क्या लोकतंत्र के चारों खम्भों को जानबूझकर बर्बाद किया जा रहा है? Raju Parulekar on Indian Democracy

Brief Summary

This video discusses the current state of democracy in India, highlighting the concerns raised by the opposition about the threat to democratic values under Narendra Modi's governance. The speakers explore the erosion of democratic institutions, including the judiciary, executive, legislature, and media, and emphasize the importance of restoring accountability in these systems for a healthy democracy.

  • Democracy is seen as under threat due to the current government's actions.
  • The discussion covers the corruption in governance and the decline in public trust in institutions.

The Threat to Democracy

The video begins with the claim that democracy in India is under threat due to the manner in which Narendra Modi operates. Discussions center around why democracy is essential and what constitutes its foundation. There are concerns regarding corruption, particularly mentioning how people aim to pass exams like UPSC for corrupt practices. The narrative shifts to discuss the ideological influences on democracy, suggesting that the country has devolved into a state of chaos without meaningful checks on power.

The Role of Institutions

The speakers discuss the four pillars of democracy – judiciary, executive, legislative, and media – and illustrate how these institutions have lost their integrity. They argue that the system has largely become commercialized, where money drives the functioning of these pillars, undermining the original purpose of serving the public. The discussion also points out that the corruption within these institutions has escalated since 2014.

Experience and Corruption

The conversation continues with personal experiences regarding the UPSC examinations and how candidates often enter the civil service with ideals but succumb to corruption. The discussion highlights moral decay, suggesting that this behavior is symptomatic of a larger societal problem. The contrast between the past and present in public service is emphasized, indicating a shift towards self-serving motives.

Judiciary and Justice

Focus turns to the judicial system. The speakers express a lack of trust in the judiciary, asserting that people believe they cannot achieve justice due to the systemic corruption. They reference judicial controversies and judgments as examples of a biased system that fails to deliver justice impartially.

Media's Role in Democracy

The role of media in shaping democratic discourse is examined. The discussion labels various media outlets as compromised and suggests that they no longer fulfill their duty to inform the public accurately. The influence of government advertising on media narratives is critiqued, highlighting a significant departure from journalistic integrity.

Restoring Democracy

The need for restructuring democratic institutions is emphasized as an urgent task. The speakers argue that a complete overhaul is necessary to revive true democratic values. They discuss the importance of public activism and sensitivity towards injustices faced by various community members to restore faith in democracy.

Reflections on the Future

In conclusion, the discussion reflects on the need for the public to become more aware and involved in safeguarding democracy. The speakers urge viewers to consider their social responsibilities and the interconnectedness of various societal issues as pivotal in reinstating a more humane and sensitive approach to governance.

Summarize any YouTube video in seconds

Get summaries like this one for any video, in your language, with the free Summ app.

Download on the Apple Store
Get it on Google Play

Transcript

Full transcript of “क्या लोकतंत्र के चारों खम्भों को जानबूझकर बर्बाद किया जा रहा है? Raju Parulekar on Indian Democracy”. Click a timestamp to open the video at that moment. Need another video? Use the YouTube transcript generator.

0:00 विपक्ष का कहना है कि लोकतंत्र ख़तरे में है। नरेंद्र मोदी जिस तरह से कामकाज कर रहे हैं, तो लोकतंत्र को लेकर सवाल उठता है। डेमोक्रेसी क्यों महत्वपूर्ण है? इस पर बातचीत होती है। लेकिन आखिर यह लोकतंत्र बनता किससे है? एक्चुअली करप्शन करने के लिए यूपीएससी पास करते हैं बच्चे। तो भगत सिंह का नाम हम आदर्श सहित लेते हैं आज। वैसे कुछ साल बाद हम लोया साहब का लेंगे। हम ये कौन सा देश बनाया? नर्क बना दिया इसको। आरएसएस को जुडिशियल कैरेक्टर नहीं है। आरएसएस मैंने कहा कई बार कहा है एक अय्याशों की एक दुरदांत अपराधीरण हुई हम आतंकवादी संगठन है। पढ़ा लिखा फैसिस्ट ज्यादा डेंजरस होता है। हम अनपढ़ तो डेंजर कितना होता है ये

0:45 प्रधानमंत्री के रूप में आपने देखा क्योंकि जिन्होंने बाबरी मस्जिद को ढा वो क्राइम है। हम लेकिन उसमें कोई क्रिमिनल नहीं है। हम्म। तो यहां पर न्याय की अपेक्षा किससे करें? कौन होगा जो आपके मुद्दों को उठाएगा? कौन होगा जो आप सही है तो उसे न्याय मिलेगा? तो ऐसे में ये लोकतंत्र चलेगा कैसे? डेमोक्रेसी इज़ डेड। मोदी और शाह ने डेमोक्रेसी को खत्म कर दिया। न्याय नहीं होगा। यही डेमोक्रेसी इस डेड का लक्षण है। सीमा खन्ना पे एफआईआर तब तक नहीं होगा जब तक ये पूरा जो नेपथ्य नौटंकी चल रही है डेमोक्रेसी की मोदी शाह द्वारा उसको पूरी तरह से ध्वस्त नहीं किया जाता। ये जो फैसिज्म है फ्यू आर फैसिज्म ऑफ आरएसएस उसको पूरी तरह से डिस्मेंटल किए

1:30 बिना डेमोक्रेसी खड़ी नहीं हो सकती। तो हम कुछ भी नहीं है। विश्व गुरु तो भूल जाओ। विश्वदास भी नहीं है। विश्व हमने अपने देश को एक नर्क बना दिया। ये पुलिस और प्रशासन के 90% लोग उन पे पूरी मुकदमे चलने चाहिए। ये 12 साल में जो किया है उन्होंने उसके लिए देखिए आरएसएस का कोई ईमान नहीं है। बाबरी मस्जिद को गिराना उनके लिए एक साधन था सत्ता के तरफ पहुंचने का। सत्ता उनके लिए साधन था देश बेचने का। देश बेचना उनके लिए साधारणता यश है। राम राज्य की बात करते हैं। वो ये राम राज्य ये हराम राज्य है। धर्म के नाम पर सारा व्याभचार और ढोंग चल रहा है। ये बाबा वो बाबा यस बाबा ये सद्गुरु वो श्री श्री ये प्रेमानंद ये वो

2:16 ये कुछ नहीं है। आरएसएस की जितनी बड़ी ट्रायल हो उतनी कम है। तानाशाह हर डिसेंसिटाइज की हुई समाज की पतन की आखिरी चरण में ऐसे भजन क्लबिंग होते हैं। जितने लोगों की लिस्टें बनी हैं उतने लोगों पर कारवाई तो बननी ही है। दोस्तों नमस्कार और आप सभी का एक नए एपिसोड में बहुत-बहुत स्वागत है। मैं हूं सोहित मिश्रा। दर्शकों जब भी आप लोग मिलते हैं, बातचीत करते हैं या आपस में भी बातचीत करते हैं या हमसे भी कभी मुलाकात होती है, कहते हैं कि आप लोग लोकतंत्र बचाने के लिए अच्छा काम कर रहे हैं। लोकतंत्र को बचाना जरूरी है। यह लड़ाई लोकतंत्र की है। लेकिन इसका मतलब क्या होता है? लोकतंत्र किससे बनता है? और क्यों यह कहा जाता है कि यह लड़ाई लोकतंत्र की है? यह एक ऐसा सवाल है जो

3:02 नेता लोग भी उठाते हैं। विपक्ष का कहना है कि लोकतंत्र ख़तरे में है। नरेंद्र मोदी जिस तरह से कामकाज कर रहे हैं, तो लोकतंत्र को लेकर सवाल उठता है। डेमोक्रेसी क्यों महत्वपूर्ण है? इस पर बातचीत होती है। लेकिन आखिर यह लोकतंत्र बनता किससे है? जो चार खंभे कहाए जाते हैं लोकतंत्र के चाहे वो जुडिशरी हो, एग्जीक्यूटिव हो, लेजिसलेटिव हो या फिर चौथा खंभा मीडिया खुद को जो कहता है, सेल्फ प्रोक्लेम उसमें किस तरह से बर्बादी हुई है, जिसकी वजह से हम लोकतंत्र की बात करते हैं। इन ये जो पूरे अलग-अलग एक तरीके से जो ढांचे थे वो कैसे तहस-नहस हो रहे हैं। आज सोचा गया कि इस पर चर्चा की जाए ताकि क्लेरिटी मिले आपको भी हमें भी कि जब हम कहते हैं कि ये पूरे के पूरे इंस्टीट्यूशन एक तरीके से बिक गए हैं बर्बाद हो गए हैं उसका मतलब क्या है और ऐसी मुद्दों पर चर्चा करने के लिए और कौन

3:48 बेहतर मेहमान हो सकता है? राजू परोड़ेकर सर हमारे साथ मौजूद हैं। नमस्कार सर एक बार फिर से आपका बहुत-बहुत स्वागत है। सर जैसे आपने भी बार-बार सुना होगा कि यह लड़ाई लोकतंत्र की है। लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई है या फिर जितने भी इंस्टीटशंस हैं वो बर्बाद हो चुके हैं। जब हम ये सारी बातें करते हैं तो इसका मतलब क्या होता है? और जब हम बात करते हैं इंस्टीटशंस बर्बाद होने की तो उसमें कौन-कौन शामिल है? जैसे मीडिया की बात तो करते ही हैं गोदी मीडिया और बाकी चीजें। ऐसा क्या हो गया जिसकी वजह से लोकतंत्र के ऊपर ही पूरा खतरा हम मानते हैं कि ये सारी चीजों की वजह से आया है। देखिए मुझे ऐसा लगता है कि कंज्यूमरिज्म जो है वो हिंदुस्तान में जैसे फैलता गया उससे पहले भी था लेकिन उसके बाद बहुत ज्यादा पैमाने पर हुआ। तो एडमिनिस्ट्रेशन यानी जो स्टील फ्रेम मानी जाती थी आईएएस, आईपीएस, आईआरएस वगैरह अफसर हम

4:34 अफसरशाही, जुडिशरी हम एग्जीक्यूटिव और यानी संसद और मीडिया। ये चारों उद्देश्य से भटक गए। देखिए मनी मींस व्हाट मनी डस। हम आपके जीवन में पैसे का एक एक स्थान है। लेकिन पैसा साध्य नहीं है। साधन है। यह बात हमारे जो पहले वाली पीढ़ियां थी उनको मालूम था। 70-80 के दशक तक कुछ यहां वहां हो रहा था। नहीं हो रहा था ऐसा मैं नहीं कहूंगा। लेकिन एक जो स्त्रोत रहता है मध्यम वर्ग का वो अपने मूल्य व्यवस्था पे कायम टिका हुआ था। हम

5:20 इसलिए स्कूलें, हमारी स्कूल्स, हमारी हेल्थ इंस्टीटशंस और हमारी जुडिशरी, हमारे एग्जीक्यूटिव्स, हमारी संसद सब कुछ एक लेवल तक अपने हद में रही। हम्। उन्हें यह पता था कि थोड़ा भ्रष्टाचार होता है। सब सारी लोकतंत्र में जो कमियां हैं, वह सारी चीज़ें पकड़ के भी हम अंततः यह जनता के लिए हो रहा है। और जनता द्वारा जनता के लिए और जनता का शासन है। लेकिन आप अह 2000 14 के बाद देखेंगे हम्। तो हम विश्वास नहीं कर सकते कि इतने आसानी से ये चारों खंबों खंभों को ध्वस्त कर

6:05 दिया गया। मैं कहां से शुरू करूं ऐसा मुझे कभी-कभी लगता है। अब जो यूपीएससी की परीक्षा में जो छात्र जाते हैं मैं खुद दे चुका हूं। मुझे मालूम है कि क्या यूपीएससी है। अब उसके बारे में मैं ज्यादा नहीं बोलूंगा। लोगों को मालूम है मेरे बैच है। हम तो लोग बड़ी-बड़ी बातें करते हैं मूल्य व्यवस्था की। यानी मैं देश की सेवा करूंगा, ये करूंगा। एक्चुअली करप्शन करने के लिए यूपीएससी पास करते हैं बच्चे। वो करप्शन की शुरुआत दहेज से होती है। हम यानी उसके अपवाद है। मैं यह नहीं कहूंगा कि उसके अपवाद नहीं है। लेकिन अपवाद ही नियम को सिद्ध करते हैं। हम ये ये इनकी एक हो गया। पैसे आए तो वो

6:52 ब्लैक मनी होंगे। वो बाहर लेके जाएं। यानी आप जिस पेड़ पे बैठे हो उसकी शाखाएं काट रहे हो। यानी क्या है कि ये पैसे एक्चुअली पैसे नहीं है। ये पैसे आपके देश की करेंसी को डीवैल्यू करते हैं। यानी रुपी की जो वैल्यू है वो नीचे ला रही है। जो आज हुआ अंततः वो इतने सालों का इनका कर्म है। दूसरी जगह आप उनके खिलाफ जुडिशरी में जाओ। तो आपने एक से एक दिग्गज चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया भी देखे हैं। मिश्रा फिर गोगोई फिर चंद्रचूड। फिर क्यों कौन नहीं? यानी मुझे ऐसा लगता है कि जैसे भगत सिंह का नाम हम आदर सहित लेते हैं आज वैसे कुछ साल बाद हम लोया साहब का लेंगे हम

7:38 क्योंकि वो अपवाद थे हम आज के तारीख में जाति व्यवस्था और ब्राह्मणवाद ने कॉलोजियम और जुडिशरी को इतना बर्बाद कर दिया है कि आपको पूरा यकीन होता है कि आप कोर्ट में तो जा रहे हैं लेकिन न्याय नहीं मिलेगा। इतना यानी इट्स इट्स 100% शोर यानी आपको मालूम है कि राम रहीम छूटेगा पैरोल मिलेगा आपको मालूम है आसाराम छूटेगा आपको मालूम है कि उमर खरीद नहीं छूटेगा हम तो ये कोर्ट नहीं है ये अब तीसरी बात मैं पहले कंप्लीट करता हूं मीडिया हमारे मीडिया में जो लागत है जो चैनल्स और वो पत्रिकाएं जो आई जो 1991

8:27 उदारीकरण होने के बाद जो जो मीडिया है उसमें लागत थी हम तो उससे पैसा कमाने का साधन यानी एडवर्टाइजमेंट व फिर एडवर्टाइजमेंट सिर्फ फिर एडवर्टाइजमेंट ही होगी ज्यादा और अब तो सारा का सारा नैरेटिव चलता है सरकार का जो एडवर्टाइजमेंट लेते हैं या फिर पैसा ही देते हैं सीधा अब तो पूरी भ्रष्टता की नीच हद तक पहुंच गए निचले पायदान पे पहुंच गए रही संसद संसद में तो आप देख रहे हो कि सभापति जिस तरह से कैमरा को देख के या प्रधानमंत्री को देख के ही बात करते हैं। वहां तो सांसदों को निलंबित करके चुनाव आयोग का गठन किया गया जो नियम बनाया लॉ बनाया और जो तो आप यह समझिए कि ऐसी स्थिति में आज पूरे

9:13 देश के ढांचे में ये चारों जो खंभे हैं वो उसके पदों पे आसीन जो लोग हैं वो सारे इललीजिटमेट है। हमारे इललीजिटिमेट प्राइम मिनिस्टर है। इललीगल प्राइम मिनिस्टर है। इललीगल होम मिनिस्टर है। इललीगल चीफ मिनिस्टर है कई राज्यों के बीजेपी के। वैसे ही जो कोजियम से जो जजेस आते हैं उनकी योग्यता उनकी कैपेसिटी, उनके उनका जुडिशियल कैरेक्टर वो कहां मापते हैं? कौन मापता है? कौन तय करता है? यह ब्राह्मणवादी तय करता है। तीसरा मीडिया। मीडिया तो मीडिया ओनर के मन को आया और वहां से एक नोट आई पीएमओ से तो वही बोल दिया। हम यानी सच, झूठ, साध्य, साधन, विवेक, लोगों का हित और जुडिशियल कैरेक्टर और मीडिया की

10:01 निष्पक्षता इसका कोई लेना देना नहीं। और ब्यूरोक्रेसी का तो आप जानते हैं कि ब्यूरोक्रेसी सिर्फ सत्ता में जो फैसिस्ट हैं उनके साथ मिलकर भ्रष्टाचार करने के काम में लगी हुई है। चाटुकारिता की हद तक जाते हैं। हम आप मैंने आईएएस, आईपीएस इस तरह के आईपीएस क्यों चाहे? वह छोटा वाला जो दरोगा होता है ना वो जिस कम्युनल भावना से मुसलमानों को मारता है हम वो देखा तो मेरे तो मेरा तो रूह कांपती है क्योंकि मुझे ऐसा लगता है कि हमारे फोरफादर्स ने हमारे पूर्वजों ने इसलिए नहीं लड़ी थी जंग इसलिए नहीं इतना बाबा साहब ने संविधान बनाया था ये कौन सा देश बनाया नर्क बना दिया इसको ये चार खंभों में जो काम करते हैं उनकी सफाई इतनी जरूरी है

10:48 इसमें से 90% लोगों को फार्मिंग पे भेजना चाहिए और उनका ट्रायल होगा। अच्छा फेयर ट्रायल होगा। अच्छा और सारा देश देखेगा। यानी आने वाले सदियों तक इस देश में फिर ऐसा कोई नहीं करेगा। हम्। अह यह जो चार खंभे हैं सर, ऐसा आपको क्यों लगता है कि 2014 से पहले चीज़ें ऐसी नहीं थी जिस लेवल पर अब है कि एक तरफ़ा सब कुछ हो रहा है जो आपने उमर खलित का एग्ज़ांपल भी दिया कि राम रहीम से लेकर हर सरकार के खिलाफ, प्रधानमंत्री के खिलाफ कितने सारे जजमेंट्स आते थे? आते थे। है ना? अह लेकिन एक ऐसा समय आ गया है यानी वह दिन कोई मुझसे कह रहा था कि जब इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाया भी था और उसके बाद भी निकाला तब भी उन्हें पता था कि चुनाव आयोग जो है निष्पक्ष तरीके से काम करेगा और उसका नतीजा यह आया कि इंदिरा

11:35 गांधी वह चुनाव हार गई अगर वह चाहती क्योंकि इंदिरा गांधी नहीं चाहती थी कि वह निष्पक्ष ना करें। ना करें। तो ये सारी चीजें जब इतने समय तक चलती आई 2014 के बाद ऐसा क्या बदल गया? क्योंकि मैंने जब कई लोगों से इस पूरे मुद्दे पर बातचीत की वो यह कहते हैं बहुत सारे लोग कि जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने थे तब उन्होंने हर एक सिस्टम में अपने लोगों को घुसाया और धीरे धीरे धीरे धीरे आरएसएस के लोग हर जगह पर मीडिया से लेकर जजेस से लेकर एमएलए एमपीस से लेकर आईएएस आईपीएस ऑफिसर हर जगह पर उन्होंने अपने लोगों को घुसाया और बाद में वही लोग जो है पूरा का पूरा सिस्टम चलाने लगे जैसे उनको लगता है। आप क्या मानते हैं कि 2014 के बाद इतने बड़े पैमाने पर इन चारों खंभों में हम इतना करप्शन, इतनी तरीके से एक तरफ़ा निष्पक्ष

12:21 नहीं रहना, एक तरफ़ा नतीजे देना, इसकी वजह आप क्या मानते हैं? देखिए, आरएसएस के लोग सिस्टम में आ गए इसलिए गड़बड़ हो गई ऐसा नहीं है। आरएसएस के लोग आने से सिस्टम में गड़बड़ क्यों हुई? क्योंकि आरएसएस क्या ये आपको जानना है। आरएसएस को जुडिशियल कैरेक्टर नहीं है। हम आरएसएस मैंने कहा कई बार कहा है एक अय्याशों की एक दुरदांत अपराधीरण हुई हम आतंकवादी संगठन है। ऐसे लोग अगर सिस्टम में जाते हैं तो सिस्टम का जुडिशियल कैरेक्टर बचेगा ही कैसे? वो अय्याशी के साधन जुटाएंगे। हम सत्ता से पैसा, पैसा से सत्ता और उसके बीच में जो आए जो आपको विवेक बताएं जो

13:08 कॉन्स्टिट्यूशन संविधान बताएं जो जीने के तरीके बताएं और जेल जंगल जमीन आदिवासी मुसलमान और दुर्बल घटक जो हैं देश के उनकी उन्नति की बातें बताएं उसको कुचल देंगे। हम उनको सिर्फ नफरत फैलाने के लिए वहां पर भर्ती किया गया। और आप यह मत समझिए कि पढ़े लिखे लोग हैं तो आरएसएस के हैं तो पढ़े लिखे लोग होने के बाद वो ठीक हो जाएगा। ऐसा नहीं है। पढ़ा लिखा फैसिस्ट ज्यादा डेंजरस होता है। हम अनपढ़ तो डेंजर कितना होता है ये प्रधानमंत्री के रूप में आपने देखा लेकिन पढ़ा लिखा भी डेंजरस होता है। हम जी जब आप ये बात कर रहे थे तब मैं आप आप जजेस का देखिए

13:54 गोगोई साहब ने अपने ऊपर जो यौन शोषण का आरोप लगा था खुद ही सुना। खुद को बरी कर दिया और वहां से उतरने के बाद वह इस देश के जो सत्ता में बैठे हुए फैसिस्ट है उनकी तरफ से राज्यसभा लेके बैठ गए। हम उनके छ साल के कार्यकाल में एक शब्द नहीं बोला उन्होंने। हम क्या ही आदमी है यार। अब चंद्रचूर साहब के तो आपने देखा कि उनको भगवान ने ही खुद बोला। फिर राम मंदिर की जो जो जजमेंट है वो एपिक जजमेंट है। वो जजमेंट है ही नहीं। वो एक्चुअल एक अन्याय है। ये अन्याय गाथा कहना चाहिए। क्योंकि जिन्होंने बाबरी मस्जिद को ढा वो क्राइम

14:39 है हम लेकिन उसमें कोई क्रिमिनल नहीं है। हम और मस्जिद के नीचे कोई मंदिर था इसका कोई सुराग नहीं है। मंदिर बनाने का फैसला जज ने क्यों दिया उनको मालूम नहीं है। उनको भगवान ने बोला ऐसा वो बोलते हैं। और वो फैसले के नीचे किसी का हस्ताक्षर नहीं है। हम ऐसा कब हुआ था? और ऐसा कब कैसे हो सकता है? आप बाबा साहब अगर होते आज और उनको पूछते तो वो शॉक हो जाते कि ये क्या है? हम तो आप देखिए कि जिस तरह से एक क्रोनी के लिए जमीन मुंबई हो, महाराष्ट्र हो, कोकण हो, जंगल हो जो बना नहीं सकते। लाखों साल तक आप पानी हो, शुद्ध पानी हो, हवा हो, आप सीधा बर्बाद करके बुलडोज करते हैं। उसमें

15:24 इतनी पुलिस लगती है, इतनी ब्यूरोक्रेसी लगती है। उसमें से एक को भी ऐसा लगता नहीं है कि मैं गलत कर रहा हूं। मैं रेिग्नेशन देता हूं, घर पे बैठा हूं। लेकिन ये पाप नहीं करूंगा। अपने भविष्य की चिंता नहीं है। अपने बच्चों के भविष्य की। चलो उनके बच्चे विदेश जाएंगे। लेकिन किसी को तो बच्चे यहां रहेंगे। उनका क्या होगा? हम यह ना लगना जो एक समाज को जुडिशियल कर देखिए ऐसा है कि ब्रिटिशों ने कहा ही था कि भारत के ब्राह्मणों को जुडिशियल कैरेक्टर नहीं है। न्यायिक चरित्र नहीं है। ये दिख रहा है। हम और आरएसएस तो भयंकर ब्राह्मणवाद संगठना है। और उसका न्यायिक और आप कोर्ट्स में देखिए जजेस सारे हम ब्राह्मणों का जो वर्चस्व है अगर उनमें

16:10 न्यायिक चरित्र होता तो न्याय दिखता। न्यायिक चरित्र नहीं है। इसलिए न्यायिक चरित्र नहीं है। हम और यह सब मिलके अगर क्या हुआ है तो हमने जो एक बगीचा बनाने की कोशिश की थी लोकतंत्र का उसको इन्होंने तहसनहस कर दिया। हम चार चारों खंभों का पुनर्निर्माण करने के लिए पहले उनको पूरी तरह से ध्वस्त करना भी अभी जरूरी है। हम जब आप ये सारी बातें कह भी रहे हैं तो मेरे नजरों के मैंने अभी आपने देखा भी होगा सोशल मीडिया पर दो तस्वीरें चल रही है। एक वही पुलिस जब लोग सड़कों पर नमाज पढ़ रहे थे तो उसे लात मारते हैं। लेकिन वही पुलिस जो है गणेश चतुर्थी के समय नाचते हुए और कुछ भी कोई भी कारवाई ना करते हुए नजर आती है। और यह हर जगह पर

16:55 दिखता है कि अगर एक राजू परोड़ेकर या एक सोहित मिश्रा के सामने पुलिस वाले आएंगे तो उनके बोलने का तरीका अलग होगा। लेकिन अगर एक अब्दुल के सामने वही पुलिस वाला जाएगा तो उनके बोलने का तरीका जो है बदल जाता है। मीडिया में भी उसी तरह से है कि हम देखते हैं कि आप कौन से बड़े चैनल में आप जाएंगे और पाएंगे कि वहां का संपादक या तो मुसलमान हो या तो दलित हो या फिर ऐसा हो जो सरकार से सवाल पूछता हो वो भी नजर नहीं आता है। इसी तरह से आईएएस आईपीएस की जो लॉबी है वहां पर भी आप जाएंगे तो पता चलेगा। सब आपने तो देखा ही महाराष्ट्र के ऐसे लोग थे जो आप कहते हैं कि जब 92 में बाबरी गिरी थी तब हम वहां पर मिठाई खा रहे थे केसरी मिठाई खा रहे थे हमने इसको सेलिब्रेट किया था सर तो ऐसे लोग अगर इस सिस्टम को चला रहे होंगे तो एक आम आदमी होगा जो शायद न्यायप्रिय होगा वो इस लोकतांत्रिक देश में जो नाम के लिए तो अभी

17:41 भी लोकतांत्रिक हैं। हम कहते हैं कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश हैं क्योंकि सबसे ज्यादा आबादी है। डॉनल्ड ट्रंप अगर कोई फैसला लेता है या डॉन्ड ट्रंप के खिलाफ अमेरिका में कोई पत्रकार कुछ कहता है या कारवाई करने की बात करता है या उसके सबूत लाता है तो उसके घर पे ईडीआईटी सीबीआई नहीं आता क्योंकि वहां पर फोर्स अमेंडमेंट से वो सुरक्षित है या वहां का लोकतंत्र में अलग-अलग जो है अधिकार बहुत लोगों को दिया गया है। यहां का आम आदमी या यहां पर एक राजू परेडकर या सोहित मिश्रा को भी नहीं पता कि कल कौन आ जाए कब कारवाई हो जाए। आपके गुनाह हो या ना हो। उमर खालिद एक सिंग एग्जांपल है। तो यहां पर न्याय की अपेक्षा किससे करें? कौन होगा जो आपके मुद्दों को उठाएगा? कौन होगा जो आप सही हैं तो उसे न्याय मिलेगा? तो ऐसे में ये लोकतंत्र चलेगा कैसे? लोकतंत्र कहां है? चल नहीं रहा है। लोकतंत्र डेमोक्रेसी इस डेड। मोदी और शाह

18:30 ने डेमोक्रेसी को खत्म कर दिया। बहुत पहले वो वहां तक पहुंचे। यही डेमोक्रेसी का पतन है। हम मेन तो है कि आपको ऐसा लगता है कि न्याय चाहिए तो किसके पास जाए? आपको एक लोकतंत्र खत्म होने के बाद न्याय के पास किसी के पास जाने की जरूरत नहीं। न्याय नहीं होगा। हम न्याय नहीं होगा। यही डेमोक्रेसी इस डेड का लक्षण है। तो लोकतंत्र मर चुका है। आप समझिए हम लड़ रहे हैं उसको जीवित करने के लिए नहीं। उसको पूरा डिस्मेंटल करके रिकस्ट्रक्चर करने के लिए। और उसको रिस्ट्रक्चर करने के लिए वक्त लगेगा। आपको लड़ना पड़ेगा। चुनाव आयोग वाली सीमा खन्ना। तो लोग कहते हैं कि सीमा

19:15 खन्ना पे एफआईआर हो। कपिल सिब्बल साहब ने कहा अरे मुझे लगता है कभी-कभी यार माधवी भज पे होना चाहिए था। अगर इस कायदे से होना है तो पहले माधवी भज पे होता फिर सीमा खन्ना पे होता। पहले राजीव कुमार पे होता फिर सीमा खन्ना पे। सीमा खन्ना पे एफआईआर तब तक नहीं होगा जब तक यह पूरा जो नेपथ्य नौटंकी चल रही है डेमोक्रेसी की मोदी शाह द्वारा उसको पूरी तरह से ध्वस्त नहीं किया जाता एक्चुअल डेमोक्रेसी क्रिएट करने ये जो फैसिज्म है प्योर फैसिज्म ऑफ आरएसएस उसको पूरी तरह से डिस्मेंटल किए बिना डेमोक्रेसी खड़ी नहीं हो सकती हम लेवल प्लेइंग फील्ड प्रॉपर चुनाव प्रॉपर चुनाव आयोग प्रॉपर वोटों की गिनती हर वोट वोटर को वोटिंग का अधिकार,

20:00 जल जंगल जमीन पे लोगों का अधिकार, डिसेंट्रलाइजेशन ये सारी चीजें और जुडिशियल कैरेक्टर के बिना जज का अपॉइंटमेंट ना हो। हम ये सारी चीजें आए बिना ये एक दूसरे को सपोर्ट करती है। ये आए बिना आप किसी पे एफआईआर वैसा होगा नहीं। और एफआईआर होके क्या होगा? वो तो फेंक दिया जाएगा। माधवी मुझ पे हुआ था। हाई कोर्ट ने उसको खारिज कर दिया। हम और अब वो मुझे लगता है किसी एक प्राइवेट इंस्टीट्यूशन की डायरेक्टर है। हम्म। तो ये सारी चीजें जैसे होती रहेंगी तो अह कानून का डर रहा नहीं है इन लोगों में, अधिकारियों में, मीडिया वालों में, दिन रात झूठ फैलाना उसके बावजूद यानी दूसरे देश में क्या होता है कि अगर मैं सोचिए कि सिग्नल तोड़ता हूं तो मुझे पता है कि मुझे

20:46 दंड होगा, मुझ पर कारवाई होगी, मेरे लाइसेंस रिजेक्ट हो गए, कैंसिल किया जाएगा। एक एक उदाहरण के लिए। हमारे यहां पर वो लोग जो झूठ फैलाते हैं, नफरत फैलाते हैं मीडिया के जरिए उन्हें और प्रमोशन मिलता है। जो लोग सरकार की बात सुनते हुए जबरदस्ती ईडीआईटी, सीबीआई का रेड करवाते हैं उन्हें और प्रमोशन मिलता है। जो सरकार के लिए फैसले देते हैं वो चीफ जस्टिस तक पहुंच जाते हैं। या फिर जो सरकार के अनुसार दंगे कराते हैं वो मुख्यमंत्री से लेकर अलग-अलग जो मंत्री होते हैं कैबिनेट मिनिस्टर वो बन जाते हैं। तो यहां पर तो आप जितने लोकतंत्र को तोड़ोगे उतना अह आपकी तरक्की होगी। तो ऐसे में क्या किया जाएगा? क्योंकि नहीं ये समाज का फेलर है। समाज पूरी तरह से अपने पर्पस ऑफ लॉइस से हट गया है। हम समाज में लोगों को ये मालूम नहीं कि हमें कहां जाना है। इसलिए देखो बाबाओं के पास

21:33 कितनी भीड़ होती है। बाबाओं में क्या है? कुछ नहीं है। बाबा एक फेक संस्था है। ऐसा कोई चमत्कार होता नहीं है। एक्चुअली एंटी सुपरस्टिशन लॉ सारे देश में लागू होना चाहिए। बाबाओं को कैद करना चाहिए। लेकिन यह सारी असुरक्षितता जो है असुरक्षा जो है लोगों में उसको उसकी वजह से लोग समझ नहीं पा रहे हैं। अब उनका पर्पस क्या है? उनके अस्तित्व का अर्थ क्या है? उन्हें कहां पहुंचना है? उन्हें देश को कहां ले जाना है? तो ऐसा समाज एक भ्रष्ट समाज का आउटपुट है। पूरी तरह से हम अपने मूल्य व्यवस्था को भूल चुके हैं। हम यानी ये जुडिशरी में है या एडमिनिस्ट्रेशन

22:19 में है या संसद में है या मीडिया में लोग इंपोर्ट तो नहीं कर रहे हैं हम लोग। यहीं से जा रहे हैं और इनमें से आधे से ज्यादा तो हम जानते हैं पर्सनली। बचपन से जानते होंगे। तो वो तो जन पैदाइशी भ्रष्ट तो थे नहीं हम तो इसका मतलब इस देश के कैरेक्टर में कुछ प्रॉब्लम है उसको सुधार करना जरूरी है और वो सुधार बिना बात किए बिना लिख आप लिख सकते हो लिखो बोल सकते हो बोलो लड़ सकते हो लड़ो और इसके लिए जंग कर सकते हो जंग करो लेकिन ये सुधार लाना जरूरी है। हम्म। इस देश के लोगों को ये बताए बिना कि ये आपकी भूमि है और इसको अगर बर्बाद करोगे तो तुम भी बर्बाद हो जाओगे। लोग मुझे आश्चर्य होता है। कोई कहता है कि डीजे मत लगाओ यार तुम्हारा कान फूटेगा।

23:07 उसके घर के सामने जाके डीजे बजाते हैं यार। तुम भी बहरे हो रहे हो। हम या कि यानी वो वो है ना कि मुझे वरदान मिलेगा तो मैं कहूंगा कि मेरी एक आंख फोड़ दो। तेरा दुगना सामने वाले को मिलेगा। तो दूसरी उसकी दोनों फूटेंगे। हम ये वाली मानसिकता जो है वो नफरती चिंटुओं की है। हम किसी भी सेक्शन में इस सोसाइटी के समाज के किसी भी हिस्से में आप देखिए नॉर्मल और हेल्दी कुछ भी नहीं बचा है। हम आप इतना सफोकेट फील करते हो इस देश में। और हम लोग सफोकेटेड है एनवायरमेंट में हम नीचे से निचले पायदान से दूसरे सुखांक में

23:52 यानी हैप्पीनेस कोषण में निचले से तीसरे ऐसे ही सब जगह है तो हम कुछ भी नहीं है विश्व गुरु तो भूल जाओ विश्वदास भी नहीं है हम लोग विश्व हमने अपने देश को एक नर्क बना दिया है नदियां देखो हम हमारी तुम डेनियो राइन नदियां जाकर अगर यूरोप में देखोगे तो तुम्हें रोना आएगा मजा आया आया मुझे आता है आज भी मैं मिगन लेक के पास जाता हूं तो मेरे दिमाग में 10 अब यह हमारे हिंदू लोग जाके वहां भी अब गणपति का विसर्जन करके उसको बर्बाद करने में लगे हुए हैं। उनको जितना जल्दी रोका जाए उतना अच्छा है। लेकिन मैं जब देखता हूं नदियां तो यार हमारी नदियों की क्या हालत हो गई? हम मैं अपने बचपन में मेरी

24:40 मेरा सारा बचपन प्रकृति के साथ गुजरा। पानी नदी समंदर कोकण में कोकण में जंगल तो मैं ऐसा आदमी हूं कि इसके बिना मैं रह नहीं सकता तो कोई चार गुजराती आते हैं पैसा है इसलिए खरीद लेते हैं तोड़ देते हैं मॉल बना लेते हैं अरे यार क्या कर रहे हो आप अंतत पैसा नहीं खा सकते आपको खाने के लिए चावल गेहूं आटा यह सब लगता है ये ये जो सेंस है सेंस ऑफ बिलॉन्गिंग आपके देश के प्रति वो नष्ट हो चुका है। तो ये चारों खंभों में जो लोग हैं ना उनकी सेंस ऑफ़ बिलोंगिंग जीरो हो चुका है। हम पुलिस डाठी आ जाती है तो सामने वाले को ऐसा मारती है। आपको ये समझना चाहिए कि वो जिसको मार रहे हो वो भी आपके अस्तित्व का

25:25 ही हिस्सा है। हम और अगर उसके हाथ में लाठी हो आपको मारे तो कैसा लगेगा आपको? हम ये पुलिस और प्रशासन के 90% लोग उन पे पूरी मुकदमे चलने चाहिए। ये 12 साल में जो किया है उन्होंने उसके लिए मैं रोज देखता हूं तो मुझे इनकी बर्बरता कहां से आती है ऐसा लगता है। ये बर्बरता फ्रस्ट्रेशन नहीं है। ये करप्शन है। हम कभी-कभी पहले जमाने में तेंदुलकर साहब की अर्धसत्य फिल्म में दिखाया वो पुलिस अफसर गुस्से में मारता था तो उसकी फ्रस्ट्रेशन थी। ये फ्रस्ट्रेशन नहीं है। ये करप्शन है। ये मस्ती है। मस्ती है। हम लेकिन ये मस्ती आपको नहीं लगता कि बढ़ते जा रही है। क्योंकि आपने अभी जिक्र किया कि विदेश कम भी होगी। कम भी होगी। बढ़ते देखो आपको

26:11 मस्ती तब आती है जब आपके हाथ में लाठी होती है। आपको मैं एक बात बताता हूं। बाला साहब ठाकरे जो थे उनके टाइम में हिटलर बहुत अच्छा लगता था उनको। हम लेकिन उद्धव साहब जब आए सत्ता में तब वास्तविक हिटलर से उनका मुकाबला हुआ तो उनको लगने लगा कि हिटलर बुरा था। समझे? तो आप जब हिटलर हो ना तो हिटलर अच्छा लगता है। लाठी आपके हाथ में है तब तक मजा आता है। सामने वाले के हाथ में जनता के हाथ में लाठी आ रही है। अभी तब लोगों को पता चलेगा कि बाबरी गिरी तो आपने मिठाई खाई तो आपको कितना उसका जहर गया है उसके अंदर नफरत का। हम क्योंकि जो मस्जिद का रिस्पेक्ट नहीं करता। वो मंदिर का भी नहीं करता। इसलिए

26:57 105 बार राम मंदिर में ही चोरी करी। इन्हीं लोगों ने की हम अब आपके सामने है। मैंने तो बोला नहीं था चोरी करने के लिए। ना मैंने की है। तो इन्होंने ही की है। पीएमओ का ही कंट्रोल है उसके ऊपर और उनको दबाया गया। तो जो देखिए आरएसएस का कोई ईमान नहीं है। बाबरी मस्जिद को गिराना उनके लिए एक साधन था सत्ता के तरफ पहुंचने का। सत्ता उनके लिए साधन था देश बेचने का। देश बेचना उनके लिए साधन था यश का। जो ऑफिसिसेस बनाई यशी वुमनाइजिंग जो भी रेपिंग वो सब कुछ कर रहे हैं वो लोग जो इंसान नहीं करना चाहिए। मर्यादा में रहना चाहिए। एक विवेकशील रहना चाहिए। या राम राज्य की बात करते हैं वो ये राम राज्य ये हराम राज्य है। हम हम तो

27:43 ये जो है इनकी अ एोगेंस ये एोगेंस एक परवर्ट नेचर से आता है और बेसिकली एक आतंकवादी परवर्ट संगठन अगर देश पे कब्जा करे तो ये सारे खंभों को इस तरह से बर्बाद कर सकता है। ये दीमक 100 साल पहले देश में आई थी। हमारे लिबरल और डेमोक्रेटिक इंस्टीटशंस ने उनकी तरफ थोड़ा नजरअंदाज किया उनको। वरना उनको कुचल देना ही ठीक हो जाता है। हम और उनको अब कोई अलग व्यक्ति या संस्था कुचलेगी नहीं। वो खुद को कुचलेंगे। हम क्योंकि वो भस्मासुर है। खुद के सर पे हाथ रख रहे हैं। लेकिन आपको क्यों लगता है और आपको कैसे

28:29 लगता है कि 1947 में सर जब ये देश आजाद हुआ तो इतने विद्वान थे पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर महात्मा गांधी से लेकर बाबा साहब अंबेडकर से लेकर सरदार पटेल से लेकर सब लोग एक समय में आए। उन्होंने इतने विचार किए इस देश को बनाया। और अब अब जमाना ऐसा है सर मैं देखता हूं कि लोग को एक आम आदमी अगर एक एफआईआर भी दर्ज कराना चाहे तब पुलिस को पैसे देने होते हैं। कोर्ट में अगर उसका केस जल्दी आए उसके लिए वहां पर जो रजिस्ट्रार बैठा हुआ है उसको पैसा देना पड़ता है। मंत्री को अगर मिलना पड़े तो उसके पीए को पैसा देना पड़ता है। मीडिया में खबर छपवाना पड़े तो आजकल पत्रकार लोग पैसे लेने लगे हैं। हर जगह पर इतना करप्शन इस तरह की तबाही और उन लोगों को पैसा देना पड़ रहा है जिनका काम है जो आपके टैक्स से यहां पर बैठे हुए हैं। तो इतनी तबाही हम कैसे हो गए? एक विद्वानों ने इस देश को आजादी दिलाई। दिन-रात संसद

29:17 में बहस हुआ, संविधान कैसे बनेगा, कॉन्स्टिट्यूशन कैसे होगा? लोकतंत्र में किस ढांचे को कितनी ताकत मिलेगी? और बाद में हम इतने बुरे लेवल पर कैसे आ गए? देखिए संविधान बनाना एक इंटेलेक्चुअल एक्टिविटी है। लेकिन उसको अमल में लाना या उसका डे टू डे लाइफ में उसका एग्जीक्यूशन करना ये इंटेलेक्चुअल एक्टिविटी सिर्फ नहीं है। हम उसमें एक समाज में चेतना सेंसिटाइजेशन की जरूरत है। ये जो आप भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार कह रहे हैं ना भ्रष्टाचार नहीं है। सिर्फ वो वो डिसेंसिटाइजेशन है। यानी आप किसी को मैं किसी आपको मारू लाठी से तो आपको दर्द होगा तो मुझे भी मन में दर्द होगा। है ना? वो सेंसिटाइजेशन है मेरा। सेंसिटिविटी है मेरी। अगर मैं डिसेंसिटाइज हो गया तो मुझे फर्क

30:02 नहीं पड़ता। मैं आपको लूट रहा हूं और मुझे फर्क नहीं पड़ रहा है। तो मैं डिसेंसिटाइज हो गया। ये डिसेंसिटाइजेशन इज अ डेंजरस देन करप्शन। हम करप्शन एक कंपोनेंट है डिसेंसिटाइजेशन का। ये लार्जर पर्सेक्टिव में आप देखेंगे तो ये भयंकर चीज हो चुकी है। नासूर हो चुका है। और ये डिसेंसिटाइजेशन जो है सोसाइटी का यानी मुसलमान को मारो तो अच्छा है। इसको रेप करो तो प्रॉब्लम नहीं है। महिलाओं का रेप करो तो कोई टेंशन नहीं है। ये आरएसएस का देन है भारत को। ये आरएसएस इसलिए मैं उसको आतंकवादी संगठन बोलता हूं। और उसमें भारत का इनहरेंट कैरेक्टर जो है हिंदुस्तान जो हमने देश बनाया गया है वैसे 300 संस्थान थे। हम वो जातिवादी है और ब्राह्मिनिकल ऑर्डर

30:48 उसको रूल करती थी। हम तो ब्राह्मिनिकल ऑर्डर में बेसिकली जुडिशियल कैरेक्टर नहीं है। तो सेंसिटाइजेशन का सवाल ही नहीं उठता। आप कोसते हो रिजर्वेशन को जो दलितों को पिछड़ों को मिलता है। लेकिन आपका 5000 साल का रिजर्वेशन का क्या करें? देश को लूट रहे हैं बाबा लोग जो ब्राह्मणिकल है। देश को लूट रहे हैं मंदिर जो ब्राह्मणिकल है। देश को भगवान के नाम पे कान फोड़ रहे हो आप। आंख फोड़ रहे हो, डीजे बजा रहे हो, नदियों को बर्बाद कर रहे हो, जंगलों को तोड़ रहे हो। सब भगवान के नाम पे वगैरह है। शाका का अनटचेबिलिटी नए टाइप की डेवलप कर रहे हो। वेजिटेरियनिज्म से नाम से। ये सारा डिसेंस डाइजेशन ऑफ़ सोसाइटी है। और ये ज्यादा खतरनाक है करप्शन से। हम

31:33 करप्शन तो दुनिया की ग्लोबल प्रॉब्लम है। करप्शन हर जगह होता है। लेकिन डिसेंसिटाइजेशन है। तो देखो अमेरिका में करप्शन नहीं है। ऐसा आप नहीं कह सकते। खुद अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति को ही उठा के लाया और एक्सटॉशन की तरह तरह उनसे ऑइल लिया। हम लेकिन इंस्टिट्यूशन पावरफुल है क्योंकि मध्यम वर्ग निम्न मध्यम वर्ग में सेंसिटाइजेशन हुआ। हम और वो सेंसिटिविटी जो है वो हमारी चेतना मर चुकी है भारत की। भारत की चेतना की जागृति ये सबसे पहला कार्यक्रम है जो हम करना चाहिए जो हम कर रहे हैं। हम यहां पर बात करते हुए हम वही करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन मैं किसी भी जज को आज के तारीख में इस देश के मैं क्लियर बोलता हूं। किसी भी एडमिनिस्ट्रेशन एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर यानी यानी यूपीएससीओ कोई भी

32:23 स्टील फ्रेम के अधिकारी कोई भी जुडिशरी के जजेस हम कोई भी सांसद या विधायक या कोई भी मीडिया कर्मी इनकी ऑथॉरिटी को नहीं मानता। हम शुरुआत यहां से होनी चाहिए। हम मैं सब कुछ पहले से रचना करना चाहता हूं। हम ताकि उसमें सेंसिटिविटी एमथी और कंपैशन मैं भर सकूं। हम ये जो फुडल लॉर्ड्स और क्षत्रप तैयार हुए हैं राजनेता में राजनीति में सारी पार्टियों में सारे राज्यों में उनको पहले मूल रूप से खत्म करना चाहिए। उनकी कोई जड़ यहां रखनी नहीं चाहिए। तब जनता को न्याय मिलना शुरू होगा। क्योंकि जनता को न्याय क्यों नहीं मिलता? क्योंकि न्याय की भावना, न्याय की वृत्ति, न्यायिक चरित्र जजेस में नहीं है। लेकिन

33:11 जनता को भी नहीं मालूम उनका हक क्या है और न्याय क्या है। हम तो जनता किसी भी बात से डरती है। बड़े-बड़े नेता डर गए। ये 12 साल में हमने देखा आईएएस, आईपीएस ऑफिसर्स मैंने देखे हैं कि नेता जो पढ़े लिखे नहीं है उनके वो जूते चाटने बाकी रखे हैं। हम किस लिए भाई? आप रेसिग्नेशन दोगे तो आप भूखे तो नहीं मरोगे। इतने तो इंटेलिजेंट हो आप। हम नहीं आखिर आपको क्यों लगता है कि इतनी मजबूरी क्यों आ जाती है? मजबूरी नहीं है ये। मैं वही बोल रहा हूं। ये सेंस आत्म सम्मान की भावना ही मर जाती है। इतने गृह हो गए हैं। इतना गृह नहीं। उनको लगता है कि अय्याशी यानी मेरे पांच इंद्रिय जो है वो भोग ले सकते हैं। उतना ही मैं लेके मर जाऊं।

33:57 हम उसके बिय्ड कुछ नहीं। उसके इसका मतलब इनको पर्पस नहीं है। यानी इसलिए देखो ऐसी स्थिति जब देश को आती है तो पतन किस चीज का होता है? चित्रकला, संगीत, सिनेमा, नाटक, लेखन सारी स्थितियां नीचे-नीचे आती है। हम फिर एनवायरमेंट फिर अपना अपना एनवायरमेंट क्वेश्चन फिर सुखांक सुखी नहीं है कोई। हम हमारा हैप्पीनेस क्वेश्चन नहीं बढ़ा है लूट के हम हैप्पीनेस क्वेश्चन नीचे जा रहा है हम तो यह जो सेंसिटिविटी है आपका डोपामाइन किस चीज से बढ़ता है ये इंपॉर्टेंट बात है ना तो नहीं बढ़ता है इस देश का डोपामाइन खत्म हो चुका है हम लेकिन फिर इनको जो ये डिसेंसिटाइज हो गए

34:44 हैं ऐसा क्या किया जाए आपको लगता है कि जिसके वजह से जो जनता भी है जो अपने आप को मरी हुई हारी हुई समझती है जिन्हें लगता है उनका कोई वॉइस नहीं है वो कहीं पर कुछ बोल नहीं पा रहे और यह हर लेवल पे है। ऐसा नहीं कि हम केवल लोकतंत्र की बात कर रहे हैं। आप रस्ते पर चल रहे हैं तो आप रूल नहीं मान रहे हैं। आप नियम नहीं मान रहे हैं। आप लाल सिग्नल पर रुक नहीं रहे हैं। कोविड के समय थूकने से इतने लोग मरे फिर भी आप थूक रहे हैं। तमाम तरीके की चीजें जो हर लेवल पर मौजूद हैं। तो एक लोकतंत्र या ये जो नियमों का डर सर खत्म हो गया है। तो ऐसे देश को फिर से कैसे जगाया जा सकता है? या एक बार फिर से ये जो लोकतांत्रिक पावर है या जो आपने बहुत खूबसूरत तरीके से बोला कि हमारे अंदर की जो संवेदनाएं थी वो जो मर रही हैं उसे कैसे जिंदा रखें कि कोई देखे नहीं देखे मुझे लाल सिग्नल पर रुकना चाहिए। कोई नियम पालन करे या नहीं करे

35:31 मुझे करना चाहिए। कहीं पर कुछ हो या नहीं हो मुझे करते रहना चाहिए। ये जो मर चुका है ये चीज इस संवेदना को कैसे वापस लेंगे? प्यार हम आपको आपके इर्द-गिर्द जो प्रकृति है, आपके पेड़ है, पौधे हैं, जंगल है, जल है, जमीन है, इंसान है, पशु-पक्षी हैं। उनके प्रति जितना प्यार होगा, हम उतना लगाव होगा, उतना आप उतने आप सेंसिटिव बनेंगे। हम ये जो बात है वो छोड़ के सारी चीजें आप कर रहे हैं। धर्म के नाम पर सारा व्याभचार और ढोंग चल रहा है। यह बाबा वो बाबा यस बाबा ये सद्गुरु वो श्री श्री ये प्रेमानंद ये वो ये कुछ नहीं है एक पेड काफी है वो तोड़ रहे हैं और कुंभ बना रहे

36:18 हैं ये ये इससे बड़ी नपुंसक चीज कोई नहीं है तो आपको अपनी आपको थोरो का वार्डन पढ़ना चाहिए मुझे लगता है जिसको गांधी जी को जिसने प्रभावित किया था अच्छा हेनरी डेविड थरो नाम के एक महान विचारक हुए थे दार्शनिक ही समझिए लेकिन बहुत सिंपल वार्डन में रहे वो और उन्होंने एक किताब लिखी वार्डन तो वो जरूर पढ़नी चाहिए। तो आपकी सेंसिटिविटी प्रकृति से आती है। आपकी सेंसिटिविटी आपके इर्द-गिर्द जो इंसान है उनकी तरफ से आती है। आपकी सेंसिटिविटी आपके अंदर की कंपैशन, एमथी और लव से आती है। आपकी सेंसिटिविटी आप कितनी आजाद आजादी को पसंद करते हो उससे आती है।

37:05 आपकी सेंसिटिविटी आप कितने क्रांतिकारक हो प्रतिक्रांतिकारक नहीं क्रांतिकारक हो उससे आती है। ये सारी चीजें आपकी कला अ बुद्धि आपकी संवेदना आपकी चेतना आपके न्यायिक चरित्र सबको पुष्ट बनाती है और आप समाज के रूप में उभर जाते हो हम फिर ये जो कंट्रोलिंग और बैलेंसिंग पावर है एडमिनिस्ट्रेशन जुडिशरी मीडिया और संसद पार्लियामेंट ये ठीक हो सकती है अभी खून ही नहीं है इनमें तो संवेदना का और चेतना का तो कैसे ठीक करोगे तुम आप इंपोर्ट तो नहीं कर सकते हैं लोगों को बाहरी देश से। तो आप इसमें सर मीडिया का रोल कितना बड़ा मानते हैं? लोगों को डिसेंसिव

37:51 मीडिया का सबसे बड़ा रोल है। मीडिया एक तरफ से एक तरह से आधा आर्ट है। हम तो सबसे ज्यादा जिम्मेदारी मीडिया की है क्योंकि आप जगाएंगे। चेतना मरी तो जगानी है आपको। यहां इनकी पहले मरी। हम और इतनी भयंकर रूप से इनकी नफरत इनके खून में डाली गई। एक ब्रेन वाश द्वारा आरएसएस का। आरएसएस की जितनी बड़ी ट्रायल हो उतनी कम है। तो मीडिया ने अपने इतिहास में भारत के इतिहास में सीमा चरम सीमा तक पहुंच गई। मनुष्य के अधपतन की एक रेखा उन्होंने नई बना ली। हम और अपने मनुष्यत्व को कालिक पोत दी।

38:37 यह आज तक हो या Zee न्यूज़ हो या फिर rpब्लिक टीवी हो या इंडिया टीवी हो या और ये सारे गोदी मीडिया जो है वो जब मैं देखता हूं तो मुझे लगता है कि जो काम कर रहे हैं लोग क्या उनको ऐसा नहीं लगता कि उनके आने वाली पीढ़ियां कभी उनको जज करेगी तब शर्म आएगी उनको उसके लिए तो कम से कम उनको चार शब्द तो जो सच बोलने चाहिए हम या चार शब्द मनुष्य के बोलने चाहिए या मानवता के बोलने चाहिए। इतनी नफरत, इतनी कड़वाहट, इतना झूठ, इतना फरेब, इतना नकल, इतनी चाटुकारिता, इतना रीढ़हीनता, इतनी शर्मनाक हरकतें

39:22 हम इंसान तो नहीं कर सकता। जानवर तो करता ही नहीं। लेकिन ऐसे लोगों से जो ये अलग ही ब्रीड है। बिल्कुल। आप भी बात करते हो, मैं भी बात करता हूं। हम जानते हैं ऐसे कई पत्रकारों को वो जब ये कहते हैं क्योंकि मैं ऐसे बहुत लोगों को जानता हूं मैं बहुत बार सोचता हूं कि वो नफरत दिल से फैलाते हैं लेकिन जब बात करो तब कहते हैं और क्योंकि उन्हें पता है कि हमारा स्टैंडिंग कैसा है तब बात करो तो वो थोड़ा सा गिल्ट में आएगा अरे क्या करें ये तो गलत हो रहा है लेकिन नौकरी है मजबूरी है इसलिए करना पड़ रहा है ईएमआई है इसलिए करना पड़ रहा है इस ये ऐसा जो आर्गुमेंट है इसे आप सही मानते हैं या फिर हर किसी के पास एक मौका एक चांस होता है और उन्हें मजा आ रहा है इसलिए इसलिए वो कर रहे हैं क्योंकि यही बात जो है आईएएस आईपीएस अधिकारी भी कहते हैं कि अरे इनकी सरकार है तो यह जो कहेंगे करना पड़ेगा नहीं तो हमें प्रॉब्लम होगा।

40:09 ऐसी आईएएस पुलिस वाले अधिकारी कह रहे हैं कि भाई ऊपर से ऑर्डर है इसलिए करना पड़ रहा है। हर कोई कहीं ना कहीं सर बहाना देता हुआ नजर आता है कि नौकरी है। ये नहीं करूंगा तो कोई और करेगा। तो ये आर्गुमेंट देकर वो अपने आप को कहीं ना कहीं बचाने की कोशिश करते हैं। ये इलेक्शन कमिशन के जो बाकी दो अधिकारी हैं वो भी लिखित में भले कह रहे हो। राहुल गांधी जब कह रहे थे एक उदाहरण के लिए तब यही लोग तो साथ में बैठे थे ना और कह रहे थे कि हम सीसीटीवी फुटेज क्यों निकालें? राहुल गांधी एफिडेविट थे। अब क्योंकि माहौल बदल रहा है तो कहीं ना कहीं लिखित बातें आ रहे हैं। तो ये जो आर्गुमेंट होता है कि हम क्या करें? हम तो मजबूर हैं। आप इस आर्गुमेंट को किस तरह से देखते हैं कि करते भी हैं और बाद में अपने आप को एक तरीके से विक्टिम भी बताते हैं। देखिए ऐसा है कि किसी भी व्यक्ति को ऐसी मजबूरी है ना जीवन में एक आध बार आती है। जैसे विश्वामित्र ने एक बार कुत्ता भी खाया था। हम जब अकाल हुआ था और खाने के लिए कुछ भी

40:56 नहीं था। लेकिन रोज कुत्ता नहीं खाता ना और विश्वामित्र भी नहीं बनता। ये बात है कि ये जो रोज रोज पतन की नई-नई सीमाएं आप लांग लेते हो। इसको मैं जब देखता हूं तो आप समझिए कि यह मजबूरी नहीं है। यह कैरेक्टर है और एक एक देश का एक युग में ऐसा कैरेक्टर बन गया है। नाज़ जर्मनी में लोगों को विश्वास नहीं हुआ बाद में। खुद उनको भी कि इतने लोगों का हम जेनोसाइड कर सकते हैं। हम उनको विश्वास नहीं हुआ कि एक आदमी के पीछे हम ऐसे पागल हो गए। उनको विश्वास नहीं हुआ। अपनी बर्बादी की तकदीर हमने खुद लिख

41:44 दी। इतना एडवांस देश, इतना आधुनिकता भरा। रमांडा भी वैसा ही हुआ। तो ये बूचर ऑफ इंडिया जैसे बूचर ऑफ बोसिया जब आए हैं देश में तब लोगों को लगा कुछ लोग होते हैं ना कि शक्ति के उपासक मानते हैं वो अपने आप को। ऐसे शक्ति का कोई उपासक नहीं होता। शक्ति का अपना स्थान है। उतनी उपासना है उसकी। उससे ज्यादा नहीं है। शक्ति ज्यादातर कुचलने के लिए लगती है। सृजन के लिए नहीं है। नहीं लगती। हां। तो शक्ति के यह जो उपासक मानते कहते हैं वह एक्चुअली आत्मविश्वास हीन और कॉन्टेक्स्ट में जीने वाले लोग होते हैं। देखिए आपको कोई कहता है कि यार ऊपर से

42:29 आर्डर है या घर में प्रेशर है या आजकल ये तो आप क्या पैदा संदर्भ में हुए थे? कोई भी संदर्भ में पैदा नहीं होता। हम हर किसी को मजबूरियां होती है। वो एक अलग बात है। हम लेकिन लड़ने वाले लड़ रहे हैं। हम जेल में जाने वाले जा चुके हैं और अब रवि नायर हमारे मित्र वो जेल में जा गए ना हम उन्होंने हार नहीं मानी। है ना? तो आप ये समझिए कि आपको चॉइससेस हैं। हम क्या उनको तकलीफ नहीं है? हम उनको भयंकर तकलीफ है। उनको बहुत सारे प्रॉब्लम्स हैं। होंगे। इंसान को है। अह

43:15 मेरे ऊपर केसेस हुए जब मैं अपनी बात बहुत बोलता नहीं हूं ज्यादा। लेकिन मैं जब भी जाता हूं मुझे इतनी सारी समस्या और डिसकंफर्ट्स थे हेल्थ की और डिसकंफर्ट से दवा दवा से डिसकंफर्ट। ऐसी एक विशियस सर्कल पे मैं आज भी लड़खड़ा रहा हूं। हम तो ये सारी चॉइससेस है ना अपनी। तो यह मैं इसलिए नहीं कर रहा हूं क्योंकि मुझे मजा आ रहा है। मुझे इसलिए कर रहा हूं क्योंकि मैं मनुष्य हूं और मैं किसी संदर्भ में नहीं जीना चाहता। मैं अपनी आजादी, अपने इंकलाब को खुद जीना चाहता हूं और वो एक ही बार मुझे मिलेगा। हम क्योंकि मेरा जन्म एक एक्सीडेंट है। मृत्यु भी एक एक्सीडेंट होगी। बीच में जो एकिस्टेंशियल क्राइसिस है वो मैं अपने दम पे जिऊंगा। हम्।

44:00 इतना ही बस आपको समझना है और 10 1.4 बिलियन लोगों में जो सत्ता के शीर्ष पे बैठे हुए लोग हैं आरएसएसवादी उनको यही बात समझ में नहीं आई। हम्म और इसका असर आप केवल भारत में नहीं भारत के लोग जो बाहर जा रहे हैं वो एक कॉमन नागरिक की जो रिस्पांसिबिलिटी होती है वो कैसे नहीं निभा रहे हैं? नहीं नहीं वो सारी चीज़ इसमें भारत के बाहर के नागरिकों को एक इल्लुजन हो गया है कि भारत विश्व गुरु बन गया। हां जो भारतीय हैं जो बाहर हैं। हां हां एक्चुअली भारत नर्क बन चुका है। हां लेकिन उनको लगता है कि विश्व गुरु अब वो तो पता चल जाएगा कुछ ही महीनों में कि लोग कितना विश्वगुरु बना है। अब पता ही चल ही गया है और क्या पता चला अमेरिका के वायसराॉय घूम रहे हैं हिंदुस्तान में क्या और चीन वहां आंखें दिखा रहा है। बाकी मार्केट का बैंड बज चुका है।

44:45 और बस क्या ही नहीं हुआ है। तो हेल्थ सेक्टर बैंड बज चुकी है। स्कूल बंद होते रहे हैं। सारा कुछ बर्बादी के मंजर चारों तरफ से दिख रहा है। लेकिन ऐसा है ना कि लाल सेना जब तक बर्लिन में आई तब तक बर्लिन के लोगों को विश्वास नहीं था कि हम हार रहे हैं। अब ऐसा है। तो वो भारत के लोगों को इल्लुजन हो गया। तो वहां वो नाच कर निकाल रहे हैं। तो जब डंडे पड़ेंगे और वापस भेज देंगे तो उनको पता चलेगा कि यहां कुछ था ही नहीं। फालतू में उधर मस्ती किया। टरमैक पर नाच। लेकिन दुर्भाग्य की बात क्या है कि आप ताकत से सीखते हो। दूसरे की ताकत जब आप पे गाजस गिरती है तब आप सीखते हो। उससे अच्छा आप अपने विवेक से सीखो वो बेहतर आईडिया है ना। हम

45:31 मनुष्य को दो चॉइस है। दो ही चॉइस है। एक्चुअली एक अपने विवेक से जियो तो आपकी सीख अपने विवेक से आएगी। और दूसरा अगर विवेक से सीखोगे नहीं तो एक हद तक आप मस्ती करोगे तो सामने से एक ऐसी ताकत आप पे गिरेगी कि आप सीखने के लिए मजबूर हो जाओगे। तो अब दूसरे अ चरण में भारत आ चुका है। हम तो अब क्या ही करें हम? हम्म। एक और बात क्योंकि आज हम लोकतंत्र पर बात कर रहे हैं और ये पूरा जो लोकतांत्रिक ढांचा है उस पर बहुत अच्छी तरीके से बातचीत हो रही है। मुझे तो बहुत मजा आ रहा है। तो एक सवाल मेरे मन में आया और ये बहुत सारे लोग मुझे पूछते हैं। अ खास तौर पर वो जिनसे मैं एग्री नहीं करता। वो कहते तुम कहां कह रहे हो कि लोकतंत्र खतरे में है। तुम दिनरा बात कर पा रहे हो। मोदी के बारे में बात करते हो। इतनी सारी चीजें कह

46:16 रहे हो। तुम पर कोई गाज नहीं पड़ी। लोग डायरेक्ट कुछ भी कह पा रहे हैं। लोग लड़ रहे हैं। लोग सड़कों पर देखो उतर रहे हैं। तो कहां लोकतंत्र जिंदा नहीं है। तो उन्हें लगता है कि क्योंकि मैं केवल नरेंद्र मोदी को बोल पा रहा हूं। मतलब हम एक लोकतांत्रिक देश में हैं। आपको लगता है कि हमने हमारे खुद के अधिकार या हमारी जो ताकत है या राइट्स है उसके भी लेवल को इतना कम कर दिया कि लोगों को लगता है कि केवल हम बैठकर अगर प्रधानमंत्री से सवाल पूछ लें तो हम कितने लोग ऐसा नहीं है वो एग्जिस्टेंस अलग लॉकर में बंद किया है। आप मोदी पे बोल सकते हो। मोडानी पे बोल के दिखाइए। सही बात है। तो लेकिन फिर ये जो लोकतंत्र की हम बात करते हैं इसे कैसे संवेदनाओं को बढ़ाएं क्योंकि मीडिया उनकी है। फिल्में वो

47:02 धुरंधर टाइप बना रहे हैं। खुद प्रधानमंत्री धुरंधर फिल्म नहीं है। वो एक प्रोपेगेंडा है। ठीक। देश जल रहा है तो प्रधानमंत्री भजन क्लबिंग कर रहे हैं। तो आएगी कैसे? संवेदना आएगी कैसे? आपने मोहब्बत की बात की। नहीं मोहब्बत भी तो लोगों तक मैसेज पहुंचेगा कैसे? देखिए, यह भजन क्लबिंग वग़ैरह मुझे याद आता है कि रोमानिया हो, ज़ार का रशिया हो, या हिटलर का बर्लिन हो, आखिरी पड़ाव में हम्म। हर जगह पार्टी चली थी। हम्म। नाच रहे थे लोग। क्योंकि लोग इलुजनरी वर्ल्ड में इतने आगे जा चुके थे कि वो वहीं रहना चाहते थे। उन्हें मालूम था वापसी का रास्ता नहीं है। तो आगे ही जाएंगे ना। हम तो ये नाचना गाना ये खेल कूद जो चल रहा है

47:48 ना मोदी योगी शाह सब का जो वो सब इसलिए चल रहा है क्योंकि अब दूसरा कोई रास्ता है क्या आपको नहीं हम आपको एट पीस आप जी नहीं सकते अब आपने इतना सब किया है कि शांति से कोई जीने नहीं देगा आपको और आपको यह है कि आप पीसफुल ट्रांसफर ऑफ पावर तो कर नहीं सकते आपके एकिस्टेंशियल क्राइसिस से ज्यादा बड़ी क्राइसिस जो है वो आपके अ करीबी जो है उनके पैसे उनकी संपत्ति उनकी धन उसको बचाने की भी है पद तो आपको शांति से और प्यार से कुछ नहीं

48:35 मिलेगा तो आपको कुछ तो एक इंटॉक्सिकेशन चाहिए या फिर एक नशा चाहिए तो पार्टी है रोमोना का पतन होने से पहले यही पार्टियां चलती थी रशिया में हम फिर हिटलर का पतन बर्लिन में होने से पहले बंकर में पार्टियां चलती थी धूत थे नशे में सब लोग गाने लगे थे हम अब लिखा हुआ है अल्बर्ट स्पीयर का स्पंडो डायरी पढ़िए इनसाइड थर्ड रिश पढ़िए सब कुछ लिखा हुआ है हम और ये सारे चरित्र मैंने गोबे्स के गोबे्स डायरीज है वो भी पढ़िए लास्ट पेज उसकी आखिरी डायरी है तो हर तानाशाह हर डिसेंसिटाइज की हुई समाज की पतन की आखिरी चरण में ऐसे भजन क्लबिंग होते हैं और उसको

49:23 इतना इतना इतना स्पेसिफिकली इलस्ट्रेटिव रूप में प्रधानमंत्री ने किया ना वो ऐसे मानते हैं भगवे रंग का डफली देता है उनका सुरक्षा कर सुरक्षा कर्मी और वो खुद बजाना शुरू करते हैं ना ये इलस्ट्रेटिव इलस्ट स्ट्रेस अ फेलर एंड फॉल युगों तक याद किया जाएगा। हम ये मैं जब मुझे याद आएगा जब भी ये चित्र तो मुझे इतना सुकून महसूस होता है कि मुझे ये पतन की सीमा का अंतिम चरण अंतिम अध्याय है। ये पता चलता है अंदर। हम अब ये मुझे क्यों पता चलता है? भाई तुमको

50:08 क्यों नहीं चलता? या आरएसएस वाले को क्यों नहीं चला? बीजेपी वाले को क्योंकि उस टाइप की सेंसिटिविटी चाहिए आपको वह पता चलने के लिए वह नहीं है उनमें। हम्म अभी आप जो कह रहे हैं कि आखिरी पतन में है मानकर चलते हैं चुनावों के जरिए भी सरकार बदल जाए। अह समझ लीजिए कि 2029 में कांग्रेस पार्टी या फिर विपक्ष जो है वो सत्ता में आ नहीं जाएगा। चलिए 27 में भी 27 में हम पकड़ते हैं। तो तब भी जो बाकी लोग हैं पूरे सिस्टम में वो तो इन्हीं के लोग बैठे हुए हैं। ऐसे में लोकतंत्र को वापस से कैसे रिवाइव किया जाएगा? लोगों को सेंसिटाइज कैसे किया जाएगा? कैसे चीजें जो है वो वापस से बदलेंगी? देखिए आइडियाज और आइडियोलॉजीस और सत्ता सत्ता ऑर्डर्स जब सत्ता नहीं ऑर्डर्स जब बदली है ये सत्ता नहीं बदलेगी। ऑर्डर बदलेगी।

50:54 तब आपको क्या लगता है? जार के बाद जब कम्युनिज्म आया तो वही लोग थे। हम या फिर ब्रिटिशों के बाद हिंदुस्तान आजाद हुआ तो वही लोग थे। लोग वही होते हैं। उनकी सेंसिटिविटी बदलती है। हम आप शौक को महसूस करने की ताकत आपकी बढ़ाई जाएगी या कम की जाएगी। हम लोग अचानक प्यार करना सीखेंगे। हम लोगों को अचानक कानों में एक गीत सुनाई देगा। लोग अपने जीवन में कविता महसूस करेंगे। हम लोग इश्क पर विश्वास करेंगे। लोग मुसलमान, दलित, आदिवासियों से प्यार करना सीखेंगे। हम और जो नहीं करेंगे वो बाहर फेंके जाएंगे। हम उनको सजाएं होगी। यही लोग होंगे

51:41 लेकिन देश बदल जाएगा। और वो लोग जो जिन्होंने 2014 के बाद इस लोकतंत्र का गला घोटने का काम किया। ये जो चार हम खंभों की बात कर रहे हैं क्या मुझे लगा चार लोग की बात कर रहे हैं ऐसा बोल रहा है वो भी सच है वो भी सच है वो चार हो या चार खंभे हो वो भी सच है| क्या उनके ऊपर ये चार लोग हो या चार खंभे हो उनके ऊपर कारवाई होनी चाहिए ताकि एक एग्जांपल सेट हो कि जो जो हम पिछले कई मिनटों से बात कर रहे हैं कि कैसे लोकतंत्र का गला दबाया गया तो ऐसा तो नहीं होगा कि वो लोगों को ऐसे ही छोड़ दिया जाएगा। कहीं ना कहीं तो यह नियम सेट होने चाहिए कि अगर आप यह सारी चीजें करते हैं तो इसका कोई ना कोई कॉन्सिक्वेंससेस होगा। आपको लगता है वो भी होगा? देखिए बाय एंड लार्ज तो होगा हम लेकिन ऐसा नहीं होता कि सबके सबका होता है। हम

52:26 बाय एंड लार्ज होता है लेकिन कुछ लोग निकल जाते हैं। ये तो हमेशा होता है। लेकिन बहुत बड़े लोग जो बड़े लेवल पर हैं। तो वो होगा ही ना। हम जितने लोगों की लिस्टें बनी है उतने लोगों पे कारवाई तो बननी ही है। कुछ लोगों पे ज्यादा होगी। कुछ लोग अप्रूवर बनेंगे, कुछ लोग भाग जाएंगे। हम कुछ लोग सजा भोगेंगे। हम ऐसा ही होता है किसी भी ऑर्डर के बाद। हम लेकिन आपको अभी भी विश्वास है कि ये जो चार खंभे हैं उसे फिर से नहीं नहीं उनको रिवाइव करना पड़ेगा। फिर से नहीं ये यही खंभे ठीक-ठाक करके नहीं यूज़ किए जा सकते। ये जहरीले हो चुके हैं। इनको पूरी तरह से नया बनाना पड़ेगा। रचना पतना के बाद पतन के बाद हमेशा रचना का समय

53:11 आता है और रचना करते वक्त आपको नई चेतना भरनी पड़ती है। वो सब करना पड़ेगा। बिल्कुल यानी मेहनत बहुत ज्यादा इसके बाद भी जो लोग आएंगे मेहनत कम नहीं होती। मेहनत सिर्फ भ्रष्ट आदमी को पैसे मिलते हैं उसमें नहीं होती। जैसे आईएएस अफसर, आईपीएस अफसर, पुलिस वाले या आप जो संसद में बैठे हुए बीजेपी के सांसद है या मंत्री है अब जो जो इललीगल मंत्री है जो चुनाव छीछे देने हैं चुनाव आयोग है ये लोग आराम से वो कर सकते हैं। हम बिल्कुल दर्शकों देखिए आज हमने क्या करने की कोशिश की? बर्बादी कैसे होती है? उसके लिए कितने आसानी से आपके बीच में नफरत फैलाया जा रहा है। कैसे आपको इसमें सबसे बड़ा रोल एक मैं बताता हूं। छात्रों का है। यूनिवर्सिटीज का। यूनिवर्सिटी के ऊपर आरएसएस के लोग बिठे

53:57 इसलिए छात्र नहीं बर्बाद होते। छात्रों को अपनी विवेक को, अपनी चेतना को और अपनी रचनाओं को जिंदा रखना है। हम ये समय है जब उनके नाम के गीत लिखे जाएंगे बाद में। अब लड़ना जरूरी है। लड़ो तभी बढ़ोगे। आपको लग रहा है छात्र लड़ रहे हैं और वो कर रहे हैं सर 100% अच्छा कोई भी जिंदा व्यक्ति छात्र ही क्यों जिंदा कोई भी हो लड़े तो आप नहीं लड़ रहे मैं नहीं लड़ रहा हूं हम लड़ेंगे बिल्कुल शाहरुख नहीं लड़ रहा है बिल्कुल दर्शकों देखिए आज हमने क्या करने की कोशिश की एक लोकतंत्र जो है वो आपसे और हमसे बनता है और इसलिए हमें लगा कि लोकतंत्र के अंदर जो आप और हम रहते हैं हम कितने डिसेंसिटाइज हो गए हैं कि हमारे आसपास मुसलमानों को घर नहीं मिले किसी को फर्क नहीं पड़ता अगर अगर कोई नॉनवेज खाता

54:42 है उन्हें घर नहीं मिले किसी को फर्क नहीं पड़ता और इसी से धीरे धीरे धीरे-धीरे ये जो पूरा एक तरीके से अराजकता है वो कैसे फैलती जाती है उस पर चर्चा की और ये बहुत अलग चर्चा मुझे बहुत महत्वपूर्ण चर्चा लगी राजू सर सच कहूं आज के ये जो चर्चा है मुझे लगता है आने वाले कई सालों तक ये सारी चीजों को लोगों को देखना चाहिए ताकि उनको पता चले और जो आपने कहा वो हर चीज बहुत सही है कि अगर लोकतंत्र कम होता है तो उसका असर ना केवल आपको आपके आसपास नजर आता है आपके फिल्मों में आपके म्यूजिक में आपके कहानी ियों में हर जगह पर नजर आता है और पिछले कुछ सालों से आप देख लीजिए जैसे कोशिश है कि एक बाग में एक रंग के ही फूल हो उसी तरह से कोशिश ये है कि हर जगह पर उन्हीं के गुणगान हो और ना क्रिएटिविटी के लिए बाकी तो छोड़िए यार आपके कोविड सर्टिफिकेट

55:28 से लेके आपके यूरिनल तक एक ही आदमी की फोटो होगी कम है क्या पेट्रोल पंप से लेके हर जगह हर जगह पर बिल्कुल तो दर्शकों समझिए कि ये लोकतंत्र के साथ जिस तरह तरह से खिलवाड़ हो रहा है। भले ही प्यार से राजू सर ने समझाया हो लेकिन एक-एक बात जो है बहुत गंभीर बात है और मैं उम्मीद करता हूं कि जितने अच्छे से इन्होंने इस पूरे बात को रखा है उतनी ही अच्छे से आप इसकी गंभीरता को समझ रहे हैं क्योंकि जब तक आप फिर से सेंसिटिव नहीं होंगे जब तक आप किसी और के लिए महसूस नहीं करेंगे तब तक यह देश नहीं बदलेगा क्योंकि यह देश आपसे और हमसे बनता है। बहरहाल जो शीर्ष पर हैं उनके ऊपर किस तरह से कार्रवाई होगी यह तो समय ही बताएगा। लेकिन कहीं ना कहीं जो लोग इस देश के फैब्रिक को खत्म करना चाहते हैं उनसे सतर्क रहिए। आज

56:14 के इस वीडियो से हम यही बताने की कोशिश कर रहे हैं। सर सच कहूं मुझे बहुत मजा आया। आज ये वाले चर्चा में तो सच में बहुत मजा आया। क्योंकि ये बातें वो हैं जो हर किसी के मन में है लेकिन कोई बात नहीं करता और आपने जिस क्लेरिटी से इस बात को बताई टेक अवे पॉइंट सबसे बड़ी बात है कि आदमी भ्रष्ट है। ये बड़ी बात नहीं है। आदमी संवेदना नहीं है उस बात की उसको। तो ये बहुत बड़ी बात है कि आप सोच नहीं रहे हैं कि सामने वाले आप लाठी चला रहे हो वो बड़ी बात नहीं है। आप लाठी चला रहे हो उसकी संवेदना आप में नहीं है। मर चुकी है। वो भी एक इंसान है उसकी। वो बड़ी बात है। वो बहुत बड़ी बात है। तो जो संवेदनाएं मरी हैं आज का ये एपिसोड उन्हीं लोगों के लिए है ताकि आपको पता चले कि संवेदनाएं मरने से ही देश का आप बाबरी का पेड़ा खा सकते हो। वो संवेदना मरने का लक्षण है। लक्षण है। और ये लक्षण आपके आसपास भी क्या दर्शकों दिख रहा है? कमेंट सेक्शन में

56:59 बताइएगा। आप क्या सोचते हैं आज के एपिसोड के बारे में? आपको कितना अच्छा लगा? मुझे तो सच में बहुत मजा आया। कमेंट सेक्शन में आपका इंतजार रहेगा। फिलहाल आप दीजिए इजाजत। वीडियो पसंद आया तो इसे लाइक करें। ज्यादा से ज्यादा लोगों तक साझा करें और ये जो चैनल है द टेलिस्कोप इसमें इसी तरह से टेलीिस्कोप से जो दूर की चीजें हैं उसे बहुत क्लेरिटी से देखने की कोशिश होती है। आज राजू सर से ऐसा मुद्दा जो आपके मेरे हर किसी की जिंदगी से जुड़ा है उसे बहुत क्लेरिटी से समझने की कोशिश की है। तो इस चैनल द टेलीिस्कोप को भी आप सब्सक्राइब करें और कमेंट सेक्शन में तो आपका इंतजार रहेगा। बहुत-बहुत शुक्रिया राजू सर। आप मिले। फिलहाल दीजिए इजाजत दर्शको।

Share

More video summaries