0:00 यदि तुम धनवान बनना चाहते हो तो पहले यह जानो कि तुम्हारी चेतना कैसी है। क्या तुम्हारा मन अव्यवस्थित है? क्या तुम हर निर्णय में उलझन में रहते हो? क्या तुम्हारे भीतर निरंतर चिंता चलती है? तब तुम्हारा रास्ता अभी भीतर की ओर है। बाहर की ओर नहीं। पहले खुद को व्यवस्थित करो। फिर संसार अपने आप व्यवस्थित हो जाएगा। क्योंकि जो भीतर जीत लेता है उसे बाहर जीतने की आवश्यकता नहीं रहती। उसके कदम अपने आप सही दिशा में चलते हैं। उसकी मेहनत भी फलदाई बनती है। उसका हर कार्य समृद्धि का कारण बनता है। जीवन में बुद्धिमत्ता सबसे बड़ा निवेश है। मेहनत शरीर की शक्ति है पर बुद्धिमत्ता आत्मा की
0:46 और आत्मा से किया गया कार्य कभी व्यर्थ नहीं जाता। जो भीतर से जागा हुआ है उसकी हर योजना हर निर्णय में ब्रह्मांड उसका साथ देता है। बुद्धि से कमाया गया पैसा केवल बाहरी नहीं होता। उसमें एक प्रकार की पवित्रता होती है। उसमें संतुलन होता है। वह जीवन में सुख लाता है। नशा नहीं। वह स्वतंत्रता देता है। बंधन नहीं। इसलिए याद रखो दिमाग से काम करना कोई तकनीक नहीं। यह एक साधना है। यह जीवन को गहराई से देखने की कला [संगीत] है। यह निर्णय लेने की वह क्षमता है जो हड़बड़ी से नहीं शांत ध्यान से जन्म लेती है। [संगीत] और जब यह ध्यान तुम्हारे भीतर उतरता है तो पैसा तुम्हारे
1:32 चारों ओर बहने लगता है। जैसे हवा, जैसे धूप, जैसे जीवन की कोई स्वाभाविक धारा। हम बचपन से सुनते आए हैं। मेहनत ही सफलता की कुंजी है। यह बात आधी सच है और आधा भ्रम है। मेहनत जरूरी है लेकिन अंधी मेहनत नहीं। बिना दिशा की मेहनत वैसी है जैसे कोई नाविक बिना दिशा के समुद्र में पतवार चला रहा हो। वह थक जाएगा पर कहीं नहीं पहुंचेगा। मेहनत का अर्थ केवल शरीर का परिश्रम नहीं बल्कि बुद्धि की सजगता भी है। जो व्यक्ति मेहनत करता है पर सोचता नहीं। वह पत्थर ढोने वाले मजदूर की तरह है। रोज वही काम, वही संघर्ष, वही थकावट। और जो व्यक्ति मेहनत के साथ सोचता है, वह
2:19 कलाकार की तरह है। वही प्रयास पर उसमें संगीत है। उसमें लय है, उसमें सृजन है। दोनों काम करते हैं। पर एक थकता है दूसरा खेलता है। फर्क केवल चेतना का है। सच्ची मेहनत वही है जो तुम्हारे भीतर से आती है। जो मजबूरी नहीं आनंद है। क्योंकि जब काम आनंद बन जाता है तब मेहनत का अनुभव नहीं रहता। तब तुम जो भी करते हो वह ध्यान बन जाता है। यही रहस्य है कि मेहनत को ध्यान में कैसे बदला जाए। जिस दिन तुम अपने काम से प्रेम करने लगोगे उसी दिन तुम्हारी मेहनत बुद्धि में बदल जाएगी। तुम हर क्षण सजग रहोगे। तुम छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दोगे। तुम अपनी ऊर्जा को व्यर्थ नहीं
3:07 बहाओगे। यही वह बिंदु है जहां साधारण इंसान और असाधारण इंसान के बीच का अंतर स्पष्ट होता है। साधारण व्यक्ति काम करता है क्योंकि करना पड़ता है। असाधारण व्यक्ति काम करता है क्योंकि वह उसे जीना चाहता है। बिना समझ की मेहनत हमेशा तनाव पैदा करती है। ऐसे व्यक्ति के लिए काम एक बोझ है। वह सुबह से रात तक काम तो करता है लेकिन हर पल उसके भीतर शिक आयतें हैं कि समय नहीं है, पैसा नहीं है, आराम नहीं है और वही शिकायतें उसके भीतर की ऊर्जा को नष्ट कर देती हैं। जब मन बोझिल हो तो मेहनत थकावट
3:52 में बदल जाती है। समझदार व्यक्ति काम करता है लेकिन उसे बोझ नहीं बनाता। वह काम के भीतर आनंद ढूंढता है। वह हर क्षण का रस लेता है। उसके लिए हर क्रिया ध्यान है। हर काम पूजा है। और जब तुम इस दृष्टि से काम करते हो तो तुम केवल पैसा नहीं कमाते। तुम जीवन कमाते हो। कभी अपने आसपास देखो जो लोग अपने काम से प्रेम करते हैं वे थकते नहीं। उन्हें लंबे घंटे काम करने में कोई शिकायत नहीं होती। क्योंकि उनके लिए काम कोई बाध्यता नहीं। एक आनंद की यात्रा है और जब आनंद से काम किया जाता है तो ऊर्जा बढ़ती है घटती नहीं। यहां से समझो कि मेहनत का मूल्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह किस चेतना से की जा रही है। वही काम
4:39 जब ध्यान पूर्वक किया जाता है तो चमत्कार बन जाता है और जब बिना ध्यान के किया जाता है तो नीरस बन जाता है। अगर कोई व्यक्ति पूरे दिन काम करे लेकिन उसका मन लगातार शिकायतों में उलझा रहे तो उसकी मेहनत कभी फलदाई नहीं होगी। क्योंकि जहां शिकायत है वहां कृतज्ञता नहीं होती। और जहां कृतज्ञता नहीं वहां सृजन नहीं। धन उसी व्यक्ति के पास आता है जो काम को सृजन में बदलता है। जो अपनी मेहनत में कला का स्वाद डालता है। जो समझता है कि मैं केवल पैसे के लिए नहीं अपनी ऊर्जा के पूर्ण उपयोग के लिए काम कर रहा हूं। यह समझ जीवन को पूरी तरह बदल देती है। क्योंकि अब मेहनत संघर्ष
5:25 नहीं रहती। वह ध्यान की प्रक्रिया बन जाती है। तुम काम में खो जाते हो और खोते खोते भीतर एक शांति का अनुभव करते हो। यही शांति तुम्हें नई दिशा देती है। स्मरण रखना। मेहनत से थकान आती है पर ध्यान से स्फूर्ति आती है। और जब मेहनत ध्यान बन जाती है तो वह तुम्हें थकाती नहीं। तुम्हें और रजीवंत बनाती है। यह वही बिंदु है जहां से सच्चा धन शुरू होता है। धन का अर्थ केवल नोट नहीं है बल्कि वह संतुलन है जो तुम्हारे भीतर पैदा होता है जब तुम अपने काम को समझ से करते हो। वह आंतरिक संतुलन ही बाहर समृद्धि बनकर झलकता है। मेहनत से शरीर मजबूत होता है पर समझ से
6:13 भाग्य बनता है। और जब दोनों का मेल हो जाए जब मेहनत में विवेक का साथ हो तब जीवन अपनी पूरी क्षमता से खिलता है। तब तुम्हारी हर कोशिश सफल होती है क्योंकि वह भीतर की स्पष्टता से जन्म लेती है। वह व्यक्ति जो केवल मेहनत में विश्वास रखता है। अक्सर दूसरों की नकल करता है। वह देखता है कि कौन क्या कर रहा है और उसी रास्ते पर चल पड़ता है। पर जो व्यक्ति समझ से चलता है, वह अपनी राह बनाता है। उसकी दिशा दूसरों से अलग होती है और यही भिन्नता उसे असली समृद्धि तक ले जाती है। जो व्यक्ति अपने भीतर के स्वर को सुनना सीख लेता है, उसे बाहर से मार्गदर्शन की आवश्यकता नहीं रहती। उसका हर कदम सटीक
6:58 होता है। वह जानता है कि कब काम करना है, कब रुकना है, कहां ऊर्जा लगानी है और कहां नहीं। यही सच्ची बुद्धिमत्ता है। जीवन में मेहनत करना सुंदर है। लेकिन उससे भी सुंदर है सजग होकर मेहनत करना। क्योंकि सजगता ही मेहनत को धन में बदलती है। यह वह जादू है जिसे समझने वाला कभी गरीब नहीं रहता। क्योंकि उसने अपनी चेतना की गहराई को छू लिया है। जब चेतना काम करती है तो संसार सहयोग देता है। तब परिस्थितियां अनुकूल होने लगती हैं। ऐसा नहीं कि कठिनाइयां नहीं आती लेकिन कठिनाइयां अब बाधा नहीं बनती। वे शिक्षक बन जाती हैं। और जो व्यक्ति हर चुनौती से सीखता है, उसका हर संघर्ष सफलता का पायदान बन जाता है। यही
7:46 है सच्चा रहस्य कि मेहनत को जागरूकता के साथ जोड़ो। मेहनत को ध्यान बना दो तब तुम्हारा हर प्रयास स्वर्ण में बदल जाएगा। पैसा केवल नोट नहीं है। केवल सिक्के नहीं है। ना ही किसी बैंक के खाते में दर्ज कोई संख्या है। पैसा ऊर्जा है। जीवन की गति का एक हिस्सा [संगीत] है। जैसे हवा बहती है, जैसे जल प्रवाहित होता है, वैसे ही धन भी एक प्रवाह है। वह वहीं टिकता है। जहां संतुलन है, जहां सौंदर्य है, जहां समझ है। यह संसार ऊर्जा का विशाल जाल है। हर विचार, हर भावना, हर शब्द एक तरंग है और पैसा भी उसी ऊर्जा का एक रूप है। जब
8:33 तुम्हारे विचार संतुलित होते हैं, तुम्हारी भावनाएं निर्मल होती हैं और तुम्हारा कर्म सजग होता है, तब तुम उस प्रवाह के साथ तालमेल में आ जाते हो जिसे हम समृद्धि कहते हैं। लेकिन जब मन अशांत है। जब तुम्हारे भीतर भय, लालच, असुरक्षा या तुलना है, तब यह प्रवाह रुक जाता है। पैसा ऐसे व्यक्ति के पास आता है पर टिकता नहीं क्योंकि उसका मन छिद्रों से भरा है। वह धन को पकड़ना चाहता है। बांधना चाहता है और ऊर्जा कभी बंधन में नहीं रहती। समझदार व्यक्ति धन को पकड़ता नहीं बल्कि उसके साथ नृत्य करता है। वह जानता है कि पैसा ठहरने की चीज नहीं चलने की चीज है। जितना तुम उसे बांधोगे उतना वह ठहरना
9:20 छोड़ेगा। जितना तुम उसे सहज प्रवाह में रखोगे उतना वह लौटेगा, बढ़ेगा और तुम्हारे जीवन को समृद्ध करेगा। धन का असली रहस्य देने और लेने के बीच के संतुलन में छिपा है। जिसने केवल लेने की कला सीखी है, वह अंततः खो देता है। और जिसने देने की कला सीखी है, उसके पास देने के बाद भी कमी नहीं होती। यह विरोधाभास नहीं यह अस्तित्व का नियम है। ऊर्जा हमेशा उस दिशा में बहती है जहां रुकावट नहीं होती और देने वाला व्यक्ति रुकावट नहीं मार्ग बन जाता है। पैसा उसी के पास लौटता है जो उसे प्रसन्नता से उपयोग करता है। जो उसे जीवन के लिए सृजन के लिए आनंद के लिए लगाता है।
10:09 लेकिन जो व्यक्ति पैसे को भय में जमा करता है, उसका धन धीरे-धीरे उसके ही भीतर जड़ बन जाता है। उसका मन कठोर हो जाता है। उसकी आंखें असुरक्षा से भर जाती हैं। वह जीना भूल जाता है और केवल गिनना सीखता है। समृद्ध व्यक्ति वह नहीं है जिसके पास बहुत पैसा है। बल्कि वह है जो धन के प्रवाह को समझता है। जिसके भीतर देने की प्रसन्नता है और पाने की कृतज्ञता है। जो जानता है कि यह सारा जीवन एक नृत्य है। कभी तुम देते हो, कभी लेते हो और यही दोनों का संतुलन सच्ची समृद्धि है। धन एक प्रकार का दर्पण है। यह तुम्हारे भीतर की स्थिति को
10:55 बाहर दिखाता है। अगर तुम भीतर से कमी में जी रहे हो तो तुम्हारे जीवन में कितनी भी संपत्ति आ जाए वह पर्याप्त नहीं लगेगी। क्योंकि कमी मन में है और अगर तुम भीतर से पूर्णता में जी रहे हो तो थोड़ा भी बहुत लगता है क्योंकि तब तुम्हारी चेतना भरपूर है और जहां भरपूरता है वहां ब्रह्मांड और भी देता है। धन के प्रवाह को महसूस करना एक ध्यान की तरह है। इसमें कोई जल्दबाजी नहीं होती, कोई तुलना नहीं होती। तुम बस देखते हो कि कहां से धन आता है, कहां जाता है और तुम्हारा मन इन दोनों के बीच कैसा रहता है। अगर भीतर कोई भय नहीं, कोई अपराध बोध नहीं, कोई लालच नहीं तो यह प्रवाह सहज
11:40 बना रहता है। धन का रुकना अक्सर मन के रुकने का संकेत होता है। जब मन स्थिर नहीं रहता तो बाहर की स्थितियां भी अस्थिर हो जाती हैं। और जब मन शांत हो जाता है तो संसार भी उस शांति को प्रतिबिंबित करता है। यही कारण है कि शांत और सजग व्यक्ति बिना भागदौड़ के भी समृद्ध हो जाते हैं। उनकी ऊर्जा आकर्षण बन जाती है। पैसा शक्ति है। लेकिन यह शक्ति केवल [संगीत] उन हाथों में सुरक्षित है जो सचेत है। अचेत व्यक्ति इस शक्ति का उपयोग नहीं करता बल्कि यह शक्ति उसी को उपयोग करने लगती [संगीत] है। वह धन का मालिक नहीं गुलाम बन जाता है और
12:27 जागरूक व्यक्ति धन का स्वामी बन जाता है क्योंकि वह उसे साधन के रूप में देखता है। साध्य के रूप में नहीं। जागरूकता ही वह स्थान है जहां से सच्चा धन प्रवाहित होता है। तुम जितने जागरूक हो उतनी ही तुम्हारी ऊर्जा सूक्ष्म होती जाती है और सूक्ष्म ऊर्जा ही अवसरों को पहचानती है। रिश्तों को समझती है। दिशा को पकड़ती है। यही वह अदृश्य शक्ति है जिससे धन अपने आप आकर्षित होता है। धन का कोई स्थाई ठिकाना नहीं। वह चेतना के अनुसार बहता है। जो भयभीत है वहां से वह हटता है। जो प्रेममय है वहां जाता है। जो सजग है वहां टिकता है। इसलिए
13:15 यह मत सोचो कि पैसा केवल मेहनत का फल है। वह मन की परिपक्वता का फल है। मेहनत उसका एक माध्यम है। पर असली कुंजी चेतना है। जो भीतर से शांत है वही बाहर के संसार को सुलझा सकता है। जो भीतर से भरा हुआ है वही बाहर धन का अनुभव कर सकता है। और जो भीतर से प्रेम से भरा है उसके लिए पैसा भी प्रेम का माध्यम बन जाता है। किसी को देने का, किसी को सृजन का, किसी को सहारा देने का। तुम्हारे जीवन में पैसा कितना आता है। यह ब्रह्मांड तय नहीं करता। यह तुम्हारी चेतना तय करती है। अगर तुम्हारे भीतर पूर्णता है तो संसार तुम्हारे चारों ओर खिल उठता है। अगर तुम्हारे भीतर भय है तो
14:01 संसार तुम्हारे चारों ओर सिकुड़ जाता है। इसलिए असली काम भीतर का है। बाहर का नहीं। धन का रहस्य केवल जानने से नहीं खुलता। उसे महसूस करना पड़ता है। जब तुम अपने विचारों, अपने व्यवहार, अपने भावों में सजग हो जाते हो तो धीरे-धीरे तुम देखोगे कि पैसा तुम्हारे जीवन में अधिक सहजता से आने लगा है। वह संघर्ष से नहीं प्रवाह से आता है। और यह प्रवाह किसी तकनीक से नहीं केवल ध्यान से संभव है। ध्यान का अर्थ है जो कुछ भी कर रहे हो उसमें पूरी तरह उपस्थित रहना। उसी उपस्थिति में तुम्हारे कर्म अर्थपूर्ण बनते हैं और अर्थपूर्ण कर्म ही समृद्धि बनाते हैं। हर चीज की शुरुआत मन से होती है। जो तुम्हारे भीतर
14:49 लता है। वही तुम्हारे बाहर आकार लेता है। पैसा भी इससे अलग नहीं। धन की शुरुआत किसी व्यापार, नौकरी या अवसर से नहीं होती। वह तुम्हारे विचारों की मिट्टी में उगता है। और अगर तुम्हारी मिट्टी डर, शक और कमी से भरी है तो चाहे तुम उस पर कितना भी परिश्रम का जल डालो कुछ नहीं उगेगा। अभाव की सोच सबसे बड़ा बंधन है। यह सोच कहती है मेरे पास कम है। मुझे नहीं मिलेगा। दूसरे भाग्यशाली हैं। मेरा समय नहीं है। यह वाक्य दिखने में छोटे लगते हैं। लेकिन इनके पीछे वन कंपना ऐसी ऊर्जा पैदा करते हैं जो समृद्धि को दूर धकेल देते हैं।
15:34 क्योंकि ब्रह्मांड किसी की भाषा नहीं सुनता वह तुम्हारी तरंगों को सुनता है और अगर तुम्हारी तरंगे भय और कमी की हैं तो वह उसी ऊर्जा को तुम्हें लौटा देता है। जिस क्षण तुम अपने विचार बदलना शुरू करते हो, उसी क्षण तुम्हारा भाग्य बदलना शुरू होता है। यह कोई जादू नहीं यह चेतना का विज्ञान है। [संगीत] अगर तुम अपने मन को समृद्धि के प्रति खोल दो, तो तुम देखोगे कि जीवन में ऐसे अवसर आने लगते हैं जो पहले अदृश्य थे। वे हमेशा थे, पर तुम्हारी दृष्टि पर अभाव का पर्दा पड़ा हुआ था। जो व्यक्ति मानता है कि धन सीमित है, वह हमेशा संघर्ष में रहेगा। और जो व्यक्ति मानता है कि धन अनंत है, वह सहज रूप से आकर्षित करेगा। यह फर्क भीतर की धारणा का
16:22 है। ब्रह्मांड में संसाधन असीम है। सूरज सबको रोशनी देता है। हवा सबको समान रूप से छूती है। धरती सबको समान अवसर देती है। लेकिन तुम जितना ग्रहण कर पाते हो वह तुम्हारी खुली या बंद चेतना पर निर्भर करता है। पैसे की ऊर्जा तब आती है जब तुम उसके प्रति सहज होते हो। जब तुम उसे गलत नहीं समझते। जब तुम उसे केवल भौतिक नहीं मानते। जब तुम उसे सृजन के साधन के रूप में देखते हो। जिसने पैसे को समझ लिया, उसने जीवन को समझ लिया। क्योंकि पैसा केवल तुम्हारी आंतरिक स्थिति का प्रतिबिंब है। अगर भीतर अपराध बोध है कि पैसा रखना गलत है तो तुम अवचेतन रूप से उसे दूर करते रहोगे। अगर तुम्हें लगता है कि अमीर होना
17:09 स्वार्थ है तो तुम्हारा मन तुम्हें अमीर होने से रोकेगा। और अगर तुम मानते हो कि पैसा तुम्हारे जीवन में प्रेम, अवसर और स्वतंत्रता ला सकता है तो ब्रह्मांड तुम्हें वही देता है। समृद्धि मानसिक अवस्था है। यह कोई बैंक बैलेंस नहीं बल्कि भीतर की तरंग है। जब तुम भीतर से कहो मैं योग्य हूं। मैं सक्षम हूं। मैं जीवन की संपन्नता के योग्य हूं। तो यह भावना ब्रह्मांड में फैलती है और फिर वही ऊर्जा अवसरों के रूप में लौटती है। लेकिन यह केवल शब्दों से नहीं होता। यह विश्वास से होता है। विश्वास का अर्थ है बिना देखे भरोसा करना। बिना प्रमाण के महसूस करना। यह वही स्थिति है जहां तुम्हारा मन
17:55 ब्रह्मांड के साथ एकाकार हो जाता है और जब यह एकता होती है तब समृद्धि रुकती नहीं बहती है। अभाव की मानसिकता हमेशा तुलना से पैदा होती है। जब तुम देखते हो कि कोई और तुमसे आगे है और तुम्हारे भीतर ईर्ष्या जन्म लेती है तो तुम अपनी ही ऊर्जा घटा देते हो क्योंकि ईर्ष्या यह घोषणा है कि मेरे पास नहीं है और ब्रह्मांड उस घोषणा को सत्य मान लेता है। इसलिए जो व्यक्ति सचमुच समृद्ध होना चाहता है उसे तुलना से मुक्त होना होगा। उसे हर उस विचार से मुक्त होना होगा जो कहता है मैं कमजोर हूं। मैं पीछे हूं। मेरे पास नहीं है। जब तुम यह मानना छोड़ देते हो कि तुम्हारे पास कुछ नहीं है, तभी तुम्हारे पास सब आने
18:42 लगता है। धन हमेशा कृतज्ञता के द्वार से आता है। जब तुम जो भी तुम्हारे पास है, उसके लिए आभारी होते हो। तब तुम और पाने के योग्य बनते हो। क्योंकि कृतज्ञता का अर्थ है मैं पहले से भरपूर हूं। और जहां भरपूरता है, वहां ब्रह्मांड और भरता है। यह जीवन एक प्रतिबिंब है। अगर तुम कमी दिखाओगे तो कमी लौटेगी। अगर तुम समृद्धि दिखाओगे तो समृद्धि लौटेगी। इसलिए अपनी भावनाओं को देखो। जब तुम पैसे की बात करते हो। क्या तुम्हारे भीतर भय है या आनंद? क्या तुम उसे सहेजना चाहते हो या बांटना? तुम्हारी यह आंतरिक स्थिति तय करती है कि पैसा तुम्हारे जीवन में कैसे बहेगा। जो व्यक्ति अपने पैसे को प्रेम से देखता है,
19:30 उसका पैसा बढ़ता है। जो व्यक्ति अपने पैसे से डरता है, उसका पैसा घटता है। क्योंकि धन भी जीवित ऊर्जा है। वह वहीं जाता है जहां उसे सम्मान मिलता है। धन की दुनिया में सबसे बड़ा रहस्य यही है कि यह भीतर की स्थिति का खेल है। अगर भीतर विश्वास है तो बाहर परिणाम है। अगर भीतर संतुलन है तो बाहर समृद्धि है। इसलिए अपने विचारों की जांच करो। अपने भीतर के हर नकारात्मक विश्वास को देखो। जैसे पैसा कठिनाई से मिलता है। मेरे पास कभी पर्याप्त नहीं होगा। मैं अमीर नहीं बन सकता। फिर इन विचारों को प्रेम पूर्वक बदलो। अपने मन से कहो पैसा मेरे जीवन में सहजता से आता है।
20:16 मैं समृद्धि के योग्य हूं। ब्रह्मांड मेरे लिए असीम अवसर भेज रहा है। इन शब्दों में शक्ति है। यह तुम्हारे मन को नए पैटर्न में ढालते हैं और धीरे-धीरे तुम्हारी वास्तविकता बदलने लगती है। लेकिन ध्यान रहे यह केवल शब्दों का खेल नहीं। यह भीतर के परिवर्तन की यात्रा है। तुम्हें अपने भीतर उस ऊर्जा को महसूस करना होगा जो तुम्हें धनवान बनाती है। आत्मविश्वास, प्रेम, सहजता और शांति। जब यह तुम्हारे भीतर होंगे तब पैसा तुम्हारे बाहर भी दिखाई देगा। पैसा उस व्यक्ति के पास आता है जो भीतर से प्रसन्न है। क्योंकि प्रसन्नता आकर्षण है और जहां आकर्षण है
21:04 वहां समृद्धि स्वतः बहती है। जो व्यक्ति भीतर से दुखी है, भयभीत है, असंतुष्ट है, उसका मन [संगीत] हर चीज को खोने का डर पालता है। और जो डरता है, वह कभी आकर्षित ना ही कर सकता। इसलिए समृद्धि पाने की शुरुआत धन से नहीं मन से होती है। भीतर की तरंग बदलो, बाहर की स्थिति अपने आप बदल जाएगी। पैसा बुरा नहीं है। लेकिन अचेत व्यक्ति के हाथों में वह जहर बन जाता है। जैसे तलवार किसी संत के हाथ में सुरक्षा बनती है और किसी मूर्ख के हाथ में विनाश वैसे ही धन भी बुद्धिमत्ता के साथ वरदान है और मूर्खता के साथ अभिशाप। समझने की बात यह है कि धन
21:50 कभी गलत नहीं होता। लेकिन धन के प्रति तुम्हारा दृष्टिकोण तय करता है कि वह तुम्हें मुक्त करेगा या बांध देगा। जो व्यक्ति बिना समझ के धन कमाता है, वह उसे खर्च करता नहीं बल्कि उसके बोझ तले दबता चला जाता है। उसके भीतर हमेशा एक भय होता है। अगर यह चला गया तो क्या होगा? और यह भय ही उसके सारे सुख को निगल लेता है। जो बुद्धिमान है, वह जानता है कि पैसा साधन है, साध्य नहीं। पैसे का अर्थ केवल नोटों या संपत्ति में नहीं बल्कि उस स्वतंत्रता में है जो वह प्रदान कर सकता है। धन तुम्हें अवसर देता है लेकिन दिशा तुम्हें देनी होती है। अगर तुम्हारे भीतर दिशा नहीं है तो पैसा तुम्हें भटकाने लगता है।
22:37 अचेत व्यक्ति जब अमीर होता है तो उसका मन और अधिक लालची और अधिक असंतुष्ट हो जाता है। क्योंकि उसका धन उसके भीतर की खाली जगह को नहीं भर सकता। वह बाहर बहुत कुछ जोड़ता है। पर भीतर कुछ भी नहीं बदलता। वह गाड़ियां बदलता है। घर बदलता है, कपड़े बदलता है। लेकिन वही पुराना बेचैन मन उसके साथ चलता है और अंत में उसे लगता है मैंने सब पा लिया। फिर भी कुछ कमी है। लेकिन जो व्यक्ति सजग है, जो अपने भीतर जागा हुआ है, वह जानता है कि पैसा केवल जीवन की एक परत है। वह उसका उपयोग करता है, पर उसके अधीन नहीं होता। वह पैसे को अपने हाथ में रखता है। अपने हृदय में नहीं। उसके लिए
23:22 पैसा एक साधन है प्रेम को फैलाने का, अवसर देने का। सुंदरता रचना एका बुद्धिमान व्यक्ति जानता है कि असली संपत्ति बाहर नहीं भीतर है। [संगीत] जो भीतर से धनी है, जिसकी चेतना समृद्ध है, जिसका मन शांत है, जिसकी आत्मा प्रेम से भरी है, उसके पास चाहे थोड़ा भी हो, वह पर्याप्त होता है। और जो भीतर से दरिद्र है, जो खाली है, असंतुष्ट है, लालच से ग्रस्त है, उसके पास चाहे कितना भी हो, वह कम लगता है। यह संसार दो प्रकार के लोगों से भरा है। एक वे जो पैसा कमाते हैं ताकि वे कुछ बन सके और दूसरे वे जो पहले कुछ बन जाते हैं, फिर पैसा उनके पीछे आता है। पहला वर्ग हमेशा भागता रहता है क्योंकि उसका होना अधूरा
24:09 है। दूसरा वर्ग शांत रहता है। क्योंकि उसने पहले अपने अस्तित्व को पूर्ण किया है और धन उसकी पूर्णता की स्वाभाविक छाया बनकर आता है। [संगीत] सच्ची बुद्धिमत्ता यह है कि तुम पैसा कमाओ पर उसमें खो ना जाओ। [संगीत] तुम धन का उपयोग करो पर वह तुम्हें उपयोग ना करने लगे। पैसा तब तक सुंदर है जब तक वह तुम्हें स्वतंत्रता देता है। लेकिन जैसे ही वह तुम्हारे निर्णयों पर अधिकार करने लगे, वह तुम्हारा मालिक बन जाता है। देखो, जीवन की विडंबना यह है कि लोग सारा जीवन पैसा कमाने में लगा देते हैं और जब पैसा आता है, तब वे जीना भूल जाते हैं। वे कहते हैं थोड़ा और कमा लूं फिर जी लूंगा और वह थोड़ा और कभी पूरा नहीं होता। धन उनके जीवन का केंद्र
24:55 बन जाता है और जीवन खुद हास्य पर चला जाता है। जो व्यक्ति बुद्धिमान है वह जानता है कि धन केवल एक प्रवाह है। जैसे नदी बहती है वैसे ही पैसा बहना चाहिए। अगर तुम उसे रोक लोगे तो वह सड़ जाएगा। अगर तुम उसे बांटोगे तो वह और बढ़ेगा। धन को साझा करना उसकी ऊर्जा को जीवित रखना है और यह साझा करना केवल दान में नहीं बल्कि अपने कार्य में अपने प्रेम में अपने दृष्टिकोण में भी होता है। धन के पीछे भागने वाला व्यक्ति धन को पकड़ नहीं सकता क्योंकि उसका पीछा करने वाला मन हमेशा बेचैन होता है और बेचैनी का मन कभी आकर्षित नहीं करता। वह केवल दूर भगाता है। जो व्यक्ति सहज है,
25:40 शांत है, अपने काम में प्रेम से लगा है, उसके पास धन स्वयं आता है। क्योंकि वह अपने कार्य को पूजा की तरह करता है। और जब काम ध्यान बन जाता है, तब समृद्धि उसका आशीर्वाद बनकर बरसती है। धन को पाने की सबसे बड़ी योग्यता यह है कि तुम उसे पाने के पीछे नहीं भागो। तुम अपना जीवन ऐसे जियो मानो तुम्हें पहले से सब मिला हुआ है।