“Mohan Bhagwat vs BJP: क्या संघ प्रमुख को हटाया जा सकता है? | RSS Chief's Warning | Khari Khari”的完整文字稿。点击时间戳即可从该位置打开视频。想要其他视频的字幕?试试 YouTube 字幕提取工具。
0:09 नमस्कार, मैं हूं आशुतोष और आप देख रहे हैं सत्य हिंदी। सत्य हिंदी के विशेष कार्यक्रम श्रवण गर्ग की खरीखरी में आपका स्वागत है। यह हमारा वह कार्यक्रम है जिसमें देश के जानेमाने पत्रकार संपादक श्रवण गर्ग जी अपनी तीखी टिप्पणी करते हैं मौजूदा राजनीतिक माहौल पर और उनकी तीखी टिप्पणियों से ना तो सत्ता पक्ष बचता है ना ही विपक्ष और दोनों ही तिलमिला के रह जाते हैं। आज फिर मुखातिब होंगे श्रवण जी से और जानेंगे कि आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत इन दिनों बड़ी दिलचस्प टिप्पणियां कर रहे हैं। उन टिप्पणियों का अर्थ क्या है? क्या यह माना जाए कि भारतीय जनता पार्टी के सामने उन्होंने घुटने टेक दिए हैं? क्या यह माना जाए कि उनको अपनी ही पार्टी की या अपने ही संगठन की विचारधारा में उनका विश्वास कम हो गया है। क्या कारण है? मोहन भागवत ने कहा है कि दरअसल
0:58 हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए आपको संविधान में कुछ करने की जरूरत नहीं। भारत तो हिंदू राष्ट्र है। आपको याद होगा 204 चुनाव के पहले यह कहा जा रहा था बड़े डंके की चोट पर कि अगर हमको 400 सीटें मिल गई तो हम देश के संविधान को बदल देंगे। उसका अर्थ था हिंदू राष्ट्र बनाने की और आज से नहीं जब से आरएसएस बना है तब से बार-बार कहा जा रहा है देश को हिंदू राष्ट्र बनाना है। देश को हिंदू राष्ट्र बनाना है। देश को हिंदू राष्ट्र बनाना है। लेकिन अब वो कह रहे हैं इसके लिए आपको संविधान में कुछ करने की जरूरत नहीं है। भारत एक हिंदू राष्ट्र लेकिन उससे बड़ी टिप्पणी उन्होंने की कि आरएसएस को बीजेपी के चश्मे से देखने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। आरएसएस को बीजेपी के चश्मे से देखने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। अब यह अचानक क्या
1:44 हो गया इनको? सबको मालूम है कि पिछले साल डेढ़ साल से ये दिखाई पड़ रहा है। बल्कि आप कह लें पौने दो साल से दिखाई पड़ रहा है कि आरएसएस और बीजेपी के बीच में कुछ ना कुछ तनाव है। 2024 के चुनाव के बाद मोहन भागवत जी ने बड़े तीखे हमले किए थे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऊपर बिना उनका नाम लिए। और यह भी कहा जा रहा था कि दरअसल भारतीय जनता पार्टी अपना नया अध्यक्ष नहीं चुन पा रही है क्योंकि आरएसएस की मनमर्जी का आदमी वहां नहीं चुना जा रहा है। अब नितिन नवीन को लेके आया गया है। क्या वो आए की पसंद है? तो क्या वाकई में मोहन भागवत में कुछ बदलाव आ रहा है? संघ में कुछ बदलाव आ रहा है या उनकी मजबूरियां है या यह कहा जाए कि नरेंद्र मोदी और अमित
2:30 शाह के सामने मोहन भागवत जी ने घुटने टेक दिए हैं। इसलिए कह रहे हैं कि दरअसल बीजेपी की नजर से आप आरएसएस को मत देखिए। जानेंगे श्रवण जी से उनकी क्या राय? सर नमस्कार। देखिए मैं पहले तीन विजिट्स ऐसी है मोहन भागवत साहब की जिनको मैं एनालाइज कर रहा था। एक विजिट उनकी चेन्नई की है, एक मणिपुर की है और एक कोलकाता की है। यह कुछ जो कह रहे हैं तीनों विजिट्स और उसके पहले दिल्ली की है। दिल्ली से दिल्ली में जैसे उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा कि अगर हमारी चलती होती तो बीजेपी के का अध्यक्ष जो है
3:16 कभी का बन चुका होता। फिर वो कहते हैं चेन्नई में कि यह तो पूरा मामला बीजेपी के अध्यक्ष का जो पूरा मामला है यह बीजेपी का मामला है। इससे हमारा कोई लेना देना नहीं है। फिर कहते हैं कि पीएम के जो उत्तराधिकारी का मामला है वह भी नरेंद्र मोदी और पार्टी तय करेंगे। फिर मणिपुर जाके वो उन्होंने कुछ कहा। कई चीजें कही और अब आप देख रहे हैं कि कोलकाता में उन्होंने कल जो कहा ऐसा कुछ लग रहा है मोहन भागवत जी जो लगातार कह रहे हैं उससे दो तीन चीजें दो तीन ध्वनियां निकल रही है।
4:02 एक तो यह निकल रहा है कि बीजेपी और संघ के बीच में संबंध जैसा आपने भी कहा बहुत मधुर नहीं है या तनावपूर्ण है जो काफी बदल रहे हैं लगातार दूसरा यह लग रहा है कि मोहन भागवत संघ में भी अपने आप को अकेला पाल रहे हैं। मतलब संघ में भी ऐसा लगता है कि एक लॉबी जो है वो बीजेपी के साथ अलाइन है। तीसरा यह कि वो बीजेपी को कोई संदेश देना चाह रहे हैं और वो संदेश कोई सुन नहीं रहा है। मतलब बीजेपी वाले उसकी अनसुनाई कर रहे हैं। और उनके वक्तव्यों से जो ध्वनि निकल रही
4:48 है तो यह हम मान सकते हैं या निष्कर्ष निकाल सकते हैं जो कि गलत भी हो सकता है। जिसका मोहन भागवत खंडन भी करेंगे कि मोहन भागवत जो है संघ से बीजेपी से नाराज है कि उनकी चल नहीं रही है बिल्कुल भी नहीं चल रही है या संघ की नहीं चल रही है और ये हमने कई हाल के घटनाक्रमों से एक तो जिसका उदाहरण आपने भी दिया तो अब एक जो नया उदाहरण जो नई चीज उन्होंने कही कि संघ को बीजेपी के चश्मे से नहीं देखना चाहिए। या बीजेपी के नजरिए से नहीं देखना चाहिए। और पहली चीज तो यह कही। दूसरी चीज
5:34 उन्होंने कही कि संघ का कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं है। अब सवाल यह है कि बीजेप संघ को अगर बीजेपी के नजरिए से नहीं देखें तो फिर क्या करें? मतलब किस नजरिए से देखें? संघ की बीजेपी की 1980 में स्थापना के बाद से या उसके भी पहले जनसघ के जमाने से संघ में और बीजेपी में संघ और जनसंघ में कोई फर्क किसी तरह का जनता ने या नागरिकों ने देखा नहीं। दूसरा यह कि संघ का पूरा एजेंडा देश की जनता के सामने जो है वो राजनीतिक ही है। मतलब वो
6:19 राजनीतिक एजेंडे के जरिए धर्म की अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करना चाहती है। मतलब यह नहीं है कि धार्मिक एजेंडे के के जरिए वो कुछ राजनीतिक परिवर्तन चाहती है। तो इसका मतलब यह जो उन्होंने कल कहा कोलकाता में जो कहा उससे दो चीजें बाहर निकलती है। एक तो यह कि भागवत बीजेपी को लेकर जो वक्तव्य दे रहे हैं उससे अब जो आखिरी उनका कोलकाता का जो वक्तव्य है वो यह दिखाता है कि संघ एक इंडिपेंडेंट सत्ता है और वो सत्ता बीजेपी से इतर है। बीजेपी का बीजेपी का कोई उस पर असर नहीं
7:07 है या वो बीजेपी के कारण एक सत्ता नहीं है। तो तो अगर संघ को आप एक अलग सत्ता के रूप में स्वीकार करें मतलब बीजेपी के कारण उसको स्वीकार नहीं करें। भागवत साहब ने 20 नवंबर को मणिपुर में यह कहा था कि वो मैं सरकार और पार्टी के बारे में हस्तक्षेप नहीं करता। ये 20 नवंबर को उन्होंने कहा। चेन्नई में सात दिन पहले उन्होंने कहा था जैसा मैंने पूर्व में कहा कि मोदी जी के बाद उनका उत्तराधिकारी किसको होना चाहिए यह फैसला पार्टी और मोदी जी करेंगे और उसके पहले मैंने जैसा बताया कि दिल्ली की
7:53 बैठक में उन्होंने कहा था कि अगर हमारी चलती होती तो तो बीजेपी का अध्यक्ष कवि का बन जाता। अब हुआ क्या कि भागवत साहब ने यह कहा सात दिन पहले या आठ दिन पहले और उसके ठीक अगले दिन या दो दिन बाद नितिन नवीन को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया गया। अब आप सोचिए कि जिस पार्टी के अध्यक्ष पद पर बड़े-बड़े स्टॉलवर रहे हो जिन लोगों के नाम चल रहे थे अध्यक्ष पद के लिए वो तमाम लोग संघ के करीब थे मतलब चाहे शिवराज सिंह हो या वसुंधरा हो या नितिन गडकरी हो जो भी लोग हो उन सबके जो नाम चल
8:42 रहे थे वो सीनियर लोग हैं और वो संघ के नजदीक रहे। ऐसे में 45 साल के एक मंत्री को बिहार सरकार में एक मंत्री को उठाकर वो उन्होंने कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया और हमारे ये जो है नड्डा जी भी बने रहेंगे। मतलब नड्डा जी पिछले पांच छ सालों से बने हुए हैं और अब आगे भी बने रहेंगे। इसका मतलब यह है तो इसका अर्थ यह है कि भारतीय जनता पार्टी ने अपने आप को संघ से अलग कर लिया है। पर संघ जो है अपने आप को अलग नहीं करना चाहता। इसका मतलब यह है मतलब अब बीजेपी ने जैसा आपने कहा
9:27 2024 के मतदान के बीच में मतलब मुंबई में पांचवें चरण का महाराष्ट्र में मतदान हो रहा था और मुंबई में होने वाला था। मुंबई की सीटों का होने वाला था। उस समय नड्डा जी ने कहा था कि हमको हम हम अपने पैरों पर खड़े हो गए हैं। बीजेपी हो गई है। हमको संघ की जरूरत नहीं है। तो अब ये जो आज कल उन्होंने जो कहा वो क्या उसकी पुष्टि है क्या? कि हां नड्डा जी ने ठीक कहा था कि अब बीजेपी को संघ की जरूरत नहीं है। पर हम यह कह रहे हैं कि हमको बीजेपी की जरूरत नहीं है। मतलब हम इसको किस प्रकार से इंटरप्रेट करें। मतलब जो कोलकाता में कहा या मणिपुर
10:14 में कहा और दूसरा अब वो यह कह रहे हैं कि संघ को बीजेपी के नजरिए से नहीं देखना चाहिए। मतलब बीजेपी की ताकत का उनके साथ कोई संबंध नहीं है। वह अपनी स्वयं की एक बड़ी ताकत है। अब आप सोचिए कि क्या यह संभव है इस देश में कि बीजेपी और संघ को कोई अलग-अलग तरीके से देखना चाहेगा। मतलब ये जो रिश्ता है वो तो मछली और पानी का है। मतलब पूरा का पूरा संघ और बीजेपी के बीच में है। दूसरा यह कि आपने अगर देखा हो कि मोदी जी ने जिस तरह से तारीफ की लाल किले से संघ की एक पितृ संस्था के रूप में संघ को मानते
11:02 हैं और लगातार संघ की जिस तरह से वो तारीफ कर रहे हैं उसे देखते हुए क्या ये लगता है कि दो चीजें अलग है तो अब क्या ये अंदाज लगाना चाहिए कि स्थितियां अब ज्यादा तनावपूर्ण हो गई सवाल यह है कि भागवत साहब जो है लगातार राजनीतिक विषयों पर बयान दे रहे हैं। मणिपुर में कहा कि यहां सरकार बननी चाहिए जैसा उन्होंने कहा। ये पॉलिटिकल स्टेटमेंट है। तो इन बयानों के बारे में क्या माना जाए? मतलब यह एक जो राजनीतिक एजेंडा नहीं है तो
11:50 फिर क्या एजेंडा है? मतलब राजनीतिक स्तर पर आप बयान भी दे रहे हैं और कह रहे राजनीतिक एजेंडा नहीं है। दूसरा ये कि संघ का जो वैभव प्रकट हुआ है पिछले 10 सालों में अगर आप देखें संघ की संपत्ति संघ की वहां इमारत आपके यहां दिल्ली में भव्य इमारत और संघ के लोगों के जो पूरे के पूरे तौर तरीके हैं क्या आप मान सकते हैं कि ये कोई संघ की मतलब मतलब एक ऐसी संस्था जिसका कोई रजिस्ट रजिस्ट्रेशन नहीं है जिसका कोई जिसको कोई इनकम टैक्स का रिटर्न नहीं भरना
12:36 है जिसका कोई हिसाब नहीं है क्या वो इतनी समृद्ध हो सकती है तो क्या ये इसको आप एक गैर राजनीतिक संस्था का उदय मानेंगे कि गैर राजनीतिक संस्था इतनी संपन्न हो सकती है अगर हम पिछले दौर में जाए जनता पार्टी के जमाने में तो आप पाएंगे कि जनता पार्टी का प्रयोग जो एक्सपेरिमेंट था वो असफल जो हुआ या फेल हुआ वो बीजेपी ने जो विड्र किया सरकार से अपने आप को उसका मुद्दा यह था कि दोहरी सदस्यता का मामला था कि बीजेपी का जो सदस्य है वह आरएसएस का सदस्य हो सकता
13:24 है कि नहीं। मतलब बीजेपी और आरएसएस दोनों एक हैं और दोनों के एजेंडे एक ही है। मतलब यह अगर ये कहते हैं भागवत साहब कि बीजेपी का राजनीतिक हो सकता है पर यह हिंदुओं के एकीकरण का एजेंडा है या इसका कल्चरल और धार्मिक एजेंडा है। तो यही बात उन्होंने कही थी अपने नड्डा जी ने कि भाई आप अपना काम करिए। अब हम अपने पैरों पर खड़े हो गए। तो मैंने उसमें से सवाल यह निकाला कि 2024 में अगर नड्डा जी यह कह रहे हैं कि बीजेपी अपने पैरों पर अब खड़ी हो गई है
14:09 और उसे संघ की अब जरूरत नहीं है। इसका मतलब यही है कि 204 तक संघ जो है बीजेपी के ही काम कर रहा था। बीजेपी को ही चुनाव में जीवा रहा था। दूसरी चीज यह वो मतलब जो कह रहे हैं मतलब जो अंग्रेजी में कोट किया है उनके कहे को ऑर्गेनाइजेशन गोल्स एंड आइडेंटिटी एक्सटेंड बिय्ड इलेक्टोरल पॉलिटिक्स अब आप यह बताइए कि अगर महाराष्ट्र के चुनाव में अगर महाराष्ट्र का चुनाव ले वहां तो खुलेआम फडनवीस ने भी और तमाम लोगों ने यह कहा है कि संघ ने ही हमको चुनाव जितवा आया है क्योंकि हमारी इतनी ताकत नहीं थी और संघ ने उसकी क्रेडिट भी ली और अब भागवत
14:56 साहब कह रहे हैं कि जो संघ का काम है उसको इलेक्टोरल पॉलिटिक्स से अलग हटकर दूर जाकर देखना चाहिए पर वो साथ में एक सेंटेंस और कहते हैं कोलकाता में कि कुछ सदस्य चाहे तो पार्टिसिपेट कर सकते हैं पॉलिटिकल एक्टिविटी में पर संघ का स्वयं का पिटिकल एजेंडा नहीं है। तो हम अपनी बात को खत्म करना चाहते हैं कि देश के नागरिकों को मोहन भागवत की बात से क्या समझना चाहिए। दूसरा यह कि
15:42 बीजेपी अगर रिसोंड नहीं कर रही है मोहन भागवत के कहे पर ना कोलकाता के बाद किया ना चेन्नई के बाद किया ना मणिपुर के बाद किया ना दिल्ली के बाद किया इसका अर्थ हमको क्या लगाना चाहिए तो एक जो नागरिकों के बीच में जैसा आपने भूमिका में कहा और जो एक इंप्रेशन भी खड़ा होता है कि संबंध कोई तनावपूर्ण है और ये आगे क्या शक्ल लेंगे क्योंकि अब एक चीज साफ दिखती है कि अब बीजेपी का अध्यक्ष कोई बनेगा नहीं कार्यकारी अध्यक्ष बन गया है। जी आप कुछ कह रहे हैं। सर एक सवाल मेरे मन में है क्योंकि आपने दो चीजें बड़ी स्पष्ट कही है। एक तो आपने कहा कि लगता है संघ में भी मोहन भागवत
16:29 अकेले पड़ गए हैं। और जो पूरी बातचीत उससे ऐसा लग रहा है कि वो बीजेपी अब उनको भाव नहीं दे रही है। यानी वहां पे वो अपने आप को सहाय महसूस कर रहे हैं। तो क्या यह संभावना आप देखते हैं? आपने कहा कि आगे क्या शक्ल अख्तियार करता है? देखना होगा। क्या आप ये देखते हैं कि भागवत को हटाया भी जा सकता है? नहीं भागवत को हटाया नहीं जा सकता। संघ में कोई ऐसा प्रोविजन नहीं है। इस तरह का मतलब संघ का कार्यवाह जो है वो अनिश्चित काल तक के लिए रह सकता है जब तक कि वो स्वयं इच्छा व्यक्त नहीं करें। और आपने ये दिल्ली में अगर सुना हो उनको उनके भाषण को उन्होंने कहा था कि ना तो मैं हट रहा हूं ना तो मैं इस्तीफा दे रहा हूं ना नरेंद्र मोदी इस्तीफा दे रहे हैं। हम लोग दोनों जब तक चाहे अपने पद पर बने
17:16 रह सकते हैं। हम तो इसका एक ही तरीका है कि मोहन भागवत को संघ में अकेला कर दिया जाए। और अकेला कर दिया जाए। मतलब ये स्थिति लगभग बन सी गई है कि काफी लोग जो है वो मोहन भागवत की लाइन को टो करते हैं कि नहीं इसमें कई तरह के संदेह है तो वो बने रहे अपने पद पर बने रहे उनका प्रभाव क्षेत्र कितना बनता है और कितना बढ़ता है इस पर निर्भर करता है क्योंकि जिस तरह की मांगे दूसरे लोग कर रहे हैं जिस तरह के वक्तव्य दूसरे दे रहे हैं वो मोहन मोहन भागवत से अलग है। मतलब वो अगर आप पाए कि मोदी जी की नीतियों को लेकर
18:06 जो संघ के कुछ विचारक हैं वो जिस तरह के बयान दे रहे हैं खुलेआम समर्थन कर रहे हैं। आर्टिकल्स लिख रहे हैं अंग्रेजी में तो मोहन भागवत उस तरह का एंडोर्समेंट कभी करते नहीं है मोदी जी को लेकर। उन्होंने नहीं किया या इन्होंने जिस तरह की तारीफ की हमेशा भागवत मोदी जी ने संघ की प्रधानमंत्री ने उस तरह की कोई तारीफ नहीं की या मोहन भागवत के जन्मदिन पर बधाई मोहन भागवत मोदी मोहन भागवत के जन्मदिन पर बधाई मोदी जी ने दी पर मोदी जी के जन्मदिन पर मोहन भागवत ने कुछ कहा वो मेरे देखने में नहीं आया ये पूरा का पूरा मामला एक दूसरे के प्रति
18:52 रेसिप्रोकल नहीं है। मतलब ये कुछ इस तरह का है और जैसा एक मैंने कहा था शायद कहीं आपकी चर्चा में कि अभी वहां मिले ये जो ध्वजारोहण हुआ अयोध्या में उस दौरान जो पिक्चर्स जारी हुए उसमें भी आप पाएंगे कि मोहन भागवत है। मोदी जी हैं और योगी हैं। पर दोनों के बीच में कोई संवाद हुआ हो। कोई इस तरह का फोटो आया हो तो वो दिखाई नहीं दिया। तो कुल मिलाकर एक जो इंप्रेशन आम जनता के बीच में जाता है। एक दिक्कत यह है संघ के साथ कि इतनी डिसिप्लिन संस्था है कि यह लोग अपने गवेंसेस को पब्लिकली जाहिर नहीं करते हैं। और संघ का तो कोई आदमी कहेगा ही नहीं और बीजेपी का भी कोई आदमी कहेगा नहीं कि इस तरह का चल रहा है।
19:39 पर आप जो तनाव है वह देख सकते हैं कि जो संघ से जुड़े हुए सीनियर लीडर्स हैं बीजेपी में वो किस तरह से मार्जिनलाइज किए गए हैं। पूरी तरह से हाशिए पर डाल दिए गए और इसीलिए बीजेपी अध्यक्ष के पद पर जो नाम चल रहे थे वो उनमें उनमें कंसीडर नहीं किया गया। मतलब मोदी जी ने पूरी तरह से अपनी मर्जी से कार्यकारी अध्यक्ष को अपॉइंट किया या अमित शाह जी ने किया होगा। हम ये एक चल रहा है। मतलब ये जो हम लोगों का एक एनालिसिस है। अब इसमें हो सकता है कि मोहन भागवत तो ने कहा ना कोलकाता में कि एक अलग परसेप्शन बनाया जा रहा है। एक नरेटिव गढ़ा जा रहा है आरएसएस
20:24 के बारे में जो कि सही नहीं है। तथ्यों पर आधारित नहीं है। उनके जो शब्द है कि जो नैरेटिव संघ के बारे में गढ़ा जा रहा है वो तथ्यों पर आधारित नहीं है। अब तथ्य वह यह बता रहे हैं कि हमारा कोई पॉलिटिकल एजेंडा नहीं है। तो वह यह बताना चाहते हैं कि बीजेपी के चश्मे से नहीं देखना चाहिए। बीजेपी के चश्मे से जिस दिन देखना बंद कर देंगे आरएसएस को आरएसएस बचेगी नहीं। मतलब आरएसएस का वजूद ही नहीं रहेगा। और जो मोहन जो हमारे प्रधानमंत्री जी के बारे में जानकारी है वो यही है कि वो गुजरात में जब थे मुख्यमंत्री उन्होंने आरएसएस को पूरी तरह से न्यूट्रलाइज कर दिया था। बीएचपी को भी कर दिया था। मतलब मोदी जी के राज में गुजरात में आरएसएस उतना प्रभावकारी नहीं
21:13 था जितना मोहन भागवत अभी 2024 तक बने रहे। नड्डा जी के कहे के पहले तक। अब वो नड्डा जी के कहने के बाद वो भी नहीं है। कुछ चल रहा है और निश्चित रूप से वो ऐसा है कि वो पब्लिक डोमेन में ना तो है ना आएगा ना कोई लाएगा उसको। पर मोहन भागवत को रोक नहीं पाएंगे यह लोग कि वह बोलना बंद कर दे और वह ऐसे ही विषयों को बोल के आप मान सकते हैं कि इंस्टीगेट कर रहे हैं चीजों को उत्तेजित उत्तेजना फैला रहे हैं। जब आपका पॉलिटिकल एजेंडा नहीं है तो आपको बात भी करना बंद कर देना चाहिए। क्यों बोल रहे हैं आप पिटिकल एजेंडे पर? क्यों बोल रहे हैं? पर आप बोले भी जा रहे हैं। कोलकाता में भी बोले, चेन्नई में भी बोले, मणिपुर
21:59 में भी बोले, दिल्ली में भी बोले। तमाम चीजों पर बाबरी मस्जिद पर जैसे अभी फिर बोले वो कोलकाता में बोले वो जो टीएमसी के विधायक को जो निकाला और वो बाबरी बनाना चाहते हैं उस पर भी बोले। तो कुल मिलाकर मुद्दा जो आपने कहा वो थोड़ा सा उसी के नजदीक हमारे दर्शक सोच सकते हैं कि दोनों के बीच में सब कुछ बहुत ज्यादा ठीक नहीं है। अब वो पूरा ठीक नहीं है या आधा ठीक नहीं है या चौथाई ठीक नहीं है वो तो हम कैलकुलेट नहीं कर सकते। जी थैंक यू सर। थैंक यू। थैंक यू सर।