कैसे मिलेगी real स्वतंत्रता? Independence Day Special प्रवचन || Jagadguru Kripalu Ji Pravachan

संक्षिप्त सारांश

यह प्रवचन स्वतंत्रता की वास्तविक परिभाषा पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि कैसे माया के अधीन जीव वास्तव में स्वतंत्र नहीं हैं, जबकि भगवान और उनके भक्त भी एक-दूसरे के अधीन हैं। सच्ची स्वतंत्रता भगवत प्राप्ति में है, जो आनंद प्रदान करती है, जबकि सांसारिक इच्छाओं से दुख मिलता है।

  • माया के अधीन जीव स्वतंत्र नहीं हैं।
  • भगवान और उनके भक्त भी एक-दूसरे के अधीन हैं।
  • भगवत प्राप्ति ही वास्तविक स्वतंत्रता है, जो आनंद प्रदान करती है।

स्वतंत्रता दिवस का महत्व

आज स्वतंत्रता दिवस है, लेकिन वास्तव में कोई भी स्वतंत्र नहीं है। अनंत कोटि ब्रह्मांड में घूमने वाले सभी जीव माया के अधीन हैं। माया के अंतर्गत काल, कर्म, स्वभाव और गुण आदि चीजें हैं जिनके अधीन मनुष्य, पशु, पक्षी आदि सभी हैं।

माया और भगवान के अधीन

कुछ लोग माया से परे होते हैं, लेकिन वे भगवान के अधीन होते हैं। माया के अधीन लोगों को माया छूती है, जबकि भगवान के अधीन महापुरुषों को माया नहीं छू सकती। भगवान के अनुसार चलना पड़ता है, इसलिए वे भी अधीन हैं। भगवान भक्त के अधीन हैं, इसलिए भक्त भी पराधीन हैं।

वास्तविक स्वतंत्रता

न तो भगवान स्वतंत्र हैं और न ही भगवान को पा लेने वाले भक्त स्वतंत्र हैं। माया के अधीन लोग तो बेचारे परतंत्र हैं ही। अहंकार के कारण हम किसी के आगे सर नहीं झुकाते, किसी के आगे हाथ नहीं फैलाते। काम, क्रोध और लोभ के अधीन होकर भी हम बोलते रहते हैं, यह आश्चर्यजनक है।

महापुरुषों का उदाहरण

महापुरुष कहते हैं कि वे किसी के अंडर में नहीं हैं। इसका भावार्थ यह है कि वे माया के अंडर में नहीं हैं, लेकिन भगवान के अधीन हैं। भगवान अकेले बचे हैं जो कहते हैं कि वे स्वतंत्र हैं, लेकिन इतिहास साक्षी है कि वे भक्तों की सेवा करते हैं। कृष्ण ने अर्जुन के रथ को दोनों सेनाओं के बीच खड़ा किया, और उन्हें अर्जुन के युद्ध संबंधी सभी आदेश मानने पड़े।

भक्ति में आनंद

अपढ़ गवार संत भी भगवान के अधीन रहे हैं। स्वतंत्रता की असली परिभाषा यह है कि कुछ लोग माया से स्वतंत्र हैं और कुछ लोग भगवान से स्वतंत्र हैं। माया से स्वतंत्र न होने वाले कहते हैं कि वे स्वतंत्र हैं, और भगवान से स्वतंत्र वही लोग हैं जो माया के अंडर में हैं। माया का परिणाम दुख है, जबकि भगवान की गुलामी में आनंद है।

भगवत प्राप्ति

भगवान संबंधी काम, क्रोध और लोभ सब में आनंद है, जबकि संसार संबंधी काम, क्रोध, लोभ और मोह सब में दुख ही दुख है। इसलिए भगवान संबंधी आनंद, यानी भगवत प्राप्ति करना ही वास्तविक स्वतंत्रता का लक्षण है और उसी के लिए प्रयत्न करना चाहिए।

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Transcript

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0:01 आज स्वतंत्रता दिवस है वास्तव में कोई स्वतंत्र नहीं है अनंत कोट ब्रह्मांड के आवागमन में घूमने वाले सभी जीव माया के आधीन हैं व माया के अंतर्गत काल कर्म स्वभाव गुण बहुत सी चीजें हैं जिनके आधीन है

0:50 मनुष्य हो पशु हो पक्षी हो कोई भी हो और हम लोगों में कुछ माया से परे भी होते हैं लेकिन वेह भगवान के आधीन है माया धीन को माया चाती है और भगवान के आधीन महापुरुषों को माया नहीं छू सकती

1:38 लेकिन भगवान के अनुसार चलना पड़ता है वह भी आधीन है और भगवान भक्त के आधीन है हम भक्त पराधीन हो इसलिए ना भगवान स्वतंत्र है ना भगवान को पा लेने वाले भक्त स्वतंत्र है और माया धीन तो बिचारे परतंत्र है ही हम लोगों का अनुभव है लेकिन हम लोग बकबक करने में टॉप करते

2:27 हैं अहंकार के कारण हम किसी के आगे सर नहीं झुकाते हम किसी के आगे हाथ नहीं फैलाते एक एक क्षण जो माया के आधीन है वह ऐसी बकबक क्यों करता है आश्चर्य है काम के आधीन क्रोध के आधीन लोभ के आधीन बड़े बड़े दैत्य हमारे पीछे लगे हैं और फिर भी हम बोले जाते हैं यहां हमारे गांव में एक कहावत

3:14 है कि किसी बनिया को एक झापड़ लगाओ तो कहता है अबकी मारो तो बताऊ फिर मार दिया अबकी मारो तो बताऊ पिटता जा रहा और बोलता जा रहा है महापुरुष लोग कहते हैं हम किसी के अंडर में नहीं है ठीक है माया के अंडर में नहीं हो यह भावार्थ है लेकिन भगवान के आधीन हो

4:02 भगवान अकेला बचाओ जो कहता है हम स्वतंत्र हैं लेकिन इतिहास साक्षी है भक्तों की सर्विस करते हैं गंदी गंदी सर्विस साधारण जीव सेन भयो मध्य रथम स्प अचत कृष्ण दोनों सेनाओं के बीच में रथ खड़ा करो

4:50 ऑर्डर करना पड़ता है जो कासन होगा अर्जुन का युद्ध के बीच में भी वो सब मानना पड़ता है अपड गवार संत 99 पर हुए हैं हमारे संसार में एक कमती भाई जन्ना बाई तमाम इनकी भी गुलामी किया है तो स्वतंत्रता की जो असली परिभाषा है वह यह है कि कुछ लोग माया से स्वतंत्र

5:42 है और कुछ लोग भगवान से स्वतंत्र है मन माना माया से स्वतंत्र जो है नहीं वह कहते हैं हम हैं और भगवान से स्वतंत्र वही लोग है जो माया के अंडर में है लेकिन माया का परिणाम दुख है उनकी गुलामी वाला दुख भोगता है और भगवान की गुलामी में आनंद है इतना बड़ा अंतर है भगवान संबंधी काम क्रोध लोभ सब में

6:30 आनंद है और संसार संबंधी काम क्रोध लोभ मोह सब में दुख ही दुख है इसलिए भगवान संबंधी आनंद यानी भगवत प्राप्ति करना ही वास्तविक स्वतंत्रता का लक्षण है और उसी के लिए प्रयत्न करना चाहिए

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