kyo hamara man bhagwan me nahi lagta hai, the problem we face while going towards God

Braj Chakori Devi www.youtube.com

संक्षिप्त सारांश

यह प्रवचन सांसारिक सुखों के प्रति आसक्ति और भगवान के प्रति अनासक्ति पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि कैसे मनुष्य छोटे सांसारिक लाभों के लिए आध्यात्मिक सुखों को त्याग देते हैं, क्योंकि उनका मन अनादि काल से संसार में लगा हुआ है। बुद्धि के अहंकार के कारण वे संसार से मन को हटा नहीं पाते और भगवान में मन लगाने का प्रश्न ही नहीं उठता।

  • सांसारिक सुखों के प्रति आसक्ति आध्यात्मिक सुखों से दूर करती है।
  • मन अनादि काल से संसार में लगा हुआ है।
  • बुद्धि का अहंकार भगवान में मन लगाने में बाधक है।

सांसारिक स्वार्थ और परम आनंद

वक्ता बताते हैं कि लोग सांसारिक लाभों को आध्यात्मिक सुखों से अधिक महत्व देते हैं। यदि कहीं एक पैसे का स्वार्थ सिद्ध हो रहा है और दूसरी जगह दो पैसे का, तो लोग दो पैसे वाले स्वार्थ को अपनाते हैं। इसी तरह, जहां एक तरफ सांसारिक सुख-सुविधाएं हैं, वहीं दूसरी तरफ परमानंद है, तो लोग सांसारिक सुखों को चुनते हैं।

मन की आसक्ति

अनंत जन्मों से मन संसार में लगा हुआ है, जिससे यह निश्चय हो गया है कि संसार में ही सुख है। भले ही लोगों को संसार में सुख न मिला हो, वे मानते हैं कि उनके माता-पिता, पत्नी या बच्चे खराब हैं, लेकिन संसार में आनंद है। इस कारण संसार में मन का लगाव गहरा हो गया है और मन उदासीन नहीं है।

संतों और शास्त्रों की उपेक्षा

बड़े-बड़े संत और भगवान भी लोगों को संसार से मन हटाने में सफल नहीं हो पाए। लोग वेदों और शास्त्रों की बातों को अनसुना कर देते हैं और अपनी बुद्धि के अहंकार में डूबे रहते हैं। वे अपनी डिग्रियों और उपलब्धियों को महत्व देते हैं और संसार से मन को हटा नहीं पाते।

मन की एकाग्रता

मन एक ही है, इसलिए उसे एक ही वस्तु से एक समान सुख नहीं मिल सकता। एक ही मां, बाप या पत्नी से दिन भर में कई तरह के सुख मिलते हैं, कभी ज्यादा तो कभी कम। लोग अपनी पत्नियों को दोष देते हैं और जीवन को खराब बताते हैं। कृपालु जी महाराज भी यही बात कह रहे हैं, लेकिन फिर भी मन संसार में ही जाता है।

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Transcript

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0:00 अगर कहीं पर एक पैसे का स्वार्थ सिद्ध हो रहा है, दूसरी जगह दो पैसे का स्वार्थ सिद्ध हो रहा है, तो हम संसार में भी दो पैसे वाला अपनाते हैं। अरे यहां तो एक पैसे का प्रॉफिट है। नहीं वो और जहां एक जगह चप्पल जूता मिलता है, एक जगह परमानंद मिलता है। ऐसा प्रश्न हो अरे तो वहां क्या प्रॉब्लम है? है अनंत जन्म बीत गए। इतनी बड़ी प्रॉब्लम है। वो क्या प्रॉब्लम है? यह है कि हमारा मन संसार में

0:50 अनादि काल से लग चुका है। यानी हमारी बुद्धि का यह डिसीजन, ये निश्चय पक्का हो चुका है कि संसार में सुख है। हमको नहीं मिला। हमारा बाप खराब है। हमारी मां खराब है। हमारा बेटा खराब है। हमारी बीवी खराब है। लेकिन संसार में आनंद है। लगे रहो। तो संसार में हमारे मन का अटैचमेंट प्रगाढ़ हो चुका है। हम उदासीन नहीं है मन से। यह प्रॉब्लम है।

1:38 बड़े-बड़े संत आए, जगत गुरुओं के बाप आए, भगवान आए और सब चले गए। बैरंग हम अपनी जगह डटे हैं। संसार में सुख है। अरे हम वेद हैं। अरे हम शास्त्र हैं। हां हां ठीक है। ठीक है। अरे हम वेदव्यास भगवान के अवतार बोल रहे हैं। अरे ठीक है आप बोल रहे होंगे। हमारा भी तो कोई निश्चय है। हम बीए हैं, एमए है, पीएचडी है, आईएस ओ हो ये अपनी बुद्धि का अहंकार लेकर हम लोग संसार से मन को हटा ना सके। इसलिए भगवान में लगाने का प्रश्न ही नहीं। क्योंकि एक ही तो मन है। एक ही आदमी को एक

2:26 ही वस्तु से एक सा सुख नहीं मिलता। मैंने बताया ना उसी मां से, उसी बाप से, उसी बीवी से दिन भर में कितने प्रकार का सुख मिलता है। बड़ा सुख, कम सुख और कम और कम लाइफ खराब हो गई। ऐसी बीवी मिली। ये क्या जोकरी है। हां है तो ऐसे ही। कृपालु जी आप तो बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। फिर फिर क्या फिर वही मन जाता है। यह फिर है।

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