0:00 मेरा सवाल होली के ऊपर है। जैसे महिलाओं के साथ अभद्रता और होली के साथ मांस की खपत तो होली का क्या यही मतलब है? टीवी अखबार सोशल मीडिया शुरू हो गया है सब पर। वही चल रहा है कि होली माने ये। एक-एक बात प्रतीकात्मक है। उसको समझो। नहीं तो फिर वही करोगे जिसकी प्रश्नकर्ता बात कर रही थी। हिरण्यकश्यपु ने अद्भुत तपस्या करी और तपस्या करी और कहते हैं ब्रह्मा से वरदान मान लिया और उसने ढिंढोरा पिटवा दिया। कोई मिल गया इधर-उधर किसी की पूजा करते हुए तो मार मूड़ दूंगा। मेरे ही मंदिर बनाओ मुझे ही पूजो। एक नन्ना सा ऐसे निकल आया। ये देखो प्रहलाद अपने ही घर में निकल आया। वो इतना सा निकल आया। बोला ये सब कुछ नहीं। घर की बात है। मैं तो जानता हूं ना।
0:45 तो बुआ जी ने कहा होगा कि अरे ये तो लड़का बिल्कुल ही हाथ से निकल गया है और जनता तक बात पहुंच गई कि अरे हिरण्यकश्यपु के तो घर में ही विद्रोह हो गया है तो फिर पूरी प्रजा ही क्या पता विद्रोही हो जाए कि जब ये अपने घर को ही नहीं संभाल सकते तो राज्य क्या संभालेंगे बोले इस लड़के को तो उड़ा देते तो खत्म करते हैं। बुआ जी को दांव उल्टा पड़ गया। बुआ जी भस्मीभूत सोचने वाली बात नहीं है। दोनों हाड़ मांस के हैं। जैसे बुआ जी जली वैसे ही बच्चा भी जल जाता नहीं जल जाता। पर यहां आग एक विशिष्ट प्रतीक की तरह है। यो वो आग नहीं है वो जो आप ले जाकर के लकड़ी इकट्ठा करके अभी कल परसों जलाओगे। पर हम उस आग को जाने बिना क्या करते हैं? किसी के घर के सामने कुर्सी उठा के ले आओ फूंक दी। और वो पीछे से दौड़ता हुआ आ रहा है। उससे कह रहे बुरा ना मानो होली है। अब वो
1:32 होलिका के जाने के बाद की कहानी तो पता ही है। फिर वो आग कौन सी है? इसका हमें कुछ ज्ञान ही नहीं। तो सचमुच हमें भी क्या जलाना है हर साल होली पे यह भी हमें कुछ पता नहीं और होली हर साल लौट कर क्यों आती है यह भी हम जानते नहीं प्रणाम प्यारे जी मेरा सवाल होली के ऊपर है जैसे कुछ दिन बाद ही होली आने वाली है तो जहां अभी से ही मतलब होली शुरू हो चुका है वहां से ऐसे न्यूज़ सामने आ रही है कि महिलाओं के साथ अभद्रता और जैसे कि हम जानते ही हैं कि होली के साथ मांस और जो नशा मांस की खपत और न्यूज़
2:18 में भी मतलब होली के साथ-साथ यही सब छाए हुए रहते हैं कि रंग गुलाल तो मेरा सवाल यही है कि होली का क्या यही मतलब है? अगर यह नहीं है तो वास्तविक अर्थ क्या है? वास्तविक अर्थ तो बहुत अच्छा है। आनंदप्रद है, रसपूर्ण है। उसमें बोध भी है, मजा भी है। पर वास्तविक अर्थ समझ लोगे तो जिस स्तर का अभी मजा लेते हो आप लोग होली का उस स्तर का मजा थोड़ा खतरे में पड़ जाएगा। हम
3:10 ऊंचा मजा होता है ना जिसको शास्त्र आनंद कहते हैं वो साधारण मजे वो खतरे में डाल देता है। तो इसीलिए फिर हम ऊंचे अर्थ और उससे मिलने वाला ऊंचा आनंद सबको ठुकरा देते हैं। राजा का क्या नाम था? मैं भूल गया। हिरण्यकश्यप नाम था नहीं। हिरण्यकश्यप नहीं नाम था। यह सब
3:56 लोक धर्म यहीं से शुरू हो जाता है। नाम ही खराब कर देता है। नाम ही बड़ा सांकेतिक है। नाम से ही सीख लोगे। हिरण्यकश्यपु हिरण्य कश्यप। हिरण्य माने होता है सोना या धन। अच्छा वेदों या उपनिषदों में हिरण्य सुना है कहीं? कहां सुना है? हिरण्यगर्भ। हिरण्य गर्भ और कहां सुना है? कई जगह आता है। एक बड़े बहुत बड़ा महत्वपूर्ण सूक्त है। उसमें आता है। हां। क्या है उसमें? हिरण्य माने होता है सोना। धन। कुछ भी ऐसा
4:43 जिसमें स्वर्ण प्रभाव हो। माने सोने जैसी चकाचौंध हिरण्य। और कशिपु माने होता है बिस्तर शैया जो अपने आप को सुख की स्वर्ण की धन की शैया देना चाहता हो वो हो गया हिरण्यकश्यपु वो किसका प्रतीक है कौन हर हर समय यही मांग रहा होता है। सुख सुविधा सोना किसको चाहिए? अहंकार हिरण्य कश्यपु अहंकार का प्रतीक है। ठीक है?
5:32 और मजेदार बात है। आज ही होली पर सवाल किया। आज ही करोगे। में होली आ रही है। आज गीता में क्या कह रहे थे श्री कृष्ण कि यत्न तो बहुत करते हैं। सातवां अध्याय तीसरा श्लोक यत्न तो बहुत करते हैं पर सिद्धि के लिए यत्न करने वाला हजारों में एक होता है। तो हिरण्यकश्यपु ने भी बड़ा यत्न किया। बड़ा यत्न किया। अहंकार खूब यत्न कर सकता है। हिरण्यकश्यपु ने अद्भुत तपस्या करी। अहंकार बड़ा मेहनती हो सकता है। खूब मेहनत करता है। और तपस्या करी और कहते हैं ब्रह्मा से
6:17 वरदान मांग लिया। तपस्या करने वाला भी कौन है? अहंकार। पर वो एक शर्त रखकर तपस्या कर रहा है। खुद को बचाऊंगा और अपने ही लिए वरदान मांगूंगा। भाई नाम ही है उसका हिरण्यकश्यपु तो वो वरदान सब अपने लिए मांगेगा। आप भी अगर मेहनत वगैरह कर रहे हो तो यह कोई अनिवार्य रूप से आपकी श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं है। इसी को आप देखो कि बहुत जान लगा रहा है। बहुत मेहनत कर रहा है। तो इससे जरूरी नहीं कि उसके बारे में कुछ अच्छा ही साबित हो रहा हो। मेहनत तपस्या यह तो हिरण्यकश्यपु
7:03 ने भी करी है। रावण ने भी करी है। दुर्गा सप्तशति में न जाने कितने ये दानवी चरित्र आते हैं। जो सब तपस्या किए बैठे थे और वरदान पाए बैठे थे। कुछ तो ऐसे हैं जिनको सांकेतिक रूप में कहा गया कि वह सीधे विष्णु के शरीर से ही पैदा हो रहे हैं। पहला ही चरण सप्तशति का। और मेहनती इतने कि वह हजारों साल तक फिर युद्ध भी कर रहे हैं। किससे? विष्णु से। वो विष्णु से युद्ध भी कर रहे हैं। अब युद्ध में इतना लंबा युद्ध उसमें मेहनत चाहिए। तो ऐसा नहीं है कि अहंकार आलसी,
7:49 काहिल, तामसिक ही होता है। ऐसा कुछ नहीं है। वह बहुत मेहनती होता है। वह जान लड़ा सकता है। इस बात को अच्छे से समझना। वो अपनी रक्षा के लिए मेहनत करनी पड़ी तो मेहनत करना करेगा। सोना पड़ा तो सोएगा। जगना पड़ा तो जगेगा। रोना पड़ा तो रोएगा। सारे काम वो कर सकता है। बात यह है कि ये सारे काम वो करता है अपनी सुरक्षा के लिए। खुद को बचाने के लिए। तो यह राजा हिरण्यक कश्यपु अच्छा यह जो राजा जी थे यह भी पुत्र ऋषि के ही थे। यह इनका भाई था एक हिरण्याक्ष दोनों
8:39 तो ऋषियों से भी जो उत्पन्न होता है अहंकार वहां भी हो सकता है। माने ऊंचे से ऊंचे ग्रंथ भी होते हैं पर जब वो आगे बढ़ते हैं वंश में तो वो अहंकार का रूप ले सकते हैं। ठीक वैसे जैसे श्रुति धर्म लोकधर्म बन जाता है। रावण भी किसकी संतान था? ऋषि की ही संतान था। मतलब समझ रहे हो? तो इन सब संकेतों को समझो कि कैसे श्रुति धर्म लोक धर्म बन जाता है
9:28 कि दिया तो ऋषियों ने कुछ और है। शुरू ऋषि से हुआ है और बन गया रावण। शुरू ऋषि से हुआ है बन गया हिरण्यकश्यपु। यह बिल्कुल हो सकता है। तो जीवन के बारे में बहुत कुछ बताती हैं। यह कथाएं अगर उन्हें हम ध्यान से समझे और इन कथाओं को ध्यान से समझेंगे तो फिर हम त्यौहार को भी ठीक से मना पाएंगे। तो इन्होंने खूब मेहनत करी। खूब मेहनत करी और मेहनत करके वरदान मांग लिए। अब वरदानों को समझना। अहंकार हमेशा अपने लिए क्या मांगेगा? अहंकार कहां सुरक्षा पाता है? द्वैत में। जहां द्वैत है वहां अहंकार को कोई नहीं मार सकता। जहां द्वैत है वहां अहंकार को कोई नहीं
10:14 मार सकता। तो हिरण्यकश्यपु ने अपने लिए सारे द्वैत मांग लिए। क्या बोले? दिन में भी सुरक्षित रहूंगा, रात में भी सुरक्षित रहूंगा। मुझे दिन में भी सुरक्षा है, मुझे रात में भी सुरक्षा है। ना मैं महल, भवन या घर के भीतर असुरक्षित रहूंगा, ना बाहर। समझ रहे हो? ना मैं भीतर मारा जा सकता ना मैं बाहर मारा जा सकता ना अस्त्र से मरूंगा ना शस्त्र से मरूंगा और एक चौथी चीज और रखी थी हां हां ना जमीन पर ना आकाश में
11:03 ना नर द्वारा ना पशु द्वारा माने जितने भी इसी को ये तो चार पांच शर्तें हैं इसको आप और आगे बढ़ा लो। 141 कर लो। पर इशारा समझो सब तरीके के द्वैतों में मैं सुरक्षित रहूंगा। और द्वैत के अलावा अहंकार कुछ जानता नहीं। और उसने द्वैत में अगर अपने लिए सुरक्षा मांग ली तो अपने देखे तो वो सुरक्षित ही हो गया। कि भाई दिन के बाद रात आती है। यही द्वैत का चक्र चलता है। ना दिन में मरूंगा ना रात में मरूंगा ना अंदर मरूंगा ना बाहर मरूंगा। ना आदमी से मरूंगा ना जानवर से मरूंगा। तो फिर तो अब मुझे कोई मार ही नहीं सकता। अहंकार ने अपने लिए यह मांग लिया और क्यों नहीं मरना है?
11:49 क्यों नहीं मरना है? क्योंकि डरा हुआ है। इतना डरा हुआ है कि जानता है कि मरण धर्म है। झूठ तो कभी जिंदा ही नहीं हुआ तो उसको तो मरने से डर लगेगा ही ना। जो नकली जान लेकर जी रहा है उसको तो मरना भी नहीं है। उसकी तो बस पोल खुलनी है। अहंकार तो सच पूछो तो जिंदा भी नहीं है। वो तो जिंदा होने का ढोंग करता है। तो उसको हमेशा खतरा लगा रहता है। कहीं मेरी पोल ना खुल जाए। तो इसलिए फिर वो अगर तपस्या भी करता है तो बस यही वरदान मांगने के लिए कि मरूं ना मरूं ना। मुझे मरना नहीं है, मुझे मरना नहीं है और ना मरने के लिए वह द्वैत का आश्रय लेता है। अहंकार ना मरने के लिए द्वैत का आश्रय लेता है। ठीक
12:37 है? कितना भी आश्रय ले ले उसको भरोसा ही नहीं आता। कि वो अमर है। क्योंकि अमर तो मात्र सत्य होता है। अहंकार अब सत्य तो है नहीं। अमर तो सिर्फ सत्य होता है। अहंकार सत्य है नहीं तो उसको भरोसा नहीं आता कि मैं अमर हूं। तो फिर वह क्या करता है कि वह पूरे राज्य में आदेश पारित कर देता है कि सब मुझे ही सर्वोच्च मानेंगे। इस पूरे राज्य में किसी की पूजा नहीं होगी क्योंकि मैं ही सत्य हूं। यह अहंकार क्या घोषणा कर रहा है? मैं अहंकार थोड़ी हूं। मैं आत्मा हूं। मेरी पूजा करो। मैं अहंकार थोड़ी हूं। मैं
13:22 आत्मा हूं। मेरी पूजा करो। सबसे खतरनाक बात तब होती है और यह बड़ी बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण क्षमता है अहंकार के पास। वो विषयता तो है ही। वो स्वयं अपना विषय भी बन सकता है। द ईगो कैन ऑब्जेक्टिफाई इटसेल्फ। वह स्वयं ही अपने दो फाड़ कर सकता है और अपने एक फाड़ को अपना विषय बना सकता है। वह अपने दूसरे फाड़ को ईश्वर घोषित कर सकता है और कह सकता है मैं तो ईश्वर की पूजा कर रहा हूं। जबकि वो जो ईश्वर है वह अहंकार का ही प्रक्षेपण है।
14:09 अहंकार का ही एक फाड़ है। सब्जेक्ट ने ही अपने आप को क्या बना लिया है और उसकी पूजा करनी शुरू कर दी है। अहंकार ही अपने आप को क्या घोषित कर देता है? आत्मा। और जब वह अपने आप को आत्मा नहीं घोषित कर देता तो इतना तो कर ही देता है कि अच्छा मैं आत्मा नहीं हूं। मैं अहंकार हूं पर वो आत्मा है और मैं तो उसका सेवक हूं। और वो जिसको वो आत्मा कह रहा है वो भी क्या है? वह अहंकार का ही एक रूप है। वह अहंकार की ही परिभाषा से बंधी हुई चीज है। तो अहंकार जब अपने आप को आत्मा नहीं घोषित कर सकता तो अपने किसी प्रक्षेपण को
14:54 हम अपनी किसी कहानी को आत्मा घोषित कर देता है और उसकी पूजा शुरू कर देता है। हिरण्यकश्यपु के पास ऐसी कोई मजबूरी नहीं थी। तो उन्होंने कहा अरे आत्मा की पूजा क्या करनी है? खुद ही अपने आप को घोषित कर दो ना। मैं ईच भगवान हूं। तो हिरण्यकश्यपु ने क्या आदेश चला दिया? यहां किसी की पूजावजा नहीं होगी। मैं ही भगवान हूं। मेरी पूजा होगी। यह अहंकार है जो दावा कर रहा है मैं ही आत्मा हूं और उसे ये दावा इसलिए करना पड़ रहा है क्योंकि खुद वो कभी आश्वस्त हो नहीं पाता कि वो सत्य है। तो अब वो अपने आप को दूसरों की नजर से आश्वस्त करना चाहता है।
15:42 मुझे खुद कभी भरोसा नहीं आ सकता कि मैं सत्य हूं। अजर अमर आत्मा हूं। कभी नहीं आ सकता। क्योंकि मेरी जिंदगी है ना। सच्चाई तो मैं जानता हूं। मुझे पता है मैं कौन हूं। मुझे पता है कि भीतर झूठ है और मृत्यु का ही खेल चल रहा है। मुझे पता है। तो अब यह सब प्रजा है। प्रजा है। मैंने किसी ने अगर किसी भगवान की पूजा की तो सर कटवा दूंगा। मैं ही हूं। मैं ही हूं। मैं ही हूं। इससे इसको थोड़ा भरोसा आता है। इससे इसको थोड़ा आश्वासन मिलता है कि जब इतने लोग बोल रहे हैं तो मैं ही हऊंगा। कोई अकेला मैं खुद थोड़ी कह रहा हूं कि मैं ही सत्य हूं, मैं ही परम, मैं ही सर्वोच्च हूं। मैं ही थोड़ी बोल रहा हूं।
16:27 इतने लोग बोल रहे हैं। जब इतने लोग बोल रहे हैं तो शायद ठीक ही बोल रहे होंगे। जैसे आपको भरोसा आ जाता है। आप सच-बच के निकलते हो। उसने कहा आ गॉर्जियस। उसने कहा आज तो जम रही हो। उसने कहा अरे वाह बहुत बढ़िया। कहां से खरीदी ये? तो भरोसा आ जाता है कि बिल्कुल ठीक है अपना माल। हम बाहर निकलते कोई कहता है भाई भाई भाई हमारा भाई का भाई है तो भाई भी ऐसे फूल जाता है कि जरूर मैं कोई होऊंगा मैं भाई का भाई हूं जो उसका जो भी मतलब है भाई का भाई बोलने से अच्छा भाई ही बोल देते भाई का भाई तो भाई ही होता है होता है ना अहंकारकि खुद को सीधे देखने से बहुत डरता है तो इसीलिए वो स्वयं को अपने ही विषयों की आंख
17:14 से देखना चाहता है और धांधली कर लेता है। मैं खुद को सीधे देखूं तो क्या पता पोल खुल जाए। तो इससे अच्छा मैं सामने एक ऑब्जेक्ट खड़ा करता हूं। वो ऑब्जेक्ट किसने खड़ा करा है? मैंने ही। तो वो ऑब्जेक्ट वही बात करेगा जो मैं चाहता हूं। और अब मैं उससे वही बात कहलवा लूंगा जो और मैंने वो बात कहलवा ली। फिर मैं कहूंगा देखो अब तो एक इंडिपेंडेंट ऑब्जेक्ट ने यह बात बोली है तो सच होगी। मैंने थोड़ी बोली है। उसने बोली है। मैं कूल हूं। हूं। मैं डूड हूं। मैं सुंदर हूं। मैं स्मार्ट हूं। मैं सेक्सीी हूं। यह मैंने थोड़ी बोला है। यह मैंने किससे सुना? मैंने इससे सुना। यह बोल रहा है तो सही होगा। और कैसे सुना?
18:05 मैं मैं स्मार्ट हूं कि नहीं? हूं कि नहीं? मैं स्मार्ट हूं। यह निकलवाया फिर ये देख ये देख रहे हो हम अरे ये दिखा दो वहां मुंह क्या देख रहे हो? ये असली चीज यहां है। तुम्हें पता ही नहीं है। ऊपर ऊपर घूम रहे हो। हां तो ये ये हां भाई मैं स्मार्ट हूं कि नहीं हूं। जी ये काम करा हिरण्यकश्यपु ने। पूरी आज्ञा में बोल दिया कि सब बोलोगे कि मैं ही स्मार्ट हूं। मैं ही हाईएस्ट हूं। और नहीं बोलोगे तो और जैसे ही सब ने बोला तुमने कहा देखा अब मैं अकेला थोड़ी हूं जो
18:51 मानता हूं कि मैं ही भगवान हूं। सब मान रहे हैं। इसने भी अभी-अभी बोला। अभी-अभी इसने माना कि मैं ही हूं। यह अहंकार करता है। उसे अपनी बात पर कभी भरोसा आ ही नहीं सकता क्योंकि अपनी ही बात है। उसे पता है वह बात झूठ है। तो उस झूठ को वो दूसरों के मुंह से कहलवाता है ताकि खुद को ही धोखा दे सके और जता सके कि दूसरों ने बोला है दूसरे तो स्वतंत्र है तो उन्होंने सच बोला होगा पर दूसरे स्वतंत्र नहीं है। दूसरे तुम ही से बंधे हुए विषय है तुम्हारे ही। यदि वो सचमुच स्वतंत्र होते तो तुमसे कुछ और बोलते। और जो सचमुच स्वतंत्र है उसकी बात तुम सुनना चाहते नहीं हो। जो सचमुच स्वतंत्र है उसको तुम बर्दाश्त कर नहीं सकते तो उसके पास तुम कभी जाओगे नहीं क्योंकि वह तुम्हारा विषय नहीं बन सकता। तुम पूछने ही उनसे जाओगे
19:38 जिनके बारे में तुम्हें पता है कि तुमसे सच नहीं बोलेंगे। दाल में नमक ठीक है ना? हां ठीक है। उसकी हिम्मत की बोल दे कि ये पहले तो बताओ यह दाल है क्या? नमक की बात तो बाद में आएगी। और तुमने खुद को ही भरोसा दिला दिया कि मैंने दाल मस्त बनाई है। जिससे पूछ रहे हो क्या वह स्वतंत्र है? निष्पक्ष है नहीं वो तुम्हारा ही विषय है। वो तुमसे कभी सच नहीं बोलेगा। वो तुम्हारे
20:24 ही जैसा है। हिरण्यकश्यप को भी कौन मिल गया विषय? अपनी प्रजा। और उसने ढिंढोरा पिटवा दिया। कोई मिल गया इधर-उधर किसी की पूजा करते हुए तो मार मूर दूंगा। मेरे ही मंदिर बनाओ। मुझे ही पूजो। और यह सब होने के बाद भी आप बताओ हिरण्यकश्यपु को क्या भरोसा आया होगा? कोई भरोसा नहीं आया। काहे नहीं भरोसा आया वो एक नन्ना सा यथे निकल आया। यह देखो प्रहलाद इतना बड़ा अपने ही घर में निकल आया। पूरी प्रजा बोल रही है कि हां महाराज ही भगवान है। महाराज ही भगवान है।
21:11 वह इतना सा निकल आया। बोला यह सब कुछ नहीं। घर की बात है। मैं तो जानता हूं ना। दूसरों को डरा लोगे। मुझे सब पता है तुम्हारा। मैं नहीं मानता कि तुम भगवान भगवान कुछ हो। कायदे से तो कोई फर्क ही नहीं पड़ना चाहिए था। इतने बड़े राजा हो। ऊपर से तुम वरदान पा गए हो। सबको डरावरा लिया है। और कथा कहती है कि बहुत सारे इधर-उधर जितने थे सबको जीत भी लिया था। क्योंकि अब बल आ गया है मारे नहीं जा सकते ना तो सबको जीत भी लिया था तो तुम्हें क्या फर्क पड़ना चाहिए था वह इतना सा पिद्दी सा बच्चा तुम्हारा ही अपना बेटा वो आकर कुछ बोल रहा है तो तुम्हें क्या फर्क पड़ना चाहिए था पढ़ना चाहिए था नहीं पर पड़ जाता है अंधेरा कितना भी बड़ा
21:57 हो वो दिया ना उसमें ऐसा सुराग करता है कि अंधेरे की कोई हैसियत ही नहीं बचती आपसे पूछा था ना मैंने एक दिन कि सामने बड़ा लंबा चौड़ा अंधेरा बिछा हुआ हो और बीच में कहीं कोई बत्ती टिमटिमा रही हो तो आपकी आंख कहां जाकर ठहरेगी बत्ती पर। तो इसलिए अंधेरा बहुत जलता है। प्रकाश से बहुत जलता है। तो इतना बड़ा राज्य था राज्य में सब मान रहे थे कि हिरण्यकश्यपु भगवान है। डर के मारे मान रहे थे। पर वो बच्चे ने बोल दिया हम नहीं मानते। होना तो यह चाहिए था कि उपेक्षा कर देता। इग्नोर कर देता। कहता बच्चा है कुछ है छोड़ दो क्या फर्क पड़ता है? उपेक्षा नहीं कर पाया क्योंकि वो छोटा सा
22:44 दिया भी जान ले लेता है अंधेरे की। वो भी दिया अपने ही घर का। अच्छा यह भी मजेदार बात है कि अहंकार में से ही यह मुक्ति की अभीसा पैदा हो गई है। यह भी बात सांकेतिक है कि प्रहलाद प्रजा से नहीं उठकर आया है। हिरण्यकश्यप की अपनी औलाद है। प्रहलाद कोई प्रजा से उठकर आया बच्चा नहीं है। कोई बाहरी नहीं है। वह अहंकार की अपनी पैदाइश है। मतलब अहंकार के ही दिल में मुक्ति के प्रति प्रेम भी होता है।
23:33 अहंकार से ही मुमुक्षा पैदा होती है। हिरण्यकश्यपु अहंकार है और प्रहलाद मुमुक्षा है। अहंकार से ही तो मुमुक्ष पैदा होती है ना। बंधन है तभी तो मुक्ति चाहिए होती है ना। उस दिन मैं आपसे कह रहा था कि जिसे बंधनों से ही समस्या नहीं हो रही वो मुक्ति लेकर क्या करेगा? बंधन जब घोर घना होता है तभी तड़प उठती है ना आजादी की। तभी तो लगता है कि क्यों फंसे ऐसे नहीं जीना है। प्रहलाद उसी तड़प का नाम है। और यह बात कोई सागिक नहीं है कि उसको हिरण्यकश्यपु के घर में ही पैदा होना था। वह और कहीं नहीं पैदा हो सकता था। उसको वहीं पैदा होना था
24:20 क्योंकि सबसे ज्यादा तड़प वही थी। सब बंधनों का केंद्र वहीं था। तो प्रहलाद को भी वहीं पैदा होना था। हम और वो जो तड़प पैदा हो रही है। अंत में वो खाई जाती है अंधेरे को। खा जाती है कि नहीं? हम अब अहंकार के रिश्तेदार दीदी होलिका जैसे तुम वैसे ही तुम्हारी बहन जैसे तुम वैसे ही तुम्हारी बहन मतलब समझो कि जैसे तुम होते हो वैसे ही तुम्हारा माहौल होता है और जैसा तुम्हारा माहौल होता है वैसे ही तुम हो जाते हो ये एक द्वेतात्मक रिश्ता होता है जो दोनों तरफ
25:05 की गंदगी को सुरक्षित रखता है जैसा राजा वैसी ही प्रजा यह तो दिख गया राजा भी बोल रहा है मैं कौन हूं और प्रजा भी बोल बोल रही है कि आप कौन है? और जैसा भाई वैसी बहन जैसा भाई वैसी बहन तो जो यह पूरा जो कुल कुटुंब नाथ रिशेदारी यारी दोस्ती का जो पूरा जमघट होता है यह सच पूछो तो आप जैसे हो आपको वैसा ही बनाए रखने के लिए होता है। यह आपको बढ़ने बदलने नहीं देगा। यह आपको बेहतर नहीं बनने देगा। तो बुआ जी आ गई बिल्कुल कूद के। बुआ तुम्हें क्या लगता है? आजकल ही ऐसी हो गई हैं।
25:54 यह बुआ लोगों का खेल तभी से ऐसा चल रहा है। उन्होंने कहा आ जाओ इसका। बोली मेरे पास तो सिद्धि है। मैं ऐसे डाल लेती हूं। आगवाग में मैं नहीं जलती। और यह तो और प्रहलाद के और थे। तीन भाई थे। तो बुआ जी ने कहा होगा कि अरे तुम तो राजा हो। तुम्हारे तीन और भी हैं। और यह तो लड़का बिल्कुल ही हाथ से निकल गया है। और दूसरी बात इसकी देखा देखी बाकी तीन जो भाई हैं वो भी बागी हो गए। विद्रोही हो गए तो गड़बड़ हो जाएगी। और जनता तक बात पहुंच गई कि अरे हिरण्यकश्यपु के तो घर में ही विद्रोह हो गया है। तो फिर पूरी प्रजा ही क्या पता विद्रोही हो जाए। कि जब ये अपने घर को ही नहीं संभाल सकते तो राज्य क्या संभालेंगे? बोले इस लड़के को तो उड़ा देते
26:41 हैं तो खत्म करते हैं। तो आ गई बुआ जी जैसे इनको वरदान मिला वैसे बुआ जी को मिला हुआ है। उनको कुछ मिला हुआ था कुछ चोला चौगा आवरण या शायद शिव शक्ति हां हां कि ये पहन कर बैठेंगी आग में तो जलेंगी नहीं। पर यहां आग एक विशिष्ट प्रतीक की तरह है। यहां आग किसकी है? यहां आग विवेक की है। यहां उसकी आग है जो सार को बचा देती है। असार को मिटा देती है। विवेक का क्या मतलब होता है? सार असार में भेद कर पाना। तो यह वो आग थी जो भेद कर लेती थी। इस आग को पता था क्या जलाना है क्या नहीं जलाना है।
27:28 यह वो आग है। यह वो आग नहीं है वो जो आप ले जाकर के लकड़ी इकट्ठा करके अभी कल परसों जलाओगे। यह वह आग थी जो सब कुछ इन्रिमिनेटली नहीं जला देती थी। यह डिस्क्रीशन की आग थी। यह विवेक की आग थी। यह नित्य अनित्य में भेद करना जानती थी। यह सत असत में भेद करना जानती थी। यह वो आग है। पर हम उस आग को जाने बिना क्या करते हैं? किसी के घर के सामने कुर्सी उठा के ले आ फूंक दी। और वो पीछे से दौड़ता हुआ आ रहा है। उससे कह रहे बुरा ना मानो होली है। होता है कि नहीं होता है? किसी के घर के
28:14 सामने उसका पेड़ काट दिया। बुरा ना मानो होली है। अरे यह विशिष्ट आग है जिसकी बात हो रही है। विवेक की आग है। लकड़ी वाली आग नहीं है। तभी इस आग ने होलिका को जला दिया। प्रह्लाद को बचा दिया। अगर साधारण आग होती तो दोनों को जला देती। सोचने वाली बात नहीं है। दोनों हाड़ मास के हैं। जैसे बुआ जी जली वैसे ही बच्चा भी जल जाता। कि नहीं जल जाता? पर यह आग भी जैसे चैतन्य थी। विवेक है इसके पास। ये विवेक रूपी अग्नि है। इसको भेद करना विभाजन करना आता है। किसको जलाना
29:01 है? उसी को जलाना है जिसको बचाना है उसको बचा देना है। सारस सार को गही रहे थोथा दे उड़ाए। थोथे को जला देना है। गंदगी जला दो। सोना बचा लो। तो आग ने यही करा। बुआ जी को दांव उल्टा पड़ गया। बुआ जी भस्मीभूत और प्रहलाद कह रहा है दोबारा मत करना हम पूरी जनता खौफ में प्रह्लाद रक्ड अहंकार शॉक्ड गड़बड़ हो गई
29:49 एक-एक बात प्रतीकात्मक है। उसको समझो नहीं तो फिर वही करोगे जिसकी प्रश्नकर्ता बात कर रही थी कि लड़कियां छेड़ रहे हैं। रंग लगाने के बहाने जाकर और नशा और यह जानवरों को काट रहे हैं। चिकन खाना है क्योंकि होली है, बकरा खाना है, होली है। विदेशी महिलाओं का तो हर साल आता है। अच्छा हो इस साल ना आए। खासकर धार्मिक जगहों से आता है और यह और ज्यादा दुर्भाग्य की बात है। मथुरा वृंदावन यहां से ज्यादा आता है कि गई थी उनको पकड़ करके रंग लगाने के बहाने छेड़छाड़ दिया। चूमा चाटी भी कर ली। ये सब
30:36 क्यों? क्योंकि कथा जो समझाना चाहती है वह तो हमने समझा ही नहीं। कथा के प्रतीकों को हम जानते ही नहीं। आ रही है बात समझ में? वो आग कौन सी है? इसका हमें कुछ ज्ञान ही नहीं। तो सचमुच हमें भी क्या जलाना है हर साल होली पे? यह भी हमें कुछ पता नहीं। और होली हर साल लौट कर क्यों आती है? यह भी हम जानते नहीं। भाई होलिका साफ हो गई। उसके बाद नरसिंह आए और हिरण्यकश्यप को भी साफ कर दिया। तो होली हर साल क्यों आ रही है? फिर जिनकी
31:22 सफाई होनी थी वो तो हो गई। तो हर साल होली क्यों जला रहे हो? उसके पीछे भी कारण है। पर वो कारण हम समझते नहीं। क्या कारण है? हर साल क्यों मनानी है? अब वो होलिका के जाने के बाद की कहानी तो पता ही है। फिर वह एक बोले कि तू ऐसे नहीं मरेगा। तो एक खंभा तपवाया खंभा तपवाया और कहा कि जाकर के तू इसको पकड़ के खड़ा हो जा कि अब इसी में जल के मर जा। उस आग में नहीं मरा तो तू इस आग में मरेगा। तो वो उसी खंभे से फिर कहते हैं कि नरसिंह प्रकट हुए। और द्वैत की जितनी शर्तें रखी थी सब शर्तों
32:07 का उल्लंघन कर दिया। बोले भीतर बाहर के मध्य की चौखट पर मारूंगा तुझे। दिन और रात के बीच की सांझ गोधुली बेला में मारूंगा तुझको। ना अस्त्र चाहिए ना शस्त्र चाहिए। नाखून से फाड़ दूंगा ना धरती ना आसमान है। यहां जांघ पर रख के फाड़ दूंगा। बीच में मतलब समझ रहे हो? अद्वैत अद्वैत है जो द्वैत को काट देता है। यह होली का संदेश है। अहंकार द्वैत के माध्यम से अपने आप को बचाने की कितनी भी कोशिश कर ले अद्वैत फाड़ ही देगा। द्वैत कितना भी सुरक्षा का दुर्ग बना दे, घेरा बना दे, अद्वैत
32:53 ऊपर की बात है। वह द्वैत के सारे दांव पेच काट देता है। सिखा रही है होली कि जाओ अद्वैत की शरण में पर तुम तो उसे और द्वैत का ही भोंडा कार्यक्रम बना देते हो और तुम्हारे भीतर भावना आ जाती है कि मैं पुरुष हूं मैं स्त्री की ओर जा रहा हूं रंग लगाने यह तो द्वैत हो गया मैं अपनी प्रजाति का हूं। आज मैं बकरा काट कर खाऊंगा। यह तो होली उत्सव है चेतना के उत्थान का। साधारण
33:42 चेतना द्वैतात्मक होती है। चेतना उठती है तो पारमार्थिक अद्वैत तल पर पहुंचती है। तो होली का मतलब हुआ चेतना को उठाना। भीतरी बेहोशी को और कम करना। पर हम तो होली पर और नशा कर लेते हैं और होली जिस चीज का हमें संकेत दे रही है हम उसके बिल्कुल विपरीत काम करते हैं। होली इसलिए है कि जिस नशे में तुम साल भर रहे हो वो नशा आज कम हो जाए पर हम होली के दिन और नशा कर लेते हैं। द्वैत माने नशा। अद्वैत माने उस नशे का उतरना। नशा माने क्या होता है? जो तुम्हें सत्य से दूर रखे। द्वैत मूल असत्य है क्योंकि द्वैत के एक छोर पर कौन बैठा होता है? अहंकार द्वैत के एक छोर पर सदा अहंकार बैठा होता
34:29 है। और अहंकार झूठ है। तो द्वैत मूल झूठ है। द्वैत का हटना ही अद्वैत होता है। अद्वैत की और नहीं कोई परिभाषा है। अहंकार का विघलन ही अद्वैत होता है। होली यही आपको याद दिलाने के लिए है। आम आदमी आसानी से नहीं समझ पाता था। सैद्धांतिक बातें थी। लोग इतना पढ़े लिखे नहीं थे। कृषि प्रधान भारत देश था। वर्ण व्यवस्था थी पहले जो फिर जाति व्यवस्था बन गई। तो बहुत लोगों की पढ़ाई लिखाई पर तो वैधानिक रूप से रोक लगा दी गई थी। उनसे कहा गया था तुम अपना पुश्तैनी काम ही करते रहो।
35:14 तो उन तक फिर अद्वैत कैसे पहुंचाया जाए? तो इसके लिए कथाएं रची गई। पर अहंकार ने उन कथाओं का भी शोषण कर लिया। अहंकार ने उन कथाओं को भी पालतू बना लिया। जो कथा आई थी अहंकार को ध्वस्त करने के लिए अहंकार ने उस कथा को अपने घर पर बांध लिया। पालतू बनाकर। बात आ रही है समझ में? अद्वैत नियति है। तुम कितना भी बड़ा सुरक्षा चक्र बना लो द्वैत का अनपेक्षित जगह से सत्य प्रकट होगा। जैसे
36:00 खंभे से नरसिंह का प्रकट होना माने ऐसी जगह से जहां तुमने कभी सोचा ही नहीं था। क्योंकि तुम्हारी योजना तो यही रहती है कि कभी भी सच्चाई सामने आए ही नहीं। पर वह ऐसी जगह से सामने आ जाएगी। तुम कहोगे यह क्या हो गया? मेरे ही घर में औलाद कैसी पैदा हो गई? और मेरे ही घर के खंभे में से यह भगवान प्रकट हो गए। आप में से कितने लोगों ने सचमुच चाहा था कि आप इस तरह से एक दिन गीता पढ़ेंगे और परीक्षा देंगे। यह देखो। यह अद्वैत का तरीका है। वह आपके बिना चाहे आपकी जिंदगी में घुस आता है। क्योंकि आपकी चाहत का इंतजार करेगा तो प्रतीक्षा ही करता रह जाएगा।
36:46 आप कभी नहीं चाहने वाले। हिरण्यकश्यपु क्या कभी स्वयं चाहता कि मुझे मुक्ति मिले? वह स्वयं कभी ना चाहता उसे मुक्ति मिले। तो उसको तो फिर इसी तरीके से लगभग धोखे से ही मुक्ति दी जा सकती थी। तो दे दी गई कि ले तेरे घर में औलाद ऐसी हो जाएगी कि अब औलाद के माध्यम से तुझे मुक्ति मिलेगी। ले तूने बड़े प्यार से यह भवन बनवाया था ना, यह खंभे लगवाए थे। अब इसी स्तंभ में से देख अब कौन निकलता है? जिसको तू जड़ समझ रहा था उस जड़ में से उच्चतम चेतना प्रकट हो जाएगी। आ रही है बात समझ में?
37:48 लेकिन हिरण्यकश्यपु मरकर भी नहीं मर सकता क्योंकि वह व्यक्ति नहीं है। व्यक्ति तो चलो मर गया तो चला जाता है। वो एक सिद्धांत का प्रतीक है। सिद्धांत नहीं मरते। उस सिद्धांत का नाम है अहंकार। अहंकार नहीं मरता। जीव मरता है। अहंकार नहीं मरता। किस अर्थ में नहीं मरता? कि हर बच्चा जो पैदा होता है वह अहमवृत्ति लेकर पैदा होता है। इस अर्थ में मैं कह रहा हूं कि अहंकार नहीं मरता। एक इंसान को मार दोगे अगला बच्चा पैदा होगा। उसके भीतर भी अहमवृत्ति होती है। और जैसा मैं आपसे कहा करता हूं कि मुक्ति कोई मंजिल नहीं होती। कोई पल नहीं होता। जब तक शरीर है तब तक आपको लगातार मुक्ति
38:33 की यात्रा करनी पड़ेगी। लगातार आप रुक नहीं सकते। आप यह नहीं कह सकते कि मैंने अपनी ईगो को अपने अहंकार को पूरे तरीके से मिटा दिया है। वो वापस आएगा। क्योंकि वो वापस आता है। इसीलिए होली हर साल मनानी पड़ती है। आप यह ना सोचे कि एक बार मिटा दिया हिरण्यकश्यप को तो चला गया। नहीं चला गया। वह वापस आता है। रक्तबीज याद है? अहंकार रक्त बीज होता है। वो वापस आता है। उसको आप कितना भी मिटाओ वापस आएगा। तब तक वापस आएगा जब तक देह है। क्योंकि वो देह की उत्पत्ति है ना। जब तक देह है तब तक अहमवृत्ति रहेगी और जब यह देह मिट भी जाएगी तो जो बच्चा नया पैदा होगा उसमें भी अहम वृत्ति रहेगी
39:18 तो अहंकार हर तरीके से वापस आता है। आप मिटा दो तो आप में वापस आएगा और आप ही मिट गए माने मरमुरा गए तो उसके बाद जो बच्चे हैं उन बच्चों में वापस आएगा। तो इसलिए बार-बार होली मनानी पड़ती है। बार-बार विवेक की आग में अहंकार को जलाना पड़ता है। हर साल अपने आप को याद दिलाना पड़ता है कि अभी काम पूरा नहीं हुआ है। जब तक सांस चल रही है तब तक माया का खतरा बना रहेगा। इसलिए हम एक निश्चित अवधि पर एक एक अंतराल में बार-बार अपने आप को याद दिलाने के लिए होली मनाते हैं। यह होली का मर्म है। ऐसे मनानी होती है। लड़कियों पर गुब्बारा फेंकने को होली नहीं
40:05 बोलते या लड़कों पर अब लड़कियां भी तेज है वो भी फेंकती हैं गुब्बारा फेंको कीचड़ फेंको पत्थर फेंको ये नहीं होली हो गई बात आ रही है समझ में तुम्हें तो सब आया है ना समझ में कब से आगे हम
40:51 और होली को अगर आपने विकृत कर दिया है तो इसमें आप होली को दोष मत दे दीजिएगा। होली का क्या दोष है? होली के पीछे की जो कथा है वह तो बड़ी समृद्ध है। बहुत सुबोध है। आप उसको नहीं समझ रहे तो इसमें पर्व का दोष नहीं है। लोकधर्म का काम ही है धर्म को विकृत कर देना। लोक धर्म होता ही इसीलिए ताकि वह धर्म को बिगाड़ सके और उसे अहंकार के उद्देश्यों की पूर्ति का साधन बना सके। कथा कहीं नहीं कहती है कि आज बकरा कटेगा।
41:38 कथे में कथा में है कहीं कथा तो कहती है अहंकार कटेगा। तुम बकरा काटने लग गए। कथा नहीं कहती है कि साइलेंसर निकलवा करके बाइक का करते हुए चलना है क्योंकि होली है। बुरा ना मानो। हेलमेट भी नहीं पहनना है। जाके भिड़ा देना है। जरा देखना कितनी सड़क दुर्घटनाएं होती हैं। होली के आसपास। देखो दार्शनिकों, चिंतकों, ऋषियों ने जितने साधन हो सकते थे करें। अब उसके बाद भी अगर हमको नालायकी करनी है तो यह हम जाने
42:24 और नालायकी तो हमारी भरपूर है। टीवी, अखबार, सोशल मीडिया शुरू हो गया है सब पर। वही चल रहा है कि होली माने यह जिन लोगों का धर्म से कोई लेना देना नहीं, वह उछलउछल कर नाच रहे हैं। उसमें कुछ नहीं है। कामना का नंगा नाच है। बस धर्म समझते नहीं। सत्य से प्रेम नहीं। पर होली में सबसे आगे हैं। बात आ रही है समझ में? हम
43:09 तो कथा इसलिए है कि उससे सीख लो सारी बातें अहंकार की क्या प्रकृति प्रवृत्ति होती है समझो वो डरा हुआ रहता है। वह मेहनत भी करता है तो बस अपने स्वार्थ और आत्मरक्षा के लिए करता है। वह दूसरों को डराधमका कर रखता है। शरीर के रिश्ते उसके लिए बहुत अर्थ नहीं रखते। वो अपने बच्चे को भी आग में डालने को तैयार हो जाता है। अच्छा यह मजेदार बात है। विरोध तो दोनों ओर से है। हिरण्यकश्यपु भी कह रहा है कि प्रह्लाद को भस्म कर दो, आग में डाल दो। और प्रहलाद भी कह रहा है कि मैं पिता का विरोध करने को
43:56 तैयार हूं। पर क्या इन दोनों विरोधों में अंतर है? अंतर है। हिरण्यकश्यपु विरोध कर रहा है और खूनी विरोध कर रहा है किसका? प्रहलाद का। किसके लिए? अपने अहंकार के लिए आत्मरक्षा के लिए। अहम रक्षा के लिए। आत्मरक्षा अहम रक्षा के लिए। और हिरण्यकश्यपु कह रहा है होगे तुम मेरे शरीर के देह के बाप सत्य से बड़े नहीं हो गए खून का कोई भी रिश्ता सत्य से बड़ा नहीं हो जाता सत्य की खातिर अगर देह के रिश्तों
44:42 दोस्तों यारों यहां तक कि परिवार के लोगों का भी विरोध करना पड़े तो ठीक यही तो किया है प्रहलाद ने। बात आ रही है समझ में? होली इसलिए नहीं है कि आज के दिन तो जाकर दुश्मनों को भी गले लगाना होता है। होली सर्वप्रथम तो इसलिए है कि जाकर अपने दोस्तों के सामने कुछ सच्ची बातें कर लो। हमारे दुश्मन कोई उधर थोड़ी हैं जिनको हमने दोस्त कह रखा है। सबसे ज्यादा दुश्मनी तो हमारी उन्हीं से रहती है।
45:27 हमको डुबोने का काम हमारे दुश्मन थोड़ी करते हैं। हमें बर्बाद करने का काम तो हमारे दोस्तों ने ही किया है। प्रहलाद सिखा रहा है कि कोई तुम्हारा दोस्त हो, यार हो, रिश्तेदार हो, भले ही बाप हो। सच सबसे बड़ा होता है। किसी के सामने मत झुकना। और आप में से जिन लोगों को लगता हो कि भाई खून का रिश्ता बहुत बड़ा होता है। भूलना नहीं कि वो जो होली थी जिसको चिता कहा जाना चाहिए। वह सजाई उस बच्चे के बाप ने ही थी और उस पर उस बच्चे को लेकर उसकी बुवाई चढ़ी थी।
46:16 तो रिश्ते नाते वगैरह तब तक तो चल जाते हैं जब तक परस्पर झूठ का आदानप्रदान होता रहे। लेकिन जिस दिन रिश्ते में कोई खड़ा हो जाता है सच्ची बात करते हुए उस दिन बहुत संभव है कि यह रिश्तेदार ही आपको आग में झोंकने को तैयार हो जाए। सच को झूठ नहीं बर्दाश्त कर सकता। झूठ यही चाहता है कि सच को आग में झोंक दे। यद्यपि उस आग में झोंकोगे तुम झूठ को तो जलेगा झूठ ही सच तो बच जाएगा जली होलिका प्रहलाद तो बच गया बात आ रही है समझ में तुम्हें बहुत मजा आ रहा है ना हम बोलिए
47:01 आचार्य जी इसके साथ ही मतलब फॉलो अप भी था कि इतना ऊंचा यह मर्म हम मतलब इतना ज्यादा विकृत कैसे मतलब इतना विकृत कैसे हो गया? जान बचाने के लिए कुछ भी करना पड़ता है। जब तुम्हारी जिंदगी में पहली चीज यही रहती है कि मैं जैसी हूं मैं ऐसी ही रहूं तो फिर तुम्हें किसी भी हद तक गिरना पड़ेगा। ये अच्छे से समझ लो। जिसने अपने साथ यह शर्त, यह मजबूरी बांध ली कि मैं जैसी हूं, मुझे अपने आप को ऐसे ही बचा के रखना है। उसे अब किसी भी हद तक गिरना पड़ सकता है। तो यह अनायास नहीं हो जाता कि व्यक्ति में, समाज में, धर्म में इतने
47:48 विकार आ जाते हैं। अनायास नहीं होता। इसके पीछे एक कारण है। एक ठोस सिद्धांत है। ठोस सिद्धांत यह है कि हम कहते हैं वो चीज अच्छी होगी। मैं उसको पा लूं, अपनी जेब में रख लूं। लेकिन मैं जैसा हूं वैसे ही बना रहूं। गीता मुझे मिल जाए, धर्म मुझे मिल जाए, ज्ञान मुझे मिल जाए। ताकि मैं जैसा हूं बल्कि यह सब जो मुझे मिल जाए, यह मुझे और एक सुरक्षा चक्र दे दे। यह होती है पहली गलती। इसको आप आखिरी गलती भी कह सकते हो। इसके बाद और कोई गलती नहीं चाहिए। खुद को खतरे में डालने की आदत डालो।
48:39 अभ्यास करना शुरू करो। जो भीतर बैठा हुआ है झूठ। अंतःकरण में यह जो अहंकार बैठा है, इसके मिटने का अपना एक आनंद होता है। वह खतरा उठाओ। मिटने का खतरा उठाओ। उसका स्वाद अनूठा है। और जो कुछ भी भीतर गठरी बांधकर बैठे हो उसको बचाने की कोशिश करोगे बर्बाद हो जाओगे। काहे की गठरी होती है? अहंकार क्या है? क्या है उसकी गठरी? क्या है उसकी हस्ती? विश्वास मान्यताएं आशाएं, कामनाएं, आस्थाएं,
49:24 कहानियां, वो ये सब बांध कर बैठा है। तुम इनकी रक्षा करना चाहते हो। और भीतर के झूठ की रक्षा करने के लिए तुम्हें बाहर के सच को झुठलाना पड़ता है। बाहर से फिर कोई तुम्हें सच भी देने आए। प्रहलाद आया तो था सच देने हिरण्यकश्यप को। बाहर से फिर कोई सच भी देने आए तो तुम यही कहोगे कि तुझे आग में जला दूंगा। झूठ के लिए जानलेवा दुश्मन हो जाता है। कौन? सच वो कहता है बुलाओ इसको। जलाओ भूलना नहीं। तुम अपने दोस्त नहीं हो।
50:10 तुम अपने दोस्त नहीं हो। खुद से बचकर रहो। हे राम मुझे मुझसे बचा। बहुत होशियार मत बनो। तुम्हारी होशियारी तुम्हें भारी पड़ती है। तुम्हें तुम्हारी होशियारी नहीं चाहिए। तुम्हें तुम्हारी अनुपस्थिति चाहिए। तुम हटो, तुम मिटो वो जरूरी है तुम्हारे लिए। हम बोलिए बोलिए होली से संबंधित कुछ हो तो अभी बोलिए नहीं तो फिर आगे बढ़े कुछ बोलना है बढ़िया है ना बढ़िया है तो ही बोलना चलो बोलो जल्दी से बोलो छोटा सा बोलो प्रणाम आचार्य जी
50:55 मुझे ये कहना है कि आपने अभी प्रहलाद की बात की और हिरण्यकश्यपु की बात की तो ये कहा कि अज्ञान बहुत था जहां पर जैसे हिरण्यकश्यपों में अज्ञान बहुत था तो वहीं पे उन्हीं का जो पुत्र है वही जो प्रह्लाद है वह वहीं पे पैदा हो सकता था। तो उसी तरीके से मेरे घर में भी मैंने देखा कि बचपन से बहुत ज्यादा अंधविश्वास बहुत ज्यादा ही था। अगर थोड़ा-मोटा भी होता तो शायद हम उसको थोड़ा नेगलेक्ट कर देते। लेकिन कुछ ज्यादा ही था। तो बच बचपन से ही हम ऐसे थे कि ये तो गलत है। ये चीज गलत है। ये तो अंधविश्वास है। तो लेकिन फिर भी ऐसे बोला जाता था कि मानो इसको मानो। तो आज जब आप बात कर रहे थे तो मुझे ऐसे लग रहा था कि वो प्रह्लाद मैं ही हूं
51:41 कि मतलब हम प्रश्न पूछा है कि अपना परिचय दिया? नहीं प्रश्न नहीं पूछा। आपको बताया है कि आपकी मेहनत वेस्ट नहीं जा रही है। देखो अहंकार बेचारे के साथ बदनसीबी यही है। वो बंधन है ना। वो जितना बढ़ेगा खुद ही छटपटाएगा मुक्ति के लिए। इसीलिए तो प्रहलाद पैदा हो रहा है हिरण्यकश्यपु के यहां। मुक्ति की आकांक्षा बंधन से ही तो पैदा होती है। मुक्ति की आकांक्षा बंधन से ही तो पैदा
52:28 होती है ना। हिरण्यकश्यपु महाबंधन है तो प्रह्लाद पैदा हो गया उसके यहां और फिर घर वालों से यह भी सुनने को मिलता है कि ये बता दो तुम कब ये तो सब ठीक है कहानी वगैरह हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए। इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए। तुम्हारी पीर पर्वत जैसी कब होगी? तुम कब पिघलोगे? तुम्हारी भी पीड़ा बहुत बढ़ गई है पर तुम पिघल ही नहीं रहे। तुम जमे बैठे हो अपनी ही जगह पर। अपने प्रहलाद स्वयं बनो। तुम ही हिरण्यकश्यपु हो। तुम्हें ही प्रहलाद होना पड़ेगा।
53:13 तुम ही बंधन हो। तुम्हें ही अपनी मुक्ति का वाहक होना पड़ेगा। कब पैदा होगा प्रहलाद? लोग कहते हैं आचार्य जी बच्चे नहीं पसंद करते। मैं तो कह रहा हूं पैदा करो। मैं तो कह रहा हूं। मैं तो सब लड़कियों से बोलता हूं मां बनो। और खुद को पैदा करो। क्योंकि तो अभी तो तुम ही नहीं पैदा हुई हो। और सब लड़कों से बोलता हूं तुम भी बाप बनो। पहले खुद को तो पैदा करो। तुम कहां किसी और को पैदा करने निकल पड़े?
53:59 इतने सारे पैदा करके बैठे हो। एक प्रहलाद भी पैदा कर लो। यह होली का संदेश है। मैंने कुछ बहुत गलत बोल दिया अभी-अभी। मैंने वो बिल्कुल नहीं बोला है जो आप में से कुछ नहीं समझा होगा। मैं भौतिक शारीरिक प्रहलाद की बात नहीं कर रहा हूं। पैदा करने मत लग जाना। मैं कह रहा हूं तुम्हें ही अपना प्रहलाद खुद होना पड़ेगा। हम हो गया। धन्यवाद आचार्य जी। जी
55:14 थैंक यू थैंक यू तुम क्या अभी लगाओगे अभी सब लोग साइन करा रहे हैं अच्छा लगाओ