0:00 जिस मनुष्य का चित्त हर तरह की वासनाओं से मुक्त हो गया है जो हर परिस्थिति में न किसी आकांक्षा से बंधा है ना किसी इच्छा से संचालित उसकी तुलना आखिर किससे की जा सकती है ऐसा आत्मा स्वतंत्र व्यक्ति भीतर से पूर्ण होता है ना उसे कुछ पाने की लालसा रहती है ना कुछ खोने का भय वासना ही वह बीज है जिससे अनगिनत इच्छाओं की बेल पनपती है और यह बेल कभी खत्म नहीं होती वह जितना भी पाले भीतर की खालीपन भरता नहीं। सिकंदर ने आधी दुनिया जीत ली पर तृप्त ना हो सका। अनगिनत अरबपति अपार संपत्ति के बावजूद अधूरे ही चले जाते हैं। पर जिसने वासना की आग बुझा दी वह जो कुछ भी है उसी में संपूर्ण है। चाहे उसके पास कुछ हो या
0:47 कुछ भी ना हो। बुद्ध राजकुमार थे। फिर भी भीतर अधूरापन था। लेकिन आत्मबोध के बाद जब वासनाएं समाप्त हुई तब उन्हें सच्ची तृप्ति मिली। सच तो यह है कि जब तक वासना है मन हमेशा किसी ना किसी उलझन में फंसा रहता है और जब वासना मिट जाए तो जीवन स्वयं में ही पूर्ण हो जाता है। जब तक मन वासनाओं से बंधा रहता है। उसे कोई स्थाई समाधान नहीं मिलता। जीवन में भागदौड़ बनी रहती है। उलझने सुलझती नहीं और भीतर एक अधूरापन हमेशा बना रहता है। लेकिन जैसे ही कोई व्यक्ति ज्ञान के प्रकाश में वासनाओं से मुक्त होता है। वैसे ही उसके भीतर का तूफान शांत हो जाता है। जीवन की गु्थियां खुद ब खुद सुलझने लगती हैं। वह व्यक्ति ना
1:35 तो बाहरी हलचल में उलझता है ना ही किसी आकर्षण या अस्वीकार में खोता है। वह भीतर से हल्का निर्विघ्न और पूर्ण हो जाता है। उसकी स्थिति वैसी होती है जैसे गांठों से मुक्त रेशमी धागा सरल, कोमल और स्वतंत्र उसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती क्योंकि वह अब ना किसी से बांधता है ना किसी को बांधता है। जो संसार की चीजों को पकड़ने में लगा है, वही उन्हीं में उलझा रहता है और पूर्णता को कभी नहीं छू पाता। अष्टावक्र इसी गढ़ सत्य को उजागर करते हुए कहते हैं कि वासना मुक्त ज्ञानी ही वह है जो सब कुछ जानता हुआ भी जानने के भ्रम से रहित है। सब देखता है पर देखने के अहंकार
2:21 से मुक्त है। बोलता है पर मौन की गहराई में डूबा हुआ। ज्ञानी और अज्ञानी के बीच अंतर सिर्फ ज्ञान का नहीं बल्कि दृष्टि और अनुभूति की गहराई का होता है। एक सतह पर रहता है। दूसरा अस्तित्व की जड़ तक पहुंच जाता है। अज्ञानी व्यक्ति अक्सर अपने अहंकार और वासनाओं के जाल में इस कदर उलझ जाता है कि उसका नजरिया सीमित और स्वार्थपूर्ण हो जाता है। वह ना खुद को सही से समझ पाता है ना दूसरों को जानने की क्षमता विकसित कर पाता है। वह जिसे नहीं जानता उसी पर सबसे ज्यादा दावे करता है। जिसे कभी देखा तक नहीं उसके बारे में भी ठोक बजाकर राय देता है। आत्मा, परमात्मा, स्वर्ग, नरक, पुनर्जन्म यह शब्द उसके लिए
3:07 अनुभव नहीं बल्कि सिर्फ बहस के हथियार होते हैं। जिनसे वह दूसरों को जज करता है और खुद को श्रेष्ठ साबित करता है। वह बार-बार दूसरों पर आरोप लगाता है कि तुम आस्तिक नहीं, तुम अधर्मी हो। इसलिए तुम्हें नरक मिलेगा। जबकि सच्चा ज्ञानी वह है जो सब जानने के बाद भी कहता है मैं नहीं जानता जो देख चुका होता है फिर भी दावा नहीं करता और अगर बोलता भी है तो उस वाणी में ना अहंकार होता है ना आग्रह उसका ज्ञान उसे विनम्र बनाता है वासना से मुक्त करता है और भीतर की शांति में स्थापित कर देता है ऐसे ज्ञानी की तुलना किसी से नहीं की जा सकती क्योंकि उसने न सिर्फ सत्य को देखा है बल्कि उसे बिना शोर किए जी भी
3:53 लिया अष्टावक्र कहते हैं कि जिस व्यक्ति की बुद्धि अब किसी भावना को ना शुभ मानती है ना अशुभ जिसने अपनी कामनाओं को पूरी तरह छोड़ दिया है वही वास्तव में तेजस्वी और शोभायमान होता है। चाहे वह किसी महल का राजा हो या किसी गली का भिखारी। उसका सौंदर्य बाहरी नहीं बल्कि अंतर से प्रकट होता है। जीवन की गहराई एक अद्भुत त्रिवेणी की तरह है। जैसे गंगा और यमुना की धाराएं सतह पर स्पष्ट दिखती हैं। परंतु सरस्वती की धारा भीतर से बहती है। वैसे ही हमारे जीवन में शरीर और मन तो सबको दिखते हैं। लेकिन चेतना की सूक्ष्म धारा गुप्त ही रहती है। अज्ञानी इन्हीं दो सतहों तक सीमित रहता है। शरीर को सजाता है। मन को
4:41 तौलता है और जीवन को केवल दो रंगों में देखता है। परंतु जो सच में जानता है, वह उस छिपी हुई चेतना तक पहुंच जाता है जहां ना कोई भेद रहता है, ना कोई द्वंद्व वहां सब एक हो जाता है। यह विभाजन जो संसार में हमें इतना संघर्ष देता है, वह केवल सत ही दृष्टि का परिणाम है। और जैसे ही कोई व्यक्ति उस गहराई को छू लेता है जहां सब एकरस हो जाता है। वहीं से जीवन में सच्चा सौंदर्य, स्थिरता और समरसता प्रकट होती है। इसी अनुभूति को सच्चा ज्ञान और परम सत्य कहा गया है। वह दृष्टि जो भेद से परे देखती है। यह संसार जितना हमें विभाजित दिखता है, स्वर्ग और नरक, सुख और दुख, राग और वैराग्य, सज्जन और दुर्जन जीवन मुक्त
5:29 और सांसारिक सब भेद केवल सीमित ज्ञान की उपज है। स्वार्थी मन हमेशा तुलना में उलझा रहता है। यह अच्छा है, वह बुरा है। यह लाभ है, वह हानि, यह सुंदर है। वह असुंदर। वह हर चीज को तोलता है और एक निष्कर्ष पर पहुंच जाता है। लेकिन ज्ञानी इन द्वंद्वों की सतह को पार कर चुका होता है। वह मन से आगे बढ़कर अस्तित्व से एकाकार हो जाता है। जहां ना कोई श्रेष्ठ है ना निकृष्ट सब कुछ एक ही स्रोत से निकला हुआ दिखाई देता है। और यही समत्व बुद्धि है। वह विलक्षण अंतर्दृष्टि जिसे भारत की महानतम खोज माना गया है। यह ऐसी दृष्टि है जो ना किसी धर्म की संकीर्णता में बंधी है ना किसी आचरण के
6:15 खोल में सिमटी है। जो धर्म केवल सही गलत के नियमों तक सीमित रह जाए वह अस्तित्व की गहराइयों से अपरिचित रहता है। जबकि ज्ञानी के लिए उपलब्धि का अर्थ है उस बोध को पाना जिसमें समस्त भेद मिट जाते हैं और केवल एक व्यापक शांत और समरस अनुभूति शेष रह जाती है। इसलिए अष्टावक्र स्पष्ट करते हैं कि जो व्यक्ति हर भावना से परे हर भेद से मुक्त हो चुका है उसके लिए भिखारी और सम्राट में कोई अंतर नहीं रह जाता क्योंकि उसकी आभा उसके आंतरिक गुणों से प्रस्फुटित होती है ना कि धन पद या सामाजिक सम्मान से। असली गरिमा ना तो किसी ऊंचे आसन से आती है ना ही किसी दिखावे से। वह तो तब
7:01 प्रकट होती है जब व्यक्ति वासना और अहंकार की जकड़न से मुक्त हो जाता है। ऐसा ज्ञानी जो अब शूद्र भाव से ऊपर उठ चुका है और आत्मज्ञान की ऊंचाई को छू चुका है वही सच्चे अर्थों में महान कहलाता है। अष्टावक्र आगे कहते हैं कि जिस योगी ने जीवन के सत्य को पहचान लिया है जो सृष्टि की जड़ आत्मा को समझ चुका है। उसका स्वभाव सहज निष्कपट और सरल हो जाता है। उसके भीतर ना कोई संकोच बचता है ना कोई भ्रम या उलझन। वह स्वच्छंद होकर जीता है। लेकिन वह स्वच्छंदता अनुशासन से उपजी होती है। भीतर की स्पष्टता और तत्व की ठोस समझ से। ऐसा योगी ना दिखावे में रहता है ना किसी आडंबर
7:46 में। उसका आचरण यथार्थ से भरा होता है क्योंकि वह जान चुका होता है कि जीवन के केंद्र में केवल आत्मा है और वही सबसे बड़ी उपलब्धि है। जिसने आत्मा को जान लिया वह स्वच्छंदता, संकोच या तत्व निर्णय जैसी मानवीय अवधारणाओं से बहुत आगे निकल चुका होता है। उसके लिए अब अस्तित्व ही उसका मार्गदर्शक होता है। वही उसका अनुशासन बन जाता है। ऐसा व्यक्ति ना मन के उतार-चढ़ाव में बहता है, ना किसी मानसिक बंधन में बंधता है। वह एक ऐसी आंतरिक स्पष्टता में जीता है, जो विवेक से उपजी होती है, ना कि द्वंद्व से। अष्टावक्र आगे कहते हैं कि जब कोई आत्मा में विश्रांति पा लेता है जब वह तृप्त हो जाता है ना किसी आशा में उलझा
8:33 होता है ना किसी शोक में डूबा तब उसके भीतर जो अनुभव प्रकट होता है उसे शब्दों में पिरो पाना असंभव हो जाता है। ऐसा अनुभवी व्यक्ति किसी को समझाने की कोशिश नहीं करता क्योंकि वह जानता है कि यह अनुभव व्यक्त नहीं केवल जिया जा सकता है। यह स्थिति एक गहराई है। एक ठहराव है जहां इच्छाएं शांत हो जाती है और मन एक विराट मौन में विलीन हो जाता है। वहां पहुंचकर जीवन ना साधारण रहता है ना असाधारण। वह बस होने की एक विशिष्ट अवस्था बन जाता है जिसे देखना या बताना नहीं केवल महसूस करना संभव है। आत्मिक अनुभव ऐसे होते हैं जो इस सांसारिक जगत के सामान्य अनुभवों से बिल्कुल अलग होते हैं। वे इतने सूक्ष्म
9:20 इतने गहन होते हैं कि उन्हें शब्दों में बांधना लगभग असंभव हो जाता है। कोई और उन्हें समझ नहीं सकता क्योंकि उन्होंने वह स्थिति जानी ही नहीं। वे उस अंतर यात्रा से गुजरे ही नहीं है। जैसे किसी छोटे बच्चे को प्रेम का अनुभव नहीं समझाया जा सकता। जैसे किसी अंधे को रंगों की बात करना निरर्थक है। वैसे ही आत्मिक आनंद को सिर्फ सुना या पढ़ा नहीं जा सकता। उसे केवल अनुभव किया जा सकता है। किसी का दुख या पीड़ा भी पूरी तरह किसी और को महसूस नहीं हो सकती। भले ही वह पास बैठा हो। यही बात आत्म सुख पर भी लागू होती है। इसलिए सच्चे ज्ञानी मौन हो जाते हैं। ना इसीलिए कि वे कुछ कहना नहीं चाहते बल्कि इसलिए कि
10:08 कहने लायक कुछ बचता ही नहीं। आत्मज्ञान की अवस्था में व्यक्ति के भीतर एक ऐसी जागरूकता पैदा होती है जो पुराने विश्वासों और मानसिक संरचनाओं को ढा देती है। वहां ना तर्क काम आते हैं ना प्रमाणों की कोई जरूरत रह जाती है। बस एक शुद्ध अनुभूति होती है जो शब्दों से परे होती है और जिसे केवल अंतर में उतर कर ही पाया जा सकता है। जैसे ही कोई स्वप्न टूटता है। एक ही पल में पूरी दुनिया बदल जाती है। जो क्षण भर पहले था वह अब बस एक स्मृति बन जाता है। आत्मज्ञान का क्षण भी कुछ ऐसा ही होता है। जब यह घटता है तो यह सांसारिक जीवन जैसे एक लंबा स्वप्न लगता है जो अचानक मिट जाता है और एक नई चेतना का जन्म
10:54 होता है। ऐसी चेतना जिसे ना पहले देखा गया है ना सुना गया है ना कभी सोचा गया है। यह अनुभव इतना प्रबल और अपरिचित होता है कि यदि उस समय कोई मार्गदर्शक गुरु साथ ना हो तो व्यक्ति भ्रमित हो सकता है। यहां तक कि पागल भी लेकिन यह पागलपन किसी रोग का नहीं एक दिव्य उन्माद का होता है। वह मस्ती जो संसार की सीमा को लांघ चुकी होती है। अगर पागल ही होना है तो ईश्वर के प्रेम में पागल होना कहीं अधिक मूल्यवान है। बनिस्बत इस संसार की भागदौड़ में। आत्मा का साक्षात्कार तभी होता है जब मन पूरी तरह शांत, निर्विकार और रिक्त हो जाता है। और यही शून्यता ध्यान है। यही स्थिति समाधि की ओर ले जाती है। ध्यान कोई सोच विचार
11:41 नहीं ना ही कोई अभ्यास है जिसे जबरन किया जा सके। ध्यान किसी विषय से जुड़ा नहीं होता क्योंकि जहां विषय है वहां ध्यान नहीं और जहां ध्यान है वहां कोई विषय नहीं बचता। यह तो बस घटता है स्वाभाविक रूप से तब जब मन अपनी सारी गति छोड़कर मौन हो जाता है और उस मौन में आत्मा अपनी संपूर्ण रोशनी के साथ प्रकट होती है। अक्रियता ही ध्यान की असली गहराई है। अष्टावक्र का समूचा संदेश इसी मौन निष्क्रिय स्थिति पर आधारित है। जहां ना कोई प्रयास है ना कोई चाह बस एक शुद्ध उपस्थिति है। इसी अक्रिया में आत्मज्ञान जागता है। बोध की लौ प्रज्वलित होती है और भीतर एक नई चेतना का
12:28 उदय होता है। जब यह अनुभव घटता है तो व्यक्ति स्वयं को आत्मवत अनुभव करने लगता है। न केवल शरीर या मन के रूप में बल्कि समग्र ब्रह्म के रूप में। यही सच्चा ब्राह्मण है जिसे ज्ञान की उपलब्धि ने अहंकार और वासना से मुक्त कर दिया होता है। यह स्थिति किसी जातिगत पहचान से नहीं बल्कि भीतर की पूर्णता से उपजती है। यह नया जन्म है। एक गहरे आंतरिक रूपांतरण का क्षण जिसमें पुराना व्यक्ति मर जाता है और आत्मा का नवजीवन शुरू होता है। इसलिए इसे द्विज कहा गया है। शरीर से एक बार जन्म लिया और आत्मा से दूसरी बार मां शरीर को जन्म देती है। लेकिन गुरु आत्मा को जन्म
13:13 देता है। वह शिष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। शूद्र से ब्राह्मण और मनुष्य से परमात्मा बना देता है। इसीलिए गुरु की महिमा ईश्वर से भी ऊंची कही गई है। क्योंकि वही ईश्वर की साक्षात झलक बनकर मार्ग दिखाता है। यही है सन्यास की असली पाठशाला। जहां अंतिम फल है आत्मानुभूति और उसी में अंततः मिलती है संपूर्ण मुक्ति। जीव का सर्वोत्तम विकास या परिणति उस अवस्था में होती है जब वह परमानंद की स्थिति में पहुंचता है जहां ना कोई दुख होता है ना कोई संताप। अष्टावक्र के अनुसार जो व्यक्ति स्वप्न, निद्रा और जागृत अवस्था में भी एक सी स्थिति में रहता है, वह ही सच्चा ज्ञानी होता है। वह
14:00 ना तो पूरी तरह सोता है, ना स्वप्न में ही खो जाता है, और ना जागृत अवस्था में किसी बाहरी दुनिया में उलझा रहता है। ऐसे व्यक्ति की अंतरात्मा हमेशा जागरूक और संतुष्ट रहती है। ज्ञानी और अज्ञानी दोनों की नींद में फर्क होता है। अज्ञानी जब सोता है तो वह अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है और स्वप्न में खोकर दूसरी दुनिया में प्रवेश कर जाता है। उसकी निद्रा में ना तो उसे खुद का एहसास होता है ना संसार का। वहीं ज्ञानी की नींद पूरी तरह से अलग होती है। वह अपनी आत्मा के साथ हर क्षण जुड़ा रहता है। उसकी निद्रा भी शांति और जागरूकता से भरी होती है। उसकी नींद केवल शारीरिक विश्राम का माध्यम नहीं
14:47 बल्कि आत्मा का गहरा साक्षात्कार होती है। जहां वह सांसारिक भयों और उलझनों से परे होता है। एक सच्चा ज्ञानी स्वप्न में भी जागरूक रहता है क्योंकि वह साक्षी भाव से अपनी अवस्था को देखता है। उसे यह भान रहता है कि वह सो रहा है और स्वप्न देख रहा है। यही जागरूकता उसे स्वप्न में भी सच्चे वास्तविकता से जोड़कर रखती है। इसी तरह जब वह गहरी नींद में होता है, तब भी वह आत्मा से जुड़ा रहता है और उसे आनंद का एहसास होता है क्योंकि उसकी नींद सिर्फ शारीरिक विश्राम नहीं बल्कि आत्मिक गहराई में जाकर शांति का अनुभव करना होती है। योगी इस अवस्था में खुद को पूरी तरह से जागरूक पाते हैं। जागृत अवस्था में भी वह हमेशा
15:34 अपनी आत्मा में लीन रहते हैं। जिससे बाहरी संसार की कोई भी स्थिति उन्हें प्रभावित नहीं कर सकती। इसका मतलब यह है कि वह ना तो पूरी तरह से जागृत होते हैं ना पूरी तरह से सोते हैं। वे हमेशा अपने आत्मा के साथ जुड़े रहते हैं। चाहे वह जागृत अवस्था हो, स्वप्न हो या गहरी नींद। ऐसे ज्ञानी व्यक्ति के लिए हर अवस्था में आत्मा का अनुभव होने से वह हमेशा तृप्त और संतुष्ट रहता है। अष्टावक्र के अनुसार ज्ञानी की स्थिति बिल्कुल अलग होती है। वह निश्चिंत रहता है। चाहे वह इंद्रियों, बुद्धि या अहंकार से घिरा हो। इसके विपरीत एक आम व्यक्ति जब इंद्रियों, बुद्धि या अहंकार से जुड़ा होता है तो वह उनमें उलझकर
16:21 परेशान होता है। ज्ञानी के पास इंद्रियां हैं लेकिन वह उनसे प्रभावित नहीं होता। वह अपनी इंद्रियों का उपयोग सिर्फ आवश्यकता के हिसाब से करता है ना कि किसी तरह की वासना या इच्छाओं के कारण। इंद्रियां अपना काम करती हैं। जैसे खाना खाना, देखना, सुनना, सूंघना आदि। लेकिन ज्ञानी उन पर नियंत्रित रहता है। उसका मन शांत और स्थिर रहता है। वह इन अनुभवों से जुड़े बिना बस उनका उपयोग करता है। इसी तरह उसकी बुद्धि भी कार्य करती है। लेकिन वह इसे सिर्फ जरूरत के हिसाब से प्रयोग करता है। ना कि किसी बाहरी दबाव या विचारों के चलते। ज्ञानी की स्थिति यह होती है कि वह इन सभी
17:06 बाहरी कार्यों का इस्तेमाल तो करता है लेकिन उन पर निर्भर नहीं होता और इस तरह वह दुख या चिंता से मुक्त रहता है। ज्ञानी की स्थिति बहुत खास होती है। वह अपनी बुद्धि का मालिक होता है ना कि इसके दास। वह आवश्यकता के अनुसार अहंकार और विनम्रता का उपयोग करता है। लेकिन इनसे बंधता नहीं है। वह साक्षी भाव में रहता है। जो भी होता है उसे बिना किसी व्यक्तिगत लगाव के देखता है। ज्ञानी सृष्टि के स्वाभाविक नियमों से ना तो टकराता है ना ही उनका अड़चन बनता है। वह सब कुछ ईश्वर की इच्छा समझकर इसे अपने तरीके से घटित होने देता है। अष्टावक्र कहते हैं कि ज्ञानी ना तो सुखी होता है ना दुखी ना ही वह विरक्त
17:52 होता है या संग से जुड़ा होता है। वह ना तो मोक्ष की चाह रखता है और ना ही मुक्त होता है बल्कि वह सबको अपने भीतर समेटे हुए रहता है। उसकी स्थिति द्वंद्व से परे होती है। वह समत्व बुद्धि का स्वामी होता है और हमेशा शांति में रहता है। जैसे वीणा के तार ना ज्यादा ढीले होते हैं, ना ज्यादा कसते हैं। तब जाकर संगीत निकलता है। ज्ञानी की शांति स्थिर रहती है। वह कभी भी किसी भी स्थिति से ना तो बहुत ऊपर उठता है ना बहुत नीचे गिरता है। जैसे एक घड़ी का पेंडुलम अपनी धुरी पर अडिग रहता है। अज्ञानी अक्सर जीवन के उलझाव में फंसे रहते हैं। जबकि ज्ञान और संतुलन में ही सच्ची शांति है। अज्ञानी अपने अहंकार में
18:37 बंधा हर स्थिति में आनंद खोजने की कोशिश करता है। जबकि ज्ञानी की स्थिति पूरी तरह से अलग होती है। वह नट की तरह है जो रस्सी पर चलते हुए संतुलन बनाए रखता है। चाहे दोनों ओर अस्थिरता हो। यही वजह है कि धर्म को एक अत्यंत सख्त और सतर्क मार्ग पर चलने जैसा बताया गया है। जहां थोड़ा सा भी झुकाव सब कुछ खो देने का कारण बन सकता है। उपनिषदों में भी यह कहा गया है कि जैसे रस्सी पर चलते हुए थोड़ी सी भी चूक हो तो गिरने का डर रहता है। ठीक वैसे ही जीवन में संतुलन बनाए रखना अत्यंत जरूरी है। अष्टावक्र कहते हैं कि ज्ञानी ना तो सुखी है ना दुखी ना किसी से जुड़ा हुआ है ना ही
19:22 विरक्त है। वह ना तो मोक्ष की चाहत रखता है ना ही उसे कोई मुक्ति का दावा है। वह ना तो स्वयं को श्रेष्ठ मानता है ना ही खुद को नगण्य समझता है। वह सदा समस्थि में रहता है। ना किसी चीज में अत्यधिक अटका ना किसी से भागा हुआ। अष्टावक्र ने कहा है कि जो व्यक्ति आत्मज्ञान की स्थिति में है, वह हर परिस्थिति में संतुष्ट रहता है। बिना किसी बाहरी उतार-चढ़ाव से प्रभावित हुए। वह ना तो विक्षिप्त होता है ना समाधि में रहते हुए समाधि का दिखावा करता है। ऐसे व्यक्ति की स्थिति किसी स्थिर और शांत चट्टान जैसी होती है जो ना तो विक्षेपों से विचलित होती है ना ही वह समाधि की अवस्था में किसी प्रकार की अज्ञता का अनुभव करता है। वह जड़ता में भी जड़ नहीं
20:11 होता। यानी भले ही उसके बाहरी व्यवहार में कुछ स्थिरता या निष्क्रियता दिखे लेकिन भीतर वह पूरी तरह से जागरूक और सचेत रहता है। वह ना तो पंडित के ढांचे में बंधा होता है ना किसी आडंबर में लिप्त होता है। ऐसे व्यक्ति का ध्यान किसी बाहरी प्रयास पर केंद्रित नहीं होता बल्कि वह भीतर की गहरी स्थिति में रहता है। यह व्यक्ति बाहरी दुनिया की भागदौड़ और व्यस्तता से मुक्त होकर अपने भीतर की शांति और चैतन्य से जुड़ा रहता है। इसलिए वह हमेशा सचेत और पूर्ण रूप से जागृत रहता