मनुष्य वो हंस है जो कौवा बना बैठा है || आचार्य प्रशांत, ताओ ते चिंग पर (2025)

संक्षिप्त सारांश

इस वीडियो में महत्व का फोकस यह है कि अनुभव केवल वास्तविकता को समझने का ज़रिया नहीं होते, बल्कि वे हमें स्वयं में बदलाव लाने के लिए भी प्रेरित करते हैं। सही अनुभव वही होते हैं जो हमें अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त करते हैं और हमारी सोच को विस्तारित करते हैं।

  • अनुभव का उद्देश्य सत्य और संज्ञान में वृद्धि करना है।
  • उन अनुभवों से बचना चाहिए जो हमारी पूर्वधारणाओं को पुष्ट करते हैं।

अनुभव का अर्थ

अनुभव का वास्तविक उद्देश्य धारणाओं और पूर्वाग्रहों की पुष्टि करना नहीं है, बल्कि उसे चुनौती देना है। जहां आपका मत सत्यापित होता है, वहां बार-बार जाना सुविधाजनक हो सकता है, लेकिन यह अनुभव केवल सीमित सोच को जन्म देता है। सही अनुभव वह होता है जो हमें थोड़ा तोड़ता है और हमारी बंधनों को काटता है।

अनुभवों का खेल

जीवन एक अनंत अनुभवों की श्रृंखला है। हर अनुभव, चाहे वह सकारात्मक हो या नकारात्मक, हमें कुछ न कुछ सिखाता है। इसलिए, अनुभवों से भागना नहीं चाहिए, बल्कि उनका स्वागत करना चाहिए। हमें हर पल का इस्तेमाल करना चाहिए ताकि हम उसके सही मूल्य को समझ सकें।

अनुभव को समझना

जब हम अनुभव लेते हैं, हमें यह देखना चाहिए कि क्या वह हमें कुछ नया सीखने, समझने या जानने का अवसर प्रदान करता है। अनुभव तब फ़ायदा देता है जब वह हमें हमारी पूर्वधारणाओं से मुक्त करता है। बार-बार वही अनुभव लेना जो हमारी सोच को नहीं तोड़ता, वह समय की बर्बादी है।

बर्बाद अनुभव

वर्णित अनुभव, विशेष रूप से जब वे बाहर से पुष्ट होते हैं, अक्सर हमारे लिए हानिकारक हो सकते हैं। वे हमारे अहंकार को बढ़ा सकते हैं और सच्चाई से दूर ले जा सकते हैं। जब हम ऐसे अनुभव लेते हैं जो हमारी पहचान को चुनौती नहीं देते, तब वही बर्बाद अनुभव कहलाते हैं।

वास्तविकता को पहचानना

जीवन में सच्चाई को पहचानना बहुत महत्वपूर्ण है। हमें अपने अनुभवों का मूल्यांकन करना चाहिए कि वे हमारी सोच में कितनी गहराई लाते हैं। सही अनुभव वह हैं जो हमें हर्षित करने के बजाय हमें सोचने को मजबूर करते हैं, ताकि हम अपने ज्ञान के दायरे को बढ़ा सकें।

आध्यात्मिक विकास

आध्यात्मिक अनुभवों का उद्देश्य केवल उन चीजों का आनंद लेना नहीं, बल्कि उन्हें परखना भी है। हमें महसूस करना चाहिए कि क्या वह अनुभव हमारे अहंकार को तोड़ने में सहायक होते हैं? हमें बर्बादी के जोखिम से बचना चाहिए और ऐसे अनुभवों की खोज करनी चाहिए जो हमें हमारे सच्चे स्वरूप के करीब लाए।

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Transcript

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0:00 दे आपकी धारणाओं को मतों को पूर्वाग्रहों को और पुष्ट कर दे तो वह अनुभव व्यर्थ नहीं गया है। वह अनुभव आपको बर्बाद करके गया है। जहां तुम्हारा मत जहां तुम्हारी कहानियां सत्यापित होती हो वहां बार-बार जाना अच्छा लगेगा। और जहां टूटते हो वहां जाकर तब भी बात नहीं करोगे जब बात करना जरूरी है। सही अनुभव होता है थोड़ा गलाए थोड़ा तोड़े उसकी जंजीरें काटे। अनुभव का उद्देश्य अनुभव प्राप्ति ही नहीं है। अनुभव का उद्देश्य है देखने,

0:45 सुनने, स्वाद लेने, सोचने, चलने स्पर्श करने का उद्देश्य अनुभव प्राप्ति या रसास्वादन नहीं है। आंखें इसलिए नहीं है कि आप रंगों को देखें। कान इसलिए नहीं है कि आप ध्वनियों को

1:31 सुने। अंतःकरण इसलिए नहीं है कि आप विचार करते रहे विषयों का। आंखें हैं रंगों को जानने के लिए। कान है ध्वनियों को जानने के लिए और अंतःकरण है विचारों को समझने के लिए। अनुभव

2:18 का उद्देश्य अनुभव प्राप्ति ही नहीं है। अनुभव का उद्देश्य है अनुभक्ता को उठाना। अच्छे से समझिए। अनुभव इसलिए नहीं होता कि आप और ज्यादा अनुभवी अनुभवशील बन जाए। अनुभव इसलिए भी नहीं होता कि उससे पल दो पल कि आपको संतुष्टि या सुख मिल जाए। सही अनुभव होता है अनुभोक्ता को ही ऊंचाई दे देने के लिए।

3:06 अनुभव तभी सही है जब वह अनुभोक्ता को थोड़ा गलाए, थोड़ा तोड़े, उसकी जंजीरें काटे। उसके उलट अनुभव अगर अनुभक्ता के जमाव में, उसके गठन में, उसकी गांठों में, उसके बंधनों में उसके आकार में, उसके व्यास में, उसके वजन में, उसके आग्रह में यदि बढ़ोतरी कर रहा है

3:53 तो यह अनुभव नहीं है। यह आपका हठ है स्वयं को और नीचे गिरा लेने का। अनुभव अगर आप जैसे हैं आपको और वैसा बना रहा है। आप जहां जमे बैठे हैं आपको वहीं और जमा रहा है। तो ये आपने अनुभव नहीं ले लिया। आपने अपनी कैद के दरवाजे की सलाखों में एक सलाख और जोड़ दी। कुंडी में एक ताला और जड़ दिया।

4:41 जीवन अनुभव है ना? अनुभवों की एक अनंत श्रंखला। अनंत मैं क्यों कह रहा हूं? जीवन तो अनंत नहीं है। तो अनुभवों की श्रंखला अनंत क्यों हो गई? क्योंकि एक अनुभव और दूसरे अनुभव के बीच में न जाने कितने अनुभव और बैठे होते हैं। उनको गिना भी नहीं जा सकता। ठीक वैसे जैसे यदि आप कहें भी कि आप सिर्फ 70 80 वर्ष जिए तो भी उसमें पल अनंत हैं। सेकंड अनंत नहीं है। मिनट अनंत नहीं है। घंटे अनंत नहीं है। हम पर आप एक सेकंड को भी हजार हिस्सों में काट सकते हो। फिर 10,000 हिस्सों में काट सकते हो। फिर 1 लाख हिस्सों में काट सकते हो।

5:26 समय की कोई न्यूनतम इकाई तो होती नहीं कि इससे कम आप समय को नाप नहीं सकते। हम जहां तक जाना है चले जाओ। माइक्रो मिली क्या? नैनो सेकंड नैनो सेकंड से भी और छोटा कर लो। तो समय की जो भी छोटी से छोटी इकाई आप काट सकते हो। हर इकाई में आपको अनुभव हो ही रहा है ना। तो इसलिए जीवन अनुभवों की एक अनंत श्रृंखला है। अनुभव तो हो ही रहे हैं। तो माने जिसने अनुभवों का खेल सीख लिया उसने जीवन का खेल सीख लिया। क्योंकि जीवन क्या है? अनुभव मात्र। कोई पल ऐसा नहीं जब

6:12 आपको अनुभव ना हो रहा हो। जिसको अनुभव हो। के साथ रिश्ता बनाना आ गया। सही अनुभवों के दांव पेच जिसको समझ आने लगे वो समझ लो कि जीवन के भी दांव पेच से मुक्त हो गया। माया को इसीलिए काल कहा जाता है। जो काल से मुक्त है वो माया से मुक्त है। और काल क्या है? अनुभव। क्योंकि प्रत्येक क्षणांश में भी आपको अनुभव तो हो ही रहे हैं। कैसे जाने कि कौन सा अनुभव ठीक है? कौन सा

6:59 नहीं है? इन अनुभवों का करना क्या है जो लगातार बस होते जा रहे हैं। आप ना भी चाहो तो अनुभव हो रहा है। आप कुछ ना करो तो भी वह एक अनुभव है। बैठे हो अनुभव चल ही रहे हैं। बाहर आपको नहीं अनुभव पता चल रहा होगा तो भीतर अनुभव चल रहे होंगे। इसीलिए आज लाउज बात बस आंखों की और कानों की नहीं कर रहे हैं। वो थोड़ा आगे बढ़ो तो मन की भी बात कर रहे हैं। क्योंकि जब आंख कान और खाल और जेहवा के अनुभव नहीं चल रहे होते तो अनुभव कहां चल रहे होते हैं? मन में चल रहे होते हैं। तो अनुभवों से तो बचा जा नहीं सकता।

7:45 जो अनुभव आप जैसे हैं आपको वैसा ही छोड़ दे तो समय व्यर्थ चला गया। जो अनुभव आप जैसे हैं आपको और वैसा ही बना दे। आपकी धारणाओं को, मतों को, पूर्वाग्रहों को और पुष्ट कर दे। तो वह अनुभव व्यर्थ नहीं गया है। वह अनुभव आपको बर्बाद करके गया है। एक तो होता है किसी चीज का व्यर्थ रह जाना और एक होता है कि वो चीज आई और बर्बादी कर कर चली गई। तो जो आप

8:32 उदाहरण दे रहा हूं कि बर्बाद अनुभव कौन सा है? आप किसी बात को बहुत गहराई से मानते हैं। बहुत गहराई से आपका किसी चीज में कुछ यकीन है। और आपने व्यक्ति ही वो चुना बात करने के लिए जो आपको पता है कि आपकी बात या आपकी जो कहानी है उसको वो आपकी तरफ परावर्तित कर देगा। अनुगूंज की तरह हम अंग्रेजी में इसको कहते हैं द अदर एक्टिंग एज एन इको चेंबर।

9:20 कि आप जो भी बोल रहे हैं वह बात वो वहां से आपको कहेगा। बिल्कुल ठीक बोल रहे हो। तुम्हारा जिस विषय में जो भी मत है, जो भी आग्रह है, तुम्हारी जो भी कहानियां है जिंदगी की वो बिल्कुल ठीक ही है। वही तो सच्चाई है। तो यह अनुभव आपको बर्बाद कर गया। क्योंकि हो सकता है पहले आपको अपने मत को लेकर के थोड़ा बहुत तो संशय रहा हो। पर इस व्यक्ति के पास जाकर के आपको जो संशय था रहा सहा वो भी चला गया। आपको बर्बाद कर गया यह अनुभव लेकिन यह आपको सुखद बहुत लगेगा क्योंकि अहंकार क्या बोलता है मैं ही आत्मा हूं मैं ही सत्य हूं तो मेरे जो मत है जिस विषय में मेरी जो धारणा या मान्यता है वही तो सत्य है और कोई आपको मिल जाए जो कहे हां हां बिल्कुल तुमने एकदम ठीक कहा

10:08 एकदम ठीक कहा वो हमें बहुत पसंद आता है यह है बर्बाद कर देने वाला अनुभव बर्बाद कर देना उनको तो पूरब में एक मामा भांजे की कहानी चलती है। ठीक है? तो और बातें एक तरफ जो उसमें केंद्रीय है कि मामा को आदत लंबी लंबी फेंकने की। तो दोनों चले जा रहे हैं रात में। मामा बोलते हैं आवाज आई है। कहीं यूं ही जा रहे हैं। लगता है गंगा का

10:54 बांध टूटा है। आवाज आ रही है। ऐसा लग रहा है कि बड़ी जोर से पानी उफना रहा है। गंगा का बांध टूटा है। तो भांजा बोलता है हां मामा अभी-अभी मेरे ऊपर तो छींटे भी गिरे। यह है आपको बर्बाद कर देने वाला अनुभव। एक आदमी कहानी सुना रहा है और दूसरा उसकी हां में हां मिला रहा है। लेकिन यह आपको अनुभव सुख बहुत देगा। और अनुभवों की ही अनंत श्रृंखला जीवन है। अगर ऐसे अनुभवों की आपने आदत डाल ली तो एक

11:43 के बाद एक अनुभव बर्बादी का ही होगा। अनुभोक्ता बहुत गलत जगह पर जम जाएगा। वो अपनी मिथ्या धारणाओं को ही उष्ट मान लेगा। बात आ रही है समझ में? तो एक अनुभव है जिसमें आप जानबूझ करके भीतर जो अंधेरा जमा है उससे दूर जाते हैं जहां उदाहरण के लिए आपकी किसी विषय में कोई मान्यता है किसी विषय में मान लीजिए ईश्वर को लेकर आपकी कोई मान्यता है या धर्म को लेकर के या किसी भी चीज को बाजार को लेके कपड़ों को लेकर के राजनीति को लेकर के शादी ब्याह को लेकर रुपए पैसे को लेकर के किसी विषय में

12:29 बड़ा वो केंद्रीय विषय है जिस पर आप बहुत संवेदनशील हैं। आपकी कोई मान्यता है और उस मान्यता पर सामने आपके कोई आता है जो कहता है चलो बात करते हैं। इस मान्यता का थोड़ा अन्वेषण करते हैं। थोड़ा खोज खुदाई करते हैं। तो आप क्या बोलते हो? नहीं इस मुद्दे पर मुझे बात ही नहीं करनी है। लेट्स चेंज द टॉपिक। कोई और मुद्दा उठाते हैं। आपके भीतर जो एक ठोस चीज जमा हुई है जो आपने पकड़ कर बैठी है जिसके साथ आपने अपनी पहचान भी जोड़ ली है वो है मान लो ईश्वर या विवाह या पैसा इसी तरह की चीजें होती हैं आमतौर पे या राजनीति इसके साथ आपने अपनी पहचान जोड़ ली है। अहंकार का बड़ा पसंदीदा यह आपका विषय है।

13:20 लेकिन इस विषय पर आप बात नहीं करना चाहते। आप भीतर से क्या पकड़ कर बैठे हो? राजनीति। आप राजनीति खाते हो, पीते हो, सांस लेते हो। आप पूरे तरीके से राजनीतिक जंतु बने बैठे हो भीतर से। लेकिन कोई सामने आपको मिल गया जो आपसे कह रहा है कि चलो हम समझते हैं कि राजनीति क्या है? समझना चाहते हैं कि राजनीति क्या है? यह खेल क्या है? राजनीतिक चीज क्या होती है? तो आप कहते हो नहीं। आओ चलो मौसम के मिजाज पर बात करते हैं। आओ क्रिकेट पर बात करते हैं। आओ खेती पर बात करते हैं। जो केंद्रीय मुद्दा है उसकी आप बात ही नहीं करना चाहते। यह अनुभव सिर्फ व्यर्थ गया है। व्यर्थ गया है। ठीक है? व्यर्थ गया है। और फिर कोई व्यक्ति मिलता है जो आपके ही जैसे बिल्कुल

14:07 राजनैतिक विचार रखता है। आप उससे बात करना चाहते हो। तो ये अनुभव व्यर्थ नहीं गया है। ये बर्बाद करके गया है या व्यक्ति जरूरी नहीं है। आप जाकर के वैसा ही कोई कोई ऑनलाइन ग्रुप ज्वाइन कर लेते हो। कोई क्लब ज्वाइन कर लेते हो। कोई कम्युनिटी ज्वाइन कर लेते हो। हम जहां पर यह है कि वैसे ही सारे लोग हैं जो आपके जैसी ही बिल्कुल बात करते हैं। किसी प्रकार के विरोधी स्वर के लिए वहां जगह नहीं है। तो यह अनुभव आपको बर्बाद करके जाएगा क्योंकि वहां आप गए ही इसीलिए हो ताकि बस अपनी आपकी जो मान्यताएं हैं वह और दृढ़ होती रहे और एक अनुभव वो होता है कि असली मुद्दा

14:54 कुछ और है। असली मुद्दा नौकरी है असली मुद्दा पैसा है। और वहां आप कुछ बहुत गड़बड़ कर रहे हो लेकिन आप उस पर बात नहीं करोगे क्योंकि आपको पता है कि गड़बड़ कर रहे हो तो आप जाकर दूसरी चीजों पर बात कर रहे हो। वह अनुभव बस समय का व्यर्थ जाना है। फिर एक तीसरे तरह का अनुभव होता है हम जहां आप कहते हो कि मेरी ऐसीऐसी राजनीतिक मान्यता है और मुझे तो यही लग रहा है कि सच है। सच ना होती तो मैं पकड़ क्यों रखता? मान्यता यही बोल के तो आती है कि मैं सच हूं। तो मैं ऐसा ऐसा सोचता हूं मेरी मान्यता है और क्योंकि मुझे लग रहा है सच है तो फिर

15:40 तो अकाट्य होनी चाहिए क्योंकि सच अकाट्य होता है। अगर कोई चीज मुझे सच लगती है ईमानदारी से कोई चीज मुझे सच लगती है। तो सच का तो स्वभाव है कि अखंड है। टूट नहीं सकता। है ना? अपराजय है। उसे कोई दबा नहीं सकता। अगर कोई मान्यता मुझे सचमुच सच लगती है तो मैं उसे दबाकर थोड़ी रखूंगा। फिर तो मैं उसे जाहिर करूंगा। गाऊंगा उसको गाने से दो बातें होंगी। अगर जो मैं सोचता हूं सचमुच सच है तो वो फैलेगा और लोगों तक। बहुत अच्छी बात है। सच को सब तक फैलना चाहिए। और अगर वो सच नहीं है

16:27 तो कोई ना कोई मुझे चुनौती देगा। बहस करेगा। मेरी मान्यता पर कुछ प्रकाश पड़ेगा। मुझे कोई विपरीत पक्ष सुनने को मिलेगा। और जो मैंने झूठ पकड़ रखे हैं हो सकता है वो कटे। फिर बात आ रही है ना? समझ में? यह तीसरे तरह का अनुभव है। जहां आप बहुत ईमानदारी से कहते हो मेरे पास कुछ विचार है, कुछ मान्यता है, कुछ मत है जो मुझे तो ठीक ही लगते हैं किसी भी वजह से। और क्योंकि मुझे ठीक लगते हैं तो इसलिए मैं इनकी उद्घोषणा करूंगा। मैं डुगडुगी बजाऊंगा चौराहे पर और सबको बताऊंगा। अगर सचमुच सच होंगे तो जन-जन का कल्याण होगा। सर्वहित की बात है। सबको पता चले भाई।

17:15 मुझे जो भी लगता है पता चले ना सबको। और यदि जो मुझे लगता है वह आधारहीन है तो कोई ना कोई आएगा फिर और मुझसे बात करेगा और कहेगा नहीं आप जो सोच रहे हैं मैं उससे अलग सोचता हूं और मेरा ऐसा मानना है आप बताइए फिर हम दोनों परस्पर संवाद करेंगे और उस संवाद से कुछ ज्यादा साफ बेहतर तस्वीर उभर कर आएगी। जो तीसरे तरह का अनुभव है यह है अनुभव का उद्देश्य। अनुभव लेने जाओ तो इसलिए नहीं कि खुद को बचाना है। अनुभोक्ता को जो एक्सपीरियंसर है उसको बचाना है। इसलिए नहीं अनुभव लेने जाना है। अनुभव लेने जाना है स्वयं को चुनौती देने के लिए। स्वयं को परखने के

18:01 लिए। अपनी कहानियों का सच जानने के लिए। अनुभव बड़ी उपयोगी चीज है। वास्तव में अनुभव के अलावा कोई चीज उपयोग की है ही नहीं। उपयोग निर्भर इस पर करता है कि तुम उपयोग कर पाते हो कि नहीं कर पाते हो। उपयोग भी तुम्हारे हाथ में है और दुरुपयोग भी तुम्हारे हाथ में है और अनुपयोग भी तुम्हारे हाथ में है। सब कुछ तो तीन तरह के अनुभव अभी हमने बात करी हम उपयोगी सदुपयोग कर लो। अनुपयोगी कि जो चीज पकड़े बैठे हो उससे संबंधित अनुभव अब लेना ही नहीं चाहते क्योंकि डर है कि अनुभव लिया तो कहीं अनुभव मेरी

18:48 मान्यता तोड़ ना दे और तीसरा होता है दुरुपयोग अनुभव का जो हमने बात करी इको चेंबर की हम अनुगूंज का कक्ष तुम जो बोल रहे अनुगूंज माने जो तुमने बोला तुम्हारे पीछे पीछे तुम्हारे आसपास जो कुछ है वो वही दोहरा रहा है। वो वही दोहरा रहा है। यह अनुभव का दुरुपयोग है कि जो मुझसे विपरीत मत रखते हैं मैं उनसे मिलूंगा ही नहीं। या मैं अपने आप को किसी ऐसी जगह पर डालूंगा ही नहीं। जहां मेरा अहंकार टूट सकता हो। दूर-दूर भागूंगा। दूर रहूंगा।

19:34 किसी जगह में, किसी घटना में, किसी व्यक्ति में अगर सामर्थ्य दिखेगी कि यह मेरा अहंकार तोड़ सकता है तो मैं उससे और दूर भागूंगा। यह अनुभव का दुरुपयोग है। आ रही है बात समझ में? और बहाना मैं कुछ बना लूंगा दूर भागने का। मैं कहूंगा वो व्यक्ति इतना व्यस्त है। मैं उसका समय थोड़ी ले सकता हूं। मैं इसलिए दूर भाग रहा हूं। या कि उस व्यक्ति को जो कुछ कहना था मैंने सुन तो लिया है। अब मैं बार-बार जाकर क्या एक ही बात पूछूं? यह तुम्हारे भीतर कोई बहुत शातिर झूठा बैठा है काइया जो गलत अनुभव लेने के पक्ष में देखो कैसे कैसे महीन तर्क गढ़ता रहता है

20:23 हम वो ये नहीं कहेगा कि वो जो सामने बैठा है मेरे भीतर कोई है जो उसे अपना दुश्मन मानता है जो मेरे अनुभोक्ता और मेरे अहंकार को तोड़ सकता है भीतर ही भीतर मैं उसे अपना दुश्मन मानता हूं। इसीलिए तो मैं उसके सामने नहीं पड़ता। दूरी बनाकर रखता हूं। क्योंकि जीवन का मैंने एक लक्ष्य पक्का कर लिया। अपने भीतर के अंधेरे को कायम रखना। और जो सामने बैठा है उसमें क्षमता है प्रकाश पुंज बन जाने की। मेरा अंधेरा उससे बहुत घबराता है। नफरत करता है। तुम कहोगे नहीं नहीं वो इतना प्रकाश है। उसका प्रकाश औरों तक तो पहुंचे ना। मैं उसके ज्यादा निकट जाऊंगा तो मैं उसके प्रकाश को औरों तक पहुंचने से रोक लूंगा। इसलिए मैं उसके ज्यादा निकट

21:09 नहीं जाता। या फिर इतनी रोशनी तो मैंने अब ले ली। अब और क्या रोशनी लेकर करूंगा? कई तरीके के आप कुतर्क निकाल सकते हो अपने अंधेरे को बचाने के लिए। ये सब अनुभवों के दुरुपयोग में आते हैं। अनुभवों का दुरुपयोग है। मैं जानता तो हूं। मुझे पता है। उन्होंने बोल दिया है। हां मैंने सुन लिया। मुझे सब पता है। मैं क्या देखना है। आ रही है बात समझ में? कभी देखना है अपनी वृत्ति को। जहां तुम्हारा मत, जहां तुम्हारी कहानियां सत्यापित होती हो। वहां बार-बार जाना

21:55 अच्छा लगेगा। और जहां टूटते हो वहां जाकर तब भी बात नहीं करोगे जब बात करना जरूरी है। ऑक्वर्ड ही नहीं तुम एब्सर्ड होना भी गवारा कर लोगे पर जाकर बात नहीं करोगे। विचित्र स्थिति होगी कि यहां पर तो तुम्हें आकर बात करनी चाहिए थी ना। पर तुमने तब भी नहीं करी। तुम्हें क्या लग रहा है? तुमने यूं ही नहीं करी। नहीं नहीं नहीं नहीं। तुम्हारे भीतर कोई बैठा है जो बात करने से बचता है इसलिए तुमने बात नहीं करी। हां बात ना करने के लिए तुम्हारे पास तर्क बहुत होंगे। आ रही है बात समझ में?

22:41 क्या कह रहे हैं लाव? रंग आंखों को अंधा कर देते हैं। अगर आंखें रंगों का बस अनुभव करने के लिए हैं। रंगों को जानने के लिए नहीं। इंद्रियों का काम बस अनुभव ग्रहण करना नहीं है। आंखें इसलिए नहीं मिली है कि जगत को देखते फिरो। आंखें मिली है कि जगत को जानो। मन इसलिए नहीं है कि विषयों को संग्रहित करते चलो। मन इसलिए है कि वहां कोई विषय आ गया है मन में तो अब उसको जानना है। जानने से क्यों हम घबराते हैं?

23:29 क्योंकि जानने के बाद भोगना बड़ा मुश्किल हो जाता है। या यह कह दो कि जानने के बाद भोगना सही हो जाता है। और सही भोग का हमारा कोई अभ्यास नहीं है। जानने के बाद भी भोग होता है। पर वो भोग फिर योग जैसा होता है। ऐसा थोड़ी है कि अगर तुम जानते हो तो अब खाओगे नहीं। खाओगे। क्यों नहीं खाओगे? ऐसा नहीं है कि तुम जानते हो तो अब संबंध नहीं बनाओगे। क्यों नहीं बनाओगे? ऐसा नहीं है कि अब अगर तुम जानते हो तो शारीरिक संबंध नहीं बनाओगे। शारीरिक संबंध भी बना सकते हो। बिल्कुल हो सकता है। लेकिन वो भोग भी फिर योग जैसा होगा। अगर बोध

24:17 जनित है तो और ऐसे सुंदर भोग की हमको कोई आदत नहीं है। हमें कचरा खाने की आदत है। अध्यात्म में बड़ा ये दृष्टांत चलता है कौवे का और हंस का। हम कि कौवा जाकर क्या करता है? बार-बार गंदगी में चोंच मारता है और हंस का मिथक चलता है कि वो चुन चुन करके मोती खाता है हंस का कि चुन के मोती खाता है। अब मोती नहीं कोई हंस खाता है। पर हंस को असल में

25:05 माना जाता है शुद्ध चेतना का प्रतीक। शुद्ध चेतना जो कि गड़बड़ विषयों से संबंधित होना नहीं चाहती। तो वह जो उच्चतम विषय है बस उससे संबंध रखना चाहती है। इसी अर्थ में कहा जाता है कि हंस बस मोती से संबंध रखना चाहता है। बाकी दुनिया से वो रिश्ता रखना ही नहीं चाहता। हम जैसे कहते हैं ना साहब कि पहले तो मन कागा था करता तम घात अब मनवा हंसा भया मोती चुनचुन खात तो अब कौआ कौवा है प्रकृति से तो वह जाकर के मान लो भष्ठा में मल में टट्टी में भी अपना या कचरे में जाकर देखोगे वो अपना चोंच मार रहा है वो ठीक है क्योंकि वो

25:52 कौवा है क्योंकि वो कौवा सचमुच है और हंस का हमने मिथक बनाया है ऊंचा कि वो जाकर बस मोती चुकता है मनुष्य की स्थिति इन दोनों के मध्य की है। मनुष्य वो हंस है जो कौवा बना बैठा है। समझना कि हम सही अनुभवों से बचते क्यों हैं? क्योंकि हम वो हंस हैं जो कौवे बने बैठे हैं और अब कौवा बनने का बड़ी गहराई से अभ्यास कर लिया है। हंस ने जन्म ही ले लिया। कौवों की बस्ती में झूठे के अगर झूठा आया। झूठों के घर कोई पैदा होगा तो उसको झूठी ही तो पढ़ाएंगे। उसको यही तो बोलेंगे कि तू भी कौवा ही है।

26:40 पैदा हंसा हुआ है। पर वह सब क्योंकि खुद कौवे बने बैठे हैं। वो भी हंस हैं। पर क्योंकि उन्होंने खुद कौवे पन का अभ्यास कर लिया है तो उनके घर जो पैदा होता है उसको झूठी ही पढ़ाते हैं। झूठी छाती, झूठी कोखी, झूठा दूध पिलाया। झूठा दूल्हा, झूठी दुल्हन ने झूठा खेल रचाया। सब हंस हैं। पर बने सब बैठे हैं कौवे। ये पूरी व्यवस्था ही चल रही है ताकि तुम्हारा कौवापन कायम रहे। ये व्यवस्था इसलिए थोड़ी बनी हुई है कि तुम जान पाओ कि तुम कौवे हो ही नहीं। हंस हो।

27:26 तो अब हंस ने बड़ा तगड़ा अभ्यास कर लिया। कौवे में कौवे बनने का अब वो कौवा सचमुच होता तो कोई समस्या नहीं थी। वो बिल्कुल जिस चीज में डाल रहा है अपनी चोंच उसको बहुत मौज में देख सकता था। खुद को बहुत मौज में देख सकता था और जितना देखता उतना और आश्वस्त होता जाता कौवा कि मैं बना ही इसी के लिए हूं। क्योंकि सचमुच उसी के लिए बना है। कौवा कचरे को देखेगा और कौवा स्वयं को देखेगा। वो एक साम में पाएगा। गंदा कचरा काला कौवा बिल्कुल एक है मामला कोई दिक्कत नहीं कोई दिक्कत नहीं तो कौवा बड़ा ईमानदार हो सकता है तभी फिर संतों ने क्या कहा है

28:11 ता से तो कौवा भला तन मन एक ही रंग कौवा ईमानदार हो सकता है बिल्कुल क्योंकि वो बनाइए कचरा खाने के लिए तो ईमानदारी से कचरे को भी देख सकता है स्वयं को भी देख सकता है उसे कोई तकलीफ नहीं होगी जितना वो स्वयं को देखेगा उतना और पुष्ट होता जाएगा। सत्यापित होता जाएगा कि कौवा ठीक जिंदगी ही तो जी रहा है। लेकिन अब मनुष्य को सोचो मनुष्य हंस है जो कौवा बना बैठा है। अब ये हंस कचरे में डाल रहा है चोंच। इसकी बड़ी दुर्दशा है। अगर इसने ध्यान से देख लिया कि ये किससे रिश्ता बना रहा है कचरे से। और फिर इसने ध्यान से देख लिया कि मैं कौन हूं। तो जैसे ही यह जिंदगी जी रहा है फिर आगे जी नहीं पाएगा। इसे मानना पड़ेगा कि यह तो हंस है। कौवा

28:59 है ही नहीं। लेकिन अगर इसने मान लिया कि यह हंस है तो बड़ी समस्या खड़ी हो जाएगी। आसपास जितने हैं सब कौवे हैं उनसे हटना पड़ेगा। हम नहीं तो समाज से बहिष्कृत हो जाएगा। तो हंस के लिए फिर जरूरी है कि वह आंख बंद करके खाए। कौन सा हंस? कौवा रूपी हंस। हंस जिसने कौवे का रूप ले लिया। कौवा रूपी हंस। इसके लिए जरूरी है कि यह अपने सब अनुभवों के प्रति आंख बंद करके रहे। क्योंकि आंख खोल ली तो जैसे यह जी रहा है वैसे जीना असंभव हो जाएगा। आंख खोल ली तो अब ये

29:46 कौवा नहीं बना रह पाएगा। कौआ नहीं बना रह पाया तो सब रिश्ते नाते उसके मुश्किल में आ जाएंगे। अब दो ही तरीके बचेंगे। या तो इनको सबको त्यागो या इनको भी सबको जगाओ कि भाई मेरे तुम भी कौवे नहीं हो। रिश्ता हम कायम रखेंगे। पर पहले हमारा तुम्हारा रिश्ता था कौवा और कौवा का। रिश्ता कायम रखेंगे। पर हमारा रिश्ता होना चाहिए हंस और हंस का। रिश्ता नहीं तोड़ना चाहते। रिश्ता नहीं तोड़ना चाहते। पर बताना चाहते हैं कि कौवे और हंस का रिश्ता नहीं बन पाएगा। ठीक? हमें दिख गया हम हंस हैं। तुम भी जानो तुम भी हंस हो ताकि हमारा रिश्ता बखूबी चले। पर इसमें बड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। मेहनत भी चाहिए, करुणा भी चाहिए। निष्कामता चाहिए, दूसरे के लिए मेहनत करनी

30:33 है। कौन दूसरे के लिए मेहनत करे? और मेहनत करो दूसरे के लिए कोई पक्का नहीं। वो मान ही जाएगा। वो पलट के मारना और ना शुरू कर दे। तो इससे अच्छा क्या है? आंख बंद कर लो। बेहोशी में अनुभवों से गुजरते रहो और स्वयं को जताते रहो। मैं तो कौवा ही हूं। कमजोर किसी भी ऊंचाई से अयोग्य पातालों में रहने के लिए अभिशप्त। मैं तो कौवा ही हूं। मैं तो छोटा आदमी हूं। मैं तो नादान हूं, दुर्बल हूं, मूर्ख हूं, मंदबुद्धि हूं।

31:20 मैं तो ऐसा हूं। बहुत फायदे हैं कौवा बना रहने के। आ रही है बात समझ में? अनुभव वो चाहिए जो कौवे को दिखा दे कि तू कौवा नहीं है। अनुभव सिर्फ वो लो जो तुम्हें तोड़ दे। जब कहते हो कि अब अभी सप्ताह अंत आया है जा रहा हूं घूमने घूमने वीकेंड जॉइंट ऐसी जगह मत जाओ जो तुम्हारी आंखों में और बेहोशी और नींद और नशा भर दे ऐसी जगह पर जाओ जो तुम्हारी आंखें खोल दे जो जगा दे तुमको

32:06 जानबूझकर ऐसे अनुभव लो जिनमें क्षमता हो तुम्हें बिल्कुल झकझोर देने की, हिला देने की। हर अनुभव के बाद अगर तुम कुछ और होकर नहीं निकल रहे ज्यादा साफ और हल्के। तो अनुभव व्यर्थ गया। माने उतनी जिंदगी व्यर्थ चली गई। तुम्हारी और जिंदगी सब कुछ है। बात आ रही है समझ में? गर्भ में ही हम में कौवा भाव बैठ जाता है। गर्भ में ही बैठ जाता है।

32:55 और पैदा होते हो तो हंस है पैदा ही होता है। वो कांव काव करता और फिर तुम्हें और कांवका सिखाने के लिए यह पूरा समाज और व्यवस्था और लोक धर्म ये लग ही जाते हैं। शिक्षा मीडिया सब तुम्हारे आसपास के दोस्त यार सहपाठी रिश्तेदार अगर यह कौवा पना लगभग निश्चित है तो फिर बताओ जीवन का उद्देश्य क्या है? यह तो तय है कि हंस कौवा रूप में ही पैदा होगा। कौवा भाव ले ही पैदा होगा। यही बोलेगा अहम कौआसमी

33:43 काकास्म ठीक है यही बोलेगा कौन हूं मैं कौवा तो फिर जीवन का उद्देश्य क्या है जीवन माने फिर प्रत्येक अनुभव क्योंकि जीवन हमने क्या कहा था क्या है अनुभवों की लंबी श्रृंखला को जीवन बोलते हैं तो जीवन के फिर हर पल का हर अनुभव का उद्देश्य क्या है यह जांचना कि क्या मैं सचमुच कौवा हूं? क्या मैं सचमुच वही हूं जो मान रहा हूं और मानने के लिए मजबूर किया जा रहा हूं। क्या मैं वही हूं? क्या मैं वही हूं? तुम उत्तर नहीं जानते पर तुम प्रश्न तो कर सकते हो। तुम परिणाम नहीं जानते पर तुम परख तो सकते हो।

34:30 परिणाम ना जानना तो तुम्हें और आजाद कर देता है परीक्षण करने के लिए ना। परिणाम पता ही हो तो परीक्षण क्यों करना है? जीवन इसीलिए है लगातार परखते रहो। कहीं भी रुक मत जाओ। कहीं जम मत जाओ। कोई बात मान मत लो। और मानी हुई ही सब बातें हैं। भरे हुए हो मानी हुई ही बातों से। हम कितने सुंदर और गहरे तरीके से यह काव्य का उच्चतम प्रयोग है कि जब कोई कवि कहता है कि रंग आंखों को

35:18 अंधा कर देते हैं, आवाजें कानों को बहरा कर देती हैं। यह होती है असली कविता। असली कवि फिर कोई ज्ञानी होगा। सेज द सेज पोएट रंग आंखों को अंधा कर देते हैं। आवाजें कानों को बहरा कर देती हैं। क्यों? क्योंकि तुम वही रंग देखने जाते हो जो तुम्हें सुहाते हैं। तुम वही अनुभव लेने जाते हो जो तुम्हारे झूठ को और पुख्ता करते हैं। आवाजें कानों को बहरा कर देती हैं। क्यों? क्योंकि तुम वही आवाजें सुनते हो जो तुम्हारी हां में हां मिलाती हैं। तुम वही आवाजें सुनते हो जो तुम्हारी झूठी कहानियों को सच बताती हैं।

36:08 तुम्हारे कान बहुत कुछ कर सकते थे तुम्हारे लिए। अपने उच्चतम साहित्य को हमने श्रुति बोला है वो जो सुना गया। आंखें भी बहुत कुछ कर सकती थी। जिन ऋषियों से वेदांत आया उन्हें हमने कहा मंत्र दृष्टा ऋषि वह जिन्होंने मंत्रों को देखा आंखें बहुत कुछ कर सकती थी पर उन आंखों से तुमने क्या किया वो सब नजारे देखे जिन्होंने तुम्हारे अहंकार को और प्रगाढ़ कर दिया उन कानों से तुमने क्या किया वही सब बातें और वही सब आवाजें सुनी जिन्होंने तुम्हें और बांध दिया तुम इसलिए हो तुम्हारी टांगे इसलिए हैं कि तुम्हारी आंखों और कानों को वहां ले जाएं

36:55 जहां तुम्हें स्वयं से बहुत अलग कुछ बहुत ऊंचा कुछ बहुत आसमानी कुछ सुनने को मिले और देखने को मिले। धन भी किस लिए है? धन इसलिए नहीं है कि उसको खा पी के और मोटे हो जाओ। धन भी इसीलिए है कि वो तुम्हें वहां ले जा सके। पैसा इसी काम आता है ना। यहां जाना है, यहां बैठना है, यहां रुकना है। ये सब चीजें पैसा मांगती हैं। धन भी इसलिए है कि तुम इस काबिल हो सको कि वहां जा सको जहां तुम्हारी आंखों को कुछ अपूर्व देखने को मिले। अपूर्व वो जिसकी वो अभ्यस्त नहीं है। वो जिसका उन्हें कोई पूर्व अनुभव नहीं है। कुछ अपूर्व देखने को मिले। धन इसलिए

37:41 है कि तुम वहां जा सको। अपनी आंखों को वो दिखा सको। वो जो प्रत्याशित नहीं है। वो जो आयोजित नहीं है। वो जो तुमने पहले से ही नहीं सोच रखा कि कहीं जा रहे हो तो पहले वहां की सब तस्वीरेंस देख ली अच्छे से इंटरनेट पर। अच्छा यहां जाऊंगा तो ये सब देखने को मिलेगा। और जो अच्छा लगा अच्छा ये नजारे अच्छे लग रहे हैं। अब यहां जाते हैं तो वहां जा ही काहे कर रहे हो? देख तो लिए नजारे। अब काहे के ले जा रहे हो? अब काहे को जा रहे हो? ऐसे ही जाते हैं ना हम। जहां पहले ही पता होता है कि अब सुरक्षा है अहंकार को वहीं जाते हैं हम। जहां पहले ही पता होता है कि खेल हमारी पसंद का होने वाला है। वहीं जाते हैं हम। जहां तुम्हारी पसंद है वहीं तुम्हारी अहता है। जहां तुम्हारी नाप है वहां भी तुम्हारी अहता है। जब कुछ कहा जा रहा है कि अपूर्व हो तो उसका अर्थ यह नहीं है कि उसका

38:27 तुम्हें पूर्व अनुभव है और वो नापसंद था। ना नापसंद नापसंद बस नया। जो पसंद है उससे भी नाता पुराना है तुम्हारा। जो नापसंद है उससे भी नाता पुराना है। तुम्हें चाहिए जो नया हो। यह उद्देश्य है सब इंद्रियों का। टांगे क्या है? कर्मेंद्रियां। आंखें क्या है? हम कहते हैं तथाकथित रूप से ज्ञानेंद्रियां। पर हमारी आंखें ज्ञानेंद्रियां तो होती नहीं। उनके माध्यम से हम ज्ञान तो लेते नहीं। हमारी आंखें तो भोग इंद्रियां होती हैं। हम तो चक्षु भोग करते हैं।

39:13 करते हो कि नहीं करते हो? अब यहां पर घूम रहे हो, चले जाते हो बीच पर और वहां आंखों को ऐसे फाड़ फाड़ के क्या देखते हो? आतियां जातियां देख रहे हो सब। तो आंखों से ज्ञान इकट्ठा कर रहे हो क्या? आंखों से भी भोग ही कर रहे हो। कानों से भी भोग ही करते हो। लगा दो वो वाला मस्त म्यूजिक। कि जिसमें नशा छा जाए। बिल्कुल कानों से क्या रिचाएं सुन रहे हो? क्या बोध वचन सुन रहे हो? क्या ब्रह्म वाक्य सुन रहे हो? कान भी इसीलिए हैं कि अहंकार और बली हो जाए। रंग आंखों को अंधा कर देते हैं। आवाजें कानों को बहरा कर देती हैं। स्वाद जीभ को

39:58 सुन कर देते हैं। विचार मन को भ्रमित कर देते हैं। कामनाएं मन को सुखा देती हैं। कोई भी विषय तुम्हारे मन में अगर इसलिए मौजूद है कि वह तुम्हारी कामना पूरी करेगा तो गड़बड़ हो गई। विषय बिल्कुल लेकर आओ मन में परखने के लिए और उत्सुक रहो प्रकृति के सब विषयों को लेकर के बोलो अरे ये क्या है ये क्या है मुझे इसे परखना है बताओ परखना है लोकधर्मी मत बन जाओ कि दुनिया के जो विषय हैं उनको लेकर के पहले ही मान्यता बना ली कि ये अच्छा है ये बुरा है परखने की जरूरत क्या है

40:47 वो बात जीवन विरुद्ध हो जाती है। वो लोग बुरे हैं। उनसे आगे बात भी नहीं करूंगा। परखने की भी जरूरत नहीं है। मैं उनसे बात ही नहीं करूंगा। यह काम बुरा है। मैं जाकर टटोलूंगा भी नहीं, छऊंगा भी नहीं, प्रयोग भी नहीं करूंगा। यह तो बुरा काम है। मैं करूंगा ही नहीं। ऐसे मत हो जाओ। जीवन के सब विषयों के प्रति खुले रहो। पर भोगने के लिए नहीं, परखने के लिए। भोगने के लिए नहीं, परखने के लिए। तुम अगर छाती चौड़ी करके बोलते हो इतने इतने इतने इतने विषय हैं जीवन में जो मैंने एक बार भी अनुभव नहीं करे तो यह बात लज्जा की है। ये कोई गौरव की बात नहीं है। ये उतनी ही

41:33 लज्जा की बात है जैसे कोई बोले कि मैं इन इन विषयों से आसक्त हूं। मुझे आदत लग गई है, लत लग गई है और मुझे रोज इन विषयों का सेवन या भोग करना पड़ता है। वो बात लज्जा की होती है ना कि कोई विषय तुम पर चढ़ बैठा है बिल्कुल और अब तुम आसक्त हो गए। लत लग गई। नशा चढ़ गया। एडिक्शन हो गया। कोई भी विषय हो सकता है। पैसा हो सकता है, स्त्री पुरुष हो सकता है, प्रसिद्धि हो सकती है। और बाकी यह सब तो हम जानते ही हैं। ड्रग्स शराब इनका यह बात जैसे लज्जा की है। बराबर लज्जा की यह बात है कि साहब हमने तो जिंदगी में कभी फलानी चीज को देखा ही नहीं, छुआ ही नहीं, स्पर्श ही नहीं करा, अनुभव ही नहीं करा। ना ना अगर एक बार भी नहीं करा तो तुम्हें

42:21 पता क्या है? और यह बात जो मैं कह रहा हूं, यह पोटेशियम साइनाइड पर लागू नहीं होती। आप लोगों पर मुझे कुछ खास भरोसा नहीं है। विशेषकर जो नए-नए आए हैं पिछले दो चार छ महीने में कि आचार्य जी ने कहा था कि कम से कम एक दफे तो प्रयोग करना चाहिए। हां, एक दफे प्रयोग करना चाहिए। पर विवेक साथ रख के कर लो एक दफे प्रयोग पर यह हम वो जिन्होंने जिंदगी को जाना ही नहीं और उन्हें आकर के किसी ने बता दिया कि ऐसा ऐसा अच्छा ऐसा ऐसा बुरा वो अजीिए मर गए

43:08 अजीिए मर गए हमारे यहां बहुत सालों तक तो यही चलता था कि जिसने समुद्रों को पार करा अब वो महानर्क का भागी बनेगा। जिसने जल राशि पार करी अब उसको बहुत बड़ा पाप लगेगा। नतीजा तुमने जल राशि नहीं पार करी औरों ने कर ली पार और वह आकर तुम पर चढ़ बैठे। कल 15 अगस्त है। बड़ी मुश्किल से फिर स्वाधीनता मिली। बड़ी मुश्किल से ना हम दूर देशों को जान पाए ना हम उनके

43:56 अनुभवों उनके ज्ञान से लाभ ले पाए ना हम उनके साथ व्यापार कर पाए। हम अपने में ही सिकुड़ कर रह गए क्योंकि अरे बाहर अगर जाओगे तो पापी हो तुम। फलाने अनुभव मत ले लेना। पापी हो तुम। आज भी दुनिया में पर्यटकों में भारतीय बहुत पीछे आते हैं। सिर्फ इसलिए नहीं कि हम गरीब हैं बल्कि इसलिए क्योंकि हम अनुभव लेने से बहुत कतराते हैं। हम कहते हैं जो चल रहा है इधर सब ठीक ही तो है ना। वहां क्या जाकर देखना है? तुम वहां जाकर के ठीक इसीलिए नहीं देखना चाहते क्योंकि तुम्हें पता है कि वहां जाकर के देख लोगे तो टूटोगे। एक भीतरी लज्जा से गुजरना पड़ेगा कि अरे

44:45 ऐसे भी जिया जा सकता है और हम ऐसे क्यों जी रहे हैं फिर जैसे हम हैं। भारत फिर बिल्कुल ही अंतर्मुखी हो गया। बाहर से मुझे कोई अनुभव लेना ही नहीं है। मुझे बातचीत सब अपनी पात, अपनी जात में करनी है। बस अभी भी है। आप विदेशों में देखिए तो किसी शहर में अगर पांच भारतीय होंगे तो वो पांचों आपको हमेशा इकट्ठे डोलते मिलेंगे। वो विदेश भी चले जाए तो भी उन्हें विदेशियों का अनुभव लेना ही नहीं है।

45:34 नहीं चाहिए। देसी आदमी बाहर भी जाता है तो बार-बार खोजता है इंडियन रेस्टोर कहां है? इसलिए नहीं कि तुम शाकाहारी हो और तुम्हें शाकाहारी भोजन कहीं नहीं मिल रहा है। बस हमें नहीं हमें समझ में ही नहीं आता मेन्यू में क्या लिखा है? ना हमें पूछना है ना हमें उनका खाना खाना है। शादी ब्याह भी यह तो छोड़ो कि तुम्हें अपने धर्म के अंदर ही करना है। यह भी छोड़ो कि तुम्हें अपनी जाति के अंदर करना है। फिर तुम गोत्र में भी जाते हो। फिर तुम और 10 चीजों में जाते हो। फिर तुम कुंडली मिलाते हो। ले दे के तुम किसी ऐसे को पकड़ लाते हो जो बिल्कुल तुम्हारे ही जैसा हो। ये जो जितनी चीजें तुम मिला रहे हो उसका

46:21 कुल उद्देश्य यही है कि मुझे बिल्कुल मेरी प्रतिछवी ही मिल जाए ब्याह करने के लिए भी ताकि वो कोई ऐसी बात ना बोल दे जो मेरे अहंकार और मेरी आदतों के खिलाफ जाती हो। सोचना और क्या होगा और इसका नतीजा यह भी हुआ है यदि आप जाएंगे और पढ़ेंगे वैज्ञानिक तौर पर कि हम जेनेटिकली कमजोर हो गए हैं। दुनिया की बड़ी से बड़ी प्रतिभाएं जन्म लेती हैं। जब दो अलग-अलग नस्लों के स्त्री और पुरुष मिलते हैं। पर हमारे लिए अलग नस्ल तो छोड़ दो। अलग जाति भी बहुत बड़ा हवा है। हम तो ढूंढते हैं कोई बिल्कुल हमारी

47:08 जैसा मिल जाए आसपास के चार गांव में जहां पे कुछ मिल जाए वहां पे ले आ लो आपकी जाति का आप उत्तर में हो आपको आपकी ही जाति का भी अगर कोई दक्षिण से मिल रहा होगा तो आप शायद ब्याह ना करो आप कहते हो जाति गोत्र ये सब तो ठीक ही है खानपान भी हमारी जैसा होना चाहिए भाषा भी हमारी जैसी होनी चाहिए आदत बोल व्यवहार वचन भी हमारे ही जैसा होना चाहिए। तुम अगर यह कर रहे हो तो तुम जीवन बर्बाद कर रहे हो। आप अभी कम्युनिटी पर जाकर के थोड़ा सा लिखिएगा कि दुनिया की जो शीर्ष प्रतिभाएं हुई हैं उसमें से एक बहुत बड़ा अनुपात उनका है। हम

47:58 जिनका बाप अमेरिका से है। मां पोलैंड से है और यूरोप में भी कोई सिर्फ एक नस्ल नहीं होती है। वहां भी बहुत सारी हैं। उदाहरण के लिए पूर्व की तरफ आपको स्लाव लोग मिलते हैं। वो आपको पश्चिम में नहीं मिलेंगे। अब वहां से कोई इस्लावियन बंदा कहीं से भी हो सकता है। वो चिकसलावा स्लोवेनिया कहीं से भी हो सकता है। सर्बिया रशिया से भी हो सकता है। वहां भी वो जाकर के मान लो किसी ब्रिटेन से

48:44 शादी करता है। वहां से फिर जो संतान आती है स्वयं प्रकृति भी चाहती है कि तुम अपने ही दायरे में संकुचित होकर मत बैठे रहो। मां बड़ी मां प्रकृति मां वो भी यही चाहती है कि अपने ही दायरे में मत बैठे रहो। बाहर निकलो। बाहर निकलो। बाहर निकलो। पर हमारी हालत यह है कि अगर मैं आपको गोवा बुला रहा हूं तो बहुत सारे लोग मुझसे थोड़ा खफा हो गए हैं। कम्युनिटी के कह रहे हैं आप काहे नहीं आए दिल्ली?

49:32 अच्छा मैं तो तुम्हारे लिए दिल्ली में ही था। तुम मेरे लिए क्यों नहीं यहां आ सकते? क्योंकि तुम्हें हिलना नहीं है। तुम्हें हिलना नहीं है जरा भी। और ना सिर्फ तुम्हें नहीं हिलना है। तुम चाहते हो मैं अभी ना हिलूं। और मैं तुम्हें हिलाने के लिए यहां आकर बैठा हूं। तुम भी हिलो। और भी काम है। आप ही के लिए नहीं बैठा हूं। बजाय इसके कि मैं कह रहा हूं कि अरे आ जाओ। तुम वहां बैठकर प्रतीक्षा कर रहे हो। जब आचार्य जी हमारे शहर में आएंगे तब होगा। आचार्य जी आप सरफुरागंज कब आएंगे? नहीं आऊंगा।

50:18 600 साल जिया तो भी नहीं आऊंगा। और बहुत सारे तो हमारे यहां भी लोग धर्मी है। उनको बड़ा बुरा लगता है। अरे गोवा थोड़े अजीब से कपड़े पहन के जनानिया घूमती रहती हैं। तो मतलब धार्मिक काम थोड़ी होवेगा वहां। अहंकार को बचाए रखना ही अधर्म है और वह तुम कर रहे हो अपने घोंसलों में खुद को कैद करके।

51:04 आ रही है बात समझ में? जैसे मैंने कहा कम्युनिटी पर लिखिएगा कि प्रकृति भी कैसे चाहती है कि आप जाओ देखो समझो। तो आध्यात्मिक लाभ भी उसी में है और जैविक लाभ भी उसी में है। वैसे ही जो लोग अभी नए आए हैं मैं उनको बता दूं कि कम्युनिटी बहुत खास उद्देश्य के लिए है और उसका सदुपयोग करिए। कम्युनिटी इसलिए है कि हर सत्र के बाद आपने जो जाना सीखा वो वहां जाकर लिखें और नए लोगों के लिए तो बहुत आवश्यक है कि सत्र देखते ही वहां जाकर के बिंदु आर पॉइंट वाइज अपनी सीखें लिखें। यह देखा, यह जाना, यह जाना, यह जाना, यह जाना, यह समझ

51:50 में आई बात, यह समझ में आई बात। उसकी जगह क्या हो रहा है कि ये नए लोग आए हैं, यह खुद कुछ ना लिख के दूसरों की पोस्ट्स पर टिप्पणी करने में बड़े उत्सुक हैं। तो, अभी आईटी ने यह कर दिया है कि आप जब तक खुद कुछ नहीं लिखते, आप दूसरों पर टिप्पणी नहीं कर सकते। पहले दो पोस्ट खुद लिखो, फिर एक टिप्पणी करना किसी और की पोस्ट पर। तुम नए-नए आए हो। तुम्हें अभी क्या पता है तुम्हारी क्या योग्यता है कि तुम जाकर के किसी की पोस्ट पर टिप्पणी करोगे। तो तुम्हें क्या पता है Facebook है क्या ये कि कोई भी आके कुछ भी लिख देगा अभी सत्र खत्म होगा सत्र खत्म होते ही अपनी सीख लिखिए वहां पर मेरे शब्दों को नहीं दोहराना है आपको बात क्या समझ में आई

52:37 आपकी जिंदगी से उसका रिश्ता क्या है वह लिखिए और सत्र से आप लाभ नहीं ले पाओगे अगर यह काम नहीं कर रहे हो जो आपको कहा जा रहा है कम्युनिटी पर करने को आ रही है बात समझ में? यहां भी आपका अहंकार आड़े जाता है। आपने अपने आप को जो भी तर्क दे रखा हो कम्युनिटी से दूर रहने का कि मैं तो वहां नहीं लिखता। चाहे आप गीता सत्रों के पुराने प्रतिभागी हो कि नए प्रतिभागी हो। और चाहे आप संस्था के सदस्य ही क्यों ना हो अगर आपने अपने आप को कुछ तर्क दे रखा है कम्युनिटी से दूर रहने का तो जान लीजिए उस तर्क के पीछे वजह बस एक है आपका कुछ दरखता है वहां जाकर आपकी कोई

53:25 कहानी टूटती है कम्युनिटी पर जाकर इसलिए आप भागते हो वहां से दूर छोड़ दो अपने तर्कों को सब तर्कों का तुम्हारे औचित्य बल्कि कहूंगा अनौचित्य एक ही है हटाओ सब तर्क कोई वजह नहीं है परखने की कि मेरा तर्क ठीक है कि नहीं कम्युनिटी से दूर रहने के पक्ष में तुम्हारे पास जो भी तर्क है उसको परखने की भी जरूरत नहीं है। हटा दो भाई। केंद्र ही गलत है तर्क का। तो तर्क कैसे सही हो जाएगा? कुछ आ रही है बात समझ में? ठीक। वो चीज जो आज लाउजू कह रहे हैं उसके लिए ही कम्युनिटी भी बनाई है।

54:14 वहां तुम्हें कुछ ऐसा देखने को सुनने को मिलेगा जो तुम्हारी आशाओं से आगे का होगा। तुम्हारी मान्यताओं के विपरीत भी हो सकता है। हम तथ्यों पर वहां बात होती है। अंधविश्वास नहीं बढ़ाए जाते। ज्ञानी संसार को देखते हैं। आंतरिक स्पष्टता में स्थित होकर वे सभी विषयों को आने जाने देते हैं। उनका मन आकाश जैसा खुला रहता है। विषय आता है। विषय से लालसा नहीं है। भोग नहीं करना है। विषय आया विषय

55:02 को परखा और परखा तो विषय चला गया। क्योंकि विषय आएगा। यह बात प्राकृतिक है। पर अटकेगा। यह बात प्राकृतिक नहीं है। यह बात अहंकार जनित है। विषय का आना प्राकृतिक बात है क्योंकि प्रकृति एक प्रवाह है। आप आंख खोलोगे एक चीज दिखाई देगी। एक पल बाद वो चीज बदल जाएगी। दूसरी हो जाएगी। लो एक विषय आया एक चला गया। विषय आ रहा है। आ रहा है। कान में एक आवाज आ रही है। दूसरी आवाज आ रही है। विषयों का आना एकदम प्राकृतिक बात है। डरो मत। पर विषयों का मन में अटक जाना, घर बना लेना यह प्राकृतिक बात नहीं है। यह

55:47 अहंकारिक बात है। विषय आया तुमने क्या करा? तुम उसको चूसने में लग गए। चिपक गए। बिल्कुल। हम विषय आया नारियल। तुमने खट से छेद मार के उसमें स्ट्रॉ डाल दिया। अब उसको तुम चूस रहे हो, जाने ही नहीं दे रहे। हिंसा ही है यह। हमारे पास जितने भी विषय आते हैं, हम उनका इस्तेमाल नारियल की तरह ही करते हैं। उसको फोड़ो, उसमें छेद करो, उसमें पाइप डालो और उसको पी जाओ। यही तो करते हैं और हम विषयों का क्या करते हैं? जाने दो। और जाने तभी दोगे जब जानोगे।

56:33 जानोगे तो जाने दोगे। अगर किसी विषय के प्रति आसक्ति है कारण बस एक है उसको जानते नहीं हो जिस विषय को जान जाओगे उससे मुक्त हो जाओगे और जानने के बाद भी अगर विषय से मुक्त नहीं होते हो तो आलिंगन कर लो विषय का फिर क्या है फिर तो मौज आ गई फिर तो फिर तो कह दो दावा कर दो कि सत्य अवतरित होकर आया है विषय के रूप में फिर तो यह विषय विषय नहीं है। यह तो तुमको मुक्ति दिलाने के लिए आसमान से उतरा हाथ है। पकड़ लो। पर ऐसा होगा नहीं। इस दुनिया में ऐसा होता नहीं।

57:23 होता भी है तो करोड़ में एक बार होता है। कोई विषय ऐसा है जो मन में स्थित है और अहंकार को तोड़ रहा है। वो बिरली घटना होती है। तुम उसको मान लो कि नहीं होती है। उसको तुम यही मान के चलो कि नहीं होती है। फिर अगर होनी होगी कभी तो हो जाएगी। पर तुम यह मान के चलो कि नहीं होती है। नहीं होती। जो भी विषय आए आने दो। रुकना नहीं आने दो। अब वो आ गया है। अब आंख खोल के उसको देखो। पूछो तू कौन? क्या आया? क्या वादा कर रहा है? कुछ देके जाएगा। क्या देके जाएगा? अपूर्णता हटा सकता है मेरी। बोध दे सकता है मुझे। बता क्या है तेरे पास? सामने

58:08 बैठना नहीं। भाग मत। चाय पिलाऊंगा तुझे। बैठ यहां पर। हां भाई इनको चाय पिलाओ। ये अभी ताजे-ताजे अभी मन में प्रवेश करा इन्होंने। हां जी साहब। अब आप बताइए आप हमें क्या देकर जाएंगे और जहां उससे ऐसे दो चार पांच सवाल करोगे जो आया है वह चला जाएगा। तुम्हारे मन में जितने भी विषय घर करके बैठे हैं उनके साथ वार्तालाप हुआ नहीं कभी तुम्हारा। दो टूक खरीखरी कभी हुई नहीं तुम्हारी। सीधी बात तुमने उनसे करी नहीं कि यूं क्यों घुसे हो हमारी जिंदगी में। मैंने गाना सुना वो मैंने कहा कितना आध्यात्मिक गाना है यह कितना आध्यात्मिक गाना है

58:56 बोलती है जहां मैं जाती हूं वहीं चले आते हो चोरी चोरी मेरे दिल में समाते हो यह तो बताओ कि तुम मेरे कौन हो तो प्रश्न कर रही है लड़की यह तो मुमुक्षु है। इसके कोई विषय प्रवेश कर रहा है मन में क्योंकि जहां ये जाती है वहीं चला आता है। ये तो तभी हो सकता है जब मन में हो। अगर बाहर होगा तो ये जहां जाएगी हर जगह तो नहीं आ सकता पीछे पीछे। ये जहां जा रही है पीछे पीछे चला जाता है। और चोरी-चोरी समाता है माने बिना अनुमति के। तो माने कोई मानसिक विषय है जिससे यह अभी प्रश्न

59:42 कर रही है और क्या पूछ रही है यह तो बताओ कि तुम मेरे कौन हो तो श्लोक है श्लोक है बिल्कुल यही आप पूछा करो बैठो यहां भागो नहीं बताओ काहे के लिए हमारे भीतर घुसे बैठे हो क्या चाहते हो और किस हक से यहां घुस गए हो किराया वगैरह तो देते नहीं तुम कुछ जगह हमारी है पालथी मार के तुम बैठे हो तो बताओ हमको दे क्या रहे हो और क्या दे सकते हो और जो बताओगे हम उसको

1:00:28 परखेंगे प्रमाण मांगेंगे उधार नहीं नकद चलेगा आगे की बात नहीं करना जो दे सकते हो अभी दिखाना वो जहां ये सवाल पूछोगे वो विषय भाग जाएगा और फिर वो स्थिति हो जाएगी जिसकी यहां बात हो रही है। ज्ञानी संसार को देखते हैं। स्पष्टता में स्थित होकर वे सब विषयों को आने जाने देते हैं। मन आकाश तक खुला रहता है। ओपन डोर पॉलिसी इस दरवाजे से प्रवेश करिए। उस दरवाजे से विदा हो जाइए। और लोकधर्मी क्या करता है? वो दोनों

1:01:14 दरवाजे बंद करके रखता है। ये क्या है? वर्जित विषय है। घुस मत आना। और यहां सब जो बैठे हैं वो क्या है? वो अनुमोदित विषय हैं। वो नैतिक विषय हैं। उनको जाने नहीं दूंगा। कुछ विषयों को इस दरवाजे से बाहर कर दिया है और कुछ विषयों के लिए जो विदाई का दरवाजा है एग्जिट डोर इसको कभी खोलता नहीं है। इधर क्या है? एंट्री डोर। एंट्री डोर बंद कर रखा है कि दुनिया के अनुभवों को कभी भीतर आने नहीं दूंगा। और एग्जिट डोर बंद कर रखा है कि जिनको भीतर अब जमा लिया। लोकधर्मी हूं नैतिकता के नाते। कही सुनी बात के नाते, जनशुति के नाते, परंपरा के नाते, धारणा, मान्यता के नाते जिनको जमा लिया, उनको कभी परखूंगा

1:01:59 नहीं तो उनको कभी बाहर जाने नहीं दूंगा। दोनों दरवाजे बंद है। यह अज्ञान का बड़े से बड़ा सबूत है कि मन आकाशवत नहीं है तुम्हारा। मन कक्षवत हो गया है तुम्हारा। हम कक्षवत भी कहना ऐसा लगता है कक्षास। मन कैदवत हो गया है तुम्हारा। ज्ञानी का मन खुला आकाश। पक्षी आया, पक्षी गया, बादल आया, बादल गया, जहाज आया, जहाज गया। और अज्ञानी का मन आने नहीं दूंगा, जाने नहीं दूंगा। वो सब वो सब गंदी चीजें उनको कभी आने मत देना। उनको दिमाग में मत आने देना। जीवन में मत आने देना। कभी अनुभव मत लेना। वो

1:02:45 सब गंदी गंदी बातें हैं। उनका अनुभव मत कभी मत लेना। और ये जो अच्छी-अच्छी बातें हैं ये करो। रोज का रोज करना जरूरी है। ऐसा तो करना ही है। और पूछना मत कि ये सब करना क्यों जरूरी है? बस करते जाओ करते जाओ करते जाओ करते जाओ। रोज-रोज यही करते जाओ। ये सब जो करे जा रहे हो उसको कभी फिदा भी मत होने देना। दोनों द्वार खोल दो। जो आ रहा है उसका भी स्वागत है और जो जा रहा है उसका भी स्वागत है। हम जो आ रहा है हमें उससे आपत्ति नहीं। हम जीवन के सब अनुभवों से गुजर सकते हैं। और जो जा रहा है हमें उससे आसक्ति नहीं।

1:03:32 आने वाले से आपत्ति नहीं। जाने वाले से आसक्ति नहीं। हम नहीं डर रहे हैं कि फलानी चीज जीवन में आ गई तो हमारा क्या होगा? हमें कहीं बंधक ना बना ले। हमें कहीं लत ना लग जाए। कहीं हमारी बेइज्जती ना हो जाए। आओ आए हो ना बैठो। परखते हम सबको हैं। पकड़ते हम किसी को नहीं। प्रयोग हम सब पर करते हैं। योग हम किसी से नहीं बैठा लेते। तुम पूछोगे कि फलाना अनुभव है। हम कहेंगे है फिर कुछ नहीं। आगे बढ़ गए।

1:04:18 वो अनुभव हमें और समृद्ध करके गया। वो अनुभव हमें और आजाद करके गया। रमता जोगी बहता पानी बह रहे हैं। बंध जाए तो क्या होता है? गंदा हो जाता है। गाओ जल गंधा आगे आगे। हां जोर से सबको सुनो। बहता पानी निर्मला बंधे सो गंदा होए। साधु जन रमता भला

1:05:03 दाग ना लागे दाग ना लागे कोई यही साधुता की पहचान है वो बहता रहता है उल्टा आप आज जिनको साधु बोल रहे हो वो सब एक जगह जड़ बैठे हैं भौतिक तौर पर भी मानसिक तौर पर भी उनमें कोई परिवर्तन हो नहीं सकता जिसमें कोई परिवर्तन हो नहीं सकता वो मृत है पाषाण है पत्थर है अचेत है जिनको आज तुम साधु बोलते हो उनमें जरा सा परिवर्तन लाकर दिखा दो। उन्हें किसी नए अनुभव के लिए राजी करके दिखा दो। उनसे बोलो जैसे कपड़े पहनते हो कुछ और पहन के दिखाओ। जो खाते हो कुछ और खा के दिखाओ। जो बने बैठे हो कुछ और हो जाओ नहीं हो पाएंगे वो। वो बंध गए हैं। और जो वास्तविक संत थे उन्होंने समझाया बंधे सो गंदा होए।

1:05:51 बंधे सो गंदा होए। आने और जाने दोनों का द्वार खुला रहे। आते जाओ जाते। पूरी पृथ्वी तुम्हारी है। रमते रहो। पूरा आकाश तुम्हारा है। और आकाश में दीवारें नहीं खड़ी होती। तुम नहीं कह पाओगे इतना सा क्षेत्र मेरा है बाकी पराया है। बिल्कुल जो असाधु की पहचान है। ऐसे लोगों को तो तुमने साधु घोषित कर रखा है। साधु की पहली बात यह होगी कि उसकी कोई जमी जमाई

1:06:39 बात ही नहीं होगी। बहता पानी निर्मला, वो बहते पानी जैसा होगा। वो जम ही नहीं सकता। ना जात में ना बात में इस पूरी कायनात के ना किसी ख्यालात में उसके पास कोई बंधे विधाय विचार नहीं होंगे पर अपने साधुओं के पास जाना वो एक बात पकड़ के बैठे हैं कहेंगे ये ये अच्छी बात है बुरी बात है अच्छी बात है बुरी बात है इसके अलावा उनके पास कुछ नहीं होता ये अच्छी बात है ये बुरी बात है ये अच्छी बात है ये बुरी बात है फिर जब कोई नई बात सामने आ जाती है तो उनको समझ में नहीं आता इसका करें क्या जाकर के अपने किसी साधु से एआई के बारे में बात करो अब उनको समझ में ही नहीं आया जाएगा क्योंकि बाबा जी के बाबा जी ने उनको कभी बताया ही नहीं कि एआई सामने आए तो इस पर बोलना क्या है बच्चा उनको यह पता है कि

1:07:26 स्त्री पुरुष के बारे में क्या बोल देना है खानपान के बारे में क्या बोल देना है आहार विहार के बारे में क्या बोल देना है देवी देवता भगवान के बारे में क्या बोल देना है ये सब उनकी रटी रटाई बातें हैं 12वीं शताब्दी की है वो बोल देंगे जाकर के उनसे आज की कोई बात करो पूछो कि बताओ बाबा जी क्लाइमेट चेंज के बारे में क्या बोलना है वो कहेंगे आउट ऑफ सिलेबस ये पाठ्यक्रम से बाहर का सवाल पूछ दिया तो यह सवाल पूछ पूछने की अनुमति नहीं है। वहां पर ऐसे है बात जमा दी गई है और जमी हुई चीज सड़ जाती है। दोनों दरवाजे खुले रहे हवाएं आती रहे जीवन बहता रहे। ज्ञानी सब विषयों को आने जाने देते हैं। उनका मन

1:08:13 आकाश जैसा खुला रहता है। ज्ञानी की पहचान यह नहीं कि उसके जीवन में फलाना विषय है कि नहीं है। कभी आया कि कभी नहीं आया। ये मूर्खता भरे सवाल है। वास्तव में अगर ज्ञानी होगा तो बहुत संभावना यही है कि कोई भी विषय लोगे उसके जीवन में कभी ना कभी आया होगा और आ करके चला भी गया होगा क्योंकि उसका काम ही नहीं है किसी विषय को रोकना आने से ना चले जाने से विषय आया भी रुका प्रयोग हुआ और प्रयोग के कारण ही फिर वो विषय रुखसत हो गया विदा हो गया करना क्या है विषय को जेब में थोड़ी रखना है लपेटना थोड़ी है जानना है और जाना प्रयोग किया वैज्ञानिक

1:08:58 की तरह और जब दिख गया कि यह चीज क्या है तो कहा आ गई चलो निकलो हां भाई अगली चीज लेकर के आओ अगला विषय हाजिर हो अगला विषय आया उसको देखते ही बोला तू बिल्कुल पिछले वाले जैसा है समझ में आ गया तू तू तो प्रयोग की भी जरूरत नहीं चल निकल जा तो उनको विदाई देने की गति भी बढ़ती रहती है अनुभव का यह है पैमाना अनुभव जितना बढ़े विषयों को विदाई देने की गति बढ़ती रहे क्योंकि अनुभव तुम्हें बताता चलता है सिखाता चलता है कि जितने ये तथाकथित नए विषय आ रहे हैं ये है तो सब पुराने ही जैसे ना परखना भी क्या है चलो आगे निकलो या ऐसे कह दो कि परीक्षण अब बहुत जल्दी पूरा हो जाता है क्योंकि तुम्हारे पास वो

1:09:46 नजर पैदा हो जाती है जो देख लेती है कि यह जो विषय अब नया बन के आया है यह नए कपड़ों में पुराना विषय ही है तो इसको बहुत परखने की भी जरूरत नहीं चलो आप विदा हो जाओ। हां जी। और कोई है जो नया होने का दावा करता हो? आइए आप बैठिए। आपसे भी कुछ सवाल करेंगे। सवाल करा, प्रयोग करा। चलिए आप भी निकलिए। आकाश जैसा है मामला। खुला ना सड़कें ना दीवारें। बात आ रही है समझ में? आप लोगों ने मैं कम्युनिटी पर भी देखता हूं। आप लोगों ने धार्मिकता के बड़े रटे रटाए तरीके पकड़ रखे हैं। बड़े पुराने ढर्रे

1:10:35 आप में से बहुत हैं जो जो विकृत रूप है धर्म का लोक धर्म हम जिसको कहते हैं आप हैं जो आकर के लिखते हैं कम्युनिटी पर कि लोक धर्म में यह बुराई लोक धर्म में वह बुराई पर अगर आप प्रयोग परीक्षण अनुभव के प्रति खुले नहीं हुए हैं तो आप स्वयं अभी बहुत बड़े लोकधर्मी हैं। लोक धर्म को भला बुरा कह करके आलोचना करके गाली देकर के क्या होगा अगर आप अभी वैसे नहीं है जैसी बात आज लाउज्जू कर रहे हैं आकाशवत खुले हुए सब वृक्षों के प्रति उपस्थित आ रही है बात समझ में

1:11:24 और क्या है मूर्खता इसके अलावा यह स्वांग करना कि मुझे पहले से ही पता है कि वो चीज कैसी है? तुम्हें पहले से ही पता है कि यह चीज कैसी है? तो तुम्हें पहले से ही कैसे पता कि वो चीज कैसी है? जब तुम्हें पहले से यह नहीं पता कि यह चीज कैसी है तो तुम्हें पहले से कैसे पता कि वो चीज कैसी है? तो तुम कैसे हठ जमा कर बैठे हो कि मैं तो जानता हूं वह चीज कैसी है? अच्छी है या बुरी है। यही होता है आमतौर पर फैसला हम घर में रखने लायक है या सड़क पर फेंकने लायक है? यही फैसला होता है। और ये तुम्हें पहले से पता है। तुम्हें इस चीज का कुछ पता नहीं। तुम्हें उस चीज का कैसे

1:12:10 पता है? तुम्हें किसी चीज का कुछ पता नहीं। तुम्हारे पास बस सुनी सुनाई बातें हैं। और सुनी सुनाई बातों पर चलना ही अधर्म कहलाता है। इसी को श्री कृष्ण कहते हैं कि पर धर्म भयावह होता है। परधर्म यही है। पर माने पराया है। दूसरे से सुनी सुनाई बात पर जिंदगी निकाल दी। यही परधर्म है। और कृष्ण कह भयानक है ये भयानक है। स्वधर्म क्या होता है? स्वयं जानना। नहीं मैं नहीं मानता आप किसी चीज को बुरा कह रहे हैं। नहीं मुझे उस चीज से जाकर के लिपट भी नहीं जाना है पर प्रयोग तो करूंगा स्वयं तो जानूंगा और स्वयं जानने का यह भी मतलब नहीं है कि कोई ऐसा अनुभव कर लूं जो

1:12:58 घातक हो जाए। इतनी बुद्धि इतना विवेक रखता हूं। ट्रेन के नीचे आने से मर जाते हैं। यह सुनी सुनाई ही बात है। तो इसका मतलब यह नहीं कि खुद जाकर के एक बार पटरी पर थोड़ा लेट के आजमाया जाए। बुद्धि है, विवेक है। पर बुद्धि और विवेक से किसी बात को जानना उस पर परीक्षण करना एक चीज है। और डर के कारण या लालच के कारण बुद्धि और विवेक दोनों को परे रख देना और सर झुका देना वह बिल्कुल दूसरी बात है।

1:13:45 बिल्कुल दूसरी बात हां ट्रेन के सामने बैठने की जरूरत नहीं है। ट्रेन के सामने पटरी पर लेट जाने की जरूरत नहीं है। पर जहाज में बैठने की जरूरत है। क्यों नहीं जहाज पर बैठे? क्यों मान लिया इस बात को कि समुद्र पार करने से नर्क मिल जाएगा। और तुम्हारी इस बात के कारण पीढ़ी दर पीढ़ी फिर भारत ने जो दुख झेला अब आएगा कोई लोकधर्मी बाबा उस दुख की जिम्मेदारी उठाने

1:14:33 आ रही है बात समझ में एक-एक पल कीमती है क्योंकि हर पल क्षम क्षमता रखता है तुमको एक अद्भुत अनुभव दे देने की। अनुभव अच्छा है। ये सिर्फ कब बोलोगे? जब वो तुमको जब वो तुमको बदल देता हो, तोड़ देता हो। इस बात को बिल्कुल गांठ बांध लो। किसी जगह गए थे और कोई पूछ रहा है कैसा रहा अनुभव? अगर तुमको वहां सुख मिला है, सुकून मिला है तो मत कह देना कि अनुभव अच्छा रहा। नहीं। अनुभव अच्छा तभी रहा है जब उस जगह ने तुम्हें कुछ बहुत नया सिखा दिया हो। जो

1:15:20 तुम पहले से मानते थे जब उस जगह ने वो सब तुमसे भुलवा दिया हो। तब अनुभव अच्छा है। नहीं तो मत कह देना जल्दी से। हां अनुभव बहुत अच्छा था। चले गए किसी की शादी में। हम ये जो सब ब्याह की मंडली सजती है और वहां से लौट के कह रहे हैं बहुत अच्छी शादी थी। बहुत अच्छी शादी थी। अच्छी शादी थी माने क्या? साफ-साफ समझाओ। अच्छी शादी थी माने क्या? तुम्हारी शादी हुई है? तुम्हें उसमें क्या अच्छा लग रहा है? तुम्हें क्या अच्छा लग रहा है? क्या अच्छा लग रहा है? तुम्हें क्या अच्छा लगा? क्या तुम वहां कुछ नया देख के आए?

1:16:08 तुम्हें कुछ ऐसा मिला जिसने जीवन के प्रति तुम्हारी आंखें खोल दी तो तुम उसे अच्छी शादी क्यों बोल रहे हो? क्यों बोल रहे हो? नहीं खाना बहुत अच्छा था। क्या हुआ उस खाने से? तुम्हें कुछ ऐसा मिला है जो तुम्हारे तन को यानी कि फिर मन को जरा ताजा कर देगा या कि वही पूरी कचौड़ी जो तुम्हें सदा से ललचाती थी वही तुम वहां और पा गए तो अच्छा क्या है फिर वहां पर अच्छा कहलाने की हैसियत बस उस अनुभव की है फिर कह रहा हूं जिसने तुम्हें तोड़ दिया हो झकझोर दिया हो

1:16:53 जो अनुभव तुम्हारी पुरानी पसंद नापसंद को ही और दृढ़ कर दे और पुष्ट कर दे वो अनुभव नहीं है वो समय की बर्बादी है जीवन की नहीं नहीं वो है वहां है वो वर्मा जी उनसे मिलके बड़ा अच्छा लगता है माने वर्मा जी के साथ तुम्हें अच्छा अनुभव होता है बताओ तुमने ये कैसे कह दिया नहीं भागो नहीं बैठो यहां कैसे बोल दिया कि अच्छा लगता है? कैसे? वर्मा जी से मिलते हो तुम्हारी कुछ मान्यताएं टूटती हैं। भ्रम हटते हैं। जाले कटते हैं। कुछ ऐसा होता है? नहीं वर्मा जी तुम्हारे कानों में चाशनी घोलते हैं। यह होता है और तुम बोलते हो हे हैं हे हैं आपसे तो हैं हे जितनी बार

1:17:41 मिलते हैं ही ही उतना अच्छा लगता है। जी जी नहीं अच्छा अनुभव नहीं है। अपनी जुबान को लेकर खबरदार रहो। वर्मा जी की चाशनी तुम्हारे लिए जहर है। समय बर्बाद कर रहे हैं तुम्हारा। कुछ नया दिखा रहे हैं। क्या वह तुमसे अपने रिश्ते को दांव पर लगाकर खतरा उठाकर तुमसे सच बोलने को तैयार हैं? नहीं। मत जाओ वर्मा जी के पास। और अगर जाओ तो वर्मा जी से बोलो वर्मा जी

1:18:29 बैठो कुर्सी पर और खट से कुर्सी से बांध दो उनको और आज करो सवाल और बोलो भागने नहीं देंगे आपने जितनी बातें बोली हैं हम बस जानना चाहते हैं उनकी सच्चाई क्या है जिज्ञासा कर रहे हैं साथ चलिए हमारे भागिएगा नहीं आप हमें रोज चाशनी पिलाते थे हम भी आपके लिए चाशनी तैयार रखे हैं। पूरा एक भर के लाए हैं आपके लिए। जितनी चाशनी चाहोगे पिला देंगे पर भागना नहीं। जवाब दो। मत कहा करो। जगह अच्छी है, व्यक्ति अच्छा है, खाना अच्छा है, अनुभव अच्छा है, स्मृति यादें अच्छी हैं। क्या

1:19:16 अच्छा है? अच्छाई बस एक चीज में है। अहंकार के टूटने में। अहंकार टूटा क्या? नहीं टूटा तो अच्छा गया है। ओ आई हैड अ ग्रेट इवनिंग। हाउ एक्सैक्टली? व्हाट आल्स सो ग्रेट अबाउट इट? क्या? नो यू नो। ये ऐसेसे करने से पंछी नहीं बन जाओगी। घर तुम्हारा आकाश है। यहां बैठ के ऐसे-से क्या कर रहे हो? उड़ो। सचमुच उड़ो। और इस तरह की ग्रेट इवनिंग से तुम्हें बस पिंजरे मिलते हैं। उड़ान नहीं है। क्या ग्रेट है बताओ ना क्या ग्रेट है? किस बात का जश्न है? और अस्तित्व है तुम्हें

1:20:03 जश्न देने के लिए। ज्ञानियों ने कहा तुम दुख में पैदा हुए हो। यह भी कहा जा सकता है तुम दावत में पैदा हुए हो। एक्सिस्टेंशियल पार्टी पर वो तभी हो सकती है जब तुम में जरा दम हो। सवाल पूछने का, सच्चाई झेलने का। आ रही है बात समझ में? यूं ही किसी को अच्छा नहीं बोल देंगे। कभी भी नहीं। अच्छा बस क्या है? वो जो

1:20:50 सवाल करे तुमसे वो जो आईना दिखाए तुम्हें वो जो तोड़ दे तुमको वो जो उठाए तुमको बस वो अच्छा है। अदरवाइज कुछ नहीं अच्छा है। रंग नहीं अच्छे हैं। रंग आंखों को अंधा कर देते हैं। मत कह देना। ओ आई लव दैट क्रिमसन। क्या मिल रहा है तेरे को उस क्रिमसन से? बैठ। क्या मिल रहा है इस क्रिमसन से? क्या बोल रही है? आई लव दैट क्रिमसन। क्या मिला उससे? लाउज तो बोल गए रंग आंखों को अंधा कर देते हैं। तू क्या क्रिमिशन क्रिमिशन कर रही है? क्रिमिसन नहीं है। क्राइम और सीन है। वो गाना मुझे बहुत अच्छा लगा। देव बोल रहे

1:21:37 हैं आवाज दें। अपने कानों को बहरा कर देती हैं। ये जगह तो तुम सुने जा रहे हो। इतना इससे तुम्हें मिल क्या रहा है? टूट रहे हो। शब्द वही भले हैं जो तुम्हारे भीतर की जमावट पर हथौड़े की तरह पड़े। टूट रहे हो? नहीं। चाशनी है बस वही वर्मा जी वाली कानों से पी रहे हो आ रही है बात समझ में

1:22:22 एक इतनी सी भी अगर आप बात पकड़ लें कि यूं ही कुछ भी अच्छा नहीं हो गया कोई जगह अच्छी नहीं हो गई कोई वीकेंड अच्छा नहीं हो गया कोई मूवी अच्छी नहीं हो गई कोई शादी अच्छी नहीं हो गई कुछ भी अच्छा नहीं हो गया नहीं वो ना बड़ा अच्छा अच्छा मैं वहां गया था और वो वो मेडिटेशन रिसोर्ट था और बहुत अच्छा एक्सपीरियंस हुआ। कैसे यू नो आई फेल्ट तुम और जम कर लौटे हो। पिघल कर नहीं। ये अच्छा नहीं हुआ तुम्हारे साथ। ये बहुत बुरा हो गया है तुम्हारे साथ। आपको खुशी होगी इस नाते जो हमारी अपनी ऐप है जिसमें हमारे गीता और बाकी सब

1:23:08 कार्यक्रम चलते हैं। यहां पर बुद्ध हैं, गीता है, उपनिषद है, अष्टावक्र हैं। यह मुझे मिले मेरी जिंदगी बदली। यह तुम्हें मिलेंगे तुम्हारी जिंदगी भी बदलेगी। सच पूछिए तो मतलब लाखों नहीं तो कम से कम हजारों जिंदगियां तो हैं जो बिल्कुल बदली हैं। 2 लाख से अधिक गीता प्रतिभागियों के साथ जुड़े आचार्य प्रशांत ऐप पर। पहला महीना बिल्कुल फ्री गीता मिशन का पूरा एक्सेस ऐप पर आपको मिलेंगे नियमित लाइव सत्र हर दिन आचार्य प्रशांत के विशेष संवाद गीता कम्युनिटी का एक्सेस गीता परीक्षा चयनित समाचार ऑडियो बुक्स कोर्ट्स और भी बहुत कुछ Google Play स्टोर या Apple App स्टोर पर आचार्य प्रशांत सर्च करें और अभी डाउनलोड करें

1:23:56 हम हम

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