Bhagvati Sutra Vachana -203 I Shatak 8, Uddeshak 9 I May 17 2026

संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो भगवती सूत्र आगम वाचना पर आधारित है, जिसमें कर्मों के सिद्धांत और आत्मा के साथ उनके संबंध पर चर्चा की गई है। इसमें आठवें शतक और नौवें उद्देश्य को शामिल किया गया है, जिसमें कर्म शरीर, ज्ञानवरणीय कर्म, दर्शनावरणीय कर्म, वेदनीय कर्म, मोहनीय कर्म, आयुष्य कर्म, नाम कर्म, गोत्र कर्म और अंतराय कर्म जैसे विभिन्न प्रकार के कर्मों पर प्रकाश डाला गया है। यह वीडियो यह भी बताता है कि कैसे जीव अपने कर्मों के अनुसार विभिन्न गतियों (जैसे नरक, तिर्यंच, मनुष्य, देव) में जन्म लेते हैं और विभिन्न शरीरों (जैसे औदारिक, वैक्रिय, आहारक, तैजस, कार्मण) को धारण करते हैं।

मुख्य बातें:

  • कर्मों का आत्मा पर प्रभाव और विभिन्न कर्मों के प्रकार।
  • कर्मों के अनुसार विभिन्न गतियों में जन्म और शरीरों का धारण।
  • जैन धर्म में कर्मों के सिद्धांत का महत्व और ईश्वर की भूमिका का अभाव।

परिचय

यह भगवती सूत्र आगम वाचना की 203वीं कक्षा है, जिसमें विभाबेन जी कामदार पिछली कक्षा की समरी प्रस्तुत कर रही हैं। पिछली कक्षा में आठवें शतक और नौवें उद्देश्य पर चर्चा की गई थी, जिसमें कर्म शरीर और आत्मा के संबंध को समझाया गया था।

कर्म शरीर: परिभाषा और रचना

कर्म शरीर, कार्मन वर्गणा के परमाणुओं से बना होता है, जो आत्मा के गुणों को ढँक देता है। आत्मा के असंख्य प्रदेशों पर अनंत कार्मन वर्गणा के पुद्गल परमाणु चिपक जाते हैं, जिससे गुणों का आवरण होता है। आत्मा द्रव्य से अविनाशी है, लेकिन कर्मों के कारण उसके गुण ढँक जाते हैं।

ज्ञानवरणीय कर्म और उसके प्रकार

ज्ञानवरणीय कर्म ज्ञान गुण पर आवरण डालता है, जिससे मति ज्ञान, श्रुत ज्ञान, अवधि ज्ञान और मन:पर्यय ज्ञान जैसे ज्ञान के विभिन्न प्रकार बाधित होते हैं। जब आत्मा अपने गुणों के विपरीत आचरण करती है, तो वह कर्म बांधती है, जो उसी गुण के आवरण के रूप में रहती है।

कर्म बंधन के साधन और कर्म प्रकृतियाँ

मन, वचन और काया अभिरुद्ध आचरण के साधन हैं, जिनके माध्यम से कर्म बंधते हैं। कर्म वर्गणा के पुद्गल परमाणु विभिन्न प्रकार की कर्म प्रकृतियाँ बनाते हैं, जैसे मति ज्ञानावरणीय, श्रुत ज्ञानावरणीय, अवधि ज्ञानावरणीय, मन:पर्यय ज्ञानावरणीय और केवल ज्ञानावरणीय।

दर्शनावरणीय कर्म और ज्ञान की विराधना

दर्शनावरणीय कर्म दर्शन गुण पर आवरण डालता है। ज्ञान की विराधना, ज्ञानियों की विराधना और ज्ञान के उपकरणों की विराधना से दर्शनावरणीय कर्म बंधता है। यह कर्म अनंत जन्मों में हो सकता है, जिससे कर्म की प्रकृति बनी रहती है।

वेदनीय कर्म: शाता और अशाता

वेदनीय कर्म सुख और दुख की अनुभूति कराता है। यह दो प्रकार का होता है: शाता वेदनीय (सुखद) और अशाता वेदनीय (दुखद)। प्राणियों पर अनुकंपा, दया और करुणा करने से शाता वेदनीय कर्म बंधता है, जबकि दूसरों को दुख, तकलीफ और पीड़ा पहुँचाने से अशाता वेदनीय कर्म बंधता है।

मोहनीय कर्म और नरक गति का आयुष्य

मोहनीय कर्म आत्मा को मोहित करता है। तीव्र क्रोध, मान, माया और लोभ से मोहनीय कर्म बंधता है। नरक गति का आयुष्य उन जीवों द्वारा बांधा जाता है जो महा आरम्भ, महा परिग्रह और एकेन्द्रिय जीवों की हिंसा करते हैं।

तिर्यंच गति, मनुष्य गति और देव गति के कर्म

माया, प्रवंचना, झूठ और कपट से तिर्यंच गति का कर्म बंधता है। स्वभाव से सरल, विनम्र और दयालु होने से मनुष्य गति प्राप्त होती है। सराग से तपस्या करने और अकाम निर्जरा करने से देव गति का आयुष्य बंधता है।

नाम कर्म: शुभ और अशुभ

शुभ और अशुभ नाम कर्म जीव के कार्यों के अनुसार बंधते हैं। माया, कपट, भाव और अशाता से अशुभ नाम कर्म बंधता है, जबकि उच्च गोत्र कर्म अभिमान और मद न करने से बंधता है।

गोत्र कर्म: उच्च और नीच

उच्च गोत्र कर्म आठ प्रकार के अभिमान (जाति, कुल, वंश, सत्ता, संपत्ति, ऐश्वर्य, रूपरंग और श्रुत) न करने से बंधता है, जबकि मद और अभिमान करने से नीच गोत्र कर्म बंधता है।

अंतराय कर्म और कर्मों की सामूहिक स्थिति

अंतराय कर्म दान, लाभ, भोग और वीर्य में विघ्न उत्पन्न करता है। यह कर्म जीव के कार्यों के अनुसार बंधता है। सभी कर्मों का सामूहिक नाम कर्म है, जिसे कार्मन शरीर भी कहा जाता है।

मृत्यु और कर्मों का स्थानांतरण

मृत्यु के समय शरीर छूट जाता है, लेकिन आत्मा के साथ कर्मों का आवरण चलता रहता है। यह कर्म ही आत्मा को एक गति से दूसरी गति में ले जाते हैं और नया शरीर बनाते हैं।

कर्मों की परस्पर विरोधी प्रकृतियाँ और जैन धर्म की विशेषता

कुछ कर्म प्रकृतियाँ परस्पर विरोधी होती हैं, जैसे उच्च गोत्र और नीच गोत्र। जैन धर्म में कर्मों के सिद्धांत को विस्तार से समझाया गया है, जिसमें ईश्वर की इच्छा का कोई स्थान नहीं है। प्रत्येक जीव अपने कर्मों के अनुसार फल भोगता है।

कर्मों की स्थिति और अवधि

कर्मों की स्थिति और अवधि बांधते समय किए गए कार्यों के अनुसार होती है। ज्ञानावरणीय कर्म की स्थिति 10 कोड़ा-कोड़ी सागरोपम से 30 कोड़ा-कोड़ी सागरोपम तक हो सकती है।

कर्मों का प्रभाव और पुनर्जन्म

कर्मों के अनुसार जीव विभिन्न गतियों में पुनर्जन्म लेता है। करोड़पति के घर में मानसिक रूप से विकलांग बच्चे का जन्म कर्मों के कारण होता है। कर्मों की स्थिति लंबी होने पर नीच गोत्र में बार-बार जन्म लेना पड़ता है।

देव गति और कर्मों का फल

देव गति में भी कर्मों के अनुसार फल मिलता है। पुण्य से देव गति मिलती है, लेकिन वहां भी नौकर-चाकर और स्वीपर जैसे काम करने पड़ सकते हैं। गाली-गलौज करने से नीच गोत्र बंधता है, जिससे देव गति में भी हरिजन, भंगी और चांडाल जैसे काम करने पड़ते हैं।

शरीरों का अल्प बहुत्व

जीवों में पांच प्रकार के शरीर होते हैं: औदारिक, वैक्रिय, आहारक, तैजस और कार्मण। इन शरीरों का अल्प बहुत्व इस प्रकार है: कार्मण > तैजस > वैक्रिय > औदारिक > आहारक।

शरीरों का संबंध और कर्मों का प्रभाव

औदारिक और वैक्रिय शरीर एक साथ नहीं रह सकते हैं। औदारिक शरीर वाला ही आहारक शरीर बना सकता है। तैजस और कार्मण शरीर हमेशा औदारिक और वैक्रिय शरीर के साथ रहते हैं।

वैक्रिय शरीर और देवों की स्थिति

वैक्रिय शरीर वाले देव और नारकी 48 मिनट के बाद वयस्क जैसे हो जाते हैं। उनका आयु कर्म के हिसाब से चलता है, लेकिन शारीरिक विशेषताओं में ज्यादा बदलाव नहीं होता है।

कर्मों का फल और अंधत्व

कर्मों के कारण देवी-देवता भी अंधे हो सकते हैं। दर्शनावरणीय कर्म, मोहनीय कर्म और ज्ञानावरणीय कर्म के कारण अंधत्व हो सकता है।

समापन

यह कक्षा आठवें शतक के नौवें उद्देश्य पर आधारित थी, जिसमें कर्मों के सिद्धांत और आत्मा के साथ उनके संबंध पर विस्तार से चर्चा की गई।

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Transcript

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0:00 Abhuthyo mi abhita raiyam devasyam khameo? Iccham khameo mi raiyam devasyam. Jankinchi apatiyam parpatiyam batte paane vinay vya vachche. Aalave sanlave ucchasane samasane. Antarvasay uvarivasaay. Jankinchi majjavirai parihidam. Sumumamwa bairambwa. Tubbe jana ha aham na jana haami. Tats samichami dhukadam.

0:46 Thank you. I am the one Jaya Jada Jeeva Joni Viyanao Jagaburu

1:35 Jagananda Jaganaho Jagabandho Jaya Jada Priyama Ho Vaya Jaya Shuyana Babam Tethaya Ranam Vapachimo Jaya Jaya Gurlho Gaaram Jaya Mahapamahami Sarva Rishta Pranashaya Sarva Vishtar Tadayani Sarva Napti Nidhana Sri Doktam Svaminenam Sri Siddharvan Svaminenam Agnyanthi Miramdhanam

2:22 Nyanaunjana Shalakana नेत्रमन में नितम येदान स्तरस्विन स्री गुरवेवा दर्वा मत्यानवन्दामी सहेब जी प्रणाम सभी को आज 17 में 2026 के दिन हमारी अभी तीसरी क्लास जो है वो भगवती सुत्र आगम माचना की है आज हमारी दो सो तीनवी क्लास है और आज से हमें विभाबेन जी कामदार जो है आज से भगवती सुत्र की जो समरी है

3:08 वो हमें हम सब को देगी मैं विभाबेन जी कामदार जो है उनसे विनंती करूंगी कि वो हमें क्लास की समरी सुनना है पिछले क्लास की तेंक्यू वेरी मच पुपकु मत्येण मंदा में साहिब जी और प्रणाम सभी को साहिब जी आपने लास्ट क्लास में बताया था आठवा शतक और नौवा उद्देश का विशवई कार्मन शरीर शरीर मतलब समूह जिस वरगरां को ग्रहन करके आत्मा ने जैसी रचना की है उसे शरीर नाम की संग्निया दी � कार्मन वर्गना के समु का बना हुआ पिंद को कार्मन शरीर कहेंगे। जब जब

3:56 कार्मन वर्गना के पुद्गल परमानों जिस दर्वाजे से आएंगे वह अनन्द की संख्या में ही आएंगे। यहां अनन्द की समुहात्मक संग्या पिंद है। आत्मा के असंख्य प्रदे� इतने बड़े अनन्त प्रमार में गुण है और आत्मा ने ही अनन्त प्रमार में कार्मन वर्गना के पुद्गल पर्मानु ग्रहन करके लेयर बना कर सबी गुणों को डख दिये हैं। अनन्त कार्मार में अनन्त प्रमार में कार्मन वर्गना के पुद्गल पर्मानु ग्रहन क

4:47 आत्मा द्रव्य से एक एक गुण से अविनाशी शाश्वत है। आत्मा के जिस प्रदेश पर अनंत कार्मन वर्गना के पुद्गल परमानों चिपक गए। उसने जिस गुण को ढगा और जो आवरण आया उसे प्रयोग बद कार्मन शरीर कहेंगे। ज्ञान गुण पर आवर सामुहिक अनन्त कार्मन वर्गना को कार्मन शरीर नाम दिया है केवल गनान एक ही गन्यान कहलाता है लेकिन जब केवल गनान के उपर आवरण आता है तब मति गन्यानावनिय कर्म शूत गन्यानावनिय कर्म अवदी

5:34 गन्यानावनिय कर्म और मन पर्यानावनिय कर्म कहलाएगा � जब जब आत्मा अपने जिस गूण के विपरित विरुद आजरण करेगी, तब तब कर्म बांदेगी, वह उसी गूण के आवरिन कर्म के रूप में रहेगे, आत्मा के बिना कर्म होता ही नहीं, और आत्मा बांदे तो ही कर्म बंदते हैं, आत्मा नहीं बांदे तो कर्म नही ग्णान अतिचार का पालन करेंगे तब नए कर्म का बंद होगा जी साहिब जी

6:22 अब आगे का आप हमें पढ़ाएं बहुत बहुत बहुत बहुत बहुत बहुत बहुत बहुत बहुत बहुत बहुत बहुत बहुत बहुत बह� बहुत ज्यादा हैंट विपिंग हैंट सोते जा रहे हैं अब जिस तरह से हम यहां पर पढ़ रहे हैं आप देखिए ठ्याल आ जाएगा

7:09 यहां बिसे चल रहा है कारवन शरीट तो देखिए कार्वन शरी का सीधा यहां पर क्या अर्थ है जब जब आत्मा ने जिस जिस प्रकार की कर्म प्रकृति बांदी है और वो कर्म जो है आत्मा के प्रदेशों को चिपतर जो रहा है अब कोई छोटा है कोई बड़ा है किसी में कम है किसी में ज्यादा है यह हमारे ल एक कार्मन बरगना के खुदल परमानों का समुभा पिंड बन जिसने आत्मा के गुण को ठग दिया है साथ। अब काल भी तो है काफी लंबा, हम बार-बार भी तो बांध रहे हैं, अनेक प्रकार

7:55 की कर्म प्रकृतियां बांदी हैं, यहां प्रश्ट ने ये पूछा जाया है क अभिरुद्ध आचरण करने के लिए हमारे पास यहां पर एक साधन मन का है, एक साधन वचन योग का है, एक साधन का है, एक वचन का है, इधर ये पांचों इंडरियां और तेइस विशे हैं, अब ये करी रहे साधनों का दोस्त नहीं है, त्यान देजिए, साधन तो जड़ ह जड़ पुद्गल पर्मान हूं है कि जिसको लेकर आपने बनाए लेकिन अब ये जो

8:43 बनाए है तो बनाए हुए को आप समझ सकते हो कि करम तो हमारे ही बनाए हुए है मैंने ही बनाए हुए साथ तो अब जब बनाए तो कार्मन वर्गना के पुद्गल पर्मान हुए मैंने क्य एक एक फोल्डर के अंदर कब किसके साथ किस प्रकार से क्या किया तब उस कर्म की प्रकृति बनती है अब इसका डिवीजन हो गया कोई मतिक ज्ञाना वरने कोई सुरुतक ज्ञाना वरने कोई अवधिक ज्ञाना वरने कोई मनपरेग ज्ञाना वरने कोई केवल ज्ञाना वरन आगाश में देख रहे हो ना, कोई सुर्य भी है, चंद्र भी है, ज्रह भी

9:30 है, नक्षत्र भी है, राशी भी है, तारा भी है, यहाँ पर कोई मधिक ज्याना बरनिय करम भी है, कोई अवधिक ज्याना बरनिय करम भी है कोई मनभ पर ज्याना बरनिय करम भी है, कोई तो सबकी अ आपने सोसाइटी बोल दी तो सोसाइटी क्या है यह तो एक ग्रूप नाम है अब इस अब लेने वाले 500 लोग हैं उनके फ्लैट हैं वो रहते हैं सबका अपना अपना है यह आपको समझना यह देखिए दर्शनावर्निय कर्म है अब इतनी दर्शनावर्निय कर्म की परकृति ह

10:23 ठीक है मैं तो यहां पर चित रहे तो ब्लैक बोल पर इतनी इतनी कर रहा हूँ, आज केवल ज्यानी को कुछने जाओ, तो सिमंदर स्वामी तो कहेंगे कि भई हम तो अनंत कार से, अनंत बाहर एके कर्म को बाद रखें, एके कर्म की प्रकृति को अनंत बाहर बादा है, क्यों � ज्यान की विराधना, ज्यानियों की विराधना, ज्यान के उपकरणों की विराधना, अब ये आज की जनम में क्या आज हमने एक ही बार की है, जी नहीं, अनन्त जन्मों में हो गई है, अनन्त बाहर हो गई है, तो बने कर्म की प्रकृति बनी हुई है, अब वो कर्म की प्रकृ

11:23 बहुत लंबे काल तक चलेगे, आप कितने जदम भी ताते जाओ, एक काही राष्टर कूट के भव में जो करम बांदे, तो अब दूसरे जदम में चल करके, म्रगा पुत्र बन जाएजा, अब म्रगा पुत्र बन कर आए तो स्वभी आया कि नहीं आए, आप ये बताईए, अन कुछ पुन्य प्रकृति लेकर देवगति में गए। इधर जो है ये नाम कर्म है, ये गती नाम कर्म का पुन्य है, उसको देवगति में ले जा रहा है। लेकिन ये भी तो कर्म प्रकृति साथ में चलेगी कि नहीं चलेगी।

12:12 इसमें से कुछ का उसका हो गया, ये लेगा। य वो देवता है, तो देवधती की अंदर अब वहाँ पर उसको अवधी ज्यान, अब ये अवधी दर्शन, तो क्या होगा उसको बाइबर्त है, जनम जात वहाँ की फैसलिटी है, ये जीव यहां से गया है, अवधी ज्यान, अवधी दर्शन से क्या करेगा वो, क्या वो अपने अवधी ज्ञान का उपयोग सिर्फ आपको दूर के अंतर का जानने के लिए, अवधी दर्शन का उपयोग दूर के अंतर का बैठे-बैठे देखने के लिए है, इसका

12:57 मतलब यह नहीं है कि वो अपनी मेमरी बना लेगा, वो अपनी याशक्ति और सुधार लेगा, वो अपनी � प्रक्रति किसी का दूसरी प्रक्रति का खाव नहीं करती है सब अब यहां पर क्या पूछ रहे बगवन अब दर्शना बरनी कर्म भी तो उस जीवने बांधा है तो क्या किया उसने दर्शना बरनी कर्म बांधने के पीछे तो यहां पर आवरन पहले इसके इन कर्म प्रक्रतिय

13:45 अब आस्रव की क्रिया उसने क्या की आस्रव के हेतू उसने क्या की जिससे चल करके कर्म बंदा है। आस्रव की क्रिया हेतू दो इकटे हो करके अब यहां से यह और यह दोनों इकटे हो करके यह कर्म बना रहे हैं। तो यहां पर भगवन कह रहे हैं कि इस जीवने अपनी तरह किस तरह से क्या किया उसने, जो ग्ञाना वर्णिय कर्म के अंदर ग्ञान से विरुद्ध विपरिक्षला है, खला किने बैसे ही यहां पर ग्ञानी के प्रती द्वेश किया है, ग्ञान पढ़ने में किसी को अंत्राय किया

14:34 है, ग्ञान का निन्हा होतिया है, अपलाप किया है, � انادر اپناں کی یہ ٹھیک درشن کے بھی ساتھ میں چلتے ہیں تو اس سے درشنہ ورنیہ کرم بھی ساتھ میں بندے گا جانہ ورنیہ کرم بھی ساتھ میں بندے گا اب یہاں پرشن پوچھا گیا ہے بھگوان شاہ تھا بیدنی ترمان پرائیوک بند جیب کس پرکار سے کیوں کرتا ہے کیسے ہوتا ہے تو بھگوان نے سپسٹ کیا کہ یہ ہے یہاں پر یہ ہے بیدنی ترم अब बेदनिय कर्म के ये दो डिवीजन कर लिए ये हो गया शाता बेदनिय ये हो गया अशाता बेदनिय और यहां

15:20 पर इसी भी कर्म प्रत्रतियां अंदर की बनी हुई है अब जो जितनी कर्म की प्रत्रति जैसी बांद करके लाया है अब उस रिसाब से उसको देखना है तो जिसने प्राणियों के उपर अनुकंपा की है, जीवों के उपर दया करुना की है, और जिस तरह से किसी का भला किया है, हित किया है, किसी को सुख संपत्ति दिया है, किसी के सुख में सहयोगी कार्णे बुद्निमित बने हैं, किसी के हित के लिए अपनी तरफ से उन्होंने ताकि जन्मत अन्मांतर में बविश्य में भी वे जीव जो है सुख

16:09 शाता, शारिरिक, मानसिक, वाचिक शाता प्राप्त करते हैं। ठीक इससे भी परे जो तूसरों को दुख देता है, तकलीप देता है, फिड़ा पहुंचाता है, परेशान करता है, हैरान करता है, मारता है, � वो कर्म कार्मन शरीर के रूप में आत्मा के साथ है। शरीर के ओंता नाम दिया है कि जब मृत्तिव हो जाती है और ये शरीर हम छोड़ देते हैं और जब चले जाते हैं तो आग के लिए ये कार्मन शरीर साथ में चलता है।

16:54 ये कर्म की प्रत्रति आत्मा के साथ में ये जन्म मैंने तो ऐसा कुछ नहीं कि अरे भाई क्या करके आए हो ये देख लो ना अब बताए उनको देवी देवताव को वहाँ अवधिक ज्यान है ये अच्छा है कि खराब है अरे भाई अवधिक ज्यान इतना अच्छा है कि आपको अपने ही खुद के पिछले जनम याद करा दे द तो स्वयम के लिए भी भाइद है, जब दूसरों का देख सकते हो, तो अपना पुद का क्यों नहीं भाइद? ये बगवन, अब ये जीवने मोहनिय कर्म इतना क्यों बाढ़

17:41 रखा है? ये बाला मोहनिय कर्म है. ये बगवन, जिन जीवों ने तिवर क्रोध किया है, तिवर मान देखें, यहां पर तीवरत शब्द क्यों लगाया है? क्योंकि अब उसकी लेश्या, अब किस लेश्या से उसने कैसी ये कर्म बांदा है, कितने प्रमान में बांदा है, ये लेश्या उसकी काम तर रही है, इसलिए तीवरत आई है, तो तीवरत आसे करेगा, तो फिर अनन्तान

18:31 नरक गति का आयुश्य जीव क्यों बानता है? जब नरक पसंद नहीं है, नरक दुपदाई है, नरक में जाने की इच्छा भी नहीं है, तो भी नरक गति का करम क्यों बानते हैं? एक अउतम, ये जीव जो है, नरक गति के महा आरम समारम करते हैं, महा परिद्रव करते हैं, खास और एकेंद्रिया अनंत कायादी जीवों के इंसाती प्रवरत्ती जादा करते हैं। ऐसे जी ये नरत गती नाम कर्म बांदेंगे और फिर ये कर्म इनको नरत गती में ले जाएगा समये। तो यहां पर ये गती नाम कर्म कौन सा

19:20 है। अब आप अलग-अलग कौन सा कर्म बांद और इन अलग-अलग कर्म की प्रक्रतियों में आप यह देखिए कब कौन सी कर्म प्रक्रति जीव बांद रहा है। उस रिशाव से जो है। खाली इसका काम तो क्या mechanical काम है कि नरग गति नाम कर्म बांदा है जीव आत्मा को यहां से नरग में पहुंचाना है। अब उसमें अ� ये पहले समझना, इसलिए यहां जैन धर्म के अंदर, जीव हिंसा को बढ़ा पाप बना करके, हमने बर्च करने के लिए, इसका त्याग

20:10 करके आप महवरत में आ जाएए, अनुवरत में भी आए, तो भी हम जड़े, जीव हिंसा का त्याग करे, तो ये नरगती नाम कर्म हमारा तो जो जितनी जीव दया पालेगा, जीव इंसा से बचेगा, उसके लिए नरगती का करम टल गया भाई साम। हे बगवन जीव तिरियंच गती का करम क्यों बानते हैं? कि इसन करमों के कारण जीव तिरियंच गती में जाता है, हे गवतम माया करने से, खास करके परवंचना करन

20:55 छिपाने से घूड़ चेष्टा करने से मिध्या जूट बोलने से जूठे तोलमाप रखने से क्या लाया तिरियंच योनिक आयुष्य कार्मन शरी नाम करिशरी बानता है अब ये जा करके तिरियंच गती के अंदर जन्म लेगा अब पशुपक्षी के रुप में बनना पड़ इसमें सब प्रकार का हैं अब जिसको जो बाना हो वो अपनी तरह से प्रयत न करे तो बगवन ने कहा है जो प्रकृति से स्वभाव से सरल आत्मा हो स्वभाव में विने विवेक की नम्रता अच्छी हो तया करूना अच्छी हो

21:42 इर्श्या जेलसी न हो माया कपड़ न करे म्रद अब मनुश्य गति में तो आ गए लेकिन माया को पटती साथ में, तो वो फिर आपको स्त्री जदम भी दे देते हैं, ये भी साथ में जोड़ा गया है, अब ये पगम परमात्माजी देव गति का कर्म क्यों कैसे बानते हैं, तो देव गति के आयुश्य कर्म बानने में सराग स पाल जीव है अग्णान पुर्वत भी तपश्रया करते हैं यह अकाम निजना भी करते हैं तो यह जीव देवकति के आईश्य और कति

22:32 कर्म बाते देवकति में जाते हैं अब सभी कर रहे हैं आप देख रहे हैं अब गवंत शुभ नाम कर्म के इसे जीव बानते हैं यहां पर 103 � तो यह आई इसमें नाम तर्मा की प्रकरतियों में अब इसमें 103 के अंदर शुब नाम भी है अशुब नाम सौगा के भी है दौरबा के भी है यह भी है अपयश भी है आदेव भी है अनाय देव यह क्या है सब शुब अशुब का बेद क्यों हुआ जीव यहां पर अपना जी�

23:20 اسی لئے ہوتے ہیں نہیں تو کوئی گارن نہیں ہے کوئی بھی کرم بندے گا تو آسرا کے ایتو اور کریہ سے ہی بنتا ہے اب وہ آسرا کے ایتو کریہ سے بندہ ہے تو جیو اس پرکار کرے گا تو بندے گا نہیں تو نہیں یہ بات اس کے ساتھ جھوڑی ہے اب آپ کو خیال آ جائے گا سمجھے گے تو یہاں پر جیو اشرب نام کر اب ایک تو مایا کپٹ کرے بھاو اکرت کردے سا बहाशा कराब कर दें और फिर जो है विसमवादी वाक्य रतना अशुब लेंग्वेज गाली गलों की भासा अशुब नाम कर्म में अपयाश नाम कर्म बाते हैं ये बहुत्व जीव जो है उच्छ गोत्र कर्म कैसे बनता है

24:11 ये है गोत्र कर्म अब इसमें ये उच्छ गोत्र � अग इसकी भी कर्मप्रकृतियां हैं, इसकी अंदर भी जीव जो है, कब कौनसी कैसी कर्मप्रकृति बांदे, और एक ही बार बांदता है क्या, चुँकि गोत्र तो एक बार में, एक भव में एक ही बार, लेकिन इतनी कर्मप्रकृतियां जीव बांद के रखे, तो बविश्य ये कही बार नरग गति में जाकर आए, इससे कोई करम का इसाब पूरा नहीं हो जाता है, समाब्द नहीं हो जाता है, फिर बार बार जाना पड़ता

24:59 है, अब ये उच्च गोत्र कर्म बादने में क्या है, तो भाई जो जो है आठों प्रकार के अभिमान मद न करे, जाती का मद है, कुल का मद है, वंश का मद है, सत्ता का मद है, संपत्ति का मद है, एश्वर्य का है, रूपरंग का है, शुरुत्र का है, ये किसी प्रकार का मद अभिमान अहनकार ना करे, वो जीव उच्च गोत्र कर्म बान देगा, और जो मद अभिमान करेगा, वो नेज गो मेरी जाती का, मेरी खुल का, मेरे वन्षित का, मेरी खांदानी का, मेरी स्थभवक्ति का,

25:46 मेरे रूपरंद का, मेरे संदर्य का, मेरे ज्यान का, बुद्धी का, शक्ति का, सत्ता का, ये सब नुशान कारत. ये आपके लिए अनर्थकारत है, इनसे बचना बहुत जबुरी है, � यह जो कर्म है अब ये कर्म क्यों बानता है जी अब कितनी कर्म की प्रक्रतियां इसने बांग के रखी है यह अंत्राय कर्म के अंदर भी आप देखिए समझे कि लिए तो यहां पर यह जितनी

26:33 अंत्राय कर्म की प्रक्रतियां बांगती है दान में, लाप में, फोग में, इबेरिय में, जो जिसको बिगन करता, जो जिसके जीवन में, व्योखार में बिगन उपस्तित करे, विक्रती करे समझे के नहीं, ऐसी स्थिति के अंदर जो जीव जो है, अंत्राय कर्म बांगता है, तो वही उद्धे में आता है, वैसा ही कर्म कभी तो आपकी दान की अपर्वृति में अंत्राय होगा, कभी लाप में अंत्राय होगा, कभी भोग में अंत्राय होगा, कभी वीरिय शक्ति में अंत्राय होगा, ये सब कर्म की प्रक्रतियां बार्मा रुदय में

27:23 आती और बार्मा रुदय में आने पर वो जी उसी प्रकार क अमिर से गरीब बना दे, ऐसी आलत होती है उसके, ये बगवन्पव, अब ये ग्ञाना वर्नियत कर्म, दर्षना वर्नियत कर्म आदी जो बानते हैं, देश से बानते हैं, किस प्रकार से किसने बानते हैं, कैसे कैसे बानते हैं, आयुष्य कर्म भी, अब वो गती के साथ में य अब ऐसे कर्म जो जो बाग ले अब कितनी कर्म की प्रत्रतियां हो

28:09 गई और यह आत्मा के साथ चल रही है जनम जनम चल रही है आप सोचिए समझे के लिए अब इन सब का एक सामुहिक नाम जबहन देते हैं यह जो सामुहिक नाम जिसको आप कर्म देते हो यह कर्म बोलो अब इसको कार्मन शरीर बोलिये आप इधर देखिए अब ये क्या हो रहा है मृत्य हो रही है मृत्य होने का मतलब क्या हुआ ये शरीर आपका छुड़ गया शरीर छुड़ गया अब शरीर को जला

28:55 देगे मन भी चला गया अब बताएए अब आपको क्या दिख रहा है यहां प बुले बिजल बेंजी क्या दिख रहा है? आत्मा पे कर्म के आवरन दिख रहे हैं कर्मा के ऊपर यह जो है यह सब कर्मा है अब यह कर्म उसके साथ चल रहे हैं अब ब्रत्य ओ गई शरी छोड़ दिया और आत्मा जा रही है तब जाकर कि आपके इसी कर्म को नाम दे दिया कि � बाहर का शरीर दूसरा धारन करें, न करें, ये हात्मा

29:44 के साथ चले दे से, अब इसको एक गती में से दूसरी गती में जाने के लिए समय तो लगेगा, कितना लगेगा, जो भी दो-चार समय लग जाए, एक शेत्र से दूसरे एक शेत्र में पहुंचने में, एक गती से दूसरी दूसरे जदम में अब वहां जाकर के नया शरीर कौन बनाएगा? ये करम बनाएगा से. वहां जाकर नया शरीर चो बनाने का काम करेंगे ये करम करेंगे आपका. तो इसको जहात में जाना जरूरी हो गया. अब आत्मा को ढखने वाला जैसे हमारा शरीर है, हमारे शरीर ने प�

30:34 पुरे शरीर में आत्मा के प्रदेश फैल करके रहे हैं और उपर पुरा शरीर का अवरन आ गया है तो यहां पर कौन ढग रहा है अभी तो यह शरीर छुट गया नहीं है तो अब यह कौन ढग रहा है यह कर्म की प्रक्रतियों का एक ग्रूप है समू है इसलिए शरीर संद्ध And until you become a karma-vargna, you will become a karma-vargna. After the karma-vargna, you will be locked up with the karma-vargna. After the karma-vargna, you will become a karma-vargna.

31:22 Now, when you say karma-karam, karma-karam, then you will be the karma-karam. Now, this is the karma-karam, the karma-karam, the karma-karam. इसमें से यह रहेगी आपको, इसमें से यह रहेगी आपके साथ में, अब पूरा इसका लिष्ट निकालो, कौन सी दो प्रकृतिया, कर्म की प्रकृतिया, जो परस पर विरुद्ध है, वो साथ नहीं रहेगी, उच्च गोतर और नीच गोतर दो एक साथ नहीं रहते हैं, चार पूई पीन तो छोड़ नहीं पड़ेगा एक ही रहेगा

32:09 लेकिन ज्याना बर्णिय में सब रहेंगे दर्षना बर्णिय में सब रहेंगे मोनिय में सब रहेंगे अंत्राइ में सब रहेंगे दर्षना बर्णिय के अंदर पांच प्रकार की नित्रा है वो सभी एक साथ नहीं रह कौन से रहेगी, कौन से नेगी, शाता अशाता दोनों साथ में रह सकती है, सुब में शाता दोपर को अशाता, दोपर को शाता रात में अशाता, शारीरिक शाता है, मानसिक अशाता है, अब ये सब अलग अलग अलग है, मतलब मनुष्य का या समस्तर जीवों का पूरा जीवन

33:00 हाला कि दुनिया के कोई धर्म वैवस्ता बैठा नहीं पाएं, वो उनकी गल्ती है, उन धर्मों के अंदर वहाँ वैसे सरवर्द में नहीं रहे, तो उन्होंने नहीं बनाई ऐसी वैवस्ता, चलो इश्वर के उपर ढाल दिया, अब इश्वर क्यों सुख देगा, इश्वर क् क्या बात हैं? तो यहां पर इश्वर के उपर नहीं डालना, यह जैन धर्मकी बहुत बड़ी विशेश्था. तो महावेर स्वामी केवल ज्यानी थे, बहुत अच्छी तरह से जगत के अनंत, समस्त,

33:47 जीवों की व्यवस्थात, और सब की अपने-पने करम के इसाब से बैठे. � सुनस्तर जीवों की लगाम दोरी जो है इश्वर के आत्मे दी और वो भी फिर इश्वर ने क्या दिया कि इश्वर की इच्छा बस आपको कोई अधिकार नहीं है बोलने का आपको सुख दिया कि दुख दिया किसको क्या दिया कम ज़्यादा दिया आपको बोलने का कोई अधि यहां पर सब जीवों का इसाब अपनी अपनी कर्मप्रक्रव सबका अपने अपने हाथ में हाप अपने इसाब से करो बस

34:37 किसी की बात कोई एक भी बात कि हमारी कोई इश्वर के आग में कुछ भी दे तो कितनी बड़ी विवस्ता कर दी अब यह सब कर्मप्रक्रतिया जितनी ब आप देख दीजिए साथ, सब की टाइम डेमिट जो है, वो कम ज्यादा, कम ज्यादा, कम ज्यादा क्यों है? वही बांदे समय आपने कम ज्यादा बांधी, इसलिए कम ज्यादा है. बांदे समय ही आपने इस प्रकार की बांधी

35:22 है. अब एक शहर है, एक शहर में एक राख बिल् सब की सब की सबी बिल्डिंगों की जो है एनर्जी शक्ति टाइम लिमेड सब कुछ एक सरी की रहेगी नहीं रह सकती है अब सब ने अपनी अपनी तरह से किसने कम जादा कम जादा सिमेंट विगेरे काव कैसा उप्योग किया है क्योरिंग कैसे किया है क्या क्या कम जादा कैसे यहां सब की एक साइस नहीं एक सरीकी व्यवस्ता है जी नहीं है समझे के नहीं तो यह सब अलग-अलग प्रकार्टी रहती है अब यहां पर बगवन तर ने अलग से प्रश्ण पूछा

36:09 कि यह बगवन ज्याना वर्निय कार्मन की शरीप वह कितने काल तक रहता है तो इन सब कर् दस खोड़ा कोड़ी सागरोपम की, कोई 20 की बादले, कोई 20 की बादले, कोई 15 की बादले, कोई 5 की बादले, सब अलग-अलग. दो घड़ी के अंतर मूर्त से ले करके 30 खोड़ा कोड़ी सागरोपम तकी रेज़. अब सभी जीव अपने अपने इसाब से जो चिस तरह से मान � अब ये भी कोई पांस की बांदे, कोई दस की बांदे, कोई पंदरा की बांदे, कोई बीस काज, कोई पचेश्री, कोई दीस की, ऐसे जो है,

37:00 अब छोटी बड़ी, छोटी बड़ी सम है, अब किसी ने पांसो अजार साल की जो है, चक्षु दर्षना वर्णिय कर्म की प्रकृत اب سو سو برس کے وہ آئیوشے دس کرے گا تب اس کے اجار برس اندھاپن وہ اندھاپن اس کے ساتھ چلے گا اب جہاں جائے جہاں جائے اس حساب سے گتی کونسی باندے گا یہ کونسے کرم کتنے باندے گے اب آ رہی ہے بات کہ اس کے یہ موہنیا کرم ہے अमोनिय तर्म की बंदस दिती, कोई 10 की बांदे, कोई 5 की बांदे, कोई 12 की बांदे, कोई 15 की बांदे, कोई 20 की बांदे, कोई 30 की

37:48 बांदे, और लास्ट में सिट्र, कोड़ा, कोड़ी, सादरो, कम तक की बंदस दिकिया है, यह कि जीवने भी कम ज़्यादा कम ज़्यादा प् जब आपके आर्थर और अध्यान जिस प्रकार के कम ज़्यादा थे उस इसाफ से बंदी हुए तो ये जब बंदी है हमने बंदी है तो ये साथ में चलने ही वाली है उतने काल तक उतने भवों तक तो कि इनको तो आपको सिर्फ काल देखना है

38:35 दो तो यहां पर आयुशे कर्म क अब आप चलिए वाइसा दूसरे वह में, तीसरे वह में, चौतरे जदम में, आगले के अगले जदम में, आपको तो यहां पर भौव तो बदलते जाएंगे समझे के नहीं, इन कर्म के प्रक्रतियों को भौव नहीं देखना, यह अपने बंद स्थिती के लंबे काल से हैं तो हमारे यहां पर करोड़ पती के घर में कोई mentally retardant बच्चा जदम ले तो भाई साब करोड़ पती घर में क्या करेगा को mentally retardant तो बुद्धी कहां से

39:20 लाएगा अब करम तो जिस प्रकार के जैसे साथ में लेकर आया है उसका क्या करेंगे आप करोड़ पती के घर में जदमे हो यह आ नया कपना पहनेंगे गारी में लेकर गुमने ले जाएंगे लेकिन अब मेंटल इडिटाइटनेस है वो तो है यह साथ में चल दे है संदे के बगवन्त अब यह जी अंत्राय कर्म को तो अंत्राय कर्म के भी वही आलग है कोई दस की बादे कोई पांस की बादे कोई पग्रा क

40:08 यहां पर आप इनको देखिए नाम कर्म के ये प्रकरतिया चल रही है ये बीस कोड़ा-कोड़ी की मैक्सिम बोत्र कर्म की आप देखिए ये बीस कोड़ा-कोड़ी की मैक्सिमम चल रही है सब कोड़ा-कोड़ी साथ रूप में द्यान रखिए तो करणों को करणों से गुनाका अब उसकी बंद स्थिति लंबी है, तो आपको कितनी बार नीच गोत्र में जाके जनम लेना पड़ेगा, अब ये देखो, ये देवगती बान लेगा, अब आप देवगती लेकर के देवगती में जाके देवता बन गए, देवता बन

40:53 गए आपका तीन सागरों पमका या पाँ आभी योगी बनना पड़े, नोकर चाकर के चनम लेने पड़ेंगे, आपको वहाँ पर अलग से स्थान बिलेगा, जाओ भाई साथ, आप वहाँ रहो, आप वहाँ पर जो है, नोकर चाकर की तरह से, आपको वहाँ पर स्वीपर बनाना पड़ेगा, जाडू पोचा लगाना प अभी चोड़े जे कहें कि नहीं पुन्य से देवगति मिलती है इतना पुन्य वो की वहां जाडू लगाएगा वाई साब देवगति के अंदर सब प्रकारते देव

41:44 तो मारसाब आप देवलोक में धुलाबारी भी होता है क्या सब होता है क्यों नहीं होगा यह सब प्रकारते ए اب یہاں پر گالی گلوچ کر کے نیچ گوتر باندھا ہے تو وہ وہاں جا کر کے جو حریجن کا کام بنگی کا کام میتر کا کام چندال کا کام کھالائے کے نہیں جو کرنا پڑتا ہے اس ویپر کے روپ میں رہ کر کے تو دیو گتی میں جانے سے کوئی کوئی ایسا تو نہیں ہے کہ وہاں پر آپ نوکر چاکر نہیں بنو گو یہ کیا بات کر دی سمجھے کہ نہیں تو یہاں پر جو ہے جو کرم جس پرکار کے باندھے ہے उस प्रकार

42:30 की व्यवस्ता है लोकक्षेत्र के अंदर वहां उस प्रकार की वैसी व्यवस्ता हो अब आत्मा जो है अल्फ बहुत्व तैजस शरीर प्रयोग बंद के देश बंदकों एवं अबंदकों के अल्फ बहुत्व के विसे में इस प्रकार से है आयुश्य को छोड़ करक The mantra is karma, the body of the people, the people of the people, and the people of the people of the people of the people. Now, look at the karma, they all know less and less. Who doesn't know who is being the siddha? It doesn't matter. The siddha Bhagavan is not one of the karma. All karma is born. All karma is

43:18 born. All karma is born. And the soul is born. That is the siddha-swar-la. اسی کو موکشہ کہتے ہیں اب دنیا کے جس دھرموں نے کرم کا حساب ہی نہیں مانا ہے وہ موکشہ کیسے مانیں گے اب عشور کی اچھا سے آپ کو موکشہ ملے گا کی سورگ ملے گا کی سکھ ملے گا کی کیا ملے گا تو وہاں انہوں نے الگ سے بیٹھا ہے اب یہاں پر کارمن شریل پریوگ بنتے تھا بھید پربیدوں سے آپ کو الگ الگ طریقے سے یہ پاس سمجھائے گی तो ये सेतु आप समझ गए, अब इस में से आपको पांच शरीरों में एक दूसरे के साथ बंदक कैसे, ये समझना है,

44:04 ध्यान देजिए अध्याय, ये शतक पुरा हो रहा है यहाँ पर, ध्यान देजिए ये हो गए पांच शरीर, अब इसके अंदर आपने क्या देखा आउदा अब आउधारिक और ये दूसरा है वैक्रिय शरीर है तो भैस साब ये दो नहीं मिल सकते हैं साथ साथ में नहीं चल सकते हैं आउधारिक वैक्रिय कि दोनों साथ में नहीं मिलेंगे आउधारिक रहेगा तब वैक्रिय नहीं रहेगा और वैक्रिय रहेगा तब आउधारिक नह

44:53 और दोनों ही गर्भ में रहे तब ही जीव को ये लेकर के बादना है जो पत्तियोनी में जीव जाए जिसमें जाए वहाँ पर उस प्रकार के कार्वन वर्गना ये अवधारिक वर्गना लेकर के या वैक्रिय वर्गना लेकर के आपको वैसा शरीर बना बस ये दो ही चलते हैं � आप बोलो के नहीं आधा जीवन में आधारिक शरी में बिता दूं, आधा जीवन वैकरिय शरी में बिता दूं जी नहीं, नियम क्या है, जिस वर्गणा को लेकर जनम से जो शरी बनाओगे मृत्य उसी में हो, बना पूरा जीवन एक ही शरी चलेगा से, आप दो शरी नहीं पत

45:52 यह अपना स्वतंत्र है इसको आउधारिक के साथ में मतलब कैसे आउधारिक शरीर वाला ही आहारत शरीर बना सकता है वैक्रिय शरीर वाला आहारत शरीर नहीं बना सकता है क्योंकि यह किसको बनाना है चाउदा पुर्व धारी आहारत लब्दी धारी चाउदा पुर्वी ओ व दिवता वाले नहीं बना सकते हैं, लेकिन जो अवधारिक वाले हैं, वो बनाएंगे तब अवधारिक को छोड़ करके आहारक में जाए, फिर आहारक को छोड़ कर आहारक को छोड़

46:38 कर आहारक को लेकिन आहारक में जनम मरण नहीं होता है ना, इसलिए आवधारिक शरीर धारी � कोई कंपल सरी नहीं है कि सभी बनाए ही बनाए यह कोई शौक नहीं है आपके पास शक्ति सिद्धी है तो मैं बना लू यह शौक नहीं होता है यह जब आपकी अनिवार्यता आवश्यक्ता लगे तो बनाए नहीं तो नहीं बनता है अब यह कौन है कि यह दोनों साथ में चलते और तैजस कार्मंद है, इनके आहारत के साथ नहीं

47:24 है, लेकिन जब है तब आउधारी के साथ में हैं, तो तैजस कार्मंद है, दोनों आउधारी के साथ भी, दोनों वेकरिये के साथ भी अनिवारिये चलते ही चलते हैं, आहारत का क्या है, वो दो गड़ी के लिए, वो अलग से लेकिन जब बनाएगा तब आवतारिक शरीन की ये दाइजस कारबन की आहरक के साथ तो चलेंगे ही चलेंगे, कुछ सब कर्म प्रक्रतिया तो च्छाय करने ही लिए उसने, तो उतो साथ में रहेगे उसके संजेक उस हिसाब से, अब बताएए इसके अंदर कम ज्यादा कम ज्य

48:19 तो स्वाभाविक है कि इन पांच शरीरों के अंदर अब पांच शरीरों के अंदर सबसे ज्यादा मैक्सिबम ग्रहे कार्मन शरी रहेगा तैजर शरी अब ये कितने में रहेगा अनंता अनंता जीवों में सब में रहेगा खेलें अब ये अनंता अनंत जीवों के बारे में आएगी। लेकिन अब इसके बाद वैक्रिय शरी किसमें रहेगा। असंख में रहेगा। क्यों असंख में रहेगा। देवता भी असंख है और नार की जीव भी असंख है।

49:11 दो में तो है। अब तीसरा कौन सा गुरूप आया। ये अवतारी अनंत में क्यों जाएगा मनुश्य तो संख्यात ही है लेकिन तेरियंच गती के जीव अनंत है तेरियंच गती के अंदर जीवों की संख्या अनंत है ज्यान रखिए गती बोला है मैंने तिरियन चा पशुपक्षी नहीं, पशुपक्षी के साथ साथ में चावरेंद्रिय जीव, तेंद्रिय जीव, दोईद्रिय जीव, एकएंद्रिय में प्रत्वी पानी अतनी वायू बना सभी

49:59 अवधारिक है, तो सबसे बड़ी जो है अवधारिक शरीर की संख्या जितनी अब � संख्या में इसका प्रमान तो अनंत में चलेगा लेकिन अबिकितना भी मिलाओ तो असंख्य के साथ उनाकार करो तो भी असंख्याता असंख्याता आएंगे अनंत नहीं हो जाते हैं लेकिन यहां तो तेरियंच गती बड़ी है ना तो वहां तो अनंत हैं यह समझे

50:45 के नहीं यह बात हैं अब इस तरह से यह चीव जो अउधारिक शरी देश बंदक सर्वसंख्यात उनमें से तैजस कार्मन अब यह सब के साथ तैजस कार्मन तो सब के साथ रहें गें जाए कोई भी हो आपकल यह बुलो कि दरख गती में तैजस वाई साब खाना पिना मतलब क्या नहीं है, हमारे जैसा ओधारिक आहर नहीं है उनका, छोटी सब्जी दाल चावल नहीं है, उनको भी वैकरिये वर्गना के पुद्गल परमानू लेकर के आहर तो करना ही है, और

51:35 वैकरिये वर्गना के पुद्गल परमानू का आहर करेंगे, त पुराने वाईक्रिय बर्गणा के पुद्गल परमानु शरी से भी सर्जन करना, बस सिर्व हमारी जैसे रोटी सब्जी दाल चावल नहीं है, बागी तो उनका भी जीवन है, क्यों है बाई साथ, अग्दस सागरोपम तक, बीस सागरोपम तक, तैतीस सागरोपम तक एक का एक जो गर्ब में जिस समय आये तो चार लाक योनियों में देव गति का शरीर बनाए अब वो जनम से लेकर मृत्यू तक एक सरीका तो नहीं रहेगा आजी कुछ महत्व की बात है ज्यान रखना चोड़े है जी बहां जाने के बाद

52:23 देव गति में हमारे जैसे छोटे से बड़े हो जनम जात 48 नट के बाद फुलों की शया से खड़े होते ही जो हाइट रहेगी वो मृत्यु तक वही आएट कोई परिवर्तन नहीं होगा फिर भी आपको वैक्रिय वर्गणा के पुद्दल परमावू लेना छोड़ना लेना छोड़ना लेना छोड़ना ये तो प्रक्रिया चल दिरे-दिरे height बड़ेगी, बड़े होते जाओगे, हाँ महावेदे में दिरे-दिरी height बड़ेगी, हाँ ओधारिक शरी है, यह माबाप से जनम लेना है, चलाया, तो जनम ते ही वो 500

53:14 धनुस की काया नहीं हो जाती है, आखिर बाता के गर्भ में तो कितना रहेगा जी, अब वहा अब उसके बाद में दिरे दिरे मा का दूद पिएगा, फिर बड़ा होगा, फिर खाएगा, पिएगा, फिर बड़ा होगा, फिर बड़ा होगा, अब उसके बाद में उसकी फुल हाइट आते आते आते आते आते अजारों बरस लग जाएंगे, तो पांसो दन उसकी काया होगी पांट बरस के बच्चे हो गए साथ बरस के बच्चे हो गए दस बारा बरस के डड़के हो गए अब आप पंदरा बरस के हो गए अब अठारा बीस बरस

54:02 के हो गए बस अब हाइट जितनी बढ़ने थी बढ़ गए अठारा बीस बरस तक हमारी हाइट खाते पीते बढ़ जाएग तो यह फिर बिर पहले खाते पीते ते और आइट बढ़ते थी अब वही चीजें खाते पीते तो आइट क्यों नहीं बढ़ रही वहां आपका करम काम तरह अब बस सेटिंग हो गई है आइट पूरी हो गई है आप इतना ही शरीर को दारन करके रहोगे आगे नहीं बढ़े शर अबने बताया कि वेक्रिय शरीर वाले जो देव और नार्की होते हैं वो 48 मिनिट

54:51 के बाद अडल्स के जैसे ही हो जाते हैं तो उनका आयुशे खतम हो तब तक वैसे ही रहेंगे कि एज होता है उनका एज हो रही है ना आयुशे कर्म के हिसाब से एज तो चलेगी हाइट तो ना तो मतलब जो physical features होते हैं देखने में वो वैसे ही रहेंगे, ऐसे age, वैसे, देखाव change नहीं होता है. देखाव में थोड़ा सा face आपको लगेगा, हाँ बुड़े हो गए हैं, अब रिद्ध अबस्ता आगई हैं, बड़े हो गए हैं,

55:37 ऐसा है, हलका सा changes तो आते हैं, हमारे क्या � अब जोडिया जी को पूछो तो कभी भी बुलें मैं तो बुड़ा होता ही नहीं हूं मैं तो बुड़ा होता है क्या होते हैं क्यों होते हैं क्यों नहीं होंगे अरे बाप्रवाद यहां नहीं होंगे आप यहां आपके लिए अलग प्रेवस्ता है ना मत्यरंदामी साहब जी स देवी देता भी ब्लाइंड होते हैं, चक्सु से ब्लाइंड होते हैं, होते हैं क्यों नहीं होंगे बाई सांग, करम तो साथ चलना है न, दर्षना बरनिय करम चलेंगे, मोनिय करम चल रहेगा, ज्याना

56:24 बरनिय चलेंगे, देव गती नाम करम हैंगे, आप ना बोल दो तो फिर अब देखो जैन्ज साब आपके मीत्र है साथ में ले जाना देवलोग में पता चलेगा इनको मारत सब में काफी दिनों के बाद इस लास में आया हूं लेकिन आज तो बड़ा रिविजन करा दिया अब ही मैं देख रहा हूं आपने पास्षरीर के हैं देख रहा था पार्चुवा आटोमेटिकली आहारक है, कार्बन तेज़े वेकरिया अधारीक और आहारक है,

57:12 तो रिवीजन बहुत जबनस्त हो गया, सबहरा सब मैं फिर कोशिश करूँगा इसमें आने की जे, ये आठवा शतक है ना, इसका नहुंगा उदेश्या इस विसेका Now, I am

58:05 Chathari Logatma, Arihanta Logatma, Siddha Logatma, Sahu Logatma, Kevali Pandatodammo Logatma. Chathari Saranam Pabajjani, Arihante Saranam Pabajjani, Siddha Saranam Pabajjani, Sahu saranam pabajjami kevalipannattam damlam saranam pabajjami sarva mungalam dharlyam sarva kalyan karanam pradhanam sarva dharmanam jai nam jayati shashanam

58:55 dharmala bachale badbatashatam. Karwanna, Sahajji, Sahajji Shatama Raju. Thank you.

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