Yashwant Sinha's super explosive interview on Modi's new Nuclear Energy Bill , an eye opening listen

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简要总结

本视频讨论了印度议会通过的《可持续利用和促进核能转型印度法案2025》(简称“和平法案”),该法案旨在促进核能发展,但引发了关于责任上限、外国参与和潜在风险的争议。主要观点包括:

  • 该法案允许私营企业和外国公司参与核能领域,结束了公共部门的垄断。
  • 反对派批评该法案是执政党立场的重大转变,并对责任上限和监管框架表示担忧。
  • 专家认为,该法案可能是在美国公司和国内企业集团的压力下通过的,并可能增加核事故的风险。

介绍

主持人介绍了印度议会通过的“和平法案”,即《可持续利用和促进核能转型印度法案2025》。该法案旨在促进核能发展,允许私营企业和外国公司参与核能领域,并设定了300亿卢比的责任上限。主持人提出,该法案名为“和平”,但可能给国家带来不稳定,并邀请专家讨论其影响。

法案内容及争议

该法案允许合资企业和私营部门参与核能领域,设定了300亿卢比的责任上限,并旨在结束核能领域的垄断。政府表示,该法案将改善监管框架,吸引外国投资,并实现到2047年产生100吉瓦核能的目标,从而实现清洁能源目标。反对派批评该法案是执政党立场的重大转变,并对责任上限表示担忧,认为其远低于博帕尔 gas tragedy 的赔偿金额。他们还呼吁将该法案提交常务委员会或联合议会委员会进行审查。

专家观点: यशवंत·辛哈

前中央部长 यशवंत·辛哈对该法案的通过表示遗憾,并指出执政党改变了2010年对核责任法的立场。他认为,该法案是在外部势力(特别是美国公司)的压力下通过的,旨在取悦美国和国内企业集团。辛哈批评了300亿卢比的责任上限,以及将管辖权交给特别法庭而非法院的做法,认为这些都是为了让外国供应商受益。他回忆起自己曾在2月份发推文称该法案是“反民族的”,并质疑政府为何如此急于通过该法案,而不是将其提交委员会审查。

政府动机及私营部门参与

辛哈认为,政府急于通过该法案是为了取悦某些企业集团,例如阿达尼集团,并满足美国的要求。他指出,尽管莫迪政府已经执政11年,但直到最近才开始推动核能发展。辛哈批评政府利用多数优势强行通过该法案,无视议会程序和反对派的意见。他感叹议会民主的衰落,并呼吁反对派采取更强硬的立场,例如阻止议会运作,而不是简单地退出。

潜在风险及监管问题

辛哈驳斥了政府关于该法案将吸引外国投资和改善监管体系的说法。他认为,现有的原子能监管委员会(AERB)将被削弱,新的监管框架将偏袒私营部门。辛哈强调了核技术的复杂性和风险,警告说,如果不采取足够的预防措施,可能会发生切尔诺贝利、福岛或博帕尔 gas tragedy 类似的事故。他质疑政府是否充分了解核事故的长期影响,以及为何如此急于取悦美国和企业集团。

事故风险及未来展望

辛哈表示,由于监管不力,未来可能会发生更多事故。他感叹印度机构的衰落,并对该法案可能导致的灾难性后果表示担忧。辛哈祈祷印度人民免受核事故的侵害,并希望监管机构能够确保安全。他批评莫迪政府不了解核能,只是听从美国和孟买企业集团的意见。辛哈认为,执政党已经沦为“奴隶的政党”,没有人敢于提出异议。

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文字稿

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0:07 नमस्कार स्वागत है आपका पब्लिक इंडिया पर। मैं हूं नीलू व्यास। अपोजिशन शो हंगामे के बीच वर्कआउट कर गया और मोदी जी ने अपनी नई परमाणु बिल यानी कि जिसको शांति बिल कहते हैं उसको लोकसभा में पास कर दिया। अब यह शांति बिल है क्या? जिसका नाम शांति है वो कितनी अशांति लाने वाला है पूरे देश के लिए इसको आज हम समझने की कोशिश करेंगे अपने खास मेहमान से लेकिन आपको थोड़ा सा इस बिल के बारे में बता देते हैं। एस एच एआई एस एच ए एन टीआई शांति बिल को हम क्या कहते हैं? उसका फुल फॉर्म है सस्टेनेबल हारनेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया बिल 2025। अब ये बिल के लिए कहा जा रहा है कि जो इसमें जॉइंट वेंचर्स हो सकते हैं।

0:54 इसमें प्राइवेट पार्टिसिपेशन हो सकता है। जो एक लायबिलिटी कैप था उसको सेट किया गया है और वो 3000 करोड़ कहा गया है। और भी इसके बारे में यह बोला गया है कि मोनोपोली से खत्म हो जाएगी न्यूक्लियर सेक्टर में। उसके बाद यह कहा गया है कि जो रेगुलेटरी फ्रेमवर्क है वो और ज्यादा बेहतर हो जाएगा क्योंकि हम परमाणु ऊर्जा में जो भी सेक्टर में जो लोग काम करेंगे तो उनको रेगुलेट कर सकते हैं। उसके लिए ट्राइबनल्स बनाए जा रहे हैं। रिफॉर्म्स है ये एक तरीके का उससे ज्यादा फॉरेन फंडिंग आएगी। एफडीआई को पुश मिलेगा। 49% फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट इसमें अलऊ किया गया है। और जो एक बड़ा सपना सरकार का है सरकार ये कह रही है कि इससे हम 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा की जो कैपेसिटी है वो हम जनरेट कर

1:40 पाएंगे 2047 तक और जिससे कि क्लीन एनर्जी के जो गोल्स हैं भारत वो पूरा कर पाएगा। अब अगर हम अपोजिशन की बात करें तो अपोजिशन ने यही कहा कि ये तो बीजेपी का बहुत बड़ा यूटर्न है। 2010 में अगर आपको याद हो तो मनमोहन सिंह की सरकार ने जब सिविल लायबिलिटी जो न्यूक्लियर सिविल लायबिलिटी डैमेज एक्ट जब पास किया था उस समय लेफ्ट के साथ बीजेपी ने विरोध किया था लायबिलिटी के क्लॉज़ पर। आज वही बीजेपी यू टर्न करती हुई नजर आ रही है। उसके बाद और भी विरोध सामने आए हैं कि भाई आप लायबिलिटी का कैपिंग कैसे कर सकते हैं और यह कैपिंग तो बहुत ही कम है 410 मिलियन यानी कि लगभग 3000 करोड़ की और मनीष तिवारी ने तो यह भी एग्जांपल दिया कि जब भोपाल की गैस त्रासदी हुई थी 15 साल पहले तो तब आपने कंपनसेशन

2:28 कितना दिया था? जो लायबिलिटी सेट हुई थी वो 470 मिलियन की थी। तो ये तो बहुत ही एक छोटा अमाउंट है। 10,000 करोड़ तक होना चाहिए। ऐसा उन्होंने सजेस्ट किया। फिर उन्होंने कहा कि ये लायबिलिटी और कई पार्टीज ने इसको कहा कि लायबिलिटी कैप को बढ़ा देना चाहिए। फिर उन्होंने कांग्रेस के शशि थरूर ने तो यह भी कहा कि ये बहुत ही खतरनाक बिल है और इसको स्टैंडिंग कमेटी में या जेपीसी में तुरंत भेजा जाए। एनसीपी के सुप्रिया सूले ने भी यही कहा कि भाई ये जो मैजिक नंबर जो है 3000 करोड़ का आखिर उसको किस तरीके से कैलकुलेट किया गया है तो आखिर ये सपना क्या है? ये जो शांति बिल है मोदी जी की जो नए परमाणु ऊर्जा बिल की पहली बात तो जरूरत क्या थी? एटॉमिक एनर्जी एक्ट जो 1962 का है और 2010 का जो डैमेज

3:15 लायबिलिटीज जो लायबिलिटीज डैमेज लॉ था उसको भी निरस्त कर दिया गया है। बिल्कुल जैसे कि मनरेगा का कानून निरस्त करके और अब हम वीबी जी राम जी बिल लेकर आ गए हैं मोदी जी। अब उसी तरीके से परमाणु के लिए एक नया अमली जामा पहनाने की मोदी जी कोशिश कर रहे हैं। ये कितनी खतरनाक बिल है। आज हमारे साथ वेटरन पॉलिटिशियन और पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा जी हैं। यशवंत जी आपका बहुत-बहुत स्वागत है और दर्शकों को बता दें अगर दर्शक भूल गए हैं कि यशवंत सिन्हा जी 2010 में लोकसभा के सदस्य थे। जिस समय मनमोहन सिंह की सरकार ने वो डैमेज लॉ पास किया और उस समय जिनज बिंदुओं पर बीजेपी ने विरोध किया था वो उसके गवाह हैं। तो आज मेरे ख्याल से यशवंत जी से

4:01 ज्यादा अच्छा इस इशू पर कोई नहीं बता पाएगा। यशवंत जी एक बार फिर से आपका बहुत-बहुत स्वागत है और पहला सवाल यही है कि ये जो शांति बिल के नाम पर मोदी जी क्या करने की कोशिश कर रहे हैं? देखिए आज मैं आज के दिन को बहुत दुर्भाग्यपूर्ण मानता हूं कि आज लोकसभा में यह शांति बिल पास हुआ और यह विडंबना आई थी इतिहास की कि जो पोजीशन बीजेपी ने 2010 में लिया था जब यूपीए की सरकार ने बिल लाया था ठीक ठीक उसके विपरीत वही बीजेपी आज वहां खड़ी है जहां कांग्रेस पार्टी

4:46 2010 में खड़ी थी और जिसका हम लोगों ने पुरजोर विरोध किया था पार्लियामेंट में और मैं जरूर उस समय की सरकार को यह धन्यवाद दूंगा कि उन्होंने हमारी बात सुनी उनकी मेजरिटी थी वो चाहते तो उस बिल को पास करा सकते थे उस मेजरिटी पर लेकिन उन्होंने लेफ्ट पार्टीज की बात सुनी उन्होंने बीजेपी की बात सुनी और फिर हमारी बात को मानते हुए उन्होंने उसमें एक लायबिलिटी क्लॉज़ लगाया कि अगर सप्लायर ऑफ इक्विपमेंट जो भारत को एटॉमिक एनर्जी इक्विपमेंट सप्लाई करेगा अगर उस इक्विपमेंट में कोई खोट निकला जिसकी वजह से कोई एक्सीडेंट होता है तो ऑपरेटर के साथसाथ सप्लायर की

5:33 भी जिम्मेदारी होगी। ये इन ए नटशेल प्रावधान था। तो और हम लोग चर्नोबिल को नहीं भूले थे। हम लोग फकुशिमा को नहीं भूले थे। हम लोग भोपाल को नहीं भूले थे। और इसलिए यह प्रावधान किया गया हम ही लोगों के जोर देने से कि भाई कंपनसेशन पक्का होना चाहिए और उसके लिए कानून में प्रावधान होना चाहिए। आज उसको हमारी ही सरकार बीजेपी की सरकार ने बिल्कुल उल्टा पोजीशन लेते हुए पूरी तरह से बदल दिया। और एक सपना दिखा रहे हैं 100 गीगावाट हो जाएगा। क्यों नहीं 200गाट 2047 तक 20 77 तक 500 गीगावाट कुछ कर

6:21 दीजिए। कोई एक फिगर लेके बता दीजिए देश की जनता क्या कितने लोग हैं जो जीगावाट जानते हैं? तो कोई भी बात सपना दिखा के और लोगों को वर्तमान में बेवकूफ बनाइए। मैं मानता हूं कि यह इतना इंपॉर्टेंट बिल था कि इसको हरी में जल्दबाजी में पास कराने की कोई आवश्यकता नहीं थी। इसको स्टैंडिंग कमेट को रेफर करना चाहिए था। इसके लिए हो सकता है स्टैंडिंग कमेट नहीं तो एक स्पेशल जेपीसी इसके लिए बनती जॉइंट पार्लियामेंट्री कमेट जो देखती है इस बिल को और छ महीने का डिले हो जाता। अगर इसी को हम लोग उनके सुझाव के साथ मानसून सेशन में पास करते तो कोई आफत इस मुल्क के ऊपर नहीं आ जाती। लेकिन इतनी

7:07 जल्दीबाजी जो सरकार दिखा रही है उसके पीछे भी जरूर कोई राज है। अब वो राज बहुत ज्यादा मुश्किल नहीं है पता कर लेना कि राज क्या है। बाहरी ताकतें जो है उन्होंने हिंदुस्तान पर हर मौके पर दबाव बनाया है। मुझे कोई आश्चर्य नहीं होगा कि अमेरिका की कंपनियों का इसके ऊपर बहुत दबाव है। अमेरिका के साथ हमारे रिश्ते आप जान रहे हैं कि बहुत अच्छे नहीं चल रहे हैं। आज के दिन और हो सकता है मोदी सरकार ने यह सोचा हो कि लायबिलिटी लॉ चेंज कर देंगे नया लॉ लाएंगे तो शायद हमारे मालिक जो अमेरिका में बैठे हैं वो खुश हो जाएंगे और फिर हमारे सहयोगी जो कॉरपोरेट्स है यहां पर जिन्होंने ऑलरेडी इसमें रुचि दिखाई हुई है

7:55 उनको ये मौका मिल जाएगा कि वो इस क्षेत्र में आ जाएंगे और मोनोपोली खत्म हो जाएगी जो पब्लिक सेक्टर की है। मेरा यह कहना है कि यह जो ₹000 करोड़ का लायबिलिटी फिक्स किया है। नंबर दो कोर्ट्स के बदले अब स्पेशल ट्राइबनल के हाथ में सारा अधिकार होगा। नंबर तीन फॉरेन सप्लायर जो है वो उसको मुक्त कर दिया गया है किसी लायबिलिटी से। यह सब जो है यह फॉरेन सप्लायर को खुश करने के लिए यह कोशिश है और मैं आज के दिन भी इसका घोर विरोध करता हूं। मुझे जब पहले पता चला नीलू जी कि इस तरह का कानून लाने के बारे में सरकार सोच

8:41 रही है तो मुझे वो डेट भी याद है कि मैंने 21 फरवरी इसी साल 21 फरवरी को एक ट्वीट किया था जिसमें मैंने कहा कि इससे ज्यादा एंटीनेशनल कुछ हो ही नहीं सकता। लेकिन आज ये लोकसभा से पास हो गया। सिन्हा साहब आपने एक बात कही कि यह सरकार कुछ ज्यादा ही जल्दबाजी में लग रही है। उसका कारण आपको क्या लगता है और प्राइवेट सेक्टर का पार्टिसिपेशन अभी कुछ देर पहले अडानी ने कहा कि भाई उनकी मंशा है कि वो न्यूक्लियर एनर्जी सेक्टर में आए। प्रधानमंत्री एक किसी इवेंट में इसका अनाउंसमेंट करते हैं और फिर अचानक से पता चलता है कि विंटर सेशन में इस कानून को लाया जा रहा है। बिल लाई जा रही है। तो ये क्या एक पैटर्न है? ने बड़ी सोची समझी एक रणनीति के तहत अडानी को न्यूक्लियर एनर्जी

9:27 सेक्टर में घुसाने की कोशिश है। आप बिल्कुल सही फरमा रहे हैं और मुझे खुद इसमें कोई शक नहीं है कि कुछ कॉर्पोरेट घरानों को खुश करने के लिए इतनी जल्दीबाजी में यह बिल लाया गया और इसको पास किया गया। आफ्टर ऑल आप देखिए कि यह बिल जो था ये 2010 में पास हुआ था। 2014 में मोदी जी प्रधानमंत्री बने। 11 साल हो गए। 11 साल में कोई जल्दीबाजी उन्होंने नहीं दिखाई। कोई उनको सपना नहीं आया कि 100 गीगावाट हमको 2047 तक इसको करना है न्यूक्लियर एनर्जी को। कहीं कोई कुछ नहीं। सब कुछ स्तब्ध शांति में गुजर रहा था। और

10:15 अचानक एक दिन उनको सपना आया। भगवान शंकर अपीयर हुए। उनके सपने में उन्होंने कहा मेरे शिष्य जल्दी से तुम यह काम करो। इससे अडानी को फायदा होगा। इससे अंबानी को फायदा होगा। इससे इसको फायदा होगा। इससे अमेरिका को फायदा होगा। डोनल्ड ट्रंप को तुम खुश कर सकते हो। तो जल्दी से ये कदम उठाओ। और इसीलिए उन्हें इतनी जल्दी जल्दी में ये कदम उठाया कि बिल बना, कैबिनेट से पास हुआ, पार्लियामेंट में आया और फटाफट लोकसभा से पास हो गया। और कहीं कोई विलंब नहीं, कुछ नहीं। किसी बात की कोई चिंता नहीं है। हमारे पास मेजरिटी है। हम उसमें मेजरिटी का दुरुपयोग करेंगे और लोकसभा, राज्यसभा कोई भी हो उसको रदते हुए हम आगे बढ़ जाएंगे।

11:01 लेकिन यह बिल एक ऐसे समय में भी पास हुआ है जब अभी भारत और अमेरिका के बीच में जो टेरिफ डील है वो अभी फाइनल नहीं हुई है। और मैं एक जगह पढ़ रही थी कि 2015 में तो मोदी जी ने अमेरिकी सरकार को अमेरिकी प्रशासन को खुश करने के लिए खुद ही ऑफर किया था कि भाई ये जो हमारा 2010 वाला जो न्यूक्लियर लॉ जो मनमोहन सिंह जी लाए थे उसमें हम आपको रिलैक्सेशन दे देंगे। उस समय अमेरिका को खुश करने के लिए। अब ऐसा लग रहा है कि भारत की सरकार बिल्कुल ही लेट गई है अमेरिका के आगे और उन्होंने कहा है कि आओ आप हमारे लोगों को मार भी डालो कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन आप यहां से पैसे कमाओ और फना में फंडिंग दो। ये आपको लगता है कि अमेरिकी दबाव के चलते मोदी जी ने इस इस बिल को पास करने की इतनी जल्दी की है। एक ये भी कारण हो सकता है? बिल्कुल हो सकता है। बिल्कुल हो सकता है

11:48 कि अमेरिका को और डोन्ड ट्रंप को खुश करने के लिए यह बिल इतनी जल्दबाजी में पास किया जा रहा है इंडियन पार्लियामेंट के द्वारा और कानून बनाया जा रहा है। इसमें कहीं कोई शक नहीं है और साथ में एक एडिशनल इसमें फायदा जो है वो यह है कि इस सरकार के जो कॉर्पोरेट मित्र हैं उनको भी इसमें बहुत फायदा होने जा रहा है। वह चाहते हैं कि यह सेक्टर खुले जो पब्लिक सेक्टर की मोनोपोली रही है क्योंकि यह बहुत ही जटिल एक क्षेत्र है न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी का न्यूक्लियर एनर्जी का तो इसीलिए इन सबको खुश करने के लिए मोदी जी इतनी जल्दीबाजी दिखा रहे हैं। लेकिन इसमें जिस तरीके की दलीलें जो बीजेपी की सरकार देने की कोशिश कर रही है

12:34 कि देखिए इसमें फॉरेन फंडिंग आ जाएगी। हम एक नया सपना लोगों के लिए बुनने की कोशिश कर रहे हैं। मोनोपोली खत्म हो जाएगी। हम तो देखिए रेगुलेटरी सिस्टम को एकदम पुख्ता कर देंगे। तो रेगुलेटरी सिस्टम के नाम पर तो ऑलरेडी हमारे पास एक एटॉमिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड था एईआरबी का। तो अब ये नए रेगुलेटरी फ्रेमवर्क में जब शुरुआत होगी तो क्या एईआरबी बिल्कुल डिफंक्ट हो जाएगी? क्या होगा एईआरबी? हां एआरबी डिफंक्ट हो जाएगी। सरकार का रोल घट जाएगा। एक इंडिपेंडेंट रेगुलेटर आ जाएगा। अब वो इस सरकार के के श पर प्राइवेट सेक्टर को एनकरेज करेगा। ये बार-बार जो मोनोपोली की बात ये लोग कर रहे हैं। मोनोपोली किसकी है? ये मोनोपोली तो पब्लिक सेक्टर की है ना। एक सोची समझी

13:24 रणनीति और पॉलिसी के अंतर्गत ये मोनोपोली जानबूझ के पब्लिक सेक्टर को दिया गया। क्योंकि मैं बार-बार दोहरा रहा हूं कि न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी का जो फील्ड है वो बहुत ही एक मुश्किल फील्ड है। यह नहीं है कि साइकिल पंक्चर रिपेयर करने वालों की दुकान है कि जिसको चाहो उसको दे दो कि वो दुकान खोलने और चलाने लगे। इस तरह आप न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी फील्ड को नहीं ट्रीट कर सकते हैं। ये बहुत ही कॉम्प्लेक्स फील्ड है और इसमें जब तक पूरी सावधानी नहीं बरती जाएगी तब तक चर्नोबिल होगा, फुकुशिमा होगा, भोपाल होगा, हजारों हजार लोग मारे जाएंगे। जनरेशंस जो है पीढ़ियां दर पीढ़ियां बर्बाद हो जाती है एक न्यूक्लियर

14:10 एक्सीडेंट के चलते वो थोड़ी है कि हजार लोग मर गए तो काम खत्म हो गया नहीं वो जो रेडियो एक्टिव सब्सटेंसेस आती है एटमॉस्फेयर में वो जनरेशन आउट जनरेशन को प्रभावित करती है ये सब बात क्या सरकार नहीं जानती है सरकार में बैठे लोग नहीं जानते हैं इतनी जल्दबाजी किस बात की क्यों अमेरिका डोन्ड ट्रंप यशवंत जी एक चीज और मैं आपसे ये पूछना चाह रही थी सर कि इतना बड़ा खतरा है जिस तरीके से प्राइवेट प्लेयर्स को ये खोला जा रहा है ये कहा जा रहा है कि रेगुलेटरी मैकेनिज्म सही होगा दुरुस्त होगा ट्राइबनल्स खुलेंगे तो इसका मतलब ये है कि अगर पूरा मैकेनिज्म इस तरीके से दुरुस्त किया जाएगा तो फिर क्या अब गलीगली मोहल्ले मोहल्ले में आपको इसी

14:57 तरीके से न्यूक्लियर पावर प्लांट्स दिखेंगे और जो WhatsApp चलाने वाली जो ये सरकार है क्या न्यूक्लियर एनर्जी जी का इतना बड़ा कार्यक्रम चला सकती है और आपने देखा है कि किस तरीके से गलतियां करती है यह सरकार और किसी भी विश्व के देश में अभी भी न्यूक्लियर एनर्जी का जो सेक्टर है प्राइवेट पार्टीज को नहीं दिया गया लेकिन मोदी जी को किसने एडवाइस किया कि इतनी खतरनाक चीज को लेकर आप प्राइवेट पार्टीज को दे दे। ऑब्वियसली प्राइवेट पार्टीज ने किया। आप जानते हैं कि इंडियन कॉर्पोरेट सेक्टर में उनके कितने खास मित्र हैं। उन मित्रों ने उनसे कहा भैया हमारे लिए खोल दो। उन्होंने कहा कि चलो एक पंथ दो काज इनको ही फायदा हो जाएगा। इनके लिए हम ये रिजर्व जो है क्षेत्र उसको खोल देंगे और दूसरा हमारा

15:45 बॉस जो है ट्रंप डोनल्ड ट्रंप अमेरिका में बैठा हुआ वो भी खुश हो जाएगा कि इतनी बड़ी लायबिलिटी लॉ जिसको इतने सोच विचार के बाद इंडियन पार्लियामेंट ने 2010 में मिलजुलकर पास किया। हम लोग तो विपक्ष में थे। लेकिन उस समय सरकार ने हमारी बात सुनी और इस लायबिलिटी लॉ को पास किया। हम लोगों की मदद से पास किया। हम लोगों के विचारों को जोड़ते हुए पास किया। उस लायबिलिटी लॉ को उन्होंने जो नेशनल कंसेंस पर आधारित था उसको इन्होंने आननफानन में बदल दिया। किस लिए? जैसा मैंने कहा एक पंथ दो का आज अमेरिका

16:31 भी खुश होगा और हमारे कॉर्पोरेट मित्र भी खुश होंगे। 11 साल से मोदी जी प्रधानमंत्री हैं। 100 गीगावाट 2047 तक उनको अभी तक नजर नहीं आया था। और अब जब नजर आया तो इतनी जल्दीबाजी में इसको पास करा रहे हैं जैसे कि 2047 कल ही आने वाला है और वो दो दो महीने पांच महीने छ महीने इंतजार नहीं कर सकते हैं कि ये जाए पूरा बिल स्टैंडिंग कमेट को वहां से डेलीबरेशन के पास विचार के बाद लौट कर आए और तब पार्लियामेंट के में पास हो ये तो प्रक्रिया है ना लेकिन ये सरकार किसी प्रक्रिया में पार्लियामेंट्री प्रोसीजर में प्रेसिडेंट में किसी चीज में विश्वास ही नहीं करती है। यह अपनी मनमर्जी करती है

17:18 और मनमर्जी करने में सर भारत देश को बहुत नुकसान हो रहा है। मैं तो आज हाथ जोड़कर ईश्वर से प्रार्थना करता हूं नीलू जी कि अगर ये कानून बन जाए और प्राइवेट सेक्टर आ जाए न्यूक्लियर एनर्जी फील्ड में तो कम से कम कोई एक्सीडेंट नहीं हो। भगवान हमको बचाए। बिल्कुल बिल्कुल नहीं आप सही कह रहे हैं और सर लेकिन ये जो बिल लाने का तरीका हो गया है अब आप यह देखिए कि जो ये वीबी जी राम जी बिल जो था मनरेगा की जगह जो बिल आया जेडीयू और चंद्रबाबू नायडू की पार्टी ने एक रत्ती उस बिल को अपोज नहीं किया। उसी तरीके से आज का बिल आप देख लीजिए। पूरा अपोजिशन वॉकआउ कर गया और बाकी जितने जो मोदी जी के साथ ढोल बजाने वाले लोग हैं सब ने इसको आंख बंद करके पास कर दिया। आखिर यह जो बिल चोरी से अब बिल लाए जा रहे

18:05 हैं। ओम बिरला जी अपना दिमाग इस्तेमाल ही नहीं कर रहे हैं। और यह जो इस तरीके से बिल लाया जा रहा है। अब अपोजिशन के तो विरोध का मतलब भी बिल्कुल निरर्थक हो चुका है। ऐसा लग रहा है। अब इसी तरीके से आगे आने वाले दिनों में इसी तरीके से बिल पास होंगे। खतरनाक से खतरनाक बिल पास कर संसदीय लोकतंत्र का अब इस देश में कोई मतलब नहीं रहा। लोकशाही का मतलब होता है आम सहमति बनाना और आम सहमति के आधार पर कोई भी काम करना। यह सरकार मेजॉरिटेरियन प्रिंसिपल में विश्वास करती है। हमारे पास मेजॉरिटी है। उस मेजॉरिटी का दुरुपयोग करके हम कुछ भी कर सकते हैं। और बेचारा विपक्ष क्या करें?

18:50 तो वर्कउ कर जाते हैं। मुझे तो लगता है कि ऐसा करने के बजाय उनको एक सीख लेनी चाहिए। बीजेपी ने जो किया जब हम विपक्ष में थे कि अगर कोई बात सरकार नहीं सुन रही है तो हम पार्लियामेंट नहीं चलने देंगे। वॉकआउ करना सबसे कमजोर तरीका है विरोध का पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी में। इस पर विपक्ष को गंभीरता से विचार करना चाहिए कि उनका क्या रुख होगा। यह सेशन तो खत्म हो रहा है लेकिन आने वाले बजट सेशन में या उसके बाद के सेशन में बैठकर विचार करना चाहिए विपक्ष को कि हमको क्या करना चाहिए और यह बनाना बताना कि इससे बड़ा नुकसान हो जाता है। देश की जनता इसको नहीं चाहती है।

19:36 यह बिल्कुल गलत है। देश की जनता चाहती है कि जो विपक्षी पार्टियां हैं वो पार्लियामेंट में अपनी भूमिका निभाएं। लेकिन यशवंत जी आपसे दो तीन सवाल बस करूंगी। भी चलते चलते जो खतरे हैं इस बिल के परमाणु एनर्जी के नाम पर मोदी जी एक ऐसी कहानी पूरे देश को बेचने जा रहे हैं जिससे कि लोग ताली बजाने लगेंगे जैसे कि जंगल में जितने जानवर होते हैं एक साथ ताली बजाने लगते हैं या चिल्लाने लगते हैं। उसी तरीके से अब दिख रहा है कि एक इतना खतरनाक बिल पूरे देश के सामने लाकर मोदी जी ने खड़ा कर दिया है। लेकिन यह कहा जा रहा है कि अरे वाह यह तो वही संजीवनी बूटी है जो देश को चाहिए थी और केवल मोदी जी ही दे सकते हैं। इसके अलावा और किसी ने नहीं दी और जो पहले के प्रधानमंत्री थे वह सारे मूर्ख थे। उसको उनके सारे कामों को निरस्त भी कर दिया गया।

20:22 उसमें अटल बिहारी वाजपेयी भी थे। उन मूर्ख प्रधानमंत्रियों में अटल बिहारी वाजपेई भी थे जिन्होंने सरकार में रहते हुए बहुत गलतियां की और उसके बाद जब 2010 में हम लोगों ने इस बिल का लायबिलिटी बिल का विरोध किया था तो उस समय अटल जी ना केवल जीवित थे बल्कि हम सब लोगों को गाइड भी कर रहे थे। तो इसलिए सब लोग जो है जिसमें कि कांग्रेस को छोड़ दीजिए, लेफ्ट को छोड़ दीजिए, टीएमसी फलाना ढकना सब कुछ छोड़ दीजिए। मोदी जी जो कर रहे हैं वो यह कर रहे हैं कि पहले की जो बीजेपी थी वो मूर्खों की पार्टी थी। अब बीजेपी अकलमंदों की पार्टी हो गई है। और अब हम देखो कितना बढ़िया काम कर रहे हैं। और मोदी जी को 11 साल लगा। 11 साल लगा

21:11 इस निष्कर्ष पर पहुंचने में कि एनर्जी न्यूक्लियर एनर्जी का को बढ़ावा देना चाहिए और 2000 47 तक हम लोगों को 100 गीगावाट न्यूक्लियर एनर्जी चाहिए। ये उनको 11 साल लगा। लेकिन ये न्यूक्लियर एनर्जी कोई खिलौना है क्या? मोदी जी तो इसको ऐसा खिलौना समझ रहे हैं कि अरे आके बच्चे ने जिद किया कि मम्मी मुझे एक खिलौना दे दो। अडानी ने आके ऐसा लग रहा है कि मोदी जी से कहा कि अरे भाई हमें ये खिलौना चाहिए। हमने देखिए ग्रीन एनर्जी में तो इस खेल को खेल ही लिया है। अब न्यूक्लियर एनर्जी में भी हमें एंट्री दे दीजिए। बिल्कुल ऐसे ही लग रहा है सर। ऐसे ही है। ऐसे ही होता ही है सब चीज। सब बातों में ऐसा ही होता है। हमको किसी ने कहा कि इनके जो कॉरपोरेट मित्र हैं वो

21:59 पहले पीएमओ में जाकर पॉलिसी बदलवाते हैं कि भाई अभी जो पॉलिसी है उसमें तो हम नहीं कुछ कर सकते हैं। पॉलिसी बदलो और इस तरह बदलो और तब हम देखो क्या खेल करके दिखाते हैं। तो इसके बहुत सारे उदाहरण पूर्व में भी हैं। और आप एक बार फिर हमारे सामने एक उदाहरण आ गया कि कॉर्पोरेट के दबाव में उन्होंने कहा चलो भाई खोल दो इसको और फिर जहां तक इस देश की जनता का सवाल है तो उसको वो सपने दिखाते रहेंगे सपने दूर के होंगे 2047 के होंगे 2077 के होंगे आज के नहीं होंगे कि कल ये होने वाला है नहीं 25 साल के बाद होगा 50 साल के बाद होगा और जैसा आपने कहा WhatsApp यूनिवर्सिटी और

22:46 भक्त मंडली जो है वो जाके जनता को समझाती है बेवकूफ बनाती है। तो यह देश जो है पता नहीं कहां जा रहा है। मैं तो बहुत दिनों से इसको देख रहा हूं कई कैपेसिटीज में। आज मैं एक बहुत ही उदास इंसान हूं। इसलिए कि देश जिस दिशा में जा रहा है वह मुझे सही नहीं लगता है। और न्यूक्लियर रिलायबिलिटी वाला एक दूसरा उदाहरण है। एक और उदाहरण है इसी का। इसी से जुड़ा हुआ सर मेरा आखिरी सवाल है आपसे कि आपने खुद कहा कि भाई अब एक्सीडेंट्स ही एक्सीडेंट्स होंगे। जब बिल्कुल ठीक है रेगुलेटरी मैकेनिज्म तो बना दिया उन्होंने। एक मैकेनिज्म चुनाव आयोग का भी है। हर संस्था को आप देख लीजिए

23:32 किस तरीके से चल रही है। टीआरएआई की हालत क्या है? और रेगुलेटरी बॉडीज बिल्कुल डिफंक हो चुकी है। कोई काम नहीं कर रहा है। अब ये एक और रेगुलेटरी बॉडी और रेगुलेटरी फ्रेमवर्क की बात कर रहे हैं। तो सवाल ये उठता है कि क्या अब एक्सीडेंट्स होंगे? जान लोगों की जाएगी? मोदी जी को ऐसा लग रहा है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उन्होंने शांति बिल लाके बिल्कुल एक तरीके से अपना सपना पूरा कर लिया है। तो क्या देश में एक जलजले की तैयारी मोदी जी करने जा रहे हैं? देखिए मैंने तो हाथ जोड़कर आपसे पहले भी कहा था कि मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि ईश्वर इस देश के लोगों की रक्षा करें आने वाले दिनों में। लेकिन जिस रास्ते पर हम चल पड़े हैं और जिस तरह का यह कानून पास हो रहा है उससे तो हम खुली

24:17 छूट दे रहे हैं कि तुम असावधानी बरतो। हम तुमको बिल्कुल परेशान नहीं करेंगे। उस असावधानी के चलते अगर दुर्घटनाएं घटती है तो वो घटे। लोग मरते हैं तो वो मरे। पीढ़ियां दर पीढ़ियां बर्बाद होती है तो वो बर्बाद हो जाए। लेकिन हमको कोई फर्क नहीं पड़ेगा और हम यह सुनिश्चित करेंगे कि तुमको भी कोई फर्क नहीं पड़े। तो यह तो है लेकिन हम क्या कर सकते हैं? हम प्रार्थना ही कर सकते हैं ईश्वर से कि भाई वो दिन भारत को देखना नहीं पड़े और जो भी ये कमजोर मजबूत बेकार रेगुलेटरी बॉडी बने वो इस बात को इंश्योर करे कि सुरक्षा को सारे कदम उठाए जाए। लेकिन मुझे लगता है कि ये

25:03 होना मुश्किल होगा। आपने इस इंटरव्यू में एक बात कही जो मेरे बिल्कुल दिमाग में बैठी। आपने कहा कि मोदी और शाह साहब केवल पानी पूरी बेचने लायक है। लेकिन एक इतना इंपॉर्टेंट सेक्टर अगर उनको दे दिया गया है। इन लोगों को क्या न्यूक्लियर एनर्जी का एन भी समझ में आता है? नहीं आता है। मुझे नहीं लगता है। जिस तरह ये बिल पास हुआ है या बनाया गया है। मुझे नहीं लगता है कि इनको समझ में आता है। क्या? यह केवल सुनते हैं उन लोगों की बात जो इनके लिए बहुत महत्वपूर्ण है। चाहे अमेरिका में बैठे हुए या यहां मुंबई में बैठे हुए ऐसे लोगों की ही बात ये लोग सुनते हैं। आम लोगों की बात नहीं सुनते हैं। मेंबर्स ऑफ पार्लियामेंट की बात नहीं सुनते हैं। और

25:48 पूरी बीजेपी जो है भारतीय जनता पार्टी आज के दिन वो गुलामों की पार्टी बन के रह गई है। कोई आवाज उठाएगा नहीं। बिल्कुल बिल्कुल चलिए बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है जिस तरीके से इस बिल को पास किया गया है। अब आपने सही कहा कि केवल प्रार्थना ही कर सकते हैं कि इस देश के सामने कोई ऐसी बड़ी दुर्घटना ना आ जाए जो हम लोगों ने भोपाल गैस त्रासदी के केस में देखी थी। आपका बहुत-बहुत शुक्रिया यश जी। थैंक यू सो मच फॉर जॉइनिंग। थैंक यू।

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