Chinese Communist Party Joins Hands with BJP; Calls on Hosbole: Congress Asks What MoU Signed | LIVE

简要总结

本视频讨论了印度人民党(BJP)与中国共产党(CPC)之间的互动,以及这些互动对印度国家利益的影响。重点包括:

  • BJP和RSS与中国共产党代表团的会晤,以及这些会晤缺乏透明度的问题。
  • 莫迪总理过去与涉嫌走私的中国公民的联系。
  • 中印贸易逆差不断扩大,尽管印度政府呼吁抵制中国商品。
  • 印度不明确的外交政策,以及在国际关系中保持明确立场的必要性。

介绍

讨论了印度人民党(BJP)与中国共产党(CPC)之间的会晤,包括BJP官员和RSS秘书长Dattatreya Hosabale的参与。会议旨在加强两党之间的沟通和互动。在加勒万河谷事件和中国在争议地区的基础设施建设之后,这种互动引起了人们的关注。

莫迪与走私犯

回顾了纳伦德拉·莫迪担任古吉拉特邦首席部长期间访问中国,以确保被监禁的印度公民获释的事件。这些人因走私钻石被捕。强调了S. Jaishankar在此事中的作用,他当时是印度驻华大使,并为这些走私犯提供了支持。

政治评论

讨论了如果国大党与中国官员会面可能产生的虚伪反应,并强调了对RSS与中国共产党代表团会晤缺乏公众监督。分析人士认为,这次会议可能与犯罪活动有关,并质疑与没有注册或银行账户的组织进行讨论的性质。

印中关系

概述了中印关系中的关键事件,包括2020年6月19日的加勒万河谷冲突,中国对阿鲁纳恰尔邦的主张,以及中国在印巴冲突中对巴基斯坦的支持。尽管发生了这些事件,印度还是为中国共产党代表团铺上了红地毯,并在BJP和RSS总部接待了他们。

贸易和经济影响

讨论了印度对中国商品实施贸易限制,以及此后中印贸易额的增加。尽管莫迪总理呼吁购买印度制造的甘尼萨神像,但印度对中国的贸易逆差已达到1000亿美元。强调了这种虚伪性以及对印度经济的影响。

外交政策与国际关系

分析了印度的外交政策,强调了在国家利益和国际关系中保持明确立场的必要性。批评了印度不一致的做法,即有时与美国结盟,有时又转向中国。强调了中国不可靠的性质以及与中国建立牢固关系的历史教训。

意识形态与政治

讨论了印度人民党和中国共产党之间的意识形态相似之处,尽管它们存在所谓的差异。分析人士认为,两党都专注于维持权力,并可能为了自身利益而牺牲意识形态原则。质疑了在与中国共产党打交道时缺乏透明度,并呼吁对RSS与中国代表团的会晤进行调查。

全球视角与结论

讨论了新兴的世界秩序,以及印度在其中的地位。强调了印度在国际舞台上保持强大立场的必要性,并质疑印度在与中国打交道时的妥协。分析人士呼吁公众对政府及其与中国的关系保持警惕,并要求透明度和问责制。

几秒总结任意 YouTube 视频

用免费的 Summ App,为任意视频生成这样的摘要,支持你的语言。

在 App Store 下载
在 Google Play 下载

文字稿

“Chinese Communist Party Joins Hands with BJP; Calls on Hosbole: Congress Asks What MoU Signed | LIVE”的完整文字稿。点击时间戳即可从该位置打开视频。想要其他视频的字幕?试试 YouTube 字幕提取工具。

0:14 नमस्ते 5 पीm लाइव में आपका स्वागत है। तो एक बार फिर से भारतीय जनता पार्टी और चीन की जो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना है उनके बीच इस बार गुप्तच नहीं बीजेपी के उन्होंने प्रवक्ताओं ने कहा हमने खुल के सीना तान के उनके साथ बातचीत की है और केवल उन्होंने नहीं की है आरएसएस ने भी की है आरएसएस के जो जनरल सेक्रेटरी दत्तात्रेय होसबले साहब हैं उन्होंने की केशव कुंज भी गए बीजेपी के हेड क्वार्टर्स भी आए बीजेपी के साथ तो दो दिन मीटिंग हुई। फिर एक दिन आरएसएस के साथ मीटिंग हुई। लंबी चौड़ी मीटिंग हुई। अह और उसमें कहा यह गया कि इट इज टू स्ट्रेंथन इंटर पार्टी कम्युनिकेशन। दोनों पार्टियों के बीच का जो संवाद है

1:00 उसको बढ़ाने के लिए और इंटरेक्शन इन दोनों पार्टियों के बीच का। गलवान में इतने जवान शहीद होने के बाद चीन जो हमारे नोस लैंड जो बफरल लैंड पर थे उसमें पक्की बुनियादी तौर पे जो उसने इतने रिहााइश और इतने कंस्ट्रक्शन बना दे उसके बाद ये जो मिलनाजुलना हो रहा है ये मैं इसको इसलिए थोड़ा हिस्टोरिकली आपको के साथ एक चीज शेयर कर रहा हूं ये अगर कोई सरकारी मामला होता ना ये अगर कुछ होता कि ये खरीदो। चाइना से तो हम ऐसे ही बहुत खरीद रहे हैं। हमारा ट्रेड डेफिसिट तो बुरी हालत है। 100 मिलियन से ज्यादा का ट्रेड डेफिसिट है चाइना से। ये मामला मेरे हिसाब से कोई और अपराधियों का है। और मैं क्यों

1:47 कह रहा हूं अपराधियों का है? उसके पास मेरे पास ठोस वजह है। मैं शुरुआत इसलिए कर रहा हूं कि पहले मैं वो एक वीडियो दिखा दे रहा हूं जो मोदी जी का 2011 का एस चीफ मिनिस्टर ऑफ गुजरात था। वो वीडियो सुन लीजिए और फिर आपको चीजें क्लियर हो जाएंगी। लगाइएगा। चाइना गया था तब चीन के कई वरिष्ठ राजपुरुषों के साथ मेरा मिलना हुआ था। वहां के सरकार के भी वरिष्ठ लोगों से मिलना हुआ था। तब मैंने गुजरात के जो 22 लोग चीन की जेल में हैं उनके विषय में कुछ सवाल उठाए थे और मैंने उस समय आग्रह किया था

2:33 कि हमारी अपेक्षा यह है कि कम से कम ट्रायल को एक्सपोडाइज किया जाए। जल्दी से जजमेंट मिले और ये हमारे लड़के घर वापस आए। इसकी कोई व्यवस्था होनी चाहिए। उस समय मुझे प्रॉमिस किया गया था कि हम इसको गंभीरता से लेंगे और मुझे विश्वास दिलाया गया था कि बहुत जल्द ही आपको हम अच्छी खबर सुनाएंगे। और मैंने देखा कि मैं यहां जब वापस आया तो पिछले दो साल से लड़के जेल में थे। कभी भी हिंदुस्तान के एंबेसडर को उनको मिलने नहीं दिया गया था। लेकिन मेरी इस मुलाकात के बाद तीसरे दिन भारत के एंबेसडर को जो वहां

3:18 चीन में हमारे राजदूत हैं। उनको उन्होंने जेल जाने के लिए व्यवस्था की। वो सभी नौजवानों से मिले। उनके सुखदख की चिंता की और पिछले 15 दिन में लगातार संपर्क में था और आज उन्होंने उसको एक्सपिडाइज करते कोर्ट का जजमेंट भी आ गया। काफी नौजवान जेल से मुक्त हो गए हैं। जिनको कुछ ना कुछ सजा हुई है उनका भी शायद कार्यकाल कुछ को तो पूरा हो जाएगा। तो उनके परिवार जनों को एक बहुत बड़ी राहत मिली है और मैं चीन सरकार का इसलिए आभारी हूं कि उन्होंने मुझे जो वादा किया था उस वादे को उन्होंने निभाया और ये बहुत कम समय में चीजों को एक्सपडाइज करके उन्होंने हमारी बात का

4:03 सम्मान रखा इज्जत रखी। मैं उनका आभारी हूं। मैं इसके बाद का वो भी दिखा दे रहा हूं। वो आर्टिकल क्योंकि वो लंबा आर्टिकल है। लिंक दे दे रहा हूं। आप लोग उसको चैन से पढ़ लीजिएगा। नरेंद्र मोदी जी के पेज पे ही है। नरेंद्र मोदी चाइना स्टार्टेड शोइंग रिजल्ट जजमेंट इन केस ऑफ 22 इंडियंस मोस्टली गुजराती लैंग्वेशिंग इन चाइनीस जेल डिलीवर टुडे 13% फ्री नॉट टू सर्व थ्री टू सिक्स इयर्स इन प्रजन अब ये समझ लीजिए कौन लोग थे जो लड़के थे ना इनके जिनके लिए गए थे ये स्मगलर थे ये हीरो के स्मगलर थे और कौन इस समय हीरो का सबसे बड़ा व्यवसाई था और 2010 में ये पकड़े गए थे हांगकांग और चीन के बीच में स्मगलिंग करते हुए भारत से इसका कोई लेना देना नहीं अब अपने मोदी जी तो इंटरनेशनल वो थे ना शुरू से विश्व गुरु थे तो उस उन स्मगलरों

4:49 का को छुड़वाने के लिए गए थे। पहली चीज स्मगलिंग उस समय हीरे के व्यवसाय में सबसे ज्यादा किसकी दखल अंदाजी थी ये भी आप Google करके खुद देख लीजिएगा। जो डबल ए में एक ए साहब हैं वो इनके थे। ये डबल ए के एक साहब का भतीजा भी इनके साथ उस डेलीगेशन में गया था जब ये चीन इन स्मगलरों को छुड़वाने गए थे। अच्छी खबर यह थी कि जो यह कह रहे हैं सजा सबको मिली थी। सबको सजा मिली थी। इसका मतलब सब दोषी थे। स्मगलिंग तो सबने की थी। तो पार्टी फंड पार्टी कैसे चलेगी? वो कौन सा गुजरात होता तो वाइब्रेंट गुजरात कैसे बनेगा? तो ये सब कहां से हो रहा था? ये चीज देख लीजिए। दूसरी चीज़ एक और चीज़ इंपॉर्टेंट है जो कह रहा था हिंदुस्तान के एंबेसडर थे। उन्होंने उनके सुख-दुख की

5:34 चिंता की। वो हिंदुस्तान के एंबेसडर कौन थे? यह भी जान लीजिए। खुद ही गुगुल कर लीजिए। एस जयशंकर साहब थे। घर का लड़का था। इसने स्मगलरों को छुड़वाया था। स्मगलरों के लिए इसने पैरवी की थी। तो मेरा सिर्फ कहना और ये पूरी डिटेल लिस्ट है। मैं अपने मन से नहीं कह रहा हूं। ये सारा कुछ है। स्मगलरों को छुड़वाने गए थे। यह कोई जासूसी में नहीं पकड़े गए थे। यह कोई नहीं था कि इंटर बॉर्डर में हमारे यहां के कुछ सैनिक उधर चले गए या हमारे यहां के कुछ चरवाहे उधर चले गए। उनको पकड़ स्मगलिंग करते हुए पकड़े गए। जिनको चीन की कोर्ट ने सजा दी उनकी पैरवी के लिए भारत के हमारे विश्व गुरु मोदी जी गए थे और उनके उनको छुड़वाने में और उनको यह सब करने में जो सबसे ज्यादा जिसने किया था वो एस जयशंकर साहब थे। मैं अरुण भाई आपसे ही

6:20 शुरू इसलिए कर रहा हूं कि मुझे नहीं लगता है कि जो चाइनीस डेलगेशन आया था यह कोई यह कुछ ना कुछ अपराध के लिए आया होगा कि ड्रग कैसे हो वो किधर से मुझे नहीं मालूम लेकिन आउट भाई कोई सरकारी होता तो सरकार का डेलीगेशन आता सरकार से मिलता ये जो गिरोह से मिल रहा है जिस गिरोह का ना रजिस्ट्रेशन है ना बैंक अकाउंट है तो वो क्या बात कर रहा है गिरोह से मैं जरा आपकी एक टिप्पणी चाहूंगा कि यह लोग आके मिले कितना हायतबा मचा था कांग्रेस का हो गए थे। कब आए हैं? एमआई साइन किया था। मैं जरा उसमें आपसे पूछना चाहता हूं। अरुण भाई सर अन म्यूट हो गया। हो गया हो गया।

7:05 हां जी। सर ये जो मोदी साहब ने एक शब्द कहा लड़के और जैसे ही हमारे यहां दिल्ली में मैं दिल्ली की भाषा बोलूं तो आपको हो सकता है अशिष्ट लगे। हमारे यहां लड़कों के साथ शब्द लगता है लफड़े। जहां लड़के शब्द होगा वहां लफड़े जरूर होंगे। अब लफड़े होंगे तो किनके होंगे? जो लफाड़िए होंगे। यह हमारी दिल्ली की भाषा है। यह बड़ी कॉमन है। यूनिवर्सिटी में जाएंगे तो आपको पता चल जाएगा। अब ये लफाड़िए नौजवान कब हो गए? वो आपने

7:53 ध्यान नहीं दिया होगा। मोदी जी ने पहले दो-तीन बार लड़के कहा और उसके बाद नौजवान कहा। जब वो डील सेटल हो गई। जिसको वो एमओ यू कहते हैं। जब वो डील सेटल हो गई तो वो नौजवान हो गए। फिर उनका भविष्य भी आ गया। बैठे हैं यहां यूनिवर्सिटी के हमारे उनको भी पता होगा कि लड़के यूनिवर्सिटी के क्या करते हैं? स्मगलर कौन होता है? और खासतौर से हीरों की स्मगलिंग जैसे आम तौर पर हम बाजार जाते हैं ना तो वह एक के हीरे को बाद में क्या कहते हैं ये जब वापस देने आओगे तो ये 100 पैसे का 9

8:41 पैसे रह जाएगा। मतलब 9 पैसे की चीज को जो 100 पैसे में बेचे उसको हीरों का व्यापारी कहा जाता है। तो लफाडिए इसीलिए पकड़े गए। अब यह राहुल गांधी अगर चीन के किसी व्यक्ति से मिल ले या वह बाहर चले जाए तो यह क्या कहते हैं इनके कभी प्रवक्ताओं को सुने खासतौर से एक जफर है जफर आगे नाम नहीं ले रहा मैं जानबूझ के उनका कहना ये है कि उनकी वहां रिशेदारी है तो मुझे परसों लगा कि मोदी साहब की भी रिशेदारी होगी या तो मोदी साहब का जीजा

9:27 वहां रहता है या उनका कोई फूफा रहता होगा और वो तो 2000 से जा रहे हैं। इसका मतलब यह कि स्मगलिंग का धंधा मोदी साहब 2000 से पहले से कर रहे हैं। मतलब हमारे देश का प्रधानमंत्री स्मगलर है। स्मग स्मगलरों के साथ खड़ा रहता है और चरित्रहीन है। तो मैं नाम लूंगा तो आपको याद आ जाएगा। मानसी सोनी का आशिक कौन था? यही हमारा मोदी, यही नरेंद्र मोदी। और आनंदी बहन से क्या रिलेशन थे? आपने तो लेटर दिखा दिया था। तो मेरा मानना यह है कि जो इस तरह का व्यक्ति हो और आपने लिखा चेहरा। सर चेहरा तो ये किसी का भी लगा लेते हैं।

10:14 मोदी साहब का एक बयान सुना होगा। हम तो गधे से भी सीखते हैं। तो ऐसा व्यक्ति जो विलक्षण बुद्धि का है और विश्व गुरु भी है और राहुल गांधी की रिशेदारी भी ढूंढ लेता है परंतु अपनी रिशेदारी नहीं ढूंढता। जब वो यह कहता है कि मैं पठान का बच्चा हूं। तो भाई साहब मुझे शक होता है ये पठान का बच्चा हुआ कहां से? हमें तो यह पता चला था कि यह चार भाई है, एक बहन है। अब यह पठान का बच्चा है। मैं सच्चा हूं और जब वहां जाते हैं पिछली बार बंगाल गए थे तो क्या बन के गए थे? तो इनकी जहां तक बात है

11:00 और जो आपने अभी कहा केशव कुंज बनाया गया जिसका कोई अकाउंट नहीं जिसकी कहीं रजिस्ट्रेशन नहीं और मिल कौन रहा है? सेकंड इन कमांड दत्तात्रेय वो किस हैसियत से मिल रहे हैं? हमारे भाग्यवाद साहब जो जानवरों के डॉक्टर हैं उनको किस हैसियत से जेड प्लस दिया हुआ है। तो देखने वाली बात यह है कि देश को मैंने आपके चैनल पर कई बार बोला गट्टर में ले जाना। यह असली उद्देश्य नरेंद्र मोदी नाम का एक आदमी जो है जो हिटलर का भी रिश्ते में पता

11:48 नहीं क्या लगता है मुझे। तो जो मुसलोनी का भी कुछ लगता है क्योंकि वह जिस प्रदेश में जाता है अभी तेलंगाना में उन्होंने कहा मेरा तो तमिलों से जन्म से पहले का रिश्ता है। पता नहीं हो सकता है इनकी मां कहीं तमिलों के घर में बर्तन मांझने जाती हो मुझे नहीं पता। खाली मैं एक अंदाजा लगा रहा हूं। तो चीन को लाल आंखें क्यों नहीं दिखा पाए? वो आपने वीडियो दिखा दिया। वो कहते थे कि चीन को तो लाल लाल आंखें दिखाकर बात करनी चाहिए और फिर झूला किसको झुलाया था उस तट पर वो तो राहुल गांधी नहीं थे वो तो राजीव गांधी नहीं थे तो चाल चरित्र चेहरा

12:36 के तीन अलग-अलग शब्द हैं। इन तीन शब्दों की व्याख्या इनके यहां अलग-अलग होती है। अगर वही बात अमेरिका वाला कह दे 60 बार भाई मोदी का फैसला मैंने कराया मतलब हिंदुस्तान का फैसला मैंने कराया है तो इनको सांप सूंघ जाता है। इनकी मां मर जाती है। इनकी नानी भी मर जाती है। दूसरों की नानी तो पता नहीं कहां-कहां रहती है। पर इनकी मर जाती है। ये बात पक्की है। तो ऐसा चरित्रहीन व्यक्ति देश से गद्दारी नहीं करेगा। राजद्रोह नहीं करेगा, राष्ट्रद्रोह नहीं करेगा तो आप उससे कैसी उम्मीद करते हैं? वैसे भी हमारे

13:22 बीच में बैठे हैं डॉ. राकेश पाठक। उन्होंने तो बताया कि सिंधिया परिवार कैसे गद्दार था और गद्दारों को गोदी में बिठाने वाला आदमी कैसे देश प्रेमी हो जाएगा। देखने वाली बात यह है जो जिसको पलोस रहा है और मैंने उनकी किताब पढ़ी है बड़े सिलसिलेवार पढ़ी है तो मेरा मानना यह है कि डील तो हुई है साहब तो वो डील क्या हुई है वो डोकलाम देने की हुई है अरुणांचल देने की हुई है जिस दिन मीटिंग हुई उस दिन भी एक क्षेत्र जो है उन्होंने क्लेम किया कि ये तो साहब हमारा है हमारे अब्बा का है अब पता नहीं वो हिंदुस्तान का है या मोदी के अब्बा अब्बास का है क्योंकि वो कहते थे

14:08 ना कि अब्बास का बाप जो है हमारे घर खाना देकर जाता था तो मेरा मानना यह है कि ऐसे चरित्रहीन आदमी के बारे में अगर आप कोई अच्छे की उम्मीद करेंगे भारत से राष्ट्र प्रेम की बात करेंगे क्योंकि ये तो बात वाजपेयी साहब ने भी कही थी कि भाई राष्ट्र धर्म अपनाओ अब वो राष्ट्र धर्म उन्होंने क्या अपनाया 3500 मुसलमानों को मरवा दिया ये कातिल आदमी है ये गुंडा है बदमा माश है यह डकैत है किसका वोटो गटक है और अब क्लेम कर रहे हैं कि भाई उनकी तो सीपीसी की तो 10 करोड़ मेंबरशिप है हमारी तो 18 करोड़ है तो ऐसे आदमी से किसी अच्छी बात की उम्मीद करना आप गटर के और अंदर की बात करें तो मुझे समझ में आएगी क्योंकि बीजेपी

14:53 का पुराना नाता रहा है मैं तो रहा हूं उस कीचड़ से ही बाहर आया हुआ आदमी हूं पर मुझे पता है ये कितने गर्त में जा सकते हैं इनको आपके जैसा हमारे जैसा हमारे पैनल पर बैठे हुए सम्मानित सदस्यों जैसा व्यक्ति ही टोक सकता है। और बहुत सारे और रिपोर्टर्स हैं जो खुल्लम खुल्ला इस बात को कह रहे हैं कि डील हुई है। अब वो डील पता चलेगी आपको आने वाले समय में क्या हुई है। 2027 की हुई है, 29 की हुई है। कौन सी डील हुई है और कितना पैसा इनके चुनावी फंड में बीजेपी के अकाउंट में जाएगा वो आपको बाद में पता चलेगा। तो मेरा मानना यह है कि ऐसा व्यक्ति देश हित में तो हो नहीं सकता। हां देश का सत्यानाश करने में उसके

15:39 दोनों हाथ दोनों पैर लगे हुए हैं। जी जी जी मैं डॉक्टर राकेश एक जो एक जनरल मांग ये हो रही है कि भाई जब आप चीन जैसे संवेदनशील देश से आपके बीजेपी मुख्यालय में और आरएसएस के मुख्यालय में बातचीत हो रही है। कार्यालय में आरएसएस के कार्यालय में केशव कुंज में तो ये देश को जानने का क्या नहीं हक है कि आपने क्या बात की? क्या क्या एजेंडा था? किस-किस विषयों पे बात की? नहीं नहीं हमने बात की और दो दिन तक बात की उनके छह लोगों का डेलीगेशन था और एक चीज मैं और याद दिला दूं उनके देखिए ये कुछ मोर देन अ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना था उनके एंबेसडर भी इसमें शामिल हुए अगर वहां के एंबेसडर शामिल हो रहे हैं तो ये केवल पार्टी का डेलीगेशन नहीं है ये

16:25 उनकी सरकार का डेलीगेशन है तो मैं इस पे डॉ राकेश क्या मतलब भारत के देश के आम नागरिक को जब यह जानने का हक नहीं कि आपने क्या-क्या किया और ये ये ची ये ये बीजेपी के लोगों को ये बताना नहीं चाहिए कि हमने ये बात की ये बात की इनसे ये बात की क्या बात हुई है जानने का और ओवरऑल आपका ऐसे समय में चीन के लोगों से इस तरह से गलबाइहियां करना कितना उचित है देश के लिए डॉक्टर राकेश सर ये प्रतिनिधिमंडल सरकारी था यह सिर्फ राजदूत की मौजूदगी से साबित नहीं हो रहा वो तो है ही लेकिन इसकी अगुवाई जो कर रही थी वह वहां की वाइस मिनिस्टर थी चीन चीन की कम्युनिस्ट पार्टी में से ही सरकार में लोग जाते हैं। वहां वन पार्टी सिस्टम है। हम सब जानते हैं। तो ये बाकायदा पार्टी का

17:12 और चीन की सरकार का एक प्रतिनिधि मंडल था। बाकी बाकी सारी बात करें। उससे पहले सर मैं चाहता हूं हम सब लोग एक मिनट के लिए एक सेकंड के लिए आंखें बंद करें और कल्पना करके देखें कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का प्रतिनिधिमंडल कांग्रेस के मुख्यालय में गया है। इस तस्वीर में राहुल गांधी खड़े हैं। सोनिया गांधी, जयराम रमेश हैं, सुप्रिया श्रीने हैं। और चार तस्वीरें पवन खेड़ा के twitter हैंडल से सामने आई हैं। अब जरा कल्पना करके देखिए कि देश में क्या हो रहा है। मेरे कल्पना के घोड़े यह कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग सड़कों पर उतर कर तांडव कर रहे हैं। कांग्रेस को देशद्रोही बता रहे हैं। अपने कपड़े फाड़ रहे हैं।

18:00 गोदी मीडिया ने आसमान सिर पर उठा रखा है। राहुल गांधी, सोनिया गांधी, पवन खेड़ा, जयराम, रमेश, सुप्रिया श्रीनेत को देश से निकालने की मांग हो रही है। मेरी कल्पना की उड़ान यह कल्पना कर पा रही है। लेकिन क्योंकि वह उस तस्वीर में कांग्रेस के नेता नहीं हैं। बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव हैं। मुख्यालय के प्रभारी महासचिव हैं अरुण सिंह और बाकी के नेता हैं। इसलिए सुई पटक सन्नाटा है। गोदी मीडिया इस पर सवाल नहीं पूछ रहा। बीजेपी के लोग मुंह चुराते घूम रहे हैं। अब इस मुलाकात के पहले की परिस्थितियों का थोड़ा सा आकलन कर लें। सर क्या-क्या बीते सालों में हो चुका है? उसके बाद यह

18:46 मुलाकात हो रही है। हम उसकी एक लाइन खींच देते हैं। 19 जून 2020 गलवान घाटी पर चीन का हमला। हमारे 20 जांबाज जवान हमारी भारत माता के सपूत चीन के हमले में शहीद हो गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फौरन से पेशतर क्लीन चिट दे दी है। ना कोई घुसा है ना कुछ कोई घुसाया है। ना कोई हमारी चौकी तीसरे दूसरे देश के कब्जे में है। पॉइंट नंबर वन पॉइंट नंबर टू चीन ने हमारे अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा ठोक रखा है। लगातार अरुणाचल अरुणाचल में बस्तियां बसा दी हैं। भारतीय इलाकों के नाम बदल दिए

19:32 हैं। अरुणाचल की रहने वाली एक युवती के पास भारतीय पासपोर्ट था। इस अपराध में उसे शघाई एयरपोर्ट पर घंटों हिरासत में रखा गया। उससे कहा गया कि अरुणाचल चीन का हिस्सा है। तुम चीन के पासपोर्ट के लिए आवेदन कर दो। नंबर तीन बहुत ताजा घटना है। 7 मई से लेकर 10 मई भारत और पाकिस्तान के बीच की लड़ाई जिसमें चीन भी पाकिस्तान के साथ खड़ा था। और यह दबी छुपी बात नहीं है। चीन तकनीक के स्तर पर, प्रोपेगेंडा वार के स्तर पर, हथियारों के स्तर पर पाकिस्तान की मदद कर रहा था। यह स्वीकारोक्ति है भारत की थल सेना के

20:20 उपथल सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल राहुल आर सिंह की। यानी भारत की सरकार, भारत की सेनाएं यह मानती हैं कि ऑपरेशन सिंदूर में हमारा मुकाबला सिर्फ पाकिस्तान से नहीं था बल्कि चीन से भी था। और और कई घटनाएं जोड़ लीजिए। चीन हमारे साथ जो सलूक कर रहा है। इतनी सारी घटनाओं के बावजूद हमने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के लिए लाल कालीन बिछाए। उनको भारतीय जनता पार्टी के मुख्यालय और आरएसएस के मुख्यालय में बुलाकर चाऊमीन खिलाया, मोमोज खिलाए हैं। लेकिन आनंद जी फिर ठहरने का अनुरोध करूंगा। यह पहली बार नहीं है। हमें थोड़ा और अतीत में

21:07 झांकने की जरूरत है। एक नजारा तो आपने दिखा ही दिया। हमारे युगावतार नॉन बायोलॉजिकल प्रधानमंत्री चीन गए थे हीरा तस्करों को छुड़वाने के लिए वे खुद कुबूल कर रहे हैं। गर्व से बता रहे हैं। छुड़ा कर लाए थे। उसके बाद भी भारतीय जनता पार्टी का चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से बहुत ही ज्यादा याराना लगता है। सर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान राम माधव। बीजेपी के उस वक्त के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी समय-समय पर चीन जाते रहे हैं। 2009 में गया बीजेपी का प्रतिनिधिमंडल। 2011 में नितिन गडकरी की अगुवाई में पांच दिन के लिए बीजेपी के नेता बीजंग और चीन के दौरे पर गए थे। और तुर्रा यह कि बीजेपी

21:56 नेता कहते हैं कि हम चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का कामकाज जानने समझने गए थे। सोने में सुहागा यह कि शिवराज सिंह चौहान ने अपनी यात्रा के बाद बयान दिया था कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा में बहुत समानता है। हम दोनों पार्टियां विचार के स्तर पर एक से हैं। अब आनंद जी मुझे आप बताइए हम इसमें हैरानी क्यों जाहिर कर रहे हैं? जब इतनी दांत काटी दोस्ती बीजेपी की बीजेपी के नेताओं की चीन के साथ है तो उनका इनके दफ्तरों में आना चाऊमीन उड़ाना मोमोज डकारना कतई आश्चर्य का विषय नहीं है। अब इस बैठक से इतर जरा सरकारी स्तर पर

22:45 जो हो रहा है उसकी भी बात कर लेते हैं सर। दो राजनीतिक दलों का दो देशों के राजनीतिक दलों का मिलना मुझे कोई आपत्तिजनक नहीं लगता। आप मिलिए हमें कोई ऐतराज नहीं है। बशर्ते उस देश के साथ हमारे देश के रिश्ते कैसे हैं? वो देश हमारे साथ कर क्या रहा है। तो मैंने विस्तार से बता दिया कि अब तक हमारे साथ क्या हुआ है। लेकिन सर इस मीटिंग से ज्यादा बड़ी बात यह है कि गलवान घाटी की घटना के बाद नरेंद्र मोदी की सरकार ने चीन के साथ कारोबार पर तमाम तरह के प्रतिबंध लगाए थे। गोदी मीडिया ने TikTok पर बैन लगने को मास्टर स्ट्रोक कहा था। तमाम तरह की कंपनियां प्रतिबंधित कर दी गई थी। लेकिन उसके बाद हुआ क्या है सर? उसके

23:33 बाद हुआ यह है जो अरुण जी अभी कह रहे थे। व्यापार की बात कर रहे थे। 2020 में गलवान के बाद साल दर साल भारत और चीन के बीच कारोबार लगातार बुलेट की स्पीड से बढ़ रहा है। बुलेट ट्रेन की स्पीड से और यह इस मुकाम पर पहुंच गया है जहां 100 मिलियन डॉलर का घाटा बिलियन डॉलर का घाटा पिछले वित्तीय वर्ष में हो चुका है। क्योंकि हम आयात ही आयात कर रहे हैं चीन से। भेज तो जरा सी चीजें रहे हैं। 10 10 से लेकर 18% तक का हमारा निर्यात है। बाकी सब हम आयात कर रहे हैं चीन से। अंतिम बात यह सब तब हो रहा है सर जब हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 25 या 26 मई

24:22 2025 को अभी छ महीने पहले गुजरात के गांधीनगर में कह रहे थे कि हमको चीन से आने वाले छोटी आंखों वाले गणेश जी नहीं खरीदना चाहिए। छोटी-छोटी आंखों वाले गणेश जी बकायदा उंगलियों से इशारा करके बताया था। ऐसे समय में यह सब व्यापार हो रहा है। चीन की पार्टी को, कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं को का खैरमकदम हो रहा है। स्वागत हो रहा है। जब हमारे प्रधानमंत्री ने उस दिन ये कहा था कि हमें अपनी दुकानों के सामने एक बोर्ड लगाना चाहिए कि इस दुकान में सब कुछ स्वदेशी मिलता है। उन्होंने 30 दिन का समय दिया था। नरेंद्र मोदी ने कहा था 30 दिन के अंदर पूरे देश के व्यापारी यह साइन बोर्ड लगा लें।

25:08 तो इस पाखंड का खुलासा करने का काम यह व्यापार के आंकड़े कर रहे हैं। और यह वह प्रधानमंत्री हैं जो आजाद भारत में सबसे ज्यादा बार चीन जाने वाले महापुरुष हैं। बतौर मुख्यमंत्री बतौर प्रधानमंत्री उन्होंने सबसे ज्यादा चीन की यात्राएं की हैं और यहां बुलाकर चीन के प्रीमियर को अपने हाथ से चाय बनाकर पिलाई है। साबरमती रिवर फ्रंट पर वो कौन सा मंदिर है वहां पर दक्षिण भारतीय परिधान पहनाकर शी जिनपिंग को विरासत हमारी दिखा रहे थे झूला झुला रहे थे और उसके बाद यह सबक दिया चीन ने तो मैं ऐसा मानता हूं यह छोटी घटना नहीं है इसके पीछे बहुत गहरे नेतार्थ छुपे हैं।

25:55 देश को मालूम होना चाहिए कि आखिर खिचड़ी कहां पक रही है। हो क्या रहा है चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ। जी आनंद जी मैं प्रोफेसर शशि एक सर एक लाइन जोड़ दूं मैं एक लाइन सर एक लाइन बस जी गोदावरी के ऊपर जो ब्रिज बन रहा है पानी का जो डैम बन रहा है उसको रेफरेंस में ले लेना मांजा जो चीनी आता है उसको ले लेना और लड़ियों के लिए हमें मना कर दिया दिवाली पे नहीं लेनी उसको भी कंसीडर कर लेना होली पर पिचकारी भी नहीं खरीदना है चीनी लेकिन एक अंतिम बात जोड़ दूं आनंद जी अभी चार दिन पहले रॉयर्स ने खबर दी है कि चीन की बड़ी-बड़ी कंपनियों को भारत में सरकारी ठेके देने पर जो प्रतिबंध लगा है वो हटाया

26:42 जा रहा है। ये है इनका राष्ट्रवाद फर्जी राष्ट्रवाद सर जी प्रोफेसर शशि मैं एक चीज बता दूं। मेरे एक दर्शक ने एक अच्छी चीज कही है। वो कह रहे थे कि वो लिखे हैं ओम प्रकाश जी हैं। मोदी बस ऐप बंद कर सकता है। सत्य हैं बोलना चाहिए। चीन मैप बदल देता है तो हम ऐप बदलते हैं वो मैप बदल देते हैं। खैर मैं मैं इस पे प्रोफेसर शशि एक चीज समझना चाह रहा हूं। एक चीज तो नहीं हो रही है क्योंकि अमेरिका का बहुत प्रेशर है और जिस तरह से गाली गलौज कर रहे हैं ट्रंप। अब ट्रंप तो गाली गलौज पे आ गए। वो अजीब अजीब तरह की रोज बातें कर रहे हैं। क्या उसका भी एक कारण है कि भारत यह दिखाना चाह रहा है अमेरिका को कि हम इसके क्या यह भी एक कारण है और अगर यह कारण है तो भारत अगर

27:27 कंटिन्यू रखे तब भी कोई दिक्कत नहीं है। भारत की दिक्कत क्या है कि वो एक लगाते हैं तो इधर चले जाते हैं। ये एक लगाते हैं तो उधर चले जाते हैं। तो, यह भारत की एक दीर्घकालीन विदेश नीति का क्या कोई मैनिफ़ेस्टेशन है यह? या इट इज़ जस्ट ऑन अ पार्टी टू पार्टी बेसिस। क्योंकि सरकार का इसमें अप्रूवल तो कहीं ना कहीं है ही। सरकारी लोग इसमें इन्वॉल्व हो रहे हैं। मैं तो शशि इस पे जरा ओवरऑल इंपैक्ट क्या है? और दर्शकों को यह भी बता दीजिएगा कि 200 23 बिलियन डॉलर का जो डेफिसिट था अप्रिल, नवंबर या दिसंबर तक का उसमें से केवल चीन 100 बिलियन डॉलर था। आधे से ज्यादा डेफिशिट केवल चीन का ट्रेड डेफिसिट है। प्रोस्ट जी जी नमस्कार देखिए आपने

28:12 कई बातें कही है और साथियों ने भी ये बातें रखी है। जहां तक भारत की विदेश नीति का संबंध है तो देखिए विदेश नीति तो खैर राष्ट्र के हित के अनुसार जो है बदलती है। यह कोई नई बात नहीं है। जो राष्ट्र हित होगा विदेश नीति में उसी अनुरूप परिवर्तन होता रहा है। लेकिन कुछ मूल तत्व होते हैं विदेश नीति के और उन मूल तत्वों में परिवर्तन सामान्यत नहीं होता है। यद्यपि समय परिवर्तन के साथ उसमें कुछ परिवर्तन होने की संभावना रहती है। अब आप एक जमाने में आप जानते हैं कि कैसे गुटनिरपेक्ष था तो जो अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष था जो राजनीति थी और ब्लॉक की राजनीति थी वहां दो मुख्य जो है

28:59 ग्रेट पावर्स थे और भारत के समक्ष ये चुनौती थी कि भाई भारत को अपना विकास करना है तुरंत जो देश स्वतंत्र होता है उसे अपने विकास को तो राष्ट्रीय हित था और उसके अनुरूप जो है निर्णय करना था कि किसी एक ब्लॉक में आप जाएंगे तो निसंदेह दूसरा ब्लॉक आपके साथ आपके विकास के रास्ते में बाधा पैदा करेगा तो ये कठिनाई थी यद्यपि भारत का जो है एक स्वाभाविक झुकाव रूस की ओर था क्योंकि निसंदेह रूस की जो समाजवादी व्यवस्था थी उस व्यवस्था के भारत का जो नेतृत्व था वो अपने को रिलेटिवली करीब पाता था और अमेरिका की साम्राज्यवादी और या पूंजीवादी नीति के वो खिलाफ होते थे तो ये था लेकिन इसका अर्थ ये नहीं था कि अमेरिका से कोई संबंध नहीं हो सकता है। अब

29:45 जो स्थिति है कि भाई ब्लक्स तो है नहीं गुटनिरपेक्षता की नीति जो है असामयिक हो गई है। तो ऐसी स्थिति में भारत अपने विदेश नीति को अपने राष्ट्रीय हित के अनुरूप कैसे बनाए? तो इसका अर्थ ये होता है कि वो केंद्र में अपने राष्ट्रीय हित को रखे और फिर उस प्रकार से दुनिया के पावरफुल कंट्रीज या दुनिया के विकसित देशों से वो संबंध बनाए। अभी स्थिति यह है कि ये अनुमान लगाना बहुत कठिन है कि आखिर भारत किस मूल नीति को या मूल तत्व को केंद्र में रख के विदेश नीति का निर्धारण कर रहा है। ये संकट का समय है और यही कारण है कि अमेरिका से कभी गल भैया करने की कोशिश करते हैं और फिर दुत्कार होने के बाद फिर आप चीन की तरफ जाते हैं। चीन जो है

30:33 प्रारंभ से अविश्वसनीय रहा है। इसलिए यद्यपि नेहरू के जमाने में जो भी पंचशील समझौता हुआ और जो लेकिन उसके पूर्व तिब्बत को लेकर के जो है स्थिति बनी तिब्बत की कुर्बानी भी उसी क्रम में चली गई थी लेकिन फिर लगा कि चलो पड़ोसियों से अच्छे संबंध रहे तो चीन से जो है संबंध ठीक रखने की कोशिश चीन को सबसे पहले यानी माओ जम की सरकार को सबसे पहले मान्यता देने वालों में भारत अग्रगणी था तो इसका अर्थ ये होता है कि भारत ने तो एक जो जो राष्ट्र के प्रति एक सम्मान सूचक भाव होता है उसने निभाया लेकिन चीनी ने क्या किया भारत के साथ और 62 आतेआते क्या हो गया तो ये तो देखिए लेकिन उसके बाद रिश्ते में बिल्कुल जो है एक प्रकार से शथिल्य हो गया एकदम

31:19 रिश्ता ही लगभग खत्म हुआ लेकिन फिर धीरेधीरे जो है रिश्ता जो है में कुछ परिवर्तन आया कुछ बदलाव की राजनीति की ओर बढ़े लेकिन 79 के बाद तो रूस में जो है पूंजीवादी व्यवस्था आ गई लगभग जो है कम्युनिस्ट पार्टी की शासन और एकदय व्यवस्था रही लेकिन बाजार जो है वो पूंजीवादी हो गया तो वैसी स्थिति में पूंजीवाद जो है पूरी दुनिया में अपना पंव फैला चुका था क्योंकि रूस का 91 के बिखराव के बाद जो है एक वैकल्पिक जो अर्थव्यवस्था का मॉडल था वो नहीं रहा तो निसंदेह जो है ये संकट का समय था खास करके उन देशों के लिए जो विकासशील देश थे तो भारत के साथ में ये चुनौती तो थी लेकिन अभी जो विदेश नीति है इस विदेश नीति में कुछ पता ही नहीं चलता है कि

32:05 आखिरकार भारत किस प्रकार की नीति का पालन कर रहा है? उसका राष्ट्रीय हित क्या है? तो ये ये तो घोर संकट का समय है और इसीलिए मूल तत्व को भी भूल जाते हैं। मूल तत्व की विदेश नीति का होता है कि आप देश किसी भी देश से जिससे आपके संबंध आप बेहतर करना चाहते हैं। उसके आंतरिक मामले में आप कतई हस्तक्षेप नहीं करें। उससे किसकी सरकार होती है उसमें आपकी रुचि नहीं होनी चाहिए। रुचि यह होनी चाहिए कि जो भी सरकार होगी उससे भारत अपने तमाम प्रकार के राजनिक से लेकर के आर्थिक अन्य संबंधों को कैसे मजबूत करेगा अपने हितों के अनुरूप। तो ये स्थिति जो है तो आप देख चुके हैं कि ट्रंप के समय में पहली बार जो है क्या जो चुनाव

32:51 के बाद क्या किया था नमस्ते ट्रंप और तमाम जो सारी बातें आपने देखी। इसका मतलब है कि आपने उस सीमा को क्रॉस कर लिया। अगर किसी देश के प्रधानमंत्री को विदेश नीति की यह बिल्कुल सामान्य बात की समझ नहीं है तो सोच लीजिए उस देश के प्रधानमंत्री के द्वारा देश की विदेश नीति क्या बनेगी और देश के राष्ट्रीय हित का क्या होगा तो वही स्थिति हमारी है। आपने बता दिया कि 100 बिलियन का तो कुछ चाइना के साथ जो है वो जो है स्टेज डेफिसिट है। तो 223 में अगर इतना डेफिसिट यही है फिर भी देखिए आर्थिक डेफिसिट को माना जा सकता है। मान लिया चाइना कुछ ज्यादा बना रहा है इसलिए वो ज्यादा हमें जो है वो एक्सपोर्ट करेगा। हम उतना नहीं बना रहे प्रोडक्शन

33:36 हमारा वैसा नहीं है तो चाइना की जरूरत के अनुसार हम उसको जो जो हम एक्सपोर्ट करेंगे वो निसंदेह कम हो सकता है। ये तो आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है। लेकिन चाइना तो लगातार भारत की भौगोलिक सीमा में प्रवेश करके अपना दावा ठोकता रहा है। अभी भी दावा ठोका है। जम्मू कश्मीर के एक वैली को लेकर के और पहले भी जो कभी अरुणाचल को लेकर के कभी सिक्किम को लेकर के भी याद कीजिए सिक्किम को लेकर के भी जब सिक्किम का विलय हुआ था जनता पार्टी के रिजीम में तो उस समय भी आपत्ति उठाई थी और अभी भी गलवान घाटी से लेकर के डोकलाम और तमाम इसका मतलब है कि वो भारत की भौगोलिक सीमा में प्रवेश करके वो अपने उस जमीन पर दावा ठोक रहा है। नाम बदलने की कोशिश कर रहा है। और इस क्रम

34:22 में भाई गलमान घाटी में लोग भी मारे गए। इसका मतलब है कि चाइना की विदेश नीति से या चाइना के संबंधों से हमारी विदेश नीति जो है प्रभावित भी हो रही है और हमारे आर्थिक और अन्य नीतियों को या हितों को नुकसान भी पहुंच रहा है। जो भाई देश की सीमा में अगर वो हस्तक्षेप कर रहा है और वो दावा भी कर रहा है। हमारे सैनिक भी मारे भी गए वहां और प्रधानमंत्री ने किस प्रकार से स्टेटमेंट दे दिया कि नहीं कोई घुसा ना कोई बाहर गया। यानी कि आप सोच लीजिए ये किस प्रकार की विदेश नीति है? जरा एक और विदेश नीति की बात में याद करें। जब चाइना को लेकर के सवाल उठे जयशंकर से उन्होंने कहा कि नहीं बड़ी शक्ति है चाइना उसके साथ इस प्रकार से संबंध और इस प्रकार से हम कैसे कोई भी बात कर सकते हैं उन्होंने सीधेसीधे स्वीकार कर

35:09 लिया कि चाइना की ताकत के सामने हमारी ताकत कम है इसलिए चाइना के प्रति हमारी विदेश नीति जो होगी वो उस प्रकार की नहीं होगी जो एक स्वतंत्र संप्रभु राष्ट्र के राष्ट्र हित के अनुसार विदेश नीति ये तो साफ साफ परिलक्षित हो गया और अब जो कुछ हो रहा है और अमेरिका से क्या स्थिति है? तो आज भारत तो डगरा का बैगन है। इसको एक गांव में कहावत है कि वो डगरा का बैंगन है। इधर से उधर इधर से उधर कोई विदेश नीति नहीं है। तो मोदी काल की जो विदेश नीति है वो भारत के डगरा के बैगन की विदेश नीति है। और ऐसी स्थिति में हम नुकसान ही नुकसान सह रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हमारी गरिमा भी गिरी है। हमारी राष्ट्रीय संप्रभुता को भी चुनौती कभी अमेरिका से कभी किसी और से। तो इसका मतलब हमारी

35:56 संप्रभुता को भी चुनौती मिली है और दूसरी तरफ भौगोलिक सीमा में भी उसका प्रवेश पहले से भारत के जो है आप जानते हैं कि लगभग एक बहुत बड़ा हिस्सा जो है 62 के समय जो उन्होंने जबरन कब्जा किया वो आज भी उनके पास है तो इसका अर्थ ये होता है कि जो राष्ट्रवादी ताकत छने का दावा करती है उसने कभी उसको तो लेने की कोशिश भी नहीं की वो तो परिस्थिति कुछ और थी लेकिन आपने तो वो दावा भी राष्ट्रवाद का राष्ट्र का झंडा और तमाम जो है वो वो बातें करते रहे लेकिन आपने तो कभी वो कोशिश नहीं की और आज के समय में भौगोलिक सीमा में बार-बार चाइना चाइना प्रवेश भी कर रहा है। इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप कर रहा है। नाम बदल रहा है। तमाम मैप बदल रहा है। आपने खुद कहा कि मैप बदला जाता है। मैप बदल लेता

36:41 है। हम क्या कर रहे हैं? हम तो लगता है कि निरी देश बन के रह गए हैं। एक और एक हमारा कायर प्रधानमंत्री बैठा हुआ है जिसके शरीर में खून अगर होता तो वो बलबलाता। लेकिन सिंदूर जैसी कोई चीज है वो क्या बलबलाएगा? वो तो एक केमिकल है। तो ऐसी स्थिति में आज भारत की स्थिति ये हो गई है। तो मुझे लगता है कि और अब जो कुछ हो रहा है। अरे भाई आरएसएस एक जो भी संगठन है सांस्कृतिक दावा करता है वो वो वो एक पिटिकल ऑर्गेनाइजेशन म टेक्निकल सेंस में बात कर रहा हूं। नहीं है। तो कम्युनिस्ट पार्टी वहां कैसे जा सकती है? एक सवाल वो कह रहे कि नहीं जी पहले भी गए अरे भाई कम्युनिस्ट पार्टी एक पिटिकल पार्टी है और चाइना की जो राजनीतिक व्यवस्था उसमें पार्टी और सरकार में कोई

37:27 बहुत ज्यादा प्रैक्टिकल डिफरेंस नहीं है। पार्टी इस ग पार्टी और ये सारा एक दलीय व्यवस्था कीता होती है। तो वहां से कम्युनिस्ट पार्टी का कोई डेलीगेशन आरएसएस से भी बीजेपी से मिल सकता है। रूलिंग पार्टी है वो भी वहां रूलिंग पार्टी है। वो मिल सकते हैं। प्रतिपक्षी पार्टियों से विपक्षी पार्टियों से भी मिल सकते हैं। लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक से मिलने का क्या मतलब है? क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क्योंकि सरकार में उन्हीं के लोग हैं। उन पर उनका कंट्रोल है और ऐसी स्थिति में क्या वो सरकार यानी चीन और भारत के बीच में कोई दलाली का काम करेंगे? एजेंट बन के उनके अपने हित को या चाइना के हित को क्या करेंगे? ये सवाल पूरे देश को पूछना चाहिए। लौट चुके हैं। अब बता नहीं रहे

38:12 हैं। तो एक जो सबसे बड़ा संकट है कि ट्रांसपेरेंसी तो है ही नहीं। जो मन में आ रहा है पार्टी के लीडर भी कुछ नहीं बताने के लिए। क्यों नहीं बताएंगे देश की जनता को कि चीन का डेलीगेशन अगर कम्युनिस्ट पार्टी का भारतीय जनता पार्टी से मिला तो क्या बात हुई? अगर आरएसएस आरएसएस तो कहेगा कि मैं क्यों बताऊं? तो आपसे मिले वो क्यों? और आप क्यों मिले? ये सवाल पूछा जाए कि आप क्यों मिले? आपको कहां से ये अधिकार मिल गया कि आप मिल तो इस प्रकार से तो चीन के डेलीगेशन से मिलने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर तो राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चले कि जिस राष्ट्र से हमारे संबंध काफी उतार चढ़ाव के हैं। हमारे राष्ट्रीय हितों की टकराहट होती है। उससे आप मिल रहे हैं तो ये तो राष्ट्रद्रोही काम है। लेकिन यहां राष्ट्रद्रोह की परिभाषा तो संघ तय करेगा

38:58 ना। राष्ट्रभक्ति की भी परिभाषा संघ तय करेगा। बीजेपी तय करेगा। हिंदुत्ववादी ताकत तय करेंग और राष्ट्रद्रोह की भी परिभाषा तो देश के अंदर ज्यादा जो ऐसी फांसीवादी सरकार का और ऐसी फासीवादी विचारधारा का विरोध करते हैं यहां देश के अंदर वो ज्यादा राष्ट्रद्रोही है और जो जो देश के हितों के विपरीत है उनको तो राष्ट्रद्रोही मानते नहीं और ये जो कंट्राडिक्शन है कि साहब चाइनीज माल तो नहीं खरीद स्वदेशी सभी दुकानों पर स्वदेशी ये साइन बोर्ड होना चाहिए और सवाल ये उठता है कि ये जो चाइनीज डेली आ रहे हैं। माल तो बिक ही रहा है। तो ये इतना अंतर विरोध है। भारतीय जनता पार्टी मोदी संघ और ये तो एकदम बंडल ऑफ कंट्राडिक्शन है। और यह और कुछ नहीं देश

39:46 की जनता को ठगने की कोशिश और एक अंत में बात में कह के सुब्रमण्यम स्वामी को मैं बहुत विश्वसनीय नेता कभी नहीं मानता हूं क्योंकि उनका जो अपना उनका जो कार्य करने का तरीका लेकिन अगर वो कोई सवाल उठा रहा है तो उस पर जवाब उन्होंने एक बार कहा कि ये जिस नरेंद्र मोदी ने जब एंबेसडर की बात की थी 2011 के अपने स्टेटमेंट में उस समय एस जयशंकर थे और सुब्रमण्यम स्वामी ने ये कहा कि एस जयशंकर जब वहां एंबेसडर थे तो ये मुख्यमंत्री के रूप में बार-बार जाते थे और उनके लिए तमाम प्रकार की सुविधाएं वो अन्य तमाम सुविधाएं मैं उसकी डिटेल में नहीं जा रहा ये एस जयशंकर जो है उनको प्रोवाइड वहां करवाते थे और वो एस जयशंकर

40:32 जो है बाद में मोदी सरकार में अभी विदेश मंत्री है विदेश मंत्री परिणाम जो है इनाम के स्वरूप तो आप इसकी भी इन तमाम परिस्थितियों को टोटिटी में देख के इस पर विचार किया जाए कि आखिर भारत की विदेश नीति कैसे तय हो रही है? भारत के राष्ट्रीय हित को कैसे जो है वो पूरा करने की ऐसी सरकार कोशिश करेगी जिसका जैसा कि अरुण जी ने कहा कि चाल चरित्र चेहरा सब संदेह के घेरे में है और जो देश में बलात्कारियों का स्वागत करता है तो चीन के एक जिसको कहते हैं कि डिक्टेटरशिप ऑफ द पार्टी और उस पार्टी को वो स्वागत करने की कोशिश जो है संघ के तो आप एक चीज ये देखेंगे कि फांसीवादी दृष्टि उधर भी है और अधिनायकवादी दृष्टि जो पार्टी के डिक्टेटरशिप होती है वो वहां भी है तो इस

41:18 और पार्टी की डिक्टेटरशिप अगर कम्युनिस्ट विचारधारा के अनुरूप होती तब तो हम भी उसका स्वागत उस समय कर रहे थे कि वर्किंग क्लास की डिक्टेटरशिप जो की डिक्टेटरशिप की बातें लेकिन अब तो वो भी बात नहीं है मुझे लगता है इस सारे परिपेक्ष में ये बातें देखी जानी चाहिए उस पर विचार होना चाहिए और देश की जनता मोदी सरकार से संघ से और इन तमाम हिंदुत्ववादी ताकतों से ये सवाल करे कि आखिर हमारे देश के साथ आप क्या कर रहे हैं हमारे देश के हितों को किस प्रकार से आप बेच रहे हैं और किसके हितों की पूर्ति करने के लिए हमारे राष्ट्रीय हित को आप तिलांजलि दे रहे हैं। धन्यवाद। ठीक है। मैं मेरे एक दर्शक पूछ रहे हैं कि जब मुद्रा पोर्ट पे ड्रग पकड़ा गया था तो किसी किसी भी मीडिया ने नहीं इसको कवर किया था। प्रेम भाई मैं इसको एक मिनट बता

42:05 दूं। आप Google कर लीजिए। इंडियन एक्सप्रेस हिंदू इन सब ने स्टोरी की थी। हां किसी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने नहीं किया था। हम लोगों ने भी YouTube चैनल पे से चलाया था। वो मैं एपिसोड निकाल के दे दूंगा। ये सारी चीजें हुई थी लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया क्योंकि कंट्रोल है सरकार के पूरी तरह से गिरफ्त में उसने नहीं किया था। दूसरा मैं प्रेम भाई एक और चीज जो मोदी जी जब स्मगलरों को छुड़ाने गए थे वो उस पे मैं दो एपिसोड कर चुका हूं। एक एपिसोड का मैं लिंक अभी शेयर कर दे रहा हूं। अगर किसी को तफसील से समझना हो कि मोदी जी कैसे स्मगलरों के लिए गए, कैसे उनको छुड़ाया है, कैसे इनके साथ अडानी जी के ये पुराना है एपिसोड। इसको कोई भी जाके देख सकता है। मैं इसलिए कह दे रहा हूं इसका लिंक भी मैं नीचे लगा दे रहा हूं। इसको देख लीजिएगा तो आपको इसको बहुत सी चीजें समझ में आ जाएंगे। अब जरा प्रेम भाई

42:50 मैं एक बौद्धिक चीज पे आपकी चीज पूछ रहा हूं। जो हम लोग समझते थे कि वामपंथ एक है। अब वो कितना है वामपंथी चीज में वह अभी छोड़ बीजेपी आरएसएस राइट विंगर है। बिल्कुल लेकिन यहां तो दोनों की पॉलिसी एक जैसी लग रही है क्योंकि इनका जो ऑटोक्रेटिक रूल की बात करते हैं, एक तंत्र की बात करते हैं। एक पार्टी तंत्र की बात करते हैं। मोदी जी को सूट करता है जो उनका एक तरह से रोल मॉडल है। तो वैचारिक दृष्टि से क्या पूरी दुनिया को यह बेवकूफ बनाया जा रहा है कि यह कम्युनिज्म है यह मोदी जी का आरएसएस का ये राइट विंग ये है क्या मैं वैचारिक दृष्टि से भी एक बार आपसे समझना चाहूंगा कि दोनों लोग एक दूसरे से की जो बातें हैं कि कैसे लोगों के ऊपर राज करो इसी पे

43:35 बातचीत हो रही है और आपके हिसाब से वैचारिक रूप से यह कितना उचित है जो जो अभी हुआ है वैचारिक रूप से जी जी शुक्रिया आनंद वर्धन जी देखिए इस बीच मैंने वो क्या बोलते हैं चाइनीस मोमो जो है मैं खाता रहा आप लोगों से बात होती रही और चिकन मोमोज मैं एक प्लेट खा चुका हूं तो इसका मतलब ये नहीं के चाइना से मोमो आया था मेरे लिए यहीं के लोगों ने चाइनीस डिश को बनाया और वो बेच रहे हैं वो देश है। इस बात को मैं बोलते हुए रखता हूं और इसके भी मतलब है इसलिए मैंने यह बात कही है। आपका जो प्रश्न है सैद्धांतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है और हमें लगता है इस

44:21 चर्चा में इस पर बात हुए बगैर ये चर्चा पूरी नहीं होगी क्योंकि ये पूरी जो मुलाकात डेलीगेशंस की होती है कोई भी अपने मन से चाइनीस डेलीगेशन से नहीं मिल सकता है। सरकार की परमिशन चाहिए तभी मुलाकात होगी। इसके बगैर नहीं मिलेगा। चाहे आरएसएस हो, बीजेपी हो, चाहे कांग्रेस के हो, चाहे सीपीएम के हो, कोई भी हो, विदेशी प्रतिनिधिमंडल आएगा तो उससे भारत सरकार की सहमति होगी तभी मुलाकात। तो इसमें कोई राष्ट्रद्रोह जैसी बात नहीं होती है। नहीं होनी चाहिए। एक तो यह है। लेकिन फिर भी यह बात क्यों होती है? क्योंकि खुद जो सत्ता में हैं वह ऐसी बातें कहते हैं जब कांग्रेस के डेलीगेशन से चाइनीस की मुलाकात हो जाए तो

45:07 बोलते हैं वो राष्ट्र विरोधी है। इस तरह की बातें करते हैं। तब यह प्रश्न उठता है कि आप मिलते हैं तब वो राष्ट्रभक्ति है और दूसरे मिलते हैं तो राष्ट्र विरोधी है। लेकिन सैद्धांतिक तौर पर ये कोई राष्ट्र विरोध का काम नहीं होता है किसी से मुलाकात। दूसरी बात है कि यहां की कम्युनिस्ट पार्टियों का भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों का सोवियत संघ में से भी संबंध रहा आना जाना रहा और चाइना से भी रहा और पुराना अब बहुत धड़ल्ले से होता था भारत सरकार की जानकारी में होता था मैं तो कई कामरेट्स के बच्चों को जानता हूं जिन्होंने मॉस्को में जाकर विदेश में जाकर पढ़ाई पढ़ी वो भी दो द्विपक्षीय देशों के बीच में जो द्विपक्षीय संबंध होता है उसके

45:53 के तहत होता था तो कभी इसको देश विरोध और राष्ट्र विरोध के तौर पर नहीं देखा जाता था और लेकिन इसको जरूर दक्षिणपंथी पार्टी के तौर पर बीजेपी नापसंद करती थी। आरएसएस नापसंद करते थे। वो कहते थे कि मॉस्को में बारिश होती है तो हिंदुस्तान के लाल झंडा वाले जो है छाता लगा लेते हैं। इस तरह की बातें वो बोला करते थे। यह वैचारिक लड़ाई चलती थी। लेकिन फिर भी कोई गद्दार नहीं बोलता था। यह चीजें थी। अब क्या है कि बीते कुछ समय में कि कांग्रेस ने चाइना के साथ एमओयू साइन कर लिया। बताओ वो एमओयू क्या है? बताओ वो सार्वजनिक करो। यह फोटो क्या है? यह राहुल गांधी से मिले। इस तरह की चीजें

46:40 प्रोपगेंडा के तौर पर चलाई जाती रही है। अब इस परिप्रेक्ष में यह है कि आरएसएस और बीजेपी की चाइनीस प्रतिनिधि मंडल से कोई पहली मुलाकात नहीं है। इसकी एक पूरी हिस्ट्री है जो आपने नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री रहते गुजरात में जो वह जाया करते थे उसको भी बताया और पूरा अब तो मिल जाता है। अब Google का जमाना है। एआई का जमाना है। पूरा रिकॉर्ड मिल जाता है कि कौन कब कहां गया तो उसमें आरएसएस और बीजेपी की सबसे फ्रीक्वेंट यात्रा रही है चाइना में और चाइनीस प्रतिनिधि मंडल गलवान की घटना के बाद पहली बार आया है। ये मुझे लगता है कि ज्यादा महत्वपूर्ण है। चर्चा इसलिए हो रही है कि गलवान की घटना के बाद

47:28 भारत और चीन के बीच संबंध बहुत खराब हो चुके और इस हद तक खराब हुए कि चाइना पाकिस्तान की मदद कर रहा है हमारे देश के खिलाफ लड़ाई में। युद्ध में हमारे खिलाफ में मदद कर रहा है। खुलकर मदद कर रहा है। यानी वो दुश्मन देश है। पहले तो दुश्मन देश नहीं होता था ना। अभी तो आप लड़ाई लड़े हैं। ज्यादा दिन भी नहीं हुआ है। तो गलवान की घटना में हमारे जवान शहीद हुए। हमारे द्विपक्षीय संबंध में तनाव आया। हमारा आना जाना कम हुआ। मोदी जी जिनपिंग की मुलाकात बंद हो गई। ये सारी पृष्ठभूमि एक तरफ है और ऐसे में बीजेपी के नेता आरएसएस के नेता अगर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना से उसके डेलीगेशन से मुलाकात करते हैं तो प्रश्न उठता है कि क्या सारी जो

48:16 शिकायतें थी खत्म हो गई और ये शिकायतें क्या आपकी पर्सनल लेवल की थी कि जब चाहे तब आप खत्म कर लीजिए और मीटिंग करने लग बताना होगा कि परिस्थिति में कौन सा परिवर्तन आया है कि आज डोकलाम गलवान करने वाले लोग वाला देश चीन और पाकिस्तान के का साथ देने वाला चीन भारत के साथ में प्रतिनिधिमंडल भेजकर वो भी सरकारी प्रतिनिधिमंडल भेजकर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना वहां का सरकारी प्रतिनिधिमंडल है। उसके साथ में यहां का की सत्ताधारी दल का प्रतिनिधिमंडल मुलाकात कर रहा है। अब यहां बीजेपी कोई कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया तो है नहीं। सीपीआईएम तो है नहीं। इनके तो वैचारिक विरोध भी रहे हैं। तब भी यह मुलाकात कर रहे हैं। तो क्यों कर रहे हैं?

49:04 एक तरफ अमेरिका है जो व्यापार संतुलन उसके पक्ष में थोड़ा सा गड़बड़ाता है तो भारत पर रेसिप्रोकल टेरिफ थोपता है कि नहीं हमारे अनुकूल होना चाहिए। और दूसरी तरफ भारत है जो चाइना के साथ में 100 बिलियन से ज्यादा 106 बिलियन का डॉलर का जो है व्यापार घाटा है। इसके बावजूद इसके बारे में एक शब्द नहीं बोलता है और उल्टे इन प्रतिनिधि मंडल के जरिए बातचीत होती है। तो हम यह कह रहे हैं कि सैद्धांतिक मतभिन्नताओं के बावजूद आज क्यों भारत की ओर से भारतीय जनता पार्टी की ओर से यह स्टैंड उठाए जा रहे हैं। इसके भीतर क्यों कौन सा राज छिपा है? कहीं वो तो नहीं जो

49:52 गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए उनके चाइना के साथ जो एक अलग किस्म का संबंध विकसित हुआ था। जो तस्करों को बचाने का संबंध था। जो चाइना में जाकर रंग रैलियां मनाने का संबंध था उसी संबंध का कोई ये एक्सटेंशन तो नहीं डेवलप हो रहा है। अगर ऐसा है तो वो देश के लिए ज्यादा खतरनाक है और ये अगर इसलिए ये संभावना हैकि ऐसी परिस्थिति सामान्य नहीं है कि इस तरह से सामान्य मुलाकात हो। परिस्थिति तो बहुत असामान्य है। चाइना हमारे खिलाफ में खड़ा है। अरुणाचल प्रदेश में इंटरवेंशन कर रहा है। लद्दाख में धमकी दे रहा है। शख्स गांव को बता रहा है कि हमारा अपना है। और ये उस दिन बता रहा है जिस दिन मुलाकात हो रही है। तो क्या यह मुलाकात किसी सौदेबाजी का

50:39 हिस्सा तो नहीं है। इसलिए महत्वपूर्ण है। वरना मिलते रहिए ना। क्या दिक्कत है? हमें तो कोई दिक्कत नहीं है। हमें इसलिए दिक्कत है कि विपरीत परिस्थिति के बावजूद प्रतिकूल परिस्थिति के बावजूद नहीं जो होना चाहिए था। जिस पार्टी का नारा होता था चीन के खिलाफ चीन की वस्तुओं का बहिष्कार करो। अरे देखो वो कौन लोग हैं जो चीन के वस्तुओं के बहिष्कार के साथ नहीं है। आप तो साथ हैं कि नहीं? आप यस बोलिए। आप यस बोलिए। इस तेवर में जो पार्टी रह रही थी वो आज सीधे शरणागत हो गई है। तो सवाल यहां पर है कि इसके पीछे क्या मंशा है? वरना हम इस विषय पर बात ही नहीं कर रहे होते। तो सैद्धांतिक मतभेद आपने सही कहा। चीन को जो लोग कम्युनिस्ट मॉडल मानते हैं उनसे हमेशा यह प्रश्न होता है यह चीन तो उपनिवेशवादी भी है। यह चीन

51:27 साम्राज्यवादी मंसूबा भी इसका है। जबतब दिखता है अपने साम्राज्य का विस्तार भी करता रहता है। सीपक कॉरिडोर जो है ये उसी उपनिवेशवादी साम्राज्यवादी चरित्र का उदाहरण है। ये आर्थिक उदारीकरण को दुनिया में सबसे अग्रेसिव तरीके से लागू करने वाला देश है। यह श्रम विरोधी अगर कानूनों को सबसे ज्यादा किसी देश ने अपने यहां प्रशय दिया है तो वह चीन है। तो इसके बावजूद आप इसको कम्युनिज्म का मॉडल मानते हैं। तो वही वही चीज भाई दक्षिणपंथी बोलते जरूर कम्युनिस्ट है। कम्युनिस्ट है बोलते समय गाली देते समय। लेकिन जब काम करने का समय आता है सत्ता में आते हैं तो आप उसी कम्युनिज्म साम्राज्यवादी उपनिवेशवादी आर्थिक उदारवादी कथित उदारवादी नीति के शरण में

52:12 जाते हैं और कैसे हम दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बने कैसे हम चाइनीस पार्टी का अनुसरण करें कैसे कांग्रेस मुक्त भारत जैसा संकल्प लाए ताकि जैसे कम्युनिस्ट पार्टी चाइना में वैसे भारतीय जनता पार्टी को भी चाइना की तरह भारत में दर्जा मिल जाए और केवल एक ही पार्टी हो एक देश एक इलेक्शन के साथ अगला नारा तो एक देश एक पार्टी भी होगा तो उस दिशा में कैसे चला जाए यह इनका यह तो यहां दोनों का दर्शन एक साथ है कि सत्ता में कैसे बना रहा जाए चाहे चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी हो चाहे भारतीय जनता पार्टी हो ये सारा दक्षिण पंथ वामपंथ खत्म हो जाता है सत्ता में बने रहने के लिए ये साम्राज इनको जरूरत पड़ेगी तो कमजोर देश के साथ में दादागिरी भी दिखाएंगे और जरूरत पड़ेगी तो जो ताकतवर देश है उनके चरण में भी लौट जाएंगे यही

52:58 आरएसएस का दर्शन जय शंकर ने जो कहा वो इसका मतलब यही है कि चीन बड़ी अर्थव्यवस्था है उससे हम कैसे लड़ सकते हैं और आपको मोहन भागवत ने भी यही कहा था कि दुनिया उसी के पीछे चलेगी जिसके पास ताकत होगी। तो सत्य और अहिंसा वाला देश ताकत के पीछे चलने वाला देश जब होगा तो कमजोर देश को दबाएगा और मजबूत देश के सामने झुक जाएगा। यही पॉलिसी है इस सरकार की जो आईने की तरह साफ है। जी जी जी मैं बस एक चलतेचलते बहुत ही क्लोजिंग अरुण भाई एक-ए मिनट में क्लोज कर दीजिएगा। एक मेरे दर्शक ने कहा और बहुत वाजिब चीज कही। उन्होंने कहा कि हम लोग जब चीन आया तो हम लोग गलवान को बार-बार याद कर रहे हैं। हम लोग अरुणाचल की सीमा को याद कर रहे हैं। लेकिन जो पाकिस्तान के साथ जिस तरह से उसने अभी चार दिन के युद्ध

53:45 में पाकिस्तान का पूरी टैक्टिकल टैक्टिकल क्या लड़ाई तो उसी ने पूरी लड़ी। तो उस पे कोई बात नहीं हो रही है। क्योंकि अभी तो आप उससे लड़ के आए हैं और पाकिस्तान से आपने सीज फायर किया। आपने भी युद्ध युद्ध खत्म नहीं किया है। ऐसे में कितना महत्वपूर्ण है इस बैठक का इस उसमें लेकिन एक आध मिनट में खत्म कर दीजिएगा। मैं सबसे एक राउंड वो ले लूं। समय करीब करीब खत्म। जी सर उसका महत्व तो आपके सामने है। जिस तरह से हल्के जितने हल्केपन से आरएसएस को अथॉरिटी दी गई। तभी हमारे प्रेम भाई कह रहे थे कि भाई ये तो गवर्नमेंट की तरफ से होता है। ये तो ठीक है। बात गवर्नमेंट की तरफ से होता है। तो राहुल जी क्या पर्सनल विजिट पर गए थे? वो भी गवर्नमेंट की तरफ

54:32 से गए थे। उन्होंने भी परमिशन ली होगी। अब मेरा मानना यह है कि हमारे यहां दो तीन चीजें कहावतें हैं। वो मैं बता देता हूं। हमारे पंजाबी में कहा जाता है कि साइयां कित्थे बधाइया। अब यह कहां साइयां है और कहां बधाई दी जा रही है यह आपको भी पता है क्योंकि 70 हजार करोड़ का घोटालेबाज अगले दिन रात को वो शपथ ले लेता है और फिर हमारे यहां एक और भी है कि भाई साहब प्रेम जी आपको भी बता रहा हूं मैं कि जहां हड्डी होगी कुत्ता उसी दुकान पर जाएगा ये सत्ता की हड्डी जो है जिस दुकान से मिलती है मोती उसी दुकान पर

55:18 जाएगा क्योंकि उसको हड्डी चूसने का जो हमारा कांड हुआ था रेलगाड़ी वाला जिसमें मुसलमान मारे गए थे ये चसका वहां से लगा इसको और फिर वो आदमी जो ये कहता हो कि मेरा व्यापारी बड़ा है मेरे सैनिक से क्योंकि अपना सर्वस्व लगा देता है अपना पूरा पैसा लगा देता है तो ये किस नैतिकता के लोग हैं ये आपको भी पता होगा अब इन्होंने सेवा सदन कर दिया तो हिटलर सदन कर देते। क्या फर्क था? वो तो पर्यायवाची शब्द है उसका। और फिर और बात यह है कि हमारे खाद के संकट में किसान कहांहां मरे यूपी में ये आपको पता होगा। अर्थ मेटल रोक दिया। टॉयज की नीति में दिक्कत आई। और कंप्यूटर का

56:04 सामान, बिजली का सामान। ये हिंडोले की तरह डोलते हैं। और इन्होंने हिंडोला कहां रखा? उस तट पर जहां पर इन्होंने अपने किसको अपने बहन के पति को कह दूं या अपने फूफा को कह दूं उनको झूला झुलाया इन्होंने तो इनसे यह सब बातों की उम्मीद करना निरर्थक है इनसे यह उम्मीद करना कि गद्दार सिंधिया को जब गोदी में बिठा लेते हो तो गद्दार चीन को भी गोदी में बिठा लोगे क्योंकि बहुत सारी चीजें उनके पास इनकी सीक्रेसी है। का क्या किया इन्होंने? कौन-कौन से ये तो उसमें आ गए देखने में आ गए ना स्मगलर 22 जो 220

56:50 स्मगलर और थे कांडला पोर्ट वाले वो कहां गए 25-25000 करोड़ की खेप आई पर मैंने आपको दो साल पहले भी बोला था कि 18000 करोड़ ये बीजेपी के पास कैश पड़ा हुआ है नंबर दो का तो सारी दिक्कत यह है कि सत्ता के साथ-साथ सत्ता की मलाई को भी खाना है और अपने चमचे चाटूकारों को पत्तलगारों को उनको भी खिलाना है। उस सब का इंतजाम यह इस तरह के विषय लाकर होगा। यह जो हमारा एसआईआर का विषय है यह चला जाएगा पिछवाड़े और इसके बारे में कोई बात नहीं करेगा। महंगाई को, बेरोजगारी को और छ 59,000 जो टीचर्स की वैकेंसी है उसके बारे में। ये

57:36 सब ये सब पृष्ठभूमि में चले जाएंगे। दरअसल बात ये है। जी ठीक है। डॉक्टर राकेश मैं इसलिए भी ये है कि जो नया वर्ल्ड ऑर्डर बन रहा है ब्रिक्स की मीटिंग इस साल भारत चेयर कर रहा है 2026 में यहां है और ट्रंप पूरी तरह से उतारू है कि ब्रिक्स को तहसनहस कर दिया जाए। चाइना की सरकार की तरफ से कुछ आया नहीं है। ये डेलीगेशन आया है। भारत चीन गया नहीं था जब उनके कम्युनिस्ट पार्टी का जो एक कितने साल वाला वो सेलिब्रेशन हो रहा था। मैं इस पे एक छोटी टिप्पणी आपकी चाहता हूं क्योंकि हम उनको सब तरह के क्लीयरेंसेस सुविधाएं दे देते हैं। लेकिन वो हमें चीन ने आज तक हमें कुछ ऐसा दिया। ये मुझे नहीं याद है। आपको याद हो तो बता दीजिएगा। सर बहुत संक्षेप में अपनी बात कहूंगा।

58:22 न्यू वर्ल्ड ऑर्डर में हम कहां खड़े हैं? यह पूरी दुनिया दिखा देख रही है। जब हमें जरूरत थी ऑपरेशन सिंदूर के समय तब तीन देश हमारे साथ नहीं थे। अमेरिका का राष्ट्रपति 66 बार सीज फायर का दावा कर चुका है। हमारे प्रधानमंत्री के लिए कहता है अमेरिका का राष्ट्रपति कि वे जानते हैं कि मैं खुश नहीं हूं। मुझे खुश करना जरूरी है। तो ऐसे में सर न्यू वर्ल्ड ऑर्डर में हमारी क्या हैसियत है? हम कहां हैं? मोहन भागवत के शब्दों में विश्वगुरु हैं और बने रह WhatsApp विश्वविद्यालय में। बाकी इस वक्त हम अंतरराष्ट्रीय मंच पर वैश्विक बिरादरी में बहुत पीछे हैं। मैं बस एक मिनट और लूंगा। हमारे सुधी दर्शक ने बहुत अच्छी बात कही कि पाकिस्तान के साथ लड़ाई में चीन साथ है। इसकी चर्चा नहीं हो रही

59:09 है। हो सकता है उन्होंने देर से ज्वाइन किया हो डिबेट हमने खुद विस्तार से उस पर बात की है। आप भी कई बार कर चुके हैं और हम लगातार कई दिनों से कर रहे हैं। एक बहुत छोटा विषय लेकिन बहुत महत्वपूर्ण चर्चा में शायद सर ने थोड़ा सा शशि सर ने उल्लेख किया उसका उसको बहुत दोहरा देते हैं। संक्षेप में जो सक्षम घाटी का मामला है वह भी सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। आमतौर पर लोग नहीं जानते वो कहां है। अभी क्योंकि चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता ने कह दिया कि हमारा ही क्षेत्र है वो। हमें तो पाकिस्तान से 1963 में मिला था। इसकी जो भौगोलिक स्थिति है बस उसका उल्लेख करना चाहता हूं। कितना महत्वपूर्ण है वो। हमारे भारत के हिस्से में वो सियाचिन ग्लेशियर के पास है। काराकोरम पर्वत श्रंखला जो है वहां यह नदी

59:56 है शक् उसके दोनों तरफ जो पार्ट है उसको शक् घाटी कहते हैं। उस तरफ पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर का गिलगित बाल्तिस्तान है और तीसरी तरफ चीन का अपना शिंजियांग करके एक राज्य है। प्रांत है। हो सकता है मेरे उच्चारण में कोई गलती हो। इस तरह से तीन देशों के सिरों से जुड़ी हुई यह घाटी है और वहां से चीन और पाकिस्तान भारी भरकम एक रोड बना रहे हैं 16000 फीट की ऊंचाई पर चाइना पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर जो सीपक जिसका प्रेम जी ने जिक्र किया उसके अंतर्गत चीन ने जिस दिन यह कहा कि शक्स ग्राम घाटी हमारी है उसी दिन चीन का प्रतिनिधिमंडल बीजेपी के

1:00:41 दफ्तर में बैठा बैठा था। इन चीजों को इन डॉट्स को देख जोड़कर देखने की जरूरत है सर कि हमारी सरकार अंदर खाने क्या कर रही है। पार्टी और उसका पितृ संगठन क्या कर रहे हैं। यह एक रहस्यमय दौर है सर। पता ही नहीं चलता सरकार कर क्या रही है। और देश के लोगों को कभी कोई सच्ची जानकारी नहीं मिलती। चीन के मामले में भी सर बहुत बड़ा कुछ घटित हो रहा है पर्दे के पीछे जो राष्ट्रीय हित में नहीं है। देश के राष्ट्रीय हितों के साथ समझौता कहीं ना कहीं हो रहा है। पता नहीं वो कब सामने आएगा। जी सर जी मैं प्रोफेसर शशि बस आपके पास आ जाऊं। मैं कुछ लोग बार-बार कहते हैं। एक चीज ध्यान रखिएगा। 1951 में जब देश आजाद हुआ था मतलब 47 में आजाद हुआ था। 51 की

1:01:28 जनसंख्या के हिसाब से चीन की जनसंख्या 55 करोड़, भारत की जनसंख्या 36 करोड़ थी। ये बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि उस समय तक चीन जो था वो भारत की उंगली पकड़ के चलता था। और एक ये बैंड कॉन्फ्रेंस तक रहा कि नेहरू लेके गए इनको वहां इंट्रोड्यूस किए। दुनिया के 29 देश आए थे। 54% पापुलेशन ऑफ अर्थ वहां पे रिप्रेजेंट हो रही थी। उसके बाद क्या हुआ यह सबको हिस्ट्री पता है। लेकिन आज की तारीख में हम अपनी पोजीशन क्लियर नहीं कर पा रहे हैं। हमारा रूस बहुत दिनों तक हमारा खास मित्र रहा। लेकिन आज हम रूस के भी सबसे करीबी मित्र नहीं है। वो जगह चीन ने ले ली है। अमेरिका से हमारे ऐसे ही हालत वो है। मैं इस पे थोड़ा इसलिए क्योंकि भारत को अपनी दृष्टि साफ करनी होगी। मिलनाजुलना सबसे चाहिए। हम सब

1:02:15 लोग तो इस ओपिनियन के हैं डॉक्टर लोहिया तो भारत पाक महा बांग्लादेश महासंघ मतलब उस समय बांग्लादेश नहीं था भारत पाक महासंघ मनोज सम्मेलन की बात करते थे तो मैं जी तो इसमें इसमें अगर कोई आप खुले मन से बात कर रहे हैं पूरे सबसे बात करिए पाकिस्तान से भी करिए श्रीलंका से भी करिए बांग्लादेश से भी करिए बर्मा से भी करिए नेपाल से भी करिए आप गुपचुप कुछ चीन से कर रहे हैं उससे शक पैदा होता है मेरे मैं इस पे एक छोटी टिप्पणी नहीं देखिए बातचीत तो मैंने कहा की दुनिया में राजनिक संबंधों को बनाना दो देशों के बीच में तमाम जो वैदेशिक संबंध होते तो वो तो संवाद जरूरी है। युद्ध तो जो है कहते है ना कि वॉर इस द लास्ट रिसोर्ट तो इसका मतलब है कि संवाद के द्वारा ही संबंध का निर्माण होगा और फिर जो भी राष्ट्रीय हित

1:03:00 है उसकी पूर्ति होगी। तो इससे तो कोई दो राय है ही नहीं। लेकिन सवाल है कि जो बातचीत हो रही है वो देश हित में है या क्या है वो देश को जानने का हक है कि नहीं है। यह पहला सवाल है। देश को डेमोक्रेसी है ये और डेमोक्रेसी में ट्रांसपेरेंसी और जनता को जानने का हक कि हमारे देश के विदेश नीति में और दूसरे अन्य देशों से जो संबंध हो रहा है जो बातचीत हो रही है संवाद हो रहा है वो क्यों हो रहा है उसका उद्देश्य क्या है और उसमें क्या निष्कर्ष निकला ये जानने का हक है कि नहीं यहां भारतीय जनता पार्टी की सरकार को मोदी सरकार या जो एनडीए की सरकार है वो ये तो बताएगा ना कि हम जो भी बातचीत कर रहे हैं देश के हित में कर और ये बातचीत हुई है तो चाइना और खास करके जिस देश का संबंध जो

1:03:45 हमारे देश से आप जानते हैं मैंने पहले भी कहा कि चाइना को सबसे पहले इन्होंने मान्यता दी लेकिन जो कुछ हुआ चाइना में इसका मतलब और अभी देखिए कि चाइना ताइवान को लेकर के चाइना तिब्बत तो पहले ही हड़प चुका है और इधर हांगकांग में भी आप देखिए कि किस प्रकार से जो लिबरल पार्टी थी डेमोक्रेसी के पक्ष में जब जो है 1997 में जो है वो आया लीच के बाद वहां एक डेमोक्रेटिक सरकार चल रही थी अभी उस पार्टी ने अपने को डिोल्व कर लिया दिया गया कि अब हम यहां काम नहीं कर सकते इसलिए हम अपनी पार्टी को डि कर इसका मतलब है कि हांगकांग को भी पूरी तरह से चाइना ने अपने उसी अधिनायिक वादी व्यवस्था के अंतर्गत जो है वो ले लिया है जबकि उसका हिस्सा तो पहले बन गया तो मैं सिर्फ ये कह रहा हूं उस चाइना के साथ जो भी संबंध आप बनाएंगे

1:04:30 उस संबंध को जनता को बताएं और उसमें ये भी बताएं उससे भारत के हितों की कितनी पूर्ति होगी चाहे व आर्थिक हित हो चाहे वो भौगोलिक सीमा की सुरक्षा का सवाल हो चाहे अन्य प्रकार के जो विश्व राजनीति में विश्व राजनीति में किसी देश की संप्रभुता पर कोई दूसरा देश अगर आक्रमण करे तो उस समय हम लोगों की नीति भारत या चाइना या किसी की नीति क्या होगी तो अभी आप देख रहे हैं कि विश्व की क्या स्थिति है ये कहना कि भाई हम क्या कर सकते हैं या हम क्यों कुछ करें फिर तो आप नॉन एक्सिस्टेंट है आपका कोई अस्तित्व नहीं है तो क्या भारत जैसा देश जो लार्जेस्ट डेमोक्रेसी अभी भी कहलाता है एस फ एस पपुलेशन इस वोट इस कंसर्न और दूसरी दूसरी तरफ जो है जो दावा आप करते हैं कि भाई हम फोर्थ इकॉनमी हो गए

1:05:16 या थर्ड इकॉनमी हो जाएंगे। इकॉनमी होने से विश्व की राजनीति में हमारी से क्या है? कोई भी आके हमें जो है वो थप्पड़ मार दे, कोई भी आ के बजा के चल दे। ये कैसे हो सकता है? आज ट्रंप के द्वारा जो कुछ हुआ उससे विश्व में भारत की इतनी हसाई हो रही है। जग हसाई हो रही है और आपके मुंह से शब्द नहीं निकल रहे हैं। तो मुझे लगता है कि भारत को अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता राष्ट्र हित और जनतंत्र में जनता के विश्वास को बनाए रखने के लिए उसके साथ पारदर्शिता और उन्हें बताने की जरूरत है। अन्यथा सब बेईमानी हो जाता है और जो बेईमानी हो रहा है ये दुखद पहलू है। जी धन्यवाद। मैं बस चलते चलते प्रेम भाई एक चीज बता दीजिए। मुझे कहीं-कहीं एक चीज और लगती है ये हो सकता है कि चाइना अपनी पेशबंदी कर

1:06:04 रहा है ताइवान को भी। वह ताइवान को खाएगा क्योंकि अह वेनेजुला को जब अमेरिका ने उधर खाया है तो वह वेनेजुला के वह मोरल राइट बहुत रह नहीं गया है। जिस तरह से वह आक्रमण किया है। ग्रीनलैंड की बात कर रहा है। ये उसका एक पेशबंदी तो नहीं है कि ताइवान को जैसा बहुत से लग रहा है कि इट इज़ अ मैटर ऑफ़ टाइम कि चाइना उसको उसके ऊपर कब्जा करे। क्या ये उसका भी एक कहीं से हो सकता है कुछ? देखिए जैसे पिछले विश्व युद्धों के दौरान जर्मनी जापान इन सब ने मिलकर के एरिया बांट लिया था कि अपनेप इलाके में बढ़ो आगे ये भी लगभग उसी तरह से वर्ल्ड ऑर्डर सज रहा है कि अमेरिका चाहे वेनेजुएला पर कर

1:06:49 ले या कुछ और किसी और को अपने हाथ में कर ले चाइना को भी अपने इलाके में जो जोर दिखाना है दिखा ले तो उसी तरीके से जिस तरह से रूस यूक्रेन में चल रहा है और यूक्रेन के संसाधनों का जिस तरह से अमेरिका सौदेबाजी करने में लगा है तो वो रूस को भी वो आजादी दे देगा। तुम भी करो जो यूक्रेन के साथ करना है। तो ये तीन देश यहां 21वीं सदी में दिख रहे हैं जो कि अपनेपने इलाकों में दादागिरी करें और अपनी मर्जी से करें। तो यह विश्व युद्ध का एक दूसरा चैप्टर नया चैप्टर जो है वो तैयार होता दिख रहा है जिसमें किसी राष्ट्र की संप्रभुता का कोई मतलब नहीं होता है। तो इस बीच में हमें हमनेकि डेमोक्रेसी का भी

1:07:35 स्वाद चखा है। हमने यूएन को भी देखा है। चाहे जिस रूप में भी देखा हो कमजोर हो लाचार हो लेकिन देखा है। तो ऐसे दौर में फिर क्या फिर से विश्व युद्ध जैसी परिस्थितियां बन रही है। तो बनती हुई दिख रही है। यह बात साफ है और इसमें हम जब अंदरूनी स्थिति को भांपते हैं तो भारत जब नवोदित राष्ट्र के रूप में खड़ा हुआ 1947 के बाद और नई दुनिया तीसरी दुनिया के देशों का नेता बना और महाशक्तियों से टक्कर ले रहा था। चाइना भी भारत के सामने समकक्ष वाली स्थिति में था। 90 के दशक तक तो जीडीपी भी लगभग बराबर थी। तो उससे थोड़ा सा ये स्थिति में हम पहुंचे हैं कि चाइना अब एक पावर हो गया। बहुत बड़ा पावर

1:08:21 और हम आगे बढ़ने के बजाय पीछे रह गए। ये हमारी एक पोजीशन है। इसमें भाई आर्थिक उदारीकरण की पॉलिसी नरसिम्हा राव की जो शुरू हुई उसके बाद से आप देख सकते हैं उससे पहले तक तो भारत मजबूत था। लेकिन आपको बीजेपी के राज में ये और भी हालत खराब हुई है और हम अमेरिका के को भी गिड़गिड़ा रहे हैं। चाइना से भी लाल आंखें दिखा नहीं पा रहे हैं। कॉम्प्रोमाइज कर रहे हैं। प्रतिनिधि मंडल मिल रहा है। इवन अब पाकिस्तान का भी नाम लेना हमने बंद कर दिया है। दिल्ली धमाके हुए लेकिन हम नाम नहीं ले रहे कि पाकिस्तान का हाथ है। ऑपरेशन सिंदूर जारी है और कोई भी आतंकी हमला युद्ध माना जाएगा। वो सब बाद भी भूल गए। बांग्लादेश

1:09:08 भी हमें आके दिखा रहा है। तो ये सारी परिस्थितियां हैं जो हमें एक चिंताजनक स्तर पर खड़ा करती हैं। लेकिन एक बात मैं अपनी तरफ से जोड़ना चाहता हूं। जैसे कोई हास्य कवि बोले कविता या कुछ हास्य की बात कहे और वो खुद अगर हंसने लग जाए तो हास्य कवि का कंटेंट जो है नहीं चलता है। उसका कंटेंट तब है जब उसके हास्य पर जनता हंसे। जनता रिएक्ट करे उस उदाहरण मैं इसलिए दे रहा हूं कि हम भी जो विचार रखते हैं हम अगर रॉ अगर कुछ बोले कि ऐसा है वैसा है तो उसके बजाय हम ऐसी परिस्थितियां सामने रख दे कि जनता बोले कि कौन देशद्रोही है कौन गद्दार

1:09:54 है कौन देश के खिलाफ है कौन क्या है हमें बोलने की जरूरत ही ना रह जाए तो हम भी हास्य कवि की तरह है हमें हास्य के बजाय गंभीर कंटेंट देना है और उस गंभीर कंटेंट पर जनता का रिएक्शन आए जो हम चाहते हैं जो उससे निकलना चाहिए। यानी इसी बात पर अपनी बात को यहां खत्म करते हैं। जी चलिए बहुत-बहुत धन्यवाद प्रेम भाई और मैं सर ये संयोग और प्रयोग को भी ध्यान रखना ये कौन सा प्रयोग है और यह संयोग क्या है? ठीक है। मैं मैं सिर्फ इतना कहूंगा कि ये जो चीन क्या डेलीगेशन आया है यह कोई बहुत यह मतलब जिसमें कहते हैं ना कान खड़े हो जाने चाहिए। सावधानी की जरूरत है। कुछ ना कुछ ज्यादा डीपर है। यह ऐसे ही ऑफ द कफ नहीं आ गया है कि घूमने चले आए

1:10:39 हिंदुस्तान। इसके माने बहुत हैं। और जो जो खतरा यह लगता है कि हर बार चीन हमें ठग के चला जाता है और हम फिर वहीं खड़े रहते हैं। आप सबका चर्चा में भाग लेने के लिए प्रोफेसर शशि प्रेम भाई, अरुण भाई थैंक यू सो मच फॉर जॉइनिंग। बहुत-बहुत शुक्रिया।

Share

更多视频摘要