0:00 दोस्तों, आप सब ने वो रील्स देखी होंगी जिसमें एक 70 साल की विदेशी महिला मैराथन दौड़ रही है और एक 75 साल का आदमी जिम में वेट उठा रहा है। एक 80 साल की दादी साइकिल चला रही है और हकिंग भी कर रही है। और फिर हम अपने आसपास देखते हैं। हमारे घर में 60 साल की उम्र पर लोग घुटने की शिकायत करने लगते हैं। 65 पर वो सीढ़ियां चढ़ना उनके लिए मुश्किल हो जाता है। और 70 पर बहुत से लोग बिना सहारे के जमीन से उठ भी नहीं पाते हैं। और हमारा जवाब इसमें क्या होता है? अरे उनका खानपान अलग है, उनकी जींस अलग हैं। और हमारे यहां तो ऐसा ही होता है। उम्र हो गई है अब। और दूसरी तरफ हम यह भी कहते हैं कि हमारा खाना तो दुनिया में सबसे अच्छा है। हम घी खाते हैं, हम दूध पीते हैं। हम बाजरे की रोटी खाते हैं। विदेशी लोग तो एक्चुअली पैकेट का खाना खाते हैं। तो आज हम यह देखेंगे कि इन दोनों बातों में से कौन सी बात सच है और
0:48 डाटा आखिर क्या कहता है। और चलिए पहले सबसे आम आंकड़े से शुरू करते हैं। लाइफ एक्सपेक्टेंसी यानी कि एक इंसान एवरेज कितना जीता है। जापान में लाइफ एक्सपेक्टेंसी है करीब 84 साल। यूरोप की ज्यादातर देशों में है 81 से 83 साल। सिंगापुर और साउथ कोरिया में लाइफ एक्सपेक्टेंसी है अराउंड 83 और इंडिया में ये आता है नंबर करीब 70 साल। अब यह एक बड़ा फर्क है कि करीब 13 14 साल का फर्क है एक एवरेज लाइफ एक्सपेक्टेंसी इन इंडिया एस कंपेयर टू अदर कंट्रीज। लेकिन अकेला यह नंबर पूरी कहानी आपको नहीं बताता है। क्योंकि असली सवाल यह नहीं है कि आप कितना लंबा जिएंगे। असली सवाल यह है कि आप कितना ठीक से जिएंगे। आप कितनी क्वालिटी से अपनी लाइफ को जी पाएंगे और उसके लिए एक दूसरा पैमाना है जिसे डब्ल्यूho हेल कहता है हेल्दी लाइफ एक्सपेक्टेंसी। इसका मतलब है
1:33 कि वो साल जो आप पूरी सेहत में या पूरे हेल्दी तरीके से आप जीते हैं। यानी कि वो साल जब आप खुद चल सकते हैं, खुद उठ बैठ सकते हैं। खुद किसी दूसरे पर निर्भर नहीं है। और अब यह नंबर्स अगर आप देखेंगे तो यह नंबर साउथ सिंगापुर में आता है 73.6 साल जापान में आता है 73.4 साउथ कोरिया में नंबर आता है 72.5 और यह दुनिया में सबसे ऊपर वाली कंट्रीज है जहां पर बिना किसी सपोर्ट के ये लोग अपना जीवन जी लेते हैं और दुनिया का एवरेज हेल करीब 63.7 साल है। और इंडिया का हेल करीब आता है 60 साल के आसपास। अब इन दोनों नंबर्स को साथ रखिए और एक नया नंबर निकालिए। लाइफ एक्सपेक्टेंसी माइनस हेल यानी कि वो साल जो आप बीमारी, कमजोरी या किसी पर निर्भर होने में बिता देते हैं। जापान में करीब
2:19 आता है 10 साल और वह भी एक लंबी 84 साल की जिंदगी के आखिरी या अंतिम पड़ाव में और इंडिया में करीब है 10 साल है। लेकिन 70 साल की जिंदगी में आ जाता है। और यही असली फर्क है कि एक जैपनीज अपनी जिंदगी के 73 साल पूरी हेल्दी तरीके से बिताता है और एक इंडियन वो करीब सिर्फ 60 ही साल इसमें बिताता है। यानी कि वह हमसे ज्यादा नहीं जीता है। वो हमसे ज्यादा साल खड़े होकर जीता है या ज्यादा साल बेटर क्वालिटी ऑफ लाइफ के साथ जीता है। और यह बात समझने के लिए अब हम उस डाटा पर चलते हैं जो शायद सबसे इंपॉर्टेंट है और जो हमारे अपने देश का ही है। इसका नाम है लासी यानी कि लोंगिट्यूडनल एजिंग स्टडी इन इंडिया। यह इंडिया का सबसे बड़ा बुजुर्गों पर किया गया एक स्टडी है जिसमें 60 साल के ऊपर के करीब 28,000 से 31,000 लोगों का एनालिसिस किया गया और इसमें सिर्फ सवाल नहीं पूछे
3:06 गए। उनकी ताकत को नापा गया। उनकी वॉक को नापा गया और उनकी ग्रिप को नापा गया और नतीजा यह था कि इंडिया में 60 साल से ऊपर के करीब 30% लोग फेल थे यानी कि शारीरिक रूप से कमजोर और उस मेडिकल परिभाषा के हिसाब से जिसे दुनिया भर में इस्तेमाल किया जाता है। मर्दों में ये करीब 27% था और औरतों में करीब 32% यानी कि हमारे हर तीन बुजुर्ग में से एक और अब वो तथ्य जो सबसे ज्यादा चुभता भी है कि डब्ल्यूho के एक इंटरनेशनल रिसर्च में छह डेवलप छह डेवलपिंग कंट्रीज की तुलना की गई उनमें थे चाइना घाना मेक्सिको रशिया साउथ अफ्रीका और इंडिया और उन छह में से फ्रेल्टी के मामले में सबसे ऊपर आता है इंडिया और आदमी और औरत के बीच का फर्क भी इंडिया में ही सबसे ज्यादा है। अब इस फ्रेल के अंदर के
3:52 हिस्से देखिए क्योंकि वही असली जवाब आपको मिल जाएगा। फ्रेल पांच चीजों से नापी जाती है। पहला थकान, दूसरा वजन का गिरना, तीसरा ग्रिप की ताकत या आपकी कितनी स्ट्रेंथ है ग्रिप में। चौथा चलने की रफ्तार और पांचवा कि आपकी फिजिकल एक्टिविटी कैसी है? और लासी में सबसे ज्यादा किस चीज में कमी मिली? एक्चुअली आदमियों में सबसे ज्यादा कम मिला ग्रिप स्ट्रेंथ। करीब 79% आदमियों की पकड़ जो थी वह कमजोर थी या उनके हाथ से ग्रिप जो पकड़ते हैं वह बहुत कमजोर और 75% से ऊपर के ग्रुप में यह 95% तक पहुंच चुकी थी और औरतों में फिजिकल एक्टिविटी को माना गया कि बहुत कम आए। करीब 82% औरतों में उस पैमाने पर कम एक्टिव निकली और सबसे बूढ़े ग्रुप में यह नंबर था 93%। अब एक्चुअल नंबर्स को देखिए। लासी में हैंड ग्रिप स्ट्रेंथ मशीन से नापी गई। इंडिया में 60
4:39 साल से ऊपर के मर्दों की एवरेज ग्रिप्स थी 32.26 कि.ग्र. और औरतों की थी 23.70 और इस ग्रिप स्ट्रेंथ का मतलब सिर्फ हाथ की ताकत नहीं है। दुनिया भर की रिसर्च मानती है कि ग्रिप स्ट्रेंथ पूरे शरीर की ताकत का सबसे एक भरोसेमंद पैमाना है और वो आगे चलकर बीमारी, गिरने और यहां तक कि जीवन की लंबाई तक का एस्टीमेट दे देता है। यानी कि वो एक छोटा सा नंबर पूरे शरीर का रिपोर्ट कार्ड होता है। अब हड्डियों पर आ जाते हैं और यहां आंकड़े और भी साफ हैं। एक इंडियन रिसर्च में अलग-अलग उम्र की औरतों में ऑस्टियोपोसिस देखा गया। उसका नतीजा था 30 से 39 साल में 3% ऑस्टियोपोसिस 40 से 49 साल में 3.4 और 50 टू 59 साल में अचानक 14.3% 60 टू 69 में 18.6% और 70 साल के
5:24 बाद यह नंबर चला जाता है 36.4% यानी कि 50 के बाद एकदम से आपके डिक्लाइन करने लगती है और ऑस्टियोपरोसिस आपका बढ़ता जाता है। और अब एक दूसरे बड़े इंडियन रिसर्च के नतीजा और भी गंभीर था। उसके मुताबिक करीब हर दूसरे एडल्ट को ऑस्टियोपीनिया है। यानी कि हड्डियों का कमजोर होना और हर पांच में से एक को ऑस्टियोपरोसिस है। मेनोपॉज के बाद की करीब 1/3 औरतों में ऑस्टियोपोसिस मिलता है। और उसका सीधा नतीजा लासी के मुताबिक इंडिया के करीब 11.5% बूढ़ों में पिछले कुछ साल में गिरने की घटना बताई और उसमें औरतें सबसे आगे थी और एक बुजुर्ग के लिए गिरना एक आम घटना नहीं होती है। वो अक्सर उस दिन की शुरुआत होती है जिसके बाद वो फिर कभी पहले जैसा नहीं चल पाएगा। तो असली सवाल यह है कि ऐसा क्यों होता है और
6:09 मैं साफ आपको कह देता हूं कि इसका जवाब हमारी नस्ल कमजोर है। इस बात में बिल्कुल भी नहीं छुपा हुआ है। क्योंकि अगर ये जींस का मामला होता तो जापान और कोरिया जो एशियन है वो इस लिस्ट में सबसे ऊपर कैसे हो सकते हैं? और सिंगापुर जहां एक बड़ी इंडियन पॉपुलेशन भी है वहां हेल दुनिया में सबसे ज्यादा कैसे हो सकता है? क्योंकि वहां कई लोग माइग्रेट करके गए हैं सिंगापुर में। और सबसे बड़ी बात यूरोप के जो बूढ़े लोग हैं वो हमेशा से ऐसे नहीं थे। आज का 70 साल का यूरोप वाला जो दौड़ रहा है उसके दादाजी 70 साल पर नहीं दौड़ रहे थे। वो बदलाव वहां पिछले 40-50 साल में आया है। सोच समझ कर बनाई गई पब्लिक हेल्थ पॉलिसी से वहां की सड़कों से पार्कक्स से और एक विज़न के साथ में। यानी कि वो जेनेटिक्स का नतीजा नहीं है। वो एक्चुअली आदतों या हैबिट्स का नतीजा है और हमारे यहां वो आदतें थोड़ी अलग हैं। और उसके चार बड़े कारण हैं। पहला कारण है
6:57 हमने कभी पीक बनाया ही नहीं। यह सबसे इंपॉर्टेंट बात है और इसे ज्यादातर लोग नहीं मानते हैं कि इंसान का शरीर अपनी सबसे ज्यादा मसल और सबसे मजबूत हड्डियां करीब 25 से 30 साल की उम्र तक बना लेता है। इसके बाद में जिंदगी भर आप उसी जमा पूंजी से खर्च करते हैं। हर डिकेड में थोड़ा-थोड़ा वो घटता रहता है। इसका मतलब यह हुआ कि आप 70 साल की उम्र में कैसे होंगे? वो बहुत हद तक आपके 25 साल की उम्र पर ही तय हो जाता है। और हमारे यहां उस उम्र में क्या होता है? उस उम्र में बच्चा पढ़ाई कर रहा होता है। एग्जाम, नौकरी और शादी का स्ट्रेस और फिजिकल। फिजिकल के लिए उस उम्र में हमारे पास कोई प्लान नहीं होता है। और जैसा हम अपने पिछले वीडियो में भी देख चुके हैं कि एक बड़ी इंडियन स्टडी में पाया गया था कि 30 से 55 साल के करीब 71% इंडियंस की मसल हेल्थ एक्चुअली खराब है। यानी कि हमारी पीक ही कम बन जाती
7:43 है और उसी कम पूंजी से हम 40 साल तक खर्च करते रहते हैं। दूसरा कारण है हमारे यहां ताकत की कोई संस्कृति है ही नहीं या उसका कोई कल्चर ही नहीं है। और यह बात आप ध्यान से समझिएगा क्योंकि हमारे यहां सेहत का मतलब हमेशा वॉक करना रहा है। सुबह पार्क में टहलना यह अच्छी बात है और दिल के लिए फायदेमंद है। लेकिन वॉकिंग से मसल नहीं बनती है। इस बात को समझना बहुत जरूरी है। मसल बनने के लिए आपके शरीर पर रेजिस्टेंस आना चाहिए। आपको कुछ उठाना पड़ेगा। कुछ धकेलना पड़ेगा और किसी चीज के अगेंस्ट जोर लगाना पड़ेगा। और यही एक चीज हमारे यहां बुजुर्गों के लिए लगभग मना है। हमारे घर में 60 साल के आदमी से अगर कह दिया जाए कि वह हल्का वेट उठाए या स्क्वाट करें तो घर वाले क्या कहेंगे? अरे इस उम्र में चोट लग जाएगी। आराम करिए आप तो। और दुनिया भर की रिसर्च इसका बिल्कुल उल्टा कहती है। वह कहती है कि उम्र के साथ में स्ट्रेंथ
8:28 ट्रेनिंग और ज्यादा जरूरी हो जाती है। कम करना नहीं बल्कि आप इसे बढ़ाइए। क्योंकि यही वो चीज है जो मसल्स को बचाएगी, हड्डियों को मजबूत करेगी और बैलेंस आपका इंप्रूव करेगी। यानी कि ठीक वही तीन चीजों जो किसी बुजुर्ग को गिरने से भी बचाएगी। तीसरा कारण और अब हम उस घी और दूध वाली बात पर आ जाते हैं। और यहां मैं बिल्कुल ईमानदार रहूंगा दोनों तरफ से। सच यह है कि दूध, दही और घी खराब चीजें नहीं है। दूध में कैल्शियम है, प्रोटीन है, बी12 है। तीनों चीजें जो हड्डी और मसल्स के लिए जरूरी है। और इस मामले में हमारी परंपरा सही भी थी। लेकिन दो बातें हैं जो हम भूल जाते हैं। पहली कि घी में कैल्शियम या प्रोटीन लगभग जीरो होता है। घी एक फैट है। वो एनर्जी देता है और खाने का स्वाद बढ़ाता है और उसकी अपनी जगह है। लेकिन घी से ना मसल बनती है और ना ही हड्डियां
9:14 इंप्रूव होती है। और दूसरी बात जो सबसे बड़ी बात है कि वो पूरी व्यवस्था एक बिल्कुल अलग जिंदगी के लिए बनी थी। सोचिए जिस दौर में पंजाब और हरियाणा का वह खानपान बना उस दौर में वह आदमी दिन भर खेत में होता था। हल चलाता था। बोझ उठाता था। मीलों चलता था और हाथ से काम करता था। वो घी उस मेहनत का फ्यूल हुआ करता था और आज आज वही थाली है वही घी है लेकिन वो मेहनत बराबर नहीं है और आज ट्रैक्टर है बाइक है और काम पूरा कुर्सी पर हो रहा है यानी कि हमने वो परंपरा का हिस्सा रख लिया जो खाने का था लेकिन वो हिस्सा छोड़ दिया जो मेहनत का था और जब फ्यूल वही रहे और इंजन चलना बंद हो जाए तो वो फ्यूल ताकत नहीं बल्कि चर्बी में कन्वर्ट हो जाता है और इसलिए पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में मोटापा और डायबिटीज देश के सबसे ज्यादा में से एक
9:59 है और उनके बुजुर्ग किसी खास खास मजबूत स्थिति में नहीं है। चौथा कारण है धूप और न्यूट्रिशन की कमी। जैसे हमने पिछले वीडियोस में देखा है कि इंडिया में विटामिन डी की कमी करीब 70 से 90% लोगों में पाई जाती है और वह भी दुनिया में सबसे अच्छी धूप वाला देश में से एक होने के बाद में। विटामिन डी के बिना आपका शरीर कैल्शियम अब्सॉर्ब नहीं कर सकता है। आप दूध पिए, दही खाएं। अगर विटामिन डी नहीं है तो वह कैल्शियम हड्डी तक नहीं पहुंचेगा। और उसके साथ प्रोटीन की कमी भी एक बहुत इंपॉर्टेंट फैक्टर है। इंडिया का एवरेज प्रोटीन इंटेक करीब 47 ग्राम रोजाना है। जबकि दुनिया का एवरेज प्रोटीन इंटेक है 68 ग्राम। और अब इन चारों को एक साथ रखिए और पूरी पिक्चर आपको क्लियर हो जाएगी। कम पीक, कम स्ट्रेंथ, [गहरी सांस लेने की आवाज़] वही पुराना खाना लेकिन बिना उस पुरानी मेहनत के और ऊपर से विटामिन डी और
10:46 प्रोटीनंस की डेफिशिएंसी। और उसका नतीजा वो है कि 60 साल का इंसान है जो जमीन से उठने में सहारा ढूंढता है। और अब एक और चीज देखिए जो शायद सबसे गहरी है और वो मेडिकल नहीं है। एक्चुअली कल्चरल है। हमारे यहां बुजुर्ग होने का मतलब क्या है? हमारे यहां इज्जत का मतलब क्या है? इज्जत का मतलब है बुजुर्ग होने का मतलब है कि आप बैठ जाइए। घर में बड़े को कोई काम नहीं करने दिया जाना चाहिए। सामान उठाने नहीं दिया जाएगा। सीढ़ी नहीं चढ़ने दी जाएगी। बाहर अकेले नहीं दिया जाने दिया जाएगा। और यह प्यार से किया जाता है। इसमें कोई बुरी नियत भी नहीं होती है। लेकिन शरीर का नियम बहुत क्रूल है कि यूज़ इट और लूज़ इट। जो मसल्स इस्तेमाल नहीं होती हैं, वह खत्म हो जाती हैं। जो जॉइंट हिलता नहीं है, वह जकड़ जाता है और जो इंसान चलता नहीं है, वह चलना भूल जाता है। यानी कि हम अपने
11:31 ओल्ड एज को आराम देकर उनकी इज्जत करते हैं और उसी आराम से उनकी एक्चुअली स्ट्रेंथ छीन लेते हैं और यूरोप में उल्टा होता है। वहां रिटायरमेंट के बाद लोग नया काम शुरू करते हैं। हकिंग क्लब ज्वाइन करते हैं। साइकिल चलाते हैं। वहां बुजुर्गों के लिए अलग से स्टैंड ट्रेनिंग प्रोग्राम सरकारी गवर्नमेंट फैसिलिटीज के हिस्से होते हैं। वहां रिटायरमेंट का मतलब होता है कि अब और ज्यादा चलेंगे। अब हमारे यहां इसका उल्टा मतलब है कि हमारे यहां मतलब है कि आराम करिए। अब दो बातें ईमानदारी से जरूरी है इसमें देखना ताकि एक तरफा ना हो जाए। पहला उन रील्स पर भरोसा मत कीजिए क्योंकि वो 70 साल की दौड़ती हुई महिलाएं वहां का भी एवरेज नहीं है। वो इसलिए रील में है क्योंकि वो असाधारण है। वो थोड़ा सा डिफरेंट है। यूरोप में भी बहुत से बुजुर्ग बीमार हैं। मोटापे के शिकार हैं और घर पर भी हैं। बल्कि अमेरिका का हेल 63.9 साल सारे अमीर देशों में सबसे कम है और वहां
12:19 बीमारी में बिताए जाने वाले साल करीब 12.5 है। यानी कि विदेशी मतलब फिट यह भी एक गलतफहमी है। लेकिन दूसरी बात ये है जो इससे ज्यादा इंपॉर्टेंट है कि रील भले ही एक एक्सेप्शन दिखाती हो हमारा अपना डाटा एक्सेप्शन नहीं दिखाता है और वो 30% फेडल्टी असली है वो ग्रिप स्ट्रेंथ का नंबर असली है और वो ऑस्टियोपरोसिस के आंकड़े भी असली हैं और उनमें से कोई भी किसी विदेशी ने नहीं बनाए हैं। वो हमारी अपनी सरकार और जो साइंटिफिक स्टडीज है उन्होंने कलेक्ट किए हैं। तो क्या यह बदला जा सकता है? है। यह सबसे बड़ा सवाल है और इसका जवाब सबसे अच्छी खबर यह है कि मसल एक ऐसा टिश्यू है जो किसी भी उम्र में वापस बनाया जा सकता है। दुनिया भर की रिसर्च ने यह बार-बार दिखाया है कि 80 और 90 साल के लोगों में भी सही तरह की स्ट्रेंथनिंग से ताकत वापस आती है। हड्डी
13:04 और बैलेंस भी बेहतर हो जाता है। यानी कि वो पूंजी जो हमने 25 साल की उम्र में नहीं बनाई, उसका एक हिस्सा 60 साल की उम्र में वापस बनाया जा सकता है। और उसके लिए तीन चीजें चाहिए। पहला वॉक के साथ स्ट्रेंथ। सिर्फ टहलना काफी नहीं है। हफ्ते में दो-तीन बार कुछ ऐसा जिसमें कि मांसपेशियों पर जोर पड़े चाहे वो चाहे वह हल्का वेट ही हो, रेजिस्टेंस बैंड हो या फिर कुर्सी से बार-बार उठना बैठना हो। और यह किसी डॉक्टर या ट्रेन पर्सन की सलाह से शुरू करना चाहिए। खासकर अगर आप पहले से कोई बीमारी से ग्रसित हैं। दूसरा आप अपने खाने के अंदर प्रोटीन मिलाइए। सिर्फ घी मत मिलाइए। हर खाने में कुछ प्रोटीन, दाल, दही, दूध, पनीर, अंडा और खासकर बुजुर्गों में क्योंकि उम्र के साथ शरीर को प्रोटीन से मसल्स बनाने के लिए पहले से ज्यादा प्रोटीन चाहिए होता है। तीसरा विटामिन डी
13:50 और हड्डियों की जांच। खासकर 50 साल के बाद औरतों के लिए क्योंकि मेनोपॉज के बाद हड्डियां तेजी से गिरती है और यह जांच महंगी नहीं है। और अब हम देखते हैं पूरी बात को एक जगह रखते हैं कि वो रील जिसे देखकर हम कहते हैं कि इनकी जींस अलग है। वो नस्ल का फर्क है। वो उन 40 सालों का फर्क है जो उन्होंने अपने शरीर में लगाया और हमने नहीं लगाया। और उस रील के नती नीचे जो कमेंट्स हैं और वो हम लिख देते हैं कि हमारा खाना तो सबसे अच्छा है और वो आधी सच भी है। इसको आपको जानना पड़ेगा कि झूठ भी आधा क्योंकि हमारा खाना कभी सबसे अच्छा था उस जिंदगी के लिए जो हम तब बिताते थे। आज वो सही है हमारे लिए या नहीं यह बात देखना जरूरी होगा। और उस जिंदगी में जिसमें हम दिन भर चलते हैं, उठाते थे और मेहनत करते थे। उसके लिए वह खाना ठीक था। वह खाना आज भी वही है। बस वह जिंदगी नहीं रही। आप बिल्कुल चेंज हो चुके
14:36 हैं और इसलिए इस वीडियो का एक्चुअली जो पर्पस है वो किसी को नीचा दिखाना नहीं है। मकसद सिर्फ एक गलतफहमी को तोड़ना है कि हम अपने आप को हेल्दी मानकर बैठे हैं और हमारा अपना डाटा हमें कुछ और बता रहा है क्योंकि एक देश की हेल्थ इस बात से नहीं नापी जाती है कि उसके लोग कितने साल जीते हैं। वो इस बात से नापी जाती है कि उसके लोग अपने आखिरी 20 साल अपने पैरों पर खड़े होकर जिएं किसी के सहारे नहीं। और उस लिस्ट में हम एक्चुअली बहुत पीछे आते हैं। लेकिन अच्छी बात यह है कि रेस जींस ने नहीं हारी है और वो रेस जींस ने नहीं हारी है। वो एक्चुअली आदतों से जीती जा सकती है। आप हैबिट्स के साथ में इंप्रूव कर सकते हैं। इसीलिए अपनी लाइफस्टाइल चेंज कर कर अपने पेरेंट्स की लाइफस्टाइल चेंज कर कर आप यह बदलाव ला सकते हैं। प्लीज आप उन्हें प्रमोट कीजिए, मोटिवेट कीजिए ये सब
15:22 काम करने के लिए। माय नेम इज मंगल सिंह। आई टीच एंथ्रोपोलॉजिस्ट स्टडी आईक्यू आईएस। आप मुझसे जुड़ सकते हैं इन दोनों क्यूआर कोड्स को स्कैन कर कर एंथोलॉजिकली ऑन ऑन Telegram एंथ्रोलॉजिकल ऑन Instagram यह वीडियो आपको कैसी लगी प्लीज कमेंट्स करके बताएं और कौन से ऐसे टॉपिक्स हैं जिन पर आप वीडियोस चाहते हैं प्लीज लेट अस नो इन द कमेंट बॉक्स थैंक यू सो मच स्टडी आईक्यू आईएस आपका सिलेक्शन हमारा मिशन