Nitin Nabeen BJP Working President: RSS Compromise या Modi-Shah की पसंद? | Ashutosh Ki Baat

简要总结

本视频讨论了印度人民党(BJP)任命尼廷·纳宾为执行主席的决定,分析了这一任命背后的原因、策略和政治意义。主要观点包括:

  • 尼廷·纳宾的任命令人惊讶,但可能代表了人民党的一次世代交替尝试。
  • 莫迪和沙阿可能希望培养新一代领导人,并保持对党内事务的控制。
  • 尽管尼廷·纳宾缺乏国家层面的政治经验,但他得到了党内高层的认可,并可能在未来发挥重要作用。
  • 这一任命也引发了关于人民党是否会重蹈国大党覆辙的讨论,即在强人领导下,党内人才难以崭露头角。

引言

主持人阿舒托什介绍了本期节目的主题,即讨论印度人民党(BJP)任命尼廷·纳宾为新的执行主席一事。他指出,尼廷·纳宾此前在全国范围内并不为人所知,因此这一任命引起了广泛关注。主持人将与资深记者维杰·特里维迪一起,分析这一任命背后的策略和政治意义。

任命背景:总理莫迪、阿米特·沙阿和印度民族联盟

过去两年来,一直有传言称,在人民党主席的任命问题上,总理纳伦德拉·莫迪、阿米特·沙阿和印度民族联盟(RSS)的莫汉·巴格瓦特之间存在分歧。印度民族联盟希望下一任主席不是莫迪和沙阿的橡皮图章,而是一个能够独立思考并指导人民党未来20-25年战略方向的人。然而,尼廷·纳宾的任命让许多密切关注人民党政治的人感到惊讶。

维杰·特里维迪的观点:世代交替和领导层控制

维杰·特里维迪表示,他和许多人一样,对尼廷·纳宾的任命感到惊讶。他指出,尼廷·纳宾现年45岁,与印度人民党的年龄相仿。特里维迪认为,这可能代表着人民党的一次世代交替尝试。他同时指出,人民党中央领导层,特别是纳伦德拉·莫迪和阿米特·沙阿,希望保持对党内事务的控制。因此,任命尼廷·纳宾这样一位经验相对较浅的领导人,可以让他们更容易地进行指导和控制。

尼廷·纳宾的资历与经验

特里维迪提到,在过去六到八个月里,人民党和印度民族联盟挑选了大约20名年轻有为的人,评估他们是否具备领导潜力。尼廷·纳宾是其中之一。尽管尼廷·纳宾缺乏国家层面的政治经验,但他曾在比哈尔邦担任过部长,并在党内担任过组织职务。此外,阿米特·沙阿曾在比哈尔邦选举期间拜访过尼廷·纳宾的家,这表明他可能早就被纳入了考虑范围。

人民党历史上的年轻领导人

特里维迪指出,人民党历史上不乏年轻的领导人。例如,阿塔尔·比哈里·瓦杰帕伊在44岁时成为人民党的前身印度人民同盟的主席,拉尔·克里尚·阿德瓦尼在46岁时成为主席。因此,任命年轻的领导人并非没有先例。

尼廷·纳宾的背景:缺乏印度民族联盟背景

与许多其他人民党领导人不同,尼廷·纳宾并非出身于印度民族联盟。他也没有在全印度学生联合会(ABVP)中担任过重要职务。特里维迪认为,这可能表明,阿米特·沙阿和总理莫迪更看重尼廷·纳宾的个人能力和潜力,而不是他的意识形态背景。

橡皮图章主席的担忧

主持人阿舒托什指出,许多人担心尼廷·纳宾会成为一个“橡皮图章”主席,即一个没有独立思考能力,完全听命于党内高层的领导人。他提到,近年来,人民党在多个邦任命了缺乏经验的首席部长,这似乎表明,党内高层更喜欢容易控制的领导人。

维杰·特里维迪的回应:手把手指导与潜力

维杰·特里维迪回应说,你可以把这看作是“手把手指导”,也可以看作是“橡皮图章”。他指出,尼廷·纳宾过去在组织工作中表现出色,例如在赢得 छत्तीसगढ़邦的选举中发挥了作用。他认为,尼廷·纳宾是否能成为一位杰出的领导人,还有待观察。

与英迪拉·甘地时代的比较

主持人阿舒托什将当前的情况与英迪拉·甘地时代进行了比较。他指出,英迪拉·甘地经常提拔缺乏经验的领导人,以确保自己对党内的控制。这最终导致了国大党的衰落。阿舒托什询问,人民党是否会重蹈覆辙。

维杰·特里维迪的警告与希望

维杰·特里维迪表示,人民党内的一些人也担心,他们可能会走上与国大党相同的道路。他们担心,在强人领导下,党内人才难以崭露头角。然而,特里维迪也指出,情况并非一成不变,尼廷·纳宾和其他新一代领导人有可能在未来成长为强大的领导者。他回顾了2012-2013年,当时人民党对赢得2014年大选并不乐观,但最终纳伦德拉·莫迪脱颖而出,带领人民党取得了胜利。

结论

主持人阿舒托什感谢维杰·特里维迪的分析。本期节目讨论了印度人民党任命尼廷·纳宾为执行主席的决定,分析了这一任命背后的原因、策略和政治意义。

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0:05 नमस्कार मैं हूं आशुतोष और आप देख रहे हैं सत्य हिंदी। सत्य हिंदी के विशेष कार्यक्रम आशुतोष की बात में आपका स्वागत है। बातचीत शुरू करने के पहले एक छोटी सी अपील सत्य हिंदी एक कोशिश है ईमानदार निडर और निर्भीक पत्रकारिता की। हम अपने लाखों दर्शकों के शुक्रगुजार है जो लाखों की संख्या में हमारे कार्यक्रम को देखते हैं और हमारी हौसला अफजाई करते हैं। हम उनसे एक और छोटी सी गुजारिश करना चाहते हैं कि आप ना केवल हमारे कार्यक्रम देखें बल्कि संभव सके तो हमारे वीडियोस को बड़ी संख्या में सर्कुलेट करें, डिस्ट्रीब्यूट करें और शेयर करें ताकि ईमानदार पत्रकारिता ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे। और अब आज की बातचीत शुरू करते हैं। इस वक्त पूरे देश में एक ही नाम की चर्चा है। इस नाम की चर्चा है जिसको 24 घंटे पहले तक शायद ही कोई जानता हो। यह नाम है नितिन नबीन।

0:53 नितिन नवीन जो बिहार में बहुत कम लोग शायद उनको जानते होंगे देश के स्तर पर। तो खैर जब उनका नाम आया तो सब लोग चौंक गए। नितिन नवीन को दरअसल भारतीय जनता पार्टी ने अपना नया कार्यकारी अध्यक्ष चुना है। देश में नहीं देश के स्तर पर। यानी जेपी नड्डा के बाद पार्टी में उनकी दूसरे नंबर की स्थिति होगी। वो दूसरे नंबर के नेता होंगे और सारे वरिष्ठ नेताओं को उनके सामने उनकी बातों को मानना होगा। नितिन नवीन को क्यों चुना गया? किस लिए चुना गया? उसके पीछे की रणनीति क्या है? और उसके पीछे की राजनीति क्या है? आज इसी पे करेंगे दरअसल हम चर्चा। लेकिन नितिन नवीन पर चर्चा करने के पहले अपने दर्शकों को बता दें कि पार्टी के नए

1:39 अध्यक्ष को लेकर तकरीबन तकरीबन पिछले दो साल से ऐसा कहा जाता था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह और आरएसएस यानी मोहन भागवत के बीच में एक तरीके से ठनी हुई थी। इस तरीके की खबरें लगातार आ रही थी कि संघ अगला अध्यक्ष एक ऐसे आदमी को चाहता है जो दरअसल मोदी शाह का रबर स्टैंप ना हो। जो उनके कहने पर उठे और उनके कहने पर बैठे। यानी एक ऐसे व्यक्ति की तलाश हो रही थी जो दरअसल संघ के हिसाब से कम से कम अगले 20 साल की या 25 साल की बीजेपी की रणनीति को या राजनीति को अगर संचालित ना भी करे तो कम

2:25 से कम उसको दिशा जरूर दे और ये भी था कि वो इंडिपेंडेंट थिंकिंग आदमी हो जो आरएसएस और संघ की विचारधारा हिंदुत्व में पूरी तरीके से ओतपोत हो। अब जब यह नाम अनाउंस हुआ तो उसके बाद से जो संघ से जुड़े हुए लोग थे जो भारतीय जनता पार्टी के राजनीति को भी बहुत करीब से देख रहे थे वो सब लोग हतप्रबद्ध रह गए और चौंक गए। वैसे तो यह कहा जा सकता है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अपना स्टाइल है। वो जब से प्रधानमंत्री बने जब से बीजेपी के सर्वोच्च नेता बने तब से अपने हर अपॉइंटमेंट अपने हर नियुक्ति में वो ना केवल पत्रकारों को बल्कि बीजेपी को

3:10 भी चौकाते हैं। आपने देखा राजस्थान के अंदर भजन लाल शर्मा अचानक मुख्यमंत्री बन गए और उनका नाम सुनकर खुद वसुंधरा राजे सिंधिया के चेहरे का रंग उड़ गया। चेहरा पड़ गया। यह भी हो सकते हैं मुख्यमंत्री। इसी तरीके से उत्तराखंड में पुष्कर सिंह धामी का नाम आया था। गुजरात में भूपिन पटेल का नाम आया था। और भी बहुत सारे नाम है। निर्मला सीतारमण सडनली बहुत पावरफुल हिंदुस्तान के इतिहास में शायद सबसे ज्यादा बजट पेश करने वाली वित्त मंत्री भी वो हो गई है। तो ऐसे बहुत सारे नाम है। लेकिन नितिन नवीन का मुख्य का पार्टी का अध्यक्ष क्योंकि ये कहा जा रहा है वो कार्यकारी अध्यक्ष बने तो शायद अगले पार्टी का अध्यक्ष भी होंगे। तो अगर कार्यकारी अध्यक्ष बने हैं उसके पीछे की

3:56 सोच क्या है? उसके पीछे की रणनीति क्या है? उसके पीछे की राजनीति क्या है? क्या मोदी शाह को एक रबर स्टैंड ही चाहिए था या वाकई में नितिन नवीन एक ऐसे नेता के तौर पर उभरेंगे जो बीजेपी की बागडोर को आगे बढ़ाएंगे। चर्चा करेंगे हम विजय त्रिवेदी जी से। विजय त्रिवेदी जी की खासियत सिर्फ ये नहीं कि वरिष्ठ पत्रकार है बल्कि उन्होंने आरएसएस पे बहुत जबरदस्त किताब लिखी हिंदी में। अब उसका अंग्रेजी का संस्करण भी आ रहा है। उन्होंने खुद बीजेपी पर एक किताब लिखी है। बीजेपी कल आज और कल। साथ ही साथ योगी आदित्यनाथ पर भी किताब लिख चुके हैं। अटल बिहारी वाजपेयी पर भी उनकी किताब है। तो यह कह सकता हूं कि भारत में बहुत कम लोग हैं जो बीजेपी और आरएसएस को इतनी बेहतर तरीके से समझते हैं। तो विजय जी आपका बहुत-बहुत स्वागत है।

4:41 काफी दिन बाद हमारे प्रोग्राम में आप दिखाई पड़ रहे हैं। बहुत शुक्रिया आशुतोष जी। आपने जब पहली बार नितिन नवीन का नाम सुना तो आपकी प्रतिक्रिया क्या थी? जैसे आपने भूमिका में क्या हम सब लोगों की चौंकने की बारी थी। हम सब लोग चौक रहे लेकिन अभी दो दिन पहले मैं किसी प्रोग्राम में था तब ये बात हो रही थी कि कौन बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष होगा मैंने कि मैं इतना भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस को नहीं जानता उनका नाम बताना मुश्किल काम है लेकिन भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस की जो लीडरशिप है उसका मैं थोड़ा सा कल रास्ते से मैं इस पर जब से ये नाम आया कल शाम को ये नाम आया था जी तो नितिन नवीन साहब का 44 45 साल के 45 साल के हैं और कहे तो भारतीय जनता पार्टी

5:27 और नितिन नवीन की उम्र बराबर है। अप्रैल 1980 में भारतीय जनता पार्टी बनी है और मई 1980 का जन्म है नितिन नवीन का। समझे? 45 साल के तो एक तो ये हम लोग तो चौकते इसलिए क्योंकि हम लोग बहुत कन्वेंशनल तरीके से सोचते रहते हैं भारतीय जनता पार्टी के बारे में, आरएसएस के बारे में। तो इसलिए हर बार हम चौकते हैं और वो अपने तरीके से काम करते हैं। प्रॉब्लम ये वाली है चौकनी की हम जानकारी मुझे मिली तो वो ये था कि पिछले छ आठ महीनों में कुछ करीब डेढ़ दर्जन नाम 20 नाम पार्टी ने सेलेक्ट किए थे आरएसएस ने सेलेक्ट किए थे जो नौजवान है मतलब उम्र के हैं और उनमें देखा जाए कि

6:12 किसको लीडरशिप में शामिल किया जा सकता है फिर उसमें से करीब आधा दर्जन नाम सॉर्ट आउट किए गए और ये आरएसएसपी के दोनों के जो भी लोग थे बड़े लोग उन्होंने उन्होंने तय किए और फिर मेरे ख्याल से उसमें से जो नाम तय किया गया वो प्रधानमंत्री जी या अमित शाह जी ने तय किया। ये तो इनका प्रोसेस है। जो बताया मुझे हो सकता है इसमें कुछ इधर उधर हो बात लेकिन जो जानकारी मुझे मिली लेकिन मैं इसको जनरेशनल चेंज के तौर पर देखता हूं। ये कहना है जो आप कह रहे थे वो तो ठीक है। जी मैं आपकी अब आपकी बात पे आऊंगा। आपने बड़ी दिलचस्प बात की क्योंकि पिछले हमने हमने भी कई बारे इस बारे में बातचीत की है। कई टीवी पैनल में हम लोग एक साथ वहां भी हमने इस चर्चा की है। यह कहा जा रहा था कि दरअसल इस बार का जो अध्यक्ष होगा वो संघ की पद पसंद का होगा और संघ की सहमति

7:00 का होगा और यही एक बड़ा कारण माना जा रहा था जिसकी वजह से जेपी नड्डा साहब का जो कार्यकाल था वो लोकसभा चुनाव के पहले खत्म हो गया था। लेकिन वो पद पर बने हुए थे। वो राज्यसभा के अंदर लीडर ऑफ हाउस भी थे। वो कैबिनेट मिनिस्टर भी थे और उसके साथ-साथ पार्टी के अध्यक्ष भी थे। तो क्या यह माना जाए कि नितिन नवीन के नाम पे एक सहमति मोहन भागवत जी की भी है और उनकी सहमति से बने हैं। क्योंकि मैं ये कह रहा हूं कि जो नाम 20 नाम हुए या जिसमें से सॉर्ट आउट हुए उसमें पांच छह नाम वो सब मोहन भागवत जी के पास भी गए होंगे। ये अकेला नाम मोहन जी ने स्वीकृत किया नहीं क्या इसकी मेरे को जानकारी नहीं है। मंदिर है ना वो उनके पास ये नाम जानकारी में था। जब वो लिस्ट जैसे बनाते हैं हम लोग उस तरह

7:47 की लिस्ट उन्होंने बनाई होगी और उसमें इस नाम पर चर्चा हुई और जो आप बात कर रहे हैं कि उनको मैं इसको दूसरे तरीके से देखता हूं कि एक तो बीजेपी का जनरेशनल चेंज है और दूसरा मैं मजाक में कहता रहता हूं। ऐसी बात है कि अभी भारतीय जनता पार्टी के स्थाई राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह जी हैं। ठीक है तो हमें कहानी तो एक अध्यक्ष की जो एग्जीक्यूटिव हेड के तौर पर काम करे वो रहे लेकिन इसका पॉजिटिव तरीके से देख तो ये है कि भ बीजेपी की सेंट्रल लीडरशिप के पास एक हैंड होल्डिंग है। नरेंद्र मोदी है, अमित शाह जी है, जेपी नड्डा है। तो उसके नीचे एक नई जनरेशन को तैयार करें। मतलब कोई नुकसान नहीं होगा ना। मान लीजिए नितिन नवीन कोई बात नहीं कर पाए तो कोई बड़ा नुकसान नहीं होगा। बहुत

8:33 सारे लोग चला रहे हैं कि वो बंगाल के चुनाव के लिए बंगाल के चुनाव में नितिन नवीन को कौन जान रहा है? कोई फर्क नहीं लेकिन वो संगठन के लोग हैं। उस पर काम करेंगे और एक ऐसा वक्त ऐसा मौका बीजेपी के पास है कि वो एक लीडरशिप तैयार कर सकता है। ठीक है? तो इसलिए नितिन नवीन को चुना गया। एक और जानकारी मिली कि अभी पिछले दिनों जब बिहार के चुनाव थे तो अमित शाह जी उनके घर गए थे। उनके साथ बातचीत हुई है नितिन नवीन के साथ। तो इसका मतलब दिमाग में कुछ नाम चल रहे होंगे। बस इसमें सवाल यह आता है कि यदि अध्यक्ष बनाना था तो अभी मंत्री बनाने की क्या जरूरत थी? अभी महीने भर पहले बनाया। एक बात लेकिन मैं पूरा बीजेपी के इतिहास जैसे आपने जिक्र किया कि किताब का भी बीजेपी का तो बीजेपी के जनरेशनल चेंज की एक टेंडेंसी है। अटल बिहारी वाजपेयी जनसंघ के जब अध्यक्ष बने तो वो 44 साल के थे। 44 ये तो 45 के हैं। तो मतलब जो सबसे

9:20 यंगेस्ट प्रेसिडेंट है बीजेपी जनसंघ का वो है अटल बिहारी वाजपेयी। 45 साल के बीजेपी के अध्यक्ष हैं। जब आडवाणी जी अध्यक्ष बने तो 46 साल के थे। जब दीनदयाल उपाध्याय अध्यक्ष बने तो वो 50 साल के थे। हालांकि वो उससे पहले जनरल सेक्रेटरी के तौर पर बहुत लंबे समय से काम कर रहे थे। मतलब 40 के करीब बने। श्यामा प्रसाद मुखर्जी जब बने तो वो 50 साल के थे। जब पार्टी शुरू की गई तो ऐसा नहीं है नितिन गडकरी जब बने तो वो 51 साल के थे। अमित शाह बने तो वो भी 50 के करीब करीब थे। तो इसलिए बीजेपी में नए लीडरशिप को लाने का कोई पहला मौका नहीं है। लेकिन हम भूल जाते हैं इसलिए उसका जिक्र किया और अब ये जो मौका था इसमें ये साफ हो गई बात कि हैंड होल्डिंग उनके पास है तो काम जो अमित शाह जी के नेतृत्व में किया जाएगा। अमित शाह जी पार्टी के

10:06 अध्यक्ष हैं। एक तरह से समझ लीजिए या पार्टी को वो देख रहे हैं। अध्यक्ष कहना ठीक नहीं है। लेकिन वो देख रहे हैं तो उनके नेतृत्व में काम किया जाए। वो मोटे तौर पे नड्डा जी भी वैसे ही काम कर रहे थे। ठीक है? हम और फिर वो ग्रो किया तो अब छ साल में वो भी बहुत बड़े नेता हो गए। हालांकि वो हिमाचल से आए। इनके पास कोई संगठन का अनुभव उस तरह से नहीं है कि वो प्रदेश अध्यक्ष नहीं रहे बिहार के। किसी से काम उनके पिताजी जो है जब उनकी डेथ हुई तब वो एंट्री हुई उनकी साल साल की उम्र में एजुकेशन छोड़कर भी उन्होंने किया। तो वो आरएसएस और जेपी मूवमेंट के साथ जुड़े रहने वाले लोग हैं। तो आरएसएस के साथ उनका एक उस तरह का अनुभव है। नितिन नवीन कोई आरएसएस के साथ भी नहीं रहे। एबीपी के साथ भी नहीं रहे तो कोई उस तरह का बैकग्राउंड उनका नहीं है। लेकिन मुझे लग रहा है कि केवल एक जनरेशनल चेंज

10:53 का ये मौका उनके पास था। उस मौके को इस्तेमाल करते हुए ये काम किया गया। कोई भी अध्यक्ष और मान लीजिए कोई बड़ा ताकतवर अध्यक्ष बन जाता। एक कन्फ्रेशन होता है। कोई एक बड़े अनुभवी को ज्यादा अनुभवी को बना दिया जाए तो उससे बेहतर है कि नितिन नवीन को बनाया है। अब वो अमित शाह जी के लीडरशिप में जितना आगे बढ़ना होगा जो काम करेंगे। कार्यकारी अध्यक्ष तो इसलिए कि अभी जब चुनाव होंगे तो फिर वो जब भी चुनाव करना होगा अध्यक्ष बना देंगे। मतलब ऐसा नहीं लग रहा कि नितिन के बाद कोई नया अध्यक्ष आपको मिल जाएगा। वही बट विजय विजय एक बात मुझे बताइए आपने अटल बिहारी वाजपेयी का जिक्र किया कि 44 साल की उम्र में बन गए थे। लाल आडवाणी 46 साल की उम्र में बन गए थे। दीनदयाल उपाध्याय 50 साल की उम्र में बने और नितिन गडकरी 51 साल की उम्र में बने। इसमें अगर सिर्फ नितिन

11:38 गडकरी को छोड़ दिया जाए तो कम से कम इन तीन नेताओं का जिनका जिक्र आपने किया। इतनी कम उम्र में बने तो उनका एक राष्ट्रीय राजनीति का अनुभव भी था। राष्ट्रीय राजनीति में उनका एक्सपोजर भी था और तीनों के में लोग भविष्य को देख सकते थे। यानी अटल जी को तो नेहरू जी पसंद करते थे। दीनदयाल उपाध्याय गोलवकर जी के ब्लू आइड बॉय माने जाते थे। लाल आडवाणी ने लंबे समय तक अटल जी के साथ काम किया था। तो तीनों का राष्ट्रीय राजनीति का अनुभव भी था। नेशनल आउटलुक लोग जानते थे उनके बारे में। गडकरी एक कामयाब मंत्री के तौर पर स्थापित उन्होंने अपने आप को महाराष्ट्र के पॉलिटिक्स में किया था जब वो कैबिनेट मिनिस्टर थे और उनको बहुत कुछ क्रेडिट जाता हुआ इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने के लिए फ्लाई ओवर्स बनाने के लिए कोकण रेलवे बनाने के

12:24 लिए उसकी क्रेडिट उनको जाता है नितिन का ऐसा कोई अनुभव दिखाई नहीं पड़ता उनको बिहार के अंदर भी कोई बहुत बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी गई थी राष्ट्रीय राजनीति के लिए तो पूरी तरीके से वो एक तरीके से अनभिज्ञ मानी जाएंगे पहली बार वो दिल्ली आके इतनी बड़ी जिम्मेदारी संभालेंगे तो उनको चुनने के पीछे पीछे का कारण क्या था? क्या वो सबसे काबिल लोगों में से माने जाते हैं संगठन में? क्योंकि संगठन में और बहुत सारे लोगों के नाम लिए जाते हैं जो बन सकते थे पार्टी के अध्यक्ष। बिल्कुल बिल्कुल ये नहीं कि वो सबसे काबिल जो सबसे काबिल लोग चुने गए उनमें से एक नाम चुना गया। और ये बात बिल्कुल ठीक है कि राष्ट्रीय राजनीति का उनका अनुभव नहीं है। लेकिन उनके मतलब मुकुट में क्रेडिट में छत्तीसगढ़ का चुनाव है जो उन्होंने लड़वाया जिसमें कांग्रेस जीत की भारतीय जनता पार्टी ने। ठीक है? एक ये बड़ा काम है और दूसरा

13:10 दिल्ली के चुनावों में भी वो बहुत एक्टिव रहे थे। दिल्ली में भी बड़ा काम उन्होंने किया। तो संगठन के तौर पर वो माने जाते हैं। तीन बार वो नीतीश सरकार में मंत्री रहे हैं। पांच बार एमएलए रहे हैं। परिवार के साथ आते हैं तो संगठन को भाजपा को ठीक से समझते हैं। ये बिल्कुल ठीक बात है कि वो राजनीति में राष्ट्रीय राजनीति का कोई अनुभव उनके पास नहीं है। लेकिन इसीलिए मैंने कहा ना कि जब वो हैंड होल्डिंग करना है ना। हैंड होल्डिंग के लिए राष्ट्रीय राजनीति के लिए अमित शाह बैठे हुए हैं। प्रधानमंत्री बैठे हुए हैं। अभी बैठे हुए हैं। तो उस दौरान उनको तैयार किया जाए और वो संगठन को कैसे बेहतर कर सकते हैं और मैं बता रहा हूं कि जो नाम 20 नाम जिक्र मैं जो कर रहा हूं जो लिस्ट में थे उसमें से कुछ नाम अभी इनकी जो नई टीम बनेगी उसमें भी शामिल हो जाएंगे। इसलिए नितिन नवीन सबसे काबिल है। ऐसा मैं नहीं कहता लेकिन उन काबिल लोग जिनको पार्टी और संघ

13:56 समझ रहा था उनमें से किसी एक को चुनना था। ये चुना गया। हो सकता है अमित शाह जी की और जैसे मैंने कहा कि चुनावों के दौरान अमित शाह उनके घर गए थे तो इसका मतलब दिमाग में कोई बात उनके चल रही होगी कौन से बड़े कारण रहे या नहीं रहे ये तो पार्टी जानती है लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में उनका अनुभव नहीं है लेकिन ऐसा होता है अमित शाह जी का भी राष्ट्रीय राजनीति में अनुभव नहीं था वो पहले गुजरात की राजनीति जिंदगी भर करते रहे प्रधानमंत्री नहीं है प्रधानमंत्री तो राष्ट्रीय राजनीति में भी रहे और वहां भी रहे लेकिन अमित शाह तो नहीं थे राष्ट्रीय राजनीति में और का भी आपने जिक्र किया तो वो भी उस तरह राजनीति में नितिन गडकरी साहब भी नहीं थे तो वो चलता रहता है कि किस तरह से हो रहा है। मुझे लगता है कि यह तैयार करने के लिए एक पीढ़ी बदलाव के लिए एक नए नेता को तैयार किया जाए। कोई बहुत चमत्कार कर

14:41 देंगे। इस उम्मीद से मेरे ख्याल से पार्टी नेतृत्व ने नहीं चुना लेकिन एक नया नेतृत्व मिल जाए। इस कोशिश में किया गया होगा ये फैसला। ऐसा मैं समझता हूं। क्या होगा आगे और उनको क्या बदल देंगे? बंगाल में क्या बदल देंगे? पूर्वोत्तर में ऐसा मैं नहीं समझता। वो संगठन को तरीके से काम कर अब तक जो भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष हुए हैं या पार्टी में रहे हैं यह माना जाता था कि आरएस के शाखा में जाने वाले लोग थे हमारे ख्याल से जेपी नड्डा भी शाखा में गए थे और अटल बिहारी वाजपेयी लाल अडवारी दीनदयाल उपाध्याय स्वयंसेवक ही थी गडकरी जी भी स्वयंसेवक थे जी नितिन गडकरी नितिन नवीन के बारे में कहा जाता है कि दरअसल वो आरएसएस की शाखा से नहीं निकले वो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से निकले हैं तो विद्यार्थी परिषद इसको कैसे देखा अखिल भारतीय विद्यार्थी

15:29 परिषद में भी वो नहीं रहे। नहीं रहे। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद कॉलेज लेवल पर संगठन के लोगों का काम करती है। वो तो कॉलेज में रहे ही नहीं। 12th पास करने के बाद जब इंजीनियरिंग में एडमिशन ले रहे थे तभी उनके फादर की डेथ हो गई है और वो पार्टी में सीधे आ गए 26 साल की उम्र में 25 साल की उम्र में तो वो एबीबीपी में भी नहीं रहे और संघ में भी नहीं रहे। हो सकता है शाखा में जाते हुए मुझे आईडिया नहीं है। लेकिन संघ की भूमिका में कोई नहीं रहे। हम बात मेरे को केवल यही लगता है कि अमित शाह जी को पसंद है, प्रधानमंत्री जी को पसंद है। संघ को कोई आपत्ति नहीं होगी। मैं यह नहीं कह रहा कि उनकी मोहर उस लगेगी नहीं। लेकिन आपत्ति नहीं होगी। इतना मुझे समझ में आता है। और यही एक बात तय की गई थी कि संघ और उसमें सहमति हो। दोनों के बीच में सहमति हो। तो इसलिए उनको चुना गया

16:16 होगा और जनरेशनल चेंज एक बड़ा कारण मुझे लगता है और वो एक्सपीरियंस में आप सोचिए वाजपेयी जी का आपने जिक्र किया लेकिन वाजपेयी जी बलराज मधो के वक्त में प्रेसिडेंट बने हमे तो बलराज मधो बहुत बड़े नेता थे और उसके लिए तो संघ ने फैसला करके जो है उनको उस समय जिम्मेदारी दी गई तो इसलिए पार्टी में ये सारा काम चलता है इसको आप दूसरी पार्टी हम लोग इसलिए नहीं समझते क्योंकि हमारी जो परेशानी है मतलब मेरी अपनी भी कि हम कन्वेंशनल तरीके से सोचते हैं। बीजेपी और खासतौर से मोदी जी की लीडरशिप और चौंकाने का इसलिए क्योंकि हमें तो नहीं पता होता इसलिए हम चौकते हैं। ये बताइए कि बहुत सारे लोग बहुत सारे लोग ये कह रहे हैं। के लिए तो प्रधानमंत्री जी ये फैसला नहीं कर रहे।

17:02 ये बताइए बहुत सारे लोग यह कह रहे हैं कि दरअसल एक रबर स्टैंप प्रेसिडेंट होंगे और वो इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि पिछले जितने बड़े फैसले हुए हैं अब गुजरात की तो पूरी कैबिनेट ही बदल दी थी उन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव के पहले और फर्स्ट टाइमर भूपेंद्र पटेल को उन्होंने मुख्यमंत्री बना दिया उत्तराखंड के अंदर उन्होंने पुष्कर सिंह धामी को बना दिया और भजनल को उड़ीसा में राजस्थान में भजन लाल शर्मा को बनाया राजस्थान ने भजन मोहन मोहन यादव को मनोज मांझी इनमें से कोई ऐसा नेता तो नहीं था जिसको हम कहते कि शिवराज सिंह चौहान बन गए या फिर वसुंधरा राजे सिंधिया बन गए या फिर वो खुद नरेंद्र मोदी बन गए या अमित शाह बन गए ठीक है अपनेप जिम्मेदारियां ये लोग निभा रहे हैं लेकिन कोई बहुत स्पार्कलिंग

17:48 टैलेंट हो ऐसा तो दिखाई अभी तक नहीं पड़ा जबकि अटल जी के जमाने में हर राज्य के अंदर बड़े कद्दावर नेता खड़े हुए कल्याण सिंह खड़े हुए भैरव सिंह शेखावत थे खुद गुजरात के अंदर नरेंद्र मोदी में गए उसके पहले वाघेला वहां पर थे केशु भाई पटेल थे प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान उमा भारती मतलब कद्दावर नेता महाराष्ट्र के अंदर प्रमोद महाजन गोपीनाथ पुंडे कर्नाटका के अंदर यदप्पा जैसे लोग थे और केंद्र के अंदर भी अगर आप देखें तो अरविंद जेटली सुषमा स्वराज जैसे लोग यहां थे खुद नरेंद्र मोदी जी यहां जहां पर थे आज की तारीख में उसका पूरा अभाव दिखाई पड़ता है। तो क्या यह माना जाए कि नितिन नवीन भी उसी श्रेणी में है कि हां पद की जिम्मेदारी मिल गई है लेकिन कोई स्पलिंग टैलेंट नहीं है और इसीलिए लोग कह रहे हैं कि दरअसल

18:34 अमित शाह मोदी जी को कोई टैलेंटेड आदमी नहीं बल्कि एक रबर स्टैंप चाहिए। मैंने हैंड होल्डिंग बोला उसको आप रबर स्टैंप भी कह सकते हैं। नहीं लोग कह रहे हैं मैं देखिए मेरी कोई व्यक्तिगत राय इस पे नहीं है। मेरी व्यक्तिगत राय तो जब आप मुझसे बात करेंगे तो मैं आपको व्यक्तिगत राय बताऊंगा। नहीं और इस पाक का तो अब जब वो काम करेंगे तब समझ में आएगा कि वो क्या काम कर रहे हैं और जैसा उन्होंने पिछला काम किया छत्तीसगढ़ का चुनाव जिताया जो बहुत मुश्किल चुनाव था भारतीय जनता पार्टी के लिए दिल्ली का चुनाव भी बहुत मुश्किल चुनाव था तीन बार वो सरकार में भी रहे हैं नीतीश सरकार में तो अब स्पार्क राष्ट्रीय स्तर पर क्या होगा क्या नहीं होगा लेकिन यह आमतौर पर माना जा रहा है भारतीय जनता पार्टी में भी कि वो जो मौजूदा नेतृत्व है वह कोई बहुत बड़े लीडर्स को बड़ी जिम्मेदारी नहीं देना चाहता

19:19 ठीक है। लेकिन इनमें से किसी का मैं सम्मान नहीं कर रहा कि जो लोग भी आए इसको दूसरे तरीके से देखते हैं हम कि जो बड़े नेता हैं नितिन गडकरी हैं, शिवराज जी हैं, वसुंधरा जी हैं, राजनाथ जी हैं। राजनाथ जी तो फिर भी रक्षा मंत्री है और जो सब लोग हैं उनको कोई एक बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी। इसलिए मैंने कहा कि कहीं कंफ्रेशन ना हो। हम आपको याद हो हम पहले भी बात कर रहे थे कि बड़ी लीडरशिप मनोहर लाल खट्टर की शिवराज जी की बात हो रही थी तब भी मुझे लग रहा था अब आप सोचिए उसके भी दूसरे स्तर पर जो नाम चल रहे थे जिनको हम लोग चर्चा करते थे वो थे धर्मेंद्र प्रधान का वो भूपेंद्र यादव का इस तरह के नाम भी चल रहे थे तो वो ये तो फोर्थ जनरेशन ऑफ बीजेपी है इसको आप देख अभी बीजेपी की 45 साल में तो

20:05 ये फोर्थ जनरेशन हो गई एक जनरेशन वाजपेयी जी वगैरह वाली है दूसरी जनरेशन नरेंद्र मोदी सुषमा स्वराज अरुण जेटली वाली है। फिर तीसरी जनरेशन और जो लोग अब आ गए हैं जो मुख्यमंत्री वगैरह भी बन गए हैं। और ये चौथी जनरेशन आप भूपेंद्र यादव नड्डा को जोड़ सकते हैं। जोड़ सकते हैं। तो वो सब लोग अब ये चौथी जनरेशन आ गई है तो वो एक नया बदलाव है और वो नहीं चाहती ऐसा लगता है कि सेंट्रल लीडरशिप कोई कंफेशन नहीं चाहती। पार्टी का संगठन उनके पास रहे। ये साफ दिखता है सरकार का भी और संगठन का भी। मैं तो ये बात करता हूं। और दूसरा किसी में चैलेंज करने की हिम्मत नहीं है क्योंकि जीतने की सारी ताकत नरेंद्र मोदी जी के पास है चुनावी तौर पर मतलब वही अकेले उनके हीरो है तो जो जीताता है जो गाय दूध देती है तो उस पर आप सवाल क्या करेंगे या तो कोई ऐसा

20:52 बड़ा लीडर हो जो कहे कि भाई मैं चुनाव जीता सकता हूं आप राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दीजिए उसको और वो जिम्मेदारी ले तो ऐसा तो नहीं हो रहा वो तो खुद ही नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव जीत रहे हैं। जब नरेंद्र मोदी चुनावों में कहते हो आप डालेंगे वोट मोदी को मिलेगा तो इसलिए जो सीनियर लीडरशिप है वह शायद कंफेशन में भी नहीं आना चाहती कोई चैलेंज करने वाला भी नहीं आता कोई मरमरिंग भी नहीं है जो लोग हैं वो सेफ साइड में अपने काम कर रहे हैं और उसके साथ चल रहे हैं और नहीं चाहती होगी बीजेपी और संघ भी नहीं चाहता होगा कि कंफ्रेशन हो जब सरकार ठीक से चल रही है तो क्या आपको लगता है कि ये चर्चा बेकार थी जो चर्चा पिछले दो साल से चल रही थी या ये कहा जाए कि 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद चर्चा तेज हुई औरकि उसके बाद अनप्रेसिडिटेड तरीके से राज्यों के चुनाव बीजेपी ने जीते हैं तो संघ ने भी सरेंडर

21:38 कर दिया। मुझे लगता है ऐसा क्योंकि 2024 के चुनावों के हारने के बाद यदि ये फैसला हो जाता उस समय संघ फैसला करता तो हो सकता है कोई दूसरा नाम होता। लेकिन उसके तुरंत बाद बीजेपी ने महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली और जो चुनाव जीते बिहार तक वो जीते तो उसके बाद वो जो हार का एक दबाव था हम वो दबाव कम हो गया और वापस आप उस पोजीशन में आ गए कि आप ही फैसला कर सकते। ठीक है? आप यदि 204 के चुनाव के तुरंत बाद अध्यक्ष का फैसला होता तो मुझे लगता है कि कोई दूसरा नाम होता और वो बड़ा नाम भी हो सकता था और वो संघ की सहमति नहीं संघ के निर्देश पर भी हो सकता था। आज जो नाम है वो संघ की सहमति पर मैं

22:23 इसमें नहीं मानता कि संघ की सहमति नहीं है। संघ की सहमति का है। वो संघ के निर्देश का भी नाम हो सकता था। हम लेकिन अब जब पूरी तरह से पार्टी और सरकार दो लोगों के पास हो और वो कामयाब लोग हैं। इसको भी आपको क्रेडिट देना चाहिए। हम ये क्रेडिट भी देना चाहिए। भले ही आप कहे कि डेमोक्रेटिक सिस्टम है कि नहीं लेकिन जो चुनाव जीता रहा है जिसके भरोसे सरकार चल रही है देश में देश में और संगठन भी पूरी तरह से चल रहा है। आप सोच लीजिए नड्डा जी का छ साल का बीजेपी के जनसंघ के इतिहास में कभी नहीं हुआ कि कोई अध्यक्ष दो साल ढाई साल तक एक्सटेंशन पर चल रहा हो। हम क्योंकि एक्सटेंशन पर इसलिए चल रहा है क्योंकि उनको जो काम बताए जाए वो ठीक से वो करें। ठीक। दो चीजें हैं विजय जी। एक तो ये कि हम

23:10 लोगों ने बंगारू लक्ष्मण को पार्टी अध्यक्ष के तौर पर देखा था जब और ये कहा जाता है कि जब दरअसल पार्टी सरकार में आ जाती है तो इनके जो तमाम बड़े नेता होते हैं या जिम्मेदार नेता होते हैं उनको सरकार में महती भूमिका मिलती है और तब संगठन थोड़ा सा गौड़ पड़ जाता है। क्या ये कारण है कि उन नितिन शिवराज सिंह चौहान को नहीं बनाया गया या फिर जो प्रधान धर्मेंद्र प्रधान है जो तमाम बड़े-बड़े नेता थे। भाई अटल जी के जमाने में भी तो बंगारू लक्ष्मण को ही बनाया गया था थे। किसी और को तो बनाया नहीं गया था। जबकि पार्टी के बहुत बड़े बड़े-बड़े नेता थे। यही कारण है नहीं वो जरूरत ही नहीं है ना। अभी आप इसको समझिए ना कि वो जरूरत ही नहीं है उनको कि जो भी रहेगा एक ऑफिस में बैठने के लिए चाहिए। पर एक ठीक से काम जो दिया जाए उस

23:57 काम को ठीक से करें। और मैं आपको बताता हूं एक उदाहरण बताता हूं। अभी इस सरकार की छोड़ वाजपेई जी प्रधानमंत्री थे और कुशाबा ठाकरे जो 70 साल के थे कोई वो 45 साल के नितिन नवीन नहीं थे वो राष्ट्रीय अध्यक्ष थे और कुशा ठाकरे को अपनी टीम बनानी थी ये फैक्ट बात बता रहा हूं कुशा ठाकरे को अपनी टीम बनानी थी और वाजपेयी जी अपने लॉन में घूम रहे थे ठीक है और कुशा जी उनके साथसाथ कह लीजिए पीछे नहीं थे साथसा चल रहे थे और वो नाम बता रहे थे ये ये नाम है इन पर सहमति वाजपेयी जी हां ठीक है ये करते करते कर रहे थे एक बड़ा नाम था उस नाम पर उन्होंने पूछा कि क्या इस नाम को शामिल कर लूं वाजपेय कुछ नहीं बोले और दोबारा तो वो चक्कर लगाते लगाते लॉन में फिर कुशा बाबू

24:44 जी ने पूछा कि क्या करना भाई साहब इसका इस नाम का तो वाजपेयी जी ने यूं देखा और छोड़ दिया और वो नाम कुषा बाबू ठाकरे की टीम में नहीं था और वो नाम है के एन गोविंदाचार्य का ओके हम हम ठीक है इसलिए नितिन नवीन की बात मत कीजिए केशु भाई 71 साल के वाजपेयी जी उस समय भी उतने ही साल के करीब करीब रहे होंगे 70 75 मुझे दिख गया लेकिन ये 99% बात बिल्कुल इसको थोड़ा बहुत इधर उधर कोई बात को लेकिन ऐसे कैसे बात हुई थी ये तो इसलिए जब सरकार में प्रधानमंत्री होते हैं प्रधान और वाजपेयी जी थे तो पार्टी का कोई दखल उस तरह से नहीं था संघ का एक दखल हुआ जब क्या नाम था सुदर्शन जी चले गए थे

25:30 उनको प्रमोद महाजन को जसवंत सिंह को विड्र कर दिया था नाम लेकिन उसको बाद में उन्होंने थोड़े दिनों बाद वापस कर लिया उनको वित्त आयोग में भेज दिया और उनको अलग से कर लिया तो सरकार में जब रहते हैं तो संगठन वैसे भी थोड़ा सा पीछे हो जाता है और बंगारू लक्ष्मण के साथ जो हुआ और यहां पर ये कायस्त है तो वो जातिवाद का जो समीकरण था वो भी झगड़ा नहीं हुआ कि ठाकुर बनाएंगे तो ब्राह्मण नाराज होगा ओबीसी बनाएंगे तो अपर कास्ट नाराज होगा अपर क्लास तो कायस एक न्यूट्रलाइज कास्ट के तौर पर भी देखी जाती है वो भी शायद काम में आ सकता है लेकिन और फिर प्रधानमंत्री जी की आज की तारीख में उनकी पकड़ तो और ज्यादा मजबूत है ग्रिप है और अमित शाह जी की भी संगठन पर पूरी ग्रिप है आपसे आखरी सवाल कुछ लोग ये कहते हैं कि दरअसल

26:16 ये पूरा इंदिरा गांधी का मॉडल है। जैसे किसी की जड़ जमने लगती इंदिरा गांधी के बारे में कहा जाता था जब किसी नेता की जड़ जमने लगती तो उसको हिला के उठा के देखते उस जड़ जम गई क्या और जैसे जड़ जमती दिखाई पड़ती थी वैसे उसको हटा देते थे और उसका नतीजा यह हुआ कि जब इंदिरा गांधी गई तो कांग्रेस पार्टी आज इस स्थिति में है वो उसका एक बड़ा कर्म ये भी माना जाता था संगठन कमजोर हो गया संगठन में जो बहुत कमजोर लोग थे उनको मौका दिया गया और जो बड़े मजबूत लोग थे जिनका अपना आधार था उनको अचानक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के पद से हटा के पंजाब का गवर्नर बना दिया था। आप जानते हैं मैं अर्जुन सिंह की बात कर रहा हूं। जी और उसका खामियाजा कांग्रेस को लॉन्ग टर्म में भुगतना पड़ा। शरद पवार साहब को याद कीजिए। वो शरद पवार साहब को इंदिरा गांधी ने से नहीं हटाया। तो क्या ये ये आलोचना उचित होगी?

27:04 उस रास्ते पर तो है और वो बीजेपी में संगठन में जो लोग हैं वो यह बात कह रहे हैं और उनको इस बात की आशंका भी लगती है कि कहीं हम उसी रास्ते पर ना पहुंच जाए 10 20 साल बाद। उनकी चिंता यह है कि जब सरकार चलती है तब तक तो सब ठीक चलता है। जब सरकार आपकी चली जाती है तो फिर संगठन पर आ जाता है सारी जिम्मेदारी और संगठन में तब आपको ताकतवर प्रभावी मजबूत नेता चाहिए होते हैं। अगर वो नहीं है जो इंदिरा गांधी जी के साथ हुआ कांग्रेस के साथ हुआ और उसी क्राइसिस को आज कांग्रेस झेल रही है। हम उसी क्राइसिस को झेल रही है क्योंकि आज उसके पास कोई उस तरह की लीडरशिप नहीं है। ये हो सकता है कि वहां तक पहुंचे। लेकिन यह भी हो सकता है कि इसमें से कुछ नए नेता अच्छे मजबूत होकर निकल कर आ जाए क्योंकि मुझे 2012-13 का इलेक्शन याद कीजिए आप

27:50 2012 13 मतलब 14 का जो इलेक्शन है 2012-3 में बीजेपी सोच भी नहीं पा रही थी कि इलेक्शन कैसे लड़ेंगे हम लेकिन नरेंद्र मोदी का नाम उस समय भी अच्छा हां एक बात और जोड़ दूं उस समय भी चार पांच लोगों के नाम थे जिसमें मनोहर परिकर शिवराज सिंह चौहान जिनको प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार होना था फिर उसमें से नरेंद्र मोदी का नाम सेलेक्ट हुआ और तब जो डी4 के लोग यहां पर बैठते थे वो कहते अरे नरेंद्र मोदी क्या जानते हैं राष्ट्रीय राजनीति को और वो कैसे करेंगे देश को वो आप देख रहे हैं तो आशंका हो सकती है लेकिन हमेशा यह समझ ले कि नहीं अब ये कुछ नहीं कर पाएंगे लेकिन बीजेपी संगठन में कुछ लोग इस बात से थोड़ा सा आशंकित है कि आगे चलकर जब यदि सरकार नहीं हो हालांकि हम ही लोग मान रहे अभी सरकार तो चल रही है जब नहीं हो तब क्या संगठन के

28:35 लिए ऐसे नेता काम कर सकते हैं और कहीं पार्टी कमजोर ना हो जाए ये आशंका रहती है बहुत-बहुत शुक्रिया विजय जी हमसे बातचीत करने के लिए। थैंक यू सर। थैंक यू।

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