हैं वही हो रहा है। यह संघ नहीं चाहता। यह प्रॉब्लम है संघ का। दोनों के साथ बीजेपी के साथ संघ का वो प्रॉब्लम नहीं है। बीजेपी और संघ में कोई द्वंद्व

53:30 नहीं है। द्वंद्व अगर है तो संघ और इन दोनों के जोड़ी में है। तो ये समझना बहुत जरूरी है। जी बिल्कुल। तो संघ का सोच कुछ और है और मोदी और शाह किसी और सोच के तहत एजेंडा बेशक पूरा कर रहे हो लेकिन कंट्रोल कर रहे हैं और आरएसएस को थोड़ा सा तरकिनार भी कर रहे हैं। राजेश जोशी जी आखरी टिप्पणी आपकी मैं अभी ये पूरी तरह मानने को तैयार नहीं हूं कि संघ जो है वो नरेंद्र मोदी के सामने झुक गया है या संघ जो है नरेंद्र मोदी उनके लिए एक ऐसा नेता बन गए हैं जिनको ना उगलते बन रहा

54:17 है ना निगलते बन रहा है। अड़चन तब आती है जब प्रधानमंत्री यह बयान देता है। अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था ना कि वह कोलेशन धर्म में हम लोग इंप्लीमेंट नहीं कर सकते। विश्व हिंदू परिषद को नाराज कर दिया था। सबको नाराज कर दिया था। नरेंद्र मोदी की खूबी यह है। विश्व हिंदू परिषद को नाराज कर दिया। दरकिनार कर दिया गुजरात में। इसके बावजूद उनका जो भीतर स्वयंसेवक है उस स्वयंसेवक में कोई आंच नहीं आई। उन्होंने अपनी विचारधारा पर जो सिंधुत्व की है उसको कहीं डाइल्यूट नहीं किया। जबकि अटल बिहारी वाजपेयी बीच-बीच में कभी डेमोक्रेट कभी नेहरू वादी कभी समाजवादी गांधीवादी होते थे। नरेंद्र मोदी ने कभी ऐसा नहीं किया। इसलिए नरेंद्र मोदी के जो व्यक्ति व्यक्तित्व है उससे हो सकता है आरएसएस को

55:02 थोड़ी अड़चन हो कि ये तो संगठन से भी ऊंचा हो रहा है। लेकिन नरेंद्र मोदी जी का जो कृतित्व है वैसा ही कृतित्व वाला व्यक्ति संघ को चाहिए और इसीलिए संघ जो है उनके साथ एक वेल ऑइल्ड मशीनरी की तरह काम करेगा। आने वाले कुछ दिनों में और स्पष्ट होगा कि नितिन नवीन इस पूरी योजना में मोदी शाह के आदमी है या संघ भी उनके साथ है। बहुत-बहुत शुक्रिया आप सबका। धन्यवाद। नमस्कार।

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