Insight: हर घर स्वदेशी, घर घर स्वदेशी। PM Modi’s Swadeshi Push | 23 September, 2025

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संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो "गर्व से कहो यह स्वदेशी है" नारे के महत्व पर प्रकाश डालता है, जो आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक राष्ट्रीय आंदोलन है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पहल को स्वतंत्रता संग्राम के समान महत्वपूर्ण बताया है, जो भारत की अर्थव्यवस्था, समाज और वैश्विक पहचान को मजबूत करेगा। वीडियो में स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने, एमएसएमई को सशक्त बनाने, और भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के तरीकों पर चर्चा की गई है।

  • स्वदेशी को केवल आयात प्रतिस्थापन नहीं, बल्कि एक भावना के रूप में अपनाने पर जोर दिया गया है।
  • आत्मनिर्भरता के लिए घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने और निर्यात को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।
  • शिक्षा, कौशल विकास, और अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) को स्वदेशी विज़न के साथ जोड़ने पर बल दिया गया है।

परिचय

अमृता चौरसिया ने नवरात्रि के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के "गर्व से कहो यह स्वदेशी है" नारे के साथ कार्यक्रम की शुरुआत की। यह नारा आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक राष्ट्रीय आंदोलन का प्रतीक है, जिसका उद्देश्य भारत की अर्थव्यवस्था, समाज और वैश्विक पहचान को मजबूत करना है। जीएसटी सुधारों के साथ, एमएसएमई और उद्योग जगत से मेड इन इंडिया को वैश्विक ब्रांड बनाने की अपील की गई है।

स्वदेशी: एक भावना

संपद तोशनीवाल ने कहा कि प्रधानमंत्री का यह आह्वान जीएसटी सुधारों के साथ सही समय पर आया है, जिससे उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति बढ़ेगी। स्वदेशी का अर्थ केवल आयात नहीं करना नहीं है, बल्कि अपनी आवश्यकताओं के अनुसार तकनीक और कच्चे माल का आयात करते हुए अधिकतम उत्पादों को देश में बनाना और निर्यात करना है। यह एक भावना है जो प्रत्येक देशवासी के मन में होनी चाहिए।

उभरता हुआ भारत

विनोद शर्मा ने कहा कि भारत के पास सबसे बड़ा बाजार है, और इसे ठीक से उपयोग करना महत्वपूर्ण है। जापान ने भी विश्व युद्ध के बाद "मेड इन जापान" का नारा अपनाया और अपने उत्पादों पर विश्वास दिखाया। भारत को भी स्वदेशी उत्पादों को खरीदकर अपने व्यवसायियों को आत्मविश्वास देना चाहिए और उन्हें स्केल अप करने की क्षमता प्रदान करनी चाहिए।

आत्मनिर्भर भारत की लड़ाई

प्रोफेसर बीपी शर्मा ने कहा कि भारत को समृद्ध और महान बनाने के लिए स्वदेशी को अपनाना होगा, और "मेड इन इंडिया" से आगे बढ़कर "मेड बाय इंडिया" उत्पादों और ब्रांड्स पर ध्यान देना होगा। उन्होंने आर्थिक राष्ट्र निष्ठा पर जोर दिया, जैसे जापान में 85% कारें मेड बाय जापान बिकती हैं। भारत में विदेशी ब्रांड्स का प्रभुत्व कम करने के लिए स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देना चाहिए।

उत्पादकता परिषद का योगदान

तोवाल जी ने कहा कि चीन के साथ व्यापार घाटा कम नहीं हो रहा है क्योंकि उपभोक्ता गुणवत्तापूर्ण और सस्ती वस्तुएं खरीदते हैं। एमएसएमई को ऐसी वस्तुएं बनाने में सक्षम बनाने के लिए सरकार को नीतियां बनानी चाहिए जो शोध और विकास को बढ़ावा दें और उत्पादों की गुणवत्ता और लागत को कम करें। सीएसआईआर जैसी संस्थाएं इंपोर्ट सब्स्टिट्यूट के रूप में विकसित की जा सकने वाली चीजों की सूची बनाकर छोटे उद्यमियों को सहायता प्रदान कर सकती हैं।

इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में आत्मनिर्भरता

विनोद शर्मा ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक्स में भारत ने काफी प्रगति की है, लेकिन अभी भी इंपोर्ट डिपेंडेंसी है। उन्होंने एक 4 * 400 मीटर रिले रेस के रूप में इस प्रक्रिया का वर्णन किया, जिसमें पहला भाग असेंबली था, दूसरा सेमीकंडक्टर और कंपोनेंट्स का निर्माण, तीसरा डिजाइन, और चौथा भारतीय ब्रांड्स का विकास। उन्होंने स्वदेशी उत्पादों की पहचान के लिए एक रेटिंग सिस्टम की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

शिक्षा और कौशल विकास

प्रोफेसर बीपी शर्मा ने कहा कि शिक्षा और कौशल विकास संस्थानों को स्वदेशी विज़न से जोड़ा जाना चाहिए ताकि युवा जॉब सीकर नहीं बल्कि जॉब क्रिएटर बनें। उन्होंने तकनीकी राष्ट्रवाद का भाव लेकर आईआईटी और अन्य तकनीकी संस्थानों को उन उत्पादों और कंपोनेंट्स को विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करने की बात कही जिन पर भारत विदेशी निर्भर है। उन्होंने एंटी डंपिंग ड्यूटी का उपयोग करने और टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट को बढ़ावा देने की भी बात कही।

दिल्ली उत्पादकता परिषद का अनुभव

तोशनीवाल जी ने कहा कि जीएसटी में सुधार एक बड़ी पहल है जो भारत की जीडीपी को बढ़ाएगी। उन्होंने श्रम और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया, जिसमें छोटे उद्यमियों के लिए अलग लेबर लॉ और स्किल डेवलपमेंट शामिल हैं। उन्होंने स्किल डेवलपमेंट के क्षेत्र में अधिक काम करने की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला।

निष्कर्ष

आत्मनिर्भरता, गुणवत्ता और वैश्विक नेतृत्व की सोच भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाएगी और विश्व गुरु की दिशा में ले जाएगी।

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Transcript

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0:01 [संगीत] नमस्कार स्वागत है आपका। आप देख रहे हैं इनसाइट और मैं हूं आपके साथ अमृता चौरसिया। नवरात्रि के शुभ अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को एक नया संकल्प दिया है। गर्व से कहें यह स्वदेशी है। यह केवल एक नारा नहीं बल्कि आत्मनिर्भर भारत की दिशा में राष्ट्रीय जन आंदोलन का बिगुल है। प्रधानमंत्री ने जोर दिया कि जैसे स्वदेशी ने स्वतंत्रता संग्राम को मजबूती दी वैसे ही आज यह भारत की अर्थव्यवस्था, समाज और वैश्विक पहचान

0:46 का आधार बनेगा। जीएसटी सुधारों के साथ ही उन्होंने एमएसएमई और उद्योग जगत से अपील की है कि वे मेड इन इंडिया को सिर्फ घरेलू पहचान नहीं बल्कि वैश्विक ब्रांड बनाएं। आज चर्चा करेंगे यह स्वदेशी पुष्प भारत की अर्थव्यवस्था को कैसे एक नई ऊंचाई देगा? समाज में आत्मगौरव की भावना कैसे पैदा करेगा? और विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को कैसे तेजी से आगे बढ़ाएगा? सवाल है कि क्या मेक इन इंडिया से आगे बढ़कर अब प्राउडली मेड इन इंडिया का दौर शुरू हो रहा है? [संगीत]

1:33 और इसी पर चर्चा करने के लिए मेरे साथ खास मेहमान जुड़े हैं। मेरे साथ श्री विनोद शर्मा जी हैं। आप एमडी हैं डीके इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड चेयरमैन सीआईआई नेशनल इलेक्ट्रॉनिक्स कमेटी। सर बहुत स्वागत है आपका। आप हमारे साथ ऑनलाइन जुड़ रहे हैं। साथ ही मेरे साथ श्री संपद तोशनीवाल जी हैं। आप अध्यक्ष हैं। दिल्ली उत्पादकता परिषद। आपका बहुत स्वागत है। इस स्टूडियो में आपकी मौजूदगी है। साथ ही ऑनलाइन हमारे साथ जुड़े हैं प्रोफेसर बीपी शर्मा। पूर्व कुलपति हैं गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी। साथ ही आप चेयरमैन रहे हैं यूनेस्को एमजीआईपी। स्वागत है आपका संसद टीवी में। और चर्चा की शुरुआत सबसे पहले तोवाल जी मैं आपसे कर लेना चाहती हूं कि जब प्रधानमंत्री यह कहते हैं कि गर्व से कहो

2:18 यह स्वदेशी है तो यह जो नारा है वो किस तरीके से मेक इन इंडिया से कहीं आगे बढ़कर अब मेड इन इंडिया और जो भारत की आत्मनिर्भरता है जो भारत पूरे विश्व में खुद को एक सेल्फ रिलायंट देश के रूप में एस्टैब्लिश कर रहा है और जिस विज़न के साथ आगे बढ़ रहा है विकसित भारत 247 उसमें कितना बड़ा बड़ा यह मील का पत्थर साबित होगा। देखिए प्रधानमंत्री जी ने यह आह्वान ऐसे समय किया है जब जीएसटी टू जीएसटी दो का जो इतना बड़ा परिवर्तन उन्होंने किया है हम सब जानते हैं कि जीएसटी का सबसे अधिक जो जीएसटी का अंतिम भार जो है वो उपभोक्ता पर पड़ता है। बिल्कुल

3:04 सरकार ने जो छूटें दी है दरों में सरकार ने यह बताया है कि ₹48,000 करोड़ प्रतिवर्ष इससे हमारे राजस्व में कमी होगी। ये पैसा सीधे-सीधे उपभोक्ता के हाथ में जाएगा और उपभोक्ता के पास में खर्च करने की राशि ज्यादा होगी। जी तो निश्चित रूप से वो इसको खर्च करेगा। ऐसे समय में पावर बढ़ेगी। हां। उसकी परचेजिंग पावर बढ़ेगी। ऐसे समय में वो क्या खरीदे? उसके खरीदने की दृष्टि क्या होनी चाहिए? सोच क्या होनी चाहिए? तो मैं समझता हूं प्रधानमंत्री जी ने जीएसटी टू की जो इतनी बड़ी पहल है इसको स्वदेशी के साथ में कंबाइन करने की कोशिश की है जो आज की आवश्यकता है। तो ये बहुत बड़ी बात है और

3:49 स्वदेशी का अर्थ जो है मात्र इतना नहीं कि हम बाहर से कुछ आयात नहीं करें। ऐसा नहीं है। हम अपनी आवश्यकता के अनुसार तकनीक, कैपिटल गुड्स, रॉ मटेरियल जरूर मंगाए। जी। लेकिन हमारे अधिकतम जो उत्पाद हैं वो देश में बने हो हम और हम उनको बाहर निर्यात भी करें। इस ये भावना स्वदेशी कोई नारा नहीं है। हम ये एक भावना है जो प्रत्येक देशवासी के मन में होनी चाहिए। जी। तो मैं समझता हूं कि प्रधानमंत्री जी ने इस अवसर पर ये जो बात कही है देशवासियों को ये बहुत ही एक प्रासंगिक और सही समय पर उन्होंने आह्वान किया है। जी बिल्कुल विनोद शर्मा जी एक बहुत ही

4:35 सुंदर बात कही तोषीवाल जी ने कि स्वदेशी सिर्फ एक नारा नहीं ये एक भावना है। यह एक वो स्पिरिट है जो इंडिया को बहुत मजबूत आधार प्रदान करती है। जब प्रधानमंत्री गर्व से कहते हैं कि गर्व से कहो यह स्वदेशी है और इस विज़न के साथ जब हम आगे बढ़ रहे हैं। आपको कैसे उभरते हुए भारत की तस्वीर दिखाई देती है क्योंकि आप देख रहे हैं जीएसटी रिफॉर्म्स के बाद अगर हम कह रहे हैं कि हमारे लोगों की परचेसिंग जो पावर है जो उनकी कैपेसिटी है वो बढ़ रही है। स्वाभाविक सी बात है प्रोडक्शन बढ़ेगा और जिस तरीके की जिओपॉलिटिकल सिचुएशन है टेरिफ वॉर के बीच में भारत की यह आत्मनिर्भरता किस तरीके से आप इसे मील का पत्थर या एक बहुत बड़ा चेंज मानते हैं

5:20 अमृता जी हमारे पास अगर मैं देखूं भारत के पास सबसे बड़ी चीज क्या है वो हमारा मार्केट है जी 140 करोड़ लोग जो कुछ ना कुछ खरीदना चाहते हैं और आप देखेंगे कि अभी ट्रंप साहब हमने जो टेरिफ की लड़ाई शुरू की वो भी इस मुद्दे पे की कि उनका एक बहुत बड़ा मार्केट है। वो सबसे बड़े कंज्यूमर है और उस बात को वो लेवरेज करते हुए पूरी दुनिया को आज एक तरह से नेगोशिएट कर रहे हैं उनके साथ कि हमारा उनके साथ व्यवसाय किस तरह से होना चाहिए। सो अगर हम पहली बात अपने ही मार्केट को ठीक से लेवरेज नहीं करेंगे। इसको एक जहां से भी हमको सबसे सस्ता मिले चाहे वो हमारे नॉर्दर्न लेबर्स हैं और सारा उन्हीं से माल लेते रहे एक बहुत बड़ा उनसे डेफिसिट कर ले के साथ ट्रेड डेफिसिट

6:07 और उसी ट्रेड डेफिसिट के सहारे वो देश उस ट्रेड डेफिसिट का जो हर मंथली गैप है उसी से कई वेपन्स खरीद के हम हमारे अगेंस्ट ही वेपनाइज करें उसको। तो ये मेरे ख्याल से कोई बहुत अच्छी लॉन्ग टर्म स्ट्रेटजी या प्लान नहीं है। तो पहली बात तो प्रधानमंत्री जी ने आहान किया है। यह मैं उसको उस रूप से देखता हूं। दूसरा अगर आप देखेंगे विश्व युद्ध दूसरे वाले के बाद जापान ने जब एक तरह से एक नारा लिया मेड इन जापान का ऐसा नहीं था कि उनका कोई मार्केट बहुत बड़ा था और ऐसा भी नहीं था कि उनकी क्वालिटी कोई बहुत अच्छी थी। हम लेकिन जापान को जापानियों ने बनाया। सबसे पहले वहां के नागरिकों ने उस पर विश्वास दिखाया उनके प्रोडक्ट्स पर और ये एक एक

6:53 तरह से एक उन्होंने एक संकल्प लिया कि हम सबसे पहले जापान के ही आइटम्स को इस्तेमाल करेंगे। जी आज मेरे ख्याल से हिंदुस्तान के सामने भी एक ऐसा ही एक ऐसी ही परिस्थिति है जब हमको ये अपने आप को पहले सिद्ध करना है कि जहां तक हो सके हम स्वदेशी खरीदें और इससे ना केवल हमारे व्यवसाय व्यापारियों को एक बहुत बड़ा कॉन्फिडेंस मिलेगा उनको एक स्केल अप करने की एबिलिटी मिलेगी। बिल्कुल इस समय से कुछ लोग जो हमारे बहुत बड़े निर्यातक थे जैसे हमने देखा अमेरिका में उनको इस समय काफी टेरिफ्स की वजह से परेशानी हुई। क्या हम उनको वो अल्टरनेटिव मार्केट हिंदुस्तान में दे सकते हैं ताकि वो इमीडिएटली उनको कुछ जो वहां पर डेफिसिट हुआ है वो यहां पर पूरा हो पाए और इसका तीसरा पहलू ये है कि क्योंकि जब हम अपने

7:39 आप को एक स्केल अप करते हैं और हिंदुस्तान के लिए जो चीजें चाहिए बहुत कई बार हमको एक कस्टमाइज न्यूस्ड रिक्वायरमेंट्स होती है हमारी हिंदुस्तानी होने के। ये केवल हिंदुस्तान का नहीं है बट अगर 7 बिलियन लोगों की पपुलेशन है इस दुनिया में। उनमें से करीब 5 मिलियन लोग ऐसे हैं जैसे हम हिंदुस्तानी है। उनकी जरूरत हमारी जैसी है। उसी यू नो उनका जो इनकम है वो उसी लगभग है। तो हम जो भी हिंदुस्तान में बना सकेंगे एक अच्छी क्वालिटी एक फ्रूगल इंजीनियरिंग से एक अच्छे अच्छी क्वालिटी का लेकिन अच्छे दामों पर जो चीज बना पाएंगे वो केवल एक हिंदुस्तान मार्केट नहीं है बट कम से कम 5 बिलियन लोगों का मार्केट है। मेरे ख्याल से ये बहुत बड़ा अवसर है हमारे लिए कि पहले हम हिंदुस्तान में अपने लिए बनाएं और फिर उन देशों को भी निर्यात कर सकें। जी बिल्कुल आपके पास लौटेंगे प्रोफेसर बीपी

8:26 शर्मा जी जब प्रधानमंत्री कहते हैं कि स्वदेशी ने आजादी की लड़ाई में एक मजबूती दी थी। बहुत बड़ा योगदान दिया था और आज यह आत्मनिर्भर भारत की लड़ाई को कैसे बूस्ट कर रहा है। कैसे उसमें अपना योगदान दे रहा है? इस दृष्टिकोण को मैं आपसे समझना चाहूंगी। देखिए भारत को अगर समृद्ध और महान देश बनाना है तो हमें स्वदेशी को अपनाना होगा और स्वदेशी में एक स्टेप और आगे जाने की बात करता हूं। मेड इन इंडिया से काम नहीं चलेगा। मेड बाय इंडिया प्रोडक्ट्स एंड ब्रांड्स पर हमको जाना होगा। मैं छोटा सा उदाहरण लेता हूं। अगर हम वर्ल्ड पूल का रेफ्रिजरेटर जो अमेरिकन कंपनी का है उसका खरीदते हैं तो उसका रेफ्रिजरेट उसकी मिनी कंप्रेसर अमेरिका से आता है। अगेन हमारा ट्रेड डेफिसिट होता है। और अगर हम कोई भी

9:11 इंडियन ब्रांड लेते हैं, ब्लू स्टार लेते हैं, vol्टs लेते हैं, लॉयड लेते हैं तो उसका ज्यादातर वैल्यू एडिशन देश में होता है तो एंप्लॉयमेंट जनरेशन, वैल्यू एडिशन और टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट ये सारा अपने देश का होता है। और जैसा अभी मेरे पूर्व वक्ता ने भी कहा था जापान का उदाहरण लिया था। अब देखिए जापान का वर्ल्ड पपुलेशन में केवल 1.7% कंट्रीब्यूशन है। लेकिन वर्ल्ड मैन्युफैक्चरिंग में उनका कंट्रीब्यूशन 7% है। वो इसलिए कि जापान में इकोनॉमिक पेटिज्म यानी कि आर्थिक राष्ट्र निष्ठा इतनी ज्यादा है कि जापान में 85% कारें मेड बाय जापान बिकती है। जबकि हमारे यहां 22% कारें मेड बाय इंडिया Tata Mahindra की बिकती है। बाकी सारी फॉरेन ब्रांड्स हैं। तो मेरा यहां स्वदेशी से आशय यह होगा हम मेड बाय इंडिया प्रोडक्ट्स और ब्रांड्स को प्रमोट करें और जिससे उसका ज्यादातर

9:58 डाउनस्ट्रीम वैल्यू चेन ऑफ़ ओरिजिनल इक्विपमेंट्स भी हमारे देश में बनेंगे और स्वदेशी आज अगर आज हम देखें तो चाहे टीवी फ्रिज ले लीजिए चाहे वो कार्स ले लीजिए चाहे वो स्कूटर मोटरसाइकिल्स ले लीजिए चाहे वो दूसरे प्रोडक्ट्स में ले लीजिए चाहे तो उनमें आज टू थर्ड मार्केट शेयर फॉरेन ब्रांड्स का है। मुझे लगता है अगर हमने यह स्वदेशी मेड बाय इंडिया प्रोडक्ट्स को अगर हुआ तो ये टू थर्ड जो फॉरेन ब्रांड्स का डोमिनेंस है वो भी कम होगा और एक सबसे बड़ा खतरा अभी ट्रेड डेफिसिट की बात तो की है। कोई देश का ना तो इकोनमिक पेपर्स ये बात करते हैं ना और कोई संस्थान करता है। हमारा इन्वेस्टमेंट इनकम डेफिसिट बहुत बढ़ रहा है। यानी कि पिछले 2000 से हमने मोर देन $1 ट्रिलियन डॉलर का जो एफडीआई यहां

10:43 इनवाइट किया फॉरेन मैन्युफैक्चरर्स को जो इनवाइट किया उससे उनके द्वारा प्रॉफिट देश से बाहर ले जाते हैं। इसलिए इस साल 83 बिलियन डॉलर के एफडीआई में नेट एफडीआई लेस देन $1 बिलियन डॉलर का था। 40 टू 50 बिलियन मल्टीीनेशनल कंपनियों में प्रॉफिट्स बाहर ले गए। तो मुझे लगता है रुपए का भी उस दबाव आता है। तो मेरा मानना यह है कि स्वदेशी का आशय मेड बाय इंडिया प्रोडक्ट्स एंड ब्रांड्स होना चाहिए और देश के अगर सभी लोग जैसे जापान में चाहे जापान में मोटा घटिया राइस जापानी राइस है। कैलिफोर्नियन राइस लंबा लॉन्ग ड्रेन फाइन एरोमेटिक राइस जापानी नागरिक कोई नहीं खरीदता। आधी कीमत में अवेलेबल है। तो हमें कहीं-कहीं मेड बाय इंडिया प्रोडक्ट को हम करेंगे तो हमारे यहां मैन्युफैक्चरिंग आज वर्ल्ड मैन्युफैक्चरिंग में हमारा कंट्रीब्यूशन

11:29 लेस देन 3% है। चाइना का 32% है। हम उसको उसको एनहांस करना है तो निश्चित रूप से हमें मेड बाय इंडिया प्रोडक्ट्स और ब्रांड्स को प्रमोट करना है। बिल्कुल बिल्कुल। तोवाल जी प्रधानमंत्री जब ये कहते हैं कि हर दुकान को स्वदेशी उत्पाद से सजाना होगा। यहां मैं समझना चाहूंगी कि उत्पादकता परिषद के स्तर पर यह कैसे संभव है और हम एमएसएमई की बात करें जो कि हमारी अर्थव्यवस्था की रीड माने जाते हैं तो उनकी कंपटेंसी या उनके प्रोडक्शन को और एनहांस करना उनको और सपोर्ट करना इसे हम किस तरीके से और बूस्ट कर सकते हैं? कि आपका सवाल बहुत महत्वपूर्ण है। एक बात समझिए पिछले कई सालों से कोशिश करने के बावजूद भी चीन के साथ हमारा व्यापार घाटा कम नहीं हो रहा

12:15 है। जी बिल्कुल बल्कि बढ़ ही रहा है। बढ़ रहा है। कारण क्या है? उपभोक्ता या व्यवसाई इन दोनों की एक मानसिकता होती है। यह वह वस्तु खरीदेगा जो उसे अधिक गुणवत्तापूर्ण हो और सस्ती भी हो। मिले। हम आज दिक्कत ये है बहुत सारी ऐसी वस्तुएं हैं जो हम आयात करते हैं। वो देश में बन सकती है। हम क्यों नहीं बन रही? बनाने का काम एमएसएमई का है। छोटे उद्योगों का है। इसलिए नहीं बन रही शायद कि या तो उसकी वो क्वालिटी नहीं बन पा रही है या अगर बनती है तो वह अपेक्षाकृत सस्ती नहीं पड़ती, महंगी पड़ रही है। यहां पर दो लोगों की भूमिका बनती है। एक उद्योग की और दूसरी सरकार की। हम

13:00 हमारे देश में छोटे उद्यमियों का माइक्रो और बल्कि नैनो इनका एक बहुत बड़ा जितना बड़ा तंत्र हमारे देश में है उतना दुनिया के किसी देश में नहीं है। गांव-गांव में करोड़ों उद्यमी उत्पाद बनाते हैं। उनकी कठिनाई यह है कि वो शोध और विकास रिसर्च और डेवलपमेंट वो नहीं कर सकते। वो इतने इक्विप्ड और इतने समर्थ नहीं है। यहां सरकार की भूमिका आती है। बना सकते हैं वो कि सरकार ऐसी नीतियां बनाए। उन कारणों का पता करें कि हमारे जो माइक्रो उद्यमी हैं वो शोध और विकास क्यों नहीं कर पाते ताकि वो वो चीजें जो आज हम देश में बना सकते हैं लेकिन नहीं बना पा रहे हैं।

13:46 हम वो कैसे सस्ती हो और उनकी कैसे क्वालिटी इंप्रूव हो। अगर इस पर हम ध्यान दें तो अपने आप जो है आप लैकिंग जो है वो रिसर्च एंड डेवलपमेंट की बता रहे हैं। कहीं ना कहीं इस स्तर पे काम हो तो वो प्रोडक्टिविटी जो है या जो हमारी लागत कॉस्ट आती है जो हमारी वो उसकी वजह से भी प्रोडक्ट्स महंगे होते हैं। उसे कैसे कम किया जा सकता है? देखिए मैं फिर आपको बताता हूं कि बहुत सी ऐसी वस्तुओं की लंबी सूची है जो हमारे देश में बन सकती है। हम लेकिन हम नहीं बनाते। हमारे उद्यमी में नहीं बनाते क्योंकि वह या तो उसकी वह क्वालिटी नहीं आती या उसकी वह प्राइस जो है मैच नहीं करती। उसको करने के लिए हमें रिसर्च और डेवलपमेंट उसको बढ़ावा दें। मैं मेरा एक सुझाव मैं आपको बताता हूं। आज देश में सीएसआईआर जैसी इतनी बड़ी लैब है

14:33 जिसकी पूरी देश में कई लैब्स हैं। जी। अगर वो एक बात का ध्यान दे कि ऐसी चीजें जो देश में बन सकती है और इंपोर्ट सब्स्टट्यूट के रूप में डेवलप करनी है। इन चीजों की सूची बना करके वो ये देखे कि कहां कमी है और वो रिसर्च और डेवलपमेंट करके और बहुत ही कम कीमत पर छोटे उद्यमियों को दे कि आप ये चीजें बनाइए हम आपको ये सुधार करना पड़ेगा तो ये चीज भी अच्छी बनेगी। इंपोर्ट सब्स्टिट्यूट बनेगा और रेट भी घटेगी। उसकी लागत घटेगी। तो वो काम हो जाएगा। तब जाकर के हम आसानी से चीन के साथ व्यापार घाटा कम कर पाएंगे। स्वदेशी की भावना है। हम लेकिन मैंने आपसे कहा कि व्यवसाय और उपभोक्ता उनकी एक स्वाभाविक मानसिकता भी है। हमें इन दोनों चीजों को मैच करना पड़ेगा। बिल्कुल बहुत ही अच्छा सुझाव था आपका और

15:21 विनोद शर्मा जी मैं आपका रुख करूंगी। प्रधानमंत्री जब यह कहते हैं कि गर्व से कहीं स्वदेशी है। इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में जो इंपोर्ट डिपेंडेंसी है उससे निकलने के लिए हमें कौन-कौन से तत्काल कदम उठाने होंगे? इसे लेकर आपका क्या मानना है? जी इलेक्ट्रॉनिक्स में एक्चुअली हमने काफी डिस्टेंस तय किया। एक जमाना था जब सरकार ने भी और उद्यमियों ने भी मैन्युफैक्चरिंग को छोड़कर आपको याद होगा पहले हम अपनी टीवी ऑडियो सिस्टम यही बनते थे। आज से 30 साल पहले फिर हमने एक आईटीए वन डब्ल्यूटीओ में एक एग्रीमेंट साइन किया जिससे ये कई आइटम्स जीरो ड्यूटी पर आ गए। इसका मतलब 2005 से मेरी अपनी कंपनी कैपेसिटिस बनाती है। फॉर एग्जांपल वो 2005 से आज तक पिछले 20 साल मैं एक भी

16:07 कैपेसिटर अगर बेचता हूं तो मुझे चीन के साथ उसको बेंचम पार्क करना पड़ता है प्राइस पर और जापान के साथ बेंचमार्क करना पड़ता है क्वालिटी पर। तो ये बहुत कम कंपनीज़ कर पाई। अब लेकिन जो उस उस समय एक ऐसा माहौल हो गया था कि ये विश्वास ही नहीं रहा था कि हिंदुस्तान में हम इलेक्ट्रॉनिक हार्डवेयर बना पाएंगे और कई सरकार में भी कई प्रतिनिधियों ने हमसे कहा कि आप लोग हार्डवेयर छोड़ दीजिए आप सॉफ्टवेयर पे फोकस कीजिए लेकिन मुझे बड़ी खुशी है कि इस सरकार ने समझा कि इलेक्ट्रॉनिक्स के बिना हमारा गुजारा नहीं है। हमको खुद बनाना पड़ेगा और खुद डिजाइन भी अपना करना पड़ेगा और इस पर पहल शुरू हुई। तो मैं इसको सारांश में अगर कहूं तो ये एक 4 * 400 मीटर रिले रेस की तरह है। जी इसका जो पहला पार्ट है पहला भाग जो था पहले 400 मीटर वो असेंबली था। हमने सेलफोन

16:52 की असेंबली पर पहले एक 20% रिपोर्ट ड्यूटी लगाई एक तरफ से और दूसरी तरफ से एक लगभग 5% औसत का पीएलआई दिया। इस प्रोत्साहन और दूसरी तरफ से एक एक ड्यूटी की वजह से यह हुआ कि आज हम लगभग सारे फोन जो हम इस्तेमाल करते हैं हिंदुस्तान में यही असेंबल करते हैं और इसके एक बहुत बड़े निर्यातक भी बन गए हैं। ये पहला फ था ये लेकिन अकेला काफी नहीं है। अब जो दूसरा फ आ गया है वो है कि इसमें जो सेमीकंडक्टर मैकेनिकल्स डिस्प्ले और जो बाकी कॉम्पोनेंट्स है इलेक्ट्रॉनिक कॉम्पोनेंट्स जो बनते हैं क्या वो हम हिंदुस्तान में बना सकते हैं? खुशी की बात यह है कि प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में एक अब सेमीकंडक्टर पॉलिसी बहुत सक्षम रही है। आपने देखा कि कई सेमीकंडक्टर कंपनीज हिंदुस्तान में ऑलरेडी आ गई है और सिर्फ टू जो सेकंड पार्ट आने वाला है उससे हमें

17:39 उम्मीद है कि और भी कुछ कंपनीज़ इसमें भाग लेंगी। इसी के साथ एक इलेक्ट्रॉनिक कॉम्पोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम बनी जिसमें हम जैसी कंपनीज पार्टिसिपेट कर रही है और जितना इंडिपेंडेंस से आज तक हमने निवेश किया है पूरे इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्चरिंग कंपोनेंट्स में उससे पांच गुना ज्यादा निवेश होने वाला है अगले पांच साल में इन दो स्कीम्स की वजह से जो कि बहुत खुशी की बात है। इसमें तीसरा जो सपना है वो ये होगा कि हम अपना डिजाइन शुरू करें और चौथा ये है कि हमारी हिंदुस्तानी कंपनीज की जो ब्रांड है वो ना केवल हिंदुस्तान में पर दुनिया में जापान का अपना Sony और Panasonic है। कोरिया का अपना Samsung और LG है तो हिंदुस्तान की वो कौन सी ब्रांड्स होंगी जो उस लेवल पर जाए कि दुनिया में उसको उनको अपनी ब्रांड से जाना जाए। तो ये एक लंबी रेस है। हमको धैर्य रखना पड़ेगा। इसी पर इसी पर रहना पड़ेगा कि अच्छी क्वालिटी

18:27 बनाए। और एक और मैं बात कहना चाहूंगा कि जब हम कहते हैं स्वदेशी खरीदिए। स्पेशली इलेक्ट्रॉनिक आइटम में ये कैसे पता लगेगा कि स्वदेशी है। हम आप अगर एक लैपटॉप खरीदते हैं आज आपको नहीं पता है क्योंकि ब्रांड्स तो सभी वही है। मैं एक टीवी खरीदता हूं। मुझे नहीं पता लगता उस टीवी को देखने से कि ये इनमें से ज्यादा स्वदेशी कौन सा है और इलेक्ट्रॉनिक्स में आपने सही कहा कि हमारी निर्भरता सप्लाई चेस पर ग्लोबल पर रहेगी आज भी है और आगे भी रहेगी क्योंकि हर चीज कोई नहीं बना सकता चीन भी नहीं बनाता है तो उसमें हमें एक अच्छा मार्क लेकर आने की जरूरत है एक कोई रेटिंग सिस्टम कि साहब मुझे पता लगे कि ये पांच सितारा है तो ये पूरी तरह से हिंदुस्तानी है ये दो सितारा है तो इसमें हो सकता है डिस्प्ले या कुछ सेमीकंडक्टर बाहर के है बाकी यहां का है तो एक ये एक एक मार्क सिंपल मार्क लाना भी बहुत जरूरी है स्वदेशी उत्पाद के लिए आप मार्किंग की बात

19:13 करें मीनु शर्मा जीएसटी सुधारों को आप कैसे देखते हैं उसके बाद इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर सेक्टर में जो एमएसएमई और स्टार्टअप्स हैं आप मान आप मानते हैं इसको गति मिलेगी अगर मैं अपने ही सेक्टर की फिर से बात करूं तो इसमें बहुत बड़ा रोल है इसका उदाहरण देना चाहूंगा एयर कंडीशनिंग का जो प्रोफेसर शर्मा जी ने भी पहले जिसका जिक्र किया एयर कंडीशनिंग आज हम हिंदुस्तान में लगभग तीन साल पहले हम बनाते थे 9 मिलियन 90 लाख एयर कंडीशनर हम पे असेंबल करते थे और एक पीएलआई स्कीम आई जो डीपीआईआईटी ने किया उसके चलते हुए हमने देखा कि बहुत तेजी से कुछ गति पकड़ी और नौ से हम करीब 12 मिलियन लेकिन हम जिससे प्रतिस्पर्धा गोल ग्लोबली करते हैं वो चीन है और चीन हमसे 10 गुना ज्यादा 90 मिलियन एयर कंडीशन बनाकर पूरी दुनिया को बांटता है।

19:59 जी हिंदुस्तान में लेकिन अनफॉर्चुनेटली एयर कंडीशनर को लग्जरी आइटम माना गया और 28% उसप जीएसटी जी। अब इस बार क्योंकि उसको रिड्यूस कर दिया गया है तो हमें उम्मीद है कि कई लोग क्योंकि अब एयर कंडीशन कोई लग्जरी आइटम नहीं रहा। हमारे यहां जितनी गर्मी पड़ती है तो हर आदमी को इसकी जरूरत है। तो उससे इसका जो स्केलिंग होगा और जो डिमांड बढ़ेगी वो भी हमारे बहुत जो एयर कंडीशन मैन्युफैक्चर है उनको प्रोत्साहन मिलेगा। वो सेल अप कर पाएंगे और उसके पुरजे भी यहां पर बना। बिल्कुल विनोद शर्मा जी आपके पास लौटेंगे क्योंकि प्रोफेसर बीपी शर्मा हमारे साथ जुड़े हुए हैं। उनसे भी बातचीत करते हैं। शिक्षा और कौशल विकास के संस्थानों को सर अगर मैं आपसे समझना चाहूं कि स्वदेशी विज़न से कैसे जोड़ा जा सकता है ताकि युवा जॉब सीकर नहीं बल्कि जॉब क्रिएटर बने और साथ ही अगर हम सामाजिक दृष्टि से समझना चाहें कि क्या स्वदेशी

20:46 आंदोलन भारत में उपभोक्ता व्यवहार और लाइफस्ट में एक बड़ा बदलाव ला पाएगा। मुझे लगता है शिक्षा के क्षेत्र में हमारा एजुकेशनल सिस्टम वर्ल्ड का सेकंड लार्जेस्ट है। जी और हम आज की तारीख में अगर टेक्नो नेशनलिज्म तकनीकी राष्ट्रवाद का भाव लेके हमारे आईआईटी आईआईटी से लेके सारी टेक्निकल इंस्टट्यूट्स एनआईटीस और टेक्निकल यूनिवर्सिटीज अगर सभी हम उन सारे प्रोडक्ट्स में जिन पे हम फॉरेन डिपेंडेंट्स है जिन कंपोनेंट्स के इंपोर्ट में फॉरेन डिपेंडेंट है उन सब में अगर हम अपना प्रोडक्ट डेवलप करें और अपनी टेक्नोलॉजी डेवलप करें छोटा सा एग्जांपल जैसे रिसर्च एनालिसिस के लिए हम एसपीएसएस पे काम करते हैं। मुझे लगता है हमारा आईटी सेक्टर चाहे तो एसपीएसएस जैसा डाटा

21:32 एनालिटिक्स का सॉफ्टवेयर बना सकता है। तो मुझे लगता है कि चाहे वो आईटी प्रोडक्ट्स हो, चाहे वो फिजिकल प्रोडक्ट्स हो। हमें अपने इंस्टीटशंस का यूज़ करना चाहिए। और कुल बात यह है कि स्किल के बिना हम अपने यहां प्रोडक्ट असेंबलिंग नहीं कर सकते और टेक्नोलॉजी के बिना हम नए प्रोडक्ट डेवलप करके मार्केट में ल्च नहीं कर सकते। और इसलिए आज आवश्यकता और इसके साथ ही साथ मैं एक बात और स्ट्रेस करना चाहूंगा जो आपने प्रश्न नहीं पूछा लेकिन आज प्रोडक्ट सब तरह के हैं। मान लो हम एक्वा फिनाया किन किन का पानी खरीदेंगे तो प्रॉफिट विदेश में जाएगा। और अगर हमने चाहे जितने इंडियन ब्रांड्स हैं आज हम बल्ब और ट्यूबलाइट अगर हम Philips खरीदेंगे तो प्रॉफिट होलैंड जाएगा। टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट होलैंड का होगा। और अगर हमने बजा सूर्य मतलब देश में

22:18 स्वदेशी प्रोडक्ट करीब-करीब हर कैटेगरी में है और उनको अगर हम प्रोडक्शन सपोर्ट देंगे तो उनकी टेक्नोलॉजी भी डेवलप होगी। उनका डाउनस्ट्रीम वैल्यू चेन ऑफ़ ओरिजिनल इक्विपमेंट्स का मैन्युफैक्चरिंग भी होगा और कई बार चाइना हमारे यहां डंपिंग करता है। जैसे कंप्यूटर हार्डवेयर में हम लोग जेनथ और विप्रो भी कंप्यूटर हार्डवेयर बनाता था। पीसी बनाता था। अब चाइना ने डंपिंग शुरू की। ऐसे में सरकार उस समय अगर एंटी डंपिंग ड्यूटी लगा देती तो हमारे ये मैन्युफैक्चरर्स बच जाते। इसी प्रकार से इलेक्ट्रॉनिक्स में जैसा विनोद शर्मा जी कह रहे थे मुझे लगता है कि हमें अपना एंटी डंपिंग ड्यूटी का उपयोग भी करना चाहिए जहां कोई अगर यहां डंपिंग करता है तो और हमें अपना टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट भी करना चाहिए। आज जैसे हम बहुत सारे एक्टिव फार्मा इंग्रेडिएंट्स है। मुझे लगता है कि

23:05 अगर इंडस्ट्री अगर कॉन्ट्रैक्ट रिसर्च करवाए हमारे जो चाहे आईआईटीस हैं, चाहे एनआईटीस हैं, चाहे टेक्निकल यूनिवर्सिटीज हैं, चाहे फार्मेसी कॉलेजेस हैं तो चाहे फार्मा सेक्टर हो, चाहे इलेक्ट्रॉनिक सेक्टर हो। मुझे लगता है अपने कंपोनेंट्स को डेवलप कराने के लिए इंडस्ट्री एकेडमिक इंस्टीटश को जोड़ सकती है और उनसे कॉन्ट्रैक्ट रिसर्च के लिए आग्रह कर सकती है और वो उनके उन कंपोनेंट्स की क्वालिटी इंप्रूव करना उनका डेवलपमेंट करना ये भी एक हो सकता है और मुझे एक और लगता है हमारे देश में कंसोशियम जिसको सहायता संघ कहते हैं एकेडमिया इंडस्ट्री यानी यूनिवर्सिटी इंडस्ट्री सहायता संघ होना चाहिए आज अमेरिका में गवर्नमेंट यूनिवर्सिटी इंडस्ट्री राउंड टेबल हर वर्ष होता है और उस राउंड टेबल में इंडस्ट्री के लिए

23:52 कौन-कौन सी रिसर्चेस एकेडमिक इंस्टीटश कर सकती है और वो उसमें एलोकेट कर लेते हैं और मुझे एक बात और कहनी है जो अभी विनोद शर्मा जी ने भी कहा कि हमारे यहां जो छोटे-छोटे मैन्युफैक्चरर्स हैं मुझे लगता है हम अगर कंसोशियम अप्रोच अडॉप्ट करते हैं इंडस्ट्री कंसोशियम्स तो इंडस्ट्री कंसोशियम्स यानी कि जैसे फिरोजाबाद में 150 कांच के सामान बनाने वाली छोटी-छोटी उद्यम है अगर उनका एक कंसोशियम बन जाए उद्योग सहायता संघ बन जाए और वो अपना कॉमन कंट्रीब्यूशन रखें तो वो जो है प्री कॉम्पिटिटिव रिसर्च करके अपने प्रोडक्ट की क्वालिटी इंप्रूव कर सकते हैं। किसी जमाने में 500 कांच के कारखाने थे आज 150 रह गए। तो ये स्किल बिल्डिंग कंसोशियम के माध्यम से भी हो सकता है। और यहां एक बात मैं कहना चाहता हूं। अमेरिका में सारी जो टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट

24:37 कंसोशियम्स के थ्रू हो रहा है। उन्होंने 1984 में कोऑपरेटिव रिसर्च एक्ट ल्च किया था और उस कोऑपरेटिव रिसर्च एक्ट के तहत किसी भी हर सेक्टर में जो इंडिविजुअल कंपनीज़ है उनका कंसोशियम होता है और कंसोशियम में वो कंट्रीब्यूट करके कॉमन फंड से आरएडी करके अपना नेक्स्ट जनरेशन ऑफ़ टेक्नोलॉजी डेवलप करते हैं और गवर्नमेंट उसमें 80 टू 90% कंट्रीब्यूट करती है। तो मुझे लगता है कि आज का समय हमें स्किल डेवलप करने की भी जरूरत है और टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट करने की भी जरूरत है और मेड बाय इंडिया प्रोडक्ट्स और ब्रांड्स अगर जनता विदेशी ब्रांड्स को खरीदना बंद कर देती है जापान की तरह तो यहां पर सारा का सारा आज जो ट्रेड टर्नओवर मैन्युफैक्चरिंग है वो सारा हमारे उद्यमों को मिलेगा और उससे क्या होगा मैं एक डाउनस्ट्रीम वैल्यू चेन का छोटा सा एग्जांपल देता हूं मान लो आज

25:25 हम मेक इन इंडिया में क्या हो रहा है चाइनीस कंपनी है वो अपना मोबाइल फोन 96% % कंपोनेंट बाहर से लाके असेंबल कर रही है। खिलौने हैं। अब एक खिलौने की कार लीजिए। अगर ₹200 की खिलौने की कार है और वो अगर चाइनीस कंपनी सारे कंपोनेंट्स वहां से चीन से लाकर यहां असेंबल कर रही है केवल उसको मेड इन इंडिया टैग लगाने के लिए। उसके बदले में अगर इंडियन टॉय मैन्युफैक्चरर आता है तो उसे टॉय बनाने के लिए एक कॉइल चाहिएगी। तो वो ₹20 की एक कॉइल खरीदेगा। देश में 2030 कंपनियां कॉइल मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां डेवलप होंगी। अब कॉइल मैन्युफैक्चर को चाहिए एनामल्ड वायर। तो वायर एनामेलिंग कंपनीज उसमें आएंगी। वायर एनामलिंग कंपनी को चाहिएगा कॉपर वायर तो कॉपर ड्राइंग मशीनंस आएंगी। कॉपर ड्राइंग मशीनंस को चाहिए कॉपर इनगोट तो कॉपर इनगोट की सेल होगी। तो उसमें जो

26:12 हमारा स्वदेशी प्रोडक्ट की अगर ₹100 का टर्नओवर है तो ट्रांजैक्शन वेलोसिटी ऑफ़ मनी से वो पांच से 10 गुना इनक्रीस हो जाता है। उन सारे एम्प्लाइज को जो वेजेस और सैलरी मिलती है वो मार्केट में परचेजिंग करते हैं और उस परचेजिंग से मार्केट में जो ट्रेड टर्नओवर जनरेट होता है वो अब माइंड बोगलिंग इट मे बी 100 टाइम्स। तो मुझे लगता है कि आज के समय में भारत को स्वावलंबी बनाने के लिए स्वदेशी एकमात्र ऐसा वो है। आज हम देखते हैं टेक्नोलॉजी इज नॉट ए प्रॉब्लम। Tata मोटर्स ने जिस समय Volgo ने अपनी 400 हॉर्स पावर के ट्रक और बस ल्च कर दिया। तो Tata Motors ने डेबो कमर्शियल व्हीकल्स लिमिटेड जो दिवालिया हो गई कोरिया में उसको टेकओवर कर लिया और 400 हॉर्स पावर के उनकी टेक्नोलॉजी वहां से ले ली। उन्होंने स्पेन में हिसपानो को टेकओवर कर लिया।

26:58 उन्होंने ब्राजील में मार्कोपोलो के साथ टाइप तो टेक्नोलॉजी हम एक्वायर भी कर सकते हैं। चाइना ने पिछले 30 साल में 6000 यूरोपियन सिख कंपनीज़ को टेकओवर करके अपनी टेक्नोलॉजी को अपडेट किया। प्रोफेसर वीपी शर्मा जी निश्चित रूप से बहुत ही इंपॉर्टेंट और वैल्यूुएबल आपकी इनसाइट्स रहे। अह एक क्लोजिंग कमेंट के लिए अतोषनीवाल जी जब हम कह रहे हैं कि यह जो है वह एक स्वदेशी पुष एक जन आंदोलन है, एक भावना है। तो दिल्ली उत्पादकता परिषद के अनुभव से मैं समझना चाहूंगी कि कैसे सरकार उद्योग जगत मिलकर कुछ ऐसे स्टेप्स उठाए जिससे कि इसकी जो मूल भावना है उसको आत्मसात करते हुए इसके इसका जो मेन विज़न है उस तक हम पहुंच सके। जी। देखिए, जहां से हमने बात शुरू की थी, जीएसटी में जो

27:44 अभी सुधार हुआ, यह एक बहुत बड़ी पहल है। यह भारत की जीडीपी को बढ़ाने का एक रोड मैप है। मांग बढ़ेगी। उत्पादन चाहिए और ऐसे समय में उद्योगों से आह्वान किया जा रहा है और उपभोक्ताओं से भी। जी। केवल जीएसटी से सुधार से मांग बढ़ जाएगी। लेकिन इतने से काम नहीं चलेगा। हमें जिन सेक्टर्स में और सुधार चाहिए वो है श्रम और शिक्षा। बाद में कृषि सुधार, न्यायिक सुधार वो भी शामिल है। मैं इन दो पर आपको बात करना चाहूंगा। श्रम से मेरा आशय है। आज हमारे देश में एक चाहे माइक्रो यूनिट है या लार्ज यूनिट है। दोनों पर समान लेबर कानून लागू होते हैं। जबकि देश के छोटे उद्यमी वर्षों से डिमांड

28:29 कर रहे हैं कि हमारे लिए एक छोटा और सिंपल अलग से लेबर लॉ बनाया जाए। जिसकी बहुत आवश्यकता है। इससे बहुत बड़ा चेंज आएगा। दूसरी बात जो शिक्षा की बात कर रहा हूं स्किल डेवलपमेंट की। आज शायद सबसे अधिक आवश्यकता किसी चीज की देश में है तो वो स्किल डेवलपमेंट है जो सीधा प्रोडक्टिविटी के साथ जुड़ा हुआ है। इस विषय में जितना हमें काम करने की आवश्यकता है उतना नहीं हो पा रहा। मैं आपको एक उदाहरण बताता हूं। दिल्ली प्रोडक्टिविटी काउंसिल प्रोडक्टिविटी बढ़ाने के लिए अनेक प्रकार की एक्टिविटीज करती है। हमारे देश में नेशनल स्किल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन एक बड़ा संगठन है जो प्रोडक्टिविटी बढ़ाने के लिए लोगों के साथ मिलकर काम करता है। एक साल पहले प्रोडक्टिविटी काउंसिल ने उनसे कांटेक्ट किया। हमने कहा देखिए हमारे पास

29:16 बड़े-बड़े कैंपस है। पूरा इंफ्रा है। हम इस इस सेक्टर का अनुभव है। आप हमें भी ट्रेनिंग पार्टनर बनाइए। हम आपकी सहायता से थोड़ा सा जी हम इसमें काम करना चाहते हैं दिल्ली में। उन्होंने कई दिन लगाने के बाद में उन्होंने हमें अपना ट्रेनिंग पार्टनर बनाने योग्य ही नहीं समझा। अब उनकी क्या सोच थी मैं नहीं समझता। स्किल डेवलपमेंट में आज सबसे अधिक काम करने की आवश्यकता है। बिल्कुल बिल्कुल इसकी जरूरत है जिसका जिक्र आपने अपने शुरुआती उससे जो इतनी बड़ी पहल है प्रधानमंत्री जी की वो वहां पहुंचेगी जहां उन्होंने हमसे इस बात की अपेक्षा की और इसलिए हम देख रहे हैं कि स्किल इंडिया जैसे मिशन की भी शुरुआत की गई है क्योंकि स्केलिंग पे जोर और जैसा कि आपने भी कहा चूंकि सब्जेक्ट बहुत अच्छा है और इस पे हम बहुत लंबी बातचीत हो सकती है लेकिन जो

30:01 वक्त है उसकी मर्यादा है। आप तीनों खास मेहमानों का बहुत शुक्रिया इस चर्चा में शामिल होने के लिए। तो आत्मनिर्भरता, गुणवत्ता और वैश्विक नेतृत्व की सोच यही सोच भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाएगी और यही भारत को एक बार फिर विश्व गुरु की दिशा में लेकर जाएगी। एक बार फिर से आप सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया। फिलहाल इनसाइट में इतना ही। आप इस कार्यक्रम को संसद टीवी के YouTube चैनल्स पर देख सकते हैं। नमस्कार। [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत]

30:53 संसद टीवी के और भी प्रोग्राम्स देखने के लिए सब्सक्राइब करें हमारा YouTube चैनल और हां इन्हें लाइक और शेयर करना ना भूलें।

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