Full transcript of “Ashtavakra Maha Geeta 01 lecture by Osho”. Click a timestamp to open the video at that moment. Need another video? Use the YouTube transcript generator.
0:06 जनक उवाच कथम ज्ञानमवानोति कथम मुक्ति [गाना गाने की आवाज़] भविष्यति वैराग्यम च कथम प्राप्तमतही [संगीत] मम प्रभु मुक्त अष्टवक्र [संगीत][गाना गाने की आवाज़] वाच मुक्ति सी चेतात विषय विषवाज [संगीत] क्षमजव दया तोष सत्यम पियज
0:54 न पृथ्वी [गाना गाने की आवाज़] ना जलम ना अग्नि वायु [गाना गाने की आवाज़] वान एशा साक्षणम आत्मानंम रूपम वित्त [गाना गाने की आवाज़] मुक्त यदि देहम प्रथा कृत्य ची विश्रामतीस [गाना गाने की आवाज़] अधव सुखी [संगीत] शो [गाना गाने की आवाज़] बंध मुक्तो भविष्य नम विप्रािको वर्णो
1:40 नाश्रमी नाक्ष गोचर [संगीत] असंगोसी [गाना गाने की आवाज़] निराकारो [संगीत] विश्व साक्षी सुखी भव धर्मा [गाना गाने की आवाज़] धर्मो सुखम दुखम मानसानी न दे न करता [गाना गाने की आवाज़] सी न भोक्तासी [संगीत] मुक्तवासी सर्वदा
2:27 एक अनूठी यात्रा पर हम निकलते हैं। मनुष्य जाति के पास बहुत शास्त्र है। पर अष्टावक्र गीता जैसा शास्त्र नहीं। वेद फीके हैं। उपनिषद बहुत धीमी आवाज में बोलते हैं। गीता में भी ऐसा गौरव नहीं जैसा अष्टावक्र की संहिता में कुछ बात ही अनूठी है सबसे बड़ी बात तो यह है कि ना समाज
3:13 ना राजनीति ना जीवन की किसी और व्यवस्था का कोई प्रभाव अष्टावक्र के वचनों पर इतना शुद्ध भावातीत वक्तव्य है। समय और काल से अतीत दूसरा नहीं शायद इसीलिए अष्टावक्र की गीता अष्टावक्र की संयता का बहुत प्रभाव नहीं पड़ा। कृष्ण की गीता का बहुत प्रभाव पड़ा। पहला कारण कृष्ण की गीता समन्वय है। सत्य की उतनी चिंता नहीं जितनी समन्वय [संगीत] की चिंता है। समन्वय का आग्रह इतना गहरा है कि अगर
4:02 सत्य थोड़ा खो भी जाए तो कृष्ण राजी है। कृष्ण की गीता खिचड़ी [संगीत] जैसी है। इसलिए सभी को भाती है क्योंकि सभी का कुछ ना कुछ उसमें मौजूद है। ऐसा कोई संप्रदाय खोजना मुश्किल है जो गीता में अपनी वाणी ना खोज ले। ऐसा कोई व्यक्ति खोजना मुश्किल है जो गीता में अपने लिए कोई सहारा ना खोज ले। इन सब के लिए अष्टावक्र की गीता बड़ी कठिन होगी। अष्टावक्र समन्वय वादी नहीं सत्यवादी सत्य जैसा है वैसा कहा है बिना किसी लाग लपेट के सुनने वाले की चिंता नहीं है
4:50 सुनने वाला समझेगा नहीं समझेगा इसकी भी चिंता नहीं सत्य का ऐसा [संगीत] शुद्धतम वक्तव्य है ना पहले कहीं हुआ ना फिर बाद में कभी हो सका कृष्ण की गीता लोगों को प्रिय है क्योंकि अपना अर्थ निकाल लेना बहुत सुगम है। कृष्ण की गीता काव्यात्मक है। दो दो पांच भी हो सकते हैं। दो दो तीन भी हो सकते हैं। अष्टावक्र के साथ कोई खेल संभव नहीं। वहां दो दो चार ही होते का वक्तव्य शुद्ध गणित का वक्तव्य [संगीत] वहां काव्य को जरा भी जगह नहीं
5:36 वहां कविता के लिए जरा सी भी छूट नहीं जैसा है वैसा कहा है किसी तरह का समझौता नहीं कृष्ण की गीता पढ़ो तो भक्त भक्त अपना अर्थ निकाल लेता है क्योंकि कृष्ण ने भक्ति की भी बात की है। कर्म योगी अपना अर्थ निकाल लेता है क्योंकि कृष्ण ने कर्म योग की भी बात की है। ज्ञानी अपना अर्थ निकाल लेता है क्योंकि कृष्ण ने ज्ञान की भी बात की है। कृष्ण कहीं भक्ति को सर्वश्रेष्ठ कहते हैं। कहीं ज्ञान को सर्वश्रेष्ठ कहते हैं। कहीं कर्म को सर्वश्रेष्ठ कहते हैं। कृष्ण का वक्तव्य बहुत राजनैतिक है। वह
6:23 राजनेता थे। कुशल राजनेता थे। सिर्फ राजनेता थे इतना ही कहना उचित नहीं। कुटिल राजनीतिज्ञ थे। डिप्लोमेट थे। उनके वक्तव्य में बहुत सी बातों का ध्यान रखा गया। इसलिए सभी को गीता भा जाती है। इसलिए तो गीता पर हजारों टीकाएं हैं। अष्टावक्र पर कोई चिंता नहीं करता। क्योंकि अष्टावक्र के साथ राजी होना हो तो तुम्हें अपने को छोड़ना पड़ेगा। बेशर्त [संगीत] तुम अपने को ना ले जा सकोगे। तुम
7:10 पीछे रहोगे तो ही जा सकोगे। कृष्ण के साथ तुम अपने को ले जा सकते हो। कृष्ण के साथ तुम्हें बदलने की कोई भी जरूरत नहीं। कृष्ण के साथ तुम मौजू पड़ सकते हो। इसलिए सभी सांप्रदायकों ने कृष्ण पर गीता, कृष्ण की गीता पर टीकाएं लिखी। शंकर ने, रामानुज ने, निब्बारक [संगीत] ने, वल्लभ ने सबने सबने अपने अर्थ निकाल लिए। कृष्ण ने कुछ ऐसी बात कही है [संगीत] जो बहुअ है इसलिए मैं कहता हूं काव्यात्मक है। कविता में से मन चाहे अर्थ निकल सकते हैं।
7:58 कृष्ण का वक्तव्य ऐसा है जैसे वर्षा में बादल गिरते। जो चाहो देख लो कोई देखता है हाथी की सूंड कोई चाहे गणेश जी को देख ले। [संगीत] किसी को कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता। वो कहता है कहां की फिजूल बातें कर रहे हो? बादल है। धुआ इसमें कैसी आकृतियां देख रहे हो? पश्चिम में वैज्ञानिक मन के परीक्षण के लिए स्याही के धब्बे ब्लाटिंग पेपर पर डाल देते हैं और व्यक्ति को कहते हैं देखो इसमें क्या दिखाई पड़ता है। व्यक्ति गौर से देखता है उसे कुछ ना कुछ दिखाई पड़ता है। वहां कुछ भी नहीं है। सिर्फ ब्लाटिंग पेपर पर स्याही के धप्पे बेतरतीब फेंके गए।
8:45 सोच विचार के भी फेंके नहीं गए हैं। ऐसी ही बोतल उेल दी है। लेकिन देखने वाला कुछ ना कुछ खोज [संगीत] लेता है। जो देखने वाला खोजता है वो उसके मन में है। वो आरोपित कर लेता है। तुमने भी देखा होगा। दीवाल पर वर्षा का पानी पड़ता है। लकीरें खींच जाती है। कभी आदमी की शक्ल दिखाई पड़ती है। कभी घोड़े की शक्ल दिखाई पड़ती है। तुम जो देखना चाहते हो आरोपित कर लेते हो। रात के अंधेरे में कपड़ा टंगा है। भूत प्रेत दिखाई पड़ जाते हैं। कृष्ण की गीता ऐसी ही है जो तुम्हारे मन में है दिखाई पड़ जाएगा। तो शंकर ज्ञान देख लेते हैं। रामानुज भक्ति देख लेते हैं। तिलक कर्म देख लेते हैं। और सब अपने घर प्रसन्नचित लौट आते
9:33 हैं कि ठीक कृष्ण वही कहते हैं जो हमारी मान्यता है। इमर्सन ने लिखा है कि एक बार एक पड़ोसी प्लेटो की किताबें उनसे मांग के ले गया। अब प्लेटो 2000 साल पहले हुआ और दुनिया के थोड़े से अनूठे विचारों में से एक कुछ दिनों बाद इमरसन ने कहा किताबें पढ़नी हो तो वापस कर दें। वो पड़ोसी लौटा गया। इमरर्सन ने पूछा कैसी लगी? उस आदमी ने कहा कि ठीक इस आदमी [संगीत] प्लेो के विचार मुझसे मिलते जुलते। कई दफा तो मुझे ऐसा लगा कि इस आदमी को मेरे विचारों [संगीत] का पता कैसे चल गया?
10:20 प्लेयर तो 2000 [संगीत] साल पहले हुआ है। इसको शक हो रहा है कि इसने कहीं मेरे विचार तो नहीं चुरा लिए। कृष्ण में ऐसा शक बहुत बार होता है। इसलिए कृष्ण पर सदियां बीत गई। टीकाएं [संगीत] चलती जाती है। हर सदी अपना अर्थ खोज लेती है। हर व्यक्ति अपना अर्थ खोज लेता है। कृष्ण [संगीत] की गीता स्याही के दब्बों जैसी एक कुशल राजनीतिज्ञ का वक्तव्य है। अष्टावक्र की गीता में तुम कोई अर्थ ना खोज पाओगे। तुम [संगीत] अपने को छोड़कर चलोगे तो ही अष्टावक्र की गीता स्पष्ट होगी। अष्टावक्र का सुस्पष्ट संदेश है। उसमें जरा भी तुम अपनी व्याख्या ना डाल
11:08 सकोगे। इसलिए लोगों ने टीकाएं नहीं लिखी। टीका लिखने की जगह नहीं है। तोड़ने मड़ोने का उपाय नहीं है। तुम्हारे मन के लिए सुविधा नहीं है कि तुम कुछ डाल दो। अष्टावक्र ने इस तरह से वक्तव्य दिया है। कि सदियां बीत गई। उस वक्तव्य में कोई कुछ जोड़ नहीं पाया, घटा नहीं पाया। बहुत कठिन है ऐसा वक्तव्य देना। शब्द के साथ ऐसी कुशलता बड़ी कठिन है। इसलिए मैं कहता हूं एक अनूठी यात्रा तुम शुरू कर रहे हो। अस्सा वक्र में राजनीतिज्ञों की कोई उत्सुकता नहीं। ना तिलक [संगीत] की ना अरविंद की ना गांधी की ना विनोबा की किसी की कोई उत्सुकता
11:55 नहीं क्योंकि [संगीत] तुम अपना खेल ना खेल पाओगे। तिलक को उकसाना है [संगीत] देशभक्ति उठाना है कर्म का ज्वार कृष्ण की गीता सहयोगी बन जाती कृष्ण हर किसी को कंधा देने को तैयार कोई भी चला लो गोली उनके कंधे पर रख के वो राजी है कंधा उनका पीछे छिपने की तुम्हें सुविधा है और उनके पीछे से गोली चलाओ तो गोली भी बहुमूल्य मालूम पड़ती है अष्टावक्र किसी को कंधे पर हाथ भी नहीं रखने देते। इसलिए गांधी की कोई उत्सुकता नहीं, तिलक की कोई उत्सुकता नहीं। अरविंद विनोवा को कुछ लेना देना नहीं। क्योंकि तुम कुछ थोप
12:42 ना सकोगे। राजनीति की सुविधा नहीं है। अस्तवक्र राजनीतिक पुरुष नहीं। ये पहली बात ख्याल में रख लेनी जरूरी। ऐसा सुस्पष्ट खुले आकाश जैसा वक्तव्य जिसमें बादल है ही नहीं। तुम कोई आकृति देख ना पाओगे। आकृति छोड़ोगे सब। बनोगे निराकार। अरूप के साथ जोड़ोगे संबंध तो अष्टावक्र समझ में आएंगे। अष्टावक्र समझना चाहो [संगीत] तो ध्यान की गहराई में उतरना होगा। कोई व्याख्या से काम होने वाला नहीं। और ध्यान के लिए भी अष्टवक्र नहीं कहते कि
13:28 तुम बैठ के राम राम जपो। अष्टावक्र कहते हैं [संगीत] तुम कुछ भी करो वो ध्यान ना होगा। करता जहां है वहां ध्यान कैसा? जब तक करना है तब तक भ्रांति है। जब तक करने वाला मौजूद है तब तक अहंकार मौजूद है। अस्तावक्र कहते हैं साक्षी हो जाना है ध्यान। जहां करता छूट जाता [संगीत] तुम सिर्फ देखने वाले रह जाते। दृष्टा मात्र दृष्टा मात्र [संगीत] हो जाने में ही दर्शन दृष्टा मात्र हो जाने में ही ध्यान [संगीत] दृष्टा मात्र हो जाने में ही
14:13 ज्ञान इसके पहले कि हम सूत्र में उतरे अष्टावक्र [संगीत] के संबंध में कुछ बातें समझ लेनी जरूरी है ज्यादा पता नहीं क्योंकि ना तो वे सामाजिक पुरुष थे ना राजनीतिक तो इतिहास में कोई उल्लेख नहीं है [संगीत] बस थोड़ी सी घटनाएं ज्ञात है वह भी बड़ी अजीब भरोसा करने योग्य नहीं लेकिन समझोगे तो बड़े गहरे अर्थ खुलेंगे पहली घटना अष्टावक्र पैदा हुए उसके पहले की पीछे का तो कुछ पता नहीं गर्भ की घटना [संगीत] पिता बड़े पंडित
14:59 अष्टावक मां के गर्भ में पिता रोज वेद का पाठ करते हैं और अष्टावक्र गर्भ में सुनते हैं। एक दिन अचानक गर्भ से आवाज आती कि रुको भी यह सब बकवास है। ज्ञान इसमें कुछ भी नहीं। बस शब्दों की शब्दों का संग्रह शास्त्र में ज्ञान कहां ज्ञान स्वयं में शब्द में सत्य कहां सत्य
15:46 स्वयं में पिता स्वभावता नाराज हुए एक तो पिता फिर पंडित और गर्भ में छिपा हुआ बेटा इस तरह की बात कहे अभी पैदा भी नहीं हुआ क्रोध में आ गए आग बबूला हो गए पिता का अहंकार चोट खा गया फिर पंडित का अहंकार बड़े पंडित थे बड़े विवादी [संगीत] थे शास्त्रार्थी थे क्रोध में अभिशाप दे दिया कि जब पैदा होगा तो आठ अंगों [संगीत] से टेढ़ा होगा इसलिए नाम अस्तावक्र आठ जगह से कुबड़े [संगीत] पैदा हुए।
16:34 आठ जगह से ऊंट की भांति इरछे [संगीत] तिरछे पिता ने क्रोध में शरीर को विक्षित कर दिया। ऐसी और भी कथाएं हैं। कहते हैं बुद्ध जब पैदा हुए तो खड़े खड़े पैदा हुए। मां खड़ी थी वृक्ष के तले खड़े खड़े मां खड़ी [संगीत] थी खड़े खड़े पैदा हुए जमीन पर गिरे नहीं कि चले सात कदम चले आठवें कदम पर रुक कर चार आर्य सत्यों की [संगीत] घोषणा की कि जीवन दुख है अभी सात कदम ही चले हैं पृथ्वी पर कि जीवन दुख
17:22 है कि दुख से मुक्त होने की संभावना है कि दुख मुक्ति का उपाय कि दुख मुक्ति की अवस्था है। निर्वाण की अवस्था है। लाओसु के संबंध में कथा है कि लाओसु बूढ़े पैदा हुए। 80 वर्ष के पैदा हुए। 80 वर्ष तक गर्भ में ही रहे। कुछ करने की चाह ही ना थी तो गर्भ से निकलने की चाह भी ना हुई। कोई वासना ही ना थी। तो संसार में आने की भी वासना [संगीत] ना हुई।
18:07 जब पैदा हुए तो सफेद बाल थे। 80 वर्ष के बूढ़े थे। [संगीत] जरस्र के संबंध में कथा है कि जब जथुस्त्र पैदा हुए तो पैदा होते से ही खिलखिला के हंसे। मगर इन सबको मात कर दिया अष्टावक्र ने। ये तो पैदा होने की बाद की बात है। अष्टावक्र ने अपना पूरा वक्तव्य दे दिया। पैदा होने के पहले यह कथाएं महत्वपूर्ण है। इन कथाओं में इन व्यक्तियों के जीवन की सारी सार
18:53 संपदा है निचोड़ है। बुद्ध ने जो जीवन भर में कहा उसका निचोड़ बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग का उपदेश दिया तो सात कदम चले आठवें पर रुक गए आठ अंग है कुल पहुंचने की अंतिम अवस्था है सम्यक समाधि। उस समाधि की अवस्था में ही पता चलता है जीवन के पूरे सत्य का वह चार आर्य सत्यों की घोषणा [संगीत] करती लासु बूढ़ा पैदा हुआ लोगों को 80 साल लगते हैं। तब भी ऐसी समझ नहीं आ पाती।
19:41 बूढ़े होकर भी लोग बुद्धिमान कहां हो पाते? बूढ़ा होना और बुद्धिमान होना पर्यायवाची तो नहीं। बाल तो धूप में भी पकाए जा [संगीत] सकते हैं। लाओसु की कथा इतना ही कहती है कि अगर जीवन में त्वरा हो, तीव्रता हो तो जो 80 साल में घटता है वो एक क्षण में घट सकता है। प्रज्ञा की तीव्रता हो तो एक क्षण में घट सकता है। बुद्धि मलिन हो तो 80 साल में भी कहां घटता है। जस्त जन्म के साथ ही [संगीत] हसे। जस्त्र का धर्म अकेला धर्म है दुनिया में जिसको हंसता हुआ [संगीत] धर्म कह सकते अति पार्थिव पृथ्वी का धर्म [संगीत] इसलिए
20:27 तो पारसी दूसरे धार्मिकों को धार्मिक नहीं मालूम होते [संगीत] नाचते गाचते प्रसन्न जस का धर्म आस्था हुआ धर्म जीवन के स्वीकार का धर्म है निषेध नहीं है [संगीत] त्याग नहीं है तुमने कोई पारसी साधु देखा [संगीत] नंग धड़ंग खड़ा हो जाए छोड़ दे धूप ना खड़ा हो जाए धनी रमा के बैठ जाए नहीं पारसी धर्म में जीवन को सताने कष्ट देने की कोई व्यवस्था नहीं जस्त्र का सारा संदेश यही है कि जब हंसते हुए परमात्मा को पाया जा सकता है तो
21:14 रोते हुए क्यों पाना जब नाचते हुए पहुंच सकते हैं उस मंदिर तक तो नाहक कांटे क्यों बोने जब फूलों के साथ जाना हो सकता है [संगीत] तो यह दुखवाद क्यों इसलिए ठीक है प्रतीक [संगीत] ठीक है कि जस पैदा होते हसे इन कथाओं में इतिहास मत खोजना ऐसा हुआ है ऐसा नहीं है लेकिन इन कथाओं में एक बड़ा गहरा अर्थ है। तुम्हारे पास एक बीज पड़ा है। जब तुम बीज को देखते हो तो इससे पैदा होने वाले फूल की कोई भी तो खबर नहीं मिलती। यह क्या हो सकता है?
22:01 इसकी भनक भी तो नहीं आती। यह कमल बनेगा, खिलेगा। जल में रहेगा और जल से अछूता रहेगा। सूरज की किरणों पर नाचेगा और सूरज सूरज भी [संगीत] ईर्षालु होगा। इसके सौंदर्य से इसकी कोमलता से इसके अपूर्व गरिमा इसके प्रसाद [संगीत] से। इसकी सुगंध आकाश में उड़ेगी। ये बीज को देखकर तो पता भी नहीं चलता। बीज [संगीत] को तो देख के इसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता, अनुमान भी नहीं कर सकता। लेकिन एक दिन यह घटता है।
22:50 तो दो [संगीत] तरह से हम सोच सकते हैं। या तो हम बीज को पकड़ ले जोर से और हम कहे जो बीच में दिखाई नहीं [संगीत] पड़ा वो कमल में भी घट नहीं सकता। यह भ्रम है। यह धोखा [संगीत] है। ये झूठ है। जिनको हम तर्कनिष्ठ कहते हैं, संदेहशील कहते हैं, उनका यही आधार है। वो कहते हैं जो बीज में नहीं दिखाई पड़ा वो फूल में हो नहीं सकता। [संगीत] कहीं भ्रांति हो रही है। इसलिए संदेह व्यक्ति बुद्ध को मान नहीं पाता। [संगीत] महावीर को स्वीकार नहीं कर पाता। जीसस को अंगीकार नहीं कर पाता। क्योंकि वो कहते हैं हमने जाना इनको। जीसस [संगीत] अपने गांव में आए। बड़े हैरान हुए। गांव
23:36 के लोगों ने कोई चिंता ही ना की। जीसस [संगीत] का वक्तव्य है कि पैगंबर की अपने गांव में पूजा नहीं होती। [संगीत] कारण क्या रहा होगा? क्यों नहीं होती गांव में पूजा पैगंबर की? गांव के लोगों ने बचपन से देखा बड़े ही जोसेफ का लड़का है। लकड़ियां ढोते देखा। रिंदा चलाते देखा। लकड़ियां चीरते देखा। पसीने से लथपथ देखा, सड़कों पर खेलते देखा, झगड़ते [संगीत] देखा। गांव के लोग इसे बचपन से जानते हैं बीज की तरह देखा। आज अचानक यह हो कैसे सकता है कि परमात्मा का पुत्र हो गया। नहीं। जिसने बीज को देखा है, वह फूल को मान नहीं पाता। वो कहता है जरूर धोखा होगा। बेईमानी
24:24 होगी। यह आदमी पाखंडी है। बुद्ध अपने घर वापस लौटे [संगीत] तो पिता सारी दुनिया को जो दिखाई पड़ रहा था वह पिता को दिखाई नहीं पड़ा। सारी दुनिया अनुभव कर रही थी। एक प्रकाश दूर-दूर तक खबरें जा रही थी। दूर देशों से लोग आने शुरू हो गए थे। लेकिन जब वो वापस बुद्ध घर आए 12 साल बाद तो पिता ने कहा मैं तुझे अभी भी क्षमा कर सकता हूं। यद्यपि तूने काम तो बुरा किया है। सताया तो तूने हमें अपराध तो तूने किया लेकिन मेरे पास पिता का हृदय मैं माफ कर दूंगा द्वार तेरे लिए खुले मगर फेंक ये
25:09 भिक्षा का पात्र हटा ये भिक्षु का वेश ये सब नहीं चलेगा तो वापस लौटा। ये राज्य तेरा है मैं बूढ़ा हो गया। इसको कौन संभालेगा? हो गया बचपना बहुत। अब बंद करो यह सब खेल। बुद्ध ने कहा कृपा कर मुझे देखें तो जो गया था वह वापस नहीं आया है। यह कोई और ही आया है जो आपके घर पैदा हुआ था। वही वापस नहीं आया है। यह कोई और ही आया है। बीज फूल होके आया है। गौर से तो देखो। पिता ने कहा तू मुझे सिखाने चला है। पहले दिन से जब तू पैदा हुआ था तब से तुझे [संगीत] जानता हूं। किसी और को धोखा देना।
25:56 किसी और को समझा लेना। भ्रम में डाल देना। मुझे तू भ्रम में ना डाल पाएगा। मैं फिर कहता हूं मैं तुझे भलीभांति जानता हूं। मुझे कुछ सिखाने को चेष्टा मत कर। क्षमा करने को मैं राजी हूं। बुद्ध ने कहा आप और मुझे जानते हैं। मैं तो स्वयं को भी नहीं जानता था। अभी अभी [संगीत] किरणें उतरी है और स्वयं को जानो। क्षमा करें लेकिन यह मुझे कहना ही पड़ेगा कि जिसको आपने देखा वो मैं नहीं हूं। और जहां तक आपने देखा वो मैं [संगीत] नहीं हूं। बाहर बाहर आपने देखा। भीतर आपने कहां देखा? मैं आपसे पैदा हुआ हूं। लेकिन आपने मुझे निर्मित नहीं किया।
26:43 मैं आपसे आया हूं। जैसे एक रास्ते से कोई राहगीर आता है। लेकिन [संगीत] रास्ता और राहगीर का क्या लेना देना? कल रास्ता कहने लगे कि मैं तुझे पहचानता हूं। तू मेरे ही से तो होकर आया। ऐसे ही आप कह रहे हैं आपके [संगीत] पहले भी मैं था। जन्मों जन्मों से मेरी यात्रा चल रही। आपसे गुजरा जरूर। ऐसा मैं औरों से भी गुजरा हूं। और भी मेरे पिता थे और भी मेरी माताएं थी। लेकिन मेरा होना बड़ा अलग थलक है। कठिन है बहुत अति कठिन है अगर बीज देखा तो फूल पर भरोसा नहीं आता एक तो ढंग है अश्रद्धालु का
27:30 तर्कवादी का संदेहशील का कि वो कहता है बीच को हम पहचानते हैं तो फूल हो नहीं सकता हम कीचड़ को जानते हैं उस कीचड़ से कमल हो कैसे सकता है सब गलत सपना [संगीत] होगा भ्रांति होगी किसी मोह जाल में पड़ गए होगे किसी ने धोखा दे दिया कोई जादू कोई दलिस्म एक तो यह रास्ता है एक रास्ता है श्रद्धालु का प्रेमी का भक्त का सहानुभूति से भरे हृदय का वो फूल को देखता है और फूल से पीछे की तरफ यात्रा करता है वो कहता है जब फूल में ऐसा सुगंध हुई जब फूल में ऐसी विभा प्रकट हुई जब फूल में ऐसी प्रतिभा जब फूल में ऐसा कुंवारापन दिखा तो जरूर
28:17 बीज में भी रहा होगा क्योंकि जो फूल में हुआ है वह बीज में ना हो तो हो ही नहीं सकता। यह सारी कथाएं घटी है ऐसा नहीं। जिन्होंने अष्टावक्र के फूल को देखा उनको यह ख्याल में आया कि जो आज हुआ है वह कल भी रहा होगा। छिपा था। अवगुठित था। पर्दे में पड़ा था जो आज है अंत में है वह प्रथम भी रहा होगा जो मृत्यु के क्षण में दिखाई पड़ रहा है वह जन्म के क्षण में भी मौजूद रहा होगा अन्यथा पैदा कैसे होता तो एक तो ढंग है फूल से पीछे की तरफ देखना और एक है बीच [संगीत] से आगे की तरफ देखना गौर से देखो तो दोनों में सार सूत्र एक ही
29:06 है दोनों की आधार भित्ति एक ही है लेकिन लेकिन कितना जमीन में आसमान का अंतर हो जाता है। जो बीज वाला है वो भी यह कह रहा है कि जो बीज में नहीं है वो फूल में कैसे हो सकता है? ये उसका तर्क है। फूल वाला भी यही कह रहा है। वो कह रहा है जो फूल में है वो बीज में भी होना ही चाहिए। दोनों का तर्क तो एक है लेकिन दोनों के देखने के ढंग अलग गए। बड़ी अड़चन मुझसे कोई पूछता [संगीत] था कि आपके साथ बचपन में बहुत लोग पढ़े होंगे स्कूल में, कॉलेज में वे दिखाई नहीं पड़ते। वे कैसे दिखाई पड़ सकते? उनको बड़ी अड़चन है। वो भरोसा नहीं कर सकते। [संगीत]
29:53 अति कठिन है उन्हें। कल ही मेरे पास रायपुर [संगीत] से किसी ने एक अखबार भेजा। श्री हरिशंकर परसाई ने एक लेख मेरे खिलाफ [संगीत] लिखा है। वो मुझे जानते हैं। कॉलेज के दिनों से जानते हैं। हिंदी के मूर्धन्य व्यंग लेखक हैं। मेरे मन में उनकी कृतियों का आदर्श है। लेख में उन्होंने लिखा है कि जबलपुर की हवा में कुछ खराबी है। यहां धोखेबाज और धूरथी पैदा होते जैसे रजनीश महेश योगी मुंदड़ा तीन नाम उन्होंने गिनाए
30:41 धन्यवाद उनका कम से कम मेरा नाम नंबर एक तो गिनाया इतनी याद तो रखी एकदम बिसार नहीं दिया बिल्कुल बिल्कुल भूल गए हो ऐसा नहीं है। लेकिन अर्जुन स्वाभाविक है सीधी साफ है। मैं उनकी बात समझ सकता हूं। ये असंभव है बीच को देखा तो फूल में भरोसा। फिर जिन्होंने फूल को देखा उन्हें बीच में भरोसा मुश्किल हो जाता है। तो सभी महापुरुषों की जीवन कथाएं दो ढंग से लिखी जाती है। जो उनके विपरीत है वो
31:26 बचपन से यात्रा शुरू करते हैं। जो उनके पक्ष में है वो अंत से यात्रा शुरू करते हैं। बचपन की तरफ जाते हैं। दोनों एक अर्थ में सही है। लेकिन जो बचपन से यात्रा करके अंत की तरफ जाते हैं वह वंचित रह जाते हैं। उनका सही होना उनके लिए आत्मघाती है। जो अंत से यात्रा करते हैं वो पीछे की तरफ [संगीत] जाते हैं। वो धन्य भागी हैं। क्योंकि बहुत कुछ उन्हें अनायास मिल जाता है जो कि पहले तर्कवादियों को नहीं मिल पाता। अब ना केवल मैं गलत मालूम होता हूं। मेरे
32:11 कारण जबलपुर तक की हवा [संगीत] उनको गलत मालूम होती है। कुछ भूल हवा पानी में होनी चाहिए। यदि मैं [संगीत] उनको कहना चाहूंगा जबलपुर को कोई हक नहीं है मेरे संबंध में [संगीत] हवा पानी को अच्छा या खराब तय करने का। जबलपुर से मेरा कोई बहुत नाता नहीं है। [संगीत] थोड़े दिन वहां था। [संगीत] महेश योगी भी थोड़े दिन वहां थे। उनका भी कोई नाता नहीं है। हम दोनों का नाता किसी और जगह से है। उस जगह के लोग इतने सोए हैं कि उन्हें अभी खबर ही नहीं है। महेश योगी और मेरा जन्म पास ही [संगीत] पास हुआ। दोनों गाडरवाड़ा
32:58 के आसपास पैदा हुए। उनका जन्म चीचली में हुआ। मेरा जन्म [संगीत] कुवाड़े में हुआ। अगर हवा पानी खराब है तो वहां का होगा। इसका दुख गाटरवाड़ा को होना चाहिए। कभी होगा या सुख जबलपुर को इसमें बीच में आना नहीं चाहिए। लेकिन मन [संगीत] कैसे तर्क रचता है। अब जो अष्टावक्र की कथा को देखेगा वो सुनते से ही कह देगा गलत। असंभव यह तो कथा जिन्होंने लिखी उनको भी पता है कि कहीं कोई गर्व से बोलता है वो तो केवल इतना कह रहे हैं कि जो आखिर
33:44 में प्रकट हुआ वो गर्भ में मौजूद रहा होगा जो वाणी आखिर में खिली वो किसी ना किसी गहरे तल पर गर्भ में भी मौजूद रही होगी अन्यथा खिलती [संगीत] कहां से आती कहां से सुनने से थोड़ी कुछ आता है हर चीज [संगीत] के पीछे कारण है नहीं देख पाए हो हम लेकिन था तो मौजूद यह सारी कथाएं इसी का सूचक देती है अष्टावक्र के संबंध में दूसरी बात जो ज्ञात है वो है जब वे 12 वर्ष के थे बस दो ही बातें ज्ञात है तीसरी उनकी अष्टावक्र गीता है या कुछ लोग कहते हैं अष्टावक्र संहिता
34:30 जब वे 12 वर्ष के थे तो एक बड़ा विशाल शास्त्रार्थ जनक ने रचा। जनक सम्राट थे और उन्होंने सारे देश के पंडितों को निमंत्रण दिया और उन्होंने 1000 गाय राजमहल के द्वार पर खड़ी कर दी। और उन्होंने गानों के सी पर सोना मर दिया और हीरे जवाहरात लटका दिए और कहा जो भी विजेता होगा वो इन गांवों को हाक के ले जाए। बड़ा विवाद हुआ। अष्टवक्र के पिता भी उस विवाद [संगीत] में गए। खबर आई सांझ होते कि पिता हार रहे हैं।
35:19 सबसे तो जीत चुके थे। वंदिन नाम के एक पंडित से हारे जा रहे हैं। यह खबर सुनकर अष्टावक्र भी राजमहल पहुंच गया। सभा सजी थी। विवाद अपनी आखिरी चरम अवस्था में था। निर्णायक घड़ी करीब आती थी। पिता के हारने की स्थिति बिल्कुल पूरी तय हो चुकी थी। अब हारे तब हारे की अवस्था थी। [संगीत] अस्थावक्र दरबार में भीतर चला गया। पंडितों ने उसे देखा। महापंडित इकट्ठे थे। उसका आठ [संगीत] अंगों से टेढ़ामेढ़ा शरीर वो चलता
36:04 तो भी देख के लोगों को हंसी आती। उसका चलना भी बड़ा। हास्यास्पद था। सारी सभा हंसने लगी। अष्टावक्र भी खिल के हंसा। जनक ने पूछा और सब हंसते हैं वह तो मैं समझ गया क्यों हंसते लेकिन बेटे तू क्यों हंसा? असवक्र ने कहा मैं इसलिए हंस रहा हूं कि इन [संगीत] चम्हारों की सभा में सत्य का निर्णय हो रहा है। बड़ा आदमी अनूठा रहा होगा। ये चम्हार यहां क्या कर रहे हैं? सन्नाटा [संगीत] छा गया चमार। सम्राट ने पूछा तेरा मतलब उसने कहा सीधी [संगीत] सी बात है इनको
36:50 चमड़ी ही दिखाई पड़ती है मैं नहीं दिखाई पड़ता मुझसे सीधा साधा आदमी खोजना मुश्किल है वो तो इनको दिखाई ही नहीं पड़ता इनको आड़ा टेढ़ा शरीर दिखाई पड़ता है ये चमार है ये चमड़ी के पारखी राजन मंदिर के टेढ़े होने से कहीं आकाश टेढ़ा होता है घड़े के फूटे होने से कहीं आकाश फूटता है। आकाश तो निर्विकार है। मेरा शरीर टेढ़ा-मेढ़ा है। लेकिन मैं तो नहीं।
37:35 ये जो भीतर बसा है इसकी तरफ तो देखो। इससे तुम सीधा साधा और कुछ खोज ना सकोगे। यह बड़ी चौंकाने वाली घोषणा थी। सन्नाटा छा गया होगा। जनक प्रभावित [संगीत] हुआ। झटका खाया। [संगीत] निश्चित ही कहां चमारों की भीड़ इकट्ठी करके बैठा है। [संगीत] खुद पर भी पश्चाताप हुआ, अपराध लगा कि मैं भी हंसा। उस दिन तो कुछ ना कहते [संगीत] बना। लेकिन दूसरे दिन सुबह जब सम्राट घूमने निकला था
38:22 तो राह पर अष्टावक्र दिखाई पड़ा। उतरा घोड़े से पैरों में गिर पड़ा। सबके सामने तो हिम्मत ना जुटा पाया। एक दिन पहले। एक दिन पहले [संगीत] तो कहा था बेटे तू क्यों हंसता है? 12 साल का लड़का था। उम्र तौली थी। आज उम्र नहीं तौली। आज घोड़े से उतर गया। पैर पर गिर [संगीत] पड़ा। साष्टांग दंडवत। और कहा पधारे राजमहल [संगीत] मेरी जिज्ञासाओं का समाधान करें। हे प्रभु आए मेरे घर।
39:07 बात मेरी समझ में आ गई। रात भर मैं सो ना सका। ठीक ही कहा। शरीर को ही जो पहचानते हैं उनकी पहचान गहरी कहां? आत्मा के संबंध में विवाद कर रहे हैं और अभी भी शरीर में रस और विरस पैदा होता है। घृणा आकर्षण पैदा होता है। मृत्यु को देख रहे हैं। अमृत की चर्चा करते हैं। धन्यभाग मेरे कि आप आए और मुझे चौका आया। मेरी नींद तोड़ दी। अब पधारो राजमहल में उसने बड़ी सजावट कर रखी थी स्वर्ण सिंहासन पर बिठाया था इस 12 साल के
39:54 अष्टावक्र को [संगीत] और उससे जिज्ञासा की पहला सूत्र जनक [संगीत] की जिज्ञासा है जनक ने पूछा है अष्टावक्र ने समझाया है इससे ज्यादा अष्टावक्र के संबंध में और कुछ पता नहीं और कुछ पता होने की जरूरत भी नहीं। काफी है। इतना बहुत है। हीरे बहुत होते भी नहीं। कंकड़ पत्थर ही बहुत होते हैं। हीरा एक भी काफी होता है। ये दो छोटी सी घटनाएं हैं। एक तो जन्म के पहले की गर्व से आवाज और घोषणा कि क्या पागलपन में पड़े
40:41 हो। शास्त्र में उलझे हो। शब्द में उलझे हो। जागो यह ज्ञान नहीं है। यह सब उधार है। यह सब बुद्धि का ही जाल है। अनुभव नहीं है। इसमें रंच मात्र भी सार नहीं है। कब तक अपने को भरमाए रखोगे? और दूसरी घटना राजमहल में हंसना पंडितों [संगीत] का और कहना अष्टावक्र का कि जीवन में देखने की दो [संगीत] दृष्टियां है। एक आत्म दृष्टि एक चर्म दृष्टि चम्हार चमड़ी को देखता है। प्रज्ञावान आत्मा को देखता [संगीत] है। तुमने गौर
41:27 किया? चमार [संगीत] तुम्हारे चेहरे की तरफ देखते नहीं वह जूते को ही देखता असल में चमार जूते को देख के सब पहचान लेता तुम्हारे संबंध में कि आर्थिक हालत कैसी [संगीत] है सफलता मिल रही कि विफलता मिल रही भाग्य कैसा चल रहा वो सब जूते में लिखा है जूते की सिलवटें कह देती जूते की दशा कह देती जूते में तुम्हारी आत्मकथा लिखी चमार पढ़ लेता। जूते में [संगीत] चमक, जूते का ताजा और नया होना चम्हार तुमसे प्रसन्नता से मिलता है। जूता ही उसके लिए तुम्हारी [संगीत] आत्मा का सबूत है। दर्जी कपड़े देखता है।
42:15 तुम्हारा कोट कपड़ा देख के समझ लेता हालत कैसी है। सबकी अपनी बंधी हुई दृष्टियां [संगीत] है। सिर्फ आत्मवान ही आत्मा को देखता है। उसकी कोई दृष्टि नहीं है। उसके पास दर्शन है। [संगीत] एक छोटी घटना और जो अष्टावक्र के जीवन से संबंधित नहीं। रामकृष्ण और विवेकानंद के जीवन से संबंधित है। [संगीत] लेकिन अष्टावक्र से उसका जोड़ है। फिर हम सूत्रों में प्रवेश करें। विवेकानंद रामकृष्ण के पास आए तब उनका नाम नरेंद्र नाथ था। विवेकानंद बाद में रामकृष्ण ने उनको पुकारा। [संगीत] जब आए रामकृष्ण के पास तो अति विवादी थे,
43:02 नास्तिक थे, तर्कवादी [संगीत] थे। हर चीज के लिए प्रमाण चाहते थे। कुछ चीजें हैं जिनके लिए कोई प्रमाण [संगीत] नहीं। मजबूरी है। परमात्मा के लिए कोई प्रमाण नहीं। है और प्रमाण नहीं। प्रेम के लिए कोई प्रमाण नहीं है और प्रमाण नहीं है। सौंदर्य के लिए कोई प्रमाण नहीं है और प्रमाण नहीं है। अगर मैं कहूं देखो एक खजूरे ना के वृक्ष कैसे सुंदर और तुम कहो हमें तो कोई सौंदर्य दिखाई नहीं पड़ता। वृक्ष जैसे वृक्ष सिद्ध करें मुश्किल हो जाएगी। कैसे सिद्ध करें कि सुंदर है
43:50 सुंदर होने के लिए सौंदर्य की परख चाहिए और तो कोई उपाय नहीं। आंख चाहिए और तो कोई उपाय नहीं। कहते हैं मजनू ने कहा कि लैला को जानना हो तो मजनू की आंख चाहिए। ठीक कहा। लैला को देखने का और कोई उपाय ही नहीं। [संगीत] मजनू को बुलाया था उसके गांव के राजा ने और कहा था तू पागल है। मैं तेरी लैला को जानता हूं। साधारण सी लड़की है। काली कलूठी कुछ खास नहीं। [संगीत] तुझ पर मुझे दया आती है। ये मेरे राजमहल की 12 लड़कियां खड़ी। ये इस देश की सुंदरतम स्त्रियां है। इनमें से तू कोई भी चुन ले। ये तुझे रोते देख के मेरा भी प्राण रोता है। उसने देखा और उसने कहा इनमें तो लैला
44:37 कोई भी नहीं। यह तो लैला को लैला के मुकाबले तो दूर उसके चरण की धूल भी नहीं। सम्राट कहने लगा मजनू तू पागल है। मजनू ने कहा ये हो सकता है। लेकिन एक बात आपसे कहना [संगीत] चाहता हूं। लैला को देखना हो तो मजनू की आंख चाहिए। [संगीत] ठीक कहा मजनू ने। अगर वृक्षों के सौंदर्य [संगीत] को देखना हो तो कला की आंख चाहिए और कोई प्रमाण नहीं। अगर किसी के प्रेम को पहचानना हो तो प्रेमी का हृदय चाहिए और कोई प्रमाण नहीं और परमात्मा [संगीत] तो इस जगत के सारे सौंदर्य और सारे प्रेम और सारे सत्य का इकट्ठा नाम है। उसके लिए तो ऐसा निर्विकार चित्त चाहिए। ऐसा साक्षी
45:26 [संगीत] भाव चाहिए जहां कोई शब्द ना रह जाए। कोई विचार ना रह जाए, कोई तरंग ना उठे, वहां कोई धूल ना रह जाए। मन की और चित्त का दर्पण परिपूर्ण शुद्ध हो। प्रमाण कहां? रामकृष्ण से विवेकानंद ने कहा प्रमाण चाहिए। है परमात्मा तो प्रमाण थे। और विवेकानंद खुद देखा रामकृष्ण ने। बड़ी थी संभावना इस युवक की। बड़ी थी यात्रा इसके भविष्य की। बहुत कुछ होने को पड़ा था। इसके भीतर बड़ा खजाना था। उससे यह अपरिचित थे। रामकृष्ण ने देखा इस युवक के पिछले जन्मों में झांका। यह बड़ी संपदा [संगीत] बड़े पुण्य की संपदा लेकर आ रहा है।
46:13 यह ऐसे ही तर्क में दबा ना रह जाए। करा उठा होगा पीड़ा और करुणा से रामकृष्ण का [संगीत] हृदय। उन्होंने कहा छोड़ प्रमाण वगैरह बाद में सोच लेंगे। मैं जरा बूढ़ा हुआ। मुझे पढ़ने में अड़चन होती तू अभी जवान तेरी आंख अभी तेज यह किताब पढ़ी इसे तू पढ़ वो थी अष्टावक्र गीता जरा मुझे सुना दे कहते हैं विवेकानंद को इसमें तो कुछ अड़चन ना मालूम पड़ी ये आदमी कुछ ऐसी तो कोई खास बात नहीं मांग रहा है दो चार सूत्र पड़े और एक घबराहट और रोआ रोवा कपने लगा और विवेकानंद ने कहा मुझसे नहीं पढ़ा था। रामकृष्ण ने कहा पढ़ भी इसमें हर्ज क्या है? तेरा क्या बिगाड़
46:59 लेगी यह किताब? तू जवान है अभी तेरी आंख अभी ताजी है। और मैं बूढ़ा हुआ मुझे पढ़ने में दिक्कत होती और ये किताब मुझे पढ़नी तो तू पढ़ के सुना दे। कहते हैं उस किताब को सुनाते सुनाते विवेकानंद डूब गए। रामकृष्ण ने देखा इस व्यक्ति के भीतर बड़ी संभावना है। बड़ी शुद्ध संभावना है। जैसी एक बुद्धि सत्व की होती जो कभी ना कभी बुद्ध होना जिसका निर्णय थे। [संगीत] आज नहीं कल भटके कितना ही बुद्धत्व जिसके पास चला आ रहा है। क्यों अष्टावक्र की गीता रामकृष्ण ने कही कि तू पढ़ के मुझे सुना दे। क्योंकि इससे ज्यादा शुद्धतम [संगीत] वक्तव्य और कोई नहीं।
47:45 यह शब्द भी अगर तुम्हारे भीतर पहुंच जाए तो तुम्हारी सोई हुई आत्मा को जगाने लगेंगे। यह शब्द तुम्हें तरंगायित करेंगे। यह शब्द तुम्हें अल्हादित करेंगे। [संगीत] ये शब्द तुम्हें जगझोरेंगे। इन शब्दों के साथ क्रांति घटित हो सकती है। अष्टावक्र की गीता को मैंने यूं ही नहीं चुना है। और जल्दी नहीं चुना [संगीत] बहुत देर करके चुना है सोच विचार के दिन थे जब मैं कृष्ण की गीता पर बोला क्योंकि भीड़भाड़ मेरे पास थी भीड़भाड़ [संगीत] के लिए आस्था वक्र गीता का कोई अर्थ ना था बड़ी चेष्टा करके भीड़भाड़ से छुटकारा पाया है
48:31 अब तो थोड़े से विवेकानंद यहां हैं। अब तो उनसे बात करनी है जिनकी बड़ी संभावना है। उन थोड़े से लोगों के साथ मेहनत करनी है। जिनके साथ मेहनत का परिणाम हो सकता है। अब हीरे तराशने हैं। कंकड़ पत्थरों पर यह छेनी खराब नहीं करनी। इसलिए चुनी है अष्टावक्र की गीता। तुम तैयार हुए हो इसलिए चुने पहला सूत्र जनक ने कहा हे प्रभु पुरुष ज्ञान को कैसे प्राप्त होता है और मुक्ति कैसे होगी और वैराग्य कैसे प्राप्त होगा [संगीत] यह मुझे कहिएत
49:16 मम प्रभु मुझे समझाएं प्रभु 12 साल के लड़के से सम्राट जनक का कहना है प्रभु भगवान मुझे समझाएं ममही मुझे ना समझ को कुछ समझ दें मुझे अज्ञानी को जगाएं तीन प्रश्न पूछे कथम ज्ञानम कैसे होगा ज्ञान साधारणता तो हम सोचेंगे कि यह भी कोई पूछने की बात है किताबों में भरा पड़ा है जनक भी जानता था। किताबों में भरा पड़ा है वह ज्ञान नहीं।
50:02 वह केवल ज्ञान की धूल है राख है। ज्ञान की ज्योति जब जलती है तो पीछे राख छूट जाती है। राख इकट्ठी होती चली जाती है। शास्त्र बन जाती है। वेद राख है। कभी जलते हुए अंगारे थे। ऋषियों ने उन्हें अपनी आत्मा [संगीत] में जलाया था। फिर राख रह गए। फिर राख संयोजित की जाती, संग्रहित की जाती, सुव्यवस्थित की जाती। जैसे जब आदमी मर जाता है तो हम उसकी [संगीत] राख इकट्ठी कर लेते हैं। उसको फूल कहते हैं। बड़े मजेदार लोग हैं। जिंदगी में जिसको फूल नहीं कहा।
50:48 उसकी हड्डी वड्डियां इकट्ठी [संगीत] कर लाते हैं। कहते फूल संजोला है। फिर संभाल कर रखते हैं। मंजूसा [संगीत] बनाते हैं। जिसको जिंदगी में कभी फूल का आदर नहीं दिया। जिसको जिंदगी में कभी फूल की तरह देखा नहीं। जब मर जाता है आदमी पागल है तब उसकी हड्डी [संगीत] को राख को फूल कहते हैं। ऐसे ही जब [संगीत] कोई बुद्ध जीवित होता है तब तुम सुनते नहीं। जब कोई महावीर तुम्हारे बीच से गुजरता है तब तुम नाराज होते हो।
51:34 लगता है यह आदमी तुम्हारे सपने तोड़ रहा है या तुम्हारी नींद में दखल डाल रहा है। [संगीत] यह कोई जगाने का वक्त है। अभी-अभी तो सपना आना शुरू हुआ था। अभी-अभी तो जरा जीतना शुरू किया था जिंदगी में। अभी-अभी तो दांव ठीक लगने लगे थे। तीर ठीक ठीक जगह पड़ने लगा था और ये सज्जन आ गए। यह कहते है सब असार है। अभी-अभी तो चुनाव जीते थे। पद पर पहुंचने का रास्ता बना था और यह महापुरुष आ गए। यह कहते हैं यह सब सपना है इसमें कुछ सार नहीं मौत आएगी सब छीन लेगी और छोड़ो भी जब मौत आएगी तब देखेंगे बीच में तो इस तरह की बातें मत उठाओ लेकिन जब महावीर मर जाते बुद्ध मर जाते तब उनकी राख को हम इकट्ठी कर लेते फिर हम धम्मपथ बनाते वेद बनाते फिर हम पूजा के
52:21 फूल चढ़ाते जनक भी जानता [संगीत] था कि शास्त्रों में सूचनाएं भरी पड़ी है लेकिन उसने पूछा कथम ज्ञानम कैसे होगा ज्ञान क्योंकि कितना ही जान लो ज्ञान तो होता ही नहीं जानते जाओ जानते जाओ शास्त्र कंठस्थ कर लो तोते बन जाओ एक एक सूत्र याद हो जाए पूरे वेद स्मृति में छप जाए फिर भी ज्ञान तो होता नहीं कथम ज्ञानम कैसे होता है ज्ञान कथम मुक्ति मुक्ति कैसे होगी? क्योंकि जिसको तुम ज्ञान कहते हो वो तो बांध लेता उल्टे।
53:08 मुक्त कहां करता? ज्ञान तो वही है जो मुक्त करे। जीसस ने कहा है सत्य वही है जो मुक्त करे। ज्ञान तो वही है जो मुक्त करे। यह ज्ञान की कसौटी है। पंडित मुक्त तो दिखाई नहीं पड़ता। बंधा दिखाई पड़ता है। मुक्ति की बातें करता है। मुक्त दिखाई नहीं पड़ता है। हजार बंधनों में बंधा हुआ मालूम पड़ता है। तुमने कभी गौर किया तुम्हारे तथाकथित संत तुमसे भी ज्यादा बंधे हुए मालूम पड़ते। तुम शायद थोड़े बहुत मुक्त भी हो। तुम्हारे संत तुमसे भी ज्यादा बंधे लकीर [संगीत] के फकीर है। ना उठ सकते स्वतंत्रता से ना बैठ सकते
53:53 स्वतंत्रता से [संगीत] ना जी सकते स्वतंत्रता से। कुछ दिनों पहले [संगीत] कुछ जैन साधवियों की मेरे पास खबर आई कि वह मिलना चाहते मगर श्रावक आने नहीं देते [संगीत] यह भी बड़े मजे की बात हुई साधु का अर्थ होता है जिसने फिक्र छोड़ी समाज की जो चल पड़ा अरण्य की यात्रा पर जिसने कहा अब ना तुम्हें तुम्हें तुम्हारे आदर की मुझे जरूरत है ना सम्मान की लेकिन साधु साध्वी कहते हैं श्रावक आने नहीं देते। वो कहते हैं वहां भूल के मत जाना। वहां गए तो यह दरवाजा बंद। यह कोई साधुता हुई। ये तो परतंत्रता हुई, गुलामी
54:39 हुई। यह तो बड़ी उल्टी बात हुई। ये तो ऐसा हुआ कि साधु श्रावक को बदले। उसकी जगह श्रावक साधु को बदल रहा है। एक मित्र ने आकर [संगीत] मुझे कहा एक जैन साध्वी आपकी किताबें पढ़ती लेकिन चोरी से टेप भी सुनना चाहती है लेकिन चोरी से [संगीत] और अगर कभी किसी के सामने आपका नाम भी ले दो तो वो इस तरह हो जाती जैसे उसने कभी आपका नाम सुना ही नहीं। यह मुक्ति हुई। जनक ने पूछा कथम मुक्ति कैसे होती मुक्ति क्या है मुक्ति उस [संगीत] ज्ञान को मुझे समझाएं जो मुक्त कर देता स्वतंत्रता
55:25 मनुष्य की सबसे [संगीत] महत्वपूर्ण आकांक्षा है सब पा लो लेकिन गुलामी अगर रही तो छिदती है सब मिल जाए स्वतंत्रता ना मिले तो कुछ भी नहीं मिला मनुष्य [संगीत] चाहता है खुला आकाश कोई सीमा ना हो। वो मनुष्य की अंतरतम निगुणतम आकांक्षा है। जहां कोई सीमा ना हो। कोई बाधा ना हो। इसी को परमात्मा होने की आकांक्षा कहो। मोक्ष की आकांक्षा कहो। हमने ठीक शब्द चुना है मोक्ष। दुनिया की किसी भाषा में ऐसा प्यारा शब्द नहीं। स्वर्ग फिरदौस इस तरह के शब्द
56:12 लेकिन उन शब्दों में मोक्ष की कोई धुन नहीं मोक्ष का संगीत अनूठा है उसका अर्थ ही केवल इतना है ऐसी परम स्वतंत्रता जिस पर कोई बाधा नहीं है स्वतंत्रता इतनी शुद्ध कि जिस पर कोई सीमा नहीं पूछा जनक ने कैसे होगी मुक्ति और कैसे होगा वैराग्य हे प्रभु मुझे समझाकर कहिए [संगीत] अष्टावक्र ने गौर से देखा होगा जनक की तरफ क्योंकि गुरु के लिए वही पहला काम है कि जब कोई जिज्ञासा करे तो वह गौर से देखे जिज्ञासा किस [संगीत] स्रोत से आती है
57:00 पूछने वाले ने क्यों पूछा है उत्तर तो तभी सार्थक हो सकता है जब प्रश्न क्यों किया गया है वह समझ में आ जाए वह साफ हो जाए ध्यान रखना सद्ञान को उपलब्ध व्यक्ति [संगीत] सद्गुरु तुम्हारे प्रश्न का उत्तर नहीं देता तुम्हें उत्तर देता है तुम क्या पूछते हो इसकी फिक्र कम है तुमने क्यों पूछा है तुम्हारे पूछने के पीछे अंतर [संगीत] चेतन में छिपा हुआ जाल क्या है तुम्हारे सारे प्रश्नों की आड़ में वस्तुत कौन सी आकांक्षा छिपी है? दुनिया में चार तरह के लोग [संगीत] हैं। ज्ञानी,
57:47 मुमुक्षु अज्ञानी मूढ़। और दुनिया में चार ही तरह की [संगीत] जिज्ञासाएं होती। ज्ञानी की जिज्ञासा तो निशब्द होती है। कहना चाहिए ज्ञानी की जिज्ञासा तो जिज्ञासा होती ही नहीं जान लिया जानने को कुछ बचा नहीं [संगीत] पहुंच गए चित्त निर्मल हुआ शांत हुआ घर लौट आए विश्राम में आ गए तो ज्ञानी की जिज्ञासा तो जिज्ञासा जैसी होती ही इसका यह अर्थ नहीं कि ज्ञानी
58:33 सीखने [संगीत] को तैयार नहीं होता। ज्ञानी तो सरल छोटे बच्चे की भांति हो जाता है। सदा तत्पर सीखने को जितना ज्यादा तुम सीख लेते हो उतनी ही सीखने की तत्परता बढ़ जाती है। जितने तुम सरल और निष्कपट होते चले जाते हो। उतने ही सीखने के लिए तुम खुल जाते हो। आए हवाएं तुम्हारे द्वार खुले पाती आए सूरज तुम्हारे द्वार पर दस्तक नहीं [संगीत] देनी पड़ती आए परमात्मा तुम्हें सदा तत्पर पाता है ज्ञानी ज्ञान को संग्रहित नहीं करता
59:21 ज्ञानी सिर्फ ज्ञान की क्षमता को उपलब्ध होता है इस बात को ठीक से समझ लेना क्योंकि पीछे ये काम पड़ेगी। ज्ञानी का केवल इतना ही अर्थ है कि जो जानने के लिए बिल्कुल खुला है जिसका कोई पक्षपात नहीं। जानने के लिए जिसके पास कोई पर्दा नहीं जिसके पास जानने के लिए कोई पूर्व नियोजित योजना ढांचा नहीं। ज्ञानी का अर्थ है ध्यानी जो ध्यान पूर्ण है। तो देखा होगा अष्टावक्र ने गौर से जनक में झांक के यह व्यक्ति [संगीत] ज्ञानी तो नहीं
1:00:07 ये ध्यान को तो उपलब्ध नहीं हुआ है अन्यथा इसकी जिज्ञासा मौन होती उसमें शब्द [संगीत] ना होते बुद्ध के जीवन में उल्लेख है एक फकीर मिलने आया एक साधु मिलने आया एक परिव्राजक घुमक्कड़ उसने आके बुद्ध से कहा पूछने योग्य शब्द मेरे पास नहीं क्या पूछना चाहता हूं उसे शब्दों में बांधने की [संगीत] मेरे पास कोई कुशलता नहीं आप तो जानते ही हैं समझ ले जो मेरे योग को
1:00:54 कहते हैं ये ज्ञानी की जिज्ञासा है। बुद्ध चुप बैठे रहे। उन्होंने कुछ भी ना कहा। घड़ी भर बात जैसे कुछ घटा। वो जो आदमी चुपचाप बैठा बुद्ध की तरफ देखता रहा था। उसकी आंख से आंसुओं की धार लग गई। चरणों में झुका नमस्कार किया और कहा धन्यवाद। खूब धन्यभागी। जो लेने आया था आपने दिया वो उठकर चला भी गया उसके चेहरे पर अपूर्व आभा थी वो नाचता हुआ गया बुद्ध के आसपास के शिष्य
1:01:39 बड़े हैरान हुए आनंद ने पूछा बनते भगवान पहेली हो गई पहले तो याद नहीं कहता है कि मुझे पता नहीं कैसे पूछूं पता नहीं किन शब्दों में पूछूं यह भी पता पता नहीं क्या पूछने आया हूं। फिर आप तो जानते ही हैं सब। देख ले मुझे जो [संगीत] मेरे लिए जरूरी हो कह दे। पहले तो यह आदमी ही जरा पहेली था। यह कोई ढंग हुआ पूछने का। और जब तुम्हें यही पता नहीं कि क्या पूछना है तो पूछना ही क्यों? पूछना क्या? खूब रही। फिर यही बात खत्म ना हुई। आप चुप बैठे सो चुप बैठे रह गए। आपको ऐसा कभी मौन देखा नहीं। कोई पूछता तो
1:02:26 आप उत्तर देते। कभी-कभी तो ऐसा होता कोई नहीं भी पूछता तो भी आप उत्तर देते। आपकी करुणा सदा बहती रहती। क्या हुआ अचानक कि आप चुप रह गए और आंख बंद हो गई। और फिर क्या रहस्यमय घटा कि वो आदमी रूपांतरित होने लगा। हमने उसे बदलते देखा। हमने उसे किसी और ही रंग में डूबते देखा। उसमें मस्ती आते देखी वो नाचता हुआ गया है। आंसुओं से भरा हुआ गदगद आल्हादित वो चरणों में झुका उसकी सुगंध हमें भी छुई ये हुआ क्या? आप कुछ बोले नहीं उसने सुना कैसे? और हम तो इतने दिनों से वर्षों से आपके पास
1:03:12 हम पर आपकी कृपा कम है क्या? यह प्रसाद जो उसे दिया हमें क्यों नहीं मिलता लेकिन ध्यान रहे उतना ही मिलता है जितना तुम ले सकते हो बुद्ध ने कहा सुनो घोड़े आनंद से घोड़े की बात की क्योंकि आनंद छत्री [संगीत] था बुध का चचेरा भाई था और बचपन [संगीत] से ही घोड़े का बड़ा शौक था उसे घुड़सवार था प्रसिद्ध घुड़सवार था प्रतियोगी था बड़ा। उसने कहा सुन आनंद [संगीत] पुत्र ने कहा घोड़े चार प्रकार के होते है। एक तो मारो भी तो भी टस [संगीत] से मस नहीं होते। रद्दी से रद्दी घोड़े। जितना मारो उतना ही
1:04:00 हठ योगी हो जाते हैं। बिल्कुल हट बांध के खड़े हो जाते। तुम मारो तो वो जिद्द बना लेते हैं कि देखो [संगीत] कौन जीतता है। फिर दूसरे तरह के घोड़े होते हैं। मारो तो चलते हैं ना मारो तो नहीं चलते। कम से कम [संगीत] पहले से बेहतर। फिर तीसरे तरह के घोड़े होते हैं। घोड़ा फटकारो मारना काफी। जरूरी नहीं। सिर्फ घोड़ा फटकारो आवाज काफी। और भी कुलीन होते हैं। दूसरे से भी बेहतर। फिर आनंद तुझे जरूर पता होगा ऐसे भी घोड़े होते हैं कि घोड़े की छाया देख के भागते हैं। फटकारना भी नहीं पड़ता। यह ऐसा ही घोड़ा था। छाया काफी है।
1:04:46 अस्तावक्र ने देखा होगा गौर से। जब तुम आकर मुझसे कुछ पूछते हो तो तुम्हारे प्रश्न से ज्यादा महत्वपूर्ण [संगीत] सवाल तुम हो। कभी-कभी तुम्हें भी ऐसा लगता होगा कि तुमने जो नहीं पूछा था वह मैंने उत्तर दिया है। और कभी-कभी तुम्हें ऐसा भी लगता होगा कि शायद मैं टाल गया। तुम्हारे प्रश्न को बचाव कर गया। कुछ और उत्तर दे गया हूं। लेकिन सदा तुम्हारी भीतरी जरूरत ज्यादा महत्वपूर्ण तुम क्या पूछते हो यह उतना महत्वपूर्ण नहीं क्योंकि तुम्हें खुद ही ठीक पता नहीं तुम क्या पूछते हो क्यों पूछते हो उत्तर वही दिया जाता है जिसकी तुम्हें जरूरत थी। तुम्हारे पूछने से कुछ तय नहीं होता।
1:05:36 देखा होगा अष्टावक्र ने ज्ञानी तो नहीं है जनक। अज्ञानी है फिर क्या अज्ञानी भी नहीं क्योंकि अज्ञानी तो अकड़ी अकड़ा से भरा होता है अज्ञानी तो झुकना जानता ही नहीं ये तो मुझ 12 साल की उम्र के लड़के के पैरों में झुक गया साष्टांग दंडवत की यह अज्ञानी के लिए असंभव है। अज्ञानी तो समझता है कि मैं जानता ही हूं। मुझे कौन समझाएगा? अज्ञानी अगर कभी पूछता भी है तो तुम्हें गलत सिद्ध करने को पूछता है। क्योंकि अज्ञानी तो यह मान के चलता है कि
1:06:21 पता तो मुझे है ही देखें इनको भी पता है या नहीं। अज्ञानी परीक्षा के लिए पूछता है। नहीं इसकी आंखें जनक की [संगीत] तो बड़ी निर्मल है। मुझ 12 साल के अनजान अपरिचित लड़के को [संगीत] सम्राट होते हुए भी इसने कहा एतत मम ब्रूही प्रभु हे प्रभु मुझे समझा के कहे नहीं [संगीत] यह विनयशील है अज्ञानी तो नहीं मूढ़ है क्या फिर? मूढ़ तो पूछते ही नहीं। मूढ़ों को तो पता ही नहीं कि जीवन में कोई समस्या है।
1:07:07 मूढ़ और बुद्ध पुरुषों में एक समानता है। बुद्ध पुरुषों के लिए कोई समस्या नहीं रही। मूढ़ों के लिए अभी समस्या उठी ही नहीं। बुद्ध पुरुष समस्या के पार हो गए। मूढ़ अभी समस्या के बाहर। मूढ़ तो इतना मूर्छित थे उसे कहां सवाल कथम ज्ञानम मूढ़ पूछेगा [संगीत] कथम मुक्ति मूढ़ पूछेगा कैसे होगा वैराग्य मूढ़ पूछेगा असंभव मूढ़ अगर पूछेगा भी तो पूछता है राग में सफलता कैसे मिलेगी मूढ़ अगर पूछता भी है तो पूछता है संसार
1:07:54 में और थोड़े ज्यादा दिन कैसे रहना हो जाए मुक्ति [संगीत] नहीं मूढ़ पूछता है बंधन सोने के कैसे बने बंधन में हीरे सवारात कैसे जड़े मूढ़ पूछता भी है तो ऐसी बातें पूछता है ज्ञान मूल तो मानता ही नहीं कि ज्ञान हो सकता है वो तो संभावना को स्वीकार नहीं करता वो तो कहता है कैसा ज्ञान मूढ़ तो पशुवत जीता है। नहीं यह जनक मूढ़ भी नहीं है। मुमुक्षु है। मुमुक्षु शब्द समझना जरूरी है। मोक्ष की आकांक्षा मुमुक्षा। अभी मोक्ष के पास नहीं पहुंचा। ज्ञानी
1:08:40 नहीं है। मोक्ष के प्रति पीठ करके नहीं खड़ा। मूढ़ नहीं है। मोक्ष के संबंध में कोई धारणाएं पकड़ के नहीं बैठा। अज्ञानी भी नहीं है। मुमुक्षु है। मुमुक्षु का अर्थ है सरल है इसकी जिज्ञासा। ना मूढ़ता से अपवित्र हो रही है ना अज्ञान पूर्ण धारणाओं से विकृत हो रही है। शुद्ध है इसकी जिज्ञासा। सरलित से पूछा है। अष्टावक्र ने कहा हे प्रिय यदि तू मुक्ति को चाहता है तो विषयों को विष के समान छोड़ दे और क्षमा [संगीत] आरज्जव दया
1:09:28 संतोष और सत्य को अमृत के समान सेवन कर मुक्ति मिससी चेतात विशियान विश्वतज शब्द विषय [संगीत] बड़ा बहुमूल्य वो विष से ही बना है। विष का अर्थ होता है जिसे खाने से आदमी [संगीत] मर जाए। विषय का अर्थ होता है जिसे खाने से हम बार-बार मरते। बार-बार भूख, बार-बार भोजन, [संगीत] बार-बार महत्वाकांक्षा, ईर्ष्या क्रोध जलन।
1:10:14 बार-बार इन्हीं को खा के तो हम मरे। बार-बार इन्हीं के कारण तो मरे। अब तक हमने जीवन में जीवन कहां जाना? मरने को ही जाना है। अब तक हमारा जीवन की प्रज्वलित ज्योति कहां? मृत्यु का ही धुआ है। जन्म से लेकर मृत्यु तक हम मरते ही तो हैं। धीरे-धीरे जीते कहां? रोज रोज मरते हैं। जिसको हम जीवन कहते हैं वो एक सतत मरने की प्रक्रिया है। [संगीत] अभी हमें जीवन का तो पता ही नहीं तो हम जिएंगे कैसे? यह शरीर तो रोज क्षीण होता चला जाता है। यह बल तो रोज खोता चला जाता है। यह भोग और विषय तो रोज हमें चूसते चले जाते हैं।
1:11:00 [संगीत] जरा जीर्ण करते चले जाते। यह विषय और कामनाएं तो छेदों की तरह इनसे हमारी ऊर्जा और आत्मा रोज बहती चली जाती। आखिर में घड़ा खाली हो जाता। उसको हम मृत्यु कहते हैं। तुमने कभी देखा? अगर छिद्र वाले घड़े को कुएं में डालो तो जब तक घड़ा पानी में डूबा होता है भरा मालूम पड़ता है। उठाओ पानी के ऊपर खींचो रस्सी बस खाली होना शुरू हुआ। जोर का शोरगुल होता है। उसी को तुम जीवन कहते हो। जलधारे गिरने लगती है। उसी को तुम जीवन कहते हो। और घड़ा जैसे जैसे पास आता है हाथ के खाली होता चला जाता है। जब हाथ में
1:11:45 आता है तो खाली घड़ा जल की एक बूंद भी नहीं ऐसा ही हमारा जीवन है। बच्चा पैदा नहीं हुआ भरा मालूम होता है। पैदा हुआ कि खाली होना शुरू हुआ। जन्म का पहला दिन मृत्यु का पहला दिन है। खाली होने लगा। एक दिन मरा, दो दिन मरा, तीन दिन मरा जिनको तुम जन्मदिन कहते हो अच्छा हो मृत्यु दिन कहो तो ज्यादा सत्य तर होगा। एक साल मर जाते हो उसको कहते हो चलो एक जन्मदिन आ गया। 50 साल मर गए कहते हो 50 साल जी लिए। स्वर्ण जयंती मना है। 50 [संगीत] साल मरे मौत करीब आ रही। जीवन दूर जा रहा है। घड़ा खाली हो रहा है।
1:12:32 जो दूर जा रहा है उसके आधार पर तुम जीवन को सोचते हो या जो पास आ रहा है उसके आधार पर यह कैसा उल्टा गणित हम रोज मर रहे हैं मौत [संगीत] करीब सरकती आती है असावक्र कहते हैं विषय है विषवत क्योंकि उन्हें खा [संगीत] के हम सिर्फ मरते उनसे कभी जीवन तो मिलता नहीं यदि तू मुक्ति चाहता है हे तात हे प्रिय तू विषयों को [संगीत] विष के समान छोड़ दे और क्षमा आरजव दया [संगीत] संतोष और सत्य को अमृत के समान सेवन कर अमृत का अर्थ होता है जिससे जीवन [संगीत]
1:13:18 मिले जिससे अमृत्व मिले जिससे उसका पता चले जो फिर कभी नहीं मरेगा तो क्षमा क्रोध विषय क्षमा अमृत आरव कुटिलता विषय सीधा सरलपन आर्जाओ अमृत दया कठोरता क्रूरता विषय दया करुणा अमृत संतोष असंतोष का कीड़ा खाए चला जाता असंतोष का कीड़ा हृदय में कैंसर की तरह फैलता चला जाता है। विष को फैलाए चले जाता
1:14:04 है। संतोष जो [संगीत] है उससे तृप्ति जो नहीं है उसकी आकांक्षा नहीं। जो है वो काफी से ज्यादा है। वो है ही काफी से ज्यादा। आंख खोलो जरा देखो। संतोष कोई थोपना नहीं है ऊपर जीवन को जरा गौर से देखो तुम्हें जो मिला है वो तुम्हारी जरूरत से सदा ज्यादा है। तुम्हें जो चाहिए वह मिलता ही रहा है। तुमने जो चाहा है वह सदा मिल गया है। तुमने दुख चाहा है तो दुख मिल गया है। तुमने सुख चाहा है तो सुख मिल गया है। तुमने गलत चाहा तो गलत मिल गया है। तुम्हारी चाह ने तुम्हारे जीवन को रचा है।
1:14:52 चाहे बीज फिर जीवन उसकी फसल है। जन्मों जन्मों में जो तुम चाहते रहे हो वही तुम्हें मिलता रहा है। कई बार तुम सोचते हो हम कुछ और चाह रहे हैं। जब मिलता है तो कुछ और मिलता है। तो तुम्हारे चाहने में भूल नहीं हुई है। सिर्फ तुमने चाहने के लिए गलत शब्द चुन लिया था। जैसे तुम चाहते हो सफलता मिलती है विफलता। तुम कहते हो विफलता मिल रही चाही तो सफलता थी लेकिन जिसने सफलता चाही [संगीत] उसने विफलता को स्वीकार कर ही लिया वो विफलता से भीतर डर ही गया है विफलता [संगीत] के कारण ही तो सफलता चाह रहा है और जब जब सफलता चाहेगा तब तक विफलता का
1:15:39 ख्याल आएगा विफलता का ख्याल भी मजबूत होता चला जाएगा सफलता तो कभी मिलेगी लेकिन रास्ते पर यात्रा तो विफलता विफलता में ही बीतेगी विफलता का भाव संग्रीभूत [संगीत] होगा वो इतना संग्रीभूत हो जाएगा कि वही एक दिन प्रकट हो जाएगा तब तुम कहते हो कि हमने तो सफलता चाही थी [संगीत] लेकिन सफलता के चाहने में तुमने विफलता को चाह लिया लाओजू ने कहा है सफलता चाही विफलता मिलेगी अगर सचमुच सफलता चाहिए हो सफलता चाहना ही मत फिर तुम्हें कोई विफल [संगीत] नहीं कर सकता। तुम कहते हो हमने सम्मान चाहा था। अपमान मिल रहा है। सम्मान चाहता ही वही व्यक्ति है जिसका अपने प्रति कोई सम्मान
1:16:25 [संगीत] नहीं। वही तो दूसरों से सम्मान चाहता है। अपने प्रति जिसका अपमान है वही तो दूसरों से अपने अपमान को भर लेना चाहता है। डांक लेना चाहता है। सम्मान की आकांक्षा इस बात की खबर है कि तुम अपने भीतर अपमानित अनुभव कर रहे हो। तुम्हें अनुभव हो रहा है कि मैं कुछ भी नहीं हूं। दूसरे मुझे कुछ बना दे। सिंहासन पर बिठा दे, पताकाएं फहरा दे, झंडे उठा ले मेरे नाम के, दूसरे कुछ कर दें। तुम भीखमंगे हो। तुमने अपना अपमान तो खुद कर लिया जब तुमने सम्मान चाहा। और यह अपमान गहन होता जाएगा। लाओसु कहता है मेरा कोई अपमान नहीं कर सकता क्योंकि मैं [संगीत] सम्मान चाहता ही नहीं। यह
1:17:12 सम्मान को पा लेना है। लाजू कहता है मुझे कोई हरा नहीं सकता क्योंकि जीत की हमने बात [संगीत] ही छोड़ दी। अब हराओगे कैसे? तुम उसी को हरा सकते हो जो जीतना चाहता है। अब ये जरा उलझा हुआ हिसाब है। [संगीत] इस दुनिया में सम्मान उन्हें मिलता है जिन्होंने सम्मान नहीं चाहा। सफलता उन्हें मिलती है जिन्होंने सफलता नहीं चाही। क्योंकि जिन्होंने सफलता नहीं चाही उन्होंने तो स्वीकार ही कर लिया कि सफल तो हम है ही अब और चाहना क्या है? सम्मान तो हमारे भीतर आत्मा का है ही। अब और चाहना क्या है? परमात्मा ने सम्मान दे दिया तुम्हें पैदा करके। अब और किसका सम्मान चाहते हो? परमात्मा ने तुम्हें काफी गौरव दे दिया।
1:17:59 जीवन दिया। यह सौभाग्य दिया कि आंख खोलो। देखो हरे वृक्षों को, फूलों को, पक्षियों को कान दिए। सुनो संगीत को जलप्रपात के मर्मर को बोध दिया कि बुद्ध हो सको अब और क्या चाहते हो? सम्मानित तो तुम हो गए। परमात्मा ने तुम्हें प्रमाण पत्र दिया। तुम भिखारी की तरह किन से प्रमाण पत्र मांग रहे हो? उनसे जो तुमसे प्रमाण पत्र मांग रहे हैं। ये बड़ा मजेदार मामला है। दो भिखारी एक दूसरे के सामने खड़े भीख मांग रहे हैं। ये भीख मिलेगी कैसे? दोनों भिखारी हैं। तुम किससे सम्मान मांग रहे हो? किसके सामने [संगीत] खड़े हो?
1:18:45 यह अपमान कर रहे हो तुम अपना। और यही अपमान [संगीत] गहन होता जाएगा। संतोष का अर्थ होता है देखो जो तुम्हारे पास है। देखो जरा आंख खोल के जो तुम्हें मिला ही है। यह अष्टावक्र की बड़ी बहुमूल्य कुंजी है। [संगीत] यह धीरे-धीरे तुम्हें साफ होगी। अष्टावक्र की दृष्टि बड़ी क्रांतिकारी है। बड़ी अनूठी है। जड़ मूल से क्रांति की है। संतोष और सत्य को अमृत के समान सेवन कर। क्योंकि असत्य के साथ जो [संगीत] जिएगा वह असत्य होता चला जाएगा। जो असत्य को बोलेगा असत्य को जिएगा स्वभावता असत्य से गिरता चला जाएगा। उसके
1:19:30 जीवन से संबंध विच्छिन्न हो जाएंगी। जड़े टूट जाएंगी। परमात्मा में जड़े चाहते हो तो सत्य के द्वारा ही वे जड़े हो सकती है। [संगीत] प्रमाणिकता और सत्य के द्वारा ही तुम परमात्मा से जुड़ सकते हो। परमात्मा से टूटना है तो असत्य का धुआं पैदा करो असत्य के बादल अपने पास बनाओ जितने तुम असत्य होते चले जाओगे उतने परमात्मा से दूर होते चले जाओगे तू ना पृथ्वी है ना जल है ना वायु है ना आकाश है मुक्ति के लिए आत्मा को अपने को इन सब का साक्षी चैतन्य जान सीधी-सीधी बातें हैं। भूमिका भी नहीं है।
1:20:19 अभी दो वचन नहीं बोले आस्था वक्र ने कि ध्यान आ गया। कि समाधि की [संगीत] बात आ गई। जानने वाले के पास समाधि के अतिरिक्त और कुछ जताने को है भी नहीं। वो दो वचन भी बोले क्योंकि एकदम से अगर समाधि की बात होगी तो शायद तुम चौक ही जाओगे। समझ ही ना पाओगे। मगर दो वचन और सीधी समाधि की बात आ गई। अष्टावक्र सात कदम भी नहीं चलते। बुद्ध तो सात कदम चले। आठव कदम पर समाधि है। अष्टावक्र तो पहला कदम ही समाधि का उठाते। तू ना पृथ्वी है ना जल ना वायु ना आकाश। ऐसी प्रतीति में अपने को स्थिर कर।
1:21:04 मुक्ति के लिए आत्मा को अपने को इन सबका साक्षी [संगीत] चैतन्य जान। साक्षी सूत्र है। इससे महत्वपूर्ण सूत्र और कोई भी नहीं। देखने वाले बनो। जो हो रहा है उसे होने दो। उसमें बाधा डालने की जरूरत नहीं। यह देह तो जल है, मिट्टी है, अग्नि है, आकाश है। तुम इसके भीतर तो वह दिए हो जिसमें यह सब जल, अग्नि, मिट्टी, आकाश, वायु प्रकाशित हो रही है। तुम दृष्टा हो। इस बात को ग्रहण करो। साक्षी नाम चिद रूपम आत्मानम [संगीत] वि
1:21:58 ये इस जगत में [संगीत] सर्वाधिक बहुमूल्य सूत्र है। साक्षी बनो। इसी से होगा ज्ञान, इसी से होगा वैराग्य, इसी से होगी मुक्ति। प्रश्न तीन थे, उत्तर एक है। यदि तू देह को अपने से अलग कर और चैतन्य में विश्राम कर स्थित है तो तू अभी ही सुखी, शांत और बंध मुक्त हो जाएगा। इसलिए मैं कहता हूं यह जड़ मूल से क्रांति है। पतंजलि इतनी हिम्मत से नहीं [संगीत] कहते कि अभी ही पतंजलि कहते हैं करो अभ्यास यम नियम साधो
1:22:45 प्राणायाम प्रत्याहार आसन शुद्ध करो जन्मजन्म लगेंगे तब सिद्धि है महावीर कहते हैं पंच महाव्रत और तब जन्मजन्म लगेंगे तब होगी निर्जरा तब कटेगा जाल कर्मों का सुनो अस्थापक्रो यदि देहम प्रथ्य चित विश्राम्य तसी अधुन सुखी शांतो बंध मुक्तो भविष्य से अधनेव अभी यही इसी क्षण यदि तू देह को अपने से अलग कर और चैतन्य
1:23:31 में विश्राम कर स्थित अगर तूने एक बात देखनी शुरू कर दी कि देह मैं नहीं हूं। मैं करता और भोगता नहीं हूं। ये जो देखने वाला मेरे भीतर छिपा है जो सब देखता है। बचपन था कभी तो बचपन देखा। फिर जवानी आई तो जवानी देखी। फिर बुढ़ापा आया तो बुढ़ापा देखा। बचपन नहीं रहा तो मैं बचपन तो नहीं हो सकता। आया और गया मैं तो हूं। जवानी नहीं रही तो मैं जवानी तो नहीं हो सकता। आई और गई मैं तो हूं। बुढ़ापा आया जा रहा है तो मैं बुढ़ापा नहीं हो सकता। क्योंकि जो आता है जाता है वो मैं कैसे हो सकता हूं। मैं तो सदा हूं। जिस पर बचपन
1:24:18 आया जिस पर जवानी आई जिस पर बुढ़ापा [संगीत] आया। जिस पर हजार चीजें आई और गई। मैं वही शाश्वत हूं। स्टेशनों की तरह बदलती रहती बचपन जवानी बुढ़ापा जन यात्री चलता जाता है। तुम स्टेशन के साथ अपने को एक तो नहीं समझ लेते। पुणे की स्टेशन पर तुम ऐसा तो नहीं समझ लेते कि मैं पुणे हूं। फिर पहुंचे मनमा तो ऐसा तो नहीं समझ लेते कि मैं मनमा हूं। तुम जानते हो कि पुणे आई गई। मनमा आया गया। तुम तो यात्री हो। तुम तो दृष्टा हो जिसने पुना देखी। पुना आई। जिसने मनमाड़ देखा मनमाड़ आया तुम तो देखने वाले हो तो
1:25:03 पहली बात जो हो रहा है उसमें से देखने वाले को अलग कर लो देह को अपने से अलग कर और चैतन्य में विश्राम और करने योग्य कुछ भी नहीं है। जैसे लाओसु का सूत्र है समर्पण वैसे अष्टावक्र का सूत्र है विश्राम रेस्ट करने का कुछ भी नहीं है मेरे पास लोग आते है वह कहते हैं ध्यान कैसे करें वो प्रश्न ही गलत पूछ रहे है गलत पूछते है तो मैं उनको कहता हूं करो क्या करोगे तो उनको बता देता हूं कि करो कुछ [संगीत] ना कुछ तो करना ही पड़ेगा अभी तुम्हें करने की खुजलाहट है तो उसे तो पूरा करना होगा खुजली है तो क्या करोगे
1:25:52 बिना खुजाए नहीं बनता। लेकिन धीरे-धीरे उनको करवा करवा के थका डालता हूं। फिर वो कहते हैं अब इससे छुटकारा दिलवाओ। अब कब तक ये करते रहे? मैं तो पहले ही राजी था। लेकिन तुम्हें समझने में जरा देर लगी। अब विश्राम करो। ध्यान का अत्यंतिक अर्थ विश्राम है चित्ती विश्रामसी [संगीत] जो विश्राम में ठहरा देता अपने चेतना को जो होने मात्र में [संगीत] ठहर जाता कुछ करने को नहीं क्योंकि जिसे तुम खोज रहे हो वो मिला ही हुआ है क्योंकि जिसे तुम खोज रहे हो उसे कभी खोया
1:26:39 ही नहीं उसे से खोया नहीं जा सकता वही तुम्हारा स्वभाव है। ऐ महात्मा ब्रह्म [संगीत] तुम ब्रह्म हो। अनल हक तुम सत्य हो। कहां खोजते हो? कहां भागे चले जाते हो? अपने को ही खोजने कहां भागे चले जाते हो? रुको ठहरो। परमात्मा दौड़ने से नहीं मिलता। क्योंकि परमात्मा दौड़ने वाले में छिपा है। परमात्मा कुछ करने से नहीं मिलता क्योंकि परमात्मा करने वाले में छिपा है। परमात्मा के होने के लिए कुछ करने की जरूरत ही नहीं है। तुम हो ही इसलिए
1:27:24 अस्तावक्र कहते हैं चित विश्राम में। विश्राम करो। ढीले छोड़ो अपने को। ये तनाव छोड़ो। कहां जाते कहीं जाने को नहीं, कहीं पहुंचने को नहीं। और चैतन्य में विश्राम तो तू अभी ही इसी क्षण अधुन सुखी शांत और बंध मुक्त हो जाएगा। अनूठा है वचन। नहीं कोई और शास्त्र इसका मुकाबला करता है। तू ब्राह्मण आदि वर्ण नहीं है और ना तू कोई आश्रम वाला है और ना आंख आदि इंद्रियों का विषय है। असंग और निराकार तू सबका विश्व [संगीत] का साक्षी है। ऐसा जानकर सुखी हो। अब ब्राह्मण कैसे टीका
1:28:12 लिखे? तू ब्राह्मण आदि वर्ण नहीं है। अब हिंदू इस [संगीत] शास्त्र को कैसे सिर पर उठाएं? क्योंकि उनका तो सारा धर्म वर्ण और आश्रम पर खड़ा है। और यह तो पहले से ही अष्टावक्र जड़ काटने लगे। वो कहते हैं तू कोई ब्राह्मण नहीं है ना कोई शूद्र है ना कोई [संगीत] क्षत्रिय है। यह सब बकवास है। यह सब ऊपर के आरोपण है। यह सब राजनीति और समाज का खेल है। तू तो सिर्फ ब्रह्म है। ब्राह्मण नहीं, क्षत्रिय नहीं, शूद्र नहीं। तू ब्राह्मण आदि वर्ण नहीं और ना तू कोई आश्रम वाला है और ना तो यह है कि तू ब्रह्मचर्य आश्रम में है कि गस्थ आश्रम में है कि वानप्रस्थ की सन्यस्त [संगीत] कोई आश्रम वाला नहीं है
1:29:00 तू तो इन सारी स्थानों के भीतर से गुजरने वाला दृष्टा साक्षी अष्टावक्र [संगीत] की गीता है हिंदू दावा नहीं कर सकते हमारी अष्टावक्र की गीता सबकी है। अगर अष्टावक्र के समय में मुसलमान होते, हिंदू होते, ईसाई होते तो उन्होंने कहा होता ना तू हिंदू है ना तू ईसाई है ना तू मुसलमान है। अब ऐसे अष्टावक्र को कौन मंदिर बनाए इसके लिए? कौन इसके शास्त्र को सिर पर उठाए? [संगीत] कौन दावेदार बने? क्योंकि सभी का निषेध कर रहे हैं। मगर यह सत्य की सीधी घोषणा है। असंग और निराकार
1:29:48 तू सबका विश्व का साक्षी है। ऐसा जानकर सुखी हो। अष्टावक्र ये नहीं कहता कि ऐसा तुम जानोगे तो फिर सुखी होगे। वचन को ठीक से सुनना। अष्टावक्र कहते हैं ऐसा जानकर सुखी हो। नम विप्रादिको वर्णो नाश्रमी नाक्ष गोचरा असंगो अस निराकारो विश्व साक्षी सुखी भव सुखी भव अभी हो सुखी जनक पूछते हैं कैसे सुख होगा कैसे बंधन मुक्ति होगी कैसे ज्ञान होगा अष्टावक्र कहता है अभी हो सकता है क्षण
1:30:33 मात्र की भी देर करने की कोई जरूरत नहीं है। इसे कल पर छोड़ने का कोई कारण नहीं। स्थगित करने की कोई जरूरत नहीं। यह घटना भविष्य में नहीं घटती या तो घटती है अभी या कभी नहीं घटती। जब घटती है तब अभी घटती है। क्योंकि अभी के अतिरिक्त कोई समय ही नहीं है। भविष्य कहां है? जब आता है तब अभी की तरह आता है तो जो भी ज्ञान को उत्पन्न हुए हैं अभी उत्पन्न हुए कभी पर मत छोड़ना वो मन की चालाकी है मन कहता है इतनी जल्दी कैसे हो सकता है तैयारी तो कर ले मेरे पास लोग आते हैं वो कहते हैं सन्यास लेना लेंगे कभी कभी
1:31:22 कभी ना लोगे [संगीत] कभी पर टाला तो सदा के लिए टाला कभी आता ही नहीं। लेना हो तो अभी अभी के अतिरिक्त कोई समय ही नहीं है। अभी है जीवन, अभी है मुक्ति, अभी है अज्ञान, अभी है ज्ञान, अभी है निद्रा, अभी हो सकता है जागरण। कभी क्यों? कठिन होता मन को क्योंकि मन कहता है [संगीत] तैयारी तो करने दो। मन कहता है कोई भी काम तैयारी के बिना कैसे घटता आदमी को विश्वविद्यालय से प्रमाण पत्र लेना है तो वर्षों लगते
1:32:08 डॉक्टरेट करनी है तो 202 [संगीत] साल लग जाते मेहनत करते करते फिर आदमी आकर डॉक्टर हो पाता अभी कैसे हो सकते हैं अष्टावक्र भी जानते दुकान करनी हो तो अभी थोड़ी खुल जाएगी इकट्ठा इक्ठा करना पड़े, आयोजन करना पड़े, सामान लाना पड़े, दुकान बनानी पड़े, ग्राहक खोजने पड़े, विज्ञापन भेजना पड़े, वर्षों लगते हैं। इस जगत में कोई भी चीज अभी तो घटती नहीं, क्रम से घटती है। ठीक है? अष्टावक्र भी जानते हैं, मैं भी जानता हूं। लेकिन एक घटना यहां ऐसी है जो अभी घटती है वह परमात्मा है। वो तुम्हारी दुकान नहीं। ना तुम्हारा परीक्षालय ना तुम्हारा
1:32:53 विश्वविद्यालय परमात्मा क्रम से नहीं घटता परमात्मा घट ही चुका है। आंख भर खोलने की बात है। सूरज निकल ही चुका है। सूरज तुम्हारे आंख के लिए नहीं रुका है। तुम जब आंख खोलोगे तब निकलेगा। सूरज निकल ही चुका है। प्रकाश सब तरफ भरा ही है। अहिनस गूंज रहा उसका नाद। ओंकार की ध्वनि सब तरफ गूंज रही है। सतत अनाहत चारों तरफ गूंज रहा है। खोलो कान खोलो आंख आंख खोलने में कितना समय लगता है? उतना समय भी परमात्मा को पाने में
1:33:39 नहीं लगता। पल तो लगता है पलक के झपने में। पल का अर्थ ही होता है जितना समय पलक को झपने में लगता उतना पल मगर परमात्मा को पाने में पल भी नहीं लगता विश्व साक्षी असंगो अस निराकारो सुखी भव अभी हो सुखी उधार नहीं है अष्टावक्र का धर्म नगद कैसे हे व्यापक धर्म और अधर्म सुख और दुख मन के
1:34:28 धर्म और अधर्म सुख और दुख मन के हैं। तेरे लिए नहीं है। तू ना करता है ना भोगता है। तू तो सर्वदा मुक्ति ही है। मुक्ति हमारा स्वभाव है। ज्ञान हमारा स्वभाव है। परमात्मा हमारा होने का ढंग है। हमारा केंद्र है। हमारे जीवन की स्वास है। हमारा होना है। धर्मो अधर्मो सुखम दुखम मान सानी [संगीत] नते विभो अष्टावक्र कहते हैं हे व्यापक हे विवाहवान
1:35:14 हे विभूति संपन्न धर्म और अधर्म सुख और दुख मन के यह सब मन [संगीत] की ही तरंगे बुरा किया अच्छा किया पाप किया पुण्य किया मंदिर बनाया दान दिया सब मन के न करता सी ना भोगतासी मुक्त एवासी सर्वदा तू तो सदा मुक्त है तू तो सर्वदा मुक्त है मुक्ति कोई घटना नहीं है जो हमें घटानी मुक्ति घट चुकी है हमारे होने में। मुक्ति से बना है यह अस्तित्व। इसका रो रंच रंच मुक्ति से निर्मित है। मुक्ति है धातु जिससे बना है सारा
1:36:01 अस्तित्व। [संगीत] स्वतंत्रता स्वभाव यह उद्घोषणा बस समझे कि क्रांति घट जाती है। समझने के अतिरिक्त कुछ करना नहीं [संगीत] है। यह बात ख्याल में उतर जाए। तुम सुन लो इसे मन भर के बस। तो आज इतना ही कहना चाहूंगा। अष्टावक्र को समझने की चेष्टा पर करना। अष्टावक्र में करने का कोई इंसान नहीं है। इसलिए तुम यह मत सोचना कि अब कोई तरकीब निकलेगी जो हम करेंगे। अष्टावक्र कुछ करने को कहते ही नहीं। तुम विश्राम से सुन लो। करने को कुछ होने
1:36:48 वाला ही नहीं है। इसलिए तुम कॉपी वगैरह नोटबुक ले मत आना कि लिख लेंगे। कुछ आएगा सूत्र तो नोट कर लेंगे। करके देख लेंगे। करने का यहां कुछ काम ही नहीं है। इसलिए तुम भविष्य की फिक्र छोड़कर सुनना। तुम सिर्फ सुन लेना। तुम सिर्फ मेरे पास बैठकर शांत भाव से सुन लेना। विश्राम में सुन लेना। सुनते सुनते तुम मुक्त हो जा सकते हो। इसलिए महावीर ने कहा है कि श्रावक मुक्त हो सकता है। सिर्फ सुनते सुनते श्रावक का अर्थ होता है जो सुनते सुनते मुक्त हो जाए। साधु का तो अर्थ ही इतना है कि जो सुन सुन के मुक्त ना हो सका थोड़ा कमजोर बुद्धि का है कुछ करना पड़ा
1:37:38 सिर्फ कोड़े की छाया काफी ना थी [संगीत] घोड़ा जरा कुजा थे कोड़ा फटकारा तब थोड़ा चला या मारा तो थोड़ा चला छाया काफी है तुम सुन सुन लेना घोड़े की छाया दिखाई पड़ जाएगी। तो अष्टावक्र के साथ एक बात स्मरण रखना कुछ करने को नहीं है। इसलिए तुम आनंद भाव से सुन सकते हो। इसमें से कुछ निकालना नहीं है कि फिर करके देखेंगे। जो घटेगा वह सुनने में घटेगा। सम्यक श्रवण सूत्र है।
1:38:26 अधुन सुखी शांतो बंध मुक्तो भविष्य अभी हो जा मुक्त इसी क्षण हो जा मुक्त कोई रोक नहीं रहा कोई बाधा नहीं हिलने की भी जरूरत नहीं है जहां है वहीं हो जा मुक्त क्योंकि मुक्त तू है [संगीत] जाग और हो जा मुक्त असंगोसी निराकारो विश्व साक्षी सुखी भव हो जा सुखी एक पल की भी देर करने की कोई जरूरत नहीं छलांग है क्वांटम छलांग
1:39:14 [संगीत] सीढ़ियां नहीं है अष्टावक्र में क्रमिक विकास नहीं है सडन इसी क्षण हो सकता है। हरि ओम तत्सत आज इतना ही