The Art of Risk | Book summary in hindi | book pedia | Audiobook

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संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो "द आर्ट ऑफ़ रिस्क" नामक पुस्तक पर आधारित है, जो जोखिम लेने के विज्ञान को उजागर करती है। यह बताती है कि कैसे डर को नियंत्रित करके और सोच-समझकर जोखिम लेकर असाधारण सफलता प्राप्त की जा सकती है। वीडियो में जोखिम लेने से जुड़े मस्तिष्क के कार्यों, डर के प्रबंधन, जोखिम लेने की क्षमता को विकसित करने और अंतर्ज्ञान की शक्ति पर प्रकाश डाला गया है।

  • जोखिम लेना एक जन्मजात प्रतिभा नहीं है, बल्कि एक कौशल है जिसे सीखा जा सकता है।
  • डर को प्रबंधित करना और उसे अपनी ताकत बनाना महत्वपूर्ण है।
  • छोटे-छोटे जोखिम लेकर धीरे-धीरे अपनी जोखिम लेने की क्षमता को बढ़ाया जा सकता है।
  • अंतर्ज्ञान एक शक्तिशाली उपकरण है, लेकिन इसे तर्क और डेटा के साथ संतुलित करना चाहिए।
  • जोखिम लेने की क्षमता व्यक्तित्व का हिस्सा है, लेकिन इसे बदला जा सकता है।

अध्याय 1: जोखिम पर आपका मस्तिष्क

यह अध्याय बताता है कि जोखिम लेना भाग्य पर निर्भर नहीं है, बल्कि एक जैविक प्रक्रिया है जो मस्तिष्क के अंदर चलती है। जब हम किसी जोखिम भरी स्थिति में होते हैं, तो हमारा दिमाग तेजी से गणना करता है और तीन मुख्य सिस्टम - एमिगडाला, प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स और डोपामाइन सिस्टम - के आधार पर निर्णय लेता है। एमिगडाला खतरे का संकेत भेजता है, प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स तार्किक रूप से विश्लेषण करता है, और डोपामाइन सिस्टम हमें रोमांच का एहसास कराता है। इन तीनों सिस्टम को समझकर हम अपने डर को प्रबंधित कर सकते हैं, तार्किक सोच को बेहतर बना सकते हैं और डोपामाइन सिस्टम को नियंत्रित कर सकते हैं।

अध्याय 2: निडरता का मिथक

यह अध्याय निडरता के मिथक को तोड़ता है और बताता है कि हर इंसान डरता है, लेकिन कुछ लोग अपने डर को प्रबंधित करना सीख जाते हैं। डर एक प्राकृतिक प्रतिक्रिया है जो हमें खतरों से बचाने में मदद करती है, लेकिन जब हम करियर, निवेश या रिश्तों में जोखिम लेते हैं, तब भी हमारा दिमाग वही प्रतिक्रिया देता है। असली जोखिम लेने वाले डर को महसूस करने के बावजूद आगे बढ़ते हैं, उसे समझते हैं और उसे अपनी ताकत बना लेते हैं। डर को दबाने की कोशिश करने के बजाय, हमें उसे प्रबंधित करना सीखना चाहिए और यह सोचना चाहिए कि हम इस डर के साथ कैसे आगे बढ़ सकते हैं।

अध्याय 3: जोखिम सीढ़ी

यह अध्याय बताता है कि हर इंसान का जोखिम लेने का स्तर अलग-अलग होता है और यह एक सीढ़ी की तरह काम करता है। जब हम कोई जोखिम लेते हैं और उसमें सफल होते हैं, तो हमारा दिमाग अगले बड़े जोखिम के लिए तैयार हो जाता है। छोटे-छोटे जोखिम लेकर हम बड़े जोखिम के लिए तैयार होते जाते हैं। यदि हम अपनी जिंदगी में जोखिम लेने से डरते हैं, तो हमें एकदम से कोई बड़ा जोखिम लेने की जरूरत नहीं है, बल्कि अपनी जोखिम सीढ़ी पर एक कदम ऊपर चढ़ने की जरूरत है।

अध्याय 4: जोखिम के लिए प्रशिक्षण

यह अध्याय बताता है कि जोखिम लेना एक कौशल है जिसे सीखा और विकसित किया जा सकता है। जोखिम लेना सिर्फ भाग्य या साहस पर निर्भर नहीं करता, बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि हमने खुद को उस स्थिति के लिए कितना तैयार किया है। जोखिम लेने को बेहतर बनाने के लिए एक्सपोजर और सिमुलेशन जरूरी हैं। यदि हम किसी चीज से डरते हैं, तो हमें बार-बार खुद को उस स्थिति में डालना होगा ताकि हमारा दिमाग उस चीज को सामान्य मानने लगे। असली जोखिम लेने से पहले हम उसकी प्रैक्टिस भी कर सकते हैं।

अध्याय 5: अंतर्ज्ञान की शक्ति

यह अध्याय बताता है कि दुनिया के सबसे बड़े जोखिम लेने वाले अपने निर्णय लेने में अंतर्ज्ञान पर भरोसा करते हैं। अंतर्ज्ञान हमारे दिमाग का एक शक्तिशाली निर्णय लेने का उपकरण है जो हमें वह चीजें महसूस करने की शक्ति देता है जो हमारा सचेत मन तुरंत नहीं समझ पाता। अंतर्ज्ञान हमारे पिछले अनुभवों और पैटर्नों पर आधारित होता है। अंतर्ज्ञान को तेज करने के लिए ज्यादा से ज्यादा अनुभव लेना और अपने अंतर्ज्ञान को डेटा और तर्क से क्रॉस-चेक करना जरूरी है।

अध्याय 6: जोखिम लेने वाला व्यक्तित्व

यह अध्याय बताता है कि जोखिम लेना हमारी पर्सनालिटी का हिस्सा होता है और हर इंसान में जोखिम लेने की क्षमता अलग-अलग होती है। कुछ लोग स्वाभाविक रूप से उच्च जोखिम लेने वाले होते हैं, कुछ मध्यम जोखिम लेने वाले होते हैं और कुछ कम जोखिम लेने वाले होते हैं। जोखिम लेने वाले व्यक्तित्व को बदला जा सकता है। यदि कोई कम जोखिम लेने वाला है, तो वह धीरे-धीरे अपनी जोखिम लेने की क्षमता को बढ़ा सकता है। असली सफलता उन्हीं लोगों को मिलती है जो अपने स्वभाव को समझकर खुद को बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं।

निष्कर्ष

यह वीडियो निष्कर्ष निकालता है कि जोखिम लेना एक सीखा जाने वाला कौशल है जो हमें असाधारण सफलता तक ले जा सकता है। "द आर्ट ऑफ़ रिस्क" हमें सिखाती है कि कोई भी इंसान एक स्मार्ट जोखिम लेने वाला बन सकता है यदि वह सही मानसिकता और सही प्रशिक्षण अपनाए। जोखिम से भागने के बजाय, हमें उसे समझना और अपनाना जरूरी है। जोखिम लेना ही वह पुल है जो आपको एक साधारण जीवन से असाधारण सफलता तक ले जाता है।

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Transcript

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0:00 हेलो दोस्तों क्या आपने कभी सोचा है कि कुछ लोग बड़े से बड़ा रिस्क क्यों ले लेते हैं जबकि कुछ लोग छोटी-छोटी चीजों से भी डर जाते हैं आखिर ऐसा क्यों होता है कि कुछ लोग अपनी जिंदगी में बड़े डिसीजंस बिना किसी हेसिटेशन के ले लेते हैं जबकि कुछ लोग हर कदम उठाने से पहले हजार बार सोचते हैं क्या रिस्क टेकिंग कोई इनबिल्ट टैलेंट है जो सिर्फ कुछ खास लोगों को मिलता है या फिर इसे सीखा जा सकता है रिस्क यानी जोखिम हमारी जिंदगी का एक ऐसा हिस्सा है जिसे हम चाहे या ना चाहे हमें फेस करना ही पड़ता है लेकिन सवाल यह है कि रिस्क टेकिंग का सही तरीका क्या है क्या यह सिर्फ लक किस्मत पर डिपेंड करता है या इसके पीछे कोई साइंटिफिक लॉजिक है अगर हम

0:46 इस आर्ट को सीख ले तो क्या हम भी अपनी जिंदगी के सबसे बड़े डिसीजन बिना डर के ले सकते हैं आज हम बात करने वाले हैं एक ऐसी किताब की जो रिस्क टेकिंग के पीछे की साइंस को रिवील करती है द आर्ट ऑफ रिस्क यह सिर्फ एक किताब नहीं बल्कि एक माइंड सेट है जो हमें सिखाती है कि कैसे हम फियर को कंट्रोल करके कैलकुलेटेड रिस्क ले सकते हैं और अपनी लाइफ में एक्स्ट्राऑर्डिनरी सक्सेस हासिल कर सकते हैं रिस्क टेकिंग सिर्फ डेयर डेविल्स या एडवेंचर सीकर्स के लिए नहीं है यह एक ऐसी स्किल है जिसे हर कोई डेवलप कर सकता है चाहे आप बिजनेस में हो करियर में ग्रोथ चाहते हो या पर्सनल लाइफ में बोल्ड डिसीजंस लेना चाहते चाते हो रिस्क लेना जरूरी है लेकिन सही रिस्क

1:33 लेना और बेवजह का रिस्क लेना दोनों में बहुत बड़ा फर्क होता है इस किताब में बताया गया है कि हमारे दिमाग में ऐसा कौन सा सिस्टम होता है जो यह डिसाइड करता है कि हम किसी रिस्क को एक्सेप्ट करेंगे या उससे डर करर पीछे हट जाएंगे क्या कोई ऐसा तरीका है जिससे हम अपने माइंड को ट्रेन कर सकते हैं ताकि हम सही समय पर सही रिस्क ले क्या हमारे पास्ट एक्सपीरियंस हमारी सोचने का तरीका और हमारी पर्सनालिटी इस पर असर डालती है कि हम रिस्क लेने वाले इंसान बनेंगे या नहीं किताब की सबसे बड़ी सीख यह है कि फियर यानी डर हमेशा रिस्क टेकिंग के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा होती है लेकिन सच्चाई यह है कि सक्सेसफुल रिस्क टेकर्स

2:20 वो नहीं होते जो बिल्कुल भी नहीं डरते बल्कि वह होते हैं जो अपने डर को मैनेज करना सीख लेते हैं यानी रिस्क टेकिंग का मतलब यह नहीं कि आप बेधड़क और बिना सोचे समझे कोई भी कदम उठा लें इसका मतलब यह है कि आप अपने डर को समझें अपने गोल्स को क्लियर करें और फिर एक स्मार्ट स्ट्रेटजी बनाकर उस रिस्क को हैंडल करें इसीलिए अगर आप भी अपनी जिंदगी में एक बोल्ड और कॉन्फिडेंट इंसान बनना चाहते हैं अगर आप भी उन लोगों में शामिल होना चाहते हैं जो बिना किसी डर के अपने सबसे बड़े ड्रीम्स को फॉलो करते हैं तो यह वीडियो आपके लिए है इस वीडियो में हम द आर्ट ऑफ रिस्क की सबसे पावरफुल स्ट्रेटेजी को डिकोड करेंगे

3:06 जो आपको यह सिखाएंगे कि कैसे आप अपने अंदर रिस्क टेकिंग का सही बैलेंस डेवलप कर सकते हैं और अपनी जिंदगी में फियर को कंट्रोल करके सफलता हासिल कर सकते हैं तो चलिए बिना कोई समय गवाए इस रोमांचक सफर की शुरुआत करते हैं और सीखते हैं रिस्क लेने की असली कला चैप्टर वन योर ब्रेन ऑन रिस्क क्या आपने कभी सोचा है कि कुछ लोग किसी ऊंची चट्टान से कूदने तेज रफ्तार में बाइक चलाने या अपने बिजनेस में करोड़ों का निवेश करने से जरा भी नहीं डरते जबकि कुछ लोग छोटी-छोटी चीजों में भी रिस्क लेने से कतराते हैं आखिर ऐसा क्यों होता है क्या यह सिर्फ हमारी पर्सनालिटी पर निर्भर करता है या इसके पीछे कुछ साइंटिफिक लॉजिक छुपा

3:52 है इस चैप्टर में एक बहुत ही चौकाने वाली बात बताई गई है रिस्क टेकिंग सिर्फ लक या बो पर निर्भर नहीं करता बल्कि यह एक डीप वायर्ड बायोलॉजिकल प्रोसेस है जो हमारे ब्रेन के अंदर चलता रहता है जब भी हम किसी रिस्की सिचुएशन में होते हैं हमारा दिमाग एक तेज कैलकुलेशन करने लगता है क्या यह रिस्क लेना सेफ होगा क्या इसके रिजल्ट्स पॉजिटिव होंगे क्या हम फेलियर हैंडल कर पाएंगे और फिर हमारी बॉडी उस कैलकुलेशन के हिसाब से रिएक्ट करती है लेकिन मजेदार बात यह है कि हर किसी का दिमाग रिस्क को एक ही तरीके से प्रोसेस नहीं करता कुछ लोग नेचुरली ज्यादा रिस्क टेकिंग होते हैं और कुछ लोग ज्यादा कॉशस लेकिन ऐसा क्यों इसकी

4:40 जड़ें हमारे दिमाग में छुपी हुई हैं जब भी हम किसी रिस्क से सामना करते हैं हमारा ब्रेन तीन बड़े सिस्टम्स के आधार पर फैसला लेता है एमिगरा प्री फ्रंटल कॉर्टेक्स और डोपामिन सिस्टम अमिगो करता है जब भी हमें कोई बड़ा रिस्क दिखता है यह हमारे अंदर अलर्ट सिग्नल भेजता है रुक जाओ यह खतरनाक हो सकता है इसलिए जब कोई ऊंचाई पर खड़ा होता है और नीचे देखता है या कोई नया बिजनेस शुरू करने से पहले फेलियर का डर महसूस करता है तो इसके पीछे एमगल ही काम कर रहा होता है लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती हमारे दिमाग का प्रीफ्लॉप उस रिस्क को लॉजिकली

5:25 एनालाइज करता है यह हमारे पास्ट एक्सपीरियंस हमारे गोल्स और उस रिस्क से मिलने वाले पॉसिबल रिवार्ड्स को कंपेयर करता है अगर प्री फ्रंटल कॉर्टेक्स को लगता है कि रिस्क लेना सही रहेगा तो यह अमिगो पमन सिस्टम डोपामिन जिसे हम फील गुड केमिकल भी कहते हैं हमारे दिमाग का वह हिस्सा है जो हमें थ्रिल और एक्साइटमेंट का एहसास कराता है जब हम कोई रिस्क लेते हैं और उसमें सक्सेसफुल होते हैं तो हमारा डोपामिन सिस्टम हमें एक स्ट्रांग रिवॉर्ड सिग्नल भेजता है यस यह मजेदार था दोबारा ट्राई करो यही कारण है कि कुछ लोग रिस्क

6:11 लेने से घबराते नहीं बल्कि बार-बार उसका थ्रिल महसूस करना चाहते हैं लेकिन यही डोपामिन सिस्टम कभी-कभी हमें गलत फैसले लेने पर भी मजबूर कर सकता है जब कोई पर्सन एक्सट्रीम रिस्क टेकिंग बिहेवियर्स दिखाता है जैसे गैंबलिंग हाई स्पीड रेसिंग या अनावश्यक रूप से डेंजरस डिसीजंस लेना तो इसका कारण डोपामिन की ओवर एक्टिविटी हो सकती है कुछ लोग नेचुरली ज्यादा डोपामिन सेंसिटिव होते हैं और यही कारण है कि वह बार-बार हाई रिस्क डिसीजंस लेते हैं भले ही उसमें फेलियर का खतरा हो अब सवाल यह उठता है क्या रिस्क टेकिंग को कंट्रोल किया जा सकता है क्या हम अपने दिमाग को इस तरह से ट्रेन कर सकते हैं कि हम सही समय पर सही रिस्क ले और अननेसेसरी रिस्क से बचे हां यह पॉसिबल है अगर हम अपने दिमाग

7:00 के इन तीन सिस्टम्स को अच्छी तरह समझ ले तो हम अपने फियर को मैनेज कर सकते हैं अपनी लॉजिकल थिंकिंग को इंप्रूव कर सकते हैं और अपने डोपामिन सिस्टम को सही तरीके से कंट्रोल कर सकते हैं इस चैप्टर में एक बहुत ही पावरफुल मैसेज है रिस्क टेकिंग कोई रैंडम टैलेंट नहीं है बल्कि यह एक बायोलॉजिकल और साइकोलॉजिकल प्रोसेस है जिसे हम समझकर मास्टर कर सकते हैं जो लोग स्मार्ट रिस्क लेते हैं वह अपनी इंस्टिंक्ट्स एक्सपीरियंस और लॉजिकल थिंकिंग के बीच एक परफेक्ट बैलेंस बनाते हैं वो ना तो बिना सोचे समझे रिस्क लेते हैं और ना ही किसी डर के कारण अपॉर्चुनिटी मिस करते हैं तो अगली बार जब आप किसी बड़े डिसीजन के सामने खड़े होंगे तो खुद से एक सवाल पूछिए क्या यह मेरा एमग दला है जो

7:47 मुझे रोक रहा है क्या मेरा प्रीफ कॉर्टेक्स इस रिस्क को सही तरीके से एनालाइज कर रहा है क्या मेरा डोपामिन सिस्टम मुझे सही रिवॉर्ड की ओर खींच रहा है अगर आप इस फर्म को समझ लेते हैं तो आप किसी भी रिस्क को समझदारी से हैंडल कर सकते हैं और अपनी जिंदगी में बड़े-बड़े गोल्स अचीव कर सकते हैं रिस्क एक आर्ट है और इसे मास्टर करना पॉसिबल है बस आपको अपने दिमाग को सही तरीके से समझना होगा चैप्टर टू द मिथ ऑफ फीयरलेसनेस क्या आपने कभी ऐसे लोगों को देखा है जो ऊंचाई से छलांग लगाने में हिच किचा नहीं जो तेज रफ्तार में बाइक दौड़ा हैं जो बिना किसी डर के नए बिजनेस आइडियाज पर करोड़ों रुपए लगा देते हैं हमें लगता है कि यह लोग

8:34 फेयरलेस हैं यानी इन लोगों को डर महसूस ही नहीं होता लेकिन क्या सच में ऐसा होता है क्या कुछ लोग जन्म से ही डर से मुक्त होते हैं या फिर यह सिर्फ एक मित है इस चैप्टर में इस बहुत बड़े भ्रम को तोड़ती हैं फीयरलेसनेस नाम की कोई चीज होती ही नहीं हकीकत यह है कि हर इंसान डरता है चाहे वह कितना भी बहादुर क्यों ना दिखे फर्क बस इतना है कि कुछ लोग अपने डर को सही तरीके से मैनेज करना सीख जाते हैं और कुछ लोग डर के आगे घुटने टेक देते हैं जब भी हम किसी रिस्की सिचुएशन में होते हैं हमारा ब्रेन तुरंत अलर्ट मोड में चला जाता है हमारे अंदर एक अनदेखी घबराहट पैदा होती है हमारी हार्टबीट तेज हो जाती है हथेलियां पसीने

9:21 से भीगने लगती हैं और दिमाग कहता है रुक जाओ यह खतरनाक हो सकता है यह हमारा डाला है जो हमें सर्वाइवल मोड में डाल देता है यह सिस्टम लाखों सालों से हमारे अंदर मौजूद है और यही हमें हर तरह के खतरों से बचाने में मदद करता है लेकिन आज के दौर में खतरे सिर्फ जंगलों में जंगली जानवरों से नहीं होते बल्कि करियर डिसीजंस पब्लिक स्पीकिंग इन्वेस्टमेंट्स और रिलेशनशिप्स में भी रिस्क होता है लेकिन जब हम इन रिस्क को फेस करते हैं तब भी हमारा दिमाग वही प्रिमिटिव प्रतिक्रिया देता है जो किसी जानलेवा खतरे को देखकर देता अब सवाल यह है अगर डर नेचुरल है तो फिर दुनिया के सबसे बड़े रिस्क टेकर्स कैसे इतने बड़े

10:07 फैसले ले लेते हैं क्या उनके अंदर डर नहीं होता असली रिस्क टेकर्स वे लोग होते हैं जो डर को महसूस करने के बावजूद भी आगे बढ़ते हैं वे अपने डर को अनदेखा नहीं करते बल्कि उसे समझते हैं उसे स्वीकार करते हैं और फिर उसी डर को अपनी ताकत बना लेते हैं यही है असली माइंडसेट शिफ्ट जो जो एक आम इंसान और एक एक्स्ट्राऑर्डिनरी इंसान के बीच का सबसे बड़ा फर्क पैदा करता है एक प्रोफेशनल स्काई डाइवर जब हजारों फीट ऊंचाई से कूदता है तो उसे भी डर लगता है एक एंटरप्रेन्योर जब अपना पहला स्टार्टअप शुरू करता है तो उसे भी नाकामयाब का डर होता है लेकिन फर्क यह है कि वे इस डर को अपने ऊपर हावी नहीं होने देते वे जानते

10:54 हैं कि डर सिर्फ एक सिग्नल है जो हमें बताता है कि हम अपने कंफर्ट जोन से बाहर आ रहे हैं और इसी कंफर्ट जोन से बाहर निकलकर ही कोई इंसान ग्रोथ कर सकता है जब हम डर को पूरी तरह से समझ लेते हैं तो हम उसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं डर हमें सतर्क बनाता है हमें सोचने पर मजबूर करता है हमें ज्यादा प्रिपेयर्ड करता है एक सही मात्रा में डर हमें बेहतर परफॉर्मेंस देने में मदद करता है लेकिन अगर यह डर हद से ज्यादा बढ़ जाए तो यह हमें पैरालाइज कर देता है हमें डिसीजंस लेने से रोकता है और हमारी जिंदगी को एक लिमिटिंग बॉक्स में बंद कर देता है इसीलिए सबसे जरूरी चीज यह है कि हम अपने डर को दबाने की कोशिश ना करें बल्कि उसे मैनेज

11:40 करना सीखें यह सोचने के बजाय कि मैं डर को खत्म कैसे करूं हमें यह सोचना चाहिए कि मैं इस डर के साथ कैसे आगे बढ़ सकता हूं दुनिया के सबसे बड़े लीडर्स एथलीट्स आर्टिस्ट और नहीं करते बल्कि उसे अपना दोस्त बना लेते हैं तो अगली बार जब आपको किसी रिस्की डिसीजन के सामने घबराहट महसूस हो तो इसे कमजोरी मत समझिए यह एक सिग्नल है कि आप अपनी लिमिट्स को पुश कर रहे हैं डर महसूस होना कोई गलत बात नहीं लेकिन डर के कारण अपॉर्चुनिटी को खो देना यह सबसे बड़ी गलती हो सकती है फीयरलेसनेस एक मिथ है लेकिन फियर मैनेजमेंट एक आर्ट है यही इस चैप्टर

12:28 की सबसे बड़ी सीख है अगर आप इस आर्ट को सीख जाते हैं तो कोई भी डर आपको आपकी ड्रीम लाइफ तक पहुंचने से रोक नहीं सकता चैप्टर थ्री द रिस्क लैडर क्या आपने कभी सोचा है कि एक ही जैसी सिचुएशन में कुछ लोग बिना किसी डर के आगे बढ़ जाते हैं जबकि कुछ लोग घबराकर पीछे हट जाते हैं मान लीजिए कि दो दोस्त एक साथ एक ऊंची चट्टान पर खड़े हैं उनमें से एक तुरंत नीचे छलांग लगाने को तैयार हो जाता है जबकि दूसरा असहज महसूस करता है और पीछे हट जाता है या फिर दो एंटरप्रेन्योर कर परेशान हो जाता है आखिर

13:13 ऐसा क्यों होता है हर इंसान का रिस्क टेकिंग लेवल अलग-अलग होता है यह कोई फिक्स्ड चीज नहीं है बल्कि यह एक सीढ़ी लैडर की तरह काम करता है यानी जब भी हम कोई रिस्क लेते हैं और उसमें सक्सेस होते हैं तो हमारा दिमाग अगले बड़े रिस्क के लिए तैयार हो जाता है लेकिन जब हम बार-बार रिस्क से बचते हैं तो हमारा कॉन्फिडेंस कम होने लगता है और धीरे-धीरे हम छोटे-छोटे फैसलों में भी डर महसूस करने लगते हैं सोचिए कि एक बच्चा पहली बार साइकिल चलाने की कोशिश कर रहा है पहले वह डगमगा आता है गिरता है लेकिन धीरे-धीरे बैलेंस बनाना सीखता है जब वह एक बार बिना गिरने के थोड़ी दूर तक चला लेता है तो उसका कॉन्फिडेंस बढ़ जाता है फिर वह तेज चलाने

14:01 की कोशिश करता है और कुछ ही दिनों में वह बिना किसी डर के पूरी गली में घूमने लगता है यही रिस्क लैडर है छोटे-छोटे रिस्क लेकर हम बड़े रिस्क के लिए तैयार होते जाते हैं लेकिन अगर वह बच्चा शुरू में ही गिरने के डर से साइकिल चलाना छोड़ दे तो वह कभी सीख ही नहीं पाएगा अब इसे असली जिंदगी में अप्लाई करें मान लीजिए कि आपको पब्लिक स्पीकिंग का डर है अगर आप सोचते हैं कि आप एक दिन सीधे हजारों लोगों के सामने बिना घबराए बोल पाएंगे तो यह असंभव लगेगा लेकिन अगर आप छोटे स्टेप्स ले पहले दोस्तों के सामने बोले फिर छोटे ग्रुप में फिर किसी मीटिंग में तो धीरे-धीरे आपका कॉन्फिडेंस बढ़ेगा और आप अपने फियर को ओवरकम कर लेंगे दुनिया के सबसे बड़े रिस्क

14:49 टेकर्स ने भी इसी सीढ़ी को चढ़कर ऊंचाई हासिल की है कोई भी इंसान एक ही दिन में एक्सट्रीम रिस्क टेकर नहीं बनता हर बड़ा डिसीजन हर बड़ा एडवेंचर हर बड़ी सफलता छोटे-छोटे रिस्क से शुरू होती है यही कारण है कि कुछ लोग हाई रिस्क सिचुएशंस को भी बड़ी आसानी से हैंडल कर लेते हैं क्योंकि उन्होंने अपनी रिस्क टेकिंग क्षमता को धीरे-धीरे डेवलप किया है इस चैप्टर की सबसे बड़ी सीख यह है कि अगर आप अपनी जिंदगी में रिस्क लेने से डरते हैं तो आपको एकदम से कोई बड़ा रिस्क लेने की जरूरत नहीं है आपको बस अपनी रिस्क लैडर पर एक स्टेप ऊपर चढ़ने की जरूरत है छोटे-छोटे चैलेंज को एक्सेप्ट कीजिए अपनी कंफर्ट जोन

15:35 से बाहर आइए और धीरे-धीरे अपने डर को पीछे छोड़ दीजिए क्योंकि अगर आप हमेशा सेफ जोन में रहेंगे तो आपकी जिंदगी कभी नहीं बदलेगी लेकिन अगर आप अपनी रिस्क टेकिंग क्षमता को धीरे-धीरे बिल्ड करेंगे तो आप वह हासिल कर सकते हैं जो आज आपको असंभव लगता है रिस्क एक सीढ़ी की तरह है छोटे कदम आपको ऊंचाई तक ले जा सकते हैं सवाल यह है कि क्या आप इस सीढ़ी पर पहला कदम रखने के लिए तैयार हैं चैप्टर फोर ट्रेनिंग फॉर रिस्क क्या रिस्क लेना एक टैलेंट है जो कुछ लोगों को जन्म से मिलता है या फिर यह एक स्किल है जिसे सीखा और डेवलप किया जा सकता है यह सवाल बहुत जरूरी है क्योंकि जब भी हम किसी रिस्क टेकर को देखते हैं चाहे

16:22 वह कोई हाई स्टेक्स एंटरप्रेन्र्दे हमें लगता है कि उनके अंदर कोई सुपर पावर है जो उन्हें बिना डर के बड़े फैसले लेने की क्षमता देती है लेकिन सच्चाई कुछ और ही है रिस्क टेकिंग कोई जादू नहीं है बल्कि यह एक स्किल है जिसे आप सही ट्रेनिंग के जरिए सीख सकते हैं जब हम रिस्क लेने की बात करते हैं तो यह सिर्फ लक या नेचुरल बोल्डनेस पर निर्भर नहीं करता बल्कि यह इस बात पर निर्भर करता है कि हमने खुद को उस सिचुएशन के लिए कितना तैयार किया है यानी रिस्क लेना कोई कॉइन नहीं है बल्कि यह एक कैलकुलेटेड प्रोसेस है जिसे आप अपने दिमाग और शरीर को ट्रेन करके इंप्रूव कर सकते हैं अब सोचिए जब कोई फायरफाइटर जलते हुए

17:09 घर में जाता है तो क्या वह बिना सोचे समझे अंदर कूद जाता है नहीं वह जानता है कि आग कैसे फैलती है उसे पता होता है कि कहां जाना है और किस तरह से खतरे को कम करना है उसने ट्रेनिंग ली होती है बार-बार ड्रिल्स की होती है जिससे उसका दिमाग सही समय पर सही डिसीजन लेने के लिए तैयार हो जाता है यही ट्रेनिंग फॉर रिस्क है अपने दिमाग और शरीर को इस तरह तैयार करना कि जब कोई हाई स्टेक्स सिचुएशन आए तो आप बिना घबराए सही फैसला ले सकें अगर आप किसी नए बिजनेस में इन्वेस्ट करना चाहते हैं तो क्या आप बिना रिसर्च किए करोड़ों रुपए लगा देंगे बिल्कुल नहीं पहले आप मार्केट को स्टडी करेंगे डेटा एनालाइज करेंगे एक्सपर्ट से

17:57 बात करेंगे और फिर एक कैलकुलेटेड रिस्क लेंगे यही रिस्क टेकिंग का असली फार्मूला है सही तैयारी सही नॉलेज और सही एग्जीक्यूशन रिस्क टेकिंग को इंप्रूव करने के लिए सबसे जरूरी चीज है एक्सपोजर यानी अगर आप किसी चीज से डरते हैं तो आपको बार-बार खुद को उस सिचुएशन में डालना होगा ताकि आपका दिमाग उस चीज को नॉर्मल मानने लगे जब कोई नेवी सील सैनिक पहली बार पानी के अंदर सांस रोकने की ट्रेनिंग करता है तो वह घबरा जाता है लेकिन बार-बार ट्रेनिंग करने के बाद उसका दिमाग उस स्थिति को सामान्य नॉर्मल मानने लगता है और वह बिना घबराए मिशन पूरा कर सकता है यही कांसेप्ट हर तरह के रिस्क टेकिंग पर

18:44 लागू होता है रिस्क टेकिंग को इंप्रूव करने के लिए दूसरी जरूरी चीज है सिमुलेशन यानी आप असली रिस्क लेने से पहले उसकी प्रैक्टिस कर सकते हैं पायलट हजारों फीट की ऊंचाई पर प्लेन उड़ाने से पहले फ्लाइट लेटर में प्रैक्टिस करते हैं डॉक्टर सर्जरी करने से पहले वर्चुअल रियलिटी ट्रेनिंग लेते हैं और एथलीट्स बार-बार अपनी परफॉर्मेंस को टेस्ट करते हैं जब आपका दिमाग पहले से ही एक सिचुएशन को कई बार एक्सपीरियंस कर चुका होता है तो असली रिस्क लेने का डर बहुत कम हो जाता है अब सवाल यह है कि क्या कोई भी इंसान खुद को एक स्मार्ट रिस्क टेकर बना सकता है कैट सुकल कहती हैं हां बिल्कुल अगर आप खुद को सही ट्रेनिंग और सही

19:30 एक्सपोजर देते हैं तो आप अपने कंफर्ट जोन से बाहर आ सकते हैं और बेहतर डिसीजंस ले सकते हैं हर बड़ा रिस्क टेकर पहले छोटे-छोटे स्टेप्स लेकर खुद को तैयार करता है और यही सबसे बड़ा सीक्रेट है इस चैप्टर की सबसे बड़ी सीख यह है कि रिस्क टेकिंग कोई मैजिक पावर नहीं बल्कि एक सीखी जाने वाली स्किल है अगर आप सही ट्रेनिंग लेते हैं सही माइंडसेट डेवलप करते हैं और धीरे-धीरे खुद को एक्सपो देते हैं तो आप भी उन लोगों में शामिल हो सकते हैं जो बड़े से बड़ा रिस्क स्मार्ट तरीके से लेते हैं और अपनी जिंदगी में बड़ी सफलता हासिल करते हैं तो अब सवाल यह है क्या आप खुद को अगले रिस्क के लिए ट्रेन करने के लिए तैयार हैं चैप्टर फाइव द पावर ऑफ

20:16 इंट क्या आपको कभी ऐसा महसूस हुआ है कि कोई बड़ा फैसला लेने से पहले आपके अंदर से एक आवाज आई हो यही सही है यही करो या फिर कोई सिचुएशन देखकर आपको अचानक एहसास हुआ हो कि यहां कुछ गलत है मुझे इससे दूर रहना चाहिए यह जो अंदर से आने वाली आवाज होती है जिसे हम अक्सर सिक्त सेंस या गट फीलिंग कहते हैं इसे ही इंटू कहते हैं और क्या आप जानते हैं कि दुनिया के सबसे बड़े रिस्क टेकर्स अपने डिसीजंस लेने में इसी इंटू पर सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं इंटू कोई जादू या रहस्य नहीं है बल्कि यह हमारे दिमाग का एक बेहद शक्तिशाली डिसीजन मेकिंग टूल है जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं इंटू

21:02 हमें वह चीजें महसूस करने की शक्ति देता है जो हमारे कॉन्शियस माइंड के लिए तुरंत समझ पाना मुश्किल होता है जब कोई अनुभवी डॉक्टर बिना किसी टेस्ट के ही मरीज की बीमारी का अंदाजा लगा लेता है जब कोई इन्वेस्टर बिना ज्यादा डाटा देखे किसी बड़ी कंपनी में इन्वेस्ट कर देता है या जब कोई सोल्जर किसी अनजान खतरे को पहले ही भांप लेता है तो यह सब इंटू की ताकत है अब सवाल यह उठता है कि यह इंटू काम कैसे करता है जब हम कोई भी नया एक्सपीरियंस लेते हैं तो हमारा दिमाग उस एक्सपीरियंस को अपने अंदर स्टोर कर लेता है यह स्टोर की गई जानकारियां और पैटर्स हमारे अनकॉन्शियस माइंड में जमा होती रहती हैं जब हम किसी रिस्की सिचुएशन में होते हैं तो हमारा

21:48 दिमाग तेजी से इन पास्ट एक्सपीरियंस को स्कैन करता है और बिना किसी लॉजिकल एनालिसिस के हमें एक सिग्नल भेजता है यह सही है या यह गलत है यही इंटू है इसे समझने के लिए एक बहुत ही साधारण उदाहरण लेते हैं मान लीजिए कि आप किसी नए शहर में घूमने गए हैं और आपको दो रास्ते दिखते हैं एक रास्ता साफ सुथरा और रोशन है जबकि दूसरा रास्ता अंधेरा और सुनसान बिना ज्यादा सोचे ही आपका मन कहेगा कि पहला रास्ता ज्यादा सेफ है क्यों क्योंकि आपके दिमाग ने आपके पास्ट एक्सपीरियंस और बचपन से सुनी गई कहानियों को मिलाकर एक पैटर्न बना लिया है कि सुनसान और अंधेरे रास्ते खतरनाक हो सकते हैं यही इंटू है रिस्क टेकिंग के मामले में भी यही होता है जब

22:35 कोई प्रोफेशनल पोकर प्लेयर बिना अपोनेंट के कार्ड्स देखे ही अंदाजा लगा लेता है कि सामने वाले के पास अच्छा हाथ है या नहीं जब कोई स्टॉक मार्केट ट्रेडर किसी कंपनी के शेयर के बढ़ने या गिरने का सही अनुमान लगा लेता है या जब कोई एथलीट बिना सोचे समझे सही डिसीजन ले लेता है तो यह सब उनके सालों के अनुभव से आने वाली इंटू के कारण होता है यानी जितना ज्यादा आप किसी चीज में एक्सपीरियंस लेंगे उतनी ही तेज आपकी इंटू बनेगी लेकिन एक दिलचस्प बात यह है कि इंटू हमेशा सही नहीं होती कभी-कभी हमारा दिमाग पास्ट एक्सपीरियंस की वजह से गलत पैटर्स बना लेता है और हम गलत फैसले भी ले सकते हैं इसलिए काइट सुखल बताती हैं कि इंटू को शार्पन करने के लिए दो चीजें

23:22 जरूरी है पहला ज्यादा से ज्यादा एक्सपीरियंस लेना और दूसरा अपने इंटू को डाटा और लॉजिक से क्रॉस चेक करना इसका मतलब यह है कि आपको ब्लाइंड सिर्फ इंटू पर भरोसा नहीं करना चाहिए बल्कि उसे लॉजिकल थिंकिंग के साथ बैलेंस करना चाहिए रिस्क टेकिंग में इंटू का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि यह हमें तेज डिसीजन लेने में मदद करता है जब हमारे पास ज्यादा सोचने का समय नहीं होता जब हमें तुरंत कोई एक्शन लेना होता है तब हमारा कॉन्शियस माइंड इतनी तेजी से प्रोसे नहीं कर सकता लेकिन हमारा इंटूटिव माइंड पहले से ही तैयार होता है यही कारण है कि एक्सपीरियंस्ड लोग ज्यादा तेज और सही फैसले ले पाते हैं

24:09 क्योंकि उनकी इंटू पहले से शार्प होती है इस चैप्टर की सबसे बड़ी सीख यह है कि इंटू एक सुपर पावर की तरह काम कर सकती है लेकिन इसे डेवलप करने की जरूरत होती है जितना ज्यादा आप खुद को न्यू एक्सपीरियंस में डालेंगे जितना ज्यादा आप अपने पास्ट मिस्टेक से सीखेंगे उतनी ही बेहतर आपकी इंटूटिव पावर बनेगी और जब आपकी इंटू स्ट्रांग हो जाएगी तब आप किसी भी रिस्की सिचुएशन में तेज और सही डिसीजन ले पाएंगे तो सवाल यह है क्या आप अपनी इंटू की पावर को अनलॉक करने के लिए तैयार हैं चैप्टर सिक्स द रिस्क टेकिंग पर्सनालिटी क्या कभी आपने सोचा है कि कुछ लोग किसी भी सिचुएशन में रिस्क लेने के लिए तैयार रहते हैं जबकि कुछ लोग जरा सा भी रिस्क लेने से

24:55 बचते हैं कुछ लोग ऊंचाई से छलांग लगाने तेज रफ्तार में बाइक चलाने या नए बिजनेस में करोड़ों लगाने से नहीं घबराते जबकि कुछ लोग छोटी-छोटी चीजों में भी हजार बार सोचते हैं आखिर ऐसा क्यों होता है क्या रिस्क टेकिंग एक आदत है एक सीखी जाने वाली स्किल है या फिर यह पर्सनालिटी का हिस्सा है रिस्क टेकिंग कोई एक जैसा बिहेवियर नहीं है बल्कि यह हमारी पर्सनालिटी का हिस्सा होता है यानी हर इंसान में रिस्क लेने की क्षमता अलग-अलग हो होती है और यह बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि हमारा दिमाग किस तरह से बना है जब हम रिस्क टेकिंग की बात करते हैं तो यह सिर्फ एक चॉइस नहीं होती बल्कि यह हमारी

25:41 बायोलॉजी साइकोलॉजी और पास्ट एक्सपीरियंस से जुड़ी होती है कुछ लोगों के दिमाग में डोपामिन सिस्टम बहुत एक्टिव होता है जो उन्हें थ्रिल और एक्साइटमेंट की तरफ खींचता है यही कारण है कि कुछ लोग एडवेंचर स्पोर्ट्स गैंबलिंग और हाई स्टेक्स बिजनेस में ज्यादा दिल दिलचस्पी लेते हैं उनका दिमाग उन्हें लगातार नयापन खोजने के लिए प्रेरित करता है वहीं कुछ लोगों का दिमाग ज्यादा कॉशस होता है जो उन्हें हर रिस्क को एनालाइज करने और सेफ रहने के लिए कहता है रिस्क टेकिंग पर्सनालिटी को तीन अलग-अलग कैटेगरी में बांटा जा सकता है कुछ लोग नेचुरली हाई रिस्क टेकर्स होते हैं कुछ मॉडरेट रिस्क टेकर्स होते हैं और कुछ लोग लो रिस्क टेकर्स होते हैं हाई रिस्क

26:27 टेकर्स वे होते हैं जो किसी भी नई चुनौती को लेकर एक्साइटेड हो जाते हैं उन्हें लगातार नयापन चाहिए होता है और वे अनिश्चितता उं अनसर्टेनटीज को एक्सेप्ट करना जानते हैं मॉडरेट रिस्क टेकर्स वे होते हैं जो कैलकुलेटेड रिस्क लेते हैं यानी वे सोच समझकर फैसले लेते हैं लेकिन जरूरत पड़ने पर बड़े कदम उठाने से पीछे नहीं हटते लो रिस्क टेकर्स वे होते हैं जो स्टेबिलिटी को प्राथमिकता देते हैं हर स्थिति में सेफ रहना चाहते हैं और और अनिश्चितता हों से बचते हैं अब सवाल यह उठता है कि क्या रिस्क टेकिंग पर्सनालिटी को बदला जा सकता है केट सुकल कहती हैं कि हां यह संभव है रिस्क टेकिंग कोई फिक्स्ड ट्रेट नहीं है बल्कि यह हमारी हैबिट्स

27:13 एनवायरमेंट और एक्सपीरियंस से प्रभावित होती है अगर कोई लो रिस्क टेकर है तो वह धीरे-धीरे अपनी रिस्क टेकिंग क्षमता को बढ़ा सकता है जब हम खुद को छोटी-छोटी रिस्की सिचुएशंस में डालते हैं और और उन्हें सफलता पूर्वक हैंडल करते हैं तो हमारा दिमाग रिस्क टेकिंग को नॉर्मल मानने लगता है इसी तरह हाई रिस्क टेकर्स को यह सीखने की जरूरत होती है कि वे कब और कितना रिस्क ले ताकि वे अननेसेसरी लॉस से बच सके रिस्क टेकिंग पर्सनालिटी को समझने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि आप अपनी स्ट्रेंथ और वीकनेसेस को पहचान सकते हैं अगर आप नेचुरली रिस्क अवर्स हैं तो आप अपनी कंफर्ट जोन से बाहर निक कर खुद को चैलेंज

27:59 में डाल सकते हैं और अगर आप बहुत ज्यादा रिस्क टेकिंग हैं तो आप खुद को कंट्रोल करके ज्यादा कैलकुलेटेड और थॉटफुल डिसीजंस ले सकते हैं इस चैप्टर की सबसे बड़ी सीख यह है कि रिस्क टेकिंग पर्सनालिटी कोई स्थाई चीज नहीं है अगर आप चाहे तो आप अपने माइंड सेट को बदल सकते हैं अपने कंफर्ट जोन को एक्सपेंड कर सकते हैं और अपने डिसीजंस को बैलेंस कर सकते हैं असली सक्सेस उन्हीं लोगों को मिलती है जो अपने नेचर को समझकर खुद को इंप्रूव करने की कोशिश करते हैं तो सवाल यह है क्या आप अपनी रिस्क टेकिंग क्षमता को समझने और बेहतर बनाने के लिए तैयार हैं कंक्लूजन रिस्क एक ऐसा शब्द जो कुछ लोगों के लिए एक्साइटमेंट लाता है और कुछ के लिए डर लेकिन रिस्क टेकिंग कोई रैंडम एक्ट नहीं

28:46 बल्कि एक सीखी जाने वाली स्किल है यह हमारे दिमाग की हार्ड वायरिंग हमारे एक्सपीरियंस और हमारी पर्सनालिटी से जुड़ा हुआ है इस किताब में हमने जाना कि कैसे हमारा ब्रेन रि को प्रोसेस करता है कैसे फियर को मैनेज किया जा सकता है और कैसे छोटी-छोटी कैलकुलेटेड रिस्क हमें बड़ी सक्सेस तक ले जा सकती हैं द आर्ट ऑफ रिस्क हमें यह सिखाती है कि कोई भी इंसान एक स्मार्ट रिस्क टेकर बन सकता है अगर वह सही माइंडसेट और सही ट्रेनिंग अपनाए दुनिया के सबसे बड़े एंटरप्रेन्र्दे किया अपनी रिस्क टेकिंग स्किल्स को डेवलप किया और अपने कंफर्ट जोन से बाहर निकलकर बड़े डिसीजंस लिए उन्होंने ना सिर्फ अपने

29:32 डर पर काबू पाया बल्कि रिस्क को एक अपॉर्चुनिटी की तरह देखा इस किताब की सबसे बड़ी सीख यही है कि रिस्क टेकिंग कोई कॉइन टॉस नहीं है यह एक आर्ट है इसे आप जितना ज्यादा समझेंगे और प्रैक्टिस करेंगे उतना ही ज्यादा आप अपनी जिंदगी में बोल्ड और मीनिंगफुल डिसीजंस ले पाएंगे चाहे आप करियर में आगे बढ़ना चाहते हो कोई नया बिजनेस शुरू करना चाहते हो या अपनी जि जिंदगी के किसी भी क्षेत्र में बड़ा कदम उठाना चाहते हो रिस्क से भागने के बजाय उसे समझना और अपनाना जरूरी है अगर आपको यह किताब पसंद आई और इससे आपको कुछ नया सीखने को मिला तो इसे अपनी जिंदगी में अप्लाई करने की कोशिश जरूर करें रिस्क टेकिंग ही वह ब्रिज है जो आपको एक ऑर्डिनरी लाइफ से

30:18 एक्स्ट्राऑर्डिनरी सक्सेस तक ले जाता है तो अगली बार जब आपके सामने कोई बड़ा डिसीजन आए तो खुद से पूछें क्या यह रिस्क लेने लायक है और अगर हां तो मैं इसे स्मार्ट तरीके से कैसे ले सकता हूं अगर आपको यह वीडियो पसंद आया तो इसे लाइक और शेयर करना ना भूलें बुक पीडिया चैनल को सब्सक्राइब करें और बेल आइकॉन दबाएं ताकि आपको इसी तरह की और भी पावरफुल बुक सरीज मिलती रहे आप हमें कमेंट्स में बताइए कि यह किताब आपको कैसी लगी और कौन सी अगली किताब की समरी आप देखना चाहते हैं मिलते हैं अगले वीडियो में एक नई किताब एक नई सीख और एक नए माइंड सेट के साथ कीप लर्निंग कीप ग्रोइंग

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