बीफ से बेहतर चिकन और चिकन से बेहतर सब्जी [Will climate change threaten food security?]

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संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो जलवायु परिवर्तन के कारण खाद्य आपूर्ति पर मंडरा रहे खतरे और भोजन की बर्बादी के मुद्दे पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि कैसे जलवायु परिवर्तन फसलों को बर्बाद कर रहा है, खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ रही हैं, और दुनिया भर में भोजन की बर्बादी हो रही है। वीडियो समाधान के तौर पर जलवायु अनुकूल फसलों को उगाने, जैविक खेती को बढ़ावा देने और भोजन की बर्बादी को कम करने पर जोर देता है।

मुख्य बातें:

  • जलवायु परिवर्तन से फसलों का उत्पादन प्रभावित हो रहा है, जिससे खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ रही हैं।
  • हर साल एक अरब टन से ज्यादा खाना बर्बाद हो जाता है, जो ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में बड़ा योगदान देता है।
  • मांस उत्पादन, विशेष रूप से रेड मीट, ग्रीनहाउस गैसों का सबसे बड़ा उत्सर्जक है।
  • भोजन की बर्बादी को कम करके और जलवायु अनुकूल फसलों को उगाकर खाद्य सुरक्षा को बेहतर बनाया जा सकता है।

भोजन का वैश्विक सफर और जलवायु परिवर्तन का खतरा

वीडियो जर्मनी में मौजूद खाद्य पदार्थों, जैसे भारत से आए अंगूर, कोस्टा रिका से आए केले और अमेरिका से आई मूंगफली का उदाहरण देकर शुरू होता है। यह बताता है कि कैसे ये खाद्य पदार्थ हजारों किलोमीटर की यात्रा करके यहां पहुंचे हैं। इसी तरह, भारत में कश्मीर के सेब और नागपुर के संतरे पूरे देश में जाते हैं। हालांकि, खाद्य पदार्थों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में ऊर्जा और ईंधन की खपत होती है, जिससे कार्बन उत्सर्जन होता है और जलवायु परिवर्तन होता है। जलवायु परिवर्तन का फसलों पर बुरा असर पड़ रहा है, जिससे खाद्य आपूर्ति को खतरा है। भविष्य में नाश्ते के लिए कॉफी, बच्चों के लिए कोकोआ और सबके लिए केला, एवोकाडो, आम, नारियल और पपीता गायब हो सकते हैं।

जलवायु परिवर्तन और फसलों पर प्रभाव

जलवायु परिवर्तन फसलों को बर्बाद कर रहा है, जिससे बाजार में खाद्य पदार्थों की उपलब्धता और उनकी कीमतें प्रभावित हो रही हैं। बहुत सारी फसलें खास जलवायु परिस्थितियों की वजह से निश्चित इलाकों में ही उगती हैं, लेकिन अब ये इलाके सूखा, चक्रवात और बाढ़ का शिकार बन रहे हैं, जिससे जमीन बेकार हो रही है और फसलें बर्बाद हो रही हैं। मोनोकल्चर यानी एक ही तरह की फसल को बार-बार उगाना भी ठीक नहीं है, क्योंकि इससे फसल पर चरम मौसम, बीमारियों और कीटों का खतरा बढ़ जाता है। एक बैक्टीरियल बीमारी की वजह से संतरों में रस घट रहा है और वे महंगे हो रहे हैं। स्पेन में जैतून के तेल का उत्पादन हाल के वर्षों में आधा हो गया है। अनुमान है कि 2050 तक कॉफी के वैश्विक उत्पादन का भी यही हाल हो सकता है।

समाधान: जलवायु अनुकूल फसलें और जैविक खेती

वीडियो में समाधान के तौर पर फसलों की ऐसी किस्में उगाने की बात की गई है जो गर्मी, तूफान और बाढ़ का बेहतर मुकाबला कर सकें। जैविक खेती में भी यही बात लागू होती है। जलवायु परिवर्तन से कुछ फायदा भी हुआ है, क्योंकि तापमान बढ़ने से कुछ नए इलाके खेती के काबिल बन रहे हैं। भविष्य में जर्मनी में तरबूज उग सकते हैं, वाइन आइसलैंड से आ सकती है और एवोकाडो इटली से मंगाए जा सकते हैं।

भोजन की बर्बादी: एक वैश्विक समस्या

दुनिया में हर साल एक अरब टन से भी ज्यादा खाना कचरे के ढेर में चला जाता है, यानी जितना भी खाना मौजूद है, उसका 17% से ज्यादा बर्बाद हो जाता है। वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में से 8% के लिए खाने का उत्पादन, परिवहन और उसका सड़ना जिम्मेदार है। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि अगर खाने की बर्बादी एक देश होता, तो वह दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक होता।

उत्सर्जन और खाद्य उत्पादन

जो कुछ भी हम खाते हैं, उसे खाने की मेज तक पहुंचने के लिए लंबा सफर तय करना पड़ता है। इस पूरी प्रक्रिया में बहुत सारी ऊर्जा खर्च होती है और ग्रीनहाउस गैसों का भारी उत्सर्जन भी होता है। किसान जितनी भी ग्रीनहाउस गैसें पैदा करते हैं, उनमें से 1/3 का संबंध कहीं ना कहीं खाने से है। इसमें भी सबसे बड़ी हिस्सेदारी खेती और जमीन के इस्तेमाल से जुड़ी है। बेहतर पैदावार के लिए इस्तेमाल होने वाले रासायनिक खाद से नाइट्रस ऑक्साइड निकलती है, मवेशियों की जुगाली और पाचन प्रक्रिया से मीथेन निकलती है। सबसे ज्यादा उत्सर्जन मीट उत्पादन से होता है, खासकर रेड मीट से। दूसरी तरफ, पौधों पर आधारित खाना ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करता है।

भोजन की बर्बादी को कम करने के उपाय

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, हर दिन 100 करोड़ थालियों के बराबर खाना यूं ही फेंक दिया जाता है। यह स्थिति तब है जब दुनिया में 80 करोड़ लोग भूख से जूझ रहे हैं। रिपोर्ट कहती है कि 2022 में 1 अरब टन से भी ज्यादा खाना बर्बाद हुआ, जो उस साल बाजारों तक पहुंची कुल उपज का 20% हिस्सा था। खाने की यह बर्बादी सिर्फ पश्चिमी और अमीर देशों में नहीं, बल्कि दुनिया भर के सभी देशों में हो रही है। अगर आपके घर में खाना बच जाए तो उसे फेंकने की बजाय किसी जरूरतमंद को दे दीजिए। अगर किसी पार्टी या फंक्शन के बाद बहुत सारा खाना बच जाता है तो पता करिए आपके आसपास ऐसी कोई संस्था जरूर होगी जो उस खाने को जरूरतमंद लोगों तक पहुंचा दे। खाने की बर्बादी बहुत सारे लोगों की मेहनत और संसाधनों की बर्बादी है। इस दुनिया में हर दिन जितना खाना बर्बाद होता है, वह करोड़ों लोगों की भूख शांत कर सकता है।

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Transcript

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0:00 [संगीत] अभी हम जर्मनी में मौजूद हैं और टेबल पर हमारे सामने जो चीजें आप देख रहे हैं इनमें से यह अंगूर भारत से आए हैं यह केले कोस्टा रिका से आए हैं और यह मूंग फलियां अमेरिका से आई हैं यानी 6000 से 9000 किलोमीटर तक का सफर तय करके यह चीजें यहां जर्मनी में पहुंची हैं बाजार की जहां मांग होती है सामान पहुंच जाता है भारत में भी तो कश्मीर के सेब और नागपुर के संतरे देश भर में जाते हैं लेकिन चीजों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने पर ऊर्जा की खपत होती है ईंधन की खपत होती है जिससे कार्बन उत्सर्जन होता है इसकी वजह से जलवायु

0:46 परिवर्तन होता है और यह जलवायु परिवर्तन अब हमारी फसलों पर भारी पड़ रहा है क्या जलवायु परिवर्तन से हमारी खाद्य आपूर्ति को खतरा है नाश्ते के लिए ना कॉफी ना बच्चों केलिए लिए कोकोआ और ना ही सबके लिए केला अवा काडो आम नारियल और पपीता सब गायब एक दिन ऐसा हो सकता [संगीत] है जलवायु परिवर्तन फसलों को बर्बाद कर रहा है इसी से तय हो रहा है कि बाजार में हम क्या खरीदेंगे और कितने दाम पर बहुत सारी चीजें खास जलवायु परिस्थितियों की वजह से निश्चित इलाकों

1:31 में ही उगती हैं और यह इलाके अब सूखा चक्रवात और बाढ़ का शिकार बन रहे हैं जमीन बेकार हो रही है फसल बर्बाद हो रही है मोनोकल्चर यानी एक ही तरह की फसल को बार-बार उगाना भी ठीक नहीं है इससे फसल पर चरम मौसम बीमारियों और कीटों का खतरा ज्यादा होता है एक बैक्टीरियल बीमारी की वजह से संत्रों में रस घट रहा है है और महंगा हो रहा है स्पेन में जैतून के तेल का उत्पादन हाल के वर्षों में आधा हो गया है 2050 तक कॉफी के वैश्विक उत्पादन का भी यही हाल हो सकता है अभी दुनिया में पर्याप्त भोजन है फिर भी उसके दाम बढ़ते ही जा रहे हैं किल्लत

2:18 और बाजार के उतार चढ़ाव की वजह से एक समाधान है फसलों की ऐसी किस्में उगाना जो गर्मी तूफान और बाढ़ का बेहतर मुका कर पाए जैविक खेती में भी यही बात लागू होती है जलवायु परिवर्तन से कुछ फायदा भी हुआ है तापमान बढ़ने से कुछ नए इलाके खेती के काबिल बन रहे हैं और अगर जर्मनी में तरबूज उगे वाइन आइसलैंड से आने लगे और अवा काडो इटली से मंगाए जाए तो हैरान मत [संगीत] होएगा क्या आपको पता है कि इस दुनिया में हर साल एक अरब टन से भी ज्यादा खाना कचरे के ढेर में चला जाता जाता है यानी इस दुनिया में खाने के लिए जितना भी खाना मौजूद है हर साल उसका 17 फीसद से ज्यादा

3:06 बर्बाद हो जाता है वैश्विक स्तर पर ग्रीन हाउस गैसों का जितना भी उत्सर्जन होता है उसमें से 8 फीसद के लिए खाने का उत्पादन खाने का परिवहन और उसका सड़ना जिम्मेदार होता है संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि खाने की बर्बादी अगर एक देश होता तो वह दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक होता जो कुछ भी हम खाते हैं उसे खाने की मेज तक पहुंचने के लिए लंबा सफर तय करना पड़ता है सबसे पहले खेतों में फसल उगाई जाती है उसे काटकर गांव कस्बों और शहरों तक भेजा जाता है बहुत सारे खाने को प्रोसेस भी किया जाता है फिर वह बाजार में आता है और वहां से लोगों तक पहुंचता है इस

3:52 पूरी प्रक्रिया में बहुत सारी ऊर्जा खर्च होती है और ग्रीन हाउस गैसों का भारी उत्सर्जन भी इन किसान जितनी भी ग्रीन हाउस गैसें पैदा करते हैं उनमें से 1 तिहाई का संबंध कहीं ना कहीं खाने से है इसमें भी सबसे बड़ी हिस्सेदारी खेती और जमीन के इस्तेमाल से जुड़ी है जैसे कि खेती के लिए जंगलों को काटने से कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ती है बेहतर पैदावार के लिए इस्तेमाल होने वाले रासायनिक खाद से नाइट्रस ऑक्साइड निकलती है मवेशियों की जुगाली और पाचन प्रक्रिया से मीथेन निकलती है इसके अलावा चावल की खेती पराली जलाने और खेतों पर ईंधन के इस्तेमाल से भी उत्सर्जन होता है सबसे ज्यादा उत्सर्जन मीट उत्पादन

4:41 से होता है खासकर रेड मीट से इसके बाद दूध से बने उत्पाद भी हमारे पर्यावरण पर भारी पड़ते हैं दूसरी तरफ पौधों पर आधारित खाना ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम करता है इसमें फल और सब्जियां साबुत अनाज फलियां मेवे और दालें शामिल हैं इन्हें उगाने में कम ऊर्जा कम जमीन और कम पानी की जरूरत पड़ती है 1 किलो बीफ के उत्पादन पर जहां 70.6 किलोग्राम ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन होता है वहीं 1 किलो चावल और अनाज के लिए यह उत्सर्जन 35 किलो से थोड़ा सा ज्यादा है वहीं दूध के लिए यह आंकड़ा 3.2 किग्रा है उत्सर्जन के मामले में बीफ

5:28 के मुकाबले चिकन कहीं बेहतर है जिस पर प्रति किलो होने वाला उत्सर्जन करीब 10 किग्रा है कमाल की बात यह है कि इतने संसाधनों से तैयार होने वाले खाने की अंधा धुंध बर्बादी हो रही है संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रिपोर्ट कहती है कि हर दिन 100 करोड़ थालियां के बराबर खाना यूं ही फेंक दिया जाता है यह स्थिति तब है जब दुनिया में 80 करोड़ लोग भूख से जूझ रहे हैं रिपोर्ट कहती है कि 2022 में 1 अरब टन से भी ज्यादा खाना बर्बाद हुआ जो उस साल बाजारों तक पहुंची कुल उपज का 20 फीसद हिस्सा था और खाने की यह बर्बादी सिर्फ पश्चिमी और अमीर देशों में नहीं बल्कि दुनिया भर के

6:13 सभी देशों में हो रही है अगर आपके घर में खाना बच जाए तो उसे फेंकने की बजाय किसी जरूरतमंद को दे दीजिए और अगर किसी पार्टी या फंक्शन के बाद बहुत सारा खाना बच जाता है तो पता करिए आपके आसपास ऐसी संस्था कोई जरूर होगी जो उस खाने को जरूरतमंद लोगों तक पहुंचा दे खाने की बर्बादी से भी आप इस तरह बच सकते हैं और कुछ लोगों की मदद भी हो जाएगी खाने की बर्बादी बहुत सारे लोगों की मेहनत और संसाधनों की बर्बादी है इस दुनिया में हर दिन जितना खाना बर्बाद होता है वह करोड़ों लोगों की भूख शांत कर सकता है आप अपने घर में बचे हुए खाने का क्या करते हैं कमेंट करके बताइए तो आज के वीडियो में बस इतना

7:00 ही होगी आपसे जल्द मुलाकात अपना ध्यान रखिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद

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