Brief Summary
This video provides a roadmap for starting and progressing on a spiritual journey. It emphasizes that devotion and connecting with the divine are more important than outward appearances or strict renunciations. Key points include:
- Even those with past misdeeds can be considered righteous through devotion.
- Connecting with God can be done while fulfilling worldly duties.
- True joy and freedom from fear come from inner connection, not external pleasures.
The video addresses viewers interested in starting a spiritual journey and seeks to provide a roadmap for them. It assures that anyone, regardless of their past, can begin and progress on this path. The core message is about finding a way to connect with the divine while living a normal life.
The speaker quotes scriptures emphasizing that even a person with a questionable past is considered a saint if they devote themselves to God. It highlights the transformative power of surrendering to a higher power and chanting the divine name. Even if the world judges you, God sees you as pure if you are devoted.
The video explains that one doesn't need to renounce their family or responsibilities to connect with God. Instead, one should maintain those relationships but dedicate a portion of their heart and mind to the divine. It uses the analogy of a rope made of many threads, where one thread is dedicated to God while the others remain connected to worldly affairs.
The speaker describes the state of being that arises from connecting with God: equanimity, freedom from joy and sorrow, and fearlessness. Such a person becomes dear to God, who cherishes them always. This connection brings a joy that surpasses any worldly pleasure.
The video clarifies that one doesn't need to change their appearance or renounce the world to be spiritual. It emphasizes that one can attain the highest spiritual state while living within their family and fulfilling their duties. The key is to constantly remember God while performing one's actions, as Lord Krishna advised Arjuna.
The speaker avoids describing the specific experiences that come with spiritual practice, as these are personal and can be diminished by being spoken about. Instead, he encourages viewers to try it for themselves. He suggests that if worldly pleasures have proven fleeting, then trying a spiritual path is a worthwhile experiment with nothing to lose.
The video concludes by encouraging viewers to incorporate positive changes into their lives, inspired by the discussion. This includes adopting practices that resonate with them and letting go of those that don't. By creating a routine and moving forward with awareness, significant positive changes can be achieved.
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Transcript
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0:00 आज के टाइम में अगर कोई एक एक जो जो भी लोग हमें देख रहे हैं हमारे ऑडियंस ठीक है यह ना अध्यात्म की तरफ अपना जाना चाहते हैं एक जर्नी की शुरुआत करना चाहते हैं ठीक है तो आप इनके लिए क्या रोड मैप देंगे जिसके जरिए ये अपनी अध्यात्म की जर्नी को बहुत अच्छे से शुरू कर सकते हैं और चल सकते हैं उस पाथ पर भगवान कहते हैं कि अपीि चेतस दुराचारो भजते मामन्य भाव साधु रेवस मंतव्यम सम्यगव्य वसितोष के अपिचेत सु दुराचार चारों कि चाहे तू कितना दुराचारी क्यों ना हो अगर तू मेरे परायण हो जाता है और मेरा नाम लेना शुरू कर देता है तो साधु रेव सम मंतव्यम तो तू तुझे मैं साधु ही कहूंगा साधु ही गिनूंगा भले ही संसार तुझे कुछ भी कह रहा हो लेकिन मेरी दृष्टि में तू साधु ही है जो नर हो चराचर
0:46 द्रोही आवे सब शरण तकि मोहि तज मद मोह कपट छलना करहु सद्य तेह साधु समाना कि जो बहुत ज्यादा द्रोही भी होता है वो सब यानी कि उसे भय लगा कि मेरा जीवन खराब हो रहा है मेरा जीवन नष्ट हो रहा है। अब तक मैंने जीवन में क्या किया? इस तरीके का भय उसके अंदर आया और वह मेरे परायण हो जाता है। मेरा नाम लेना शुरू कर देता है। तो मैं उसे कर हूं सद तेह साधु समाना उसे साधु की तरह कर देता हूं। जननी जनक बंधु सुतदारा तनु धनु भवन सुदय परिवारा सबके ममता ताग बटोरी मम पद मन ही बांधी बरु डोरी कि जो तेरी जो जो तेरे भाव अलग-अलग जगहों पर जुड़े हुए हैं घर में जुड़ गए बच्चे में जुड़ गए माता में जुड़ गए पिता में जुड़ गए और बहुत सारे संबंधों में जुड़ गए तू
1:33 वहां पर इनको जोड़े रख तो एक काम कर कि जैसे एक डोरी होती है एक डोरी किसी एक मैं डोरी अभी अपने पैर में बांध देता हूं और उसका एक धागा निकाल लेता हूं। यानी कि उसमें बहुत सारे धागों से मिलकर के एक डोरी बनी है। उसका एक धागा निकाल ले। और वह तू मेरे पैर में बांध दे। है ना? तो सब कहत ममता ताग बटोरी। मम पद मन ही बांध बरु डोरी। समदर्शी इच्छा कछु नाही कि वह समदर्शी हो जाएगा। यानी कि तू अगर दूसरे विषयों से जुड़ा हुआ भी अपने भाव को मेरे में जोड़कर के उन कामों को करेगा तो तू समदर्शी हो जाएगा। समदर्शी इच्छा कछु नाही हर्ष शोक भय नहीं मन माही तो मैं तेरी अवस्था क्या कर दूंगा ना हर्ष ना शोक ना भय हर भय से तुझे मुक्त कर दूंगा समदर्शी इच्छा कछु नाही हर्ष शोक
2:20 भय नहीं मन माही अस सज्जन मम उर्व बस कैसे लोभी हृदय बसई धनु जैसे कि ऐसे जो सज्जन पुरुष होते हैं जो अपने सारे कामों को करते हुए भी मन को मुझ में लगा करके रख सक रखते हैं। जिस तरीके से लोभी व्यक्ति धन के प्रति उसकी रुचि रहती है। इसी प्रकार से मैं उनको अपने हृदय से लगा करके रखता हूं। मैं उन्हें क्षण भर के लिए भी अपने से दूर नहीं कर पाता। इससे सुंदर तो मुझे नहीं लगता। कुछ हो सकता है। यानी कि कोई असुविधा है ही नहीं। हम कोई ये नहीं है कि ये बहुत बड़ी गलत अवधारणा है कि योगी बनना है तो भाई ऐसे ही कपड़े पहनने पड़ेंगे। हमें ऐसा अच्छा लग रहा है हम ऐसे पहन रहे हैं। लेकिन अमित जी भी बिल्कुल उसी स्टेट ऑफ माइंड में रह सकते हैं जिस स्टेट ऑफ माइंड में मैं हूं या मेरे से बहुत आगे भी जा सकते हैं। ये काम ये बात से कोई प्रभाव नहीं पड़ता। आप अपने परिवार में रहते हुए
3:05 और सब कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए भी बहुत उच्चतम अवस्था ये नहीं कहूंगा कि यहां तक पहुंच सकते हो। जो ऊंची से ऊंची अवस्था हो सकती है वहां तक पहुंच सकते हो। लेकिन वही कि करते रहो। अर्जुन से भी भगवान यही कहते हैं कि तस्मात सर्वेशु कालेशु मा मनु स्मर युद्ध कि तू युद्ध भी करता रहे लेकिन मन को निरंतर मुझ में लगाए रख बस इतना करना है अमित जी कोई बहुत बड़ी बात नहीं कहीं छोड़ के नहीं जाना है कर्तव्यों से नहीं भागना है कोई वस्त्र नहीं बदलने है कहीं तीर्थों में जाकर के रहोगे तभी कल्याण होगा ऐसा कुछ नहीं है बस उस मालिक से अपने मन को जोड़ करके अपने कर्मों को करो और आप देखेंगे कि ऐसा अद्भुत आनंद आएगा ना जीवन में कि देखो अगर मैं वही बात आ जाती है कि मैं अगर अगर शब्दों से आपको व्यक्त करूं कि आपका जीवन ऐसा हो जाएगा, ऐसा हो जाएगा तो आपको लगेगा कि सुनी-सुनाई बातें हैं। ऐसे ही बोल रहे
3:51 हैं। मैं इसीलिए इस विषय पर बात भी नहीं करता हूं। अपनी साधना और अपने मनोभाव को गोपनीय रखा जाता है। योग मार्ग में इनको उजागर नहीं करना होता है। उससे हमारी ही जो ऊर्जा है और जो हमारे पुण्य है वो क्षय होते हैं। तो हम इस विषय पर नहीं कहेंगे कि हमें ऐसा लग गया। आप खुद करके देख लो। हम अगर हमारे कहने से आपने सब चीजों में सुख देख लिया कि चलो इस गाड़ी में सुख होगा। लेकर के आए घटा घटा घटा घटा थोड़े दिन में समाप्त फोन भी होगा घटा घटा सब सब जगह आपने देख ली है तो अब एक बार हमारे कहने से स्मारक पे भी चल के देख लो तो अगर मिल जाए तो अच्छा ही है ना और अगर नहीं मिले तो फिर आपका कुछ जा तो नहीं रहा है लेकिन हां मैं कहता हूं कि ये जो चीजें हमने अभी सारी बात की है ना ये बातें बातें ना रह जाए ये लोगों के जीवन में आ जाए तो हमारी बात करनी और हमारी जो ऊर्जा लगानी है ये कहीं ना कहीं सार्थक हो जाए
4:38 हम तो हमने ऐसे भी कोशिश की कि हम व्यवहारिक तल पर भी बताएं ऐसे आप अपने जीवन में ला सकते हैं चीजों को और कुछ चीजों के लिए हमने अवेयर किया जैसे कि मानसाहार का आपने प्रश्न किया दूसरी चीजें की और जो आपके साधना में प्रयोग होने वाली चीजें उन पे हमने बात की तो उन चीजों से समझ के इंस्पायर हो के जो चीजें आपको लगती है कि जीवन में लानी है वो दर्शक लाएं और जो चीजें लगती हैं कि छोड़नी चाहिए उन्हें छोड़ें और एक रूटीन बनाएं और फिर आगे बढ़े तो मुझे लगता है बड़े परिवर्तन हो सकते हैं। बहुत सही बहुत ही सुंदर मुझे मतलब मैं मुझे बहुत अच्छा लगा। यह फाइनल पार्ट तो मुझे और भी ज्यादा