0:01 आज मैं आपको 10 ऐसे टॉपिक्स करवाने वाली हूं जिसको करने के बाद आप ईजीली पास हो सकते हो और अगर आपको बहुत अच्छे नंबर लाने हैं, 90 प्लस स्कोर करना है तो उसके लिए मैंने डिटेल वन शॉट बना रखी है पार्ट ए की भी और पार्ट बी की भी। ठीक है? तो आप उसको करने के बाद बहुत अच्छे नंबर स्कोर कर सकते हो। लेकिन सिर्फ आपका एम पास होना है। पासिंग मार्क्स आ जाए। मुझे ज्यादा नंबर नहीं चाहिए। तो यह वीडियो आपके लिए इनफ होने वाली है। जिसके अंदर मैंने 10 टॉपिक दिए हैं और तीन बोनस के टॉपिक दिए हैं। अगर आपको एक्स्ट्रा पढ़ना है तो आप तीन बोनस के टॉपिक्स कर सकते हो। अदरवाइज ये 10 इंपॉर्टेंट टॉपिक्स बहुत होने वाले हैं। तो चलिए स्टार्ट करते हैं।
0:46 अब हमारे टॉपिक का नाम है सोशल रिस्पांसिबिलिटी। नाम से ही समझ में आ रहा है। सोसाइटी के प्रति जो जिम्मेदारियां हैं, जो रिस्पांसिबिलिटीज बनती हैं, उसको हमने क्या बोल दिया? सोशल रिस्पांसिबिलिटी। पर हम बात किसकी कर रहे हैं? किसकी बनती है? हम बात कर रहे हैं कॉर्पोरेट की। हम बात कर रहे हैं बिजनेस की। बिजनेस की जो सोसाइटी के प्रति जिम्मेदारियां बनती है उसे हम क्या बोलते हैं? सीएसआर बोलते हैं। देखो होता क्या है? जब एक बिजनेस स्टार्ट किया जाता है ना तो वो कहां पर किया जाता है? सिंपल सी बात है सोसाइटी के अंदर ही किया जाता है। तो वो सोसाइटी से बहुत सारे रिसोर्सेज लेता है। कस्टमर कहां से मिलेंगे उसको? सोसाइटी से मिलेंगे। एंप्लाइजज़ कहां से मिलेंगे उसको? सोसाइटी से मिलेंगे। रॉ मटेरियल कहां से मिलेगा? सोसाइटी से मिलेगा। तो जब वो सोसाइटी से इतनी सारी चीजें ले रहा है बिजनेस को स्टार्ट करने के लिए तो अब उसका
1:32 फर्ज बनता है कि वो भी सोसाइटी को कुछ वापस दे। ठीक है? उसकी भी कुछ जिम्मेदारियां बनती हैं कि वो सोसाइटी को कुछ वापस लौटाए। ठीक है? जैसे कि क्या करवा सकती है वो सोसाइटी के लिए? गरीब बच्चों के लिए स्कूल बनवा सकती है। फ्री हेल्थ कैंप लगवा सकती है। पेड़ लगवा सकती है। क्लीन वाटर की फैसिलिटी अवेलेबल करवा सकती है सोसाइटी में। तो ये सारी जो जिम्मेदारियां हैं जब वो इन जिम्मेदारियों के बारे में सोचती है तो उसे क्या बोलते हैं? सीएसआर बोलते हैं। तो समझ में आ गया बिज़नेस सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाने के लिए सोसाइटी में नहीं आया है। उसे सोसाइटी को कुछ वापस भी करना पड़ेगा। रिटर्न भी देना पड़ेगा। उसे हमने क्या बोल दिया? कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी बोल दिया। अब मुझे एक बात बताओ। अगर बिजनेस बहुत अच्छा खासा पैसा कमा रहा है, प्रॉफिट कमा रहा है तो क्या भरोसा कि वो कल को सोसाइटी के प्रति जिम्मेदारी निभाए या ना निभाए। इसलिए ना एक एक्ट बनाया गया है। ठीक है?
2:18 कंपनीज़ एक्ट 2013 में सेक्शन 135 सब सेक्शन वन के तहत यह बोला गया है कि अगर कोई भी बिजनेस जिसकी नेटवर्थ नेटवर्थ क्या होती है? उसकी कीमत के बारे में बात कर रहे हैं। अगर उसकी कीमत ₹500 करोड़ या ₹500 करोड़ से ज्यादा की है या फिर उसकी रेवेन्यू। रेवेन्यू का मतलब होता है कमाई। अगर उसकी कमाई 1000 करोड़ या उससे ज्यादा की है और नेट प्रॉफिट का मतलब होता है सारे खर्चों को निकालने के बाद जो प्रॉफिट बच रहा है अगर उसका प्रॉफिट 5 करोड़ या 5 करोड़ से ज्यादा का है और यह 3 साल तक रेगुलर चीजें हो रही हैं उसकी नेटवर्थ इतनी आ रही है टर्नओवर इतना आ रहा है और नेट प्रॉफिट इतना आ रहा है 3 साल तक तो भैया उस पर कंपलसरी है एलिजिबल है उसे सीएसआर करना पड़ेगा सोसाइटी के प्रति कुछ तो करना पड़ेगा या तो वह फ्री हेल्थ कैंप लगवा दे या क्लीन वाटर की फैसिलिटी
3:05 अवेलेबल करवा दे या पार्क खुलवा दे या कुछ भी करे कंपलसरी है भाई कंपलसरी है क्योंकि वो अच्छा खासा प्रॉफिट कमा रही है यह किसने डिसाइड किया है लॉ ने डिसाइड किया है ठीक है तो हमें समझ में आ गया भैया सीएसआर क्या है वो कंटिन्यूइंग कमिटमेंट है वो प्रॉमिस है कंपनी वालों की तरफ से बिजनेस वालों की तरफ से कि वो अपने प्रॉफिट के साथ-साथ वो एथिकली काम करेगा और साथ में अपनी सोसाइटी की इकोनॉमिक डेवलपमेंट करेगा अपने कामों से जिससे क्या होगा जो वर्क फ़ोर्स है हमारे एंप्लाइजज़ हैं ठीक है और हमारी सोसाइटी में जितने भी लोग रह रहे हैं उनकी जो क्वालिटी ऑफ़ लाइफ है वो इंप्रूव हो जाएगी। समझ में आया? अब हमारा नेक्स्ट टॉपिक है रिस्पांसिबिलिटीज़ ऑफ़ बिज़नेस। जो अभी तक हम पढ़कर आए कि बिज़नेस की जिम्मेदारियां बनती हैं सोसाइटी के प्रति। तो सोसाइटी में क्या सिर्फ लोग रहते हैं? नहीं। सोसाइटी में शेयरहोल्डर भी रहते हैं, एंप्लाइजज़ भी
3:52 रहते हैं, कस्टमर भी रहते हैं, गवर्नमेंट भी रहती है, कम्युनिटी भी है और हमारा एनवायरमेंट। इन सब से मिलकर ही तो सोसाइटी बनी है। तो इन सबके प्रति बिज़नेस की कुछ ना कुछ रिस्पांसिबिलिटी होती है। तो सबसे पहले पढ़ते हैं शेयर होल्डर के बारे में। शेयरहोल्डर कौन होता है? वो पर्सन होता है जो कि कंपनी में अपना पैसा इन्वेस्ट कर रहा है। शेयर्स खरीद रहा है। ठीक है? और अपना पैसा लगाता है तो चाहता है कि बिजनेस बदले में उसको अच्छा खासा रिटर्न दे, डिविडेंड दे। तो बिज़नेस की जिम्मेदारी बनती है कि अगर कल को उसे अच्छा खासा प्रॉफिट होता है तो फेयर रिटर्न किसको मिलना चाहिए? शेयर होल्डर को मिलना चाहिए। और दूसरा कि जितनी भी इंफॉर्मेशन है बिज़नेस की चाहे उसकी इनकम से रिलेटेड हो, प्रॉफिट एंड लॉस से रिलेटेड हो, करेक्ट ही इंफॉर्मेशन शेयर होल्डर के साथ बतानी चाहिए। ठीक है? उनके भी इंटरेस्ट को प्रोटेक्ट रखा जाना चाहिए। अगर उन्होंने पैसा इन्वेस्ट किया है तो सोच समझ के ही किया होगा। तो आपका फर्ज बनता है कि आप उन्हें अच्छा खासा रिटर्न दें। दूसरा होता है एंप्लई। अगर कोई एंप्लई आपके लिए काम
4:39 कर रहा है तो आपका ये फर्ज बनता है आप उन्हें अच्छी सैलरी दो। अच्छी वर्किंग कंडीशन दो। उनकी सेफ्टी का ध्यान रखा जाए। उनके लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाए जाएं। ठीक है? ग्रोथ अपॉर्चुनिटीज दी जाए। मतलब कि प्रमोशन वगैरह दिए जाए और सारे एंप्लाइजज़ को इक्वली ट्रीट किया जाए। ठीक है? अब बात करते हैं कस्टमर के प्रति क्या जिम्मेदारी बनती है? तो कस्टमर अगर लॉयल है, वो आपके बिजनेस से प्रोडक्ट खरीद रहा है तो उन्हें अच्छी गुड एंड सर्विज प्रोवाइड करवाओ। वो भी फेयर प्राइस में अच्छी क्वालिटी के साथ कस्टमर को किसी भी तरीके से चीट मत करो। गलत एडवर्टाइजमेंट मत छापो। प्रॉपर इंफॉर्मेशन दो प्रोडक्ट के बारे में, उसके प्राइस के बारे में, एक्सपायरी डेट के बारे में और उसको कैसे यूज़ किया जाता है ये सारी जानकारी दो। अगर कस्टमर कोई भी कंप्लेन करता है। ठीक है? तो उसे आफ्टर सेल सर्विज दो। ठीक है? होता है ना? वाशिंग मशीन खराब हो जाती है तो वो ठीक करने आते हैं घर पे। ठीक है? अब बात करते हैं गवर्नमेंट के प्रति आपकी क्या जिम्मेदारी बनती है? तो आपकी जिम्मेदारी बनती है कि अच्छा खासा आप कमा रहे हो तो
5:25 जितने भी रूल्स रेगुलेशन है जो कि गवर्नमेंट ने बनाया है उनको फॉलो करो ऑनेस्टली टैक्स को पे करो टाइम पे पे करो जितने भी लेबर लॉस हैं सेफ्टी रूल्स हैं एनवायरमेंट के लिए रूल्स बना रखे हैं गवर्नमेंट ने वो सारी चीजें आप फॉलो करने चाहिए ऐसा नहीं है कि एनवायरमेंट को अधुन पोल्यूट करते जा रहे हो लेबर को एक्सप्लइट करते जा रहे हो तो जितनी भी पॉलिसी है गवर्नमेंट की उसमें सपोर्ट करो नेक्स्ट है कम्युनिटी कम्युनिटी वो एरिया होता है जहां पर भी बिज़नेस ऑपरेट कर रहा है ना उसके आसपास का जो भी एरिया है जगह है सोसाइटी है उसको हम बोलते हैं कम्युनिटी ठीक है तो बिज़नेस की रिस्पांसिबिलिटी िटी बनती है कि उनके लिए एंप्लॉयमेंट अपॉर्चुनिटीज क्रिएट की जाए। एजुकेशन पर, हेल्थ पर, वेलफेयर एक्टिविटी को सपोर्ट किया जाए। कैंप वगैरह लगवाए जाए। ठीक है? जिससे क्या होगा? हमारी कम्युनिटी डेवलप होगी। अब बात करूं एनवायरमेंट के बारे में तो भाई ऐसीऐसी-ऐसी चीजें करो जिससे एनवायरमेंट को फायदा हो। सोलर पैनल लगा लो बिजली को प्रोड्यूस करने के लिए। ठीक है? रिसाइक्लिंग प्रोडक्ट यूज़ करो। सस्टेनेबल
6:11 डेवलपमेंट को प्रमोट करो। ये सारे मेथड का यूज़ करो जिससे हमारा जो नेचर है वो भी प्रोटेक्ट हो। हमारा एनवायरमेंट डैमेज ना हो। अब हमारे टॉपिक का नाम है पैराडिंग शिफ्ट ऑफ कॉर्पोरेट रिस्पांसिबिलिटी। इसका मतलब क्या होता है कि बहुत बड़ा चेंज आया है। बिजनेस का जो सोचने का तरीका है ना वही बदल गया है। पहले बिज़नेस सोचता था कि प्रॉफिट कमाओ, प्रॉफिट कमाओ, प्रॉफिट कमाओ। लेकिन आज का जो बिज़नेस है, वह जानता है कि अगर हम सिर्फ और सिर्फ प्रॉफिट कमाने पर ध्यान देंगे ना, तो फिर हम सोसाइटी में लंबे समय तक टिक नहीं सकते। ठीक है? अपने आप को लॉन्ग टर्म अप ग्रोथ देखना चाहते हैं, सक्सेसफुल होता हुआ देखना चाहता है तो हमें सोसाइटी के बेनिफिट के लिए कुछ ना कुछ तो जरूर करना पड़ेगा। ठीक है? तो बिजनेस ने जो अपनी सोच बदली है ना उसे ही हम क्या बोल रहे हैं? पैराडिंग शिफ्ट बोल रहे हैं। तो जो बड़े-बड़े चेंजेस आए उन चेंजेस के बारे
6:56 में बात कर लेते हैं। तो पहला चेंजेस ये आया फिलॉसफी ऑफ़ बिज़नेस। फिलॉसफी ऑफ़ बिज़नेस का मतलब होता है बिज़नेस चलाने के जो बेसिक से तरीके हैं, बेसिक सी सोच है। पहले क्या हुआ करती थी? पहले हुआ करती थी ज्यादा से ज्यादा प्रॉफिट कमाओ। चाहे कस्टमर को चीट करो, फेक प्रोडक्ट बेचो, चाहे सस्ता मटेरियल यूज़ करो, लेकिन ज्यादा से ज्यादा प्रॉफिट कमाओ। तो सबसे पहला चेंजेस आया कि देखो भैया प्रॉफिट कमाना जरूरी है। लेकिन हमें साथ ही साथ सोसाइटी के वेलफेयर के बारे में भी सोचना होगा। प्रॉफिट जरूरी होता है। लेकिन जबजब उसे हमने एथिकल वे में कमाया हो। मतलब अपने कस्टमर के साथ चीटिंग नहीं करी हो, फेक प्रोडक्ट नहीं बेचे हो, वर्कर को ज्यादा एक्सप्लइट नहीं किया हो, कस्टमर को मिसलीड नहीं किया हो और साथ में सोसाइटी को भी हार्म नहीं किया हो, तभी वह प्रॉफिट सही माना जाएगा। और हम उस मार्केट में लंबे समय तक टिक सकते हैं। तो पहला चेंज क्या आया कि प्रॉफिट जरूर
7:42 कमाएंगे लेकिन सोशल रिस्पांसिबिलिटी को निभाते हुए। ठीक है? फिर दूसरा बहुत बड़ा चेंज आया सेकंड शिफ्ट में। अब जो स्कोप था ना इन सारी चीजों का वो बहुत बड़ा हो गया। अब हमें एनवायरमेंट के बारे में भी सोचना है, सोसाइटी के बारे में भी सोचना है, शेयरहोल्डर्स के बारे में भी सोचना है और स्टेक होल्डर्स के बारे में भी सोचना है। स्टेक होल्डर कौन होते हैं? जो डायरेक्टली और इनडायरेक्टली हमारे बिजनेस से जुड़े हुए होते हैं। उन्हीं पर्सन को हम स्टेक होल्डर कहते हैं। जैसे कि एंप्लाइजज़ हो गया, गवर्नमेंट हो गया, सप्लायर्स हो गए। ठीक है? ये सब लोग कौन हैं? जो कि हमारे बिजनेस से जुड़े हुए हैं। ठीक है? इन्हें बोलते हैं स्टेक होल्डर। तो इन सबके प्रति भी जिम्मेदारी बनती है। जैसा कि अभी हम ऊपर पढ़ के आए। तो यहां पर जो एरिया था वो वास्ट हो गया है। तो मतलब हमें भाई बिजनेस करना है लेकिन पॉल्यूशन नहीं करना। सोसाइटी के बारे में सोचना है। उनकी डेवलपमेंट करनी है। ठीक
8:27 है? अपने सारे स्टेक होल्डर के बारे में भी सोचना है। उन्हें भी सेटिस्फाई करना है और शेयरहोल्डर को तो ज्यादा से ज्यादा रिटर्न भी देना ही देना है। अब हमारे टॉपिक का नाम है ई-कॉमर्स। ई का मतलब होता है इलेक्ट्रॉनिक मतलब कि जिसमें इंटरनेट का यूज़ हो रहा हो। डिजिटल टेक्नोलॉजी का यूज़ हो रहा हो। मतलब वो इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेस जिसका यूज़ करके हम सामान को खरीद रहे हैं। ठीक है? वो क्या-क्या है? हमारे मोबाइल फोन, हमारा लैपटॉप, हमारे कंप्यूटरटर्स। ठीक है? ये सब किसका पार्ट है? इलेक्ट्रॉनिक का पार्ट है। ठीक है? जिसमें हमें इंटरनेट यूज करना पड़ता है और कॉमर्स का मतलब होता है खरीदना या बेचना। ट्रेड हो रही है। ठीक है? मतलब ई-कॉमर्स क्या है? एक ऐसा प्लेटफार्म है जहां पर हम खरीदना बेचना कर रहे हैं लेकिन इंटरनेट की मदद से। ठीक है? जैसे आप अपने घर बैठे-बैठे शॉपिंग करते हो। कुछ भी सामान खरीदते हो। कहां से? Amazon से, Flipkart से, MNTRa से और कुछ भी सामान अगर बेचना हो तो कहां पे बेचते हो? OLX पे। तो ये
9:14 सारे क्या है? ई-कॉमर्स प्लेटफार्म है जिसमें इंटरनेट की मदद से ट्रेड हो रही है। खरीदना बेचना चल रहा है। सारी सर्विज, सारे गुड्स कहां पर मिल रहे हैं हमें? इंटरनेट के माध्यम से मिल रहे हैं। ठीक है? और ऐसा ही नहीं है कि सिर्फ और सिर्फ इसमें आप किसी ऐप पर जाते हो, वेबसाइट पर जाते हो और अपने लिए सामान खरीद लेते हो। इतनी ही चीज नहीं आती इसके अंदर। आप वहां पर जाकर बेच भी सकते हो। बहुत सारे सेलर्स हैं जो अपने दुकान को वहां लिस्ट करके बैठे हुए हैं। और आपको पता है जब आप ऑर्डर प्लेस करते हो आप तो सिर्फ एक बटन दबाते हो। और ऑर्डर प्रोसेसिंग मतलब ऑर्डर रिसीव करना, पैकेजिंग करना, डिलीवरी के लिए भेजना। यह पूरा प्रोसेसिंग किसके माध्यम से हो जाता है? इंटरनेट के माध्यम से। सिर्फ आपने एक बटन दबाया और ऑर्डर प्रोसेसिंग होता है। ठीक है? और यहां तक कि अगर आपको इस सामान के लिए पेमेंट करनी है तो वह भी आप घर बैठे-बैठे कर सकते हो। यूपीआई वगैरह का यूज़ करके, नेट बैंकिंग का यूज़ करके इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट भी कर सकते
10:00 हो। ठीक है? और अगर आपको कोई भी प्रोडक्ट के बारे में डिटेल चाहिए, प्राइस चाहिए, डिलीवरी अपडेट चाहिए, ठीक है? रिव्यूज वगैरह चेक करने हैं, तो आप उस प्रोडक्ट की इंफॉर्मेशन को बहुत ईजीली देख भी सकते हो, समझ भी सकते हो। फोटो वगैरह भी लगी होती हैं। तो इसके अंदर कितनी सारी चीजें आ रही हैं जो कहां पर हो रही हैं? इंटरनेट पर हो रही हैं। ठीक है? उसी प्लेटफार्म को हमने क्या बोल दिया? ई-कॉमर्स बोल दिया और यहां पर बहुत सारे कस्टमर हैं क्योंकि ऑनलाइन तो हम कहीं पर भी पहुंच सकते हैं ना और अगर मैं बात करूं कस्टमर की तो भाई अगर आप एक दुकान खोलते हो तो आसपास के एरिया को ही कवर कर पाते हो लेकिन ऑनलाइन क्या है? ऑनलाइन आप अलग-अलग देशों को कैप्चर कर सकते हो। वहां के कस्टमर को भी टारगेट कर सकते हो। तो हमें बहुत बड़ा कस्टमर बेस मिलता है। ठीक है? हम कहीं से भी किसी भी टाइम शॉपिंग कर सकते हैं अपने डिजिटल डिवाइसेस का यूज़ करके। उसी प्लेटफार्म को हमने ई-कॉमर्स बोल दिया। अब बात करें फीचर
10:47 के बारे में। में ई-कॉमर्स का पहला फीचर होता है कि यहां पे पेपरलेस ट्रांजैक्शन होती है। कहने का मतलब डिजिटल फॉर्म में होती है। चाहे बिल बनाना हो, ऑर्डर प्रोसेसिंग का काम हो, पेमेंट रिसीप्ट हो। ये सारी चीजें आपको पेपर पर नहीं मिलेगी। ये आपके मोबाइल फोन लैपटॉप में आ जाएंगी। ठीक है? अगर आप ऑर्डर भी कैंसिल करते हो ना तो इसका भी मेल आ जाता है। ठीक है? और दूसरा होता है ग्लोबल रिच। अगर आपकी कोई दुकान है तो आप उतने ही एरिया को टारगेट कर पाओगे। उतने ही एरिया के कस्टमर आपको मिल पाएंगे। लेकिन अगर आपका बिजनेस ऑनलाइन चल रहा है तो आप किसी भी सिटी के कस्टमर के साथ कनेक्ट कर सकते हो। अलग-अलग कंट्रीज के साथ भी कनेक्ट कर सकते हो। ठीक है? आपको इंटरनेट पर बहुत सारे कस्टमर मिलते हैं। और तीसरा होता है डिजिटल पेमेंट सिस्टम। मतलब आप घर बैठे-बैठे ही पेमेंट भी कर सकते हो। आपके पास ऐसे इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम आ गए हैं जैसे कि यूपीआई हो गया, डेबिट क्रेडिट कार्ड हो गया, नेट बैंकिंग हो गया, मोबाइल वॉलेट हो
11:33 गया जिसके थ्रू पेमेंट करना भी बहुत ज्यादा आसान हो गया है। अब बात करें इसके फायदों के बारे में तो जैसे फिजिकल शॉप जो होती है जो लाला भैया की दुकानें होती हैं वो 8:00 बजे से खुलती हैं और रात के 10:00 बजे तक बंद हो जाती हैं। लेकिन इसका फायदा क्या है? ई-कॉमर्स का फायदा है कि हमेशा खुली रहती है। 24 * 7 कभी भी। अगर 12:00 बजे मन कर रहा है शॉपिंग करने का तो हम 12:00 बजे कर सकते हैं। ठीक है? दूसरा होता है ये हमारे कन्वीनियंस के हिसाब से होती है। मतलब हम कभी भी घर बैठे किसी भी एरिया से बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती। मेहनत करने की जरूरत नहीं पड़ती। तैयार होना नहीं पड़ता। कभी भी किसी टाइम किसी भी एरिया से शॉपिंग कर सकते हैं इंटरनेट की मदद से। ठीक है? तीसरा ये हमारा टाइम और कॉस्ट दोनों बचा देती है। घर बैठे-बैठे जो ट्रैवल का टाइम होता है वो बच जाता है। पेट्रोल, बस का किराया। ठीक है? अगर ऑटो से जाते तो ऑटो का किराया। ये जो अननेसेसरी एक्सपेंस होने
12:20 वाले थे, वह अब नहीं होंगे। और चौथा हमें यहां पर बहुत सारे प्रोडक्ट की चॉइस मिल जाती है। अगर हम लोकल दुकान पर जाएंगे तो हो सकता है उन्होंने अपनी दुकान के हिसाब से सामान रखा हो। वहां के लोकल लोगों के हिसाब से सामान रखा हो। लेकिन किसी ई-कॉमर्स प्लेटफार्म का यूज करते हैं तो हमें किसी भी साइज का बड़े-बड़े फन पॉप के साइज, बड़े-बड़े मैड एंगल, बड़ा-बड़ा ओएस का साइज, किसी भी साइज का किसी भी टाइप का प्रोडक्ट ईजीली मिल सकता है। मतलब हमें एक ही जगह पर 10 तरह की ब्रांड्स भी मिल जाएंगी, 10 तरह के कलर्स भी मिल जाएंगे, 10 तरह के साइज भी मिल जाएंगे और 10 तरह के प्राइस भी मिल जाएंगे और ईजीली कंपेयर करने के बाद हम चीजों को खरीद सकते हैं। ठीक है? अब बात करते हैं इसके नुकसान के बारे में। तो इसमें कोई फिजिकल इंस्पेक्शन नहीं होती। मतलब कि हम कपड़े को सामान को छूकर महसूस कर कर नहीं देख सकते। ठीक है?
13:05 जो क्वालिटी हमें छूकर पता लगती है, चेक करने के बाद पता लगती है, वह हमें फोन पर लैपटॉप या कंप्यूटर में पता नहीं लग पाती और कभी-कभी हमारे साथ धोखा हो जाता है। हमने सोचा था यह कपड़ा तो बहुत अच्छा है। लेकिन जब वो डिलीवर होता है तो वो उतना अच्छा नहीं लगता जितना कि वो फोटो में लग रहा था। और हो सकता है क्या पता हमें फिटिंग वगैरह ना आई हो। दूसरा होता है साइबर सिक्योरिटी रिस्क। बहुत सारा खतरा होता है फ्रॉड का, हैकिंग का। ऐसे बहुत सारी फेक वेबसाइट हैं जो डाटा को चुरा लेती हैं। आपसे पेमेंट तो ले लेती हैं। आपको बहुत अच्छा ड्रेस पसंद आया। आपने ऑर्डर प्लेस कर दिया, पेमेंट भी कर दी। लेकिन कभी वो ड्रेस आएगी ही नहीं। ऐसी बहुत सारी फेक वेबसाइट बनाई हुई है। और कहीं पर अगर आप अपने कार्ड वगैरह की डिटेल वगैरह डाल देते हो तो भी आपके अकाउंट से पैसे कट जाते हैं। और तीसरा हो सकता है डिलीवरी लेट हो जाए। ठीक है? कभी-कभी टाइम पर चीजें डिलीवर नहीं हो पाती। वेदर की वजह से ट्रांसपोर्ट प्रॉब्लम हो सकती है। सेलर डिले कर सकता है। तो बहुत सारी ऐसी
13:52 चीजें होती है। हमने कोई बर्थडे के लिए ड्रेस मंगवाया था। लेकिन वो बर्थडे के एक दिन बाद आएगा तो क्या ही फायदा तो कभी-कभी डिले बहुत ज्यादा नुकसान कर देता है और हमेशा हम इंटरनेट पर डिपेंड रहते हैं ऑनलाइन चीजों को खरीदने के लिए। ठीक है? अगर हमारे फोन में इंटरनेट नहीं है। ठीक है? हमारे पास डिवाइस नहीं है तो हम शॉपिंग भी नहीं कर सकते। तो हम किस पे डिपेंड हैं? इंटरनेट पर डिपेंड है। अब हमारे टॉपिक का नाम है डिफरेंसेस। हम किस में डिफरेंस पढ़ने वाले हैं? ट्रेडिशनल कॉमर्स और ई-कॉमर्स। ई-कॉमर्स तो आपको पता ही लग गया कि हम क्या कर रहे हैं? ऑनलाइन खरीदना बेचना कर रहे हैं और ट्रेडिशनल कॉमर का मतलब ऑफलाइन खरीदना बेचना कर रहे हैं। जहां पर एक फिजिकल शॉप है। किसी की दुकान है वहां पर्टिकुलर जा के हम खरीद के ला रहे हैं। उसे क्या बोलते हैं? ट्रेडिशनल कॉमर्स बोलते हैं। ठीक है? तो जितनी भी ट्रांजैक्शन हो रही हैं वो कहां पर हो रही है? फिजिकल स्टोर में हो रही हैं। मार्केट में हो रही हैं। उसे हमने ट्रेडिशनल कॉमर्स बोल दिया। और जितनी भी
14:37 ट्रांजैक्शन होती हैं यहां पर वो कहां पर हो रही है? इलेक्ट्रॉनिकली हो रही हैं। इंटरनेट पर हो रही हैं। उसे हमने ई-कॉमर्स प्लेटफार्म बोल दिया। ठीक है? यहां पे जितना भी प्रोसेस होता है चाहे बिल बनाने का काम हो, ऑर्डर प्रोसेस करने का काम हो, कस्टमर के रिकॉर्ड करने का काम हो तो इन सब में ह्यूमन एफर्ट लगता है। मैनुअल मैनुअल प्रोसेस होता है। यहां पे ह्यूमन खुद करता है। लेकिन यहां पर तो मशीनें कर देती हैं। कंप्यूटर कर देते हैं। बहुत बड़े-बड़े बिलिंग सिस्टम लगा रखे हैं। पेमेंट कंफर्मेशन के लिए बहुत सारी चीजें लगा रखी हैं। रिकॉर्ड कीपिंग सिस्टम लगा रखे हैं कि आपको सिर्फ एक बटन दबाना है। आप ऑर्डर पे दबाओगे ना सारी चीजें अपने आप हो जाएंगी। ठीक है? ऐसे ही पेमेंट का भी अगर आप एक बटन दबा लोगे अपना पिन वगैरह डालने के बाद तो पैसे कट जाएंगे। तो ये सारी चीजें ये जो पूरा प्रोसेस है वो कैसा होता है? ऑटोमेटिक होता है। ठीक है? और यहां पर ये जो बिजनेस होते हैं वो लिमिटेड बिजनेस आवर्स में काम करते हैं। मतलब कि 8:00 बजे सुबह दुकान खोली रात के 10:00 बजे तक बंद हो जाएगी। लेकिन ये कभी भी कभी
15:23 भी आप शॉपिंग कर सकते हो। हमेशा 2400 घंटे खुले रहते हैं। 24 * 7 अवेलेबल रहते हैं। यहां पे हम बायर और सेलर दोनों आपस में मिलते हैं। ये अपने सवाल पूछ सकता है। भैया कपड़े की क्वालिटी तो कैसी है? अरे भैया प्राइस तो बहुत ज्यादा लगा रहे हो तुम। ठीक है? तो यहां पे फेस टू फेस इंटरेक्शन हो सकता है, बारगेनिंग हो सकती है। लेकिन यहां पर ऐसा नहीं होता। यहां पे एक बायर होता है। वो स्क्रीन के साथ इंटरेक्शन कर रहा होता है। उसके सामने स्क्रीन होती है लैपटॉप की, कंप्यूटर की या मोबाइल फोन की। ठीक है? और लास्ट वाला पॉइंट ये कह रहा है अगर आपकी दुकान एक पर्टिकुलर एरिया में है। ठीक है? एक जगह पर है तो उसके आसपास के लोगों को ही आप टारगेट कर पाओगे। और अगर आपकी बहुत फेमस दुकान है तो फिर दूर-दूर से लोग आ सकते हैं। लेकिन फिर भी लिमिटेड एरिया तक ही आप टारगेट कर पाओगे। लेकिन यहां पर आपको पूरा वर्ल्ड वाइड ग्लोबल रीच मिल रही है। आप किसी भी कंट्री के कस्टमर को टारगेट कर सकते हो क्योंकि ऑनलाइन बिनेस में कस्टमर
16:09 कहीं का भी हो सकता है। तो यहां पे हमें कस्टमर बेस बहुत बड़ा मिलता है। ठीक है? अब बात करते हैं हम फॉर्म्स ऑफ ऑर्गेनाइजेशन के बारे में। यहां पर हम ऑर्गेनाइजेशन के टाइप्स के बारे में पढ़ने वाले हैं कि वो कैसे फॉर्म हुई है, कैसे बनी है? तो उसको अगर एक पर्सन चला रहा है तो उसका अलग नाम होगा। उसको पार्टनर्स मिलके चला रहे हैं तो उसका अलग नाम होगा। तो उनके लीगल स्ट्रक्चर के बेसिस पर उनका क्या लीगल स्ट्रक्चर है? उसके बेसिस पर हमने उसको डिवाइड कर दिया है। अलग-अलग फॉर्म्स बना दी हैं। तो हमारा फर्स्ट है सोल प्रोपराइटरशिप। थोड़ा सा फास्ट लेकर चलते हैं चीजों को और अगर आपको डिटेल में समझना है तो उसके लिए मैंने वन शॉट ऑलरेडी बना रखी है। तो सोल प्रोपराइटरशिप ऐसी फॉर्म ऑफ बिनेस होती है जिसके अंदर एक सिंगल पर्सन होता है जो कि अपने बिज़नेस को खुद ही ओन करता है। ओनर भी वही है। मैनेजर भी वही है जो कि मैनेज कर रहा है और कंट्रोलर भी वही है जो कि अपने बिज़नेस को कंट्रोल भी कर रहा है। ठीक है? तो उसे
16:56 क्या बोलते हैं? सोल प्रोपराइटरशिप बोलते हैं। इसके अंदर सारी चीजें बिजनेस उसी का है। सारे डिसीजन उसी के हैं। सारा प्रॉफिट भी उसी का है। ठीक है? और कल को अगर मान लो कोई भी रिस्क आता है, कोई लोन वगैरह है, चुका नहीं पा रहा, कर्जा जो बढ़ रहा है, जो भी लॉस हो रहा है, वो भी उसी की जिम्मेदारी होगी। जैसे कि मान लेते हैं आपने अपनी खुद की एक बेकरी खोल ली। तो बेकरी क्या है? आपका बिजनेस है। तो उस बिजनेस का नाम क्या होगा? सोल प्रोपराइटरशिप होगा। ठीक है? अब बात करें इसके फीचर के बारे में। तो इसको चलाने के लिए कितने बंदे चाहिए होते हैं? सिर्फ और सिर्फ सिंगल ओनर चाहिए होता है। ये बना रहे होते हैं ना बिजनेस को फॉर्म कर रहे होते हैं। तो इसमें कोई भी लीगल फॉर्मेलिटीज की जरूरत नहीं पड़ती। कहने का मतलब ऐसे अलग-अलग टाइप्स के बिजनेस हैं जिसको बनाते वक्त हमें बहुत सारी गवर्नमेंट की परमिशन चाहिए होती है। रजिस्ट्रेशन करवाना पड़ता है। तो अब मुझे खुद बताओ अगर आप अपनी खुद की बेकरी खोल
17:43 रहे हो तो क्या उसके लिए आपको रजिस्ट्रेशन करवाना पड़ेगा? बहुत सारे अप्रूवल लेने पड़ेंगे? नहीं ना? तो कोई लीगल फॉर्मेलिटीज भी नहीं होती और बिजनेस पर फुल और फुल कंट्रोल हब का ही होता है। और लास्ट है अनलिमिटेड लायबिलिटी। मतलब कि जो कर्जा है अगर मान लो कल को बिजनेस के ऊपर बहुत ज्यादा कर्जा बढ़ जाता है तो वो कर्जा किसको चुकाना पड़ेगा? आपको चुकाना पड़ेगा। इसलिए बोला गया है यहां पर जो लायबिलिटी है वो अनलिमिटेड है। उसकी कोई लिमिट नहीं है। तो जितनी भी लायबिलिटी अगर कल को बढ़ जाएगी वो आपके सर पर आएगी। आपको अपने पॉकेट से चुकाना पड़ेगा। तो ओनर के ऊपर अनलिमिटेड लायबिलिटी हो गई। ठीक है? अब बात करें इसके फायदे और नुकसान के बारे में तो इसको बनाना बहुत आसान है क्योंकि इसमें कोई भी लीगल फॉर्मेलिटी नहीं होती। सिर्फ और सिर्फ आपका कंट्रोल होने वाला है तो फुल कंट्रोल होगा। ठीक है? और जल्दी से आसानी से आप डिसीजन ले सकते हो। ऐसा नहीं
18:29 है कि आपको टॉप मैनेजमेंट वालों से अप्रूवल लेना पड़ेगा। उनसे जाके पूछना पड़ेगा। आपको जो अपने बिजनेस में करना है, नया प्रोडक्ट ल्च करना है, नई पैकेजिंग लानी है, जो भी करना है, आप इजीली डिसीजन ले सकते हो। ठीक है? क्योंकि आप ही ओनर हो। ठीक है? अब बात करूं इसके डिसएडवांटेज के बारे में। तो अगर आप लाओगे तो कम ही पैसा लाओगे, कम ही रिसोर्सेज लाओगे। ऐसा तो नहीं है बहुत सारी मशीनें ले आओगे आप जितना कैपेबल हो तो उतना ही ला पाओगे तो रिसोर्सेज क्या हो जाते हैं लिमिटेड हो जाते हैं ज्यादा नहीं हो पाते एक पर्सन के पास जितना पैसा है जितना रिसोर्स है वो उतना ही ला पाएगा ठीक है और यहां पे लायबिलिटी क्या होती है अनलिमिटेड होती है जिसकी कोई लिमिट नहीं होती ठीक है अगर कल को लायबिलिटी का कर्जा बढ़ जाता है तो सबसे पहले क्या करोगे आप बिजनेस की मशीन वगैरह बेचोगे एसेट बेचोगे उससे कर्जा चुकाने की कोशिश करोगे अगर कर्जा नहीं चुक पाता है उसके बाद आपकी पर्सनल जेब पर बात
19:15 आ जाएगी आपका घर भी बिक सकता है। जो मर्जी हो सकता है। आपकी पर्सनल प्रॉपर्टी पर्सनल लाइफ पर बात आ जाएगी। इसलिए बोला गया है कि अनलिमिटेड लायबिलिटी होती है। और मान लो कल को अगर आपका बिजनेस बड़ा हो जाता है। ठीक है? बहुत ज्यादा भीड़ लग जाती है आपकी बेकरी पे तो एक सिंगल पर्सन वो बिजनेस नहीं चला सकता। अब हमारा नेक्स्ट है पार्टनरशिप। पार्टनरशिप ऐसी फॉर्म ऑफ़ ऑर्गेनाइजेशन है जिसमें दो या दो से ज्यादा लोग आपस में मिलकर डिसाइड करते हैं कि चलो भैया बिज़नेस करते हैं और अपना-अपना पैसा लेके आते हैं। बिज़नेस में इन्वेस्ट करते हैं और यह तय करते हैं कि अगर कल को इस बिज़नेस से जो भी प्रॉफिट होता है, जो भी लॉस होता है, आपस में बांट लेंगे। तो इन्होंने म्यूचुअली एग्रीमेंट पर ये डिसाइड किया कि चलो हम बिजनेस शुरू करते हैं। तो मतलब इनको क्या बोलेंगे? पार्टनर्स बोलेंगे। पार्टनर्स आए। पार्टनर्स ने बिज़नेस शुरू किया। वो हो गई पार्टनरशिप। ठीक है? अब बात करें इसके
20:00 फीचर के बारे में। तो देखो सिंपल सी बात है जब ये पार्टनरशिप फर्म होती है ना तो लोग अपना-अपना पैसा लेकर आते हैं। अपनी-अपनी कैपिटल लेकर आते हैं बिजनेस को स्टार्ट करने के लिए मशीनों को खरीदने के लिए। तो लोगों के बीच में क्या हो रहा है? एक एग्रीमेंट फॉर्म हो रहा है। जहां पर वो लोग आपस में एग्री कर रहे हैं कि हम बिजनेस करने वाले हैं। ठीक है? अब ये जो एग्रीमेंट होता है वो ओरल फॉर्म में भी हो सकता है और रिटर्न फॉर्म में भी हो सकता है। ये मुंह से बोलकर भी एग्रीमेंट कर सकते हैं कि चलो भैया बिज़नेस शुरू करते हैं या फिर रिटन फॉर्म में। एक डॉक्यूमेंट होता है अगर आपको याद हो पार्टनरशिप डीड बोलते हैं उसको। ठीक है? एक रिटन लीगल डॉक्यूमेंट। ठीक है? मतलब एक ऐसा पर्चा जिसमें साफ-साफ लिखा होता है कि बिजनेस का क्या नाम है? सभी पार्टनर्स का क्या नाम है? सब पार्टनर्स कितनी कैपिटल लेकर आए हैं? हर पार्टनर की ड्यूटीज और रिस्पांसिबिलिटी क्या होने वाली है? और लास्ट में कौन से रेश्यो में उनमें
20:46 प्रॉफिट और लॉस बटने वाला है? ठीक है? अगर नया पार्टनर आएगा तो क्या करना पड़ेगा? अगर कोई पार्टनर को रिटायर होना है तो क्या करना पड़ेगा? तो उस रिटन डॉक्यूमेंट में सारी बातें लिखी होती है जिसे हम बोलते हैं पार्टनरशिप डीड। तो उस पे साइन वगैरह करके एग्रीमेंट हो जाता है। ठीक है? और इसमें भी यही झंझट है कि अगर कल को बिजनेस के ऊपर कर्जा बढ़ जाता है तो बिजनेस क्या करेगा? सबसे पहले अपने एसेट वगैरह बेचेगा। उसके बाद वो कर्जा पार्टनर्स को चुकाना पड़ेगा। पार्टनर की पर्सनल पॉकेट पे बात आ जाएगी। इसलिए हम क्या बोल रहे हैं कि लायबिलिटी क्या है? अनलिमिटेड है। और पता है आपको अगर किसी को पार्टनरशिप स्टार्ट करनी है तो उसे इंडियन पार्टनरशिप एक्ट 1932 को फॉलो करना पड़ेगा। उसके अनुसार जितनी भी चीजें होंगी ना जो जो पार्टनरशिप में होती होंगी उसके अनुसार चलना पड़ेगा। तो गवर्नमेंट ने क्या बना रखा है? पार्टनरशिप एक्ट बना रखा है।
21:31 अब बात करें इसके फायदे और नुकसान के बारे में तो इसको फॉर्म करना भी इजी है। बस एक एग्रीमेंट करना पड़ता है और पार्टनरशिप फॉर्म हो जाती है। ठीक है? इसमें ज्यादा पैसा आता है क्योंकि अलग-अलग पार्टनर अपना-अपना पैसा लेकर आते हैं तो पैसा इकट्ठा हो जाता है और साथ में अगर कल को कोई नुकसान होगा ₹40 करोड़ का नुकसान हो गया तो आपस में वो बांट लेंगे। तो रिस्क भी क्या हो रहा है? शेयर हो रहा है। ये फायदे वाली बात है। अब बात करूं इसके डिसएडवांटेज के बारे में। तो यहां पर देखो लिमिटेड कैपिटल है। लिमिटेड कैपिटल कहने का मतलब क्या है? कि जितना पार्टनर्स ला पा रहे हैं उतना ही पैसा आ पा रहा है। ठीक है? उससे ज्यादा नहीं आ पा रहा। लेकिन दूसरे टाइप्स की ऑर्गेनाइजेशन में क्या होता है? हम शेयर इशू कर सकते हैं। शेयर इशू करने के बाद कंपनी बहुत सारा पैसा रेज कर सकती है। 1000 करोड़, 500 करोड़। ऐसे पैसे को रेज किया जा सकता है। और यहां पे नहीं कर सकते। इसलिए हमने इसको बोल दिया लिमिटेड कैपिटल। ठीक है? और यहां पे लायबिलिटी कैसी होती है? अनलिमिटेड होती है। और हो सकता है दोनों पार्टनर की जो
22:17 सोच हो वो अलग-अलग हो। थॉट्स फीलिंग अलग-अलग हो जिससे क्या हो जाए? लड़ाई झगड़े हो जाए। यह कह रहा है कि भाई हमें अपने बिजनेस में भले ही क्वालिटी के साथ कॉम्प्रोमाइज कर दें लेकिन प्रोडक्ट को हमेशा सस्ता ही रखेंगे। लेकिन यह कह रहा है भैया देख प्रोडक्ट भले ही महंगा हो जाए लेकिन क्वालिटी के साथ कॉम्प्रोमाइज नहीं होना चाहिए। तो ऐसे में इनके बीच में लड़ाई झगड़े भी हो सकते हैं। नेक्स्ट है जॉइंट हिंदू फैमिली बिज़नेस। ठीक है? अब देखो शर्मा जी की ना मिठाई की दुकान है। ठीक है? अगर उनकी डेथ हो जाती है तो उनके बच्चे बिज़नेस संभाल लेंगे। अगर उनकी डेथ हो जाती है तो उनके बच्चे बिज़नेस संभाल लेंगे। जो फैमिली बाय फैमिली चलता ही जा रहा है ना उस बिजनेस को हमने क्या बोल दिया? जॉइंट हिंदू फैमिली बिज़नेस बोल दिया। और इसके लिए कौन सा रूल फॉलो करना पड़ता है? इसके लिए रूल बनाया गया है हिंदू सक्सेशन एक्ट 1956। और ये ऐसी यूनिक फॉर्म ऑफ बिजनेस ऑर्गेनाइजेशन है जो कि सिर्फ और सिर्फ इंडिया में ही मिलती है। ठीक है? यहां पर इस बिजनेस को कौन चला रहे हैं? फैमिली मेंबर ही चला रहे हैं। अगर
23:03 बच्चा पैदा हो गया उस फैमिली में तो वो उस बिजनेस का मेंबर बन गया। ठीक है? यहां पर मेंबरशिप खरीदने की जरूरत ही नहीं पड़ रही। तो वही हमें समझ में आ गया कि मेंबरशिप कब से मिल गई है? जन्म से मिल गई है। ठीक है? और इस बिजनेस को कौन चलाता है? सारे डिसीजन कौन लेता है? सारे फैसले लिए जाते हैं कर्ता के द्वारा। जो इस फैमिली का हेड होता है ना हमारे दादाजी या हमारे पापा जी वही कर्ता होते हैं जो इस बिजनेस को चला रहे होते हैं। सबसे एल्डेस्ट मेंबर मान लो उनकी डेथ हो जाती है तो उनके बाद उनके बच्चे संभाल लेते हैं। उनकी बीवी नहीं बनेगी। उनकी बीवी हेड नहीं बनेगी लेकिन बीवी के बच्चे बन सकते हैं। क्योंकि उन्हें क्या बोलते हैं? कोपारनर बोलते हैं। कोपार्टनर का मतलब होता है कि उन्होंने उसी फैमिली में जन्म लिया है। बीवी तो शादी करने के बाद आई है। इसलिए बीवी जो है वो हिस्सा नहीं बनती, कर्ता नहीं बनती। लेकिन अगर उनके बच्चे हैं क्योंकि उन्होंने वहां पर जन्म लिया है तो वह बन सकते हैं और पहले के जमाने में ऐसा हुआ करता था सिर्फ और सिर्फ जो हमारा बड़ा बेटा होता था वही कर्ता बनता
23:49 था। ठीक है? लेकिन आज के जमाने में रूल्स रेगुलेशन बदल गई है। आज के जमाने में बड़ी बेटी भी कर्ता बन सकती है। ठीक है? तो हमें समझ में आ गया इसके फीचर कि यहां पर मेंबरशिप जन्म से ही मिल जाती है। बिज़नेस को कौन संभालता है? कर्ता संभालता है। और अगर किसी मेंबर की डेथ भी हो जाती है, कर्ता की डेथ भी हो जाती है, उसके बाद भी बिज़नेस कंटिन्यू रहता है। लेकिन पार्टनरशिप में क्या होता है? अगर दो पार्टनर्स ने मिलकर स्टार्ट किया है बिज़नेस और उसमें से एक की डेथ हो गई तो बिज़नेस बंद करना पड़ता है क्योंकि 1% से थोड़ी ना पार्टनरशिप फर्म होती है। ठीक है? अब बात करें इसके फायदों के बारे में तो स्टेबल बिज़नेस है। कहने का मतलब चाहे मेंबर बदलते जा रहे हैं, बदलते जा रहे हैं। चाहे किसी की भी डेथ हो रही है लेकिन बिज़नेस क्या है? स्टेबल है। बिज़नेस रुक नहीं रहा। वो चलता ही जा रहा है और इसमें क्योंकि करता ही बिजनेस को चला रहा है वही सारे फैसले लेता है तो इसमें जल्दी से फैसला भी हो जाता है और साथ ही साथ फैमिली मेंबर्स का सपोर्ट भी मिल जाता है क्योंकि यहां पर जितने भी फैमिली मेंबर्स होते हैं
24:34 उसी बिज़नेस को तो चला रहे होते हैं। ठीक है? अब बात करें डिसएडवांटेज के बारे में। तो भाई फैमिली अपना पैसा लगा सकती है। फैमिली के पास जितनी भी कैपिटल होगी उतना ही लग सकता है। तो यहां पे कैपिटल क्या होती है? लिमिटेड होती है। और अगर इस बिज़नेस में कोई भी कल को कर्जा वगैरह होता है तो वो किसके मध्य आएगा? कर्ता के मध्य आएगा। तो कर्ता के ऊपर क्या है? अनलिमिटेड लायबिलिटी है और हो सकता है भाई इनका दिमाग ही सब कुछ थोड़ी हो सकता है। ठीक है? अगर हम कंपनी वगैरह चला रहे होते तो 10 लोगों की हमें सलाह मिलती। 10 लोग एक्सपर्ट होते लेकिन यहां पर तो सिर्फ एक ही पर्सन है। उसके पास ही अपनी स्किल्स है। तो कभी-कभी हो सकता है कि यह फैसले गलत ले लें। तो हो सकता है कि इनके पास जो मैनेजरियल स्किल्स है वो लिमिटेड हो। लेकिन अगर दूसरा बिज़नेस होता तो उसमें 10 एक्सपर्ट होते, 10 सजेशन देते, 10 एडवाइस देते तो हमारा बिज़नेस और अच्छे लेवल तक पहुंच सकता। अब आपको तो पता ही है कंपनी के बारे में ऑलरेडी आपने अकाउंट्स में पढ़ा
25:19 होगा। कंपनी जो होती है ना कंपनी उसको हम क्या बोलते हैं? यह एक आर्टिफिशियल पर्सन है। आर्टिफिशियल पर्सन क्यों बोल रहे हैं? क्योंकि इसका एक अपना नाम होता है। इसकी अपनी एक पहचान होती है। इसलिए हम इसको आर्टिफिशियल पर्सन बोलते हैं। जो कि किसने बनाई है? लॉ ने बनाई है। ठीक है? सबसे पहले जब कंपनी बनाई जाती है ना तो रजिस्ट्रेशन वगैरह करवाया जाता है। रजिस्टर करवाया जाता है। इसलिए इसको कानून ने बना दिया है। इसलिए हमने इसको क्या बोला? एक आर्टिफिशियल पर्सन बोला। जिसका खुद का एक ठप्पा होता है। हर चीज पर एक थप्पा मारते हैं ना कि कंपनी की तरफ से कॉन्ट्रैक्ट हुआ है। कंपनी की तरफ से प्रॉपर्टी खरीदी है। कंपनी की तरफ से केस चल रहा है। तो इसका खुद की एक पहचान होती है। सेपरेट लीगल आइडेंटिटी होती है। इसका जो ओनर होता है, इसको जो चलाने वाला है वो अलग है और कंपनी अलग है। ठीक है? अब हम Jio को Jio के नाम से जानते हैं कि ये Jio की कंपनी है। यूं नहीं कहते मुकेश अंबानी की कंपनी है। तो वहां पर ओनर अलग हो गया।
26:06 ओनर का नाम अलग हो गया। उनकी पहचान अलग हो गई। लेकिन कंपनी का खुद का एक नाम होता है। खुद की एक पहचान होती है। ठीक है? और आपको पता है ये कंपनी को कंपनीज एक्ट 2013 के तहत रजिस्टर किया जाता है। मतलब ये कानून है कंपनीज एक्ट 2013 उसके अंडर रजिस्ट्रेशन होता है। ठीक है? अब बात करें इसके फीचर के बारे में तो अभी हमें पता लग गया इसकी खुद की एक पहचान होती है। एक नाम होता है। परपेचुअल सक्सेशन का मतलब कंपनी कभी भी मर नहीं सकती। भले ही ओनर बदल जाए फिर भी कंपनी चलती ही रहेगी। चलती ही रहेगी। क्योंकि कंपनी के बहुत सारे ओनर्स होते हैं। जितने भी लोग शेयर खरीदते हैं ना तो शेयर खरीदने के बाद वो ओनर बन जाते हैं। तो कंपनी का कोई एक ओनर नहीं होता। जो भी पैसा इन्वेस्ट कर रहा है कंपनी का वही ओनर है और इसकी एक कॉमन सील होती है। मतलब एक लीगल आइडेंटिटी होती है। अपना एक थप्पा होता है। अपनी एक स्टेम होती है। ऑफिशियल पहचान होती है। ठीक है? और इसके
26:52 अंदर देखो हर जगह अनलिमिटेड अनलिमिटेड अनलिमिटेड आ रहा था ना देखो इसके अंदर ओनर के ऊपर लिमिटेड लायबिलिटी होती है। मतलब अगर कंपनी के ऊपर कल को बहुत ज्यादा कर्जा बढ़ जाता है। वो डूबने की कगार पर हो जाती है। तो जो ओनर है ना उनकी पर्सनल पॉकेट पर बात नहीं आएगी। ठीक है? यही कानून कहता है और इसको कंपनीज एक्ट के अंडर फॉर्म करवाना पड़ता है, बनाना पड़ता है। अब बात करूं इसके एडवांटेज के बारे में तो इसमें भैया बहुत पैसा आता है। बहुत पैसा जितने शेयर इशू करेंगे जब हम शुरुआत में कंपनी बनाने जा रहे होते हैं ना तो हमें रजिस्ट्रेशन करवाना पड़ता है। तो वहां पर ना लिखवाना पड़ता है कि हम कितने शेयर इशू कर सकते हैं। तो अब वहां पर हमने लिखवा दिया। तो हम शेयर इशू करने के बाद बहुत सारा पैसा 500 करोड़, 1000 करोड़ इतना तक भी रेज कर सकते हैं। तो पैसा ही पैसा होता है। रेज कर सकते हैं। तो कैपिटल बहुत सारी होती है। यहां पर लायबिलिटी भी लिमिटेड होती
27:38 है। और यहां पे ना कंटीन्यूअस एकिस्टेंस रहती है। मतलब भले ही कंपनी का ओनर की डेथ हो जाए या फिर कंपनी का ओनर बदल जाए लेकिन फिर भी कंपनी चलती रहती है। चलती रहती है। और जिस भी पर्सन ने शेयर्स खरीदे हैं ना वो अपने शेयर को किसी और को भी ट्रांसफर कर सकता है। बेच सकता है। तो ये सारे फायदे होते हैं कंपनी के। अब बात करें इसके डिसएडवांटेज के बारे में तो कंपनी को फॉर्म करना बहुत कॉम्प्लेक्स प्रोसेस है। आपको तो पता ही है ना सबसे पहले अगर आपको याद हो आपने 12th में पढ़ा होगा सबसे पहले जब हम कंपनी फॉर्मेशन के लिए जाते हैं तो हमें अपनी कंपनी का एक यूनिक नाम सोचना पड़ता है जो सबसे मैच ना करता हो। किसी भी कंपनी से मैच ना करता हो। ठीक है? फिर डॉक्यूमेंट बनाने पड़ते हैं। याद आ रहा है कुछ? एमओए करके कुछ पढ़ा था। मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन एओ ए करके कुछ पढ़ा था। आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन याद है? अगर नहीं है तो कोई बात नहीं। ये दोनों डॉक्यूमेंट बनाने पड़ते हैं। डायरेक्टर की डिटेल देनी पड़ती है। रजिस्ट्रेशन के लिए रजिस्ट्रार
28:23 ऑफिस जाना पड़ता है। उसके बाद कहीं जाकर वो हमें सर्टिफिकेट इशू करते हैं। तो इसको बनाना बहुत कॉम्प्लेक्स प्रोसेस है। और बात करूं इसकी लीगल फॉर्मेलिटीज के बारे में तो भैया देखो कंपनी के फॉर्म होने के बाद भी लीगल फॉर्मेलिटीज खत्म होने का नाम नहीं लेती। हर साल हमें एनुअल फाइनेंसियल स्टेटमेंट बनानी पड़ती है। दिखाना पड़ता है कि कंपनी ने कितना प्रॉफिट किया। कितनी इनकम हुई, कितना लॉस हुआ। सबको दिखाना पड़ता है। जितने भी हमारे इन्वेस्टर हो गए, चाहे हमारी गवर्नमेंट हो गई। ठीक है? उन्हें भी तो पता चलना चाहिए ना। आखिर कंपनी कैसा परफॉर्म कर रही है। ऑडिटर को बुलाया जाता है। ऑडिटिंग करवाई जाती है। एनुअल रिटर्न भरने पड़ते हैं। डायरेक्टर कौन है? शेयर होल्डर कौन? ये सारी जानकारी डायरेक्टर को देनी पड़ती है। बहुत सारे टैक्स कंप्लायंसेस होते हैं। जैसे इनकम टैक्स हो गया, जीएसटी हो गया। ऐसे बहुत सारी लीगल फॉर्मेलिटीज करनी पड़ती है। ठीक है? और लास्ट है लेस सीक्रेसी। लेस सीक्रेसी का मतलब कि यहां पे कोई भी चीज प्राइवेट नहीं होती। सब चीजों को
29:09 डिस्क्लोज़ करना पड़ता है, दिखाना पड़ता है, शेयर करना पड़ता है सबके साथ। ठीक है? जितनी भी फाइनेंसियल स्टेटमेंट है, प्रॉफिट कितना हुआ, लॉस कितना हुआ, वो हमारे शेयरहोल्डर के साथ, स्टेक होल्डर के साथ हमें शेयर करना पड़ता है। तभी तो वो हमारा कंपनी में अपने पैसे को इन्वेस्ट करेंगे, जब उन्हें भरोसा होगा हमारी कंपनी के ऊपर। ठीक है? अब हमारे नेक्स्ट टॉपिक का नाम है कोऑपरेटिव सोसाइटी। ठीक है? सबसे पहले एग्जांपल देती हूं, उसके बाद आपको सारा टॉपिक आसानी से क्लियर हो जाएगा। मान लेते गांव है। गांव में 10 लोग ऐसे हैं जो कि दूध बेचते हैं। ठीक है? जब वो अपना दूध किसी मिडिलमैन को देते थे बेचने के लिए, तो मिडिलमैन सारा पैसा ही खा जाता था। बीच में रहता था। जितना भी प्रॉफिट होता था आधा से ज्यादा प्रॉफिट तो मिडिलमैन ही खा जाता था। फिर सारे फार्मर ने मिलकर ये डिसाइड किया चलो एक ग्रुप बनाते हैं। उस ग्रुप का नाम क्या है? कॉरपोरेटिव सोसाइटी। मतलब ये ऐसी फॉर्म ऑफ ऑर्गेनाइजेशन है जिसमें गांव के लोग मिलकर ये डिसाइड करते हैं कि चलो भैया ग्रुप बनाते हैं और अपनी सोसाइटी का भला करते
29:56 हैं। उनका मेन फोकस प्रॉफिट कमाना नहीं होता। उनका मेन फोकस होता है ज्यादा से ज्यादा सोशल वेलफेयर करना। तो उन्होंने एक ग्रुप बना लिया। अब उसमें ये डिसाइड किया गया कि हम लोग मिलकर आपस में सोसाइटी का जितना भी दूध होगा वो कलेक्ट कर लेंगे। फिर उसे डेरी कंपनी को बेचने चले जाएंगे। तो जो मिडिल मैन था ना उसको हटा ही दिया गया। अब क्या होगा सबको फेयर? प्राइस मिल सकता है। तो मतलब इस ग्रुप के अलग-अलग मेंबर थे जिन्होंने ये ग्रुप बनाया ताकि वो अपनी सोसाइटी की ग्रोथ में पार्टिसिपेट कर सके। लोगों का भला कर सकें। चलो मीनिंग भी पढ़ लेते हैं। तो कोऑपरेटिव सोसाइटी ऐसा वॉलंटरी का मतलब होता है जिसको अपनी मर्जी से बनाया गया हो। तो ऐसा अपनी मर्जी से बनाया हुआ ग्रुप है। एसोसिएशन है। पीपल का ग्रुप है जो कि साथ में क्यों आ रहा है? अपनी एक कॉमन प्रॉब्लम के लिए आ रहा है। कॉमन कॉमन प्रॉब्लम हो सकती है इकोनॉमिक से रिलेटेड। ठीक है? पैसों से रिलेटेड या बिजनेस से रिलेटेड हो सकती है।
30:42 सोसाइटी से रिलेटेड हो सकती है या उनके कल्चर से रिलेटेड हो सकती है। ठीक है? तो ये सारी प्रॉब्लम को पूरा करने के लिए इनको खत्म करने के लिए वो एक ग्रुप बनाया जा रहा है। जैसे हो सकता है कि किसान अपना दूध अच्छे दाम पर बेचना चाहते थे। अच्छे पैसे में बेचना चाहते थे या हो सकता है वो गांव को सस्ता राशन देना चाहते इसलिए उन्होंने ग्रुप बनाया और वो मंडी खुद ही चले जाते हैं और राशन खरीद के ले आते हैं और सस्ते में अपने सोसाइटी को अपने लोगों को प्रोवाइड करवा देते हैं। या फिर ऐसा हो सकता है वहां की जो संस्कृति है जो कला है वहां को उनको बढ़ावा देने के लिए इसलिए बनाई गई हो। अब बात करें इनके फीचर्स के बारे में तो ये एक ऐसा ग्रुप होता है जो कि खुद की मर्जी से बनाया गया हो। तो खुद की मर्जी से इंसान जॉइन भी कर सकता है और खुद की मर्जी से इंसान लीव भी कर सकता है। ठीक है? अब देखो उस ग्रुप को बनाने के लिए सब लोग अपना-अपना पैसा लेकर आए होंगे। मेंबर्स जितने भी होंगे वो अपना-अपना पैसा इन्वेस्ट किए होंगे। चाहे कोई 5000 किया
31:28 हो, चाहे कोई 500 किया हो। लेकिन यहां पर हर एक मेंबर को एक वोट देने का अधिकार होता है। कहने का मतलब कल को अगर किसी मुद्दे पर बात हो रही है। मान लो कोई भी जरूरी मुद्दा है उसको सॉल्व करना है, उसके लिए हेड चुनना है तो वोट डाल सकते हैं। तो वोट एक पर्सन एक ही दे सकता है। तीसरा यह सर्विस मोटिव से होता है। मतलब यहां पर मेंबरों को सर्विस दी जाती है। ठीक है? यहां पर मुद्दा क्या है? प्रॉफिट कमाना मुद्दा नहीं है। सर्विस देना मुद्दा है। ठीक है? वो बेनिफिट के लिए जुड़ रहे हैं। और इसके लिए भी ना एक कानून बनाया गया है। ठीक है? कॉरपोरेटिव एक्ट बनाया गया है जिसके अंदर रजिस्ट्रेशन करवाना जरूरी होता है और रजिस्ट्रेशन के बाद ना इनकी खुद की एक सेपरेट लीगल एंटिटी बन जाती है। अब बात करें इसके फायदे और नुकसान के बारे में तो इनको भी बनाना बहुत आसान होता है। गवर्नमेंट का थोड़ा बहुत सपोर्ट मिल जाता है क्योंकि आप लोग क्या करने जा रहे हो? अच्छा काम करने जा रहे हो तो गवर्नमेंट की तरफ से लोन मिल जाता है। थोड़ी सी फाइनेंसियल हेल्प मिल जाती है। सब्सिडीज के रूप में टैक्स बेनिफिट मिल जाते हैं कि
32:14 आपको ज्यादा टैक्स वगैरह भरने की जरूरत नहीं है। ट्रेनिंग प्रोग्राम चला दिए जाते हैं। ये सारे बेनिफिट गवर्नमेंट आपको देती है। ठीक है? और यहां पर लिमिटेड लायबिलिटी होती है। मतलब कि अगर बिनेस के ऊपर कर्जा होता है तो फिर वो मेंबर्स के ऊपर बात नहीं आएगी। ठीक है? और बात करें डिसएडवांटेज के ऊपर तो जितने-जितने मेंबर आएंगे अपना-अपना पैसा लेके आएंगे तो कैपिटल क्या हो गई? लिमिटेड हो गई। सबको एक दूसरे से पूछकर सलाह मशवरा करके फैसले लेने होंगे तो फैसला स्लो हो जाता है। और यहां पे मोटिवेशन की कमी होती है। क्यों होती है? क्योंकि उन्हें पता है कि प्रॉफिट तो ज्यादा मिलना नहीं है। हम क्यों कर रहे हैं? सोशल वेलफेयर के लिए कर रहे हैं। तो फायदा उतना होना नहीं है। क्योंकि मोटिवेशन कब आता है? जब आप उनको एक्स्ट्रा बेनिफिट दोगे, एक्स्ट्रा बोनस वगैरह दोगे वो मिलेगा नहीं। नहीं तो फिर वो एक्टिवली काम करेंगे नहीं। अब हमारे टॉपिक का नाम है प्लानिंग। मतलब कोई भी काम को शुरू करने से पहले जब हम पहले से ही एडवांस में सोच लेते हैं ना, तैयारी करते हैं कि हमें क्या-क्या करना है, उसको
32:59 हम क्या बोलते हैं? प्लानिंग बोलते हैं। ठीक है? मतलब कि हमने एडवांस में डिसाइड किया है कि हम क्या करने वाले हैं, कैसे करने वाले हैं, कब करने वाले हैं और कौन उस काम को करने वाला है। जैसे जैसे आप सोच रहे थे मुझे एग्जाम की अच्छी तैयारी करनी है तो आपने पहले से ही डिसाइड करोगे आपको क्या पढ़ना है? अच्छा मेरा अगला पेपर तो बिजनेस ऑर्गेनाइजेशन का है तो मुझे बिजनेस ऑर्गेनाइजेशन पढ़नी है। फिर आप सोचोगे आपको कैसे पढ़ना है? अरे हिना क्लासेस के नोट मिल जाए ना उससे मैं पढ़ लूंगा। ठीक है? फिर आप सोचोगे आपको कब पढ़ना है? ऐसा करता हूं। 2 घंटे सुबह पढ़ लेता हूं। 2 घंटे रात को पढ़ लेता हूं। इनफ होगा। ठीक है? फिर लास्ट में आप सोचोगे उस काम को करने कौन वाला है? अरे मैं ही करूंगा। मेरा ही पेपर है तो मुझे ही करना पड़ेगा। वैसे ही सेम चीज करती है ऑर्गेनाइजेशन। पहले से ही डिसाइड कर लेती है कि उसे क्या करना है, कैसे करना है, कब करना है और कौन
33:44 करेगा? मतलब उसे डिपार्टमेंट का हेड करेगा, मैनेजर करेगा, डायरेक्टर करेगा। कौन करेगा उस काम को? ठीक है? उसे क्या बोलते हैं? प्लानिंग बोलते हैं। और आपने 12th में पढ़ा होगा प्लानिंग जो होता है वो प्राइमरी फंक्शन होता है। सबसे पहले हम क्या करते हैं? प्लानिंग से ही चीजें शुरू करते हैं। बाद में चीजें होती हैं। चीजों को ऑर्गेनाइज करना, फिर स्टाफ लेकर आना, फिर डायरेक्शन देना। तो सबसे पहला फंक्शन क्या होता है? प्लानिंग करना ही होता है। और ना प्लानिंग ना ब्रिज है। ब्रिज क्या है? ब्रिज है। आज हम जहां खड़े हैं। ठीक है? और कल हमें जहां पहुंचना है। मतलब आज की जो प्रेजेंट सिचुएशन है और जो फ्यूचर की सिचुएशन है उसके बीच का ब्रिज क्या है? प्लानिंग है वो हमें रास्ता दिखा रही है। अगर हमारा गोल है कि 5 सालों में हमें अपने आप को वहां पर देखना है तो उसके लिए हमें प्लांस तो बनाने पड़ेंगे। वो रास्ता जो होता है उसी को हमने क्या बोल दिया? प्लानिंग बोल दिया। ठीक है? अब बात करें
34:31 इसके नेचर के बारे में। तो प्लानिंग को फ्यूचर के लिए किया जाता है। ठीक है? हम फ्यूचर में जहां पहुंचना चाहते हैं, जो हमारे गोल्स हैं, जो अपॉर्चुनिटीज़ एंड चैलेंजेस को हम पूरा करना चाहते हैं, उसके लिए प्लान बनाते हैं। क्या पास्ट के लिए प्लान बना सकते हैं? नहीं ना? दूसरा होता है परवेसिव। मतलब एक ऐसी चीज जो हर जगह अप्लाई होती है। चाहे कोई सा भी डिपार्टमेंट हो हर जगह हमें प्लानिंग तो करनी पड़ेगी ना। चाहे टॉप लेवल वाले हो, मिडिल लेवल वाले हो या हमारे जितने भी एंप्लाइजस हो जूनियर्स हो हर लेवल पर प्लानिंग की जरूरत होती है। ठीक है? इसलिए इसको परवेसिव बोला गया है। और ये एक इंटेलेक्चुअल प्रोसेस है। मतलब कि एक ऐसा प्रोसेस जिसमें बहुत ज्यादा सोचना पड़ता है। लॉजिकली सोचना पड़ता है। केयरफुली एनालाइज़ करना पड़ता है चीजों को। तभी हम एक बेहतर फैसला निकाल पाते हैं। ठीक है? अगर आपको टाइम टेबल बनाना है तो ऐसी थोड़ी ना बना लोगे। आप पहले देखोगे सब्जेक्ट कितने हैं, मेरे पास कितना टाइम है, कितने महीने रह गए हैं। तो मतलब बहुत ज्यादा
35:17 दिमाग लगाना पड़ता है। इसमें हमारी मेंटल एक्सरसाइज हो जाती है। ठीक है? चौथा है डायनेमिक। डायनामिक का मतलब होता है जिसमें चेंजेस आते रहते हैं। अगर हो सकता है कल को सिचुएशन बदली तो प्लानिंग भी तो बदली जा सकती है ना। आपने प्लान बनाया था कि कल घूमने जाएंगे। लेकिन हो सकता है कल को बहुत तेज बारिश हो जाए तो आप अपना प्लान चेंज भी तो कर सकते हो। तो प्लानिंग क्या है? डायनेमिक है। ऐसी बिजनेस वाले भी कर सकते हैं। वो सोच रहे थे कल क्या करेंगे? हम उस वाली कंपनी के साथ कॉन्ट्रैक्ट करेंगे। पर हो सकता है उन्हें और ज्यादा अर्जेंट काम आ जाए। तो प्लानिंग डायनेमिक होती है जो आए दिन आए दिन बदल सकती है। अब हमारा टॉपिक है प्रोसेस ऑफ प्लानिंग। मतलब कि प्लानिंग करते वक्त कौन-कौन से स्टेप्स को फॉलो करना पड़ता है। वो कौन-कौन से स्टेप्स होते हैं जो प्लानिंग में लेने पड़ते हैं। तो जैसे एग्जांपल से समझते हैं। जैसे मान लेते हैं हिना का ना एक फैशन स्टोर है जिसकी जो सेल्स है वो घटती जा रही है, घटती जा रही है, घटती जा रही है। जिसके लिए हिना क्या
36:02 चाहती है? प्लानिंग करना चाहती है। तो सबसे पहले वो कौन-कौन से स्टेप्स लेगी प्लानिंग को करने के लिए? सबसे पहले ना वो प्लान को बनाने के लिए ही प्लानिंग करेगी। कहने का मतलब सबसे पहले वो अपने मैनेजमेंट से बात करेगी। उनको समझाएगी प्लानिंग की कितनीेंस है। ठीक है? फिर मीटिंग कंडक्ट करी जाएगी। ट्रेनिंग टीम, प्लानिंग टीम इन सबको बनाया जाएगा। क्योंकि इन्हें प्लानिंग करनी है ना। इसलिए तो हम ये टीम बना रहे हैं। तो अपने हिसाब से हिना ने बहुत अच्छे से मीटिंग कर ली, बात कर ली कि उन्हें बता दिया कि हमें क्या करना है? अपनी सेल्स को बढ़ाना है। तो प्लानिंग को करने के लिए हमने क्या बना लिया? प्लान बना लिया। फिर हिना क्या करेगी? इंटरनल सिचुएशंस को देखेगी। बिज़नेस के अंदर झांक कर देखेगी। पूरे बिजनेस को अच्छे से स्कैन करेगी कि उसकी स्ट्रेंथ क्या है? वीकनेस क्या है? उसका स्टाफ अच्छा है या नहीं है? उसके पास पैसा है, उसके पास अच्छे प्रोडक्ट्स हैं। उसकी जो शॉप की लोकेशन है वो अच्छी है, फैसिलिटीज अच्छी है या नहीं है? ठीक है? उसका प्रमोशन वगैरह वीक तो
36:48 नहीं है। स्टाफ को कस्टमर के साथ डील करना आता है या नहीं आता? ये सारी चीजों को उसने देख लिया। अब वो देखेगी एक्सटर्नल एनवायरमेंट को। मतलब बाहर का जो एनवायरमेंट है, उसके कस्टमर कौन-कौन है? कॉम्पटीिट कितने हैं? मार्केट में क्या ट्रेंड चल रहा है? गवर्नमेंट ने कोई ऐसा रूल्स रेगुलेशन तो नहीं बना दी जिससे उसके बिज़नेस पर बात आ जाए। उसका बिजनेस खराब हो जाए। टेक्नोलॉजी तो अपग्रेड नहीं हुई। ये सारी चीजें हिना चेक करने वाली है। ठीक है? उसने देख लिया कि सामने जो कॉम्पिटिट है ना भाई डिस्काउंट ऑफर कर रहा है। तो उसने डिसाइड कर लिया कि मेरे में क्या कमियां है और क्या स्ट्रेंथ है। ठीक है? अब वो वो एरिया डिसाइड करेगी जिस-जिस एरिया में प्लानिंग करने की जरूरत है। ठीक है? तो उसने यह पाया कि हमारा जो प्रमोशन करने का तरीका है ना वो बहुत ज्यादा इंप्रूव करने की जरूरत है। बहुत ज्यादा ही वीक है। हमें फेस्टिवल कलेक्शन लाने पड़ेंगे क्योंकि त्यौहार आ रहे हैं। कस्टमर को बेटर सर्विस प्रोवाइड करनी
37:34 पड़ेगी। इन सारी चीजों को करने के बाद ही सेल्स बढ़ सकती है। तो जिस भी एरिया में उसे कमी लगी उसके रिगार्डिंग उसने प्लांस बना लिए। ठीक है? अब उसके पास बहुत सारे प्लांस हैं। ठीक है? उसके पास बहुत सारे अल्टरनेटिव हैं, रास्ते हैं अपने सेल्स को बढ़ाने के लिए। हो सकता है वह 20% डिस्काउंट दे दे। हो सकता है वो Instagram पर ऐड चलवा दे। हो सकता है वो ऑनलाइन डिलीवरी स्टार्ट कर दे। ठीक है? या फिर फेस्टिव एग्बिशन वगैरह मेला वगैरह लगा ले। ठीक है? तो उसके पास बहुत सारे रास्ते हैं। अब क्या कर रही है? हर एक रास्ते को चूज़ करने के लिए कंपेयर कर रही है कि कौन सा फायदेमंद रहेगा या नहीं रहेगा। इवैल्यूएट कर रही है। सबके फायदे और नुकसान देख रही है। कौन से रास्ते को चूज़ करने के बाद हिना को सबसे ज्यादा फायदा होने वाला है। तो उसने अच्छे से कंपेयर करने के बाद डिसाइड कर लिया और यहां पे प्लांस को फॉर्मुलेट कर दिया। ठीक है? लॉन्ग टर्म गोल को छोटे-छोटे प्लांस में
38:21 डिवाइड कर लिया। एक बड़ा गोल को पूरा करने के लिए सेल्स बढ़ाने के लिए उसने छोटे-छोटे गोल्स बना लिए। छोटे-छोटे प्लांस बना लिए। उसने सोचा कि एक महीने तो हम Instagram पर ऐड चलाने वाले हैं जमकर। दूसरा उसने सोचा कि फेस्टिवल कलेक्शन लाने वाले हैं। तीसरा उसने सोचा कि भैया हम तो डिस्काउंट ऑफर करने वाले हैं। और यहां क्या करेगी? लास्ट वाले पॉइंट में इन प्लान को एग्जीक्यूट कर देगी, इंप्लीमेंट कर देगी। यहां से डिस्काउंट देना शुरू कर देगी। Instagram पे ऐड चलाना शुरू कर देगी। तो यहां पर प्लान को इंप्लीमेंट कर दिया। तो ये सारे स्टेप्स फॉलो करने पड़ते हैं जब हम प्लानिंग कर रहे होते हैं। अब प्लानिंग के प्रिंसिपल्स के बारे में बात करते हैं। तो पहला प्रिंसिपल कहता है कि मैनेजमेंट का इंटरेस्ट भी जरूर होना चाहिए। ऐसा नहीं है कि एंप्लई को तो बोलते जा रहे हो सेल्स बढ़ाओ, सेल्स बढ़ाओ, सेल्स बढ़ाओ। लेकिन खुद का इंटरेस्ट ही नहीं है। खुद कुछ कर नहीं रहे हो। सबसे पहले तो आपको ही सोचना पड़ेगा ना अपने स्टोर के बारे में कि आपको कौन-कौन से प्लान लेकर आने हैं? क्या-क्या चीजें करनी है। ठीक है? तभी तो आप अपने एंप्लई को गाइड कर पाओगे। तो मैनेजमेंट का इंटरेस्ट होना जरूरी है। तो प्लानिंग कहां से शुरू
39:08 होनी चाहिए? टॉप मैनेजमेंट से शुरू होनी चाहिए। दूसरा प्रिंसिपल होता है लॉन्ग रेंज व्यू का। मतलब हमें दूर की सोचनी चाहिए। दूर की देखनी चाहिए। आज जो हम फैसला ले रहे हैं उससे फ्यूचर रिजल्ट क्या होने वाले हैं? फ्यूचर में क्या अच्छी चीजें होंगी? क्या बुरी चीजें होंगी? क्या वो हमारे बिजनेस को इफेक्ट करेंगी या नहीं करेंगी? वो भी हमें सोचना है। आज तो हम क्योंकि कुर्तीज़ बहुत बिक रही है तो हम सस्ता कपड़ा लाकर जल्दी-जल्दी बेच रहे हैं। लेकिन क्या इससे हम लॉन्ग टर्म तक मार्केट में सर्वाइव कर पाएंगे? अगर ऐसी ही खराब क्वालिटी का प्रोडक्ट अपने कस्टमर को बेचते रहेंगे। तो हमें सोच कर चलना है कि फ्यूचर रिजल्ट क्या हो सकता है। तीसरा हमें हमेशा ऐसे प्लान बनाने चाहिए जो ऑर्गेनाइजेशन के ऑब्जेक्टिव को पूरा करने के लिए हो। ठीक है? अगर कोई भी उनका गोल से कनेक्शन नहीं है ना तो फिर वो प्लान किसी फायदे के नहीं है। चौथा प्रिंसिपल है सबसे पहले हमें प्लानिंग को प्रीिमिसी देनी है। मतलब किेंस देनी है। आपको तो पता ही है मैनेजमेंट के जितने भी फंक्शनंस परफॉर्म किए जाते हैं उसमें से सबसे पहले
39:55 प्लानिंग की जाती है। तो प्लानिंग सबसे इंपॉर्टेंट फंक्शन माना जाता है। अब हमारे टॉपिक का नाम है डिसीजन मेकिंग। नाम से ही समझो डिसीजन मेकिंग। मतलब कि डिसीजन लिया जा रहा है। मान लेते हैं हमारे पास एक प्रॉब्लम है। उस प्रॉब्लम को सॉल्व करने के लिए हमारे पास तीन ऑप्शंस हैं। ऑप्शन ए, ऑप्शन बी, ऑप्शन सी। तो जब हमारे पास इतने सारे ऑप्शंस हैं उनमें से सारे ऑप्शन को कंपेयर करते हुए एक बेस्ट को जब हम चूज़ करते हैं, बेस्ट कोर्स ऑफ एक्शन चुनते हैं, तो उसे क्या कहते हैं? डिसीजन मेकिंग। डिसीजन मेकिंग अगर मैं एक लाइन में कहूं, तो सही सोच समझ कर चॉइस करना ही डिसीजन मेकिंग होता है। ठीक है? अब देखो, यह डिसीजन मेकिंग का प्रोसेस दे रखा है जिसको अभी हम नेक्स्ट पेज पर पढ़ने वाले हैं। और देखो डिसीजन मेकिंग से क्या होता है? जब हम सही फैसला चुनते हैं। ठीक है? बेस्ट कोर्स ऑफ एक्शन चुनते हैं तो ऑर्गेनाइजेशन की जो प्रॉब्लम है वो सॉल्व हो पाती है। हमारे रिसोर्सेज अच्छे से यूज़ हो पाते हैं और कंपनी अपने ऑब्जेक्टिव को
40:41 सक्सेसफुली अचीव कर पाती है। चलो अब डिसीजन मेकिंग का प्रोसेस पढ़ लेते हैं। तो डिसीजन मेकिंग प्रोसेस में अलग-अलग स्टेप्स दिए गए हैं। तो पहला स्टेप होता है प्रॉब्लम को पहचानना। तभी तो हम एक अच्छा फैसला ले सकते हैं जब हमें प्रॉब्लम पता होगी। तो सबसे पहले प्रॉब्लम क्या है? उसको रिकॉग्नाइज करो। एक्चुअल प्रॉब्लम को पहचानो। हमें प्रॉब्लम क्लियरली डिफाइन होनी चाहिए। अच्छा हमारी सेल्स गिर रही है तो प्रॉब्लम क्या है? सेल्स गिरना है। फिर हम क्या करेंगे? उसके लिए अलग-अलग ऑप्शन सर्च करेंगे। अलग-अलग अल्टरनेटिव सर्च करेंगे। ए ऑप्शन, बी ऑप्शन, सी ऑप्शन, डी ऑप्शन कि सेल्स को कैसे बढ़ाया जा सकता है? उसके क्या-क्या सॉल्यूशन निकल के आ सकते हैं। ऐड चला सकते हैं, ऑफर दे सकते हैं। नए-नए प्रोडक्ट को लॉन्च कर सकते हैं। इनसे हमारी सेल्स बढ़ सकती है। ठीक है? अब हम इन सारे ऑप्शन को इवैल्यूएट करेंगे। आपस में कंपेयर करेंगे कि सबके क्या फायदे हैं और क्या नुकसान है और उसको
41:26 अगर हम चूज़ करते हैं तो उसमें कितनी कॉस्ट लगने वाली है। कितना हमारा रिस्क होने वाला है। ठीक है? ये सारी चीजों को इवैल्यूएट करके अच्छे से एक बेस्ट एक बेस्ट फैसले को निकाल लेंगे। एक बेस्ट चीज को चूज़ कर लेंगे। तो हमने क्या कर लिया? डिसीजन मेकिंग कर लिया। ठीक है? हमने एक बेस्ट ऑप्शन को सेलेक्ट कर लिया। हमारे लिए बी ऑप्शन जो है फाइनल डिसीजन होने वाला है। हम क्या करने वाले हैं? सेल्स को बढ़ाने के लिए नए प्रोडक्ट ल्च करने वाले हैं। ऐसा हमने सोच लिया। अब क्या कर देंगे? उस चीज को इंप्लीमेंट कर देंगे। ठीक है? है जो डिसीजन हमने लिया है प्रोडक्ट ल्च करने का उसको एक्शन में ले आएंगे और उसके लिए जो भी नेसेसरी रिसोर्सेज चाहिए होंगे नई-नई मशीनें चाहिए होंगी नए प्रोडक्ट को बनाने के लिए रॉ मटेरियल चाहिए होगा उसको इकट्ठा करेंगे और उस फैसले को इंप्लीमेंट कर देंगे इंप्लीमेंट करने के बाद चेक करेंगे जो हमने फैसला लिया था सेल्स बढ़ाने का हम क्या करने वाले थे नए-नए फ्लेवर के प्रोडक्ट को लॉन्च करने वाले थे तो क्या
42:11 उससे सेल्स बढ़ी या नहीं बढ़ी तो ये लास्ट में हम चेक करेंगे कि सेल्स बढ़ी है या नहीं तो उसे बोलेंगे फॉलो अप करना ठीक है चलिए अब हमारा नेक्स्ट टॉपिक है ऑर्गेनाइजेशन स्ट्रक्चर देखो ये इंपॉर्टेंट नहीं है। लेकिन क्योंकि मुझे सिर्फ और सिर्फ आगे चलके आपको डिफरेंस पढ़ाने हैं अलग-अलग स्ट्रक्चर के बारे में। इसलिए थोड़ा सा मीनिंग पढ़ लेते हैं कि ऑर्गेनाइजेशन स्ट्रक्चर होता क्या है? देखो नाम से ही समझ नहीं आ रहा। नाम से ही क्लियर हो रहा है ऑर्गेनाइजेशन का स्ट्रक्चर। मतलब हम किसके बारे में बात कर रहे हैं? ऑर्गेनाइजेशन के स्ट्रक्चर के बारे में बात कर रहे हैं कि वहां पर कौन किसके ऑर्डर को फॉलो करता है? कितने डिपार्टमेंट है? किसकी क्या पोजीशन है? स्ट्रक्चर क्या है पूरी ऑर्गेनाइजेशन का? ठीक है? और एंप्लई के बीच में और मैनेजमेंट के बीच में रिश्ते कैसे हैं? कौन किसको रिपोर्ट करता है? कौन किसके ऑर्डर को फॉलो करता है। बस इसी पैटर्न ऑफ रिलेशनशिप को हम क्या बोलते हैं? ऑर्गेनाइजेशन का स्ट्रक्चर बोलते हैं कि
42:56 कौन करने वाला है, किसके लिए करने वाला है। ये सारी बातें किस में आ गई? ऑर्गेनाइजेशन स्ट्रक्चर में आ गई। बात कर रहे हैं फॉर्मल ऑर्गेनाइजेशन और इनफॉर्मल ऑर्गेनाइजेशन के डिफरेंस के बारे में। तो मैनेजमेंट ने जो स्ट्रक्चर बना रखा है अपनी ऑर्गेनाइजेशन में कौन किसकी बात सुनेगा? किसके लिए काम करेगा? किसके ऑर्डर फॉलो करेगा? वो पूरा जो स्ट्रक्चर है ना ऑफिशियल तरीके से जो बनाया गया है उसको हमने क्या बोल दिया? फॉर्मल ऑर्गेनाइजेशन बोल दिया। जहां पर सब कुछ फिक्स्ड है। किसकी क्या जॉब है, किसकी क्या ड्यूटी है, किसके पास कितनी अथॉरिटी है? और कौन-कौन से रूल को किस-किस को फॉलो करना है। ठीक है? तो यहां पर ऑफिशियली मैनेजमेंट ने जो ऑर्गेनाइजेशन जानबूझकर बना रखी है, उसे हमने बोल दिया फॉर्मल। अब बात करें इनफॉर्मल के बारे में तो आपको तो पता ही होगा अगर ऑफिस वगैरह में आप काम करते होंगे तो एक ऑफिस के अंदर जब लंच होता है, लंच करने बैठे हो तो आपस में दोस्त-वोस्त
43:42 तो यूं ही बन जाते हैं ना। एक ग्रुप फॉर्म हो जाता है। ठीक है? तो फॉर्मल ऑर्गेनाइजेशन के अंदर एक ग्रुप बन जाता है जिसमें बातचीत होती है। दोस्त बन जाते हैं। आपस में एक दूसरे से बात कर लेते हैं। किसी भी टॉपिक पर कैजुअली बात कर लेते हैं। ठीक है? तो उसको क्या बोलते हैं? इनफॉर्मल ऑर्गेनाइजेशन बोलते हैं। तो हमें बहुत अच्छे से समझ में आ गया ये एक ऐसा नेचुरल ऑर्गेनाइजेशन का फॉर्म है जहां पर एक ग्रुप बना लिया गया है। एंप्लई ने खुद बनाया है। अपनी बातचीत वो करता है दोस्ती के लिए। ठीक है? उसको हमने बोल दिया इनफॉर्मल। और यहां पे हमें पता है कि ये मैनेजमेंट ने बनाया काम को करने के लिए। सबको सबकी ड्यूटी बता दी। कौन किसके अंडर आएगा, कौन किसको रिपोर्ट करेगा। ठीक है? चलिए अब इसके डिफरेंस के बारे में पढ़ लेते हैं। तो हमें समझ में आ गया इसको किसने बनाया? मैनेजमेंट ने। इसको किसने बनाया? एंप्लाइजस ने। ठीक है? ये क्यों बनाया गया है? ताकि सब लोग अपना काम करें। ऑर्गेनाइजेशन के गोल पूरे हो सके। और ये क्यों बनाया गया है? ये दोस्ती यारी में अपने आप बन जाता है। खानावाना खा रहे हैं। आपस में बातें कर ली। गसिप्स कर लिए।
44:27 मनोरंजन हो गया। ठीक है? और इसका स्ट्रक्चर क्या होता है? यहां पे फिक्स्ड रूल होते हैं। प्रॉपर हायरार्की होती है। कौन किसके आदेश को मानने वाला है? कौन किसको रिपोर्ट देने वाला है? ये सारी चीजें फिक्स्ड है। रूल्स रेगुलेशन यहां पे फिक्स्ड है। लेकिन यहां पर कोई भी रूल फिक्स्ड नहीं होता। यह तो खुद एंप्लई ने अपने आप बना लिया है। ठीक है? यहां पर फॉर्मल कम्युनिकेशन होती है। बिनेस के रिलेटेड कम्युनिकेशन होती है कि अच्छा ये वाला टारगेट पूरा करना है। डेडलाइन दी जाती है। मैनेजर डेडलाइन देगा कि तुम्हें इतना-इतना काम करना है। ऐसे-ऐसे करना है। अगर तुम्हें लीव लेनी होगी तो उसके लिए भी प्रॉपर प्रोसेस को फॉलो करना पड़ेगा। तो यहां पर जो कम्युनिकेशन हो रही है वो फॉर्मल हो रही है। लेकिन यहां पर तो हम कुछ भी बातें कर सकते हैं। तुझे पता चला प्रिया की ना शादी हो रही है वो भी उसके एक्स के साथ। हां ये होती है इनफॉर्मल कम्युनिकेशन जो अपने आप ग्रुप में हो जाती है। ठीक है? चलिए अब बात कर लेते हैं थोड़ा से डिफरेंस के बारे में। देखो तीन
45:14 टाइप्स के बारे में पढ़ने वाले हैं हम। तीन टाइप के स्ट्रक्चर के बारे में पढ़ने वाले हैं। ऑर्गेनाइजेशन के अंदर तीन टाइप्स के स्ट्रक्चर। एक होता है फंक्शनल, एक होता है लाइन, एक होता है लाइन एंड स्टाफ ऑर्गेनाइजेशन। ठीक है? चलो अब मैं तीनों को बहुत अच्छे से बहुत प्यार से मजेदार तरीके से पढ़ाती हूं। अब देखो नाम से ही समझ में आ रहा है। जो ऑर्गेनाइजेशन बहुत ज्यादा बड़ी होती है जिसमें बहुत सारा काम होता है, बहुत सारे फंक्शन होते हैं। ठीक है? है तो उसके स्ट्रक्चर को इजी बनाने के लिए हम फंक्शन वाइज अपने ऑर्गेनाइजेशन स्ट्रक्चर को डिवाइड कर देते हैं। कहने का मतलब हर काम को करने के लिए अलग-अलग डिपार्टमेंट बना देते हैं। ठीक है? जैसे हमने फाइनेंस के लिए जितना भी पैसों वाला काम होगा वो फाइनेंस डिपार्टमेंट संभालेगा। मार्केटिंग से रिलेटेड कोई काम होगा मार्केटिंग डिपार्टमेंट संभालेगा। ठीक है? एचआर वाले जितने भी काम होते हैं ना एंप्लाइजस को लेकर आना उनका सिलेक्शन करना वो एचआर डिपार्टमेंट संभाल लेगा और प्रोडक्शन से रिलेटेड काम प्रोडक्शन डिपार्टमेंट संभाल लेगा। मतलब हर काम को करने के लिए हमने
46:01 अलग-अलग डिपार्टमेंट बना दिए और उस डिपार्टमेंट को संभालने के लिए उसमें एक हेड बना दिया। ठीक है? जिसको हम क्या बोलते हैं? एक्सपर्ट मैनेजर बोलते हैं। तो मतलब हर एक डिपार्टमेंट का क्या है? एक एक्सपर्ट मैनेजर है। हेड है जो उस पूरे डिपार्टमेंट को संभालने वाला है। तो समझ में आया? फंक्शन के हिसाब से हमने अपनी ऑर्गेनाइजेशन को डिवाइड कर दिया है। छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ दिया है जिससे काम जो है वो आसान हो जाए। ठीक है? और उसमें एक हेड भी प्लेस कर दिया है कि वो पूरे डिपार्टमेंट को संभाल ले। अब बात करें लाइन ऑर्गेनाइजेशन के बारे में। तो लाइन ऑर्गेनाइजेशन देखो नाम से ही समझो। इसमें कैसा स्ट्रक्चर होने वाला है? लाइन एक लाइन की फॉर्म में स्ट्रक्चर होने वाला है। जैसे जो ऑर्गेनाइजेशन बहुत बड़ी नहीं होती जिसमें ज्यादा काम नहीं होता ना उसमें ना एक लाइन के थ्रू काम हो जाता है। कहने का मतलब ये ओनर भाई साहब हो गए। ठीक है? इनके अंडर में मैनेजर आ गए। मैनेजर के अंडर में सुपरवाइजर आ गए। सुपरवाइजर के अंडर में सारे वर्कर आ गए। ठीक है? तो
46:47 हमें समझ में आ गया कि यहां पर जो स्ट्रक्चर है वो लाइन वाइज है। ठीक है? यहां पर अथॉरिटी सबसे ज्यादा इनके पास होगी। फिर उससे कम अथॉरिटी इनके पास होगी। ऐसे ही काम को बांटा जा रहा है। काम को किया जा रहा है। एक लाइन वाइज स्ट्रक्चर है। उसको हमने बोल दिया लाइन ऑर्गेनाइजेशन। एक होती है लाइन एंड स्टाफ। देखो ये जो लाइन वाली है ना वही इसमें भी होती है। लाइन में ही होती है। लेकिन यहां पर ना बीच-बीच में एक्सपर्ट्स होते हैं। बीच-बीच में क्या होते हैं? एक्सपर्ट होते हैं। जैसे कि यहां पर जैसे कि ये रहा लाइन में यहां पर और यहां पर एक्सपर्ट होंगे। ठीक है? एक्सपर्ट होंगे जो ओनर को गाइड करने का काम करेंगे। ठीक है? ओनर को सही फैसला लेने का काम करेंगे। क्योंकि एक्सपर्ट तो एक्सपर्ट होता है। एक एचआर एक्सपर्ट होगा जो हायरिंग प्रोसेस में मदद कर रहा होगा। एक फाइनेंस का एक्सपर्ट होगा जो बजट बनाने में मदद कर रहा होगा। एक लीगल एक्सपर्ट होगा जो रूल्स रेगुलेशन के बारे में सारे लॉ के बारे में समझा रहा होगा ओनर को जिससे क्या होता है काम और
47:33 ज्यादा परफेक्ट तरीके से होता है क्योंकि अब हमारे पास एक्सपर्ट है सलाह मशवरा के लिए। ठीक है? अभी तक तो हमने मीनिंग पढ़ ली। चलिए अब पढ़ लेते हैं डिफरेंस के बारे में। तो सबसे पहला पॉइंट है अथॉरिटी। मतलब बात कर रहे हैं हम पावर के बारे में। तो यहां पर ना हर डिपार्टमेंट के हेड को अपने डिपार्टमेंट के लिए पावर दी गई है। तो मतलब स्पेशलिस्ट फंक्शन के हिसाब से उनको अथॉरिटी दी गई है। और यहां पर अथॉरिटी कैसे होती है? लाइन में होती है। सबसे ज्यादा अथॉरिटी इनके पास होगी। उससे कम इनके पास, उससे कम इनके पास। और यहां पर भी वैसा ही होता है। ठीक है? अथॉरिटी सबसे ज्यादा ऊपर वाले के पास होती है। ठीक है? लेकिन यहां पर जो बीच-बीच में एक्सपर्ट है ना उनका अपना काम है एडवाइस करने का। उनको गिना ही नहीं जा रहा। उनका काम है बस एडवाइस देना। ठीक है? अब दूसरा होता है कमांड। कमांड का मतलब कि किसके ऑर्डर को कौन फॉलो करने वाला है। तो यहां पर जो डिपार्टमेंट का हेड होगा ना वो अपने डिपार्टमेंट के सभी मेंबर को ऑर्डर देगा और वो लोग इसकी बात को माननी पड़ेगी। और यहां पर यहां पर जो हमें ऑर्डर मिलता है
48:20 ना अपने ऊपर वाले से मिलता है। वर्कर को सुपीरियर से मिलेगा, सुपीरियर को मैनेजर से मिलेगा और मैनेजर को ओनर से मिलेगा। और यहां पर भी सेम चीज चलती है। अब बात करें थर्ड पॉइंट के बारे में तो ना यहां पर ना स्पेशलाइजेशन स्पेशलाइजेशन का मतलब होता है बहुत ज्यादा हम हमारे काम में एक्सपर्ट हैं। स्पेशलाइज्ड हैं। ठीक है? तो यहां पर ना क्योंकि हमें पता है कि हर एक डिपार्टमेंट के लिए अलग-अलग हेड है। तो यहां पर स्पेशलाइज जो एक्सपर्टीज होती है वो बहुत ज्यादा होती है। हर एक डिपार्टमेंट का हेड एक्सपर्ट होता है। तभी तो हम उसको क्या बोल रहे हैं? एक्सपर्ट मैनेजर बोल रहे हैं। ठीक है? यहां पर स्पेशलाइजेशन थोड़ी कम होती है क्योंकि मैनेजर को जो एक मैनेजर होता है बेचारा उसको बहुत सारे काम होते हैं। तो वो इतना काम को संभाल नहीं पाता। अपनी फील्ड में एक्सपर्ट नहीं होता। उसे बहुत सारे काम देखने होते हैं। और यहां पर बहुत ज्यादा ही बहुत ज्यादा ही सबसे ज्यादा ही स्पेशलाइजेशन होता है। क्योंकि यहां पर तो भाई काम को परफेक्ट बनाने के लिए हमारे
49:05 स्टाफ बैठा है ना एक्सपर्ट बैठे हैं ना जिनको सिर्फ और सिर्फ एडवाइस देने के लिए ही हायर किया गया है। यहां पर डिसीजन कौन लेगा? हर डिपार्टमेंट का हेड लेगा। ठीक है? अपने-अपने डिपार्टमेंट के हेड जो होते हैं अपने-अपने डिसीजन ले लेते हैं। यहां पे लाइन मैनेजर जो सबसे टॉप पर होता है वो डिसीजन लेता है और यहां पर डिसीजन लेने का काम मैनेजर का ही होता है। टॉप वालों का ही होता है। लेकिन वो थोड़ी सी एडवाइस ले लेते हैं। सलाह मशवरा ले लेते हैं क्योंकि एक्सपर्ट को रखा ही इसलिए गया है कि वो बेहतर फैसले ले सके। ठीक है? और लास्ट है सूटेबिलिटी। तो ये वाला जो स्ट्रक्चर है वो बड़े-बड़े बिज़नेस के लिए सही है। यह स्मॉल बिज़नेस के लिए सही है और यह उन लोगों के लिए सही है जहां पर एक्सपर्ट की गाइडेंस की जरूरत होती है। बिज़नेस लॉस में जा रहे हैं और एडवाइस की बहुत ज्यादा जरूरत है। ठीक है? अब हमारे टॉपिक का नाम है कम्युनिकेशन। जब दो लोग आपस में बातें करते हैं ना अपने आइडियाज को, अपनी इंफॉर्मेशन को, अपने थॉट्स को, अपनी फीलिंग को आपस में शेयर करते हैं और दोनों
49:50 ही एक दूसरे की बात को समझ पाते हैं। दोनों के पास कॉमन अंडरस्टैंडिंग होती है तो इस प्रोसेस को हम क्या बोलते हैं? कम्युनिकेशन बोलते हैं। इसमें क्या हो रहा है? इंफॉर्मेशन को एक्सचेंज किया जा रहा है। जो बात इस वाले के पास है वो इस वाले तक पहुंच रही है। ठीक है? और यहां पर कम्युनिकेशन प्रोसेस का मतलब ही यही है कि रिसीवर ने बात को समझ लिया है। करेक्ट वे में समझ लिया है। ठीक है? तभी हम कहते हैं कि कम्युनिकेशन जो प्रोसेस है वह पूरा हो गया है। अब बात करें इसके फीचर के बारे में तो यह दो वे प्रोसेस है। कहने का मतलब इसमें दो लोग होते हैं। एक सेंडर मैसेज देने वाला एक होता है रिसीवर मैसेज को सुनने वाला। ठीक है? इसमें क्या किया जाता है? इनफेशन को एक्सचेंज किया जाता है। आपस में बात को रखी जाती है। अपने आइडियाज को, अपने फैक्ट्स, अपनी फीलिंग को शेयर किया जाता है। और सामने वाला सुनने के बाद दोनों के पास कॉमन अंडरस्टैंडिंग होती है। वो बात को समझ पाता है कि सेंडर कहना क्या चाहता है और ये एक कंटीन्यूअस प्रोसेस है।
50:35 बिज़नेस के अंदर ये चीजें होती रहती है। अब मुझे एक बात बताओ जब ये कंटीन्यूअस प्रोसेस नहीं होगा। क्या एक महीने बिज़नेस बाद करना बंद कर सकता है। ठीक है? उसे तो काम करने ही पड़ेंगे। अपनी सेल्स वगैरह करनी पड़ेगी। अपना बिज़नेस चलाना पड़ेगा। तो हर महीने हर दिन हर घंटे हर मिनट कम्युनिकेशन प्रोसेस चलता ही रहता है। ठीक है? अब बात करते हैं इसके प्रोसेस के बारे में। तो अभी मैंने बताया कम्युनिकेशन प्रोसेस में दो लोग होते हैं। एक सेंडर जो मैसेज दे रहा है और एक रिसीवर जो मैसेज को रिसीव कर रहा है। तो यहां पे सेंडर कौन हो गया? सेंडर वो पर्सन हो गया जो मैसेज दे रहा है। ठीक है? और मैसेज क्या हो गया? मैसेज वो बात हो गई जो रिसीवर तक पहुंचाई जा रही है। वो इंफॉर्मेशन हो गई, वो आईडिया हो गई, वो थॉट हो गई, वो फीलिंग हो गई जो कि कम्युनिकेट की जा रही है। अब थोड़ा सा एग्जांपल भी ले लेते हैं। जैसे मान लेते हैं ये मैनेजर था। ठीक है? मैनेजर के दिमाग में एक बात आई थी कि ना उसे अपने सेल्स स्टाफ को बताना है कि न्यू समर कलेक्शन आ गई है जिस पर उनको 20%
51:22 डिस्काउंट लगाकर बेचना है। ठीक है? तो मैनेजर ने ये मैसेज सोचा था। तो इसको इनकोड किया जाएगा। इनकोड करने का मतलब जो मैनेजर के दिमाग में बात आई है उनको शब्दों में पिरोया जाएगा। सिंबल की फॉर्म में, साइन की फॉर्म में, लैंग्वेज में बदला जाएगा। तभी तो यह बोलेगा जब वो अपने शब्दों को पिरो लेगा। सेंटेंस को फ्रेम कर लेगा तभी तो अपने सेल्स स्टाफ को बताएगा। तो इसे क्या बोलते हैं? इनकोडिंग करना कहते हैं जब हम वही थॉट को वही फीलिंग को शब्दों में पिरो रहे होते हैं। ठीक है? तो इसने सोच लिया चलो भैया मैसेज दे देते हैं। इन्हने सोचा कि अभी तो सेल स्टाफ अपना काम कर रहा है। बाहर गया हुआ है। एक काम करता हूं मैसेज कर देता हूं। ठीक है? तो इन्हने फोन का सहारा लिया। तो मीडिया मीडिया चैनल वो रास्ता हो गया जिसके थ्रू बात को बताया जा रहा है। जिसके थ्रू मैसेज को भेजा जा रहा है। अब वो फेस टू फेस हो सकता है। ठीक है? मैनेजर सेल स्टाफ को फेस टू फेस बोल सकता है। WhatsApp पर मैसेज भेज सकता है। नोटिस भेज सकता है। कुछ भी
52:08 कर सकता है। तो वो चैनल क्या हो गया? मीडिया हो गया। अब देखो चलो मान लेते हैं सेल स्टाफ को मैसेज मिल गया उनके WhatsApp पर मैसेज आ रखा था। अब उन्हें पढ़ना तो पड़ेगा समझना तो पड़ेगा। तो यहां पर जो रिसीवर भाई साहब है मतलब कि जो सेल्स स्टाफ है वो मैसेज को डिकोड करेगा। डिकोड करने का मतलब होता है रिसीवर के मैसेज को समझेगा। ठीक है? कि 20% डिस्काउंट देना है। ठीक है? तो यहां पे रिसीवर कौन? वो पर्सन हो गया जिसको मैसेज WhatsApp पे मिल गया। इसने समझ लिया। डिकोडिंग कर ली। अब इसको समझ में आ गई सारी बातें। अब क्या कर देगा? यह फीडबैक दे देगा। ठीक है? यह मैनेजर को मैसेज करके बोल देगा ओके जी। ओके। मैं 20% सेल्स डिस्काउंट दूंगा। मुझे सारी बातें समझ में आ गई। ठीक है? तो इसे बोलते हैं कम्युनिकेशन का प्रोसेस। अब बात करते हैं बैरियर्स के बारे में। बैरियर्स क्या होते हैं? बैरियर्स का मतलब होता है रुकावटें, परेशानी, वो प्रॉब्लम, वो ऑब्सकल जो आ रहे हैं हमारे कम्युनिकेशन के
52:53 बीच में। ठीक है? जिसकी वजह से जो हमारा
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