“AMBANI vs ADANI: India's BIGGEST Energy WAR Begins!! | BUSINESS CASE STUDY”的完整文字稿。点击时间戳即可从该位置打开视频。想要其他视频的字幕?试试 YouTube 字幕提取工具。
0:01 इन कच्छ गुजरात अडानी ग्रीन वी आर डेवलपिंग वर्ल्ड्स लार्जेस्ट 55000 एकर्स राइट हियर इन इंडिया एंड विज़िबल इवन फ्रॉम स्पेस दोस्तों मुकेश अंबानी और गौतम अडानी के बीच एक जबरदस्त रेस शुरू हो चुकी है। गुजरात के रेगिस्तान में कुछ दिलचस्प हो रहा है। adानी ग्रीन इज बिल्डिंग वर्ल्ड्स लार्जेस्ट रिजनबल एनर्जी पार्क राइट हियर इन इंडिया। इस रेस की शुरुआत adानी ग्रुप ने की लेकिन अब अंबानी भी पूरी ताकत के साथ मैदान में उतर चुके हैं। वी आर डेवलपिंग वन ऑफ द वर्ल्ड्स लार्जेस्ट सोलर प्रोजेक्ट्स। अंबानी ग्रुप की जो 5 लाख एकड़ की जमीन की एक्विजिशन है। माना जा रहा है कि वो सिंगापुर से करीब पांच गुना बड़ी वो जगह है।
0:49 इंटरेस्टिंग बात यह है कि अब तक यह दोनों एक दूसरे के बिजनेस से हमेशा दूर ही रहे थे। एक तरफ अडानी अपना एंपायर इंफ्रास्ट्रक्चर पावर सेक्टर्स में बढ़ा रहे थे और दूसरी तरफ अंबानी टेलीकॉम पेट्रोकेमिकल्स और रिटेल में बिजी थे। लेकिन अब रिन्युएबल एनर्जी के मैदान में दोनों का सीधा टकराव शुरू हो चुका है। और ये कहानी शुरू होती है गुजरात के कच्छ से। स्वागत है आप सब लोगों का इंडिया के सबसे बड़े डिस्ट्रिक्ट में। पूरी तरह नमक की चादर से ढका यह डेजर्ट प्लेनेट अर्थ के सबसे बड़े सॉल्ट डेजर्ट्स में से एक है। साथियों, हमारा कच्छ हरित ऊर्जा का दुनिया
1:36 का सबसे बड़ा केंद्र बन रहा है। ये दोनों बिजनेस टकस मिलकर कच्छ में लगभग 10 लाख एकड़ की जमीन डेवलप करने जा रहे हैं। जी हां, 10 लाख एकड़ की जमीन यानी सिंगापुर से भी पांच गुना बड़ा लैंड पार्सल डेवलप होने जा रहा है। इसमें मुकेश अंबानी ने 5.5 लाख एकड़ और अडानी ने 4.6 लाख एकड़स डेवलप करने का प्रोजेक्ट उठाया है। लेकिन सवाल यह है कच्छ ही क्यों? आखिर कच्छ जैसे एक साल्ट डेजर्ट में ऐसा क्या छुपा है कि भारत के दो सबसे बड़े बिलेनियर्स इस बंजर जमीन में इंटरेस्टेड हैं? 10 लाख एकड़ में आखिर ऐसा क्या होने वाला है और कच्छ के इस डेवलपमेंट से भारत
2:22 का क्या फायदा होगा जानेंगे इस एपिसोड में। दोस्तों ये चैनल Zerodha और थिंग्स स्कूल का एक जॉइंट इनिशिएटिव है जिसके माध्यम से हम भारत को वर्ल्ड क्लास बिज़नेस एजुकेशन देना चाहते हैं। तो अगर आप भी बिज़नेस सीखना चाहते हो तो प्लीज हमारे चैनल को सब्सक्राइब करो। आपके लिए तो यह लाइक और सब्सक्राइब फ्री है लेकिन हमारे लिए यह बहुत बहुत जरूरी है। दोस्तों, कच्छ में तीन चीजें हैं जो उसको आज की डेट में एक गोल्ड माइन बनाती है। पहला एडवांटेज है टॉरिड ज़ोन का। दोस्तों,
3:09 टॉरिडो जोन ट्रॉपिक ऑफ कैंसर और ट्रॉपिक ऑफ कैप्रीिकॉर्न के बीच के एरिया को माना जाता है। यह वही हिस्सा है जहां सबसे ज्यादा सनलाइट रिसीव होती है। यही रीजन हैवी रेनफॉल, डेंस फॉरेस्ट और मनसून क्लाइमेट्स के लिए जाना जाता है। और इंडिया ब्राजील इंडोनेशिया नाइजीरिया जैसे देश इसी टॉरिड ज़ोन में पड़ते हैं। और कच्छ इंडिया के भी सबसे सनी रीजंस में से एक है। तो इस ज़ोन में अगर आप सोलर पैनल सेटअप करते हो तो टेंपरेट ज़ों्स के कंपैरिजन में टॉरेट ज़ोन से आपको 50 टू 60% ज्यादा एनर्जी मिलेगी। इनफैक्ट कच्छ में इतनी पावरफुल सनलाइट है कि एक स्क्वायर किलोमीटर एरिया में सोलर पैनल्स लगाकर आप 150 मेगावाट पावर जनरेट कर सकते हो। इसका दूसरा एडवांटेज है विंड स्पीड। अगर आप इस चार्ट को देखो तो इसमें विंड एनर्जी के
3:55 प्रोडक्शन के लिए विंड स्पीड को रेट किया गया है। इसमें कहा जाता है कि अगर विंड की स्पीड 6 मीटर्स पर सेकंड हो तो अच्छा है। 7 मीटर्स पर सेकंड हो तो बहुत अच्छा है और अगर 8 मीटर्स पर सेकंड हो तो इंडस्ट्री स्टैंडर्ड्स में एक्सीलेंट माना जाता है। और कच्छ की विंड स्पीड 8 मीटर्स पर सेकंड है। जिसकी वजह से कच्छ में विंड एनर्जी का भी बहुत बड़ा स्कोप है। और इंटरेस्टिंग बात यह है कि जब दिन में सोलर एनर्जी प्रोडक्शन मैक्सिमम होती है तब विंड स्पीड कम होती है। और रात को जब सोलर एनर्जी ज़ीरो होती है तब कच्छ में विंड की स्पीड सबसे ज्यादा होती है। तो अगर आप यहां सोलर और विंड एनर्जी प्लांट लगा दो तो आपको 24 से इलेक्ट्रिसिटी प्रोड्यूस करने का मौका मिलेगा। कच्छ का तीसरा एडवांटेज है लैंड अवेलेबिलिटी। दोस्तों आज भारत की जितने भी मेगा प्रोजेक्ट्स हैं उनमें डिले का एक
4:41 बहुत बड़ा रीजन होता है लैंड एक्वज़िशन। क्योंकि सरकार को अगर कहीं भी हाईवे, एयरपोर्ट या कोई भी इंफ्रा प्रोजेक्ट बनाना हो, तो पहला काम होता है वहां की जमीन को एक्वायर करना। और यही काम इंडिया में सबसे स्लो और कंट्रोवर्शियल प्रोसेस है। क्योंकि इसमें कभी लोग लैंड देने से मना कर देते हैं। कई लोग प्रोटेस्ट करने लग जाते हैं। कई बार कोर्ट केसेस हो जाते हैं और कई बार तो लैंड का ओनरशिप पता करना भी बहुत मुश्किल हो जाता है। इसी वजह से बुलेट ट्रेन और भारतमाला जैसे मेगा प्रोजेक्ट्स का कंप्लीशन 2022 से 5 से 10 साल के डिले पर चल रहा है। और इंडिया में प्रॉब्लम यह भी है कि हर स्क्वायर कि.मी. पर 492 लोग रहते हैं। तो जब सरकार यहां पर लैंड एक्विजिशन के लिए आती है तो उन्हें 492 लोगों को कंपनसेट करना पड़ता है।
5:27 लेकिन कच्छ में यह प्रॉब्लम बहुत कम है। क्यों? क्योंकि पहले तो कच्छ में 1 स्क्वायर किलोमीटर में 50 लोग से भी कम लोग रहते हैं। और क्योंकि कच्छ का ज्यादातर हिस्सा डेजर्ट और साल्ट प्लेेंस है। खेती भी यहां पर बहुत ही लिमिटेड एरियाज में होती है। सो इट हैज़ अ परफेक्ट कॉम्बिनेशन फॉर मैसिव इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट। इसीलिए दोस्तों, अंबानी और अडानी इंडिया के दो सबसे पावरफुल बिजनेसमैन इस डेजर्ट को एक एनर्जी सेंटर बनाना चाहते हैं। अब सवाल यह है कि सोलर एनर्जी तो कई सालों से यूज़ हो रहा है। तो अचानक से आज अंबानी और अडानी सोलर एनर्जी को लेकर इतने सीरियस क्यों हैं? ओवर द नेक्स्ट फाइव इयर्स द adानी ग्रुप विल इन्वेस्ट फॉर ₹ लैक्स करोड़ इन गुजरात। वी आर ऑन ट्रैक टू फुल्ली कमिट एंड इन्वेस्ट अप टू ₹75000 करोड़ टू
6:13 एस्टैब्लिश दिस धीरूभाई अंबानी ग्रीन एनर्जी गीगा मैन्युफैक्चरिंग कॉम्प्लेक्स। दोस्तों इसके भी तीन कारण है। पहले तो पिछले 10 सालों में सोलर एनर्जी को प्रोड्यूस करने का कॉस्ट इतनी तेजी से गिरा है कि आप हैरान रह जाओगे। लुक एट दिस। जैसे-जैसे दुनिया भर में सोलर मॉड्यूल का प्रोडक्शन बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इनकी प्राइसेस कम होती जा रही है। लुक एट दिस 2009 में 1 मेगावाट आवर प्रोड्यूस करने में $500 लग जाते थे। लेकिन 2024 में यह कॉस्ट $60 से भी कम हो चुका है। सेकंडली अगर भारत ने सोलर और विंड जैसे रिन्यूएबल एनर्जी को अडॉप्ट नहीं किया तो भारत एक बहुत बड़े मुसीबत में पड़ सकता है। इस मुसीबत का नाम है कार्बन टैक्स। कार्बन टैक्स का मतलब क्या है? आज यूरोप के बड़े-बड़े देश ऐसे रूल्स
7:00 पास कर रहे हैं जिनके हिसाब से जो कंट्रीज ज्यादा पोल्यूशन करती है वो कंट्रीज उनके गुड्स पर एक्स्ट्रा टैक्स देने पर मजबूर हो जाएगी। इसको बोला जाता है सीबीएम और कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म यानी कार्बन टैक्स। फॉर एग्जांपल आज इंडियन स्टील पूरी दुनिया में इसलिए बिकता है क्योंकि एक तो हमारे लेबर कॉस्ट कम है और दूसरा हम कोल यूज करते हैं स्टील को प्रोड्यूस करने के लिए। लेकिन कोल से बहुत ज्यादा CO2 एमिशंस होते हैं। अब यूरोप क्या करेगा? यूरोप बोलेगा कि भाई इंडिया ने ना कोल यूज करके एक टन स्टील बनाया है। जिसकी वजह से 2.2 टन्स यानी ₹200 किलो CO2 एमिट हुए हैं। तो यूरोप बोलेगा तुम्हें एव्री टन ऑफ कार्बन के लिए ₹000 टू ₹1,000 एक्स्ट्रा टैक्स देना पड़ेगा। अब इससे
7:47 क्या होगा? अगर इंडियन स्टील ₹50,000 पर टन पर बिकता था और यूरोपियन स्टील ₹55,000 पर टन पर बिकता था, ₹6,000 पर टन कार्बन टैक्स लगने के बाद इंडियन स्टील ₹63,200 पर टन पर बिकेगा। और यूरोपियन स्टील सिर्फ ₹55,000 पर टन पर बिकेगा। अब आप मुझे बताओ यूरोपियन कंस्ट्रक्शन कंपनीज़ कौन सी कंपनी से स्टील खरीदेगी? ऑब्वियसली यूरोपियन कंपनी से खरीदेगी। राइट? बिकॉज़ इट्स चीपर। और इसी तरह दोस्तों कार्बन टैक्स हमारे सारे एक्सपोर्ट मार्केट्स को बर्बाद कर सकता है। और देखा जाए तो आज इंडिया के सबसे बड़े एक्सपोर्ट्स में आते हैं स्टील, सीमेंट, एलुमिनियम, केमिकल्स और फर्टिलाइज़र्स। और हर चीज के प्रोडक्शन में हम लाखों टन कार्बन एमिट करते हैं। इसीलिए मोदी सरकार ने रिन्यूल एनर्जी के लिए इतने सारे पॉलिसीज निकाले हैं कि 2070
8:35 तक हमारा यह टारगेट है कि जितना कार्बन हम एमिट करेंगे, उतना ही कार्बन हम अब्सॉर्ब भी करेंगे। इसीलिए भारत को सोलर प्लस विंड की बहुत ज्यादा जरूरत है जिससे पोलशन कम होगा और हम पर कार्बन टैक्स नहीं लगेगा। इवेंचुअली इंडियन प्रोडक्ट्स यूरोप और यूएस में चीप और कॉम्पिटिटिव प्राइसेस में मिलेंगे। तो रिन्यूएबल एनर्जी अडॉप्ट करना भारत के लिए सिर्फ एक एनवायरमेंटल नहीं बल्कि एक इकोनॉमिकल चैलेंज भी बन चुका है। एंड लास्टली दोस्तों भारत में एक नया ट्रांजिशन आ रहा है। जहां हम सेंट्रलाइज्ड पावर से डीसेंट्रलाइज्ड पावर में ट्रांजिशन हो रहे हैं। तो अब हो क्या रहा है? थर्मल पावर प्लांट्स में एनर्जी जनरेशन होता है। फिर हाई वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइंस के माध्यम से एनर्जी को पावर प्लांट से आपके शहर तक पहुंचाया जाता है। और फिर यहां से adानी पावर जैसी
9:21 डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी आपके घर तक एनर्जी पहुंचाती है। जिसके बाद आप एसी चलाकर पावर को कंज्यूम करते हो। इसे कहते हैं ग्रिड। लेकिन यहां पर प्रॉब्लम यह है कि भारत में इलेक्ट्रिसिटी कंसमशन बहुत ही तेजी से बढ़ते जा रही है। जैसे 1947 से लेकर 2023 तक भारत का हर इंसान 80 गुना इलेक्ट्रिसिटी कंज्यूम करता है। आज इंडिया का पर कैपिटा एनर्जी कंसमशन है 1400 किलोवाट आवर। लेकिन चाइना का कंसमशन है 7100 किलोवाट आवर और अमेरिका का पर कैपिटा कंसमशन है 12700 किलोवाट आवर। तो देखा जाए तो जैसे-जैसे इंडिया डेवलप होगा वैसे-वैसे हमारा कंजम्पशन भी बढ़ता जाएगा और जैसे-जैसे भारत डेवलप होगा एक्सपर्ट्स का मानना यह है कि हमारा ग्रिड सिस्टम 17 से 20% एनर्जी सिर्फ ट्रांसमिशन में ही वेस्ट कर
10:07 देगा। और जरा सोच के देखो इसमें कितना ज्यादा झंझट है। एक छोटे से गांव में इलेक्ट्रिसिटी पहुंचाने के लिए करोड़ों रुपए के ट्रांसमिशन लाइंस बिछाने पड़ते हैं। और इसको 5 से 7 साल लग जाते हैं। बट ऑल थैंक्स टू सोलर। अब हर घर बिना किसी पावर प्लांट के, बिना किसी ट्रांसमिशन लाइंस के, बिना किसी इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूटर के सोलर पैनल लगाकर खुद एनर्जी प्रोड्यूस करके कंज्यूम कर सकता है। इनफैक्ट मोदी जी का विज़न यह है कि आने वाले कुछ सालों में हर घर इलेक्ट्रिसिटी प्रोड्यूस भी करेगा और सरप्लस एनर्जी ग्रिड को सप्लाई भी करेगा। यही पीएम सूर्यघर योजना का विज़न है और अंबानी और अडानी इस ग्रिड में इस कोल पावर प्लांट को रिप्लेस करके सोलर एनर्जी पावर प्लांट्स बिठाना चाहते हैं। तो अब सवाल यह है कि अडानी और अंबानी की बिनेस स्ट्रेटजी है
10:53 क्या? और इन दोनों में से आगे कौन है? दोस्तों, इंडिया के रिन्यूएबल एनर्जी वैल्यू चेन को तीन हिस्सों में बांटा जाता है। अपस्ट्रीम, मिडस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम। अपस्ट्रीम में होता है मैन्युफैक्चरिंग ऑफ सोलर पैनल्स, विंड टरबाइन और बैटरीज। मिडस्ट्रीम में होती है एक्चुअल पावर जनरेशन और डाउनस्ट्रीम में इलेक्ट्रिसिटी को ग्रिड्स के जरिए देश के कोने-कोने तक पहुंचाया जाता है। अब Reliance का फोकस पूरा अपस्ट्रीम को कंट्रोल करने पर है। इसीलिए Reliance जामनगर में 5000 एक्स का एक गीगा कॉम्प्लेक्स बना रहा है। यहां पर सोलर पैनल्स, बैटरीज और फ्यूल सेल्स सब कुछ मैन्युफैक्चर किए जाएंगे। और अडानी क्या कर रहे हैं? वो अपस्ट्रीम पर कम और मिडस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं। आज अडानी के पास 15 गीगावाट रिन्यूएबल एनर्जी कैपेसिटी है जिसको वो 45
11:40 टू 50 गीगावाट आर तक पहुंचाना चाहते हैं। लेकिन सबसे बड़ा ट्रंप कार्ड अडानी के पास है ट्रांसमिशन एंपायर का जहां अडानी के पास 26,000 कि.मी. से ज्यादा प्राइवेट ट्रांसमिशन लाइंस हैं जो कि आज घर-घर तक इलेक्ट्रिसिटी पहुंचाती है। इसी तरह अंबानी अपस्ट्रीम और अडानी मिडस्ट्रीम और डाउन स्ट्रीम पर फोकस करके अपना सोलर एंपायर बनाने की कोशिश कर रहे हैं। अब आखिरी सवाल यह है कि भारत के इस रेवोल्यूशन का फायदा हमारे जैसे एंटरप्रेन्यर्स कैसे उठा सकते हैं? दोस्तों, पहले तो पीएम सूर्य योजना की वजह से हर स्टेट में एक सोलार बूम आ चुका है। तो सोलार सर्विसिंग कंपनीज़ जो कि इंस्टॉलेशन और मेंटेनेंस करती हैं, उनको बहुत ज्यादा बिजनेस मिलेगा। सेकंडली आप सोलार स्क्वायर, वारी एनर्जी और विक्रम सोलर जैसे कंपनीज का फ्रेंचाइज या डीलरशिप खोल के अपना खुद का बिजनेस भी खड़ा कर
12:26 सकते हो। एंड लास्टली अगला बड़ा सोलर अपॉर्चुनिटी है बैटरी स्टोरेज और स्किल डेवलपमेंट का। आने वाले दो-ती सालों में सोलर पैनल्स के साथ-साथ बैटरीज की डिमांड भी बढ़ने वाली है। साथ ही सोलर इंडस्ट्री में ट्रेंड मैन पावर की सबसे ज्यादा कमी है। तो अगर आप इनमें से किसी भी अपॉर्चुनिटी को टैप करते हो तो आप भी एक सस्टेनेबल बिजनेस खोल सकते हो। यह है दोस्तों अंबानी और अडानी के सोलर रेस और गवर्नमेंट ऑफ इंडिया के सोलर रेवोल्यूशन की कहानी। एंड होपफुली इंडिया विल गो ऑन टू बिकम अ सोलर सुपर पावर। ना!