“Nitin Nabin as BJP’s National Executive President : क्या RSS की नहीं चली? | बिहार राजनीति विश्लेषण”的完整文字稿。点击时间戳即可从该位置打开视频。想要其他视频的字幕?试试 YouTube 字幕提取工具。
0:01 नमस्कार आप देख रहे हैं सत्य हिंदी और मैं हूं आपके साथ कृति सिंह। बिहार सरकार के मंत्री नितिन नवीन को बीजेपी का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया गया है। उनकी नियुक्ति तुरंत प्रभाव से लागू हो जाएगी। इस नियुक्ति ने सभी को चौंका दिया है और लोगों के मन में एक सवाल बार-बार आ रहा है कि क्या आरएसएस भी नवीन के नाम को लेकर मंजूर हुई थी या बीजेपी ने खुद ही नबीन के नाम पर मोहर लगा दी और आरएसएस को दरकिनार कर दिया। चलिए इस सवाल का जवाब ढूंढते हैं मौजूदा समीकरण से। लेकिन पहले नितिन नबीन के बारे में जान लीजिए। नितिन नबीन का जन्म 23 मई 1980 को हुआ था। यानी अभी उनकी उम्र सिर्फ 45 साल है। नितिन नबीन दिवंगत भाजपा नेता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा के बेटे हैं और वे कायस्थ समुदाय से आते हैं। उनकी राजनीतिक शुरुआत राष्ट्रीय स्वयंसेवक
0:47 संघ की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी कि एबीवीपी से हुई। बाद में उन्होंने भाजपा युवा मोर्चा में मजबूत पकड़ बनाई और बिहार इकाई के अध्यक्ष भी रहे। वर्तमान में वे बिहार सरकार में सड़क निर्माण मंत्री हैं। इसके पहले वे शहरी विकास और आवास तथा विधि मंत्री भी रह चुके हैं। नवीन ने छत्तीसगढ़ में चुनाव प्रभारी की जिम्मेदारी निभाई जहां 2023 में भाजपा को बड़ी जीत मिली। इसके अलावा उन्होंने सिक्किम में भी संगठनात्मक भूमिका संभाली। चुनावी रिकॉर्ड की बात करें तो नवीन पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट से 2010 से लगातार विधायक हैं। 2006 में पिता की मौत के बाद हुए उपचुनाव में पटना पश्चिम से जीत हासिल की थी। नितिन नबीन साल 2008 में भारतीय जनता युवा मोर्चा की राष्ट्रीय कार्य सममिति के सदस्य भी रह चुके हैं। हालिया बिहार विधानसभा चुनाव में उन्होंने
1:34 आरजेडी की रेखा कुमारी को हराया और 2020 में कांग्रेस के लव सिन्हा को मात दी थी। अब बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह ने एक पत्र जारी कर बताया कि पार्टी के संसदीय बोर्ड ने नितिन नबीन को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंप दी है। हालांकि नितिन नबीन के नाम की घोषणा ने भी कई लोगों को हैरान कर दिया है। दरअसल बीजेपी के वर्तमान अध्यक्ष जेपी नड्डा का कार्यकाल करीब 3 साल पहले खत्म होने के बाद उन्हें लगातार एक्सटेंशन दिया गया है। बीजेपी के इतिहास में यह पहली बार है जब किसी अध्यक्ष का कार्यकाल खत्म होने के बाद भी इतने लंबे समय तक नया अध्यक्ष नहीं चुना गया। इसी वजह से कई लोगों ने पार्टी पर सवाल भी उठाए कि देश की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा करने वाली बीजेपी अपने अध्यक्ष तक को क्यों नहीं चुन पा रही है? उस पर अब जब नबीन के नाम पर
2:19 मुर लगी है तो सवाल यह है कि क्या इस फैसले से आरएसएस में आरएसएस की कितनी भूमिका थी और नवीन की कम उम्र भी इस चर्चा का विषय बन रही है। इस पर वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण कहते हैं कि बीजेपी ने हमेशा ऐसे फैसले किए हैं जो लोगों को हैरान कर दें। जब जेपी नड्डा को अध्यक्ष बनाया गया था तब भी लोग उनकी वरिष्ठता पर चर्चा कर रहे थे। नचिकेता के मुताबिक बीजेपी नितिन नवीन की उम्र को ही ताकत बनाकर दिखा सकती है। पार्टी कह सकती है कि युवाओं के देश में युवाओं से बेहतर तालमेल के लिए एक युवा चेहरा चुना गया है। हालांकि वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण यह मानते हैं कि नितिन नवीन को नरेंद्र मोदी के करीबी के तौर पर देखा जा रहा है। वह एक घटना याद करते हैं। साल 2010 की बात है जब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में
3:05 शामिल होने पटना आए थे। उस समय बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अखबारों में छपे एक विज्ञापन पर नाराजगी जताई थी। उस विज्ञापन में दो विधायकों नितिन नवीन और संजीव चौरसिया की तस्वीर छपवाई गई थी। नचिकेता कहते हैं कि विज्ञापन की तस्वीर के विरोध में नीतीश कुमार ने बीजेपी नेताओं के लिए रखा गया डिनर का कार्यक्रम रद्द कर दिया था। यानी जब नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय राजनीति में चर्चा तक नहीं थी, तब से ही वह नितिन नवीन मोदी के झुकाव वाले माने जाते थे। नचिकेता नारायण का यह भी कहना है कि नितिन नवीन को पार्टी का वर्किंग प्रेसिडेंट बनाकर नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने साफ दिखा दिया है कि पार्टी के मामले में वो आरएसएस के मुकाबले मजबूत पकड़ रखते हैं। क्योंकि संघ की ओर से तो लगातार यह कोशिश की जा रही थी कि किसी भी ऐसे नेता को यह पद मिले जो वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध हो। वहीं वरिष्ठ पत्रकार बृजेश
3:52 शुक्ला कहते हैं कि जब नितिन गडकरी को बीजेपी का अध्यक्ष बनाया गया था तो उनकी राष्ट्रीय राजनीति में ज्यादा भूमिका नहीं थी। अब बीजेपी भविष्य के लिए अपना नेतृत्व तैयार कर रही है। जबकि कांग्रेस इससे काफी पीछे है। हालांकि नितिन गडकरी को आरएसएस का करीबी माना जाता था। जबकि नितिन नवीन की संघ से दूरी नहीं है। लेकिन उन्हें इतना करीबी भी नहीं माना जाता। बृजेश शुक्ला कहते हैं कि नितिन गडकरी का दौर बीजेपी में आरएसएस के करीबियों का दौर था और अब एक नया युग आ गया है। अब नरेंद्र मोदी और अमित शाह की करीबियों का दौर चल रहा है। बृजेश शुक्ला आगे कहते हैं कि पार्टी में अभी बहुत सारे फेरबदल होंगे। इसलिए एक कायस्त को अध्यक्ष बनाया गया है। यह लोग बीजेपी के पक्के वोटर हैं और अक्सर सवाल उठाते रहे हैं कि क्या कायस्त सिर्फ वोट देने के लिए हैं? उनका मानना है कि बीजेपी फिलहाल नितिन नबीन को वर्किंग प्रेसिडेंट के तौर पर परखेगी और डेढ़
4:39 महीने के बाद पूरी तरह पुख्ता होने पर उन्हें स्थाई अध्यक्ष घोषित कर देगी। यह सभी सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं कि एक युवा नेता के तौर पर नितिन नवीन पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ अपनी भूमिका निभाएंगे कैसे? इस पर बीजेपी सांसद और बिहार बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष संजय जायसवाल ने बीबीसी से कहा कि आप उम्र की बात कर रहे हैं लेकिन नितिन नवीन पांच बार के विधायक हैं। वह छत्तीसगढ़ के प्रभारी भी रह चुके हैं। जहां बीजेपी ने बड़ी जीत हासिल की थी। संजय ने आगे कहा कि बीजेपी अध्यक्षीय सिस्टम पर चलती है। जो अध्यक्ष बनता है उसके पीछे सारे नेता और कार्यकर्ता खड़े होते हैं। संजय का मानना है कि नितिन नवीन का बिहार के हर बीजेपी कार्यकर्ता से सीधा संपर्क है और यही वजह है कि पहली बार बिहार से किसी को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है और यह बिहार बीजेपी के लिए बड़ी ही गर्व की बात है। दरअसल बीजेपी के संविधान के मुताबिक
5:26 पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष वही बन सकता है जो कम से कम 15 साल तक पार्टी का सदस्य रहा हो। इस लिहाज से नितिन नवीन को वर्किंग प्रेसिडेंट बनाना बिल्कुल सही है और इसमें कोई दिक्कत नहीं है। आपको बता दें कि बीजेपी में कभी अध्यक्ष पद के लिए वोटिंग नहीं होती। पार्टी की यह कोशिश रहती है कि बीजेपी और संघ के लोग आपस में बैठकर विचार विमर्श करें और पार्टी की जरूरत के हिसाब से अध्यक्ष का चयन करें। हाल के समय में बीजेपी ने कई ऐसे चेहरों को बड़ी जिम्मेदारी दी है जिनकी चर्चा आमतौर पर नहीं रही। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, राजस्थान और दिल्ली के मुख्यमंत्री ऐसा उदाहरण है। ऐसे में बीजेपी के लिए नए अध्यक्ष का पद बहुत अहम माना जा रहा है। खासकर अगले साल पश्चिम बंगाल और उसके बाद 2027 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों को देखते हुए यह जिम्मेदारी और भी बड़ी हो जाती है और नवीन के लिए एक चुनौती भी बन जाती है। कुल
6:11 मिलाकर जानकारों का मानना है कि नवीन को इतने बड़े पद की जिम्मेदारी सौंपे जाने में सबसे बड़ी भूमिका मोदी और शाह की ही रही होगी क्योंकि नवीन पार्टी की योग्यताओं को तो पूरा करते हैं लेकिन आरएसएस के मापदंड में उतने सटीक नहीं बैठते जितना आरएसएस चाहती थी। नितिन नवीन पर आपकी क्या राय है हमें कमेंट करके बताइए। साथ ही वीडियो को लाइक और शेयर जरूर करें और हां चैनल को सब्सक्राइब भी। फिलहाल के लिए इतना ही नमस्कार। अंडर सेक्शन कॉपीराइट 1976 क्रिटिस्म रिपोर्टिंग स्कॉलरशिप एंड रिसर्च यूज़ यूज़ परमिट बाय कॉपीराइट अदरवाइज बीन