History Of Physical Education In India | Physical Education History In Hindi By Monu Madhukar

संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो भारत में शारीरिक शिक्षा के इतिहास पर प्रकाश डालता है, जो भीमबेटका की पहाड़ियों से लेकर आधुनिक समय तक के विकास को दर्शाता है। इसमें सिंधु घाटी सभ्यता, वैदिक काल, महाकाव्य, तक्षशिला और नालंदा जैसे प्राचीन संस्थानों, बौद्ध और जैन धर्म, मध्ययुगीन काल, ब्रिटिश काल और स्वतंत्रता के बाद के युग में शारीरिक शिक्षा के विकास को शामिल किया गया है। वीडियो में एचवीपीएम, वाईएमसीए, एलएनआईपीई, एनएसएनआईएस और साई जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों और राष्ट्रीय खेल नीति और खेलो इंडिया जैसी नीतियों पर भी प्रकाश डाला गया है, जिन्होंने भारत में खेलों को बढ़ावा दिया।

  • भारत में शारीरिक शिक्षा का इतिहास 3000 साल से भी पुराना है।
  • प्राचीन काल में शारीरिक शिक्षा जीवन जीने का एक अभिन्न अंग था।
  • आधुनिक काल में शारीरिक शिक्षा को बढ़ावा देने में कई संस्थानों और नीतियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

परिचय

यह वीडियो भारत में शारीरिक शिक्षा के इतिहास की शुरुआत करता है, जो लगभग 3000 साल पहले भीमबेटका की पहाड़ियों से शुरू होती है। इसमें बताया गया है कि कैसे प्राचीन समय में शारीरिक गतिविधियाँ जीवन जीने के लिए आवश्यक थीं और बाद में गुरुकुलों और अखाड़ों में इसे कैसे महत्व दिया गया। मुगल काल में पोलो का महत्व था, जबकि ब्रिटिश काल में आधुनिक खेलों को बढ़ावा मिला। आज, शारीरिक शिक्षा स्टेडियमों, स्कूलों और अकादमियों में विकसित हो रही है।

भीमबेटका

भीमबेटका, जो कि यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल है, में मेसोलिथिक काल के साक्ष्य मिलते हैं। यहाँ की पेंटिंग्स में लोगों को खेलते हुए, तीर-कमान चलाते हुए और भाला मारते हुए दिखाया गया है, जो शारीरिक गतिविधियों को दर्शाती हैं। ये गतिविधियाँ जीवन जीने के लिए आवश्यक थीं, जिनमें शिकार करना और समूह नृत्य शामिल थे। इस काल में एंडोरेंस, एजिलिटी और रिदम जैसे शारीरिक घटकों का उपयोग होता था।

सिंधु घाटी सभ्यता

सिंधु घाटी सभ्यता, जो झेलम, चेनाब, रावी, व्यास और सतलज नदियों के किनारे बसी हुई थी, में मोहनजोदड़ो का महान स्नानागार (ग्रेट बाथ) मिला है। यहाँ ईंटों से बने मकान, पक्की गलियाँ, धार्मिक स्नान और स्वच्छता का महत्व था। इससे पता चलता है कि लोग शारीरिक और स्वच्छता दोनों पर ध्यान देते थे। ग्रेट बाथ को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि लोग यहाँ तैराकी करते होंगे। मोहनजोदड़ो में गेम्स के भी साक्ष्य मिले हैं, जैसे कि खिलौने और कंचियां।

वैदिक काल

वैदिक काल में क्लासिकल धनुर्विद्या और योगा का महत्व था। वेदों, जैसे ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद और सामवेद में शारीरिक शिक्षा का उल्लेख मिलता है। यहाँ आर्चरी, रथदौड़, कुश्ती और घुड़सवारी जैसी गतिविधियाँ होती थीं। महर्षि पतंजलि ने योगा को बहुत महत्व दिया और योग सूत्र में अष्टांग योग का वर्णन किया, जिसमें यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि शामिल हैं।

महाकाव्य

रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों में गदा युद्ध का उल्लेख मिलता है, जिसमें भीम और दुर्योधन जैसे महान योद्धा शामिल थे। तीरंदाजी में अर्जुन का नाम सबसे पहले आता है। इन सभी उदाहरणों से पता चलता है कि उस समय सिस्टमैटिक ट्रेनिंग होती थी, जिससे आज के पीरियडाइजेशन का अंदाजा लगाया जा सकता है।

तक्षशिला और नालंदा

तक्षशिला और नालंदा उस समय के सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय थे। तक्षशिला, जो आज पाकिस्तान में है, आर्चरी ट्रेनिंग के लिए जानी जाती थी, जबकि नालंदा, जो बिहार में है, में स्विमिंग पूल और योगा ट्रेनिंग का उल्लेख मिलता है। इन संस्थानों में भारत और विदेशों से लोग पढ़ने आते थे।

बौद्ध और जैन धर्म

बौद्ध और जैन धर्म ने वॉकिंग, डिसिप्लिन, मॉडरेशन और मेडिटेशन को मुख्यधारा बनाया। यहाँ इंसान का डिसिप्लिन में रहना सबसे महत्वपूर्ण था।

मध्ययुगीन काल

मध्ययुगीन काल में मिट्टी के दंगल का विकास हुआ, जो आज अखाड़ों में दिखाई देता है। रॉयल पोलो (चौगान) का भी उल्लेख मिलता है। इस समय गांव-गांव में अखाड़ों का जन्म हुआ और बच्चे कुश्ती, पुश अप्स और अन्य एक्सरसाइज करने लगे।

ब्रिटिश काल

ब्रिटिश काल में भारत में शारीरिक शिक्षा का विकास हुआ। स्कूलों में शारीरिक शिक्षा को अनिवार्य बनाया गया और क्रिकेट, फुटबॉल, हॉकी और बैडमिंटन जैसे खेलों को बढ़ावा दिया गया। कबड्डी जैसे खेलों ने स्टैमिना, एजिलिटी और टीमवर्क को प्रोत्साहित किया।

शुरुआती संस्थान

1914 में हनुमान व्यायाम प्रसारक मंडल (एचवीपीएम) बना, जो पूरे एशिया में शारीरिक शिक्षा को बढ़ावा दे रहा था। 1920 में वाईएमसीए (यंग मैन क्रिश्चियन एसोसिएशन) मद्रास में हैरी क्रोबक द्वारा स्थापित किया गया, जिसे भारत में शारीरिक शिक्षा का पहला संस्थान माना जाता है। हैरी क्रोबक को भारत में आधुनिक शारीरिक शिक्षा का जनक कहा जाता है।

ओलंपिक में भागीदारी

1927 में इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन की स्थापना हुई, जिसके पहले अध्यक्ष डॉ. दोराब जी टाटा थे। 1928 के एमस्टर्डम ओलंपिक्स में भारत ने हॉकी में गोल्ड मेडल जीता।

लक्ष्मीबाई नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ फिजिकल एजुकेशन

17 अगस्त 1957 को ग्वालियर में लक्ष्मीबाई नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ फिजिकल एजुकेशन (एलएनआईपीई) की स्थापना हुई। यहाँ बीपीई और मास्टर डिग्री जैसे प्रोग्राम शुरू हुए। एलएनआईपीई को साउथ एशिया का सबसे अच्छा संस्थान माना जाता है और इसे नेक की तरफ से ए प्लस प्लस ग्रेड मिला हुआ है।

नेताजी सुभाष नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स

1961 में नेताजी सुभाष नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स (एनएसएनआईएस) की स्थापना हुई, जिसने भारत की कोचिंग इंडस्ट्री को बदल दिया। यहाँ कोचेस को साइंटिफिक ट्रेनिंग दी जाती थी।

स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया

1984 में स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (साई) की स्थापना हुई, जिसने ग्रास रूट लेवल से खिलाड़ियों को चुनकर उन्हें तैयार किया। यहाँ वर्ल्ड क्लास की कोचिंग और खिलाड़ियों के रहने की व्यवस्था थी।

नीतियाँ

1984 में नेशनल स्पोर्ट्स पॉलिसी आई, जिसके बाद 2001 में भी पॉलिसी आई, जिसमें मास लेवल पर पार्टिसिपेशन और एक्सीलेंस पर ध्यान दिया गया। 1959 में नेशनल फिजिकल एफिशिएंसी ड्राइव (एनपीईडी) ने स्कूलों और कॉलेजों में फिटनेस का असेसमेंट शुरू किया। 2014 में टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (टॉप्स) आई, जिसने कुछ गेम्स को स्पेशल फंडिंग और सपोर्ट दिया। खेलो इंडिया ने ग्रास रूट लेवल पर खिलाड़ियों का टैलेंट आइडेंटिफिकेशन किया और उन्हें अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर दिलाया। 2019 में फिट इंडिया मूवमेंट शुरू किया गया, जिसका नारा था "फिटनेस का डोज आधा घंटा रोज"। एनईपी 2020 में स्पोर्ट्स को एक अलग ही महत्व दिया गया है और तीसरी क्लास से ही फिजिकल एजुकेशन को अनिवार्य विषय बनाया गया है। 2025 की खेलो भारत नीति गवर्नेंस, स्पोर्ट्स साइंस और ग्रास रूट टू एलाइट पाइपलाइन तैयार कर रही है, जो ओलंपिक्स के लिए टारगेट करेगी।

निष्कर्ष

शारीरिक शिक्षा भारत के लिए क्यों जरूरी है, यह बताते हुए वीडियो समाप्त होता है। यह भीमबेटका की दीवारों से लेकर क्लासरूम तक, शारीरिक शिक्षा ने भारत को एंडोरेंस, डिसिप्लिन और टीम वर्क सिखाया है। अखाड़ों की मिट्टी से उठे चैंपियंस और गुरुकुल की तपस्या से आया योगा, सभी ने भारत को एक नई पहचान दी है। वीडियो में फिजिकल एजुकेशन के छात्रों, शिक्षकों, कोचों और अभिभावकों से अपने-अपने स्तर पर योगदान देने की अपील की गई है ताकि भारत को शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में विश्व में नंबर वन बनाया जा सके।

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Transcript

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0:00 हम सभी ने पिछले दो पार्ट्स में वर्ल्ड हिस्ट्री को पढ़ा। वर्ल्ड हिस्ट्री की बहुत गहराई से हमने चर्चा करी और एक-एक देश को मैंने आप सभी के सामने रूबरू कराया। लेकिन अब हमारा प्यारा भारत तो छूटा ही था। तो प्यारे भारत की बात करेंगे एक अलग ही वीडियो में। तो आज आपके सामने इंडिया की कहानी फिजिकल एजुकेशन की लेके लौटा हूं। तो इंडिया की फिजिकल एजुकेशन की कहानी लगभग 3000 साल नहीं 3000 साल पुरानी है। भीमबेडका की पहाड़ियों से लेके वहां गुफाओं में हमें फिजिकल एजुकेशन का जिक्र देखने को मिलता है। चाहे डांसर्स हो, चाहे रनर्स हो, सर्वाइवल ही सिलेबस हुआ करता था। फिर मोहनजोदाड़ो और ग्रेट बाथ जैसे साक्ष्य हमें देखने को मिलते हैं। उसके बाद में हम आगे बढ़े तो हमें गुरुकुल में

0:47 और अखाड़ों में फिजिकल एजुकेशन का जिक्र देखने को मिलता है। थोड़ा सा और आगे बढ़े तो हमें मुगल में पोलो का जिक्र देखने को मिलता है। और माना जाता है कि कुतुबुद्दीन ऐबक की भी मृत्यु पोलो खेलते हुए। ब्रिटिश काल आया। ब्रिटिश काल में जो हमारे मॉडर्न स्पोर्ट्स हैं उनको तवज्जो दी गई। थोड़ा सा साइंस को तवज्जो दी गई। आज की डेट में हम देखते हैं फिजिकल एजुकेशन स्टेडियम्स में, स्कूल्स में और उसी के साथ-साथ में नई-नई एकेडमीज़ में पनप रहा है। तो ये सारी कहानी देखो भीमबेडका से शुरू हो रही है। तो आइए लेके चलते हैं आपको रोचक तथ्यों और बेहतरीन कहानी फिजिकल एजुकेशन की विद डेट्स एंड ऑथेंटिक डाटा। तो बात करते हैं भीमबेटका की जो कि यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट में भी शामिल है जो कि

1:33 विंध्यान फुट हिल्स में मौजूद है। यहां पर मेज़ोलेथिक पीरियड के साक्ष्य देखने को मिलते हैं। माना जाता है कि जितनी भी ये पेंटिंग्स हैं जो आप भीमबेडका की पेंटिंग्स देखते हैं जिनमें खेलते हुए और तीर कमान या भाला मारते हुए यह सारी फिजिकल एक्टिविटीज ही थी जो इंसान सर्वाइवल के लिए यूज करता था। शिकार करते थे, ग्रुप डांस करते थे। यानी कि पूरा पीरियड फिजिकल एजुकेशन का चल रहा था। जहां पर एंडोरेंस, एजिलिटी, रिदमम और बाकी सारी हमारे कंपोनेंट्स जितने भी हेल्थ रिलेटेड और फिटनेस रिलेटेड कंपोनेंट्स हैं सब यूज़ हो रहे थे। तो जो आज हम किताबों में देख रहे हैं ये सब किताबों में पहले नहीं था। और हम अगर आज किताबों में जो चीज देख रहे हैं वो साक्ष्य हमें देखने को मिलते हैं भीमबेडका में। तो आपको यदि कभी मौका मिले

2:20 तो आप भोपाल से थोड़ी सी ही दूर भीमबेडका जरूर जाना और देख के आना। भीमबेडका के बाद में बात करते हैं हम इंडस वैली सिविलाइजेशन यानी कि सिंधु घाटी की सभ्यता। आप सभी को पता है पांच नदियां हमारी झेलम, चेनाब, रावी, व्यास, सतलज इनके किनारे बसी हुई थी हमारी सिंधु घाटी की सभ्यता। तो इस घाटी में हमें देखने को मिलती है मोहनजोदड़ो द ग्रेट बाथ। उसी के साथ-साथ में आपको देखने को मिलती है ईंटों से बने हुए मकान और पक्की गलियां, रिचुअल बाथिंग और हाइजीन का एक प्रॉपर वे। यानी कि यहां पर लोग फिजिकल और हाइजीन दोनों पर बहुत ज्यादा ध्यान दे रहे थे। जो यह बड़ा ग्रेट बाथ आपको देखने को मिला है, इसे देख के हम एक अंदाजा लगा सकते हैं कि लोग यहां स्विमिंग करते होंगे। तो फिजिकल एजुकेशन

3:07 वहां मौजूद था। मोहनजोदड़ो में हमें गेम्स के भी साक्ष्य देखने को मिलते हैं। यहां पर बहुत सारे खिलौने देख के हमें यह पता लगता है कि यहां पर गेम्स भी खेले जाते थे। कंचियां यानी कि मार्बल बॉल्स भी देखने को मिली है। उसके अलावा डांसिंग गर्ल और भी बहुत सारी मूर्तियां छोटी-छोटी सील में हमें देखने को मिलती है। कुछ साक्ष्य हमें पासों के यानी कि डाइसेस के भी देखने को मिलते हैं। जिससे कि यह पता लगता है कि यहां फिजिकल एजुकेशन वाकई में ही था। अब बात करते हैं अर्ली वैदिक पीरियड की यानी कि क्लासिकल धनुर विद्या और योगा का एक कल्चर यहां पर शामिल था। तो जहां पर स्किल और स्टिलनेस एक साथ चल रही थी। हमारे वेदों में ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद और सामवेद चारों में हमें जिक्र देखने को मिलता है फिजिकल एजुकेशन का।

3:52 जहां पर हम रिलेट कर पाते हैं क्योंकि यहां पर हमें आर्चरी का, रथदौड़ यानी कि चैरियट रेस, रेसलिंग, हॉर्स राइडिंग जैसी एक्टिविटीज देखने को मिलती हैं। जिससे हम एक अंदाजा लगाते हैं कि यहां फिजिकल एजुकेशन था। योगा को महर्षि पतंजलि ने बहुत ज्यादा तवज्जो दी। यह माना जाता है कि योगा सेकंड सेंचुरी बीसीई से लेके फिफ्थ सेंचुरी सीई तक का इसका डेवलपमेंट है। जहां पर महर्षि पतंजलि ने अपनी बुक योग सूत्र लिखी जिसमें अष्टांग योग का वर्णन देखने को मिलता है। और अष्टांग योग यानी कि यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्यारा, धारणा, ध्यान और समाधि इसका जिक्र देखने को मिलता है। और यह सारी चीजें हमें बताती है कि जीवन जीना कैसे है। योगा खाली एक पोश्चर नहीं है। योगा खाली आसन नहीं है। इसमें हमें बताया गया

4:39 है कि योगा को हमें कैसे जीना है और यहां पर बताया गया है कि योगा आत्मा का परमात्मा से मिलन है और यह हमारी इनर साइंस को जानना हमारे सेंसेस पे कंट्रोल और न जाने क्या-क्या। अब बात कर लेते हैं कुछ ऐसे रिटन एविडेंसेस की जहां पर हमें जिक्र देखने को मिलता है फिजिकल एजुकेशन का। एपिक्स यानी कि जितने हमारे महाकाव्य हैं। रामायण और महाभारत में हमें जिक्र देखने को मिलता है मेस फाइट यानी कि गधा युद्ध का जिसमें भीम और दुर्योधन जिन्हें महान योद्धा के नाम से भी जाना जाता है। बात करें तीरंदाजी की तो आज भी जब भी हम निशाने का जिक्र करते हैं तो अर्जुन का नाम सबसे पहले आता है। और यह जो जितने भी रिजल्ट हम देख रहे हैं, जितने हम यह महान लोग देख रहे हैं, जाहिर सी बात है यहां

5:24 सिस्टमैटिक ट्रेनिंग तो रही ही होगी। इससे एक हम अंदाजा लगा सकते हैं कि स्पोर्ट्स ट्रेनिंग का कनेक्शन डायरेक्टली जो आज की डेट में हम पीरियडाइजेशन में देखते हैं ये महाभारत और रामायण के दौर में होगा ही होगा। नहीं तो कौन इतना महान धनुधर बन सकता है बिना ट्रेनिंग के? तो ट्रेनिंग जरूर होगी। बात कर लेते हैं तक्षशिला और नालंदा की। तक्षशिला और नालंदा इस समय पे सबसे फेमस यूनिवर्सिटीज हुआ करती थी। तक्षशिला आज की डेट में पाकिस्तान में मौजूद और नालंदा जो आज की डेट में बिहार में मौजूद है। नालंदा में जाना जाता है कि स्विमिंग पूल्स का जिक्र देखने को मिलता है। योगा की ट्रेनिंग यहां पर बहुत जबरदस्त दी जाती थी। दूसरी ओर अगर हम तक्षशिला की बात करें जो आज की डेट में पाकिस्तान में है। यहां पर आर्चरी

6:11 ट्रेनिंग दी जाती थी। और इन दोनों ही इंस्टट्यूट में भारत में विदेशों से लोग आया करते थे। बकायदा यहां के जो स्कॉलर्स हुआ करते थे उनका एंट्रेंस एग्जाम हुआ करता था। भारत के जितने भी पड़ोसी देश हैं चाहे वह चाइना हो, जापान हो या और कोई देश हो हर जगह से यहां पर पढ़ने के लिए लोग आते थे और आज की डेट की ग्रेजुएशन समझ लो वो डिग्रियां करके जाते थे। इतना ज्ञान यहां की लाइब्रेरी में भरा हुआ था। उसके साक्ष्य आज भी हमें देखने को मिलते हैं। बुद्धिज्म और जैनिज्म के ऊपर बात कर लेते हैं। फिजिकल एजुकेशन का कनेक्शन बुद्धिज्म और जैनिज्म से भी है। सर आप बताएं कैसे? तो बुद्धिज्म और जैनिज्म ने वॉकिंग, डिसिप्लिन, मॉडरेशन, मेडिटेशन को मेन स्ट्रीम बनाया। जहां पर इंसान का

6:56 डिसिप्लिन में रहना सबसे पहले आता था। मिडिवल पीरियड में हमें जिक्र देखने को मिलता है मिट्टी का दंगल जो आज की डेट में हम अखाड़ों में देखते हैं। इसका डेवलपमेंट हो रहा था। रॉयल पोलो यानी कि चौगान का जिक्र देखने को हमें मिलता है। यह मिडवल पीरियड ही वो समय था जब गांव-गांव में अखाड़ों का जन्म हुआ और बच्चा-बच्चा अखाड़ों में प्रैक्टिस करने लगा। कुश्ती के साथ-साथ यहां पर पुश अप्स और बाकी एक्सरसाइजज़ भी की जाने लगी। ये एक तरीके से जैसे हमने जर्मनी में पढ़ा था वैसा ही भारत के जिमनेजियम्स ओपन जिमनेजियम थे। बात कर लेते हैं ब्रिटिश काल की। अंग्रेजों के राज में भारत में फिजिकल एजुकेशन का रियल में डेवलपमेंट भी हुआ। जहां पर स्कूल्स में फिजिकल एजुकेशन को कंपलसरी बनाया गया और फिजिकल एजुकेशन को

7:42 क्रिकेट, फुटबॉल, हॉकी, बैडमिंटन जैसे गेम्स के थ्रू पुश किया गया। स्पोर्ट्स कल्चर का डेवलपमेंट यहां पर और तगड़ा हुआ। पर ग्रास रूट लेवल पर कबड्डी जैसे खेलों ने स्टैमिना एजिलिटी टीमवर्क को सेलिब्रेट किया और वर्ल्ड स्टेज तक गए। अब बात कर लेते हैं उन इंस्टीटशंस की जिनमें फिजिकल एजुकेशन का जिक्र देखने को मिलता है अर्ली स्टेजेस में। बात करते हैं 1914 में बने एचवीपीएम यानी कि हनुमान व्यायाम प्रसारक मंडल की। ये एकमात्र इंस्टट्यूट था अभी तक का जो पूरे एशिया में फिजिकल एजुकेशन को लेके जा रहा था। मॉडर्न लेवल पे जो आज देख रहे हैं हम फिजिकल एजुकेशन का डेवलपमेंट उसकी जड़े यहीं से जुड़ी हैं। फ्रीडम इरा की अगर हम बात करें तो अमरावती के

8:27 एचवीपीएम में वैद्य ब्रदर्स यानी कि आपके अनंत दास वैद्य और अंबादास वैद्य ने इस इंस्टिट्यूशन की स्थापना करी। शुरुआत जो हुई थी एचवीपीएम की वो अखाड़े से हुई थी। लेकिन बाद में यह पावर हाउस ऑफ फिजिकल एजुकेशन बना। आज की डेट में भी यहां पर हजारों बच्चे हर साल ट्रेनिंग लेते हैं। 1920 में वाईएमसीए यंग मैन क्रिश्चियन एसोसिएशन जो मद्रास में बना जिसे आज की डेट में चेन्नई में गिना जाता है। तो हैरी क्रोबक ने 1920 में फिजिकल एजुकेशन का एक ऐसा हब खड़ा किया जिसे आज भी हम भारत में फिजिकल एजुकेशन के पहले इंस्टट्यूट के नाम से ही जानते हैं। हालांकि इससे पहले एचवीपीएम बन चुका था। लेकिन मॉडर्न टेक्नोलॉजीस के माध्यम से यह ज्यादा फेमस हुआ और हैरी क्रोबक को इसी कारण से हम

9:14 फादर ऑफ मॉडर्न फिजिकल एजुकेशन इन इंडिया कहते हैं या पाइनियर ऑफ फिजिकल एजुकेशन इन इंडिया कहते हैं। अभी तक ये दोनों इंस्टट्यूट बहुत बेहतरीन काम कर रहे थे। लेकिन ओलंपिक में जो वर्चस्व हमें चाहिए था वो अभी हमें मिला नहीं था। तो बात करते हैं ओलंपिक में वर्चस्व की। तो इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन जिसकी स्थापना 1927 में हुई। इसके पहले प्रेसिडेंट डॉ. दोराब जी टाटा थे। उसी के साथ-साथ में इसके जनरल सेक्रेटरी एजी नोरेन थे। भारत के ओलंपिक को एक स्ट्रक्चर दिया और 1928 के एमस्टडम ओलंपिक्स में भारत ने हॉकी में गोल्ड मेडल भी जीता। यह कहानी ऐसे ही चलती रही और भारत लगातार मेडल जीतता रहा। हॉकी में झड़ी लगा दी मेडलों की। अब बात करते हैं एक ऐसे इंस्टट्यूट की जिस इंस्टट्यूट से

10:00 मैं खुद पढ़ा हूं जिसकी स्थापना हुई थी 17 अगस्त 1957 ग्वालियर में। जी हां, बात कर रहे हैं लक्ष्मीबाई नेशनल इंस्टट्यूट ऑफ फिजिकल एजुकेशन की जिसे पहले एलसीपीई बोला जाता था। इसमें बीपीई थ्री ईयर प्रोग्राम पहले तरीके के प्रोग्राम चालू हुए। उसी के साथ-साथ पहली मास्टर डिग्री फिजिकल एजुकेशन की इसी कॉलेज में चालू हो रही थी। एलएनआईपी को आज की डेट में साउथ एशिया का सबसे बेस्ट इंस्टट्यूट बोला जाता है और नेक की तरफ से ए प्लस प्लस ग्रेड भी इसे मिला हुआ है। मिनिस्ट्री ऑफ यूथ अफेयर्स एंड स्पोर्ट्स के अंडर यह यूनिवर्सिटी आती है और उसी के साथ-साथ में कोचिंग, बीपीएड, एमपीएड बाकी न जाने कितने स्पोर्ट्स से रिलेटेड प्रोग्राम्स ये चलाती है। इसके लिए आप वेबसाइट पे विजिट कर सकते हैं। अब बात कर लेते हैं एक ऐसे इंस्टिट्यूट की

10:45 जिसकी भारत को सबसे ज्यादा जरूरत थी। क्योंकि यहां पर प्लेयर तो हो रहे थे लेकिन प्लेयर को तैयार करने के लिए कोचेस की कमी थी। कोचेस को बनाने के लिए भी तो किसी संस्थान की आवश्यकता होनी चाहिए। अब जब जरूरत पड़ी कोचेस को बनाने की तो कोचेस की फैक्ट्री यानी कि एनएसएआईएस जिसको पहले एनआईएस बोला जाता था। बाद में इसका 1973 में नाम बदल दिया गया। जी हां, हम बात कर रहे हैं नेताजी सुभाष नेशनल इंस्टट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स जिसकी स्थापना 1961 में हुई और इसने भारत की कोचिंग इंडस्ट्री को बदल के रख दिया। 7 मई 1961 में बना यह इंस्टट्यूट जिसमें कोचेस को साइंटिफिक ट्रेनिंग दी जाती थी। यहां से एक साल का डिप्लोमा करके आप सरकारी कोच बन सकते थे। और आज भी यहां से एक साल का डिप्लोमा करके आप गवर्नमेंट

11:32 कोच बन सकते हैं। भारत में बहुत सारे डेवलपमेंट चल रहे थे। खिलाड़ी भी गांव-गांव में खेलों की ओर बढ़ रहे थे। सब हो रहा था। लेकिन जो खिलाड़ी बिना साइंटिफिक अप्रोच के चलेगा वो कितना ही आगे दौड़ पाएगा या कितना ही आगे वो खेल पाएगा। तो उसके लिए जरूरत पड़ती है हमारे भारत में स्पोर्ट्स के डेवलपमेंट की और स्पोर्ट्स के डेवलपमेंट में सबसे पहले आता है स्पोर्ट्स पर्सन का डेवलपमेंट यानी कि खिलाड़ियों का डेवलपमेंट। तो कोई ऐसा तो इंस्टट्यूट होना चाहिए जहां पर खिलाड़ियों को प्रशिक्षण दिया जाए या खिलाड़ियों को सिखाया जाए साइंटिफिक टेक्नोलॉजी डाइट उसके अलावा जितनी भी चीजें खिलाड़ियों के लिए जरूरी हैं वो सारी दी जाए तो उसके लिए हमारा एक संस्थान जो कि स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया यानी कि साई बना 1984 में और

12:20 साई ने 1982 में जो एशियन गेम्स हुए थे उसके बाद ग्रास रूट से इलाइट पाथवे तैयार किया जो कि ग्रास रूट लेवल से प्लेयर्स को चुन के उन्हें तैयार करता था। और यहां पर जो कोचिंग दी जाती थी वह वर्ल्ड क्लास की कोचिंग थी। खाने की फैसिलिटी और बाकी खिलाड़ियों के रहने का सारा बंदोबस्त यहां पर था। और यही कारण है कि आज की डेट में आप अगर किसी ओलंपिक मेडलिस्ट को भी देख लें। कोई भी हो वो चाहे उसके पास में साईं की टीशर्ट जरूर मिलेगी। यह साई की टीशर्ट दर्शाती है कि अगर भारत में स्पोर्ट्स की बात आती है तो साईं हमेशा खड़ा होता है। तो साईं को एक सैल्यूट तो हमारा बनता ही है। और मैं आगे भी यह उम्मीद करता हूं साईं से कि इससे भी बेहतरीन फैसिलिटीज हमारे खिलाड़ियों के लिए वो मुहैया

13:05 कराएगी। अब उन पॉलिसीज की ओर भी नजर डाल लेते हैं जिन्होंने भारत के खेल को बदल के रख दिया। सबसे पहली पॉलिसी 1984 नेशनल स्पोर्ट्स पॉलिसी उसके बाद 2001 में भी पॉलिसी आई जिसमें मास लेवल पे पार्टिसिपेशन और इलाइट एक्सीलेंस पे साथ ही साथ फिजिकल एजुकेशन पे ध्यान दिया गया। 1959 में एनपीईडी यानी कि नेशनल फिजिकल एफिशिएंसी ड्राइव जिसने ग्रेडेड फिटनेस बैटरी अक्रॉस स्कूल और कॉलेजेस में स्टार्ट किया। हम यूं कह सकते हैं नेशनल लेवल पर फिटनेस का असेसमेंट हो रहा था। बात कर लेते हैं सितंबर 2014 की जब टॉप्स यानी कि टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम आया जहां पर कुछ गेम्स को स्पेशल फंडिंग फॉरेन ट्रेनिंग और स्पोर्ट साइंस सपोर्ट मिला

13:51 जिसने हमारे भारत के खेलों को ओलंपिक में पदक दिलाया। उसके बाद बात कर लेते हैं खेलो इंडिया की। जी हां, खेलो इंडिया ने ग्रास रूट लेवल पर जितने खिलाड़ी थे उनका टैलेंट आइडेंटिफिकेशन करके उन्हें कंपटीशंस में और उन्हें अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर दिलाया ताकि खेलो इंडिया के थ्रू भारत के खिलाड़ी डेवलप हो सके और आज हमें खेलो इंडिया के थ्रू नेशनल लेवल पर मेडलिस्ट भी देखने को मिल रहे हैं। अब जिक्र कर लेते हैं फिट इंडिया मूवमेंट की। 2019 में नेशनल लेवल पे फिट इंडिया मूवमेंट चालू किया गया। जिसका एक नारा भी दिया गया फिटनेस का डोज आधा घंटा रोज। अब बात कर लेते हैं एनईपी। एनईपी का हम किसी खास वीडियो में भी जिक्र करेंगे। लेकिन एनईपी 2020 की अगर हम बात करें जिसे नेशनल एजुकेशन पॉलिसी बोला जाता है। इसमें

14:37 स्पोर्ट्स को एक अलग ही तवज्जो दी गई है। तीसरी क्लास से यानी कि थर्ड क्लास से ही फिजिकल एजुकेशन केवीएस के सिलेबस में ऐड किया गया है। फिजिकल एजुकेशन को एक कंपलसरी सब्जेक्ट की तरह ऐड किया गया है ना कि चॉइस सब्जेक्ट की तरह। तो फिजिकल एजुकेशन का यहां पर बहुत ही बेहतरीन डेवलपमेंट देखने को मिलता है क्योंकि सबको पता है फिजिकल एजुकेशन खाली पढ़ना नहीं है। फिजिकल एजुकेशन एक होलसम डेवलपमेंट है। अब बात कर लेते हैं 2025 की। खेलो भारत नीति जो सबसे लेटेस्ट है। भारत नीति के अंब्रेला में गवर्नेंस प्लस स्पोर्ट्स साइंस और ग्रास रूट टू एलाइट पाइपलाइन तैयार कर रही है जो कि हमें टारगेट करेंगी सीधा ओलंपिक्स के लिए। तो दोस्तों देखा आपने फिजिकल एजुकेशन क्यों जरूरी है?

15:24 भीमबेडका की दीवारों से लेके आपके क्लासरूम तक फिजिकल एजुकेशन ने इंडिया को एंडोरेंस डिसिप्लिन टीम वर्क सिखाया है। अखाड़ों की मिट्टी से उठे चैंपियंस और गुरुकुल की तपस्या से आया योगा। पोलोनियन क्लब्स ने रूल्स दिए और हमारी ग्रास रूट ने रूह दी। और जो आज ये पॉलिसीज चल रही हैं वो हर बच्चे का खेल का अधिकार और हर एथलीट को प्लेटफार्म देने की कोशिश है। यानी कि हर पुश अप एक प्रॉमिस है और हर मैच एक नया चैप्टर यानी कि नया अध्याय है। तो दोस्तों अब आपकी बारी है। अगर आप फिजिकल एजुकेशन स्टूडेंट हो तो अपनी थ्योरी को ग्राउंड पे उतारो। अपने डिसिप्लिन को मेंटेन करो। अगर आप फिजिकल एजुकेशन टीचर हैं तो बच्चे को पुश दो। वह जिंदगी भर का मोमेंटम बन सकता है। और अगर

16:10 आप कोच हैं तो कोचेस से मेरी रिक्वेस्ट है साइंटिफिक ट्रेनिंग्स पे और ज्यादा ध्यान दो। रिसर्चेस पढ़ो और रील्स को ऑप्टिमाइज करो। और पेरेंट्स से मेरी हाथ जोड़ के रिक्वेस्ट है कि आप अपने बच्चों को खेलों को सिर्फ एक्स्ट्रा मत समझो। खेलों को एसेंशियल बनाओ। जब तक आप अपने बच्चों को पुश नहीं करेंगे और खेल को लाइफ का एक हिस्सा नहीं बताएंगे तब तक वो अपना 100% नहीं देंगे और भारत को मेडल कहां से मिलेंगे फिर क्योंकि जब एक बच्चा खेल खेलता है तो वो खाली खेल ही नहीं खेल रहा होता है। वो डेवलप कर रहा होता है अपना फ्यूचर थ्रू मेंटली फिजिकली एंड सोशल डेवलपमेंट। तो बाकी जितना भी एडमिनिस्ट्रेटिव स्टाफ फिजिकल एजुकेशन में लगा हुआ है चाहे वो स्कूल लेवल पे हो, कॉलेज लेवल पे हो या यूनिवर्सिटी लेवल पे

16:57 हो या मिनिस्ट्री लेवल पे हो। उनसे भी मेरी गुजारिश है कि आप पॉलिसीज को इसी तरीके से लागू करते रहें और पुश देते रहें ताकि फिजिकल एजुकेशन का डेवलपमेंट बना रहे और पॉलिसी लागू करने के बाद एक निगरानी जरूर रखें कि वह सही काम कर रही है या नहीं। बहुत सारे स्टेडियम्स इंडिया में ऐसे भी हैं जहां पर घुटनों तक घास है वहां खेलने की व्यवस्था नहीं। तो ऐसी चीजों पे भी ध्यान दिया जाए। तो दोस्तों इंडिया की फिजिकल एजुकेशन की कहानी अब रुकेगी नहीं क्योंकि आप और हम सब मिलके बनाएंगे भारत के फिजिकल एजुकेशन को वर्ल्ड में नंबर वन और उसके लिए आप लोगों को क्या करना होगा? अपने विचारों को कमेंट बॉक्स में लिखना होगा। वीडियो अच्छी लगी हो तो उसे लाइक करना होगा। बाकी हम लोग इसी तरीके से मिलते रहेंगे। अंटिल वी मीट स्टे फिट एंड

17:44 स्टे हेल्दी। जय हिंद, जय भारत, फिजिकल एजुकेशन, जिंदाबाद।

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