Insight: नदियां और भविष्य | 30 September, 2025

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संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो भारत की नदियों की वर्तमान स्थिति, उनके महत्व और उनके संरक्षण के लिए आवश्यक कदमों पर केंद्रित है। इसमें नदियों के आर्थिक, पर्यावरणीय, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है, साथ ही उनके सामने आने वाली चुनौतियों और उनके संरक्षण के तरीकों पर भी चर्चा की गई है। वीडियो में विशेषज्ञों ने नदियों के प्रति व्यवहार को ठीक करने, जल संचय को बढ़ावा देने, जन भागीदारी को बढ़ाने और स्थानीय स्तर पर नीतियों को लागू करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

मुख्य बातें:

  • भारत में नदियां प्रदूषण, अतिक्रमण और पानी की कमी जैसी चुनौतियों का सामना कर रही हैं।
  • कृषि, उद्योग, आजीविका, ऊर्जा, संस्कृति और पर्यावरण के लिए नदियों का महत्व।
  • नदियों के संरक्षण के लिए जन भागीदारी और स्थानीय स्तर पर नीतियों का कार्यान्वयन आवश्यक है।
  • जल संचय, जल का पुन: उपयोग और जल ग्रहण क्षेत्रों का प्रबंधन नदियों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

परिचय

यह कार्यक्रम नदियों के महत्व और वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डालता है, जिसमें कृषि, उद्योग, आजीविका, ऊर्जा, संस्कृति और पर्यावरण में उनकी भूमिका शामिल है। यह नदियों के सामने आने वाली चुनौतियों और उनके संरक्षण के लिए आवश्यक कदमों पर भी प्रकाश डालता है। कार्यक्रम में विशेषज्ञों के साथ चर्चा शामिल है जो आर्थिक महत्व, पर्यावरणीय महत्व, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहलुओं, नदियों के सामने आने वाली चुनौतियों और उनके संरक्षण के तरीकों पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

भारत में नदियों की वर्तमान स्थिति

डॉ. तारे बताते हैं कि भारत में नदियों के प्रति व्यवहार में बदलाव की जरूरत है, क्योंकि हमने उनसे उनकी क्षमता छीन ली है। शहरों में, लोग 330 दिन दूषित पानी देखते हैं, जबकि गांवों में स्थिति और भी खराब है। भारत में नदियों की सही संख्या भी ज्ञात नहीं है, अनुमान है कि 2 लाख नदियां हैं जिनके नाम भी नहीं पता हैं। रमनकांत जी बताते हैं कि भारत में नदियों के सामने तीन बड़े संकट हैं: प्रदूषण, अतिक्रमण और पानी की कमी। छोटी नदियां लगभग आईसीयू में हैं और नाला बन चुकी हैं।

कृषि और नदियों का संबंध

डॉ. तारे बताते हैं कि भारत की कुल संचित भूमि का 60% से ज्यादा हिस्सा भूमिगत जल पर निर्भर है, लेकिन यह भूमिगत जल भी नदियों का ही पानी है। इसलिए, बारिश के पानी को भूमि में भरने की आवश्यकता है ताकि ग्राउंड वाटर का भरण हो सके और नदियों में पानी की कमी न हो। रमनकांत जी बताते हैं कि नदियों के किनारे बसा हुआ समाज उनसे पोषित होता है और अगर नदियों पर संकट आता है तो सभ्यताएं उजड़ने के कगार पर पहुंच जाती हैं।

नदियों का संरक्षण और जन भागीदारी

रमनकांत जी बताते हैं कि नदियों के संरक्षण के लिए जन भागीदारी बहुत जरूरी है। सरकार के प्रयासों के साथ-साथ समाज के स्तर पर भी प्रयास किए जाने चाहिए। नमामि गंगे जैसे कार्यक्रमों को समाज के लोगों तक पहुंचना चाहिए और उन्हें नदियों के पुनर्जीवन में शामिल करना चाहिए। डॉ. तारे बताते हैं कि नदियों को अविरल और निर्मल बनाना बहुत जरूरी है और इसके लिए समाज को ही जिम्मेदारी देनी पड़ेगी।

सांस्कृतिक धरोहरें और प्रदूषण

डॉ. तारे बताते हैं कि नदियों के किनारे कई सांस्कृतिक धरोहरें हैं जो क्लाइमेट चेंज और प्रदूषण की वजह से प्रभावित हो रही हैं। इसलिए, नदी आधारित धरोहरों की सुरक्षा के लिए भी पहल की जानी चाहिए। रमनकांत जी बताते हैं कि प्रदूषण की निगरानी और रोकथाम में कमी है और जन भागीदारी इसमें बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

अर्थ गंगा और आर्थिक व्यवस्था

डॉ. तारे बताते हैं कि नमामि गंगे प्रोग्राम पर अब तक हजारों करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं, लेकिन अभी भी बहुत कुछ करने की जरूरत है। प्रधानमंत्री जी ने अर्थ गंगा का कांसेप्ट दिया है, जिसके अनुसार नदियों से आर्थिक व्यवस्था जुड़ी हुई है। इसलिए, आम जनता का भी पैसा इसमें आना चाहिए और हमारी अर्थव्यवस्था वाटर सेंट्रिक होनी चाहिए।

अंतर्राष्ट्रीय मॉडल और विकेंद्रीकरण

रमनकांत जी बताते हैं कि हम दूसरे देशों से भी सीख सकते हैं, जैसे कि यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में नदियों के संरक्षण के लिए सख्त नीतियां हैं और समाज उनके साथ जुड़ा हुआ है। भारत में भी नदी प्रबंधन को ज्यादा विकेंद्रीकृत करने की जरूरत है और ग्राउंड के लोगों को जोड़ना बहुत जरूरी है।

जलवायु परिवर्तन और शहरी नदियां

डॉ. तारे बताते हैं कि क्लाइमेट चेंज एक रियलिटी है, लेकिन हमको स्थानीय स्तर पर एक्शन लेना है। हमें अपनी संस्कृति के हिसाब से काम करना चाहिए और नदी को संरक्षित करने के उपाय करने चाहिए। रमनकांत जी बताते हैं कि शहरी नदियों में सीवेज की समस्या बहुत ज्यादा है और एसटीपीस ठीक से नहीं चल रहे हैं। इसलिए, एसटीपीस की मॉनिटरिंग सख्त होनी चाहिए और ट्रीट किए गए पानी को फिर से उपयोग में लाना चाहिए।

निष्कर्ष

नदियां हमारी अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और संस्कृति की धड़कन हैं, लेकिन चुनौतियां गंभीर हैं। हमें नीति, तकनीक और जनता, भागीदारी को एक साथ लाना होगा। नदियों की रक्षा करना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं बल्कि हर नागरिक की जिम्मेदारी है। अगर हम छोटे-छोटे स्तर पर बदलाव लाएं और बड़ी नीतियों को जमीन पर सही से उतारें तो ही हम आने वाली पीढ़ियों को स्वस्थ और जीवनदायिनी नदियां दे पाएंगे।

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Transcript

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0:03 [प्रशंसा] नमस्कार आप देख रहे हैं सेंस टीवी। मैं हूं प्रीति सिंह और आज इनसाइट में हम बात कर रहे हैं हमारी जीवन रेखा नदियों की। नदियां केवल पानी का स्रोत नहीं है बल्कि हमारी कृषि, उद्योग, आजीविका, ऊर्जा, संस्कृति और पर्यावरण हर पहलू से जुड़ी हुई हैं। तो सवाल है नदियों की असली हालत फिलहाल क्या है? उनकी भूमिका कितनी अहम है और हमें उन्हें बचाने के लिए क्या करना होगा? क्योंकि देश ही नहीं दुनिया में जल संकट गहराता जा रहा है और भारत में नदियां कई तरह की चुनौतियों से अभी भी जूझ रही हैं। केंद्रीय निगरानी जो रिपोर्ट्स हैं उनके अनुसार देश में प्रदूषित नदी स्ट्रेच

0:49 अभी भी चिंता का विषय है और हाल ही में उनमें कमी जरूर देखी गई है। रिपोर्ट की गई है। 279 से ज्यादा नदी खंड अभी भी प्रदूषित श्रेणी में हैं। साथ ही राष्ट्रीय प्रयासों जैसे नमामि गंगे के तहत हजारों करोड़ के प्रोजेक्ट और कई एसटीपी बने हैं। सरकार की कोशिश है कि जो हमारी नदियां हैं वो प्रदूषण मुक्त रहें। इसी बीच कृषि के पानी की जरूरत में सतह जल कैनल की हिस्सेदारी है। पर देश में ट्यूबवेल ग्राउंड वाटर का योगदान भी बहुत बड़ा है। यानी नदी स्वस्थ ना हो तो खेतों के पानी पर असर साफ होगा। आज हम तमाम पहलुओं पर चर्चा करेंगे और हमारे साथ इस विषय पर चर्चा के लिए दो विशेषज्ञ भी मौजूद हैं। हम जानेंगे और समझेंगे आर्थिक मायनों से और आगे बढ़ते हुए इस मुद्दे को फील्ड इनसाइड के साथ छुएंगे।

1:45 खासतौर से आज की चर्चा में पांच पहलू पर फोकस हम करने की कोशिश करेंगे आर्थिक महत्व, पर्यावरणीय महत्व, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहलू और नदियों के सामने खड़ी चुनौतियां और अंत में उनके संरक्षण के रास्तों पर। तो आइए शुरू करते हैं इस चर्चा को और आपको बता दें कि हमारे साथ दो बेहद खास मेहमान जुड़े हुए हैं। हमारे साथ रमनकांत जी जुड़े हुए हैं रिवर मैन ऑफ इंडिया। रमनकांत जी बहुत-बहुत शुक्रिया सेंसर टीवी के साथ जुड़ने के लिए। हमारे साथ डॉक्टर विनोद तारे जुड़े हुए हैं। प्रोफेसर और फाउंडिंग हेड हैं सेंटर फॉर गंगा रिवर बेस एंड मैनेजमेंट एंड स्टडीज आईआईटी कानपुर। बहुत-बहुत स्वागत आपका डॉ. विनोद तारे शुक्रिया सेंस टीवी के साथ जुड़ने के लिए। डॉक्टर तारे शुरुआत मैं आप ही से करूंगी। थोड़ा सा हमें समझाइए क्योंकि भारत में जब हम देखते हैं तो करीब 70% पीने और सिंचाई का पानी नदियों और उनके बेसिन से आता है। दुनिया

2:30 के कई देशों में नदियां सूख रही हैं या प्रदूषित हो चुकी हैं और भारत में भी अगर मैं गलत नहीं हूं तो बताइएगा। भारत में भी अगर हम देखें तो 279 से ज्यादा नदी खंड अभी भी पोल्यूटेड कैटेगरी में हैं। आपकी नजर में आज भारत की नदियों की सबसे बड़ी ग्राउंड रियलिटी क्या कह रही है? यह मेरे से पूछा है आपने। हां हां डॉक्टर तारिक हां तो सबसे मुख्य तो हमारी समस्या है कि हमारा नदी के प्रति जो व्यवहार है वो व्यवहार ऐसा हो गया है कि हमने अपने नदियों से उनका सामर्थ्य छीन लिया है और नदियों का सामर्थ्य छीनने का मतलब यह होता है कि नदी जो हमको सर्विसेस देती है और जो नदी अपने प्रोसेससेस और फंक्शनंस करती है वो करना

3:19 बंद हो गया है और उससे हमें नहीं नुकसान हो रहा है। तो जरूरत यह है कि हम अपना व्यवहार नदी के साथ ठीक करें। व्यवहार का ठीक करने का मतलब यह है कि हम ऐसा कोई काम ना करें जिससे नदी की सामर्थ्यता कम होती है। उसमें दोनों आता है कि शहरों में शहरों के लोग कैसे व्यवहार करें और गांव के लोग कैसे व्यवहार करें। तो शहरों में यदि आप देखेंगे तो हमारी जो समस्या है करीब 3035 दिन हमारी समस्या है कि हम हम पानी ही पानी देखते हैं। अभी जो हमने रिसेंटली गए महीने में देखा और बाकी के 330 हम ये देखते हैं कि हमारे अराउंड पूरा का पूरा जो है वेस्ट वाटर बहता रहता है। तो इन दो को ही हमको और जो आपने 29 30 खंडों का बात किया वह तो मेरे को लगता है

4:05 कि जो हम देख पाए हैं या जो सीपीसी भी कर पाए पर ऐसे कई खंड है आई थिंक हजारों में होंगे जिसको हमको सुधारने की आवश्यकता है। इनफैक्ट हमारे को नहीं पता है कि हमारे देश में नदियां कितनी है। अभी हमने एक रिवर का एटलस बनाया है। उसमें हमको जो रिवर्स के नाम हमको पता है वो करीब 16,000 रिवर्स हमारे यहां हैं। बट करीब 2 लाख रिवर हमारे पास टोटल है जो कि हमको उसके नाम भी नहीं पता है पर वह रिवर्स एक्सिस्ट करती है। तो ये जो खंड की बात कर रहे हैं ये तो हम जिसको कि हम जिन रिवर को हम जानते हैं बट ऐसी कई नदियां है जिनको हम जानते नहीं हैं। तो ये भी एक मुद्दे हैं। ठीक है। ठीक है। और इसी इसी को थोड़ा सा हम रमनकांत जी के नजरिए से भी समझते हैं।

4:50 रमनकांत जी जो सवाल मेरा डॉक्टर तारे से भी था वही मैं आपसे समझना चाहूंगी। वो तो बता रहे हैं कि कई ऐसी नदियां हैं जो हैं लेकिन उनके बारे में हमें पता ही नहीं है। यानी जो आंकड़े अब तक हमारे पास हैं उनसे भी और ज्यादा विस्तार से हम देख सकते हैं। अभी भी जैसे मैंने कहा कि 70% जो पानी है वो सिंचाई का पानी हो, पीने का पानी हो वो नदियां और उनके बेसिन से ही आ रहा है। और कई देशों में नदियां सूख रही हैं, प्रदूषित हो रही हैं। भारत की स्थिति को भारत की चुनौती को आप कैसे देख रहे हैं? देखिए भारत में नदियों के सामने तीन बड़े संकट हैं। एक तो पोलशन, एनक्रोचमेंट और पानी की कमी। एनकोचमेंट का आपने लगातार देख रहे हैं कि कैसे बारिश के समय में पहाड़ों पर जब बारिश होती है तो नदियों के किनारे के मकान लगातार बह रहे हैं। पुल बह

5:35 रहे हैं। दूसरा जो पोलशन है जो गंगा को अगर छोड़ दें जो छोटी नदियां फर्स्ट ऑर्डर, सेकंड ऑर्डर, थर्ड ऑर्डर या फोर्थ ऑर्डर की वो लगभग आईसीयू में है वो नदियां। नाला बन चुकी हैं। और जो पानी की कमी है अभी बरसात के बाद अगर आप नदियों में देखें तो इतनी पानी की कमी हो जाती है। गंगा में स्वयं पानी की कमी हो जाती है। तो तीन बड़ी समस्याएं हमारे सामने नदियों के सामने हैं। इनको काउंटर करने के लिए बहुत सारे प्रयास सरकार के स्तर पे भी किया जा रहा है। समाज के स्तर पर भी बहुत सारे लोग इस प्रयास में लगे हैं। दूसरी बात जो आपने कही नदियों की संख्या या उनकी पहचान देखिए जो अगर ब्रिटिश गजेटियर हम देख 1905 के या उससे कुछ पहले तो उस गजेटर में सभी नदियों के जिक्र हैं। जैसे मैं एक बनारस का आपको उदाहरण बताऊं। बनारस में

6:22 वर्णासई, गंगा और गोमती नदियां चार प्रमुखता से मिलती हैं। लेकिन अगर ब्रिटिश गजेटर में देखेंगे तो लमोई, गरई, चंद्रप्रभा, हाथी, कर्मनासा ऐसी नदियों का भी जिक्र वहां मिलता है। तो अगर हमारे पास हर जिले का एक डाटा होगा ब्रिटिश गजिएटर के आधार पे नदियों का एक एटलस होगा तो हमको आसान होगा उस काम को करने के लिए। उसी प्रकार हमने बागपत में भी दो नदियों को खोजा। आपकी एक लम है और एक बाणगंगा है। तो ऐसे ही प्रत्येक जिले में बहुत सारी नदियां ऐसी हैं जिनको लोग जानते नहीं है। अब या उनमें गंदा पानी बह रहा है तो नाला बन गई है। तो एक जरूरत है कि इन सब नदियों को पहचाना जाए। उनको कम से कम एक डॉक्यूमेंट में लाया जाए। हम हम ठीक है। अह अगर इसके और पहलुओं को समझे डॉ. विनोद तारे अह जो एफएओ है फ़ूड एंड

7:07 एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन वो यह कहता है कि भारत की जो कुल संचित भूमि है उसका 60% से ज्यादा हिस्सा भूमिगत जल पर निर्भर है। सतही जल यानी नदियों की हिस्सेदारी घट रही है। क्या यह ट्रेंड हमारी कृषि सुरक्षा को खतरे में डाल रहा है या डाल सकता है? क्योंकि हम जानते हैं कि कृषि आधारित अर्थव्यवस्था बड़े पैमाने पर हमारी है। कैसे आपकी नजर में नदियों की भूमिका को मजबूत किया जाए। एक तरफ मत्स्यपालन इंडस्ट्री में देखें इनलैंड फिश प्रोडक्शन का बड़ा हिस्सा नदियों और जलाशयों से आता है। प्रदूषण और अवैध उत्खनन से यह खतरे में है। क्या हम अपनी नदियों को आजीविका का स्रोत बनाए रखने में नाकाम हो रहे हैं। और आपकी नजर में समाधान क्या है इसका? देखिए जो आपने एग्रीकल्चर की बात की नो डाउट कि एग्रीकल्चर में सबसे ज्यादा

7:53 पानी की आवश्यकता होती है और वो अधिकतर पानी जो है ग्राउंड वाटर से लिया जाता है और हमको यह भी समझने समझने की आवश्यकता है कि ये ग्राउंड वाटर जो है यह भी नदी का ही पानी है। हम तो हमें सबसे बड़ा यदि उपाय करना है तो यह करना है कि बारिश के दिनों में हमारे पास जो पानी आता है वह पानी जो तेजी से बह के चला जाता है उसको हम कैसे शिथिल करें ताकि वह मेरा बारिश के दिनों में ग्राउंड वाटर जो है उसका पूरा भरण हो और यदि ग्राउंड वाटर भरण होगा तो खेती के लिए भी यूज़ होगा और तो और जो रमन जी ने बात की कि पानी की कमी हो जाती है नदियों में जब बारिश का मौसम खत्म हो जाता है तो जो ग्राउंड वाटर है वो नदियों को पोषित करता

8:40 है जब बारिश नहीं होती है तो तो उसके कारण ही हमारी बहुत सी नदियां जो है सूख गई है। तो आवश्यकता यह है कि हम नदी को जो बारिश का पानी आता है उसका ज्यादा से ज्यादा जल में भूमि में भरण करें और उसके लिए जरूरी है कि जो हमारा बहुत तेज गति से पानी पानी आता है उसको कैसे शिथिल करें। यदि हम एक एग्जांपल देखें कि हम गंगा के बारे में कहते हैं जब गंगा धरती पर आने वाली थी तो उसका वेग इतना होने वाला था कि सब विनाश हो जाता। तो फिर शंकर जी ने अपनी जटाओं में उसको संभाला और फिर वह शिथिल हुई और धीरे-धीरे पानी। अब इसको हमको अपने आज के संदर्भ में समझना पड़ेगा कि जो भी जल ग्रहण शस्त्र जहां पर भी हमारी पहाड़ी होती है या ऊपर जब भी बारिश होती है उस

9:26 बारिश को जो हमारे पेड़ है जो हमारी घास है जो हमारा जल ग्रहण क्षेत्र है उसको यदि हम वो शंकर की जटाओं को बचा के नहीं रखेंगे और वो पानी के मूवमेंट को शिथिल नहीं करेंगे तो जो आज हम विनाश देख रहे हैं उसका सबसे बड़ा कारण यही है कि हमने पहाड़ों को जो है बिल्कुल बैरन कर दिया है और उसके कारण फिर लैंडस्लाइड्स होती है। उसके कारण फिर मड़ आता है। उसके नदी के किनारे हमने मकान बना लिए हैं। तो यह जो सब हमने किया है वही मैंने शुरू में भी कहा था कि यदि नदी का सामर्थ्य रखना है तो हमारा व्यवहार नदी के ऊपर सुधारना पड़ेगा। नदी तो अपने आप को सुधार ही लेगी और नदी जल भरण भी कर लेगी और क्योंकि उसको ही अपना पानी चाहिए होता है बाद में। तो ये सब पर हमने जो व्यवस्था बिगाड़ी है उसके ऊपर हमको ध्यान देना

10:13 पड़ेगा। बिल्कुल रमाकांत जी जो व्यवस्था बिगड़ी है उस पर ध्यान देना होगा। कई सारी कोशिशें हमें दिख भी रही हैं। यह कोशिशें कितनी कारगर आपकी नजर में है और जैसे मैंने अभी बात की कि केंद्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट कह रही है कि कई राज्यों में जो ग्राउंड वाटर का स्तर है वो लगातार नीचे जा रहा है। क्या नदियों के संरक्षण के संरक्षण के जरिए हम भूजल संकट को कम कर सकते हैं? वहीं इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर यानी आई आईयूसीएन की रिपोर्ट कह रही है कि भारत की 30 फीसदी से अधिक ताजे पानी की मछली प्रजातियां खतरे में हैं। तो नदियों में जैव विविधता भी एक बहुत बड़ा चैलेंज है। क्या इसके लिए हमारी पॉलिसीज कारगर हैं? कितनी कारगर हैं? या हमें रिवर बायोडायवर्सिटी मिशन जैसी पहल की जरूरत है। क्या कुछ करना होगा हमें?

10:59 देखिए नदियां केवल एक धारा नहीं है। नदियां एक पूरा समाज लेकर के चलती हैं। उसके किनारे जो बसा हुआ समाज है उससे पोषित होता है। और हमारी जो जितनी भी सभ्यताएं हैं नदियों के किनारे बसी पली बड़ी विकसित हुई। लेकिन अगर उन नदियों पर संकट आता है तो वो सभ्यता वहां से उजड़ने के कगार पर पहुंचती हैं। दूसरा जो पानी का संकट है। नदी का एक नेचर है। बरसात में नदी जो है भूजल को फीड करती है। और बरसात के बाद वही भूजल नदी को फीड करता है। जो बरसाती नदियां हम जिनको कहते हैं। तो अगर इन प्रयासों को हम समाज के स्तर पर ले जाएंगे जैसे अभी मुझे एक बहुत अच्छा प्रयास लगा भारत सरकार के जो जलशक्ति मंत्री हैं माननीय श्री सीआर पाटिल साहब उन्होंने जन भागीदारी से जल संचय तो उस प्रयास के तहत देश में करीब 30 लाख स्ट्रक्चर बनाए गए हैं तो ऐसे प्रयास अगर

11:46 नदियों को लेकर के शुरू होंगे क्योंकि माननीय प्रधानमंत्री लगातार मन की बात में उन प्रयासों को उल्लेखित करते हैं जो समाज के स्तर पर नदियों के काम किए गए हैं तो इस प्रयास को बढ़ाना पड़ेगा रहेगा हमको जैसे नमामी गंगे की आपने अभी चर्चा की नमामिंगे अगर अपनी पहुंच समाज के लोगों तक बना ले जो लोग स्वेच्छा से नदियों के पुनर्जीवन में काम कर रहे हैं नमामी गंगे उन तक पहुंच जाए तो यह एक सकारात्मक जन आंदोलन नदियों के लिए खड़ा हो सकता है वो जहां तक नदियों के संकट की बात है देखिए भूजल अगर ऊपर नहीं आएगा तो नदियां हमारी सबबल नहीं बनेगी स्वच्छ नहीं रहेंग निर्मल नहीं बहेंग तो उनको भूजल स्तर ऊपर लाने के लिए सारे प्रयास करने पड़ेंगे चाहे जलाशय निर्माण करना पड़े चाहे चाहे पौधारोपण करना पड़े या बहुत सारे ऐसे काम है जो हम कर सकते हैं कि कृषि में भी बदलाव करना

12:32 पड़ेगा। तो यह सब हमको अगर कर कर पाए तो बेहतर होगा क्योंकि हमारे पास मात्र दुनिया का तीन से 4% पानी है और हमारी आबादी है 20% और पूरी दुनिया का हम करीब-करीब 25% भूजल खींचते हैं। हम तो एक तरीके से हम संकट के दौर में तो हैं लेकिन ऐसा नहीं है अगर समाज और सरकार के प्रयास साझा हो जाएंगे जैसा कि हमारे जलशक्ति मंत्री जी प्रयास कर रहे हैं तो मुझे लगता है एक समाधान हो पाएगा। ठीक है। आपने संस्कृति का भी जिक्र किया। डॉक्टर विनोद तारे क्योंकि यूनेस्को की रिपोर्ट में कहा गया कि नदी किनारे कई सांस्कृतिक धरोहरें क्लाइमेट चेंज और पोल्यूशन की वजह से प्रभावित हो रही हैं। क्या माना जाए कि हमें नदी आधारित धरोहरों की सुरक्षा के लिए भी क्या कुछ और अलग पहल की जरूरत है? साथ ही जैसा मैंने शुरुआत में ही जिक्र

13:18 किया था कि 279 से ज्यादा नदी खंड प्रदूषित श्रेणी में हैं। तो इतने बड़े पैमाने पर और जब आप कह रहे हैं कि बहुत सारी नदियां हमें पता ही नहीं है। बड़े पैमाने पर प्रदूषण की निगरानी और रोकथाम में कमी कहां-कहां पे लग रही है फिलहाल और जन भागीदारी जिसकी बात अभी रमनकांत जी ने भी उठाई है। उसमें हम कितना पीछे हैं? जन भागीदारी मैं रमन जी को पूरा सपोर्ट करता हूं कि बिना जन भागीदारी के यह काम नहीं होने वाला है। खाली सरकारी तंत्र से ये काम नहीं होता। जब तक हम अपनी नदियों की जिम्मेदारी वहां के जो लोकल है नदी किनारे में बसने वाले जो लोग हैं उनके ऊपर उसकी जिम्मेदारी उनकी रखवाली नहीं सौंपेंगे तब तक ये काम नहीं खाली रैलियां करने से या आंदोलन करने से नहीं होगा। उनको चाहे वो मॉनिटरिंग के लिए हो, चाहे

14:03 वो नदी के संरक्षण के लिए हो और जो हम संस्कृति की बात करते हैं, धरोहर की बात करते हैं वो भी एक उसी से जुड़ा हुआ पक्ष है। जब तक हम संस्कृति रखेंगे, धरोहर रखेंगे तो लोग बाग नदी के पास जाएंगे तो नदी को नदी का महत्व भी समझेंगे। तो ये दोनों आपस में जुड़े हुए हैं। और जहां तक आपने बायोडायवर्सिटी का बात किया था ये भी बड़ा मुद्दा है कि यस हमारी जो इंडीजीनस वैरायटीज है जो हमारे स्थानीय मछलियां हैं वो धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है तो हमें बहुत आवश्यकता है। पर उसके लिए सबसे पहला कदम होता है कि नदियों को अविरल और निर्मल बनाना। यदि हम अविरल और निर्मल बना पाते हैं तो फिर वो अपने आप आ जाती है और यह अविरल और निर्मल बनाने की जिम्मेदारी हर क्षेत्र में हर

14:51 स्ट्रेच में यदि हम समाज को ही दें तो किसी भी कारण हमको ये करना पड़ेगा कि जो कस्टोडियन है रिवर का वो कस्टोडियन रिवर वहां का समाज वहां का गांव वहां किनारे उनको ही जिम्मेदारी देनी पड़ेगी और उन्हीं को हमको इक्विप करना पड़ेगा कि हम कैसे उन्हीं से उसकी रखवाली करें। और सरकार उसमें सहायता करें। अभी क्या हो रहा है? सरकार करने की कोशिश कर रही है और उम्मीद करती है कि जन भागीदारी से जन लोग उनका सहायता करेंगे। पर मेरे को लगता है काम उल्टा होना चाहिए। जनता को काम करना चाहिए और सरकार को खाली सहायता करनी चाहिए। बिल्कुल। तो इसमें अगर आप थोड़ा सा बताएं जो सरकार बहुत कोशिश कर रही है और नमामिंगे प्रोग्राम इस पर अब तक हजारों करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। 160 से

15:37 ज्यादा एसटीपी बने हैं। अह कितना असर ऐसे प्रोजेक्ट्स का है और अगर हम पूरा असर नहीं देख पा रहे तो उसके पीछे भी जन भागीदारी की कमी है क्या? बिल्कुल बिल्कुल क्योंकि मैं यह कहूंगा कि अभी जो हम काम कर रहे हैं ये आंकड़े अपने आप में बहुत बड़े लगते हैं। नो डाउट पर जितनी हमारी आवश्यकता है वो उससे कई गुना है। हां और यदि वो कई गुना है तो क्या खाली के सरकारी बजट से आएगा क्या? तो जब तक जैसे प्रधानमंत्री जी ने कहा है कि हमको अर्थ गंगा का कांसेप्ट समझना पड़ेगा क्योंकि हमारी नदियों से आर्थिक व्यवस्था जुड़ी हुई है। तो जब तक हम आर्थिक व्यवस्था उससे नहीं जोड़ेंगे और वो तभी होगा कि इसमें आम जनता का भी पैसा बहुत आए किसी भी जैसे पोलशन कंट्रोल हो, सीवेज मैनेजमेंट हो, वाटर सप्लाई हो इसको हम इस

16:27 सेक्टर को हम कैसे प्रोत्साहित करें? तो हमारी एक जो इकोनमी है वो वाटर सेंट्रिक होनी चाहिए। वो रिवर सेंट्रिक होनी चाहिए कि नदियों को अच्छा करके जल को संरक्षित करके हमारी आर्थिक व्यवस्था कैसे बढ़े और उसके लिए सबसे जरूरी है कि हमारे गांव जुड़े हमारे शहर जुड़े और सरकार चाहे वो केंद्र की हो या स्टेट की हो वो उसमें खाली सहायता करें। पर काम जो है वो बेसिकली हमारे आम जनता को ही करना पड़ेगा और सरकार सिर्फ सपोर्ट करें और एज अ सीड देके ताकि वो फिर सीड जो है बड़े इसमें ग्रो करें जनता के द्वारा। अच्छा और क्या ऐसे कुछ इंटरनेशनल मॉडल्स हैं जिन्हें अपनाया जा सकता है? रमनकांत जी कई देशों ने कम्युनिटी रिवर्स

17:13 स्टीवर्डशिप मॉडल अपनाए हैं। भारत में क्या नदी प्रबंधन को ज्यादा विकेंद्रीकृत करने की जरूरत है या और देशों से हम कुछ सीख सकते हैं क्या? देखिए बिल्कुल सीख सकते हैं क्योंकि हम एक प्रयास कर रहे हैं भारतीय नदी परिषद के माध्यम से कि कैसे देश में जो काम करने वाले लोग हैं नदियों पे और जो सरकार प्रयास कर रही है दोनों एक साथ आए एक ब्रिज के रूप में हम काम करने का प्रयास कर रहे हैं क्योंकि कोई केरल में अगर किसी नदी पे काम कर रहा है और नमामिंगे को यही नहीं पता है कि वो वो काम करने वाले व्यक्ति को क्या नीड है उसको तकनीकी सहायता चाहिए या नहीं चाहिए अगर यह गैप भर जाएगा और हम एक मॉडल खड़ा कर पाएंगे कि एक नदी पुनर्जीवित ऐसे होती है तो वह बहुत जरूरी है क्योंकि यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के अगर हम मॉडल्स देखते हैं तो उनकी बड़ी सख्त नीतियां रही और उतनी

18:00 सख्ताई से उनको लागू किया और समाज उनके साथ जुड़ा। हमारे साथ में एक ये कमी रही है। अभी भी है। मैं उसको मानता हूं कि जो हमारे प्रयास हैं। हमारे प्रयास मतलब सरकार के प्रयास हैं। उसमें नमामी गंगे को मैं प्रमुखता से कहूंगा। वो जुड़ना ही नहीं चाहते कि समाज में अगर कोई व्यक्ति काम कर रहा है। मान लिया आप एक कॉन्फ्रेंस पे एक करोड़ खर्च कर दे रहे हैं और अगर कोई नदी पे काम करने वाला व्यक्ति है अगर उस वहां उस पैसे को आप लगा दें तो एक नदी पुनर्जीवित हो सकती है। तो इस गैप को भरने की जरूरत है। बहुत अच्छे प्रयास हैं। बहुत अच्छी सोच है। लेकिन कहीं ना कहीं गैप रह जा रहा है जो कि ग्राउंड पर नहीं पहुंच रहा है। तो ग्राउंड के लोगों को जब तक हम नहीं जोड़ेंगे एक जन भागीदारी वाला स्वरूप जो अभी जल संचय जन भागीदारी जल संरक्षण के

18:46 लिए शुरू हुआ वो अगर नदियों के साथ शुरू नहीं होगा तो बड़ा मुश्किल होगा इसको सवारना क्योंकि नदी किनारे जो बसा समाज है जैसा अभी तारे साहब ने कहा अगर उसको जिम्मेदारी सौंप दी जाए जिसका हम फिर हम हम भी प्रयास कर रहे हैं एक कुछ काउंसिल बना करके तो यह काम सस्टेनेबल होगा क्योंकि किसी भी जिले में कोई अधिकारी लगातार अपॉइंट नहीं रह सकता है। 2 साल कोई डीएम है, 2 साल बाद वह चले गए तो कौन उस काम को करेगा? वहां का समाज उस काम को संभाल सकता है। तो इसकी बहुत ज्यादा जरूरत है। ठीक है। और दो और जो पॉइंट है डॉक्टर तारे रिवर फ्रंट डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स शहरों में लोकप्रिय हो रहे हैं। तो क्या जो कंजर्वेशन फर्स्ट अप्रोच अपनाना चाहिए या अर्बन डेवलपमेंट और कंजर्वेशन साथ चल सकते हैं आपकी नजर में। दूसरा इंटर गवर्नमेंटल पैनल और क्लाइमेट चेंज। आईपीसीसी की

19:33 रिपोर्ट बताती है कि जलवायु परिवर्तन से एशिया की नदियों के प्रवाह में काफी उतार-चढ़ाव आएगा। कभी अचानक बाढ़, कभी सूखा और ग्लेशियर पिघलने से लॉन्ग टर्म वाटर सिक्योरिटी पर खतरा है। तो भारत की नदियों के फ्यूचर फ्लो पर क्लाइमेट चेंज का कितना असर होगा? क्या हमारी नीतियां इस बदलाव के लिए तैयार हैं? क्लाइमेट चेंज एक एक रियलिटी है। नो डाउट अबाउट इट। बट क्लाइमेट चेंज एक व्यापक स्तर पर है। पर हमको जो एक्शन लेना है वह स्थानीय स्तर पर लेना है। तो मेरे को लगता है कि हमको अपने तरीके से जो हमारे संस्कृति है उसके हिसाब से हम काम करें कि कैसे हम नदी को संरक्षित कर सके और जिसके जैसे कि तीन उपाय यह है कि एक तो हमको नदी

20:18 में पानी बढ़ाना है। पानी में बढ़ाने के लिए हमारा सबसे यह है कि हम जल ग्रहण शस्त्र में जितना ज़्यादा पानी के जो फ़्लो है उसको शिथिल कर सके और उसके कई उपाय है। दूसरा जो हमारा बाकी के दिनों में जो पानी हम इस्तेमाल करते हैं ये हम कहते रहते हैं कि हमारी पापुलेशन ज्यादा है और पापुलेशन के हिसाब से डिमांड कैलकुलेट करते हैं और कहते हैं कि वाटर स्ट्रेस है। मेरे को नहीं लगता है कि हमारी परिस्थिति किसी भी क्षेत्र की जो डिमांड होती है वो सिर्फ वहां पे जो वाष्पीकरण होता है और पौधों के तरफ पेड़ों के तरफ जो पानी ऊपर जाता है वही उस एरिया की डिमांड होती है। इसका मतलब यह है कि हम उसी पानी को यदि सर्कुलेट करते रहे जिसको कि हम रीयूज रिसाइकल की बात कर सकते हैं। पर वो रीयूज

21:04 रिसाइकल हमारे जलाशय के थ्रू ही होना चाहिए ताकि हम पानी का इस्तेमाल करें। उसको जिस लेवल तक हमको ट्रीटमेंट करना है टेक के वो पानी फिर हम जलाशयों का दें और फिर जलायश से अपना पानी ले ताकि हमारी इकोलॉजिकल रिक्वायरमेंट भी हो। तो क्लाइमेट चेंज एक मुद्दा है। पर क्लाइमेट चेंज से डील करने का सबसे बड़ा तरीका यही है कि हम स्थानीय स्तर पे अपने समाज के थ्रू व्यापक स्तर पे काम करना पड़ेगा। और यही दो तीन मुद्दे हैं कि एक तो पानी को हम कैसे संचय करें बारिश के दिनों में और सबसे ज्यादा यह है कि हम ग्राउंड वाटर कैसे भरे हां उसके लिए जल ग्रहण क्षेत्र का जो ये करना है वो भी हम गांव के लोगों के मदद से ही कर सकते हैं और दूसरा हम जो पानी इस्तेमाल

21:50 करते हैं उसके बाद उसका प्रबंधन कैसे हो वो कैसे आज अभी हम देखेंगे सब जगह हमारी सबसे ज्यादा नदी की समस्या हम पूरे साल भर देखते हैं यदि बारिश के दिन छोड़ दें तो सब जगह हमें अपना गंदा पानी ही मिलता है। उस गंदे पानी की व्यवस्था वो हर समाज की हर गांव की हर कॉलोनी की अपनी जिम्मेदारी होनी चाहिए। अभी हमने समव ये कर दिया है कि ये जो व्यवस्था करना है ये केंद्र सरकार या राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। तो मैंने फिर मैं फिर कहूंगा कि यह जिम्मेदारी लोगों को अपनी लेनी चाहिए कि मेरे घर से मेरा जो यूज किया हुआ पानी निकलता है वो कहां जाता है। उसका भी प्रबंधन मेरे ही हाथ में होना चाहिए और मेरे को उसमें सहयोग करना चाहिए और ना जाओ क्योंकि ये कोऑर्डिनेटेड वो होना चाहिए। तो सरकार का काम उसको कोऑर्डिनेट करने का।

22:37 अदरवाइज हर कोई अपनेप तरीके से करेगा तो शायद केवास हो जाएगा। तो सरकार का काम सिर्फ उसको कोऑर्डिनेट करना, फैसिलिटेट करना और कुछ सीट देना होना चाहिए। बाकी व्यवस्था मेरे को लगता है हां अगर कोई अपने कॉलोनी में अपने शहर में अपने गांव में बिलकुल डॉक्टर तारे जैसे तो रमनकांत जी जैसे डॉक्टर तारे बार-बार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि लोकल लेवल पर और ज्यादा गहराई से काम करने की जरूरत है। आपने भी कहा जैसे कि जन भागीदारी जब तक नहीं होगी तब तक कितने भी सरकारी प्रयास क्यों ना किए जाए वो नाकाफ़ होंगे। आज सोशल मीडिया का भी जमाना है। क्या सक्सेस स्टोरीज कहीं से उस तरह से सामने आ पाती हैं जैसे आनी चाहिए क्योंकि छोटी-छोटी कोशिशें ही बड़ा बदलाव लाएंगी और लोगों की नजर में उन्हें लाना भी जरूरी है। क्या ऐसी स्टोरीज हमारे

23:23 सामने आ पाती हैं? और जब हम अलग-अलग लेवल पर खासकर लोकल लेवल पर स्थितियों को मजबूत करने की बात कर रहे हैं तो हम देखते हैं दिल्ली की यमुना, अहमदाबाद की साबरमती, लखनऊ की गोमती जैसी नदियां शहरी प्रदूषण और अतिक्रमण की सबसे बड़े शिकार हैं। तो क्या हमारे शहरी नदियों का जो मॉडल है वो पूरे देश की नदी व्यवस्था का भविष्य दिखा रहा है? और अर्बन रिवर मैनेजमेंट के लिए क्या हमें अलग नीति की जरूरत है और लोकल लेवल पर एक अलग-अलग पॉलिसी की जरूरत होगी। अलग-अलग रोड मैप की जरूरत होगी फॉलो करने के लिए? देखिए देश में बहुत अच्छे-अच्छे काम नदियों पर हो रहे हैं जो समाज के द्वारा किए जा रहे हैं। कहीं-कहीं अलग-अलग डिस्ट्रिक्ट में ऑफिसर्स भी उसको प्रयास को कर रहे हैं। जैसे कि उत्तर प्रदेश की अगर बात करूं कि यहां उत्तर प्रदेश सरकार ने एक नदी एक जनपद की एक योजना शुरू की है

24:10 कि हर जिले में एक नदी को लिया जाए। उसको पुनर्जीवित किया जाए। लेकिन अभी जो काम है वह सतही है। सतही से मतलब यह है कि एक बार खोद दिया फिर पानी आ गया फिर उसको छोड़ दिया क्योंकि नदी को अगर हमको पुनर्जीवित करना है तो उसके सारे आयामों पे काम करना पड़ेगा कि वो स्थाई बना रहे। ऐसा तो है नहीं कि हम हर साल इतना पैसा लगाकर उस नदी को खो देंगे। तो जो स्थाई काम हमको करने हैं तो उसको हमको एक कंप्लीट मॉडल देने पड़ेंगे कि एक नदी छोटी नदी कैसे पुनर्जीवित होती है। उसके लिए हमको क्या-क्या काम करना है उसका प्रयास समाज तो अपने स्तर से कर रहा है लेकिन नमामि गंगे जैसे संगठनों को वह मॉडल हमको देने चाहिए समाज को कि एक नदी को अगर पुनर्जीवित करना है तो ऐसे करना चाहिए। दूसरा शहरी नदियों की जहां तक बात है शहरों शहरी नदियों की एक समस्या है कि

24:57 सीवेज बहुत ज्यादा है तो सीवेज के ट्रीटमेंट के लिए एसटीपीस लगातार बनाए जा रहे हैं। लेकिन एक समस्या आ रही है कि एसटीपी चल नहीं रहे हैं। हम बहुत लगातार मॉनिटरिंग भी होती है लेकिन फिर भी कहीं ना कहीं चोरी हो जाती है और हो रही है। अगर एसटीपी चल भी रहे हैं और ट्रीट भी कर रहे हैं तो फिर उसी गंदे पानी में उस पानी को डाल दे रहे हैं। तो हमको ऐसा भी करना पड़ेगा कि उस पानी को यूज़ किया जाए। जो एसटीपी से ट्रीट होने वाला पानी है उसको या तो कृषि में आप दीजिए या आपको उसको सप्लाई में दीजिए। आप टॉयलेट वगैरह में उसको सप्लाई में दे सकते हैं। क्योंकि आप ट्रीट भी कर रहे हैं जिस पानी को फिर उसको गंदे पानी में डाल दे रहे तो वही व्यवस्था बन जाती है। दूसरा एसटीपीस की जो मॉनिटरिंग है वो एक सख्त होनी चाहिए क्योंकि ये एक बहुत बड़ा गैप है। हम पैसा भी खर्च कर रही है सरकार और फिर भी वो काम नहीं हो रहा तो ये

25:42 एक बहुत बड़ा एक हमारे ऊपर एक धब्बा है क्योंकि इसको हमको सुधारना पड़ेगा। उसमें समाज की भूमिका भी हो सकती है क्योंकि समाज के लोग जहां एसटीपी बना है वहां एक मॉनिटरिंग सिस्टम हम खड़ा कर सकते हैं या और बहुत सारे तरीके हो सकते हैं जिससे कि उस पे सख्ताई हो। अभी जो नए एसटीपी बन रहे हैं उसके लिए कुछ प्रयास लगातार नमामिंग कर रहा है। हम देख रहे हैं कि 15 साल तक उसको संचालन की भी व्यवस्था दी जा रही है। तो ऐसे प्रयास अगर हम करेंगे वो समाज के साथ जुड़कर के करेंगे तो मुझे लग रहा है कि हम जो वाटर विज़ 2047 है भारत सरकार का उसमें हम अपनी नदियों को निर्मल और अवरल बना पाएंगे। बिल्कुल और इसी के साथ चर्चा का समय ही पूरा हो गया। रमनकांत जी आपका डॉ. विनोद तारे आप दोनों मेहमानों का बहुत-बहुत शुक्रिया मेरे साथ आज इस चर्चा में जुड़ने के लिए। तो आज की चर्चा से बहुत कुछ साफ हुआ है कि नदियां सिर्फ जल स्रोत नहीं बल्कि हमारी अर्थव्यवस्था,

26:28 पर्यावरण और संस्कृति की धड़कन है। लेकिन चुनौतियां गंभीर हमारे सामने खड़ी हैं। प्रदूषण, अवैध खनन और जलवायु परिवर्तन। हमें नीति, तकनीक और जनता, भागीदारी को एक साथ लाना ही होगा। नदियों की रक्षा करना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं बल्कि हर नागरिक की जिम्मेदारी है। और अगर हम छोटे-छोटे स्तर पर बदलाव लाएं और बड़ी नीतियों को जमीन पर सही से उतारें तो ही हम आने वाली पीढ़ियों को स्वस्थ और जीवनदा दायनी नदियां दे पाएंगे। इसी के साथ इंस्टाइट में आज फिलहाल मेरे साथ इतना ही। आप बने रहिए टीवी के साथ। नमस्कार। [प्रशंसा]

27:20 [संगीत] संसद टीवी के और भी प्रोग्राम्स देखने के लिए सब्सक्राइब करें हमारा YouTube चैनल और हां इन्हें लाइक और शेयर करना ना भूलें। भूलें।

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