तानाशाही के ख़िलाफ़, लेखकों, पत्रकारों का शंखनाद #ashokkumarpandey

简要总结

本次活动是关于阿шок Kumar Pandey的新书《20世纪的独裁者》的讨论会。书中探讨了20世纪的独裁者,并试图揭示21世纪独裁统治的新形式。讨论会嘉宾包括历史学家、作家和记者,他们从不同的角度对这本书进行了评价和解读。

  • 本书探讨了20世纪的独裁者,并试图揭示21世纪独裁统治的新形式。
  • 嘉宾从不同的角度对这本书进行了评价和解读。
  • 讨论涉及历史、政治、社会等多个层面。

欢迎与介绍

活动开始,主持人对各位来宾表示欢迎,并感谢 राजकमल 出版集团的支持。她简要介绍了 एस इरफान हबीब、गिरिराज किराडू、उज्जवल भट्टाचार्य、राकेश पाठक 和 अशोक कुमार पांडे 等嘉宾的学术背景和著作,并邀请他们依次上台就座。最后,她邀请 राजकमल 出版集团的 अध्यक्ष अशोक माहेश्वरी 致欢迎辞。

欢迎辞

अशोक माहेश्वरी 在欢迎辞中表示,希望各位嘉宾的发言能给大家带来新的思考。他回顾了人类历史上的成就与失败,强调要从历史中吸取教训,避免重蹈覆辙。他指出,人类的成就和价值观需要不断维护,否则可能会在瞬间消失。最后,他希望今天的讨论能激发大家的思考,并再次对各位来宾表示欢迎。

书籍发布

主持人邀请 अशोक कुमार पांडे 上台,正式发布他的新书《20世纪的独裁者》。她表示,这本书能帮助读者认识到21世纪的独裁者是如何实践他们的独裁统治的。

书籍介绍

गिरिराज किराडू 介绍了《20世纪的独裁者》一书的内容。他指出,这本书以讲故事的方式展开,通过描述独裁者的生平、背景和崛起过程,以及他们周围的制度,让读者对那个时代有一个直观的认识。他提到,作者在书中探讨了个人崇拜和制度化独裁统治两种形式,并侧重于分析独裁统治是如何制度化的,以及背后的社会经济和政治动因。他还提到,作者认为20世纪的独裁统治为21世纪的新型独裁统治提供了一些预示和模型。最后,他指出作者明确表示,写作这本书是一种政治行为。

嘉宾发言:राकेश पाठक

राकेश पाठक 首先向在恶劣环境下前来参加活动的 दिल्ली 听众致敬。他回忆了与 अशोक Kumar Pandey 在 ग्वालियर 共事的经历,并分享了两人在写作和出版方面的合作。他指出,当今世界,许多人穿着民主的外衣,却在暗地里实行独裁统治。因此,了解20世纪独裁者的历史,有助于人们识别未来潜在的独裁者。他提到,这本书揭示了独裁者如何利用权力压制异议,以及他们如何利用宗教来巩固统治。他还指出,在独裁者崛起的过程中,无论是左翼还是右翼,都保持沉默,直到火焰烧到自己身上。最后,他引用了 अशोक Kumar Pandey 书中的一些句子,强调了警惕独裁统治的重要性。

嘉宾发言:उज्जवल भट्टाचार्य

उज्जवल भट्टाचार्य 首先赞扬了 अशोक Kumar Pandey 的勤奋和才华。他指出,历史写作需要同时具备历史性和相关性。他认为,将希特勒和斯大林与金日成、伊迪·阿明和皮诺切特相提并论是不恰当的。他认为,斯大林是一位世界观的追随者,而希特勒的世界观是建立在雅利安种族至上的基础上的。他提出,当民族国家取代君主制和帝国时,独裁者就出现了。他认为,独裁者的兴起与民族国家的体系有关,民族国家需要管理,而管理需要等级制度,等级制度无法容忍异议。他指出,这本书提出了关于独裁统治的解剖学的问题,并呈现了一个与此相关的全景图。最后,他希望 अशोक Kumar Pandey 未来能对希特勒和斯大林进行比较研究。

补充说明:गिरिराज किराडू

गिरिराज किराडू 补充说,希望大家思考一个问题:为什么在君主制时代没有出现独裁者,而自从民族国家建立以来,独裁者却 बार-बार 出现?他希望这本书能揭示现代民族国家在走向错误道路时可能出现的六种可能性。

作者回应:अशोक कुमार पांडे

अशोक कुमार पांडे 表示,批评政府的最大好处是让你不再害怕巨魔。他认为,批评的乐趣在于阅读书籍,讨论书中的错误事实,提出问题。他提到,如果这本书被认真阅读,就会注意到,在第一任妻子去世后,斯大林变得铁石心肠。他还表示,由于对这本书的讨论,他可能会写一本关于斯大林的书。他强调,这本书是关于独裁者的,而不是关于斯大林的。他指出,即使 मान लेते हैं 某人非常伟大,但这并不重要,重要的是公民的表达自由是否受到压制。他认为,独裁统治的概念是现代的,否则所有的国王和皇帝都是独裁者。他认为,如果一个政府不能容忍反对意见,那么它就是独裁统治。他指出,在斯大林时代,反对斯大林就是叛国,所有的报纸要么是党的,要么是政府的。他强调,在第二次世界大战期间,斯大林与希特勒签订了协议,瓜分了欧洲。他认为,如果 महानता 是以 क्रूरताओं 为代价的,那么人类就不需要这样的 महानता。最后,他表示,所有的 मूर्ख 都是一样的,即使他们的目标不同。

主席讲话:एस इरफान हबीब

एस इरफान हबीब 表示,他一直认为 अशोक Kumar Pandey 即使没有 академический 背景,也做了很多有学问的人没有做的事情,写了很多人们不敢 говорить 的主题。他指出,在当今时代,历史的重要性不如未来,历史也被用来改善今天,即使这意味着扭曲事实。他认为,像 अशोक Kumar Pandey 这样的人在当今社会中扮演着非常重要的角色,因为他们用人们的语言来讲述历史。他特别提到了墨索里尼和希特勒,认为他们与当今的印度有着直接的联系。他指出,印度的左翼几乎已经消失,而这在一定程度上要归咎于斯大林主义者。他提到,1931年 मुंजे 与墨索里尼会面,并赞扬了他的制度,这与印度的 शिशु मंदिर 正在发生的事情类似。他强调,历史永远不是客观的,但重要的是要以事实为基础。他回忆说,老 इरफान हबीब 曾说过,他不反对右翼历史学家,只要他们的著作严谨,以事实为基础。他指出,今天在印度,种族、宗教和民族主义被用来分裂社会,而这正是墨索里尼和希特勒所使用的。他希望年轻人能阅读这类书籍,并学习他们应该学习的东西,而不是被教导的东西。

感谢

राज कमल प्रकाशन समूह 的 धर्मेंद्र शशांत 对所有参与者和观众表示感谢。他表示, राज कमल प्रकाशन समूह 致力于支持那些敢于说真话的作家,并为社会带来更好的书籍。

结束语

主持人宣布讨论会结束,并再次感谢 अशोक Kumar Pandey 和所有嘉宾的参与。

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文字稿

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0:00 इस कार्यक्रम में आप सभी का स्वागत है और मैं शुरू में ही आभार व्यक्त करती हूं इस कार्यक्रम के लिए राजकमल प्रकाशन समूह का। ये मंच हमेशा से एक ऐसा मंच रहा है जहां पर आलोचनात्मक जिरह और संशोधन प्रस्ताव संशोधन प्रस्ताव का जो लोकतांत्रिक ओरा है वो हमेशा बना रहा है। तो अब मैं विलंब नहीं करूंगी और कार्यक्रम शुरू करूंगी। अनुरोध करूंगी अपने वक्ताओं का कि एक-एक करके मैं उनका नाम और परिचय लूंगी और आप से आग्रह है कि एक-एक करके आप मंच पर आकर अपनी जगह ग्रहण करें। सबसे पहले मैं आमंत्रित करना चाहूंगी एस इरफान हबीब साहब का। सर आपका मंच पर

0:47 बहुत-बहुत स्वागत है। एस इरफान हबीब विज्ञान और आधुनिक राजनीतिक इतिहास लेखन में समान रूप से सक्रिय रहे हैं। आपने टू मेक द डेफ हियर आइडियोलॉजी एंड प्रोग्राम ऑफ भगत सिंह एंड ह कॉमरेट्स जिहाद और इ्तिहाद रिलीजियस ऑर्थोडॉक्सी एंड मॉडर्न साइंस एंड कंटेंपररी इस्लाम और मौलाना आजाद लाइफ जैसी कई चर्चित किताबें लिखी हैं। इसके अलावा आपने इंडियन नेशनलिज्म द एसेंशियल राइटिंग्स पुस्तक का संपादन भी किया है। आपकी कृतियों के हिंदी में भी अनुवाद हो चुके हैं। भारतीय राष्ट्रवाद एक अनिवार्य पाठ पहले से प्रकाशित है और मौलाना आजाद एक जूनी का हिंदी संस्करण हाल

1:34 ही में राजकमल से प्रकाशित हुआ है। बहुत-बहुत स्वागत सर आपका। अब मैं आमंत्रित करना चाहूंगी गिरिराज किराडू जी का। आपसे अनुरोध है कृपया आप मंच पर आए और अपना आसन ग्रहण करें। कवि लेखक और प्रकाशक गिरिराज गिरिराज किराडू की रचनाएं अनेक प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। आपको पहली प्रकाशित कविता के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। आप बहुभाष ऑनलाइन पत्रिका प्रतिलिपि के सह संस्थापक और संपादक रहे हैं। आप इंडिया हैबिटेट सेंटर के भारतीय भाषा महोत्सव के संस्थापक सदस्य और क्रिएटिव डायरेक्टर भी

2:21 हैं। इसके अलावा आप ऑडियो बुक स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म स्टीरियल स्टोरी टेल और डिजिटल मीडिया प्लेटफार्म योर स्टोरी के भारतीय भाषा प्रमुख रह चुके हैं। वर्तमान में आप मानसिक स्वास्थ्य और वेल बीइंग से जुड़े कार्यक्रम के प्रोग्राम डायरेक्टर हैं। बहुत-बहुत स्वागत है सर। अब मैं आमंत्रित करूंगी उज्जवल भट्टाचार्य जी को। आइए आपका मंच पर बहुत-बहुत स्वागत है उज्जवल जी। चार दशक से अधिक समय से जर्मन प्रवासी उज्जवल भट्टाचार्य का भारत से गहरा रचनात्मक और वैचारिक जुड़ाव रहा है। आप पूर्वी जर्मन तथा एकीकृत जर्मन रेडियो में वरिष्ठ संपादक के रूप में लंबे समय तक कार्यरत रहे। आपकी कविताएं और

3:07 कहानियां हिंदी की सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। आपने जर्मन कविता के कई महत्वपूर्ण संग्रहों का अनुवाद किया है। जिनमें ब्रेक, एरिस्ट फ्रीड, गोएथे और एन स्नेस बैरग की रचनाएं शामिल हैं। हाल में आपके द्वारा संपादित विश्व कविता की 100 कविताओं का संग्रह और रविंद्रनाथ ठाकुर पर किताबें प्रकाशित हुई हैं। बहुत-बहुत स्वागत है सर। और अब मैं अगले वक्ता डॉक्टर राकेश पाठक जी को मंच पर आमंत्रित करूंगी। डॉक्टर राकेश पाठक वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और गांधीवादी कार्यकर्ता हैं। तीन दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय रहते हुए आपने कई प्रतिशत संस्थानों में

3:55 संपादकीय दायित्व निभाए हैं। अब तक आपकी चार पुस्तकें प्रकाशित हैं। सिंधिया और 1857 काली चिड़ियों के देश में बसंत के पहले दिन से पहले और मध्य प्रदेश की स्वतंत्र्योत्तर हिंदी पत्रकारिता का इतिहास पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में आपको अनेक सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। वर्तमान में आप डीवी लाइव चैनल में एसोसिएट एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। बहुत-बहुत स्वागत है सर आपका। और अब जिनके नजर से जिनके नजरिए से आज हम सब एक नया दृष्टिकोण भी जोड़ेंगे। इस किताब के लेखक अशोक कुमार पांडे जी आपका मंच पर बहुत-बहुत स्वागत है। कश्मीर के इतिहास और

4:42 समकाल और भारत के आधुनिक इतिहास के विशेषज्ञ के रूप में सशक्त पहचान बना चुके अशोक कुमार पांडे लेखन की अनेक विधाओं में हस्तक्षेप रखते हैं। पिछले काफी समय से आप इतिहास लेखन में सक्रिय हैं। कश्मीर नामा कश्मीर और कश्मीरी पंडित उसने गांधी को क्यों मारा और सावरकर काला पानी और उसके बाद आपकी चर्चित पुस्तकें हैं 20वीं सदी के तानाशाह आपकी नवीनतम कृति है। और अब मैं सबसे पहले स्वागत भाषण के लिए मंच पर आमंत्रित करना चाहती हूं राजकमल प्रकाशन समूह के अध्यक्ष अशोक माहेश्वरी जी। बहुत-बहुत स्वागत है आपका सर।

5:29 नमस्कार आप सभी का इस महत्वपूर्ण आयोजन में हार्दिक स्वागत है। हम अशोक कुमार पांडे जी की नवीनतम पुस्तक 20वीं सदी के तानाशाह पर चर्चा के लिए आज एकत्र हुए हैं। मुझे पूरी उम्मीद है कि विद्वान वक्ताग अपनी बातों से हमें नए सिरे से सोचने विचारने के लिए प्रेरित करेंगे। हम सभी एक समय विशेष में रहते हैं जिसके पीछे गुजर चुके समय की स्मृति और आगे आने वाले समय का अनुमान होता है। हमारी सदच्छा अतीत से इतिहास से सबक लेने की और भविष्य को बेहतर करने की होती है।

6:15 एक सामाजिक प्राणी के रूप में मनुष्य ने इतिहास के लंबे दौर में अनगिनत उपलब्धियां हासिल की हैं। हमारा इतिहास उपलब्धियों और विफलताओं का इतिहास रहा है। यह हम ही हैं जिसने सुदूर अतीत में आदिम बर्बरता को छोड़कर आगे कदम बढ़ाया और परिवार, समाज और राष्ट्र बनाया। फिर राष्ट्र से भी आगे बढ़कर वैश्विक मानवता का स्वप्न देखा। इन सब के साथ हम ही ने दोद विश्व युद्ध भी देखे। हम अपने समय में एक साथ परस्पर विरोधी वस्तुओं, विचारों, व्यवस्थाओं और परिस्थितियों से रूबरू होते रहते हैं। कोई समय ऐसा नहीं होता जब मानवीय

7:01 उपलब्धियां और मूल्य अपने आप सुरक्षित रहे। हमें अपनी उपलब्धियों और मूल्यों की लगातार हिफाजत करनी पड़ती है। अन्यथा सदियों से हासिल की गई कोई वस्तु एक झटके में समाप्त हो सकती है। किसी चीज को बनाने में बहुत वक्त लगता है पर बिगाड़ने में एक क्षण भी नहीं लगता। मेरी समझ से इतिहास की किसी विफलता को, किसी दुर्घटना को जब हम याद करते हैं तो इसका उद्देश्य खुद को आगाह करना ही होता है कि वे विफलताएं कभी दोहराई ना जाए। आज की चर्चा विवेक को जागृत रखने की प्रेरक बनेगी। इस उम्मीद के साथ एक बार फिर आप सभी का हार्दिक स्वागत। बहुत-बहुत धन्यवाद।

7:49 बहुत-बहुत शुक्रिया अशोक जी। और अब पुस्तक में प्रवेश की बारी है। लेकिन उसके पहले मैं चाहूंगी कि प्रवेश हम करें इस किताब में। पुस्तक लोकार्पण की औपचारिकता पूरी कर ली जाए। अशोक जी को मैं पुनः मंच पर आमंत्रित करना चाहूंगी कि आप आइए मंच पर और पुस्तक लोकार्पण का हम विधिवत रूप से कार्यक्रम पूरा करें।

8:48 बहुत-बहुत शुक्रिया शुक्रिया आप सभी का। निश्चित तौर पर जैसा कि इस किताब का शीर्षक है 20वीं सदी के तानाशाह। इस किताब को पूरा पढ़ने के बाद जाहिर तौर पर इस चीज की सुनिश्चितता की जा सकती है कि 21वीं सदी के तानाशाह अपनी तानाशाही किस तरह से प्रैक्टिस कर रहे हैं। वो हम जरूर चिन्हित कर सकते हैं। तो अब अधिक इस किताब के बारे में आप सबसे बात साझा करने के लिए मैं आमंत्रित करूंगी। गिरिराज किराडू जी का कि वो आएं और पुस्तक प्रवेश की आवश्यकता पूरा करें। गिरिराज करा जी को शुक्रिया और शुक्रिया आप सबका शुक्रिया

9:35 हबीब साहब का राकेश जी का उज्जवल दा अशोक और फिर से आप सभी का सो दोस्तों मेरा काम ये है कि मैं आपको बताऊं किताब के भीतर क्या है एक तरह से किताब में आपका प्रवेश कराऊं तो जैसा होता है किसी भी जमाने में किताब तक पहुंचते हैं हम उसमें जाना चाहते हैं उससे पहले बहुत सारी चीजें होती रहती है और कभी भी आप किताब में सीधे अकेले नहीं जाते। आपके साथ बहुत सारी दूसरी चीजें एक पूरा समाज, आसपास के लोग, एक इकोसिस्टम वो सब आपके साथ किताब में जाता है। तो जैसे इस किताब की अनाउंसमेंट हुई है तब से ही इस किताब के बारे में जरा संपर्क कर। अच्छी बात यह है कि बहुत सारी चर्चा हो रही है। वो पॉजिटिव हो रही है, नेगेटिव हो रही है, एल्गोरिदम के हिसाब से हो रही है, जैसे भी हो रही है। पर इस

10:20 किताब के बारे में बहुत सारी चर्चा हो रही है। और खासकर एक बिंदु को लेकर बहुत सारी चर्चा हो रही है। तो आप उस बिंदु से गुजरते हुए भी किताब में प्रवेश करते हैं क्योंकि उस बहस में आप है कहीं ना कहीं। उसी तरह से जिस जिन दिनों ये किताब आई है उन्हीं दिनों हम नम चमस्की की और एस्टीन की तस्वीरें एक साथ देख रहे हैं। तो वो तस्वीरें कहीं आपके दिमाग में होती है जब आप इसमें प्रवेश कर रहे होते हैं। जब ये किताब आई है तो उससे कुछ दिन पहले ममदानी जो है वो न्यूयॉर्क में जीत गए हैं। और ऐसा लगा जिस दुनिया भर में लिबरल ताकतों के लिए बड़ी विजय हुई है। और वो इस किताब में भी आ गए। मतलब इतनी नई चीज होने के बावजूद वो अभी इस किताब में है। उनकी जीत का जिक्र इस किताब में है। तो वो सब भी है। जब आप इतनी सारी बहस उस खास बिंदु पर

11:06 सुनते हैं तो पिछले कुछ सालों में इसको लेकर जो सीधे-सीधे बात करने वाले लोग हुए हैं वो भी आपके रास्ते में कहीं ना कहीं आते हैं किताब में जाने से पहले। जैसे मान लीजिए इस सवाल से कि ये हिटलर और स्टेलिन को एक सफे में रखने वाली जो बात है इस पे सीधा एकदम सीधा अगर आप ढूंढेंगे तो आपको झिझक बोलते हुए मिलेंगे और वो ये कहेंगे कि गुड आईडिया गॉन बैड मतलब अगर संक्षेप में कहें तो तालीम के मामले में वेरी गुड आईडिया गॉन बैड और हिटलर के मामले में अ वेरी बैड आईडिया गॉन वर्स है ना लेकिन इस सवाल से सीधी टकराहट कम हुई है। तो ये सब से गुजरते हुए और पूरे Facebook और Instagram और अब जो एक्स हो गया है

11:53 एक्स Twitter उसके एल्गोरििदम से होते हुए जब आप किताब तक पहुंचते हैं तो आपका अपना पर्सनल भी साथ में आता है। मैं और अशोक एक दूसरे को 20 साल से जानते हैं। एक जमाने में मैं ही उसे स्टालिन के बारे में बहुत बहस करता था और तब अशोक की पोजीशन दूसरी हुआ करती थी जो पिछले 20 साल में इवॉल्व हुई है। हम ये बात सही है। मतलब तब मैं बहुत अनक्रिटिकली ये मानता था कि स्टालिन एक ऑटोक्रेट डिक्टेटर टोटिटेरियन है और उनको लगभग इसी सफ में रखा जा सकता है। अब मेरा मानना उतना कम हुआ है और अशोक का सह थोड़ा बढ़ गया है। तो वो हमारी एक जाती हिस्ट्री भी है इसमें। एक हिस्ट्री ये है कि हम लोग हिंदी लेखक और उस दुनिया से आते हैं लेखन की दुनिया से। तो मुझे याद है अशोक जी यहां पर एक जमाने में पहल में एक

12:39 व्याख्यानमाला के तहत एजाज अहमद साहब को बुलाया था। ये मेरे ख्याल से मिड 90ज का वक्त था और लोग चाहते थे खासकर वामपंथी दोस्त चाहते थे कि वो कुछ ऐसा कहे जिससे उम्मीद मिले तो उन्होंने कुछ बातें कही जिससे उम्मीद मिले लेकिन कुछ बातें ऐसी भी कही जिससे लगे कि बहुत सख्त सेल्फ क्रिटिसिज्म की जरूरत है। और उन्होंने स्टालिन के मसले पर भी यही कहा कि हम इसे पूरी तरह अमेरिकन कैपिटल के बनाए हुए प्रचार तंत्र वाले एंगल से ही नहीं देख सकते। हमें वामपंथियों को एक ईमानदार नजर से स्टालिन के हर अच्छे बुरे किए पर नजर डालनी पड़ेगी। तो ये हिंदी की दुनिया में उस वक्त भी बहुत पॉपुलर बात नहीं थी जब एजाज साहब ने कही थी। अब वो दुनिया में है

13:25 नहीं। अब एक नए ढंग से थोड़ा और पॉपुलर तरीके से अशोक इस बात को कह रहे हैं। लेकिन किताब शायद ये नहीं कहती। ये सब किताब में घुसने से पहले की मुश्किलें है दोस्तों। तो किताब क्या कहती है? शुरुआत में एक भूमिका है। उस भूमिका को एक तरह से अशोक के प्रॉमिस की तरह माना जा सकता है कि वो किताब में क्या करना चाहता है। फिर हम यह देखेंगे कि उस प्रॉमिस पे वो आगे डिलीवर कितना करते हैं। तो जो भूमिका है या उसमें एक बात बहुत क्लियर है शुरू से कि वो तानाशाहियों के भीतर दो तरह की चीजों पे बात करना चाहते हैं। एक जो इंडिविजुअल पर्सनालिटी कल्ट और उसके अराउंड बनी हुई तानाशाही है और दूसरी जो संस्थागत इंस्टीट्यूशनलाइज्ड इंस्टीट्यूशन बेस्ड

14:11 तानाशाही है और उनका ये साफ मानना है भूमिका में वो साफ कहते हैं कि उनकी बहुत दिलचस्पी पर्सनालिटी और उस पे बात करने में नहीं है। इसीलिए आगे किताब में वो क्या करते हैं वो हम देखेंगे। उनकी दिलचस्पी ये है कि ऑटोपसी डिक्टेटरशिप इंस्टीट्यूशनलाइज कैसे होती है? वो संस्थाबद्ध रूप में कैसे बनती है? जाहिर है कि उसमें एक कैरिज्मेटिक फिगर होता है। वो कैरिज्मेटिक फिगर यहां पे है और आप हमारी सदी में दूसरे लोगों के चेहरे याद कर सकते हैं इस इसको देखते हुए। तो ये बात भूमिका बहुत साफ करती है कि उनकी दिलचस्पी किस चीज में है। उनकी दिलचस्पी है ऑटोक्रेसी के टोटलिटेरियन रिजीम्स के इंस्टीट्यूशनलाइज होने में। उसके पीछे के जो भी सोशियो इकोनॉमिक पॉलिटिकल

14:58 डायनेमिक्स और डायलेक्टिक्स है उसको सामने लाने में है। दूसरी बात जो ये कहते हैं और इसके लिए वो कई बार हॉब्स बर्म का हवाला भी देते हैं। और वो हवाला ये है कि जो हम अब 21वीं शताब्दी में देख रहे हैं। जो नए रूप हैं तानाशाही के उसकी कुछ झलक उसके कुछ मॉडल्स ऑफ रडी 20वीं शताब्दी की तानाशाहियों में दिखाई देते हैं। वो एक तरह से उनको प्रिडिक्ट करती है और एक दूसरे अर्थ में उनको प्रिडिकेट करती है कि एक नए फॉर्म में चीजें ऐसे भी आ सकती है। ये प्रॉमिस भी भूमिका में है। और आखिरी बात जो अशोक कहते हैं वो ये है कि मेरी किताब मेरा किताब लिखना एक पॉलिटिकल एक्ट है। यानी वह इस बात को जाहिरा तौर पर कहते

15:44 हैं कि मैं एक राजनीतिक काम कर रहा हूं। जब मैं यह किताब लिख रहा हूं। तो वैसे तो हम ऐसा कोई काम कर ही नहीं सकते जो किसी न किसी तरह से राजनीतिक ना हो। मतलब ये मुश्किल ही है। कब कहा था टॉमस मान ने कि मतलब हमारे समय में पूरी की पूरी जो मनुष्य की नियति है वो अपने आप को राजनीतिक शब्दावली में व्यक्त किया करेगी। ये कहे उनको 100 बरस से ज्यादा हो गए। तो इनका क्लियर मानना है कि ये पॉलिटिकल एक्ट है। अब होता क्या है किताब में ये तो इनका दावा है, भूमिका है। किताब स्टोरी टेलिंग के लहजे में कही गई है। ये एनालिसिस के लहजे में लिखी नहीं गई है। हालांकि इसमें एनालिसिस है। ये ऐसे लिखी गई है कि आपको एक एक दौर का एक इंसान का और उसके आसपास बन रहे

16:31 इंस्टीटशंस का एक विजुअलाइजेशन हो जाए। मान लीजिए अगर इसमें हिटलर या इदी अमीन या पिनोशे या स्टलिन के बारे में बात की गई है तो मसला शुरू होता है कि वो किस बैकग्राउंड से आए क्या किया कैसे बड़े हुए कैसे राजनीति तक पहुंचे कैसे पार्टी तक पहुंचे और उसके बाद एक तरह की पब्लिक हिस्ट्री जो है वो उसमें शामिल होते जाती है और वो बहुत क्रोनोलॉजिकल तरीके से आती है एक के बाद एक मसला आता है उसमें तो ये किताब का डिलीवर करने का तरीका है और किताब क्योंकि एक स्टोरी टेलिंग के स्ट्रक्चर में कही जा रही है। तो अक्सर इसकी शुरुआत एक आइकॉनिक सीन से होती है। जैसे मान लीजिए मुसोलिनी के साथ जो चैप्टर है मुसलिनी के बारे में उसकी शुरुआत होती है जब गांधी उनसे मिलने

17:17 गए। अब आज तो कोई कह देगा गांधी उनसे मिलने ही क्यों गए थे? बेवकूफ आदमी थे। क्या करने गए थे वहां पर? उनको कई लोगों ने रोका भी था। खासकर रोमिया रोना ने रोका था। और फिर भी वो गए उनसे मिलने और वो जो सीन जिस तरह से डिपेक्ट होता है ओपन होता है पाठक का इंटरेस्ट उस अध्याय के साथ वहां से जुड़ता है कि मुसोलिनी और गांधी के बीच में एक एनकाउंटर है वो एक दृश्य की तरह खुलता है। आपको मुसोलिनी एक तरह से इंट्रोड्यूस कर दिए जाते हैं और उसके बाद फिर जैसे स्टोरी टेलिंग का एक तरीका होता है वैसे वह कहानी धीरे-धीरे मुसलिनी के बारे में आप जानते हैं और एक पर्सनल छोटा बहुत ही छोटा पर्सनल स्केच यानी यहां जो उन्होंने भूमिका में कहा था उसप वो डिलीवर करते हैं

18:04 कि उनका बहुत इंटरेस्ट पर्सनालिटी के अराउंड नहीं है। इनका इंटरेस्ट है उन थ्रेट्स के अराउंड जो समाज से इकोनॉमिक्स से दूसरी चीजों से आते हैं और वहां से वो एक इंस्टिट्यूशनलाइज तानाशाही बनती है। तो यहां ये होता है इस किताब में एक मसला ये है कि क्योंकि वो सारा हम पुस्तक प्रवेश से पहले की बात कर चुके हैं तो क्या कोई टोन में डिफरेंस है? क्या जब अशोक स्टिन के बारे में बात कर रहे हैं या जब पिनोशे के बारे में बात कर रहे हैं, हिटलर के बारे में बात कर रहे हैं तो क्या कोई टोनल डिफरेंस है? डिस्क्रिप्शन में, कहने में मतलब लगभग अशोक ने अब ये कर दिया है इस किताब में कि वो बहुत नॉन पार्टीजन तरीके से लिखी गई है। एक तरह की एकेडमिक थोड़ी डिस्टेंस के साथ ऐसा नहीं लगता है कि वो इसके पक्ष में है, उसके पक्ष में है। बहुत

18:50 सर्जिकल ढंग से चीजों को कहा गया है। टोनल डिफरेंस आपको बहुत ज्यादा नहीं लगेगा। आपको कहीं भी ऐसा नहीं लगेगा कि दोनों को बराबर कर दिया है। कहीं ऐसा नहीं लगेगा कि दोनों को में से किसी एक को किसी पेस्टल पे रख दिया है। तो ये इन्होंने एक कमेंटेटर की तरह से एक सर्जन की तरह से एक एकेडमिशियन की तरह से करने की कोशिश की है। जहां पे इन सारे लोगों के बारे में ये सारे डिस्क्रिप्शन एकटोनल एक्सेस के बिना होते हैं। और कोई स्पेसिफ़िक ऐसा पॉइंट नहीं नज़र आता जहां से लगे कि हां ये स्पेशली इस बात के लिए इसके अगेंस्ट में है। जब इस तरह की किताब लिखी जाती है जिसमें स्टोरी टेलिंग हो जिसमें हिस्ट्री हो

19:36 जिसमें कुछ पर्सनल स्केच हो तो उसका टारगेट लीडर कौन है? हम लोग मतलब जो इस सभा में बैठे हुए लोग हैं वो लोग यानी ज्यादातर वो लोग जो स्पेशलिस्ट रीडर नहीं है। स्पेशलिस्ट रीडर से मतलब ये है कि जो रिसर्च करते हैं हिस्ट्री की या जो इस तरह के मसलों में एक तरह की विशेषज्ञता हासिल करना चाहते हैं या उसके लिए इसको देख रहे हैं। ये आम लोगों की एजुकेशन और इनेशन के लिए बनी हुई किताब है। और इसीलिए ये उस तरह से काम करती है जैसे इसका स्ट्रक्चर है। तो जब कोई आम व्यक्ति इस किताब को पढ़ेगा तो उसको इस पूरे दौर की एक समझ एक घटनाक्रम एक विजुअलाइजेशन मिलेगा।

20:21 फिर अंतिम सवाल ये है कि इस सब से गुजर कर कोई एनालिसिस हमें हासिल होता है तो वो एनालिसिस अलग से नहीं हासिल होगा। वो उसमें गुथा हुआ है। जिस तरह से सारा डिस्क्रिप्शन चलता है उसमें वो एनालिसिस गुथा हुआ है कि एक लेखक उन परिस्थितियों को कैसे एक हिस्टोरियन उस परिस्थिति को कैसे एनालाइज कर रहा है और इसीलिए इस किताब को अलग से अपनी पॉलिटिक्स या आईडियोलॉजी बताने की जरूरत नहीं पड़ेगी। मुझे उम्मीद है कि वो उस डिस्क्रिप्शन में से उन विवरण में से उन सब में से गुजर के सामने आ जाती है। और वैसे भी दोस्तों हम जितने लोग यहां बैठे हैं उनमें से कुछ एक अपवादों को छोड़कर जैसे अभिषार भाई यहां पर हैं और अजीत अंजुम है ऐसे कुछ लोग हैं जिनको छोड़कर बाकी बहुत कम लोग होंगे

21:06 जिनकी राजनीति जिनकी आईडियोलॉजी जिनका काम इतना पब्लिक व्यू में है जितना अभी अशोक का है। राकेश जी भी हैं यहां पर। तो इतने पब्लिक व्यू में जब किसी की आईडियोलॉजी और किसी की राजनीति हो तो उसके लिए आईडियोलॉजी और राजनीति किसी दिन अनाउंस करने की चीज नहीं रह जाती है। वो उसकी एक डेली डायनामिक्स बन जाती है। वो उसको रोज-रोज़ हासिल करनी पड़ती है। रोज-रोज़ उसको बनाना और बिगाड़ना पड़ता है। तो वैसे ही अशोक की और उनकी किताबों की राजनीति और आईडियोलॉजी है जो एक दैनिक घमासान में रोज बनती है। रोज स्थापित होती है और उनको वास्तविक संघर्ष करने होते हैं। मतलब कोई ऐसा इको चेंबर नहीं है जहां पे वो अपनी बात कहे और बाकी कुछ लोग उसके विरोध या पक्ष में कुछ बोले। एक बड़ी जनता है जो

21:52 उनके YouTube चैनल के मार्फत, उनकी किताबों के मार्फत उनसे लगातार बात करती है और वही इन किताबों की भी ताकत बन गई है कि वो उस जुबान में बात कर पा रही है। मेरे ख्याल से तो मैंने कुछ पुस्तक प्रवेश करा दिया है। अब अगर नहीं हुआ है तो बाकी लोगों के हवाले ठीक है। थैंक यू सो मच। बहुत-बहुत शुक्रिया सर। जो कुछ नहीं हुआ है वो प्रवेश एक-एक करके अब और भी विस्तार लेता रहेगा। मैं इसके बाद राकेश पाठक जी को बुलाऊं उसके पहले मैं आपने एक बहुत ऐतिहासिक मुलाकात के बारे में जिक्र किया मुसोलिनी के साथ जिनका हुआ। इस किताब में एक जिक्र एक और मुलाकात की जिक्र है मुसोलिनी से।

22:40 वो है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बी एस मुंजे जो मार्च 1931 में इटली जाते हैं और 19 मार्च को मुसलनी से मुलाकात करते हैं और जब वो पूछते हैं मुसलनी उनसे कि आपने विश्वविद्यालय वगैरह ये सब देखा तो वो कहते हैं कि दरअसल वह लड़कों के सैन्य प्रशिक्षण में ज्यादा रुचि रखते हैं और इटली वही देखने आए हैं मुंजे ने वहां ब्लैक शटर्ड बलिला जिसके बारे में रेफरेंस में दिया हुआ है। एक तथा अन्य फासिस्ट सैन्य प्रशिक्षण केंद्रों को देखा। उनकी तारीफ की और कहा कि युवाओं को शिक्षा से ज्यादा विचारधारा

23:26 की ट्रेनिंग की जरूरत है। लौट कर उन्होंने आरएसएस को इसी आधार पर तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। और ऐसे ही एक और जिक्र मिलता है। पता नहीं इन सबके संबंध सारे तानाशाहों से कैसे निकल आते हैं। पर हिटलर की मृत्यु के बाद भी एक महिला जो सावित्री नाम की महिलाएं जो बेसिकली ग्रीक इटालियन महिला है वो उनसे इतना ज्यादा प्रभावित है कि वो हिंदू धर्म दर्शन से जोड़कर उनको विष्णु का अवतार तक घोषित कर देती हैं। तो इसी सारे परिपेक्ष में अपनी दृष्टि डालने के लिए मैं आमंत्रित करूंगी राकेश पाठक जी को। राकेश जी

24:19 आज के इस अभिनव आयोजन के मुख्य अतिथि परम आदरणीय प्रोफेसर एस इरफान हबीब साहब उज्जवल दा अशोक जी गिरिराज किराडू जी और इस आयोजन के दूल्हा मेरे बहुत अनन्य मित्र और भाई अशोक कुमार पांडे जी। सबसे पहले तो मैं आप सब दिल्ली के 56 इंची भाइयों और बहनों को सैल्यूट करता हूं कि जिस पर्यावरण में जिस माहौल में आप लोग यहां तक आए हैं। मैं तो अभी दो-तीन घंटे ही दिल्ली आए हुए हैं। यकीनन आप सब लोग सलामी के काबिल हैं। हमारे ग्वालियर में एक दोस्त हैं अशोक भाई और हमारे दोनों के छोटे भाई हैं। जानेमाने शायर अब्दुल

25:06 अजनबी। मुझे लगता है उन्होंने आप लोगों के लिए लिखा होगा। अजीब शहर पर जीवन निसार करना पड़ा। अजीब शहर पर जीवन निसार करना पड़ा। धुएं का दरिया हमें रोज पार करना पड़ा। तो आप लोग उस धुएं के दरिया को पार करके यहां तक आए हैं। इसके लिए निश्चित तौर पर आप धन्यवाद के पात्र हैं। धन्यवाद तो सिर्फ मोदी जी का। थैंक यू मोदी जी। उनको तो वे हैं तो मुमकिन है ही। और आप जब इस किताब को पढ़ेंगे अशोक ने थोड़ी सी हिंट दे दी है। बार-बार उनका चेहरा आपकी नजर में आएगा। किताब पर बात करूं। गिरिराज भाई ने बहुत विस्तार से पुस्तक प्रवेश करा दिया है।

25:51 उससे पहले मैं इस मौके का एक लाभ उठाना चाहता हूं। मैं अपने और अशोक भाई के पुराने दिनों को याद करना चाहता हूं और उसमें एक संयोग भी जुड़ा हुआ है। आप जानते होंगे अशोक सरकारी अफसर रहे हैं और यह ग्वालियर में 2003 से 2013 तक तैनात रहे थे। संयोग यह है कि मैं उस दौर में ग्वालियर में पहले नवभारत में संपादक था। फिर नई दुनिया में संपादक रहा। ऐसे ही लिखने पढ़ने वाले लोग जैसे एक साथ कहीं ना कहीं मिल जाते हैं। ऐसे ही हम लोग मिले। हमने एक नया प्रयोग किया। अखबार में एक पूरा पेज साहित्य का बनाया। अशोक भाई उसमें बहुत मदद करते थे और मैं जिस संयोग की बात कर रहा हूं वैसा

26:39 संयोग अब आगे शायद बन पाए ना बन पाए मैं नहीं जानता। मेरी जो सबसे पहली किताब आई थी यूरोप का यात्रा वृतांत था। मैं कोसो गया था यूएन मिशन की रिपोर्टिंग करने। उसकी पहली समीक्षा अशोक कुमार पांडे ने लिखी थी। अब इसकी उलट मासी देखिए। जब अशोक भाई की किताब आई कश्मीरनामा तब उस पर पहली चर्चा ग्वालियर में मेरे साथ हुई। आखिरी जो मेरी किताब आई उससे पहले एक कविता संग्रह आया मेरा उसको अशोक ने छापा। उसका हिसाब किया अशोक जी ने। जब मेरी चौथी किताब आई सिंधिया और 1857 तो उसके विमोचन में अशोक भाई मंच पर थे।

27:26 लेकिन यह सिलसिला बहुत आगे नहीं चल पाएगा क्योंकि मेरी कुवत नहीं है अशोक की तरह लिखने की अशोक की तरह पढ़ने की अशोक तो जैसे किताबों में डूब गए हैं किताबें लिखना पढ़ना हम सब तक पहुंचाना डॉक्टर अख्तर नजमी साहब ने लिखा कि इसीलिए बनाया है घर किताबों में इसीलिए बनाया है घर किताबों में कि बार-बार तुम्हारी नजरों से गुजरूंगा अशोक ने किताब किताबों में घर बना लिया है। इसलिए हमारी आपकी नजरों से लगातार गुजरते। बात इतिहास की किताब की हो रही है। 20वीं सदी के तानाशाहों पर हम बात कर रहे हैं। इसे पढ़ते हुए पहले थोड़ा सा 21वीं वी सदी

28:12 के इस दूसरी दहाई के परिदृश्य पर नजर डाल लेना चाहिए। कि हम किस दौर में जी रहे हैं। इस वक्त हमारे आसपास हो क्या रहा है? यह जो 21वीं सदी है इसमें जमूरियत का लबादा पहनकर भीतर तानाशाही का जर बख्तर बांधते हुए बहुत सारे लोग हमारे आसपास दिखाई दे रहे हैं। दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र में सफेद हवेली में बैठा हुआ जनता के वोटों से चुना हुआ शख्स पूरी दुनिया पर हंटर फटकार रहा है। लोकतंत्र की जननी दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र वहां एक अजैविक

28:57 अवतार जनता के वोटों से चुनकर तानाशाही की तरफ धीरे-धीरे कदम बढ़ा रहा है। ऐसे में 20वीं सदी के इस महाने पर 21 वी सदी के मुहाने पर 20वीं सदी के तानाशाह कैसे थे? वे कैसे बनते थे? उनका हार्ड मास क्या था? उनका अस्थि मज्जा क्या था? वे कौन सी परिस्थितियां थी? वे कौन लोग थे जो उन्हें खाद पानी दिया करते थे? इसे जान लेना और पहचान लेना इसलिए जरूरी है ताकि आने वाले कल के तानाशाहों की पदचाप आप समय रहते सुन सके। उनकी बोली बानी पहचान सके। यह समझ सके कि वो कौन सा जीना सा पर्दा है। वो

29:42 कौन सा जीना बीना आवरण है। रोज रोज नए-नए पोशाकों में कौन है जो तानाशाह जैसा बनना चाहता है? जब आप इस किताब को पढ़ेंगे तो आपको लगेगा कि सर्वहारा की सत्ता के बहाने सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचे लोग कैसे 20वीं सदी में सर्वसहारा बन गए थे। अभी गिरिराज भाई ने स्टाइलिन का जिक्र किया। सचमुच में बहस चल रही है। आज भी मैं जब आ रहा था तो देखा एक वेबसाइट पर लंबा विश्लेषण है। लेकिन लेखक की स्वायता, लेखक का अधिकार उसे अपने तरीके से नायकों और इतिहास की घटनाओं की मीमांसा करने का अवसर देता है। हो सकता है उनके तर्क अपनी जगह हो। लेकिन

30:30 जब आप अशोक पांडे की इस किताब को पढ़ेंगे तब आपको समझ आएगा कि सचमुच में लेन का जो उत्तराधिकारी था वो कालांतर में किस तरह तानाशाह बन गया था। एक-एक घटना, एक-एक घटनाक्रम उस वक्त की परिस्थितियां यह बताती है कि भले कोई व्यक्ति पार्टी की सत्ता के नाम पर सत्ता में आया हो लेकिन जब उसने व्यक्ति की सत्ता स्थापित की तो उसका दमन चक्र पहले दूसरों पर चला। फिर उसकी चक्की घर के भीतर चलना शुरू हुई और उसके बाद लेखक, कवि, साहित्यकार हर व्यक्ति हर वो व्यक्ति जो असहमत था वो किस तरह साइबेरिया भेज दिया गया। किस तरह

31:17 लोग गायब हो जाते रहे 20वीं सदी के इन तानाशाहों के दौर में ये किताब इस बात का सुबूत है। हम अपने देश में इस वक्त जो कुछ देख रहे हैं असहमति की आवाजों को जिस तरह दबाया जा रहा है। जिस तरह सत्ता या नेता की आलोचना उससे सवाल पूछना देशद्रोह है। नेता से सवाल पूछना धर्मद्रोह है। नेता ही देश है। नेता ही धर्म है। वह सेंगोल धारण करके धर्म ध्वजा फहराना चाहता है और अंततः राजनैतिक सत्ता के अलावा धर्म का भी सबसे बड़ा पुरोधा बनना चाहता है। ऐसे में आपको समझ में आएगा कि हिटलर, मुसोलिनी, अगस्तो, पिनोशे या

32:04 दादा ईदमीन किस तरह धर्म की सत्ता का भी उपयोग किया करते थे। जब आप इस किताब को पढ़ेंगे तो आप पाएंगे कि आज हमारे आसपास कोई प्रेम पत्र बचाने की कोशिश में लगा शख्स सत्ता का चारण बन जाए तो उसे याद दिलाना पड़ेगा कि पास्टर लिमोर भी लिमोर भी किसी समय हिटलर का प्रशंसक थे। लेकिन जब वे उनके लिए आए तो उनके लिए बोलने वाला कोई नहीं था। वो कालज कविता आपने सब ने सुनी होगी। तो आज हमारे इस दौर में यह किताब हमें यह बताएगी इतिहास के अनगिनत पन्नों में अनगिनत लोगों के खून इन तानाशाहों ने किस तरह बहाए थे और एक बहुत

32:51 जरूरी बात ये किताब रेखांकित करती है। ये किताब आपको बताएगी कि आज भी दुनिया जिस तरह दो ध्रुवों में बंटी हुई है। यद्यपि शीत युद्ध के समय जैसा बंटवारा इस वक्त नहीं है। लेकिन ये तानाशाह जिस समय छोटे-छोटे कदमों से आगे बढ़ रहे थे। जब ये घुटनों के बल चल रहे थे और जिस दिन ये तन कर खड़े हुए तब तक इन सब लोगों की इस यात्रा में दोनों ध्रुवों के लोग चाहे वो दक्षिणपंथी खेमा हो या वामपंथी चाहे अमेरिका का ब्लॉक हो या सोवियत संघ का ब्लॉक ये सब लोग तब तक चुप रहे यहां तक कि मुलाकातें करते रहे जब तक कि ये आग उनकी दहरी तक नहीं पहुंच गई। चाहे हिटलर रहा हो चाहे मुसोलिनी अगस्तो पेनोश हो ईदी अमीन

33:39 हो किम इल सुंग हो इन सबके साथ इन दोनों ध्रुवों की सर्वोच्च सत्ताओं ने आशीर्वाद जैसे हाथ रख रखे थे लेकिन जब वे भस्मासुर बनना शुरू हुए जब पर जागी थी ये किताब ये बताती है कि साहित्यकार कथाकार लेखक इतिहासकार सब किसी तानाशाह को बर्दाश्त नहीं होते। अगस्तोपनोशे ने पावलो नेरूदा को किस तरह धीमा जहर देकर मार दिया या मरवा दिया था। ये किताब इस बात का सबूत है। आज भी हमारे आसपास बहुत सारा कुछ ऐसा घटित हो रहा है। जिसे मैं अक्सर मुहावरे में लोया लोहान समय कहता हूं। लहूलुहान की

34:28 बजाय लोया लोहान। आप समझ सकते हैं कि ऐसे समय में ये किताब आपको बताएगी कि अंधेरा और गहरा हो उससे पहले आप चेत जाए। बहुत थोड़ी सी चीजें मैं सामने लेकर आऊंगा। इसमें किताब में ऐसे कुछ जुमले जो अशोक ने लिखे हैं। छोटे-छोटे एक-एक वाक्य में डेढ़-ढ़ वाक्य में कितनी गहरी बात कह दी गई है। साथ ही ये किताब ये भी बताएगी कि अंत हर तानाशाह का वही होना है जो इस किताब में इन छह तानाशाहों का बताया गया है। कोई अपनी कनफटी पर पिस्तौल रखकर खुदकुशी करेगा। किसी की लाश लैंप पोस्ट पर लटकी दिखाई देगी। कोई गुमनामी में किसी दूसरे देश में अस्पताल या किसी आलीशान घर में मरा पाया जाएगा।

35:16 लेकिन जब तक तानाशाह गद्दी पर होते हैं, जब वे सत्ता के सफेद घोड़े पर बैठकर अहंकार की सड़क पर सर पर दौड़ रहे होते हैं, तब उन्हें इसका एहसास नहीं होता कि इसका अंत एक ना एक दिन मौत की दहलीज पर होने वाला है। बहुत छोटे-छोटे एक दो उदाहरण मैं इसमें से आपके साथ साझा करना चाहता हूं। अशोक भाई ने बहुत मेहनत की है। सब चीजें ऑथेंटिक है। हर चीज का फुटनोट है। रेफरेंस बुक्स का का हवाला है। आप एक भी तथ्य का खंडन नहीं कर सकते। आप ये नहीं कह सकते ये आपने अपने मन से कहीं लिखा है। और इतिहास की किताबों के लिए यही सबसे जरूरी बात है। देखिए एक दो बातें बहुत छोटी-छोटी आपको आपके साथ साझा करता हूं।

36:06 अशोक लिखते हैं अपनी किताब में 36 पर अतिवादी विचारधाराओं के लिए संकट खाद पानी की तरह होते हैं। वह कीचड़ जिसमें उनका कमल खिलता है। इससे ज्यादा और कुछ कहने की जरूरत नहीं है। ये एक वाक्य अपने आप में पर्याप्त है। नाइट ऑफ लॉन्ग नाइफ्स लंबे चाकुओं वाली रात जर्मनी में हमारे आसपास भी ऐसे लंबे चाकू जो हमें दिख नहीं रहे हैं। धीरे-धीरे जीभ लबलबाते हुए हमारे पास आते जा रहे हैं। गोवल्स का जिक्र करते हुए अशोक लिखते हैं हर अनपढ़ हिटलर को ऐसे डिग्रीधारी अंधभक्त मिल ही जाते हैं। हर तानाशाह यही चाहता है कि उसे देश समझा

36:51 जाए। उसके खिलाफ बोलने वाले वाले को देशद्रोही हर हिटलर के पास अपना एक गोब्स होता है। हिरना समझबूझ वन चरना हमारे आसपास भी कोई हिरना हिरना हिरेन पता नहीं कौन था हर स्टालिंस के पास हर स्टालिन के पास अपना एक डेरिया होता है। हिटलर और मसोलनी की तस्वीरें पूरे देश में लगी होती हैं। जब वे सत्ता के शिखर पर होते हैं। उनकी जीवनी स्कूलों में पढ़ाई जाती हैं। किसी की जीवनी में मगरमच्छ बचपन में पकड़ कर घर लाने का वृतांत होता है। किसी की जीवनी में कुछ और मुसोलिनी जिसे इल ड्यूचे कहा जाता था। यानी वहां की भाषा में लीडर सुप्रीम उसके सुप्रीम लीडर जी उसके शयन कक्ष में

37:40 जिस बालकनी में खड़े होकर वो लोगों को संबोधित करता था हाथ उठाता था वो अंदर चला जाता था उसके बाद बत्ती रात भर इसलिए जला कर रखी जाती थी कि ताकि लोगों को लगे कि सुप्रीम लीडर 18 घंटे काम कर रहा है। तो यह किताब अपने आप में इस बात के लिए जगाने के लिए हम सबको चेताने के लिए एक खिड़की है। एक दहरी है जहां से हम आगे 21वीं सदी के तानाशाहों को पहचान सके। उनकी आहट को सुन सके। क्योंकि अशोक लिखते हैं किताब के आखिर में तानाशाह खत्म हो जाते हैं। लेकिन उनकी लगाई आग कई पीढ़ियों तक उनकी लगाई आग

38:28 सुलगती रहती है। इससे पहले कि इस किताब को पढ़िए और हो सके तो अपने आंगन चौबारे घर, गांव, सूबे, मुल्क में ऐसे किसी तानाशाह को समय रहते रोक लीजिए। इससे पहले कि देर हो जाए। क्योंकि इस किताब में कई ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब आप ढूंढने चलेंगे तो आपको अपने आसपास इसी लुटियन के टीले में भी मिल सकते हैं। प्रकाश दीक्षित जी हम सबके बहुत आदरणीय हैं। ग्वालियर के बहुत बड़े कवि उनकी पंक्तियों के साथ अपनी बात खत्म करूंगा। सवाल जो सिर्फ किताबों में नहीं मुट्ठियों में भी हैं और चेहरों पर जड़े हैं। सवाल जो सिर्फ किताबों में नहीं मुट्ठियों में भी हैं और चेहरों पर जड़े हैं। स्पार्टाकस के साथियों की तरह राजपथ के

39:13 दोनों किनारों पर सदियों से सूलियों पर लटके खड़े हैं सवाल। सवाल जो सिर्फ किताबों में नहीं मुट्ठियों में भी हैं और चेहरों पर जड़े हैं। इन सवालों के जवाब अगर आपको चाहिए तो अशोक कुमार पांडे की ये किताब उन सवालों को हल करने में आपकी मदद कर सकती है। मुझ जैसे मामूली विद्यार्थी को आपने इतनी देर सुना। इसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। जय हिंद। बहुत-बहुत शुक्रिया राकेश जी। जिस अंदाज में आपने अपना वक्तव्य रखा उसी अंदाज में एक बात और इस लिहाज से इस प्रकाशन को आप बधाई दीजिए कि वो राखी वो बायोलॉजिकल राइटर्स हमारे सामने प्रस्तुत कर रहा है क्योंकि हाल फिलहाल में हमने पटना पुस्तक

39:58 मेला में एक नॉन बायोलॉजिकल राइटर का भी दर्शन किया। कितने की किताब थी? 15 करोड़ की। तो आभार कि जैविक लेखकों को आप मंच दे रहे हैं। अब उज्जवल जी की तरफ मैं बढूं तो मैंने जैसा कि कहा कि इस परिचर्चा को और विस्तार देते हैं। जब मैं इस किताब को पढ़ रही थी और इसके रेफरेंस देख रही थी उस दौरान और भी ज्यादा पढ़ने का क्योंकि ये रोचक किताब है अपने आप में जैसे अशोक जी की अन्य किताबों की तरह। तो मैंने पढ़ा रवींद्र नाथ ठाकुर जी के विचार स्टालन पर जीनस और पांच के किताब गोरकी के नेहरू के इसी तरह अल्बर्ट आइंस्टीन के विचार भी पढ़े और अलबेस इन सब

40:45 ने मतलब ये सारे लोग जो उस दौर में देख रहे थे प्रथम विश्व विश्व युद्ध को देखा था। द्वितीय विश्व युद्ध को देखा था। उन सब ने ऑलमोस्ट सबने ये एडमिट किया कि विदाउट द वैरिएंट रोल ऑफ स्टालन एंड सोवियत यूनियन इट वाज़ नॉट पॉसिबल टू डिफीट फासेसिस्ट जर्मनी। तो अल्बर्ट आइंस्टीन वहां पर एक कोट करते हैं जो भ्रम मुझे भी हुआ इस किताब में को पढ़ते हुए जो पहले से स्थापित वैचारिक की होती है तो कई सारी किताबें आती हैं जो जो झोर कर रख देती हैं तो इसने भी झोरा झझोरा और मैं अल्बर्ट आइंस्टीन की वो बात यहां पर कोट करना चाहूंगी जो कि मेंशन है एक-एक के कॉटन एक राइटर है उनकी किताब है हैज़ साइंस डिस्कवर्ड गॉड वहां पर

41:32 वो एक जगह कह रहे हैं कि बाय द वे दे आर इंक्रीजिंग साइंस दैट द रशियन ट्रायल्स आर नॉट फिट बट देयर इज़ अ प्लॉट अमंग दोज़ हु लुक अपॉन स्टालिन एज़ अ स्टूपिड रिएशनरी हु हैज़ बिट्रेट द आइडियाज़ ऑफ़ द रिवोल्यूशन आई वाज़ फर्मली कंविंस्ड टू बिगिन विथ दैट इट वाज़ अ केस ऑफ़ डिक्टेटर्स डिस्पॉटिक एक्ट्स बेस्ड ऑन लाइज एंड डिसेप्शंस बट दिस वाज़ अ डिल्युजन। सो इस रेफरेंस को भी एड्रेस करने के लिए मैं चाहती हूं कि अब विजल जी आए और इसको विस्तार जी।

42:27 थैंक यू। सलाह तो आपने दे दी लेकिन मैं तो वही बोलूंगा जो मैं बोलना चाहता हूं। धन्यवाद आयोजकों को आप सबको अशोक बेहद मेहनती है और खुशी की बात है के अब तक लगातार उसे इस मेहनत का नतीजा मिलता रहा है। यह बात मैं अशोक की तारीफ करने के लिए नहीं कह रहा हूं बल्कि ईर्ष्या के साथ कह रहा हूं। मैं

43:13 उसकी किताबों का पाठक रहा हूं। शुरू से बल्कि ये सही कहा जाए तो ज्यादातर मामलों में किताब प्रकाशित होने से पहले से ही किताब की आइडिया बनने के स्तर से ही और मैं मुरीद हूं उसकी क्षमता का उसकी शैली का लेकिन हम लोगों में एक काफी द्वंद भी रहा है इतिहास बोध के संबंध में और उसके साथ मैं इस किताब पर आ रहा हूं। मेरा मानना है कि ऐतिहासिकता में हमेशा प्रासंगिकता

43:59 होती है। लेकिन यह जरूरी नहीं कि प्रासंगिकता में हमेशा ऐतिहासिकता हो। और इतिहास संबंधित लेखन के लिए यह एक बहुत जरूरी बात है। मैं सोच रहा था तानाशाही राजा महाराजा हुए हैं। निरंकुश अत्याचारी दमन करने वाले लेकिन तानाशाह वो नहीं थे। तानाशाह राजतंत्र में नहीं हुआ है। इतिहास को देखते हुए एक छोटी सी अवधि के

44:46 लिए ऑलिव कॉम्बे को कॉमवेल में तानाशाही प्रवृत्ति देखी गई है। पहली बार जो थोड़ा मुकम्मल सा तानाशाह वो हमें दिखाई देता है। समानता मैत्री समानता भाईचारा और आजादी के नारे के साथ संपन्न फ्रांसीसी क्रांति के बाद उसके पहले नेता जैकोबिनिस्ट रबस्पियर रबस्पियर को दुनिया का पहला तानाशाह कहा जा सकता है। उसके बाद हमें एक के बाद एक एक तरफ जहां लोकतंत्र

45:34 का विकास होता है। दूसरी तरफ तानाशाही का विकास तानाशाहों का उभरना फुदक कर उभरना हमें दिखाई देता है। जहां संकट है वहां और जहां संकट बहुत स्पष्ट रूप से सामने नहीं दिखा रहे दिख रहा है वहां भी। संकट के लक्षण और उनमें से तानाशाह के ऊपर संकट सिर्फ अर्थनीति का नहीं अस्मिता का संकट पहचान का संकट उसने भी तानाशाहों को जन्म दिया है। तो आखिर क्यों इस पर बात करने से पहले

46:22 मैं ऐसा इस किताब में जो आम तौर पर लोगों को जो खामियां दिखाई दी है जिनसे वो सहमत नहीं हुए वहां से शुरू करके इस किताब के महत्व पर आना चाहूंगा। ये मेरा तरीका है। हिटलर स्टिन उस पर बात करता हूं। लेकिन मेरी सबसे बड़ी आपत्ति इस किताब पर ये है कि किल सुम इमीन और पिनोश जैसे तीन छछूंदरों के साथ हिटलर और स्टालिन की तुलना तुलना नहीं जस्ट पोजीशन नहीं चलता।

47:09 बल्कि मैं हिटलर और स्टिन के संबंध में एक बात कहना चाहूंगा जो आमतौर पर लोग कहते नहीं है। स्टालिन एक विश्व दृष्टि का सेवक था। हिटलर की एक विश्व दृष्टि थी। अपनी विश्व दृष्टि थी जो आर्यन नस्ल के प्रभुत्व के इर्दगिर्द बनी थी और बाकी सारी दुनिया को उसमें बिल्कुल बहुत ही गंदे किस्म का गुलाम होना था। दुनिया की के सारे संसाधन इस छोटी सी आर्य

47:57 नस्ल आर्य नस्ल सारे जर्मन नहीं जिनकी आंखें नीली हो, बाल सुनहरे हो, नाक लंबे हो, जिनमें से कुछ भी हिटलर और स्ट्स के नहीं थे। ये भी ध्यान देने लायक बात है। तो मैं जो कह रहा था रोबिय से शुरू होता है। उसके बाद तानाशाह आता है। क्या आखिर क्यों? मोनार्की एंपायर के बदले जब नेशन स्टेट का जन्म होता है हमें तानाशाह दिखाई देते हैं। फर्क क्या है दोनों में? नेशन स्टेट में जो पिटिकल सोसाइटी

48:45 उसका एक क्रमबद्ध सुसंगठित रूप हमें देख दिखाई देता है। जो उसे ठो है नेशन स्टेट को तो क्या तानाशाहों का उत्थान उभरना उस सिस्टम से जुड़ा हुआ है। मेरे पास जवाब नहीं है। लेकिन एक धारणा मेरे मन में आई के जहां

49:30 राजा या वंशानुक्रम से वैधता ढूंढने के बदले जनता से उसकी पहचान से वैधता ढूंढी जाती है। यानी नेशन स्टेट वहां से इसे मनाना पड़ता है। सिस्टम के लिए मैनेजमेंट की जरूरत होती है। मैनेजमेंट में हायरार्की होती है और हायरार्की डिसेंट को बर्दाश्त नहीं कर पाती है। मान तो लेती है कभी-कभी लेकिन वो उसके कैरेक्टर के विपरीत है। वहां ऊपर नीचे ऊपर से आर्डर आएगा नीचे उसे स्वीकार किया जाएगा और दोनों के बीच कम्युनिकेशन के लिए हां जितनी बेनवलेंस

50:16 जितनी डेमोक्रेसी होनी चाहिए उसको तो बर्दाश्त करता है। अक्सर हम देखते हैं कि पॉलिटिकल स्ट्रक्चर डेमोक्रेटिक होता है लेकिन इकोनमी जो है वो हायरार्किकल और ऑर्डर देने वाले व्यवस्था के तहत चलती है। तो इसी में से हमें तानाशाही की एनाटॉमी ढूंढनी पड़ेगी और ये किताब यही सवाल पेश करती है। प्रासंगिकता भारत की स्थिति वहां से यह सवाल पैदा हुआ और वहां से सारे सवाल इस एक विवरणात्मक

51:01 शैली में तानाशाहों पर संक्षेप में ही कहना पड़ेगा। इतनी मोटी किताब है नहीं। इसे प्रस्तुत किया गया है और वो तानाशाही की एनाटॉमी क्या है? इससे जुड़े हुए सवालों का एक पूरा पैनोरामा प्रस्तुत करता है। कोई जवाब नहीं देता है। जवाब देना शायद मकसद भी नहीं है। मैं ये तय करके आया था कि मैं बहुत संक्षेप में बोलूंगा। अशोक बात ये है मैं तो ये किताब हो गया। मैं अगले किताब अगली किताबों के बारे में सोच रहा हूं। और हमारी काफी बातचीत हुई है। ऐतिहासिकता को

51:50 केंद्र में रखना पड़ेगा और भारत में इतिहास लेखन में ऐतिहासिकता के सिलसिले में मैं सोच रहा था के जब मैं 20वीं सदी के तानाशाह की बात हो रही है। मैं 20वीं सदी के इतिहासकारों के बारे में सोच सोच रहा हूं और सब के सब मुझे प्रोविंशियल लगते हैं। जो प्रोविंस से आते हैं उनकी बात तो छोड़ दी जाए। उनके अलावा भी या तो मार्क्सिस्ट प्रोविशियल हॉब्स भी मुझे प्रोविंशियल लगते हैं। यूरोसेंट्रिक लगते हैं। एक शख्स जिसके पास प्रोविंशियल होने की काफी वजह

52:36 थी। वो अपनी तीन किताबों में प्रोविंशियल नहीं है। जवाहरलाल नेहरू उस इतिहास दृष्टि से एक रास्ता मिल सकता है। और जहां तक तानाशाहू की बात है सिर्फ जक्सर पोजीशन नहीं एक तुलना मैं अशोक कुमार पांडे से उम्मीद रखता हूं। हिटलर और स्टालिन की मेरी बात हो रही थी जर्मनी में वो जर्मन भारत संघ के उपाध्यक्ष वो वहां के अनुदारवादी वहां की अनुदार पार्टी

53:22 अनुदारवादी पार्टी सीएसयू के सांसद थे उस उन्हें लगा कि ये कम्युनिस्ट है तो दो स्टालिन को गाली क्योंकि वही सबसे कमजोर पॉइंट होता है उनका स्टालिन को गाली दे रहे थे। मैंने कहा यार तुम्हें क्या दिक्कत है? स्ट तो कम्युनिस्टों को मान रहे थे तो तुम्हें तो खुश होना चाहिए। क्या हुआ के ये क्या स्टालिन का प्रॉब्लम था? क्यों वो अचानक ये आया? स्टाइलिन की चर्चा करने के लिए हमें विश्व क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन के सबसे बड़े रणनीतिकार

54:08 लेनिन की समग्र ऐतिहासिक भूमिका पर विचार करना पड़ेगा। लेडी जो हमारे लिए देवता हुआ करते थे और तभी हमें पता चलेगा के समाजवाद में क्यों स्टालिन आया और स्टालिन का आना कहां तक हिटलर के उत्थान के लिए जिम्मेदार रहा है। ये एक बहस जर्मनी में चल रही है। रोजा की मौत के बाद कम्युनिस्ट आंदोलन में लेनिन का मुकाबला करने वाला कोई नहीं रह गया था। तो लेनिन का वर्चस्व स्थापित हुआ। लेनिन के वर्चस्व से स्टालिन आए जिसमें

54:54 जरूर स्टाइलिन में उसकी एक भूमिका रही है। और एक बार स्टिन आने के बाद सिर्फ वसाई नहीं स्टिन भी हिटलर के उत्थान का एक कारण रहा है। मुझे ऐसा लगता है। इस दृष्टि से तानाशाही खासकर इन दो तानाशाहओं का विचार जरूरी है। धन्यवाद। मुझे उम्मीद है कि मैंने बहुत ज्यादा वक्त नहीं लिया। धन्यवाद। पर आपने कहा था एड्रेस नहीं करेंगे आप पर आपने एड्रेस भी किया और सुझाव भी दिया कुछ

55:39 किताबों के नाम से शुक्रिया उज्जवल जी और अब गिरिराज जी कुछ अपनी बात इस संदर्भ में कहना चाह रहे हैं जोड़ना चाह रहे हैं गिरिराज जी सॉरी दोबारा दोबारा आने का मेरा कोई इरादा नहीं था लेकिन उज्जवल दा ऊंचे विद्वान हैं और वो एक बहुत जरूरी बात शुरू करके बीच में ड्रॉप कर दें तो मैं चाहता हूं आप लोग जब जाएं घरों में तो अपने साथ वो सवाल लेके जाए कि मोनार्कीज़ के टाइम में तानाशाह नहीं हुए। हालांकि ऐसे बहुत सारे चीजें हैं जो मोनार्कीज़ में है ऑलरेडी। एक तरह की अथॉरिटेरियनिज्म, एब्सोल्यूटिज्म, पावर का वो सब है ऑलरेडी। लेकिन फिर भी जिसे हम आज की भाषा में तानाशाह कहते हैं वो मोनार्की के टाइम में क्यों नहीं हुए? और जब से नेशन स्टेट बना

56:26 है तब से ये बार-बार क्यों हो रहा है? जब से मॉडर्न टाइप का नेशन स्टेट बना है, यानी जिसमें डेमोक्रेसी है, वोट का राज है, संविधान है। यह जब से बना है, तब से यह बार-बार क्यों हो रहा है? ये सवाल आप अपने साथ लेकर जाएं और ये सोचें कि ये किताब कहीं हमें वो छह पॉसिबिलिटीज तो नहीं दिखा रही है जहां पे मॉडर्न नेशन स्टेट जब गलत रास्ते जाता है तो वैसा हो सकता है। यानी ये एक प्राचीन समस्या नहीं है जो हिटलर और स्टालिन ले आते हैं। ये एक शुद्ध आधुनिक समस्या है। तो यह सवाल अपने साथ आप ले जाए आगे बढ़ सकते हैं। आधुनिकता की क्योंकि अब लेखिक वक्तव्य है तो अपनी तरफ

57:14 से और सामूहिक रूप से वो सारे सवाल मैं थोपना चाहती हूं अशोक जी पे कि वो एड्रेस करें। देखिए आज के समय में सरकार की आलोचना करने का सबसे बड़ा फायदा ये होता है कि आप ट्रॉल से डरना बंद कर देते हैं। मेरे कई सारे मित्र यहां पे हैं और मेरी बात से वो सहमत होंगे। तो आलोचना का मजा तब है जब किताब को पढ़ा जाए। किताब में गलत तथ्यों की बात की जाए। सवाल उठाया जाए। कोई खूंटा गाड़ दे कि नहीं भाई मैंने तो अशोक पांडे तुमने तो आज ब्लैक सूट पहना है और तुम मानो ना मानो तुम्हारा सूट ब्लैक ही है तो मुझे लगता है उसको इग्नोर कर देना ज्यादा अच्छा होता है। कई बार आपके दिमाग में इंपेशंस होते हैं। अगर इस किताब को ढंग से पढ़ा गया होता तो बताया होता उसने ध्यान में आया होता कि पहली पत्नी के मौत के बाद मैंने लिखा है कि इसने स्टालिन को हमेशा के लिए पत्थर बना

58:01 दिया। उसके जीवन में महिलाएं तो बहुत सारी आई लेकिन ऐसा प्रेम और ऐसी भावुकता दोबारा देखने को नहीं मिली। दूसरी बात ये कि जिस तरह की बातें इस किताब पे हो रही है। अच्छी बातें भी हो रही है जो दूसरी बातों की बात हो रही थी। मुझे लगता है कि मैं अगली किताब स्टोलिन पे ही लिख दूंगा। पूरे 250 300 पेज की एक अच्छी सी किताब लिख दूंगा तो सारी बातें निकल के आ जाएंगी। क्योंकि ये किताब मुझे स्टोलिन के बारे में नहीं लिखनी थी। ये बात मुझे ये किताब मुझे तानाशाह के बारे में लिखनी थी। अब चलिए कोई कितना भी महान हो। चलिए मोदी जी की सीधे बात कर लेते हैं। मान लेते हैं कि मोदी जी बहुत महान व्यक्ति हैं। मान लेते हैं जितने गुण उनके बताए जाते हैं 18 घंटे काम करते हैं। वेरी गुड। बहुत अच्छी बात है। बहुत सादगी पसंद है। इतने सादे हैं कि अपने सूट पे अपना ही नाम लिखवाते हैं। किसी और का नहीं लिखवाते। मान लेते हैं।

58:47 मान लेते हैं शाकाहारी हैं। बहुत अच्छी बात है। जितने अच्छे गुण उनके बताए जाते हैं सब मान लेते हैं। मुझे इससे क्या फर्क पड़ता है? भारत के नागरिक के रूप में अगर मैं ये देखता हूं कि मेरी अभिव्यक्ति की आजादी को दबाया जा रहा है। अगर मैं ये देखता हूं कि इस देश के सबसे शानदार एंकर्स टीवी चैनलों से सिर्फ इसलिए बाहर हैं क्योंकि वो सरकार के आलोचक हैं। अगर मैं देखता हूं कि जेएनयू के पढ़े हुए शानदार लड़के जिनको आज यूनिवर्सिटीज में प्रोफेसर होना चाहिए था। वो 5 साल से जेल के अंदर हैं तो आपके महान गुण और महान उद्देश्यों को लेकर मैं क्या करूंगा? वो मेरे काम के नहीं है। मेरे लिए एक ऐसा शासक बढ़िया है जो अच्छा खाता है, अच्छा पीता है। मुझे उससे कोई दिक्कत नहीं है। सारी प्रॉब्लम क्या है? वैसे तो WhatsApp यूनिवर्सिटीज अब इतनी ज्यादा फैल गई है कि

59:32 एक कहानी चली कि चर्ची लाए तो स्टॉलिन के घर गए और स्टॉलिन की पत्नी थी। उन्होंने बताया कि तीन कमरे के घर में हम रहते हैं और ऊपर वाला कमरा लेनिन का है इसलिए उसको उपयोग नहीं करते हैं। और स्टॉलिन की पत्नी खाना बना रही थी। घटना 1942 की है। स्टॉलिन की पत्नी 1930 के आसपास मर गई थी। तो आप समझ सकते हैं कि ये कितना बड़ा सच है। तो WhatsApp तो हर जगह आ गया। WhatsApp की बात 10 साल के अंदर चार की हत्या हो जाती है। चारों मार दिए जाते हैं। देशद्रोही बता के जिन लोगों ने रूसी क्रांति में अपनी जान लगाई थी वो 10 साल में देशद्रोही हो जाते हैं। सारे मार दिए जाते हैं। अन्ना आतमोवा जैसी पोएट उसको आधी वैश्या और आधी देवी कहा जाता है। कितने नाम गिनाऊं? अगर यहां गिनाना शुरू

1:00:18 कर दूंगा तो लोग परेशान हो जाएंगे। हमको मोदी से क्या प्रॉब्लम है? कोई प्रॉब्लम नहीं है। प्रॉब्लम बस इतनी है कि हमारे देश के अल्पसंख्यकों के साथ अन्याय हो रहा है। प्रॉब्लम बस इतनी है कि सरकार का विरोध करना देशद्रोह बना दिया गया है। और मजेदार बात ये है कि जिन लोगों को मोदी से शिकायत है उनको एकदम इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि स्टोलिन के समय में स्टोलिन के खिलाफ होना देशद्रोही होना था। जितने अखबार थे वह या तो पार्टी के थे या सरकार के थे। वैसे बहुत सीधी सी बात है। अपनी तानाशाही सबको अच्छी लगती है। उज्जवल दा ने एक बात कही कि राजाओं महाराजाओं के समय में तानाशाही नहीं थी क्योंकि तानाशाही का मुझे लगता है कंसेप्ट मॉडल है। वरना राजा महाराजा सारे तानाशाह महात्मा गांधी का एक

1:01:04 प्रसिद्ध कोट है जब वो हर सिंह के बारे में लिख रहे थे और वहां उन्होंने लिखा कि हिंदुस्तान का हर छोटा से छोटा राजा अपने आप में एक हिटलर है क्योंकि हिटलर के पास भी उतना अधिकार नहीं है जितना इन राजाओं के पास है ये किसी को भी मार सकते हैं इनके खिलाफ कोई केस नहीं चलेगा सर अभी बता रहे थे कि मिडिल ईस्ट चले जाइए मिडिल ईस्ट के जितने शाह शहंशाह और बाकी सब हैं सब तानाशाह है उनके खिलाफ कोई बोल के देख ले उनका क्या हाल होगा तो तानाशाही मुझे लगता है मेरे लिए बहुत सीधा सा मामला है अगर अगर लोकतंत्र नहीं है तो तानाशाह है। आपका उद्देश्य कितना भी महान हो लेकिन अगर आप अपना विरोध बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं। अगर अपने उद्देश्य को पाने के लिए 8 10 लाख लोगों को या तो आपको मार देना होता हो या गुलग में भेजना हो। अगर ऐसी सरकार है

1:01:50 जहां कोई किताब लिखी जाती है तो जब तक सरकार उसको पास नहीं करेगी तब तक किताब छपेगी नहीं। और लिख देने के लिए किसी को फांसी हो सकती है। किसी को उठाकर जेल में भेजा जा सकता है। तो ऐसे कोई महान चीज निर्मित ही नहीं हो सकती है। रहा सवाल फला ने ये कहा था फला ने ये कहा था। असल में हम जब बहुत डिटेल में नहीं देखते हैं तो दिक्कत होती है। जब हम थोड़ा विस्तार से देखते हैं तो समझ में आता है कि फला फला बहुत वजहों से कहते हैं। मोदी जी के बारे में कल किताब लिखी जाएगी तो उसमें मेलोनी जी क्या कहेंगी? बुरा कहेंगी। क्रम साहब क्या कहेंगे? बुरा कहेंगे। पुतिन साहब क्या कहेंगे? बुरा कहेंगे। मैं तो यहां तक कह रहा हूं कि शबाज शरीफ साहब से भी अगर कहा जाए कि मोदी जी के लिए किताब छप रही है।

1:02:36 दो पेज लिख के दे दीजिए। वो भी अच्छा ही कहेंगे। सत्ता में रहते हुए कौन किसके खिलाफ बुरा कह देता है। दूसरी बात सेकंड वर्ल्ड सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद का टाइम इस दुनिया में शीत युद्ध का टाइम था। कोल्ड वॉर का टाइम था। और कोल्ड वॉर में आप इस तरफ होते थे या उस तरफ होते थे? हम लोग 90 में युवा हो रहे थे तो थोड़ा सा कोल्ड वार की आईडिया है। 90 के बाद तो रशिया के टूटने के बाद तो कोल्ड वार धीरे-धीरे खत्म होता जाता है। एक ध्रुवीय विश्व बनता है। लेकिन उसके पहले थोड़ी सी कोल्ड वार की आईडिया है। तो या तो आप हिटलर की साइड में हो सकते थे या आप स्टॉलिन की साइड में हो सकते थे एक जमाने में और एक जमाने में या तो आप अमेरिका के साथ हो सकते थे या फिर आप रशिया के साथ हो सकते थे। वो आपके आपकी प्रॉब्लम थी कि दो ही ध्रुव थे। दो में से आपको चुनना था। जब मैं 20वीं सदी के तानाशाहों का इतिहास लिख

1:03:23 रहा था तो मुझे 20वीं सदी से कोई मतलब नहीं था। वो तो बीती हुई सदी है। मेरी चिंता तो मेरी अपनी 21वीं सदी थी जिसमें हम तो बूढ़े हो रहे हैं लेकिन हमारे बच्चों को जवान होना है। अपनी जिंदगी काटनी है और उनके बच्चों को भी इसी सदी में जवान होना है। 75 साल अभी बाकी है। तो मेरे लिए 20वीं सदी में क्या गड़बड़ियां हुई? जिसकी वजह से तानाशाहियां पैदा हुई। तानाशाही होती कैसी है? तानाशाही कहां जाकर खत्म होती है और तानाशाही किस तरह उसी उद्देश्य को नष्ट कर देती है जिसको पूरा करने की बात कर रही होती है ये समझाना जरूरी था इसलिए मैंने किताब लिखी है मुझे 20वीं सदी के तानाशाहों में तलाश सिर्फ ये करनी थी कि 21वीं सदी में क्या-क्या कॉमन है। कई सारे इंटरव्यूज हुए

1:04:09 हैं। उसमें मैंने ये बात कही है। एक आखरी बात और करके मैं खत्म करता हूं। पता नहीं यह कस्सा लोग क्यों नहीं याद करते हैं और कैसे भूल जाते हैं। देखिए तानाशाहों की दोस्तियां जो होती है ना विचारधारा वगैरह सड़क पर नारा लगाने वालों के लिए होती है। मैंने 30 साल लाल सलाम के नारे लगाए हैं और आज भी मैं मार्क्स की बेहद-बह इज्जत करता हूं। मैंने मार्क्स की जीवनी लिखी है। मार्क्सवाद पर किताब लिखी है। और गिरी सही कह रहा था। हमारी बहस होती थी तो मैं स्टॉलिन को पागलों की तरह सपोर्ट किया करता था। तो मैं अच्छी तरह से जानता हूं कि मार्क्सवाद हो चाहे बाकी नारे हो राष्ट्रवाद का भी नारा हो ये सब नारे जो होते हैं वो सड़क पर लगाने वालों के लिए होते हैं। बाकी तो सत्ता के हिसाब से नारे चुन लेते हैं। कांग्रेस की सत्ता थी तो कांग्रेस के नारे लगा रहे थे। ये सत्ता आई

1:04:55 इसके नारे लगाएंगे। कल किसी और की आएगी तो दूसरे के नारे लगाएंगे। सेकंड वर्ल्ड वार जब शुरू हुआ था। एक सवाल पर मैं छोड़ के जा रहा हूं। सर को क्लास में बोलना है। सबसे बड़ी बात की जाती है कि फासीवाद के खतरे से दुनिया को बचा लिया। फासीवाद का खतरा तो उसी दिन शुरू हो गया था जिस दिन हिटलर अपने अगल-बगल के छोटे मुल्कों को लगातार कब्जा करते जा रहा था। लेकिन उस समय उन मुल्कों के साथ खड़े होने की जगह स्टोलिन ने हिटलर के साथ समझौता किया था। मोलोटो रिवन ट्रॉप समझौता हुआ था। और वो समझौता सिर्फ इतना नहीं था कि आप हम पर हमला नहीं करेंगे। हम आप पर हमला नहीं करेंगे। समझौता ये था कि यूरोप के अंदरूनी इलाके में हिटलर कब्जा करता जाएगा। स्टॉलिन कोई विरोध नहीं करेगा और बाल्टिक इलाकों में स्टॉलिन कब्जा करता जाएगा। हिटलर कोई विरोध नहीं करेगा। समझौता ये था

1:05:42 कि हिटलर चावल, गेहूं जो होता है रशिया में वो लगातार सप्लाई करेगा और कच्चा लोहा सप्लाई करेगा और स्टोलिन करेगा और हिटलर बदले में बने हुए जहाज और बने हुए कुछ हथियार सप्लाई करेगा और उस समझौते के बाद एस्टोनिया पे कब्जा हो गया। अभी मैं एस्टोनिया गया था। खासतौर पे वो जगह देखने मैं गया था तालिब में। केजीबी का एक इंटेरोगेशन सेंटर है जहां पर लोगों से पूछताछ की जाती थी। वहां जहां कायदे तन्हाई जिसको कहते हैं वो जो जगह थी मैं वहां पर खड़ा था और ऐसा कुछ हुआ कि उस समय मेरे अलावा कोई नहीं था। तकरीबन 10 मिनट मैं वहां पर खड़ा रहा। और मैंने ये तसवुर किया ये सोचा कि अगर इस जेल के अंदर एक तिकोना सा एरिया था जिसमें बताते हैं एक

1:06:27 बाल्टी रख दी जाती थी जो आपके निपटने के लिए होती थी पानी दिन में एक बार आपको मिलता था खाना दिन में एक बार मिलता था और लोग महीनों महीनों रहे मैंने तसवुर किया कि अगर मुझे कुछ घंटों इसमें रहना पड़े 24 घंटे रहना पड़े तो मेरी हालत क्या होगी मुझे लगा मैं पागल हो जाऊंगा इतनी क्रूरताओं के साथ अगर कोई महानता मिलती है तो मनुष्यता को ऐसी ऐसी महानता नहीं चाहिए। मनुष्यता को आजादी चाहिए, लोकतंत्र चाहिए, अपने बोलने का हक चाहिए, शांति चाहिए। आपकी आपके महान उद्देश्य के लिए जनता अपनी कुर्बानियां, अपनी जान और अपनी आजादी गवाने के लिए तैयार नहीं है। वरना आराम से कहा जा सकता है कि मोदी जी का भी उद्देश्य बहुत महान है। वो भी हिंदू राष्ट्र बना रहे हैं। वो एक महान उद्देश्य है। लेकिन ना तो हम उनके उद्देश्य से सहमत

1:07:15 है ना उसके लिए कुर्बानियां देने को तैयार हैं। जनता से पूछ के वो तय नहीं किया गया है। और हिटलर और स्टॉलिन का समझौता टूटा कैसे? जब हिटलर ने धोखा दे दिया और हमला किया। उसके बाद स्टॉलिन का समझौता टूटा। किसी फासीवाद को बचाने के लिए स्टॉलिन ने कोई समझौता नहीं तोड़ा। किसी फासीवाद से दुनिया को बचाने के लिए अपनी तरफ से कोई लड़ाई नहीं लड़ी। जब दुश्मन आपके घर में घुस गया तब तो आपकी मजबूरी थी कि आप लड़ाई लड़ते। उसको महानता की तरह पेश किए जाने से मैं बिल्कुल इंकार करता हूं। और एक एक सेकंड की और बात बस कि दादा ने कहा कि उन मूर्खों के साथ एक ही बास्केट में क्यों रख दिया। मुझे लगा कि मूर्ख तो सारे थे। आप महानता के उद्देश्य छोड़ दीजिए अगर तो

1:08:01 तरीके सबके एक ही थे। एक बार अमेरिका में निकन बहुत ज्यादा परेशान था तो ईदी अमीन ने उसको चिट्ठी लिखा कि जब सरकार ना संभल रही हो और विरोधी बहुत परेशान कर रहे हो तो विरोधियों को मरवा देना चाहिए। हिटलर और स्टॉलिन इससे अलग क्या कर रहे थे? शुक्रिया। नहीं दृष्टिकोण जुले हम लोग एम्फसाइज्ड लोग हैं। हमने राहुल सांकत्या को पढ़ा जो जिन्होंने कहा कि स्टालिन मानवता का त्राता है। तमाम सारे लोगों को पढ़े तो एफसाइज्ड है सर इसीलिए बार-बार जिक्र कर रहे थे। सुबह एक किताब नहीं लिख पाए थे राहुल सांकर रशिया में डाक से अगर भेजेंगे तो रास्ते में खत्म होगा। आपने इसलिए एड्रेस किया है सर। वही मैं कहने जा रही थी कि अच्छा है कि इसमें वो

1:08:47 दृष्टिकोण जुड़ा है क्योंकि हम लोग अभी तक जो अध्ययन कर रहे थे वो दृष्टिकोण जुड़ा नहीं था तो एम्फसाइज थे तो दिमाग वो वो जो जाले हैं वो कुछ ना कुछ तो काम करेंगे अपना तो वैसली का है उसमें तो अगर योकफ का नहीं है जब हिटलर उसको इंप्रेजेंट कर रहा है कैप्टिवेशन में रखा हुआ है और उसके बदले कह रहा है कि तुम समझौता कर लो और स्टालिन समझौता नहीं करते तो वो तो हम हीरोइज़्म की तरह देख रहे थे कि स्वेथलाना को उन्होंने एक अच्छा फ्लैट नहीं देने दिया अपने पर्सनल असिस्टेंट द्वारा और याकूब को छुड़ाया नहीं कैप्टिवेशन से इसलिए कि कोई बात नहीं जो होगा इतनी परिवार मर चुके हैं तो मेरा परिवार भी मर जाए इस आंदोलन में तो एक हेरोइज़्म की तरह हम लोग देख रहे थे तो अच्छी बात है की वहां हम रुक रहे हैं और सोचने पर समझने पर

1:09:33 तार्किकता रैशनलिटी डेवलप करने पर इस किताब से मजबूर हुए है दैट इज व्हाट आई जस्ट वांटेड टू से अब मैं आज अध्यक्ष अध्यक्षीय उद्बोधन के है जिनको हम लोग लगातार पढ़ते आए हैं राष्ट्रवाद पर इससे बेहतर किताब मैंने नहीं पढ़ा था और इस तरह से पुनर्पाठ मैंने राष्ट्रवाद का नहीं किया था जिस तरह से हमने इरफान साहब के किताब से सीखा और मुझे लगता है कि एक सार के तौर पर सार्थकत्व के तौर पर आज उनका जो अध्यक्ष उद्बोधन होगा हम सबको समृद्ध करेगा इरफान सर ये आखिर में जब बोलना हो तो लगता है कुछ बस

1:10:20 नहीं क्योंकि जो कुछ सोच के आया वो बहुत खूबसूरती से लोगों ने बयान कर दिया तो उसको दोहराने का कोई मतलब नहीं और पहले तो मैं अशोक पांडे को जो मैं पिछले कुछ वर्षों से जानता हूं और ये महसूस हमेशा महसूस किया के एक एकेडमिक ना होते हुए भी किसी यूनिवर्सिटी से ना जुड़े हुए होते हुए भी जो ये क्लेम करते हैं मैं तो पढ़ा लिखा हूं ही नहीं तो मुझे नहीं लगता है कि बहुत से पढ़े लिखे लोगों ने वो काम नहीं किया और नहीं कर रहे हैं जो अशोक पांडे ने आज तक पिछले कुछ सालों में कर दिया उन विषयों

1:11:07 को लिखा जिन विषयों के बारे में लोग एक शब्द बोलने को तैयार नहीं होते। इतने डरा हुआ महसूस करते हैं क्योंकि मैं क्योंकि इतिहास का छात्र होने के नाते कोशिश करता हूं कि पब्लिक डोमेन में कुछ बोलता रहूं और कभी-कभी ऐसा होता है कि मैं किसी विषय पर नहीं बोलना चाहता और किसी और एकेडमिक का हिस्टोरियन का नाम दे दिया कि साहब उनसे बात कर लीजिए तो 90% लोग इंकार कर देते हैं और ये इतिहास क्योंकि आज के जमाने में आज उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना ना भविष्य महत्वपूर्ण है। आज जो है वो सिर्फ आज महत्वपूर्ण है और इतिहास को भी आज को सुधारने के लिए ही इस्तेमाल हो

1:11:52 रहा है। उसमें इतिहास को चाहे डिस्टोर्ट करना पड़े चाहे फैक्ट्स घने पड़े और अक्सर जब बात होती है तो मैं यही कहता हूं कि भाई जिसने ये फैक्ट जिसकी बात आप कर रहे हो जिसने ये फैक्ट घड़ा है वो 2000 लोगों में वायरल किया है तो आप उसी से पूछो क्योंकि फैक्ट भी उसका है और इतिहास भी उसका है क्यों हम जैसे लोग जो फैक्ट्स पर बात करते हैं उनके नजदीक तो ये फैक्ट है ही नहीं तो ये जो आज का माहौल है उसमें अशोक पांडे जैसे लोगों का रोल बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि लोगों की लोगों की भाषा में ये सब जो अशोक ने लिखा है ये एक जगह तो नहीं मिलेगा लेकिन बिखरी हुई का इतिहास अलग-अलग किताबों में अंग्रेजी में आपको

1:12:39 मिल जाएगा सोच इनकी जो है वो ना मिले ये तो इनकी अपनी सोच है जिस तरह से पढ़ा है उन सब लोगों को लेकिन उन पर आपको पढ़ने को मिल सकता है लेकिन एक जगह संग्रह हिंदी में आपको मिल जाए और आप ब्रीफ में आप समझ ले कि ये लोग क्या थे। खासतौर से मैंने दो ही लोगों के बारे में मैं सोचा था कि कुछ कहूंगा उनके बारे में भी आपने सुन लिया। अब वही दो लोग हमारे लिए महत्वपूर्ण भी है। हमारे आज के लिए खासतौर से हमारे आज के इतिहास के लिए भी और आज के राजनीति के लिए भी आज के जनजीवन के लिए भी। आपसी भाईचेरे के लिए भी हर तरह से और वो दो लोग हैं आप सब लोग जानते हैं बसोनी और हिटलर किनोश किमिलसंग

1:13:28 इमीन से हमारा डायरेक्ट संबंध नहीं है वो तानाशाह है और स्टालियन स्टालिन भी है संबंध हमारा स्टैलियन से भी है लेकिन उस लेवल का नहीं है आज खासतौर से क्योंकि दुख की बात ये है कि हमारा जो लेफ्ट विंग है वो ऑलमोस्ट खत्म है और उसको खत्म करने के लिए भी मैं तो समझता यही हूं के हमारे जो स्टेनवादी लेफ्ट विंग के लोग थे। उन्होंने अपने ही विचारधारा को अपने ही पार्टी को खत्म किया। ओवर द इयर्स अचानक से कोई कोई चीज नहीं होती। और जब ये एक प्रोग्राम अनाउंस किया अशोक ने और सोशल मीडिया पे आया और मेरा नाम मालों ने देखा तो कई फोन मेरे पास हमारे हमारे जो कॉमरेट है पुराने उन्होंने मुझसे कहा कि यार एक ने तो ये भी

1:14:15 कह दिया यार तुम ना जाओ। मैंने कहा यार बड़ा अच्छा मशवरा दे क्यों ना जाऊं। यार स्टेलियन को हिटलर के साथ लगा दिया। कहने यार ये नहीं देखते हो कि स्टैलिन ने तुम्हारी पार्टी का सत्यानाश कर दिया। वो तो देखो आज आप गायब हो गए इसलिए गायब हो गए क्योंकि आपने इस टैलेंट की जो राजनीति की टैलेंट मैं नाम नहीं लेना चाहता हूं उन लोगों के और हम सब लोग जानते हैं उस तरह की जिस तरह से पार्टी को चलाया वो एक तानाशाही थी उससे अलग नहीं था और यहां की पार्टी में भी जो लोग पार्टी को चला रहे थे वो भी एक तानाशाह के रूप में ही चलाते थे तो उसका वहां होना मुझे नहीं लगता है कि कोई गलत चीज है होना चाहिए वैचारिक तानाशा शाही हो ये धर्म और राष्ट्रीयता की तानाशाही थी लेकिन है तानाशाही आज हमारे

1:15:04 देश में दो लोग की बात मैं इसलिए कहना चाहता था क्योंकि ये दो लोग जिंदा है अपने देशों में खत्म हो गए हुए हमारे यहां जिंदा है क्योंकि हम तो वही करना चाह रहे हैं ना जो वो जो वो पीछे भी सब छोड़ के गए हम तो यहां से चल के गए थे उनके पास क्योंकि मसोलिनी तो हिटलर का भी का भी हीरो था क्योंकि वो सीनियर था तानाशाही में क्योंकि हिटलर तो बाद में आया तो हिटलर खुद चाहता था कि वो मसूलिनी जैसा बने और कोशिश भी करता था कि उसके फोटो अपने यहां इस्तेमाल करे क्या-क्या बहुत सारा है कुछ अशोक ने इसमें लिखा भी है। तो एक मॉडल रोल मॉडल जो है हिटलर के

1:15:50 लिए मसोलनी है। तो ये एक दूसरे के साथ यह रिश्ता इन इन लोगों का था और हमारा रिश्ता इन दोनों के साथ बड़ा घनिष्ठ रहा हमारे कुछ लोगों का। उस वक्त घनिष्ठ था जब ये लोग एक किनारे थे तब तो हमें कोई परवाह नहीं थी। 1925 से लेके और आज 2025 100 साल मनाए जा रहे हैं। और उस वक्त किनारे जब थे जब तक हम समझते थे कि भाई खतरा दूर है। ठीक है। पागल लोग हैं। हिटलर को भी सेलिब्रेट करते हैं। फांसीवाद की भी की भी बड़ी तारीफ करते हैं। लेकिन आज आप देखिए हमारे एक इटालियन स्कॉलर थे। नाम मैं भूल गया। उसने एक बड़ा अच्छा सा काम किया था। हिंदू महासभा और

1:16:38 मसलोनी के रिश्तों पर ईपीडब्ल्यू में एक बड़ा अच्छा लेख भी लिखा था और उसमें कोशिश किया था ये दिखाने की कि भाई हमारे देश के अब मैं ये एक इंस्टेंस जो बच गया लोगों ने नहीं बताया वो मैं बताना चाहता हूं के मुंजे साहब जो डॉक्टर थे डॉक्टर इसलिए कह रहा हूं पढ़े लिखे थे वो कोई ऐसे ऐसे नहीं थे आज के जो दसवीं पास नहीं कर पाए लोग उस कैटे कैटेगरी में नहीं है। वो डॉक्टर है प्रोफेशनल है। वो वो गए इटली मसोलिनी से मिले मार्च 1931 में और मिलने के बाद जो जो उन्होंने देखा कहा जिसज चीज की तारीफ की वो सब आपने अभी सुना के ओपनली कहा कि एक शिक्षा जरूरी नहीं है।

1:17:25 विचारधारा जरूरी है। और वही चीज हमारे शिशु मंदिर जो पिछले सालों से चल रहे हैं उनमें यही हो रहा है। उसमें क्या इतिहास पढ़ाया जाता है वह आपको तो वो किताबें भी नहीं मिलती आपको देखने को। पब्लिक डोमेन में कहीं नहीं मिलेगी। बड़ी मेहनत करना पड़ता है उन किताबों को इतिहास की खास तौर से अगर कहीं ढूंढने से मिल जाए। और उन इतिहास की किताबों में सिर्फ सिर्फ विचार है। वैचारिक सोच आईडियोलॉजी। इतिहास को कैसे पढ़ा जाए? और मैं ये नहीं कह रहा हूं कि लेफ्ट के लोग या लिबरल लोग वैचारिक सोच इस्तेमाल नहीं करते। इतिहास कभी ऑब्जेक्टिव नहीं होता। मैंने कभी यह नहीं माना और मैं हमेशा उसके खिलाफ हूं और नोमिला थापर भी लिख चुकी है इस बारे में के इतिहास ऑब्जेक्टिव हो ही नहीं सकता है

1:18:10 क्योंकि इतिहास को लिखने वाले का जो अपनी सोच है अपना विचार है अपना व्यक्तित्व है वो उसमें जरूर झलकता है बात ये है कि आप जो लिख रहे हो वो फैक्ट्स पर बेस्ड हो लड़ाई वहां है प्रोफेसर इरफान अभी मेरे बुजुर्ग हम नाम वो हम हमेशा ये कहते के राइट विंग हिस्टोरियंस से मुझे प्रॉब्लम नहीं है। आरसी मजूमदार जैसे लोग, जनाथ सरकार जैसे लोग क्योंकि वो लोग उनकी राइटिंग्स में रिगर था। उनकी राइटिंग्स में रिगर था। वो फैक्ट्स पर आधारित बात मैं उनसे डिसए्री करता हूं। करता रहूंगा लेकिन उनको उनका सम्मान करता हूं। आज जो इतिहास पढ़ाया जा रहा है जो लिखा जा रहा है जो आरएसएस लिखता रहा है

1:18:56 ओवर द इयर्स वो फैक्ट से कहीं दूरदूर तक उसका नाता नहीं है तकलीफ वहां है और हम जैसे लोग जो जो भी कुछ आज बोलते हैं लिखते हैं वो उसमें यही परेशानी है कि आप फैक्ट्स से जुड़े रहें इतिहास आप अपनी सोच से लिखें लोग पढ़ेंगे आप अगर सही लगेगा एक्सेप्ट करेंगे नहीं लगेगा तो उस पर कमेंट कमेंट होंगे क्रिटिकल या जैसे भी होंगे तो उस उस हमारे देश में आज इन दो लोगों का सम्मान है। मैं 1931 का जिक्र कर रहा था जब मुंजे साहब गए और मुलाकात हुई और ये सब तारीफ हुई। वहां के सब इंस्टिट्यूशन की तारीफ हुई। उनके जो मुसोलिनी का जो कुछ काम था उसी साल दिसंबर

1:19:44 1931 में गांधी जाते हैं। और गांधी रोमा रोला जैसे लोगों की की अवेलना कर देते हैं। उनको कहते हैं कि भाई ना जाओ लेकिन वो गए। टैगोर भी गए थे। बावजूद इसके कि लोगों ने कहा था टैगोर से भी कि ना जाइए लेकिन वो गए। आने के बाद जुम अखबारों में खबरें छपी वो सब झूठे इंटरव्यू थे गांधी के जो गांधी ने कहा भी नहीं और जो वो बड़े बड़ा अपनापन लगता है हमें उन सब चीजों में कि किस तरह से कड़ के कहानियां छाप दी अखबारों में और उन अखबार वालों को हम जो नाम देते हैं वो आप सब जानते ही हैं। तो उसी तरह अखबार वाले थे जिन्होंने बिना फैक्ट को ध्यान में रखे हुए अपनी तरफ से ही सोच के वो कहलवा दिया गांधी से जो मसूरी नहीं चाहता था और वो छुप गया। और

1:20:30 नेहरू ने उस पर कहा कि भाई यह तो गांधी की जबानी नहीं है नई गांधी की सोच है। गांधी को मसोनी से नहीं मिलना चाहिए तो वो अपनी जगह है। लेकिन मिलने के बाद गांधी ने ये सब नहीं कहा। ये सब मसोलिनी ने चाहा कि वो गांधी से कहलवाए और वो प्रेस ने ये कहलवा दिया। तो ये एक दूसरी चीज जो बड़ी इंटरेस्टिंग है क्योंकि मुझे पहले मिल चुके थे तो मसोलिनी एक सवाल पूछते हैं। मैं इसलिए मुझे डाउट हो रहा है कि मसोलिनी के दिमाग में ये सवाल अपने आप से नहीं आया होगा। वो पूछते हैं कि आप आपके देश में जो हिंदू मुस्लिम झगड़ा है इसको आप कैसे सुलझाएंगे? आपको उम्मीद है कि आप एक कर लेंगे सबको।

1:21:18 तो यह सवाल आना मसूलिनी के दिमाग में ये साफ जाहिर करता है कि मसूलिनी का की बातचीत मुझे से क्या हुई होगी? वो ऐसा सवाल नहीं है कि मसूलिनी के दिमाग में खुद आ गया। दैट वाज़ अ प्लांटेड क्वेश्चन व्हिच वाज़ प्लांटेड बाय समबडी हु वेंट फ्यू मंथ्स बिफोर गांधी। तो गांधी ने उसका जवाब ये दिया कि बिल्कुल नहीं अब तो लड़ी रहे हिंदू मुस्लिम एकता के लिए और हमारी लड़ाई उसी के लिए है और हमारा एक प्लेटफार्म है और हम सब एक साथ हैं हम सब भारतीय हैं। ये सब जवाब जवाब उन्होंने दिए। तो ये एक कोशिश हमारे जो अतिवादी लोग हैं आज हिंदू धर्म विवाद जो करते हैं। ये इतनी पुरानी कोशिश इन लोगों की चली है कि मसोलि

1:22:03 मसोलिनी तक ले गए इस हिंदू मुस्लिम के इशू को। तो आज जो हम भुगत रहे हैं देश में ये तो ये तो बहुत ही ऑब्वियस है ये तो हो ही सकता है जब इटली में जाके इस बात की बात जिक्र हो सकता है तो आज हमारे समाज में बांटने की बात होती है तो वो मुझे नहीं लगता कोई नई बात है पुराना एजेंडा है और उस एजेंडे को लागू करने का मौका खुशी की बात है कि कम से कम हम जैसे लोगों की और मेरी उम्र के जो लोग बैठे हैं हमने एक अच्छा हिंदुस्तान देखा नौजवान लोगों की का दुर्भाग्य है कि आशा यह है कि उनका भी पीछा छूट जाए जल्दी लेकिन दुर्भाग्य कहूंगा कि उनको एक ऐसा हिंदुस्तान में रहने की का मौका मिलेगा जो

1:22:51 वाकई बहुत अच्छा नहीं है जहां धर्म के नाम पर जाति के नाम पर और पता नहीं किन-किन डिवाइसिव जो चीजें या मुद्दे हैं उनका इस्तेमाल होता है। यह पूरा जो एजेंडा है जो आज हम देख रहे हैं यह मसोलिनी और हिटलर का इतना इतना मतलब यह अशोक की किताब पढ़ने के बाद क्योंकि ये ऐसा है परसों अब तो हम तो भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन पर काम कर रहा हूं। बहुत साल से जब पढ़ाते थे तो जब यूरोपियन हिस्ट्री पढ़ाया करते थे तो उस वक्त हिटलर मसूलिनी का पढ़ा और बीच में कहीं इधर-उधर जरूरत पड़ गई तो पढ़ लिया। अब ये बहुत दिनों बाद मैंने किताब उठा के पढ़ी तो ये फिर याद आया सब कि ये धर्म का नाम रेस का नाम और राष्ट्रवाद ये तीन चीज इतनी कोर है

1:23:38 उनका पूरी आईडियोलॉजी का दोनों की उसका इस्तेमाल आज हम अपने आज जिस तरह से देखते हैं वो पूरी ट्रेनिंग है पूरी ट्रेनिंग है जो इन्होंने वहां से ली और पढ़ने के बाद लगता ही नहीं कि ये हम जर्मनी की या इटली की इतिहास पढ़ रहे हैं या अपने देश के आज के हालात को पढ़ रहे हैं। तो ये ये सब चीजें इस किताब से मुझे लगता है कि ये बहुत ही महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि आज के केस हिंदुस्तान में नौजवानों को खासतौर से जो बुजुर्ग लोग हैं वो उनका परिपक्व है। उन पर असर कम होने वाला है। लेकिन जो नौजवान लोग हैं उनको कम से कम इस तरह की किताबों को पढ़ना चाहिए और कोशिश यही करनी चाहिए कि कम से कम वो चीजें सीखें।

1:24:23 जो उनको सीखनी चाहिए वो ना सीखें जो उनको सिखाए जाने की कोशिश हो रही है तो ये एक एक बड़ा महत्वपूर्ण उद्देश्य है और मैं नहीं समझता हूं कि अशोक ने जो ये अपना चैनल भी शुरू किया है अब तो खैर कई कई काफी साल हो गए उसका रोल भी एक बड़ा महत्वपूर्ण रोल है और जो इतिहासकार नहीं कर पाए बहुत कम लोग कर कर पाते हैं क्योंकि सब लोगों में ना उतनी भाषा परिपक्वता होती है लोगों की भाषा को बोलना और ना इतना कमिटमेंट होता है उस कमिटमेंट के साथ वो उसको चलाएं बनाए रखें तो ये एक शुभकामनाएं उसके लिए और आगे भी जो लिखते

1:25:10 रहेंगे वो हम जाहिर है कि इंतजार करते रहेंगे पढ़ेंगे धन्यवाद सॉरी अध्यक्ष के बाद बोलना अपराध होता ये अपराध मैं सिर्फ इसलिए कर रहा हूं कि शुक्रिया कहना रह गया था। यहां जो लोग हैं बहुत कम लोग जानते हैं। मेरे दो दोस्त हैं जो 30 साल बाद मुझसे मिले हैं। देवेश बैठा हुआ है सामने। नबीला पीछे बैठी है। हम लोग एमएम में साथ थे। 30 साल बाद मिले हैं। और भी बहुत सारे ऐसे लोग हैं जिनसे फोन पे बात लगातार होती रही लेकिन मुलाकात आज जाके हुई है। मैं आप सबका शुक्रिया कहना चाहता था। थोड़ा जोश में आ गया तो दूसरी बातें हो गई और दूसरा अशोक जी यहां बैठे हुए हैं। मैं बिना किसी शर्त के ये बात कहना चाहूंगा कि आज के समय में एक प्रकाशन हमारे पास है जो वो सब कुछ छापता है जो हम

1:25:56 लिखते हैं। मैं जानता हूं कि मेरे लिखने से उनको भी कई बार असुविधा हुई है। लेकिन इन असुविधाओं का कभी उन्होंने जिक्र नहीं आने दिया है। दूसरे और तीसरे से मुझे पता चला है और हमेशा एक फादर फिगर की तरह एक बड़े भाई की तरह हमारे साथ खड़े रहे हैं। तो अशोक जी आपका बहुत-बहुत शुक्रिया। एंड लास्ट बट नॉट द लीस्ट बल्कि सबसे ऊपर मेरी मां यहां पे है। पहली बार मेरी किसी किताब के प्रोग्राम में है। उनको प्रणाम। शुक्रिया। अब मैं धन्यवाद ज्ञापन के लिए राज कमल प्रकाशन समूह की ओर से धर्मेंद्र शशांत जी को आमंत्रित करना चाहूंगी। चाहूंगी कि आप आए और जो हमारे अतिथियों के

1:26:41 लिए सब है वो भी दे और अपना धन्यवाद यापुत्र भी करें। जी इसके बाद हम समाप्त करेंगे इस चर्चा को। आदरणीय मंच इरफान साहब पाठक जी और उज्जवल दास अशोक कुमार पांडे जी और आप तमाम आज के आयोजन में शरीक हुए सज्जनों दोस्तों आप सबका बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने आज की बातचीत के लिए इस चर्चा के लिए समय निकाला और हमारा उत्साह बढ़ाया जैसा कि अशोक जी ने कहा राजकमल प्रकाशन

1:27:29 समूह के अध्यक्ष अशोक जी के लिए चारों तरफ खतरे हैं। सच कहने के भी खतरे हैं, नहीं कहने के भी खतरे हैं। तो जब आप सब आते हैं तो एक प्रकाशक के रूप में हमारा भी उत्साह बढ़ता है कि हम आप लोगों के साथ खड़े रहे। सच्चाई सामने आए जो चाहिए इस दुनिया को बेहतर करने के लिए, इस समाज को बेहतर करने के लिए वैसी किताबें हम आप तक ले आए। वैसे लेखकों के साथ हम खड़े रहे। एक बार फिर आप सबका बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं सुरेश जी से अनुरोध करूंगा कि आज हमारे

1:28:44 जी बहुत सार्थक परिचर्चा रही एक बार पुनः अशोक जी को बहुत-बहुत बधाई। आप सभी लोगों का बहुत-बहुत शुक्रिया। बहुत-बहुत आभार।

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