Mudda Aapka: वन नेशन वन इलेक्शन | 24 September, 2025

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संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो "एक देश, एक चुनाव" की अवधारणा और भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसके संभावित प्रभावों पर केंद्रित है। पैनलिस्ट इस विचार के आर्थिक लाभों और कमियों का पता लगाते हैं, जिसमें चुनाव संबंधी खर्चों में कमी, शासन में सुधार और विकास नीतियों पर निरंतर ध्यान शामिल है। वे इस प्रणाली को लागू करने से जुड़ी तार्किक चुनौतियों और राजनीतिक विचारों पर भी चर्चा करते हैं, साथ ही इस बात पर भी प्रकाश डालते हैं कि कैसे एक साथ चुनाव देश के सामाजिक ताने-बाने और समग्र विकास को प्रभावित कर सकते हैं।

  • एक देश, एक चुनाव से देश की अर्थव्यवस्था में 1.6% जीडीपी का इजाफा हो सकता है, जिससे लगभग 7 लाख करोड़ रुपए का फायदा हो सकता है।
  • बार-बार चुनाव होने से आर्थिक तंत्र प्रभावित होता है, विकास योजनाएं बाधित होती हैं और प्रशासनिक मशीनरी पर असर पड़ता है।
  • एक साथ चुनाव होने से सामाजिक बिखराव को रोकने, आपसी सहसंबंध बनाने और सामाजिक सौमनस्य बनाने में मदद मिल सकती है।

परिचय

कार्यक्रम "मुद्दा आपका" में एक देश एक चुनाव और अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभाव पर चर्चा की गई है। संसद की संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी की अध्यक्षता में एक बैठक हुई, जिसमें आर्थिक विशेषज्ञों ने एक देश एक चुनाव से जुड़े आर्थिक पहलुओं पर अपनी राय दी। रामनाथ कोविंद जी की अध्यक्षता में गठित समिति ने एक देश एक चुनाव कराने के पक्ष में अनेक तर्क और सुझाव दिए हैं।

संसदीय समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी का वक्तव्य

रामनाथ कोविंद कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार, एक साथ चुनाव होने से देश की अर्थव्यवस्था में 1.6% जीडीपी का इजाफा होता है, जिससे लगभग 7 लाख करोड़ रुपए का फायदा हो सकता है। आचार संहिता के कारण गवर्नेंस लगभग पैरालाइज हो जाती है, जिससे गरीब आदमी का काम नहीं हो पाता और टूरिज्म का नुकसान होता है। इन नुकसानों का संकलन नहीं किया गया है।

एक देश एक चुनाव: आर्थिक पहलू

मुकेश कौशिक जी के अनुसार, एक देश एक चुनाव से आर्थिक फायदे होने वाले हैं, लेकिन इसके राजनीतिक नुकसान, व्यवहारिक पक्ष और सामाजिक पहलुओं पर भी विचार करना होगा। 1967 तक देश में एक देश एक चुनाव ही होते थे, लेकिन संविद सरकारों के दौर और राज्य सरकारों को बर्खास्त करने के सिलसिले के कारण यह परंपरा टूट गई। 2019 के चुनाव में 55,000 करोड़ और 2024 में ₹1,35,000 करोड़ खर्च हुए। अगर एक साथ चुनाव कराया जाए तो चार से लेकर 7 लाख करोड़ बच सकते हैं, जो अर्थव्यवस्था की जीडीपी का 1.6 टू7% बैठता है।

पूर्व चुनाव आयुक्त ओपी रावत का दृष्टिकोण

ओपी रावत जी के अनुसार, अभी तक कोई इंपिरिकल स्टडी नहीं की गई है कि अलग-अलग चुनाव होने और एक देश एक चुनाव होने में आर्थिक रूप से क्या असर पड़ेगा। भारत का चुनाव पूरे विश्व में सबसे सस्ता चुनाव होता है, प्रति वोट $1 खर्चा होता है। पॉलिटिकल पार्टीज के पास लीगली जो पैसा दिखाया गया है, वह कुछ हजार करोड़ ही होता है। 13 लाख35000 करोड़ का खर्चा वाइट, ब्लैक और ग्रे तीनों तरह का पैसा होता है। एक देश एक चुनाव हुआ तो 50 लाख ईवीएम सेट चाहिए होंगे, जिससे इलेक्शन कमीशन का कैपिटल एक्सपेंडिचर तुरंत बढ़ जाएगा।

शैक्षणिक दृष्टिकोण: प्रोफेसर श्री प्रकाश सिंह

प्रोफेसर श्री प्रकाश सिंह जी के अनुसार, साइमलटेनियस चुनाव सिर्फ आर्थिकता के कारण नहीं है। चुनाव के समय पूरी मशीनरी, संसाधन और कर्मचारी इनवॉल्व हो जाते हैं, जिससे शिक्षा विभाग का काम ठप हो जाता है। 2005 में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च ने साइमलटेनियस चुनाव के फायदे को लेकर रिपोर्ट सबमिट की थी। 2002 में अटल जी ने फिक्स टेन्योर और पॉजिटिव नो कॉन्फिडेंस की बात की थी। तकनीक का विकास होने से अब चुनाव कराना आसान है। एक देश एक चुनाव देश के लिए श्रेयस्कर है और आर्थिक बचत स्वाभाविक रूप में होनी ही होनी है।

विकसित भारत का लक्ष्य और एक देश एक चुनाव

मुकेश कौशिक जी के अनुसार, वन नेशन वन इलेक्शन सैद्धांतिक रूप से 100% सही है, लेकिन व्यवहारिक रूप पर आकर कितना टिक पाता है, यह अलग बात है। साइमलटेनियस इलेक्शन कराने के जितने आर्थिक लाभ हैं, उतने ही आर्थिक नुकसान भी हैं। अगर कोई सरकार समय से पहले गिर जाती है, तो मध्यवधि चुनाव उसकी बाकी टर्म के लिए होगा। 1984 से भारतीय जनता पार्टी ने इस मुद्दे को अपने चुनाव मेनिफेस्टो का हिस्सा बनाया था।

आचार संहिता और विकास पर प्रभाव

ओपी रावत जी के अनुसार, इलेक्शन कमीशन ने 2015 में ही भारत सरकार को राय दी थी कि एक देश एक चुनाव बहुत जरूरी है और करना चाहिए। असली फायदे यह हैं कि अभी पांचों साल हमारे सारे नेता बॉक्सिंग रिंग में होते हैं, जिससे कंस्ट्रक्टिव काम कर पाना संभव नहीं है। एंप्लाइज और सिक्योरिटी फर्सेस का मूवमेंट आधा हो जाएगा। सारे नेताओं को कंस्ट्रक्टिव थिंकिंग के लिए लड़ाई के मोड से हटा देना चाहिए ताकि वह सोच सके, अच्छा काम कर सके और डेवलपमेंट हो सके।

सामाजिक संघर्ष और विकास

श्री प्रकाश जी के अनुसार, चुनाव के नाम पर सामाजिक संघर्ष होता है और देश का विकास प्रभावित होता है। नेताओं के बीच में तू-तू-मैं-मैं होती है, जिससे समाज में बिखराव की प्रवृत्ति पैदा होती है। एक साथ चुनाव करने से सामाजिक बिखराव रोकने, आपसी सहसंबंध बनाने और सामाजिक सौमनस्य बनाने के लिए सरकार के पास एक लंबा समय मिलता है। चुनाव के समय घोषणाएं की जाती हैं, लेकिन उनका अमली जामा कब पहनाया जाएगा, वह निश्चित नहीं होता है।

विपक्षी दलों के सवाल और संघीय ढांचा

मुकेश कौशिक जी के अनुसार, विपक्षी दल संघीय ढांचे की बात करते हैं। आचार संहिता सब जगह सब राज्यों में लागू नहीं रही। चुनाव के इर्दगिर्द एक बहुत बड़ी अर्थव्यवस्था पनप चुकी है। रीजनल पार्टीज का तर्क है कि केंद्र सरकार 5 साल तक अपना हम पर हावी रहेगी। लगातार चुनाव का माहौल बने रहने से लोकतंत्र को मजबूती मिलती है।

निष्कर्ष

एक देश एक चुनाव का उद्देश्य देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो, देश का लोकतंत्र मजबूत हो, नीति, स्थिरता और आर्थिक विकास सुनिश्चित हो।

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Transcript

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0:00 [संगीत] नमस्कार स्वागत है आपका संसद टीवी पर। मैं हूं मनोज वर्मा और आप देख रहे हैं हमारा खास कार्यक्रम मुद्दा आपका। आज हम बात करेंगे एक देश एक चुनाव की और इससे संबंधित अर्थव्यवस्था की। इस मुद्दे पर बात इसलिए क्योंकि संसद की संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी की अध्यक्षता में दिल्ली में एक महत्वपूर्ण बैठक हुई और एक देश एक चुनाव से जुड़े जो आर्थिक पक्ष है उसको लेकर इस पे आर्थिक विशेषज्ञों की राय ली गई। संसद की संयुक्त संसदीय समिति जेपीसी के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने कहा कि एक देश एक चुनाव का देश की अर्थव्यवस्था

0:47 पर बड़ा प्रभाव होगा। इसलिए इस विषय पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के अर्थशास्त्रियों को बुलाया गया है ताकि चुनाव के साथ-साथ होने वाले फायदे और नुकसान को समझा जा सके। एक देश एक चुनाव का देश की अर्थव्यवस्था पर क्या और कितना प्रभाव होगा। भारत में लोकसभा और राज्यसभा विधानसभाओं के लिए अलग-अलग समय पर चुनाव होते हैं। एक देश एक चुनाव का मतलब लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के साथ एक साथ चुनाव कराने से है। यानी मतदाता लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव के लिए एक साथ वोट डालेंगे। देश की आजादी के बाद 1952 से 1967 तक लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ होते थे। लेकिन इसके बाद एक देश एक

1:34 चुनाव की यह परंपरा टूट गई। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जी की अध्यक्षता में गठित समिति ने अपनी रिपोर्ट में एक देश एक चुनाव कराने के पक्ष में अनेक तर्क और सुझाव दिए हैं। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक साथ चुनाव कराने के संबंध में गठित उच्च स्तरीय समिति ने भारत की चुनावी प्रक्रिया में एक क्रांतिकारी बदलाव की नींव रखी है। विकास, प्रशासनिक और वित्तीय लागत के लिहाज से एक देश एक चुनाव का मुद्दा महत्वपूर्ण है। इसलिए मुद्दा आपका में एक देश, एक चुनाव और देश की जो अर्थव्यवस्था है उससे संबंधित जो पहलू हैं इस पे चर्चा करेंगे। चर्चा करने के लिए खास मेहमान मेरे साथ जुड़े हुए हैं। फॉर्मर चीफ इलेक्शन कमिश्नर ऑफ इंडिया ओपी रावत जी

2:19 हमारे साथ जुड़े हुए हैं। ओपी रावत जी आपका स्वागत है संसद टीवी पर। साथ ही हम बात करेंगे हिम हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रोफेसर श्री प्रकाश सिंह जी से। श्री प्रकाश जी आपका भी स्वागत है संसद टीवी पर और वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कौशिक जी मेरे साथ इस समय स्टूडियो में मौजूद हैं। अह चर्चा शुरू करें उससे पहले सुनते हैं कि संसदीय समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी जी ने क्या कहा। जो रामनाथ को कमेटी कमेटी ने जो रिपोर्ट दी है उसमें यह बताया गया है कि एक साथ चुनाव होने से देश की अर्थव्यवस्था में 1.6% जीडीपी का इजाफा होता है। मोटा तौर पर अगर

3:05 आप देखें करीब राज्य सरकार और केंद्र सरकार के पूरे जीडीपी को अगर देखें तो करीब 7 लाख करोड़ रुपए का देश को फायदा होता है। तो उसके संबंध में हम अपने मेंबर्स जो है सदस्य हमारे कमेटी के वह क्लेरिफिकेशन मांगेंगे कि किस तरह से अलग-अलग सेक्टर्स जो है कुछ तो सरकारी खर्चा जो तो सामने दिखता है लेकिन कुछ ऐसा खर्चा जो सामने नहीं दिखता जो इनटेंजिबल है। जैसे कि सपोज आचार संहिता है। उसमें गवर्नेंस का ऑलमोस्ट पैरालाइज होती है। उसमें गवर्नेंस जो है पूरा का पूरा इलेक्शन मोड में होती है। उसमें चाहे जिला कलेक्टर देख लो, चाहे एसडीएम देख लो। पूरे देश के सब डिवीजनल ऑफिसर का स्टाफ। पूरे

3:52 देश का जिला कलेक्टर के लेवल का स्टाफ। वह इलेक्शन मोड में चाहे विधानसभा के इलेक्शन होते हैं, तब लगे रहते हैं, और चाहे लोकसभा के इलेक्शन होते हैं, तब लगे रहते हैं अलग-अलग। तो इसका गवर्नेंस में कितना बड़ा नुकसान होता है। एक गरीब आदमी अगर जाता है कलेक्टेट में या सब डिवीजनल ऑफिस में तो उस समय यह पता है कि भ एसडीएम वोटर लिस्ट में बिजी है। कलेक्टर इलेक्शन में बिजी है और आचार संहिता लगी है। इस समय काम नहीं हो सकता है। चाहे गरीब का काम हो समाज के अंतिम छोर के व्यक्ति का और चाहे इन्वेस्टमेंट का मामला हो चाहे लेबर का मामला हो लेबर माइग्रेशन का एक दूसरे से दूसरे स्थान पे और चाहे उत्तराखंड जैसे या हिली हिल स्टेशंस हैं जैसे हिमाचल है

4:43 नॉर्थ ईस्ट है इन प्रदेशों में सबसे बड़ा जो है वो टूरिज्म का नुकसान होता है। तो यह सारे के सारे जो हैं जिसके आंकड़े जो हैं वह कभी भी हमने इनका संकलन नहीं किया कि कितना नुकसान होता है। तो इससे 1.6% जीडीपी का जो नुकसान आया है एक कैलकुलेशन हुआ है। तो 7 लाख करोड़ देश को अगर एक साथ चुनाव होने से फायदा होता है। तो यह क्यों नहीं किया जाना चाहिए? तो आपने सुना पीपी चौधरी जी ने जो अर्थव्यवस्था का मुद्दा है एक देश एक चुनाव से जुड़ा उसको लेकर कितनी महत्वपूर्ण बात कही। लेकिन अब चर्चा शुरू करते हैं। मुकेश कौशिक जी आपसे शुरुआत करना चाहूंगा। जाहिर सी बात है एक देश एक चुनाव का मुद्दा है। लंबे समय से इस

5:28 मुद्दे पर चर्चा हो रही है। सदन में भी लंबी चर्चा हुई और उसके बाद संसद की जो संयुक्त समिति है उसके माध्यम से भी माध्यम से भी जो अलग-अलग इसके पक्ष हैं जो पहलू हैं उसको जानने समझने की कोशिश की जा रही है ताकि एक देश एक चुनाव का जो लक्ष्य है उसे पूरा किया जा सके। इस मुद्दे को आप कैसे देखते हैं? देखिए इससे आर्थिक फायदे होने वाले हैं। इसमें कोई विवाद ही नहीं है। विवाद उस बात पर ले आता है कि इसके राजनीतिक नुकसान किन दलों को होंगे? इसके व्यवहारिक पक्ष क्या होंगे? इससे सामाजिक क्या होगा? इसमें लोगों का लोगों की क्या रुचि है? पॉलिसी पैरालिसिस के इश्यूज क्या हैं? राजनीतिक इशू क्या है? लॉजिस्टिक इश्यूज क्या हैं? तो पहले जैसा कि आपने

6:14 पूरी भूमिका में ही बताया कि इस देश में 1967 तक एक देश एक चुनाव ही होते थे। उसके बाद एक देश अनेक चुनाव का जो सामने अह लक्ष्य उभरा वो हमारी चॉइस नहीं था। वो इसी देश की राजनीति की का नतीजा है जो हमारी अगर चॉइस होती तो लगातार चुनाव एक देश एक चुनाव ही रहता। लेकिन 1967 में संविद सरकारों का दौर आया। 1971 के बाद इंदिरा गांधी के बाद से जो राज्य सरकारों को बर्खास्त करने के सिलसिले शुरू हुए। एक झटके में चार पांच राज्य सरकारें बर्खास्त किया जाना। उसकी वजह से हर राज्यों के चुनाव अलग-अलग इतने स्ट्रैगर हो गए कि अब तो हर साल लगभग चार से ले पांच चुनाव कि किसी भी विधानसभा के होते ही रहते हैं।

7:01 ऐसे में जाहिर तौर पर लॉजिस्टिक है और अगर पूरा इसका हिसाब जोड़ के देखा जाए खुद कोविन कमेटी ने जो हिसाब जोड़ा और जो विधि आयोग के 22वें विधे आयोग की जो रिपोर्ट आई थी उसमें भी पूरा हिसाब इसका सामने आया कि कितना खर्च अलग-अलग चुनाव का होता है और सामने अगर इन सबको एक साथ चुनाव कराया जाए तब कितना हम खर्च बचा सकते हैं। जी आप 2019 के चुनाव को लीजिए। उसमें एक मोटे अनुमान के अनुसार और वह कई एजेंसियों का था। 55,000 करोड़ उस चुनाव का टोटल खर्च था। मैं चुनाव की जो लागत है उसको नहीं कह रहा हूं। टोटल मिलाकर जो खर्च हुआ था वो 55,000 करोड़ था। लेकिन 2024 में जब चुनाव हुआ तो एक अनुमान आया कि ₹1,35,000 करोड़

7:47 खर्च हुआ। और अगर इन सारे हिसाब को जोड़ते चले जाएं तो एक बड़ा अनुमान सामने ये आता है कि चार से लेके 7 लाख करोड़ अगर समलटेनियस इलेक्शन कराया जाए तो वो बच सकता है। जी चार से 7 लाख करोड़ यानी लगभग अर्थव्यवस्था की जीडीपी का 1.6 टू7% बैठता है ये और इस देश की पूरा हेल्थ केयर का बजट इतना ही है। इस देश का पूरा एजुकेशन का बजट इतना ही है। जाहिर सी बात है एक देश एक चुनाव की जब हम बात करते हैं तो उसका संबंध जो है वो देश के विकास से भी है। देश की अर्थव्यवस्था से भी है। अर्थव्यवस्था की बात मैं इसलिए कर रहा हूं कि आए दिन जब चुनाव होते हैं हर साल जब चुनाव होते हैं विधानसभा के या किसी और तरह के जब चुनाव होते हैं तो उसका असर

8:33 कहीं ना कहीं जो हमारा आर्थिक तंत्र है उसको भी प्रभावित करता है। अह ओपी रावत जी मैं आपसे जानना चाहूंगा इस मुद्दे को। आप देश के पूर्व चुनाव आयुक्त हैं। अह चीफ चुनाव आयुक्त रहे हैं आप। ah मैं आपसे समझना चाहूंगा इस मुद्दे को क्योंकि पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जी की जो समिति थी समिति है उसने एक देश चुनाव को लेकर जो रिपोर्ट दी है उसमें कहा गया है कि एक साथ चुनाव होने से देश की जीडीपी में बढ़ोतरी होगी और इस बात को जो संसदीय समिति के अध्यक्ष हैं पीपी चौधरी जी भी कह रहे हैं इस मुद्दे को आप कैसे देखते हैं देश की जीडीपी में यह मुद्दा किस तरह से योगदान दे सकता है देखिए इस बारे में मेरा यह कहना है कि कोई भी इंपिरिकल स्टडी अभी तक नहीं की गई है कि यह अलग-अलग चुनाव होने और एक देश एक

9:21 चुनाव होने में आर्थिक रूप से क्या असर पड़ेगा। दूसरी बात यह कहना चाहूंगा कि खर्चे दो तरह के होते हैं। पहला इलेक्शन मैनेजमेंट जो इलेक्शन कमीशन और उनकी मशीनरी पर सिक्योरिटी फर्सेस पर होता है। उसको अगर आप देखें तो भारत का चुनाव पूरे विश्व में सारे लोकतंत्रों में सबसे सस्ता चुनाव होता है। प्रति वोट $1 खर्चा होता है। जिस पे कोई शायद फर्क पड़े या ना पड़े इसकी भी स्टडी नहीं हुई है। सबसे सस्ता चुनाव है। कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि जितने वोटर है उतना डॉलर से कर दीजिए उतना ही खर्चा है। लेकिन जो 55000 करोड़ या 1 लाख35000 करोड़ का फिगर आता है ये डिफरेंट सर्वे एजेंसियों द्वारा निकाला जाता है।

10:09 अगर पॉलिटिकल पार्टीज के पास जो पैसा है लीगली जो दिखाया गया है वो देखा जाए तो कुछ हजार करोड़ ही उनके पास होता है। चाहे वो डोनेशन से आया हो चाहे पहले बॉन्ड से आता था वो सब मिला दें तो इलेक्शन कमीशन को जो रिटर्न फाइल होते हैं। उससे पूरा जो पैसा रहता है उनके पास वो अधिक से अधिक 15 से 2000 करोड़ के बीच में होता है। फिर ये 13 लाख35000 करोड़ जो खर्चा आता है ये कहां से आता है? इस पे मुद्दा है। ये वाइट, ब्लैक और ग्रे तीनों तरह का पैसा होता है। और ये जो जहां से आता है उसका क्या असर होगा जीडीपी पर? क्या असर होगा इकोनमी पर? यह अर्थशास्त्र विशेषज्ञ जो है वही एक अनुमान लगा सकते हैं कि कैसे होगा

10:56 क्या होगा। जहां तक इलेक्शन कमीशन का खर्चा है उसमें मैं सिर्फ इतना बताना चाहूंगा कि अभी भी तय नहीं है कि कम होगा या ज्यादा क्योंकि अभी 20 लाख ईवीएम से काम चल जाता है। अगर एक देश एक चुनाव हुआ तो 50 लाख ईवीएम सेट चाहिए होंगे। मतलब इमीडिएटली कैपिटल एक्सपेंडिचर इलेक्शन कमीशन का तुरंत बढ़ जाएगा। फिर इनकी इन्वेंटरी कैरिंग कॉस्ट यह सारी 50 लाख ईवीएम को पूरे 5 साल तक इंतजार करना होगा एक गोडाउन में उस गोडाउन को सिक्योर रखना होगा सिक्योरिटी फर्सेस लगा के और इनकी लाइफ 15 साल ही होती है। मतलब ये तीन चुनाव कराने के बाद डिस्कार्ड हो जाएंगे और फिर से नया कैपिटल एक्सपेंडिचर होगा। तो इस तरह से अगर देखें तो मुझे ज्यादा फर्क नहीं लगेगा कि इलेक्शन मैनेजमेंट में खर्चे में कोई अंतर

11:42 आएगा। जी जाहिर सी बात है कई पहलू हैं इसके लेकिन श्री प्रकाश जी मैं आपसे जानना चाहूंगा इस मुद्दे को क्योंकि एक एक फिगर इस तरह की उभर के सामने आई है कि देश को अगर एक साथ चुनाव होते हैं विधानसभा और लोकसभा के तो करीब ₹ लाख करोड़ का फायदा देश को हो सकता है। इस इस मुद्दे को आप कैसे देखते हैं जो इसका आर्थिक पक्ष है? नहीं मनोज जी रावत साहब ने जो बात कही उसका वो एक पक्ष है। साइमलटेनियस चुनाव सिर्फ आर्थिकता के कारण नहीं है। इसके पीछे जो तर्क है वह यह है कि जो पूरी मशीनरी होती है 4 महीने जब भी चुनाव आते हैं तो चाहे वो पक्ष हो चाहे प्रतिपक्ष हो

12:29 चाहे चुनाव कराने वाली मशीनरी हो उसमें जो तमाम संसाधन जुटते हैं तमाम कर्मचारी जुटते हैं वो सब के सब इनवॉल्व हो जाते हैं और चाहे वो शिक्षा विभाग हो ज्यादातर शिक्षा विभाग के लोग जुड़ते हैं चुनाव कराने की प्रक्रिया में उनके कर्मचारी उनके टीचर्स आप यह देखें कि चार-चार महीने तीन-तीन चार-चार महीने ना तो पढ़ाई होती है ना लिखाई होती है और काम बिल्कुल ठप हो जाता है। तो उस दृष्टि से देखा जाए एक देश एक चुनाव का जो विचार है यह बड़ा श्रेयस्कर विचार है और मैं रावत साहब की जानकारी में होगा ही फिर भी मैं रिट्रेट करना चाह रहा हूं। 2005 में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च है।

13:15 अगर मैं नाम सी सही प्रोनाउंस कर रहा हूं। प्रोफेसर सेलेथ कमेट की रिपोर्ट है जिस पे इकोनॉमिक टाइम्स ने बहुत अच्छी सी कवरेज भी उस रिपोर्ट पे की थी। वह रिपोर्ट साइमलटेनियस चुनाव के फायदे को लेकर के और यह 2005 है तब भारत में उस तरह की चर्चा नहीं हो रही है तो उस रिपोर्ट ने बहुत करीने से कितना पैसा बचेगा कितने संसाधन लगेंगे बहुत अच्छी रिपोर्ट उन्होंने सबमिट की थी और चुनाव आयोग के अह गोल्डन जुबली कार्यक्रम में 2002 में माननीय अटल जी का एक उद्बोधन है उनकी वेबसाइट पर ही उपलब्ध है उसको देखा जा सकता है जिसमें जिसमें उन्होंने फिक्स टेन्योर की बात की थी। पॉजिटिव नो कॉन्फिडेंस की बात की थी। तो

14:00 ये सिर्फ आर्थिकता का विषय नहीं है। निसंदेह से तो बचेंगे ही बचेंगे। लॉजिस्टिक्स की बात बिल्कुल ठीक है कि 50 लाख के करीब ईवीएम्स लगेंगी। लेकिन मेरा कई बार मानना रहता है कि जब हम पहला चुनाव इतनी समस्याओं के चलते, इतनी चुनौतियों के चलते जब मीलों मील पैदल लोगों को चलना पड़ता था। बैलेट बॉक्सेस को लेकर के, प्रिंटेड बैलेट पेपर्स को लेकर के जब देश ने 1967 तक वो चुनावी प्रक्रिया पूरी कर ली। एक साथ पूरी कर ली। अब तो बहुत सारे संसाधन है। तकनीक का विकास हो चुका है। बहुत तेजी से ट्रांसपोर्टेशन जो है वह सुधरा है। तो

14:48 उन सबका लाभ मिलेगा और मुझे लगता है कि अगर एक देश एक चुनाव आता है तो ये देश के लिए बड़ा श्रेयस्कर है और आर्थिक बचत तो बहुत स्वाभाविक रूप में होनी ही होनी है क्योंकि साइक्लिक इकॉनमी है उसको एक बड़ा स्पेस मिलता है पॉलिसी एग्जीक्यूशन के लिए। जी जाहिर सी बात है जब हम चुनाव की बात करते हैं, देश की बात करते हैं क्योंकि देश से जुड़ा मुद्दा है और जब देश की बात करते हैं तो अर्थव्यवस्था का मुद्दा भी देश से जुड़ा है। विकसित भारत का लक्ष्य है 2047 तक जाहिर तौर पे जब हमारी जो आर्थिक व्यवस्था है जो हमारा आर्थिक तंत्र है वो अगर व्यवस्थित रहेगा तो विकसित भारत का लक्ष्य भारत शायद पहले भी हासिल कर ले इस चीज को। विकसित भारत का जो लक्ष्य है जिसकी चर्चा की जाती है 2047

15:33 तक भारत विकसित भारत बनाना है और उसके साथ-साथ जो जो आर्थिक पक्ष है वो बहुत महत्वपूर्ण है ah मुकेश जी इसीलिए चर्चा भी होती है कि एक देश एक चुनाव अगर साथ में कराए जाते हैं देश में तो उसका लाभ कहीं ना कहीं विकास योजनाओं पर पड़ेगा उस वो हमारा आर्थिक तंत्र मजबूत होगा बेहतर होगा आप कैसे देखते हैं इस लक्ष्य को इस संदर्भ में मनोज कुछ कुछ बातें ऐसी होती हैं कुछ लक्ष्य ऐसे होते हैं जो सैद्धांतिक रूप से 100% जिससे असहमत नहीं हो सकते आप। जी वन नेशन वन इलेक्शन उनमें से एक है। अगर कोई कहे कि इस देश से गरीबी मिटनी चाहिए कि नहीं मिटनी चाहिए तो मैं असहमत होने वाला कौन हूं? 100% लोग साक्षर होने ही चाहिए। उसी तरह से साइमलटेनियस इलेक्शन होना ही था। होना होता ही रहा था। होना

16:21 चाहिए भी था। लेकिन सैद्धांतिक रूप से जो जो इश्यूज बहुत अच्छे दिखते हैं वो व्यवहारिक रूप पर व्यवहारिक धरातल पर आकर कितने टिक पाते हैं वो अलग बात है। जैसे कि इस समय मेरे पास साइमलटेनियस इलेक्शन कराने के जितने आर्थिक लाभ हैं उतने ही आर्थिक नुकसान मैं गिना सकता हूं। आर्थिक लाभ ये हैं कि आपको लॉजिस्टिक मैनेजमेंट नहीं करना पड़ेगा। आपको सिक्योरिटी फोर्सेस की को यहां से वहां भेजने के लिए जितने भी खर्चे हैं वो सब बच सकते हैं। रावत साहब ने जो इलेक्शन इलेक्शन ईवीएम की बात गिनाई 26 लाख हमारे पास हैं। 39 लाख अगर हो जाएं तब हो सकता है कि हम लोग इसको पार पा लें और चुनाव के लिए चूंकि हम लोग कभी खर्च नहीं देखते। हम गणतंत्र दिवस अब

17:07 मनाने के लिए कभी खर्च नहीं देखते। तो लोकतंत्र के इस पूरे उत्सव को मनाने के लिए और पूरे लोकतंत्र को जीवित रखने का जो तंत्र है वो चुनाव ही है। अगर उस पे जो खर्च होता है वो खर्च होना ही है। लेकिन अगर इस चुनाव को स्ट्रैगर हुआ है और वो वो हमारी आपकी मर्जी से नहीं हुआ है। एक देश अनेक चुनाव होना हमारी चॉइस नहीं था। वह हम पर थोपा गया एक चीज है। अगर कल के दिन यह होता है कि एक सरकार नहीं चल पाती अपना बहुमत खो देती है या केंद्र में कोई सरकार बहुमत खो देती है तब हमारे पास उसकी क्या समाधान है। आप बिल में अगर चले जाइए, तो एक समाधान यह दिखाया गया है कि अगर कोई सरकार समय से पहले गिर जाती है तब उसके

17:54 लिए जो मध्यवधि चुनाव होगा वो उसकी बाकी टर्म के लिए होगा और उसको पूरी 5 साल तब तक ही मिलेंगे जब तक कि लोकसभा का कार्यकाल होगा। जी लेकिन इसके कई व्यवहारिक पहलू खुल के सामने आएंगे आपके कि अगर कोई सरकार 3 महीने बाद ही गिर जाती है तब क्या होगा? क्या फिर से एक इलेक्शन हम हम सामना नहीं कर रहे होंगे या 5 साल से पहले अगर अगर छ महीने बचे होंगे उसके विधानसभा के तब क्या होगा? इन सारे इशूज़ पर जो मुझे लगता है कि संसदीय समिति बैठी बनी है। वो उस पर विचार करेगी। 1984 से भारतीय जनता पार्टी ने अपने इस इशू को अपने चुनाव मेनिफेस्टो का हिस्सा बनाया था कि हम लोग किस ढंग से एक देश एक चुनाव चाहते हैं। इतनी लंबी डिबेट इस इशू पर हुई है और मुझे लगता है कि किसी

18:41 अगर बिल पर किसी कानून पर इतना विचार विमर्श हुआ है तो बहुत अच्छा हल ही निकलेगा और अर्थव्यवस्था के तमाम पहलू उसका एक हिस्सा होंगे। जी जाहिर सी बात है इसका एक आर्थिक पक्ष है। लेकिन जिस तरह से विकास योजनाएं प्रभावित होती हैं सरकार की योजनाओं पर असर पड़ता है। प्रशासनिक मशीनरी पे असर पड़ता है। वो एक महत्वपूर्ण पहलू है पहलू है। ओपी रावत साहब एक आंकड़ा मेरे सामने है। मेरे पास है 2019 से 2024 के दौरान भारत में 676 दिन आचार संहिता लागू रही। यानी हर साल करीब 113 दिन। और अगर बात खर्च की की जाए तो 2024 का जो एक आंकड़ा है, एक अनुमान है उसके मुताबिक करीब ₹1 लाख करोड़ खर्च हुए। इस मुद्दे को

19:27 आप कैसे देखते हैं? क्योंकि अगर आचार संहिता रहेगी, सरकार की योजनाएं अटकी रहेंगी, विकास योजनाएं अटका रहेगा, देश का विकास कैसे होगा? यह भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। मनोज जी जी तो पहले मैं यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि जब मैं इलेक्शन कमीशन में था तब हमने भारत सरकार को राय दी थी कि एक देश एक चुनाव बहुत जरूरी है और करना चाहिए और उसको इन तरीकों से किया जा सकता है। इलेक्शन कमीशन ने 2015 में ही ये राय दे दी जी सिर्फ ये था कि आर्थिक पहलू के बारे में इंपेरिकल स्टडी ना होने से इलेक्शन कमीशन ने कहा था कि इसके बारे में आप स्टडी करा लीजिए बचत होगी या नहीं होगी वो किया जा सकता है। जो आपने अभी मुद्दा रखा है

20:14 जो असली फायदे इसके हैं वो ये हैं कि अभी पांचों साल हमारे सारे नेता बॉक्सिंग रिंग में होते हैं। मुक्केबाजी चल रही होती है। एक दूसरे के ऊपर लांछन दूसरी चीजें चल रही होती हैं। उनके पास लड़ाई वाला मोड होता है और लड़ाई वाले मोड में कंस्ट्रक्टिव काम कर पाना ना तो प्रतिपक्ष के लिए संभव है ना राज्य सरकार के लिए संभव है। वो चल रही होती है। जहां तक एंप्लाइज और सिक्योरिटी फर्सेस का प्रश्न है वो तो हर जगह सिर्फ दो बार ही इधर से उधर होंगे। क्योंकि या तो स्टेट असेंबली इलेक्शन होगा या फिर लोकसभा वाला इलेक्शन होगा। तो हर राज्य में पांचों साल नहीं होगा। हर राज्य में सिर्फ दो बार ही होगा। एक बार विधानसभा चुनाव के लिए मूवमेंट होगा

21:00 सिक्योरिटी फर्सेस का और पोलिंग पार्टीज का और एक बार लोकसभा के लिए होगा। इसलिए आधा हो जाएगा वो। लेकिन जैसे पहले कहा कि इलेक्शन कमीशन का खर्चा बहुत कम है। बहुत किफायती इलेक्शन हमारे यहां डिलीवर होते हैं। इसलिए उसमें बचत होगी या नहीं होगी तो बहुत थोड़ी होगी। अगर होगी और नहीं होगी तो भी थोड़ा ज्यादा खर्चा होगा। क्योंकि इन्वेंटरी कैरिंग कॉस्ट बहुत ज्यादा होगी। हर जिले में, हर कास्टटुएंसी में एक वेयर हाउस बनाना पड़ेगा। जहां ईवीएम स्टोर की जाएंगी। उनकी सुरक्षा रखी जाएगी। वो सब खर्चे अभी नहीं है। अभी सिर्फ कुछ राज्यों में कुछ जिलों में यह व्यवस्थाएं हैं और उससे वो 202 लाख जो भी ईवीएम है वो काम चला देती हैं। जब सारे चुनाव एक साथ होंगे तो उसके लिए संख्या जितनी होगी वो हर हर

21:47 जिले में हर कास्टएंसी में उन्हें रखने की व्यवस्था करनी होगी और हर 15 साल में इनको नया बदलना होगा क्योंकि 15 साल बाद इनकी लाइफ खत्म हो जाती है। तो वो एक है। फायदे बहुत हैं और रामनाथ कोविंद जी की कमेटी में भी मैंने अपना एविडेंस दिया था और उनको सुझाव भी दिए थे और वो उन्होंने अपनी रिपोर्ट में रिफ्लेक्ट भी किए हैं कि ये कुछ भी हो बचत हो या ना हो अच्छा हो या ना हो लेकिन सारे नेताओं को विपक्ष के और शासन पक्ष के उनको कंस्ट्रक्टिव थिंकिंग के लिए उनको अच्छी योजनाओं को सोचने और विचारने और उनका क्रियान्वयन करने के लिए लड़ाई के मोड से कम से कम चार सा 4 साल साल हटा देना चाहिए ताकि वह सोच सके,

22:33 अच्छा काम कर सके और कंस्ट्रक्टिव निर्णय होके डेवलपमेंट हो सके। तो ये बेसिक फायदा इसका है जो बहुत महत्वपूर्ण है पूरे देश के लिए। जी जाहिर सी बात है सैद्धांतिक रूप से हर कोई इस मुद्दे से सहमत है कि देश में एक साथ चुनाव हो। श्री प्रकाश जी मैं आपसे जानना चाहूंगा क्योंकि अलग-अलग जब चुनाव होते हैं तो जाहिर तौर पे कई मुद्दे उभर के आते हैं। आर्थिक पक्ष है। चुनाव आयोग का अपना एक पक्ष है। अपना आर्थिक पक्ष है। जो प्रशासनिक प्रक्रिया है वो एक पक्ष है। लेकिन एक पक्ष यह भी आता है कि सामाजिक संघर्ष चुनाव के नाम पर जिस तरह की तू तू-मे देखने को मिलती है और देश का विकास प्रभावित होता है। क्या आप इस बात से सहमत हैं? कि मनोज जी

23:20 जो आपसी तू मैंम नेताओं के बीच में पार्टियों के बीच में होती है वो बहुत नीचे तक जाती है और समाज में बिखराव की एक प्रवृत्ति पैदा होती है और प्रवृत्ति बार-बार साल दर साल वो रिपीट होती रहती है। कोई कुछ कह रहा है, कोई कुछ कह रहा है और तमाम ऐसे लांछन लगाए जाते हैं जिसको आप सब्सटिएट नहीं कर सकते। तो ये जो बिखराव की प्रवृत्ति समाज में पनपने लगती है बार-बार पनपती है। चाहे वो उत्तर में हो चाहे दक्षिण में चुनाव हो वो पूरे देश में ट्रैवल करता है। तो जब हम एक साथ चुनाव करेंगे तो जो कुछ कहना है दो महीने तीन महीने में कह लीजिए फिर एक लंबा समय आपको विकास के लिए मिलता है। एक तो

24:07 सामाजिक बिखराव रोकने के लिए, आपसी सहस संबंध बनाने के लिए, सामाजिक सौमनस्य बनाने के लिए सरकार के पास एक लंबा समय मिलता है काम करने के लिए। चुनाव जब डिक्लेअ होते हैं किसी भी राज्य में आप स्वयं देखें आप तो रावत साहब तो चुनाव आयोग में रहे हैं। जी तमाम घोषणाएं सत्ता पक्ष के द्वारा किसी भी सरकार के द्वारा की जाती है। उनका अमली जामा कब पहनाया जाएगा वो बहुत हद तक निश्चित नहीं होता है। और जो पहले के काम सड़कों पर दिखने चाहिए थे वो आखिरी महीनों में दिखने शुरू होते हैं। उसकी गुणवत्ता नहीं होती है। उसके काम की गति जरूर तेज हो जाती है लेकिन वह सिर्फ आम जनता को भुलावे में

24:54 रखने के लिए होती है। वो स्थिरता नहीं होती है। तो सरकार के साथ-साथ तमाम काम चल रहे होते हैं लेकिन उसका लाभ जैसा समाज को देश को मिलना चाहिए वैसा नहीं मिलता है। तो एक आर्थिक पक्ष वह भी है कि हम काम तो हो रहे हैं लेकिन 4 साल निकाल दिए। आखिरी छ महीने में काम शुरू किया। उसकी गुणवत्ता नहीं है। एक बारिश आई सब धुल गया तो वो प्रवृत्ति भी बहुत हद तक बदलेगी और किसी भी शासन प्रशासन के लिए बड़ा जरूरी होता है कि उसको नीति नियामन के लिए समय मिलना। अगर उसके पास लंबा समय होता है तो पॉलिसी रिफ्लेक्शन पॉलिसी कंसलटेंसीज पर बहुत फोकस होता है और बहुत प्लान तरीके

25:40 से क्रमिक रूप में चलती है और जो सरकार में बैठे हुए लोग हैं उनको फीडबैक लेने का अवसर प्राप्त होता है। कितना काम हो चुका वह पूछने का अवसर मिलता है और नई घोषणाएं को अमली जामा पहनाने का भी अवसर प्राप्त होता है। इसीलिए एक देश एक चुना देश के भले में है कि चुनाव प्रक्रिया शुरू की जाए। जी इसलिए देश के हित में है एक देश एक चुनाव की प्रक्रिया लेकिन विपक्ष कुछ सवाल उठाता है खासतौर से जो विपक्षी दल हैं संघीय ढांचे की बात आती है। लेकिन जब आजादी के बाद चुनाव हो सकते हैं एक साथ। तो अब सवाल क्यों? मैंने कहा कि ये एक सैद्धांतिक रूप से बिल्कुल सही है कि एक एक देश एक चुनाव हो और होता भी था। और अगर कोई विपक्षी दल विपक्षी भी मुझे लगता है कि क्षेत्रीय दल

26:26 चाहे वो तमिलनाडु की पार्टियां हो आंध्र की हो या ईस्ट और वेस्ट की हो अगर वो ये सवाल उठाती हैं कि हम हमारे संघीय ढांचे पर चोट होगी तो उन वो कुछ वैलिड रीजन भी गिनाती रहती हैं अपने पॉलिसी पैरालिसिस का जहां तक सवाल है कि अह आपने जो पूरा आंकड़ा दिया कि आचार संहिता 600 दिन लागू रही 113 दिन औसतन लागू रही लेकिन इसका एक व्यवहारिक पक्ष यह भी है कि वह 113 दिन सब जगह सब राज्यों में लागू नहीं रही। वो उन्हीं राज्यों में लागू रही जहां-जहां विधानसभा के चुनाव होने थे। और 600 दिन अगर रहा तो मैं मुझे लगता है कि अर्थव्यवस्था का एक बहुत बड़ी अर्थव्यवस्था चुनाव के इर्दगिर्द पनप चुकी है। जी। जैसे कि मंदिरों के इर्द-गिर्द एक व्यवस्था अर्थव्यवस्था पनपती है। ऐसे ही

27:12 लोकतंत्र के मंदिरों के इर्दगिर्द बहुत बड़ी अर्थव्यवस्था पनप चुकी है। बहुत सारी एजेंसियां हैं। चुनाव एजेंसियां पैदा हो चुकी हैं। सर्वे एजेंसियां पैदा हो चुकी हैं। सैकड़ों YouTube चैनल हैं जो इससे कमाई कर रहे हैं और लोकतंत्र हर हर साल चार या पांच चुनाव का ये उत्सव हम हर जगह देखने को मिलता है। तो जो रीजनल पार्टीज का अपना ये तर्क है कि जो केंद्र सरकार है वह 5 साल तक अपना हम पर एक साथ हावी रहेगी या दूसरे जो दल जो गिनाते हैं कि अगर चुनाव नहीं होगा तो इन अर्थव्यवस्थाओं का क्या होगा इन आवाजों का क्या होगा और जो लगातार चुनाव का एक माहौल बने रहने से लोकतंत्र को मजबूती मिलती है जी और बहुत सारी बातें हैं आप ले मैन से जाइए

27:59 कि अगर चुनाव नहीं होगा 5 साल कहीं तो हो सकता है कि हमको पेट्रोल के दाम लगातार 5 साल तक बढ़ते जाएंगे और हम हम लोग उसमें पिसते चले हैं इस तरह के जो इस लोकतंत्र को मजबूती देते हैं। जाहिर सी बात है बात लोकतंत्र की मजबूती है। बात देश की मजबूती की है और विकसित भारत के लक्ष्य की है। जाहिर तौर पर एक देश एक चुनाव की जब हम बात करते हैं तो उसके पीछे जो उद्देश्य है वो देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो। देश का लोकतंत्र मजबूत हो। नीति, स्थिरता और आर्थिक विकास सुनिश्चित हो। आप तीनों ने इस कार्यक्रम में बहुत भाग लिया। बहुत-बहुत धन्यवाद। बहुत-बहुत शुक्रिया संसद टीवी से बात करने के लिए। तो आज इस कार्यक्रम में इतना ही। मुझे दीजिए आज्ञा। नमस्कार। [संगीत]

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