Insight: ज्ञान भारतम- भारत का अनमोल उपहार। Repository of Manuscripts | 16 September, 2025

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संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो "ज्ञान भारतम: भारत का विश्व को अनमोल उपहार" नामक एक पहल पर केंद्रित है, जिसका उद्देश्य भारत की पांडुलिपि धरोहर का संरक्षण, डिजिटलीकरण और प्रसार करना है। इसमें संस्कृति मंत्रालय द्वारा आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का विवरण है, जिसमें विद्वानों, विशेषज्ञों और युवाओं ने भाग लिया। मुख्य विचार हैं पांडुलिपियों का महत्व, उनका संरक्षण, विदेशों से उन्हें वापस लाने के प्रयास, और इस ज्ञान को भविष्य की पीढ़ी तक पहुंचाना।

  • ज्ञान भारतम पहल का उद्देश्य भारत की पांडुलिपि धरोहर का संरक्षण और प्रसार करना है।
  • सम्मेलन में युवाओं की भागीदारी पर विशेष जोर दिया गया, ताकि वे इस ज्ञान को आगे बढ़ा सकें।
  • भारत की पांडुलिपियाँ न केवल ऐतिहासिक दस्तावेज हैं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और ज्ञान परंपरा का प्रतीक हैं।

ज्ञान भारतम पहल की शुरुआत

संस्कृति मंत्रालय ने ज्ञान भारतम नामक एक राष्ट्रीय पहल शुरू की है, जो भारत की पांडुलिपि धरोहर के संरक्षण, डिजिटलीकरण और प्रसार के लिए समर्पित है। इस अवसर पर, मंत्रालय ने नई दिल्ली में विज्ञान भवन में 11 से 13 सितंबर 2025 तक पांडुलिपि विरासत के माध्यम से भारत की ज्ञान विरासत को पुनः प्राप्त करने पर पहला ज्ञान भारतम अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया। इस सम्मेलन में भारत और विदेश के विद्वानों, विशेषज्ञों, संस्थानों और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं सहित 1100 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया।

प्रधानमंत्री का संबोधन और युवाओं की भागीदारी

13 सितंबर को संस्कृति मंत्री की अध्यक्षता में गहन मंत्रणा के साथ समापन सत्र पूरा हुआ। इस सम्मेलन में 12 सितंबर को प्रधानमंत्री ने भी भाग लिया और उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए एक नया विचार प्रेषित किया। प्रधानमंत्री ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि यह धरोहर उनके लिए है और वे इसमें सहभागी हैं, जो भारत का भविष्य बनाएगा। सम्मेलन में लगभग 65 से 70% प्रतिभागी युवा थे, जिन्होंने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

पांडुलिपियों का संग्रह और पुनर्जीवन

भारत के पास लगभग एक करोड़ पांडुलिपियों का विश्व का सबसे बड़ा संग्रह है, लेकिन लाखों पांडुलिपियाँ नष्ट हो गई हैं, चुरा ली गई हैं या लुप्त हो गई हैं। ज्ञान भारतम परियोजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि सर्वे करके यह पता लगाया जाए कि वास्तव में कितनी पांडुलिपियाँ हैं, क्योंकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह संख्या 1 करोड़ से अधिक भी हो सकती है। यह परियोजना देश के कोने-कोने में मौजूद पांडुलिपियों का डेटा एकत्र करने का प्रयास करेगी।

विदेशी संग्रहों में भारतीय पांडुलिपियाँ

कई भारतीय पांडुलिपियाँ विदेशों में हैं और उन तक पहुंचना मुश्किल है। कुछ विद्वानों ने अपने अनुभव साझा किए कि कैसे अभिज्ञान शाकुंतलम की एक मात्रिका देखने के लिए उन्हें 800 पाउंड खर्च करने पड़े। कई वैष्णव संप्रदाय के ग्रंथ यूएस चले गए हैं, लेकिन उन तक पहुंचना संभव नहीं है। एक विद्वान ने प्रधानमंत्री से निवेदन किया कि वे इन संपदाओं को वापस लाने में मदद करें, जिसे उन्होंने स्वीकार किया। गुलामी के काल में बहुत सारी पांडुलिपियाँ लंदन, फ्रांस और जर्मनी चली गईं, जिसके कारण अब उनके विशेषज्ञ तैयार करना भी मुश्किल हो रहा है।

लिपियों का अध्ययन और संरक्षण

पांडुलिपि की धरोहर को डिजिटाइज करना और उसका सर्वे करना एक हिस्सा है, लेकिन उससे बड़ा हिस्सा यह है कि ऐसे विशेषज्ञ तैयार करना जो इन पांडुलिपियों को पढ़ सकें। भारत में कम से कम 40 से ज्यादा लिपियों में पांडुलिपियाँ लिखी गई हैं, जिन्हें डिसाइफर करना एक बहुत बड़ा काम है। ज्ञान भारतम सम्मेलन में एक महत्वपूर्ण सत्र उन लिपियों पर था, जिन्हें डिसाइफरमेंट की चुनौती है, जैसे सरस्वती सिंधु सभ्यता की लिपि।

भारत की अखंड सांस्कृतिक विरासत

भारत का अस्तित्व आज का नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक रूप में और विश्व गुरु के रूप में एक ज्ञान के स्रोत के रूप में हमेशा से रहा है। कश्मीर से निकलने वाली पांडुलिपियाँ केरल में मिलती हैं और केरल में लिखे गए भास नाटक कश्मीर में मिलते हैं, जो यह दर्शाता है कि भारत एक अखंड सांस्कृतिक भारत हमेशा रहा है। धर्म और आध्यात्म ने हमेशा भारत की सीमाओं को जोड़ा है।

वैश्विक स्तर पर भारतीय संस्कृति का प्रभाव

भारत का धर्म, सनातन धर्म, हमेशा से वैश्विक रहा है। वेदों का दर्शन पूरी मानव जाति के लिए है। अलग-अलग देशों में खुदाई के दौरान भारतीय पांडुलिपियाँ और सिक्के मिलते हैं, जो यह प्रदर्शित करते हैं कि एक समय था जब भारत की संस्कृति और ज्ञान परंपरा पूरे विश्व में फैली हुई थी। वेद में अग्नि की उपासना का उल्लेख है, जो ईरान और रूस में भी पाई जाती है। महाभारत में अनेक राष्ट्रों का उल्लेख है जो आज हमारे साथ नहीं हैं।

पांडुलिपियों का महत्व और षड्यंत्र

हमारी पांडुलिपियाँ उन सारी बातों का प्रमाण हैं जो हम भारत के बारे में बोलते हैं। गणित के कई प्रमुख सिद्धांत बक्शाली मैनुस्क्रिप्ट्स में हैं, जो लंदन म्यूजियम में है, लेकिन लंदन म्यूजियम उसे ना दे रहा है ना दिखा रहा है, क्योंकि वे भयभीत हैं कि इससे भारत की प्राचीनता सिद्ध हो जाएगी। ज्ञान भारतम योजना के माध्यम से हम पांडुलिपियों के ज्ञान को विश्व के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे सारे तथ्यों का वैलिडेशन हो रहा है।

राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन और चुनौतियाँ

राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन एक बड़ा केंद्र है, और ज्ञान भारतम एक बड़ा प्रकल्प है जिसमें सभी उत्साहित समाहित हैं। देश भर में लगभग 100 संस्थाएं हैं जो पांडुलिपियों का संरक्षण और संवर्धन कर रही हैं। इन सभी को जोड़ने के प्रयास में चुनौती यह है कि यह धरोहर अमूल्य है, और जो इसे साझा करेंगे, उन्हें क्या मिलेगा। इस सम्मेलन में इस बात पर सहमति बनी कि यह सब हमारी साझा धरोहर है और जब तक सब मिलकर प्रयास नहीं करेंगे, हम इस काम को नहीं कर सकते।

डिजिटल रिपॉजिटरी और आर्थिक सहायता

एक बहुत बड़ा डिजिटल प्लेटफार्म बनाया जा रहा है, जिसमें देश की सारी पांडुलिपि संपदा होगी। जिन संस्थाओं ने इसमें सहयोग दिया है, उन्हें आर्थिक हानि ना हो, इसके लिए अगर कोई डाउनलोड करता है तो उसका शुल्क उस संस्था को जाएगा। भारत सरकार उनकी मदद करेगी ताकि वे अपना काम भी करते रहें और इस डिजिटल रिपॉजिटरी को भी अच्छी तरह से चलाते रहें।

संकल्प और भविष्य की दिशा

विकसित भारत के निर्माण में हमारी ज्ञान संपदा का विनियोग करना हमारा लक्ष्य है। अंतिम दिन में एक संकल्प पत्र बनाया गया, जिसे दिल्ली डिक्लेरेशन के नाम से जाना जाएगा। इस संकल्प पत्र में यह कहा गया है कि इस धरोहर को विकसित भारत निर्माण के लिए हम विनियोग करेंगे और इसमें प्रतिबद्ध रहेंगे: "सेव एंड शेयर"।

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Transcript

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0:00 [संगीत] नमस्ते संसद टीवी में आपका स्वागत है। मैं हूं प्रतिबिंब शर्मा और आप देख रहे हैं इनसाइट और इनसाइट में आज हम बात करेंगे ज्ञान भारतम भारत का विश्व को अनमोल उपहार की। [संगीत] संस्कृति मंत्रालय ने ज्ञान भारतम नामक एक ऐतिहासिक राष्ट्रीय पहल शुरू की है जो

0:47 भारत की पांडुलिपि धरोहर के संरक्षण और उसके डिजिटलीकरण और प्रसार के लिए समर्पित है। इस अवसर पर मंत्रालय की ओर से नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में 11 से 13 सितंबर 2025 तक पांडुलिपि विरासत के माध्यम से भारत की ज्ञान विरासत को पुनः प्राप्त करने पर पहला ज्ञान भारतम अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया। भारत और विदेश के विद्वानों, विशेषज्ञों, संस्थानों और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं सहित 1100 से अधिक प्रतिभागियों को एक साथ लाकर इस सम्मेलन ने चर्चा विचार विमर्श और भारत की पांडुलिपि संपदा के संरक्षण, डिजिटलीकरण और इसे दुनिया के साथ साझा करने की दिशा के लिए मार्ग प्रशस्त करने

1:32 में सहयोगी मंच तैयार किया। 13 सितंबर को भारत के संस्कृति मंत्री की अध्यक्षता में गहन मंत्रणा के साथ समापन सत्र पूरा हुआ। तीनों दिन तक चले इस सम्मेलन में 12 सितंबर को प्रधानमंत्री ने भी भाग लिया। उन्होंने कार्य समूहों की प्रस्तुति में भाग लिया और उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए एक नया ही विचार प्रेषित किया। भारत की ज्ञान विरासत को पुनः प्राप्त करने की दिशा में उठाए गए महत्वपूर्ण कदम के बारे में बात करेंगे दो विशेषज्ञों से जो इस मंच पर विराजमान थे। प्रोफेसर श्रीनिवास वाराखेड़ी कुलपति केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय हमारे साथ मौजूद है। आपका स्वागत है। डॉक्टर सच्चिदानंद जोशी हैं सदस्य सचिव इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के। आपका भी

2:19 बहुत-बहुत स्वागत है। ज्ञान भारतम मिशन भारत की संस्कृति साहित्य और चेतना की आवाज बनने के लिए तैयार है। प्रधानमंत्री ने यह कहा और आप दोनों भी वहां पर एक बहुत ही प्रमुख आवाज बनकर उस पूरे कार्यक्रम में शामिल थे। क्या माना जाए प्रधानमंत्री के इस वक्तव्य को? देखिए अभी तक हमारे देश में जो हमारी पांडुलिपि धरोहर है उसकी साज संभाल और उसके बारे में चेतना सामाजिक जागृति इस संबंध में कहीं बहुत अधिक प्रयास ऐसे ठोस प्रयास किए नहीं गए। इसके पहले एक नेशनल मैनुस्क्रिप्ट मिशन था और उसने कुछ काम भी किया। लेकिन एक इतने बड़े पैमाने पर लोगों के अंदर जागृति फैलाना क्योंकि माननीय प्रधानमंत्री जी ने यह भी कहा कि यह जो हमारी पांडुलिपियां हैं ये सिर्फ कोई ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं है। वो

3:04 हमारी भारत की विरासत और सभ्यता की एक तरह से वंशावली है। एक प्रतीक है। तो एक बहुत बड़ा यह अभियान था और मुझे निश्चित तौर पर लगता है कि माननीय प्रधानमंत्री जी ने जिस तरह से उस सम्मेलन को संबोधित किया जितनी ऊर्जा और जितनी शिद्दत से उसमें अपनी बात रखी है ये एक बहुत बड़ा संदेश पूरे देशवासियों के लिए अपनी पांडुलिपि संपदा की तरफ ध्यान देने के लिए और अपनी जो ज्ञान परंपरा की जो धरोहर है उसको संजो कर रखने के लिए है। श्रीनिवास जी ये हम लोग तो मानते हैं कि हम प्राचीन सभ्यता हैं लेकिन क्या दुनिया में फिर से स्थापित करने के लिए यह जो मिशन है वो सहयोगी हो सकता है इसलिए भी इस पर प्रधानमंत्री का भी जोर रहा संस्कृति मंत्री का भी और

3:52 संस्कृति से जुड़े हुए आप जैसे दिग्गजों का भी >> हमारे प्राचीन धरोहर की जो संपदा है वो अतीत का केवल विषय नहीं रहा है क्योंकि यह भविष्य निर्माण करने के लिए बहुत बड़ी संपदा का प्रयोजन होता है। मैं मानता हूं इस संपदा में भारत का भविष्य है केवल भूत नहीं है। केवल गत नहीं है। इस दृष्टि से इसको एस्पिरेशनल हम मानते हैं। पर माननीय प्रधानमंत्री जी ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा यह आपके लिए है। आप इसमें सहभागी हैं इसलिए भविष्य बनाएगा भारत का। >> जी हां। तो मैंने ये भी देख सुना भी कि वहां पर तकरीबन जो प्रतिभागी थे उसमें

4:38 ज्यादातर संख्या और तकरीबन 65 से 70% प्रतिशत की जो संख्या थी वो युवाओं की थी। जिस भविष्य की आप बात कर रहे हैं। >> जरूर प्रधानमंत्री जी ने अपने वक्तव्य में उसका उल्लेख भी किया। हमने भी तीन दिन लगातार मैं उस सम्मेलन में भागीदारी जब ली मेरे संवाद युवाओं के साथ ही रहा। जो विशेषज्ञ थे वह अनेक प्रोफेसर आए थे। अनेक संस्थाओं के नेतृत्व करने वाले आए थे और धार्मिक संस्थानों के थे। लेकिन जो टेक्नोलॉजी के साथ और नए उम्मीद के साथ 70% संख्या के युवा लोग भाग लिए थे। सभी लोगों का इतनी उत्सुकता थी। अंतिम दिन तक सभी

5:23 सत्र में उनका भागीदारी रहा और वो आगे क्या करना है इस दृष्टि में वो जिज्ञासा भी रही। तकरीबन एक करोड़ पांडुलिपियों का विश्व का सबसे बड़ा संग्रह माना जाता है भारत के पास है। जबकि माना ये भी जाता है कि लाखों करोड़ों पांडुलिपियां जो हैं वो नष्ट हो गई हैं। चुरा ली गई हैं या लुप्त भी हो गई हैं। उनको सबको फिर से पुनर्जीवित करने का भी एक प्रयास माना जा सकता है। इससे >> जी इसमें दरअसल क्या हुआ है? ये एक करोड़ का आंकड़ा आज से कुछ साल पहले एक अंदाज जब लगाया गया कि लगभग 1 करोड़ मैनुस्क्रिप्ट्स होंगी। लेकिन अभी तक कभी इसके बारे में कोई व्यापक जन अभियान छेड़कर सर्वे करने की बात नहीं हुई है। यह जो ज्ञान भारतम का जो पूरा प्रोजेक्ट है इसमें एक बहुत बड़ा महत्वपूर्ण हिस्सा यह

6:09 है कि हम सर्वे करके देखेंगे। हो सकता है कई विशेषज्ञ इस बात को मानते हैं कि ये संख्या 1 करोड़ से ज्यादा भी हो सकती है। तो ये जो 1 करोड़ से ज्यादा पांडुलिपियों का भंडार हमारे देश के कोने-कोने में अलग-अलग जगह पर है। कुछ रिपोज़िटरीज में है, संस्थाओं में है, आर्काइव्स में है, म्यूजियम्स में है। ये तो है ही। लेकिन इसके अलावा बहुत सारे मठों में, मंदिरों में, संस्थानों में, व्यक्तिगत संग्रहों में भी एक पांडुलिपि का बहुत बड़ा भंडार है। तो इस सारे भंडार का एक तरह से एक एक जगह पर कोई डाटा आ जाए हमें मालूम पड़े कितनी है। अभी आपने जो उल्लेख किया कि विदेशों में इतनी पांडुलिपियां गई हैं या नष्ट हो गई हैं। तो इसका भी कोई आंकड़ा हमारे पास अभी है नहीं। तो वो भी एक सर्वेक्षण हो कि विदेशों में कितनी गई हैं, 10 लाख गई हैं, 20 लाख गई हैं।

6:55 कहां-कहां पर हैं? एक बहुत बड़ा अभियान यह ज्ञान भारतम के माध्यम से चलने वाला है। >> प्रोफेसर श्रीनिवास हम लोग कार्यक्रम शुरू होने से पहले बातचीत कर रहे थे और उसमें आप लोगों ने उल्लेख किया था कि हमारी पांडुलिपि यहां से चुराकर ले जाई गई है और जब हम उस पांडुलिपि को देखना चाहते हैं तो देखने पर भी कहीं ना कहीं रोक है प्रतिबंध है या फिर उतनी उतना खुलापन नहीं है। क्या उस के संदर्भ में भी इस पूरे सम्मेलन में कोई चर्चा हुई? कोई निराकरण निकल कर आया सामने? >> जी बहुत चर्चा हुई है। अनेक लोगों ने अपने अनुभव का साझा किया। जैसे मैं बता रहा था एक अभिज्ञान शाकुंतलम बहुत बड़ा हमारा देश का एक सांस्कृतिक

7:41 भूमिका जिससे निकला है ऐसे नाटक महाकवि कालिदास का उनका एक मात्रिका लेने के लिए एक हमारे विद्वान ने 800 पाउंड अपने फी लेकर उसको देखा लेके आए वो भी डिजिटल फॉर्म में तो इस तरह मैंने देखा है कई चेन्नई से एक बड़ी मात्रा में वैष्णव संप्रदाय के कई मुख्य ग्रंथों का पंचरात्र आगम के ग्रंथों का एक बहुत बड़ी राशि यूएस चली गई है। वो विद्वान नहीं रहे लेकिन कई एक विश्वविद्यालय में वो रखा गया है। एक्सेस कोई नहीं कर सकता है क्योंकि इस विश्वविद्यालय में कोई नहीं रहा है। तो इस दृष्टि से हमारे काफी संपदा विदेशों में है। एक्सेस इनसेसिबल हुई है। कई जगह में

8:27 एक्सेसिबल है तो उसको फी देना पड़ेगा। ये स्थिति आज चर्चा में आई है। एक विद्वान ने मंच से माननीय प्रधानमंत्री से निवेदन किया हमारी इस संपदा को आप जैसे मूर्तियों को वापस लेके आए हैं। इस संपदा को भी आप कृपया वापस लेके आ जाइए। प्रधानमंत्री जी ने सहस्र उसको स्वीकार किया। >> एक और बात इसमें बताना चाहता हूं कि ये जब गुलामी का काल था। हम हम अंग्रेजों के अधीन थे। उस वक्त बहुत सारी क्योंकि हमारे यहां उस की जागृति नहीं थी। अगर जागृति थी भी तो हमारे पास सुविधा नहीं थी। संसाधन नहीं थे। ऐसी बहुत सारी महत्वपूर्ण पांडुलिपियां लंदन के म्यूजियम में, फ्रांस में, जर्मनी में चली गई और अब उसके विशेषज्ञ हमारे पास भी जैसे निवारी की मैनुस्क्रिप्ट्स हमारे यहां जर्मनी में बहुत सारी

9:13 मैनुस्क्रिप्ट्स हैं। तो वो उसके विशेषज्ञ भी हमको अब तैयार करना बड़ी मुश्किल होती है कि भाई हमारे पास मैनुस्क्रिप्ट ही मूल इतनी सारी नहीं है। ये एक बहुत बड़ा प्रश्न है। इस पूरे सम्मेलन में एक हमने इस पे चर्चा भी की थी कि कैसे यह डिप्लोमेसी का भी एक हिस्सा है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर भी इस पर चर्चा की जा सकती है पांडुलिपि के। >> ऐसी कैथी नाम की भी एक पांडुलिपि है जिसको अब पढ़ने वाले और समझने वाले बहुत कम लोग >> कम बहुत कम >> तो उस पर तो क्या कुछ किया जाएगा उस संदर्भ में? >> देखिए पांडुलिपि की धरोहर को डिजिटाइज करना उसका सर्वे करके डिजिटाइज करना ये तो एक हिस्सा हुआ। लेकिन उससे बड़ा हिस्सा यह है कि अब हमें ऐसे भी विशेषज्ञ या ऐसे स्कॉलर्स तैयार करना है जो इन पांडुलिपियों को पढ़ सकते हैं। आपको मालूम

9:58 है कि जिन जिन लिपियों में ये पांडुलिपियां लिखी गई हैं वो लिपियां ही भारत में कम से कम 40 से ज्यादा ऐसी लिपियों में लिखी गई जो प्रमुख लिपियां हैं और ऐसी बहुत सारी और भी लिपियां हैं जिसमें ये लिखी गई हैं। अब उसको डिसाइफर करना अपने आप में एक बहुत बड़ा काम है। एक बहुत महत्वपूर्ण सत्र इस ज्ञान भारतम की कॉन्फ्रेंस में था वह था जो हमारी ऐसी लिपियां हैं जिनको डिसाइफरमेंट की चुनौती है उसको करना जैसे हम कहते हैं कि सरस्वती सिंधु सभ्यता की जो लिपि है उसके ऊपर अभी डिसाइफरमेंट के ऊपर पूरे विश्व में चर्चा चल रही है तो वो भी सत्र इसमें थे और इतने ज्यादा उसमें लोगों का उत्साह था बहुत सारे युवा कि ये दरअसल हमारी एक सभ्यता का एक मानक है वहां से भारत की सभ्यता प्रारंभ होती है तो उस पर भी चर्चा हुई

10:44 थी। >> यह उन लोगों के लिए भी एक प्रश्न खोजने का प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास मानते हैं जिनको लगता है कि शायद भारत का जन्म 15 अगस्त 1947 को हुआ है। >> ये बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न महत्वपूर्ण विषय आपने उठाया। 47 में तो एक पॉलिटिकल एंटिटी के रूप में एक प्रजासत्तात्मक राष्ट्र के रूप में हम आए ही हैं। स्वतंत्र भारत के रूप में आधुनिक युग में। लेकिन भारत का जो जो सत्ता है वो आज का नहीं है। वो हम सांस्कृतिक रूप में और पूरे विश्व के विश्व गुरु के रूप में एक ज्ञान के स्रोत के रूप में भारत एक अखंड भारत हमेशा अस्तित्व में रहा है। उसकी परिकल्पना बहुत लोगों को नहीं है। यह मैनुस्क्रिप्ट के द्वारा इन संपदाओं के यदि हम देखेंगे सर

11:30 मैनुस्क्रिप्ट कश्मीर से जो निकलता है वह मैनुस्क्रिप्ट केरल में मिलता है 1000 साल के बाद और केरल में लिखा गया एक भास नाटक चक्र भास जो लिख थे वो कई शताब्दी पहले थे उसका नाटक मिलता है केरल में और कई दक्षिण के जो अच्छे नाटक और कृतियां कश्मीर में मिलते हैं। इसका मतलब है भारत अखंड नहीं होता। यहां नहीं मिलते। तो विद्या के क्षेत्र में, कला के क्षेत्र में, साहित्य के क्षेत्र में भारत एक अखंड सांस्कृतिक भारत हमेशा रहा है। >> लेकिन इसके केंद्र में भी, इसके केंद्र में भी क्या हमेशा धर्म और आध्यात्म रहा? और भारत की सीमाओं को अगर कोई जोड़ता रहा है अभी तक हजारों हजारों बरस से वो हमारा

12:16 धर्म और आध्यात्म ही है। >> धर्म भारत का जो धर्म था जो सनातन धर्म था और उसकी एक वैश्विक उपलब्धि थी और वैश्विक उसकी एक अस्मिता थी वो तो हमेशा से रही है और शाश्वत रही है और जो हमारा दर्शन है जिसके ऊपर देखिए वेदों की हम बात करते हैं। वेद अपौरुषय हैं। वेद परंपरा से पूरी तरह से विकसित हुए हैं और वेदों का जो दर्शन है वह ज्ञान है तो वह तो पूरी मानव जाति के लिए हमारे पूरी मानव सभ्यता के लिए है। किसी एक पर्टिकुलर सेट या संप्रदाय के लिए तो है नहीं। तो ये जो भारत का जो ये व्यापक दर्शन था ये उस समय की भी वैश्विक दृष्टि को दिखाता है। जैसा अभी श्रीनिवास जी ने भी कहा कि ये जो अखंड भारत की भी कल्पना थी उसकी भी व्याप्ति बहुत बड़ी थी। इसलिए उसको किसी भौगोलिक सीमा में बांध देना वो भी एक तरह से बहुत

13:02 गलत बात है। यह ज्ञान परंपरा भारत की जो जो विस्तृत परिधि है उस पूरी विस्तृत परिधि में वो ज्ञान परंपरा है। >> अभी भी हम देखते हैं कि अलग-अलग देशों में कुछ खाड़ी के देशों में कभी खुदाई होती है तो वहां जो है इस तरीके की पांडुलिपियां मिल जाती हैं, सिक्के मिल जाते हैं। तो विश्व माने या ना माने या हम में से बहुत सारे लोग माने ना माने लेकिन यह बात कहीं ना कहीं प्रदर्शित तो होती है कि एक समय था कि वैश्विक रूप से जो है भारत की संस्कृति ज्ञान परंपरा जो है वो फैली हुई थी पूरे विश्व में। >> जैसे देखिए दो प्रमाण मैं देता हूं। >> जी एक प्रमाण वेद का है। >> वेद में जो अग्नि का उपासना है। अग्नि को बहुत प्रधान रूप से उपासना का एक माध्यम

13:48 माना जाता था। वो अग्नि उपासना की पद्धति केवल भारत में नहीं अपितु अनेक देशों में जैसे ईरान के कई हिस्से में और रशियन रशिया के कई हिस्से में आज भी उसका ट्रेस उपलब्ध होता है। तो इसका मतलब है यहां से लोग सीखे गए थे। वहां उपासना कर रहे थे। दूसरी बात महाभारत में स्पष्ट रूप से अनेक टेक्स्ट के भाग में अनेक राष्ट्रों का उल्लेख है जो आज हमारे साथ में वो नहीं है। जैसे उदाहरण के अभी बात कर रहे थे कंधहार है वो गांधार है। >> और ऐसे हूण और यवन इत्यादि उल्लेख जो मिलता है और यूरोप्य राष्ट्रों का वहां से राजा आते थे। यहां से संबंध रखते थे। महाभारत में

14:35 उनका उल्लेख है। तो मुझे लगता है कि महाभारत जैसे प्राचीन ग्रंथों में ऐसा उल्लेख है। तो शायद इस तरह का उल्लेख किसी राष्ट्र में नहीं रहा है। ये हमारा भारत का एक विशेषता है। >> आप मध्य प्रदेश में विदिशा के पास हिलियोडोरस का पिलर मिलता है। >> अब हिलियोडोरस का पिलर एकदम भारत के मध्यवर्ती भाग में मिलना ये बताता है ना कि हमारी अंतरराष्ट्रीय परिधि कितनी व्यापक थी। कितने आना-जाना होता था जो आप कह रहे हैं कि अगर कहीं खुदाई में मिल जाती है या कारण यह है कि हमारा भारत का विस्तार नहीं और भारत के साथ भारत के लोगों का जाना आना व्यापार की दृष्टि से ज्ञान की दृष्टि से कुलपति की संज्ञा ही थी कि इतने हजार विद्यार्थी जहां होंगे वो जो गुरुकुल होगा वहां का प्रमुख कुलपति

15:21 कहलाएंगे। तो ये जो नालंदा है या हमारे विक्रमशिला है, तक्षशिला है। यहां पे कई विदेशी विद्यार्थी आकर पढ़ते थे। इसलिए वो इतने बड़े विश्वविद्यालय >> जोड़ना चाहता हूं। जैसे माननीय जोशी जी ने कहा हमारा बौद्ध धर्म का प्रभाव आज भी >> जो चाइना इत्यादि देशों में है वो हमारे देश में कम है उससे ज्यादा है वो यहां से ज्ञान संपदा यहां से ज्ञान राशि वहां गया है ऐसा स्वयं माननीय प्रधानमंत्री जी को वहां के राष्ट्रपति ने बोला उसका दिखाया भी देखिए ये भारत से आया है ये ज्ञान संपदा >> इसके इसकी वजह यह भी हो सकती है कि जो भगवान बौद्ध ने हमें सिखाया वो हमारे धर्म में पहले से ही निहित हां लेकिन जो आसपास के क्षेत्र में जब इसका विस्तार हुआ उनके लिए बड़ा नया था ये सब कुछ

16:08 >> निश्चित तौर पर क्योंकि ये देखिए हमेशा से ये जाना भी गया है लोगों ने भी माना है अरबी फारसी में इस तरह के कोटेशंस हैं कि जहां से ज्ञान आता है वो भारत है तो वो मानते ही थे कि भारत में और ये भी आपने अभी धर्म की बात की तो ये धर्म और दर्शन और मानव सभ्यता के लिए जो संदेश है वो तो हमेशा भारत से ही गया है >> तो निश्चित तौर पर >> लेकिन कुछ सब कुछ कुछ सभ्यता तो नहीं कहूंगा कुछ नस्लें कुछ देश जो है बरसों बरस से जो है आधिपत्य जमाते रहे हैं कि हम जो है आगे रहे हैं संस्कृति की बात हो भाषा की बात हो पहनावे की बात हो लेकिन जो हमारी पांडुलिपियां लेकर गए हैं और वो अब सार्वजनिक भी नहीं होने दे रहे हैं उसके

16:54 पीछे भी क्या उनकी इनफरिटी है कि उन की सार्वजनिक ना हो जाए कि भारत हमेशा से ही उनसे बहुत आगे रहा है। हर संदर्भ में >> निश्चित तौर पर क्या है यह हम अभी इन दिनों पे जो सारी स्वराज जो युद्ध चलता है वो विचार का युद्ध है। ये कहते हैं ना वॉर ऑफ नरेटिव चल रहा है। >> अब उसमें आप अगर कोई तथ्य प्रस्तुत करते हैं तो क्या है? पूरी दुनिया उसका वैलिडेशन मांगती है कि इसका प्रमाण क्या है? हमारी पांडुलिपियां दरअसल उन सारी बातों का प्रमाण है। उनमें सारी चीजें साक्षात उपस्थित हैं। तो अगर आपने वह पांडुलिपियां हमको दे दी। अभी विदेशी पांडुलिपि का उल्लेख हो रहा था। गणित के कई प्रमुख सिद्धांत हैं जो बक्शाली मैनुस्क्रिप्ट्स में है जो लंदन म्यूजियम में है। और लंदन म्यूजियम आपको बखशाली मैनुस्क्रिप्ट ना दे रहा है ना दिखा रहा है। और हम कहते हैं कि

17:42 आप दिखा देंगे उसकी डेटिंग हो जाएगी तो अपने आप सारी बातें सिद्ध हो जाएंगी। लेकिन वो इतना भी करने को तैयार नहीं क्योंकि वो भयभीत हैं कि जिस दिन हमने इनको यह दिखा दिया तो ये सारे जो गणितीय सिद्धांत हैं और इसकी जो प्राचीनता है वो सिद्ध हो जाएगी कि ये भारत से आया है। तो ये इतना बड़ा ये षड्यंत्र भी है। तो ये अगर ज्ञान भारतम पूरी की पूरी योजना के माध्यम से हम पांडुलिपियों के ज्ञान को बाहर विश्व के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं तो निश्चित तौर पर हम सारे तथ्यों का वैलिडेशन भी कर रहे हैं। जो तथ्य हम भारत के बारे में बोलते हैं उसका वैलिडेशन भी है ये। जी इसमें हम क्या है राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन ये एन एनएमएम ये भी एक बहुत बड़ा केंद्र है इससे जुड़ा इससे जुड़े हुए कुछ लोग भी आए थे उनका प्रतिनिधित्व भी था इस सम्मेलन में

18:27 >> जी मैं मैं देखिए क्या था राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन जब प्रारंभ हुआ था एक मिशन के तौर पर प्रारंभ हुआ था उसके बाद वो योजना एक तरह से समाप्त हुई अब ज्ञान भारतम एक बड़ा प्रकल्प है >> तो उसमें सब >> उत्साहित समाहित हैं तो आप जब कहते हैं लोग आए आए थे तो मैं यह समझता हूं कि इसका आशय यह है कि देश भर में सिर्फ सरकार ही नहीं है जो पांडुलिपियों का संरक्षण और संवर्धन कर रही है। ऐसी देश में लगभग 100 संस्थाएं हैं और वह अपने आप में बहुत अधिक संपन्न हैं और उनकी बहुत अधिक इन जैसे अहमदाबाद में कोबा >> कोबा के पास 45 लाख पांडुलिपियां डिजिटाइज्ड हैं और अगर आप उनका पूरा का पूरा तंत्र देखें तो आप आश्चर्यचकित रह जाएंगे कि वो अपने बलबूते पर इतनी सारी

19:12 पांडुलिपियों का ना सिर्फ संरक्षण कर रहे हैं, डिजिटाइजेशन कर रहे हैं, ग्रंथों की रचना कर रहे हैं। तो, ऐसी कई संस्थाएं हैं देश में छोटी बड़ी रिपॉजिटरीज़ और यह एक ऐसा सम्मेलन था इनमें सारी रिपॉज़िटरीज़ के लोग आए थे। बहुत आनंद से आए बहुत माननीय प्रधानमंत्री जी ने अपने भाषण में कुछ ऐसी रिपोज़िटरीज का उल्लेख भी किया है कि जैसे तंजाबुर में सरस्वती महल लाइब्रेरी है। >> उसमें पांडुलिपियों का विशाल भंडार है और बहुत अच्छी तरह से वो सारी चीजें वहां रखी हुई हैं। तो ये सब ज्ञान भारतम दरअसल एक तरह से ये किसी एक ही संस्था का या सरकार का प्रयास नहीं है। ये भारत के उन सभी लोगों का सम्मिलित प्रयास है जो भारत की पांडुलिपि धरोहर की चिंता करते हैं और उस संबंध में आगे कुछ करना चाहते हैं। आपने शुरुआत में ही कहा कि इस की सफलता इसमें

20:00 निहित है कि युवाओं की भागीदारी इसमें कितनी होती है। युवाओं की भागीदारी तय करने के लिए क्या पाठ्यक्रमों में भी इसको समाहित करना पड़ेगा? >> देखिए अभी ये मिशन का अगला हिस्सा है। जैसे माननीय जोशी जी ने कहा ये केवल एक सम्मेलन एक सरकारी व्यवस्था नहीं थी। सबके भागीदारी से एक कंसोर्शियम मॉडल था। लोग सभी इस पीपीपी मॉडल में पब्लिक प्राइवेट पार्टिसिपेशन मॉडल में सभी लोग उसमें जुड़े थे। अंततगत इसको कहां से हम एक्सेस करेंगे? उसको कहां डिस्ट्रीब्यूशन करेंगे, डिसिमिनेशन करेंगे वो बात है। जैसे हम मैनुस्क्रिप्ट को लिया उसको डिजिटाइज किया। उसके बाद उसका डिसिमिनेशन उसका डिसएफेयर हो गया। उसके बाद डिसिमिनेशन आता

20:46 है। तो डिजिटलाइजेशन के शुरू करके डिसिमिनेशन तक जो है डिसिमिनेशन की व्यवस्था तो शिक्षा शिक्षा समुदाय में रहता है। तो शिक्षा संस्थानों की जिम्मेदारी है जो नॉलेज इसमें है उसमें आधुनिक काल में आज के लिए क्या उपयोगी है और क्या रेलेवेंट है उसको निकालना उसको प्रयोग करना उसको वैलिडेशन करने के बाद टेक्स्ट बुक में शामिल करवाना। तो इसको हम ऐसे मानते हैं कि ये प्रक्रिया पूरी जारी रहे जारी रहेगी। आपने स्वयं कहा कि बहुत सारे जो है संस्था के तौर पर और बहुत सारे निजी तौर पर भी इस कार्य में सतत जो है लगे हुए हैं और उनको आप सब जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। इस जोड़ने के प्रयास में क्या चुनौती है क्योंकि ये धरोहर जो है अमूल्य धरोहर है। वो आपको दी जाएगी तो

21:34 उसके बदले में उनको क्या मिलेगा जो यह धरोहर आपके साथ साझा करेंगे या सौंपेंगे उसका कोई उत्तर जो है इस सम्मेलन से निकल कर आया >> देखिए इस सम्मेलन में इस बात पे भी सहमति बनी कि यह सब हमारी साझा धरोहर है और जब तक सब मिलकर प्रयास नहीं करेंगे हम इस बहुत बड़े काम को नहीं अंजाम दे सकते लेकिन इसमें दरअसल जो रिपोजिटरीज हैं जिनके पास वर्षों से ये पांडुलिपियां सहेज कर रखी गई हैं और निश्चित तौर पर यह उनका श्रेय है कि उन्होंने आत्म प्रेरणा से इसको अपने पास रखा है, सहेज कर रखा है। तो इसकी प्रतियां अगर लोग प्राप्त करना चाहे, कोई कॉपी करना चाहे, कोई डाउनलोड करना चाहे अगर हम एक बहुत बड़ा डिजिटल प्लेटफार्म बनाते हैं जिसका भी माननीय प्रधानमंत्री जी ने शुभारंभ किया एक बहुत बड़ी डिजिटल रिपॉजिटरी का। तो अगर देश की

22:19 सारी पांडुलिपि जो संपदा है वो इस डिजिटल रिपॉजिटरी में आती है तो जिन संस्थाओं से इसमें अपना सहयोग दिया गया है उन संस्थाओं को अगर कोई डाउनलोड करता है तो उसका कोई शुल्क होगा तो उस वो शुल्क उस संस्था के पास जाए ताकि उनको आर्थिक हानि ना हो और जो उनका एक आर्थिक लाभ का एक जरिया है वह बना रहे तो इस तरह की बात जैसे अभी आपने उदाहरण दिया 800 पौंड आप बताइए एक छोटी सी चीज को प्राप्त करने का वो लंदन की रिपोजिटरी लेती है तो बहुत ज्यादा इसमें कई-कई बार धनराशि भी इन्वॉल्व होती है। तो किसी को आर्थिक नुकसान ना हो और जहां तक हो सके भारत सरकार उनकी इस तरह से मदद करें कि वो अपना काम भी करते रहे और इस डिजिटल रिपोजिटरी को भी बहुत अच्छी तरह से चलाते रहें। ऐसी सब बातों पर बहुत खुलकर

23:06 चर्चा हुई है। ये बहुत सारी धाराएं जो हैं इसमें समाहित थी इस पूरे वृहद सम्मेलन में। ये धाराएं जो है संवेत रूप से कहां जाकर पहुंचनी चाहिए? कहां जाकर गिरनी चाहिए? क्या उसका उद्देश्य तय हुआ? >> जी जैसे एक लक्ष्य को हमने रखा। मुख्य रूप से विकसित भारत के निर्माण में हमारी ज्ञान संपदा का विनियोग करना उसके लिए हम सब प्रतिबद्ध हैं। उस दिन अंतिम दिन में एक बहुत बड़ा संकल्प पत्र हमने बनाया है। ये केवल सरकारी व्यवस्था में संकल्प पत्र नहीं रहा। यह संकल्प पत्र दिल्ली डिक्लेरेशन के नाम से पूरे विश्व के इस धरोहर के बारे में जो अवेयरनेस है क्योंकि ये संपदा के बारे में लोग जानकारी नहीं

23:52 रखते हैं। संरक्षण नहीं करते हैं। उसका वितरण नहीं करते हैं। इन तीनों बातों पर हमने एक संकल्प लिया है। ना केवल विद्वान लोग टेक्नोलॉजी के संबंधित लोग जितने भी मीडिया से लोग थे संस्थान थे सभी लोग मिलकर हमने एक डिक्लेरेशन किया है संकल्प लिया है इस संकल्प पत्र में स्पष्ट रूप से यह कहा गया है कि इस धरोहर को विकसित भारत निर्माण के लिए हम विनियोग करेंगे वहां तक हम छोड़ेंगे नहीं इसमें हम प्रतिबद्ध रहेंगे सेव एंड शेयर >> क्या बात >> इसके साथ हम आगे जा रहे हैं >> आगे जा रहे हैं और ये संकल्प सिद्धि तक पहुंचे और आप जैसे गुणी लोग ज्ञानी लोग जो हैं इस संकल्प के साथ जुड़े हुए हैं तो यह सिद्धि तक समय पर पहुंच पाएगा। यही आशा करते हैं आप दोनों आए स्टूडियो में और यह

24:38 विषय तो ऐसा है कि बातचीत करते रह लेकिन समय की अपनी सीमा है और सीमा कह रही है कि हमें संपन्न करना पड़ेगा कार्यक्रम। आप दोनों का बहुत-बहुत धन्यवाद। >> धन्यवाद जी। प्रणाम। >> इनसाइट में आज के लिए इतना ही। इनसाइट में आपसे फिर भेंट होगी एक नए विषय के साथ। फिलहाल मुझे आज्ञा दीजिए। लेकिन देखते रहिए संसद टीवी। नमस्कार। [संगीत] संसद टीवी के और भी प्रोग्राम्स देखने के

25:24 लिए सब्सक्राइब करें हमारा YouTube YouTube चैनल और हां इन्हें लाइक और शेयर करना ना भूलें।

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