भगवान् की पूजा - उपासना के लिए सबसे Important ज्ञान | Jagadguru Kripalu Ji Pravachan

संक्षिप्त सारांश

इस प्रवचन में, जगतगुरु श्री कृपालु जी महाराज भक्ति के सार को एक दोहे में प्रस्तुत करते हैं: "हरि गुरु भज नित, भाव निष्काम अनन्य।" वे भागवत पुराण के श्लोकों का हवाला देते हुए भक्ति के तीन महत्वपूर्ण पहलुओं पर जोर देते हैं: निरंतर भक्ति, निष्काम भक्ति (बिना किसी इच्छा के), और अनन्य भक्ति (केवल भगवान और गुरु के प्रति)। महाराज जी बताते हैं कि सच्ची भक्ति मन से होनी चाहिए, न कि केवल बाहरी क्रियाओं से। वे श्रोताओं को सलाह देते हैं कि सांसारिक इच्छाओं से दूर रहें और निरंतर भगवान और गुरु के ध्यान में लगे रहें, भले ही वे सांसारिक कार्य कर रहे हों।

  • भक्ति का सार: "हरि गुरु भज नित, भाव निष्काम अनन्य"
  • भक्ति के तीन पहलू: निरंतर, निष्काम, और अनन्य
  • मन से भक्ति करने का महत्व और सांसारिक इच्छाओं से दूरी

शास्त्रों का सार

महाराज जी कहते हैं कि उन्होंने समस्त शास्त्रों और वेदों का सार एक दोहे में रख दिया है: "हरि गुरु भज नित और भाव निष्काम अनन्य।" वे श्रोताओं को इस दोहे को याद रखने और हमेशा स्मरण रखने के लिए कहते हैं।

भागवत पुराण का सन्दर्भ

भागवत पुराण में शौनकादिक परमहंसों ने सूत जी से प्रश्न किया कि मनुष्य का कल्याण कैसे हो सकता है। सूत जी ने उत्तर दिया कि मनुष्य को अहतुकी (बिना किसी हेतु के), अप्रतिहता (बिना किसी बाधा के), और अव्यवहिता (निरंतर) भक्ति करनी चाहिए। तीसरे स्कंध में निर्गुण भक्ति के लक्षण भी बताए गए हैं, जिसमें अनन्य भक्ति, अहैतुकी भक्ति और अप्रतिहता भक्ति शामिल हैं।

भक्ति के तीन शर्त

भक्ति के तीन मुख्य शर्तें हैं: हरि गुरु की भक्ति करना, नित्य भक्ति (निरंतर भक्ति), और निष्काम भक्ति (बिना किसी कामना के)। वेद कहता है कि जैसी भक्ति भगवान के प्रति हो, वैसी ही भक्ति गुरु के प्रति भी होनी चाहिए। हरि और गुरु एक हैं, और वे शुद्ध हैं। इसलिए, केवल हरि और गुरु की ही भक्ति करनी चाहिए।

निरंतर भक्ति का महत्व

भक्ति का अर्थ है मन का अटैचमेंट। केवल वाणी से राम राम राधे राधे बोलने से काम नहीं बनेगा, बल्कि मन से भगवान के प्रति प्रेम होना चाहिए। उनके दर्शन की तीव्र व्याकुलता होनी चाहिए। यदि हम थोड़ी देर भक्ति करते हैं और बाकी समय संसार की भक्ति करते हैं, तो हम कर्जदार हो जाएंगे। इसलिए, निरंतर भगवान और गुरु में मन को लगाते रहना चाहिए।

सांसारिक कार्यों के साथ भक्ति

महाराज जी बताते हैं कि सांसारिक कार्यों के साथ भी भक्ति की जा सकती है। ऑफिस में काम करते समय भी मन से भगवान को अपने पास बिठाकर उनका ध्यान किया जा सकता है। थोड़ी-थोड़ी देर में अभ्यास करने से भगवान हमारे मन में बस जाएंगे और फिर हटाने से भी नहीं हटेंगे।

निष्काम भक्ति का महत्व

भक्ति निष्काम होनी चाहिए, यानी कुछ मांगना नहीं चाहिए। संसार का सुख सुख है, ऐसी बुद्धि में अभी भ्रम है। इसलिए, संसार की कामना से भगवान की उपासना नहीं करनी चाहिए। जिनके पुत्र भगवान राम थे, उनके पिता दशरथ जी भी मर गए, और जिनके मामा श्री कृष्ण भगवान थे, उनके सामने अभिमन्यु मारा गया। इसलिए, भगवान से कुछ नहीं मांगना चाहिए।

अनन्य भक्ति का महत्व

अनन्य भक्ति का अर्थ है केवल भगवान और गुरु से ही प्रेम करना। मन को संसार और भगवान दोनों में नहीं बांटना चाहिए। सारी गीता में भगवान ने अर्जुन से कहा कि केवल मेरी शरण में आओ, तभी कृपा करूंगा। संसार और भगवान दो विरोधी चीजें हैं, इसलिए या तो संसार को रखो या भगवान को।

निष्कर्ष

बुद्धि में निश्चय करना होगा कि हरि गुरु में ही मन का अटैचमेंट हो, और केवल हरि गुरु में हो। ना देवी देवता से, ना मनुष्य से, ना राक्षस से। सतगुण, रजोगुण, तमोगुण तीनों से नहीं। बिना किसी कामना के, कुछ मांगना नहीं है, और निरंतर भक्ति करनी है। यही सारी बातें दोहे में कही गई हैं: "हरि गुरु भज नित, भाव निष्काम अनन्य।" इस ज्ञान को बुद्धि में भरकर प्रैक्टिकल लाइफ में अभ्यास करने से भगवत प्राप्ति हो जाएगी।

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Transcript

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0:01 मैंने समस्त शास्त्रों वेदों का सार इस एक दोहे में रख दिया है। इस दोहे को सब लोग याद कर लो। याद कर लो और हमेशा याद रखो। हरि गुरु भज नित और भाव निष्काम अनन्य बस इतना सा ज्ञान है समस्त वेदों में शास्त्रों

0:50 में भक्ति का सबसे प्रमुख ग्रंथ है भागवत भागवत में कहा गया उनसा तत श्रेय तन में संशित मरहसी शौनकादिक परमहंसों ने सूत जी से प्रश्न किया भागवत के प्रथम स्कंध के प्रथम अध्याय के नौव श्लोक में मनुष्य का

1:38 कल्याण कैसे हो? संक्षेप में बताइए कलयुग के मनुष्यों में बहुत कम याददाश्त शक्ति है। विस्तार से अगर कुछ समझाया जाएगा तो भूल जाएंगे। तो सूत जी ने कहा सब पुसा परो धर्मो यतो भक्ति रोजे

2:26 अहतु प्रतिहता यजात्मा सम प्रसीदति अहतुकी भक्ति होनी चाहिए। एक शर्त यह है। और अप्रतिहता भक्ति होनी चाहिए। दूसरी शर्त यह है और अब व्यवहिता भक्ति होनी चाहिए। निर्गुणा भक्ति का लक्षण भी किया गया है। तीसरे स्कंध

3:14 में अहतु कब्यहिता या भक्ति पुरुषोत्तमे अर्थात अनन्य भक्ति होनी चाहिए और अहैतु की भक्ति होनी चाहिए। और अप्रतिहता भक्ति होनी चाहिए निरंतर ध्यान दीजिए तीन शर्तें हैं कुल जमा टोटल हरि गुरु की भक्ति करना है। क्यों? वेद कहता है यस देवे परा भक्ति यथा

4:05 देव तथा गुरु जैसी भक्ति भगवान के प्रति हो वैसी भक्ति गुरु के प्रति हो। वो कान फूंकने वाले गुरु नहीं जो वास्तविक गुरु हो। क्यों? इसलिए हरि गुरु एक है। यह दोनों शुद्ध है। तो जैसे गंदे कपड़े को शुद्ध पानी से धो तो गंदगी जाएगी। अशुद्ध पानी से धोगे और गंदा होगा। तो बाकी मनुष्य, देवता, राक्षस ये

4:52 तीनों गंदे हैं। माया के अंडर में है। इनमें मन का प्यार करोगे तो और गंदा होगा मन। इसलिए हरि गुरु की ही भक्ति करना। नंबर एक और भक्ति में तीन शर्त। एक तो नित्य भक्ति। भक्ति माने मन का अटैचमेंट। इंद्रियों से ही नहीं वाणी से राम राम राधे राधे बोलने से काम नहीं बनेगा। मन का प्यार उसके बिना रहा ना जाए। ऐसा

5:41 प्यार उसके दर्शन की परम व्याकुलता बढ़े। ये प्यार अरे संसार में मांबाप बेटा स्त्री पति रसगुल्लाह से प्यार करते ही हो प्यार का मतलब क्या उसके पाने की तीव्र इच्छा काम ही नार पियार जिम लोभी प्रिय जिम दाम तो एक तो भक्ति हो मन से और हरि गुरु से ही हो और नित्य हो। अगर हमने एक घंटे, दो घंटे, चार घंटे

6:29 भी भक्ति कर लिया एक जगह बैठकर और बाकी टाइम में संसार की भक्ति किया। तो इसका मतलब क्या? ₹1 कमाया, ₹ खर्चा किया। तो कर्जदार हो जाएंगे। हमने एक बार तो शुद्ध पानी से कपड़ा धोया और तीन बार गंदगी में डुबोया तो उस कपड़े का क्या हाल होगा? यानी मन गंदा है। इसको आधा घंटे एक घंटे दो घंटे हरि गुरु में लगाया। थोड़ा

7:14 शुद्ध हुआ और फिर मां बाप बेटा स्त्री पति में अटैच कर दिया फिर गंदा हो गया ये नहीं चलेगा निरंतर तस्मात सर्वेशु कालेशु मास्मर नित्य युक्त उपासते तेशा नित्याभुक्त नाम जोमाम स्मरति नित्य सहा ये शर्त है भगवान की बार-बार बार-बार निरंतर मन को भगवान और गुरु में लगाते रहो। वो भूले

8:01 ना आप कहेंगे हमको दुकान का काम करना होता है या ऑफिस का काम करना होता है। वह कैसे करें? वह भी करो। आपको ऑफिस में काम करना है। अपनी मेज पर एक तरफ श्याम सुंदर को बिठा दो। मन से फोटो की जरूरत नहीं। मूर्ति की जरूरत नहीं। मन से बिठा दो। आप यहां बैठिए। आप देखिए मैं काम करता हूं। 10 मिनट 15 मिनट काम करने के बाद। हां। बैठे हो ना? हां। अच्छा। फिर काम कर रहे हैं। किसी को मालूम नहीं कहां बिठा रखा है, क्या सोच रहा है। यह तो अपनी

8:48 प्राइवेट बात है। हम लोग थोड़ीथ थोड़ी देर में हमारा बेटा बीमार है। उसका ध्यान कर लेते हैं ऑफिस में काम करते हुए। हां। तो उसी प्रकार थोड़ी-थोड़ी देर में अभ्यास कीजिए। तो फिर बाद में वो खोपड़ी में भर जाएंगे। श्याम सुंदर हटाने से नहीं हटेंगे। बड़े भयंकर हैं वो एक बार लग गए तो फिर सूरदास कहते हैं तुम बड़े समर्थ भगवान हो। हां हां है तो निकल जाओ हृदय से तो

9:35 जाने हृदयात यदि निरजा पौरुषम गणयामते हृदय ते जब जागे मर्द बदोंगो तो नहीं निकल सकते अरे जब देखो गंदी चीजें शराब सिगरेट चाय इसकी बीमारी लग जाती आती है कुछ दिन पीने से तो फिर वह कहता है ये तो हम नहीं छोड़ सकते महाराज जी और चाहे जो हो मां बाप बीवी सब भाड़ में जाए एक बोतल शराब के आगे देखो एक जड़ वस्तु ने पकड़ लिया

10:23 हमको कि सबको न्योछावर कर दिया शराब के ऊपर तो वह तो आनंद सिंधु है। एक बार लग जाएंगे तो फिर अपने आप की खोपड़ी में गूंजते रहेंगे। एक बार एक गोपी आंख मूंद करके जमुना के किनारे बैठ गई। अचानक नारद जी आए। उन्होंने कहा गोपी कितनी भक्त है श्याम सुंदर का ध्यान कर रही यमुना के किनारे अकेले बैठ के कुछ देर खड़े रहे नारद जी जब

11:10 उसने आंख खोला प्रणाम किया नारद जी माता जी आप क्या कर रही थी अभी श्याम सुंदर का ध्यान कर रही थी अरे उसका नाम मत लो मैं उसको को निकाल रही थी। वो हमारे पीछे पड़ गया है। हमारा सब काम बिगाड़ देता है। खाना पकाते हैं। रोटी जल जाती है। दाल जल जाती है। कोई काम सही-सही होने नहीं देता। ऐसा लग गया है हमारे पीछे। हां। थोड़े दिन लगाना पड़ेगा। फिर

11:55 लग जाएगा। तो एक तो मन से रूप ध्यान नंबर दो सदा। नंबर तीन निष्काम। कुछ मांगो मत। ये बड़ी बीमारी है हम लोगों में मांगने की। संसार का सुख सुख है। ऐसी बुद्धि में अभी भ्रम है। इसलिए संसार की कामना से भगवान की उपासना करते हैं। देवी देवता यहां तक कि कब्रिस्तान में भी जाने को नहीं हम हिचकते अपनी कामना पूर्ति के लिए।

12:44 याद कर लो एक सबक कि जिनके पुत्र भगवान हैं राम उनके बाप मर गए दशरथ जी राम नहीं बचा सके जिनके मामा श्री कृष्ण भगवान बाप गीता ज्ञानी अर्जुन संत ब्याह कराने वाले पहले वेदव्यास भगवान के वो भी अवतार हैं। तीनतीन पर्सनालिटी अभिमन्यु मारा गया। उसकी 16 वर्ष की स्त्री विधवा हो गई। कोई नहीं बचा सका। और आप लोग जाते हैं मंदिरों में। ए

13:33 वैष्णो देवी ये तिरुपति मंदिर, यह यहां की दुर्गा जी, यहां के हनुमान जी यह हमारी इच्छा पूर्ति कर देंगे। हमारे मरते हुए पुत्र को जिंदा कर देंगे। हमारा यह काम कर देंगे। प्रारब्ध भोगना पड़ेगा सबको। भगवत प्राप्त संत को भी भोगना पड़ता है। औरों की क्या हैसियत है? तो यह गोबर निकाल दो दिमाग से। भगवान से कुछ नहीं मांगना। मर जाएंगे मांगेंगे नहीं कुछ बेटा मरे बाप मरे बीवी मरे हम दरिद्री हो जाए भिक्षा

14:21 मांगे भगवान से नहीं कहेंगे ये कमर कस लो तब भगवान का सिर हिलता है अरे ये तो पीछे ही पड़ गया अब इसके ऊपर कृपा करनी पड़ेगी और जब तक दिमाग में मन में गोबर भरे हुए संसार वाला तो भगवान कहते हैं रहो रहो रहो मैं बाहर रहूंगा सब गोबर निकालो तो मैं आऊं कूड़ा करकट निकालो साफ करो ड्राइंग रूम तो अनन्य भक्ति भी हो एक शर्त ये भी आ

15:07 गई यानी एक मन है। अब उससे हम भगवान से भी प्यार करें, गुरु जी से भी करें और मम्मी से भी करें, बिटिया से भी करें। ये नहीं चलेगा। हां। सारी गीता क्या है? अर्जुन धर्म की शरण में भी था। भगवान की शरण में भी था। भगवान ने कहा नहीं चलेगा। माकम शरणम ब्रज केवल मेरी शरण में आ तब कृपा करूंगा। यह दो विरोधी चीजें हैं संसार और भगवान। इस मन में भगवान को रख लो या संसार

15:56 को रख लो। संसार आया भगवान गए। अब तुमको जो चाहिए उसको रख लो। देखो एक लड़की 18 20 साल तक शादी के पहले तक अपने मायके को अपना घर मेंती है। अपनी सहेली से कहती है ये ये हमारी गाड़ी है। ये और जैसे ससुराल गई उसी दिन ये मेरा घर है। ये गाड़ी है। अच्छा अच्छा रात को चोरी

16:41 हो गई। सब घर वाले परेशान वो भी परेशान। अरे तू तो अभी कल आई है। अरे तो ये मेरे सामान तो था उसमें से सब निकल गया। एक सेकंड में अगर हम जान ले आत्मा का एकमात्र परमात्मा श्री कृष्ण ही सब कुछ है। ये सब स्वार्थी है। इनका स्वार्थ सिद्ध कर दो तो पिताजी हैं, माताजी हैं, बेटा जी हैं। स्वार्थ सिद्ध ना करो गोली मार दे। रोज होता है। आप सब देखते हैं, सुनते

17:28 हैं। तो बुद्धि में निश्चय करना होगा। हरि गुरु में ही मन का अटैचमेंट हो और केवल हरि गुरु में हो। ना देवी देवता से ना मनुष्य से ना राक्षस से। सतगुण, रजोगुण, तमोगुण तीनों से नहीं और बिना किसी कामना के कुछ मांगना नहीं है। और निरंतर हो। यह सारी बातें हमने एक दोहे में रखी है। हरि गुरु भज नित नित माने

18:14 हमेशा अभाव निष्काम यानी कोई मांगना नहीं और अनन्य और कहीं मन का प्यार ना होने पाए। बस इतना सा ज्ञान बुद्धि में भर लो। फिर प्रैक्टिकल लाइफ में उसका अभ्यास कर लो। बस भगवत प्राप्ति हो जाए।

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