0:09 नमस्कार, मैं हूं ममता पूनिया। दोस्तों, अक्सर हम उन लोगों को ढूंढते हैं जहां से हमें कोई सफलता की जादुई कहानी मिल सके। परंतु असल जिंदगी में हमें सबसे बड़ी प्रेरणा उन लोगों से मिलती है जो बहुत ही साधारण परिवार से निकले हो। आज हमारे साथ में जो शख्सियत है उनकी कहानी की शुरुआत होती है बाड़मेर की गढ़रा तहसील के फुगेरा गांव के एक किसान परिवार से सात भाई बहनों का वो शोर गांव के सरकारी स्कूल की वो टाटपट्टी तथा कक्षा 10 के अंदर महज 49% मार्क्स अगर कोई और होता तो शायद वो यहीं रुक जाता परंतु इनकी जर्नी तो यहां से शुरू होती है। हिंदी माध्यम में पढ़कर इन्होंने ना केवल खुद को साबित किया बल्कि
0:54 हिस्ट्री और ज्योग्राफी से डबल एमए कर कर पीएचडी तक का सफर तय किया तथा डॉक्टर की उपाधि ली। एक दौर वो भी आया जब ये चार बार आरएस मेंस तथा चार बार आईएएस मेंस लिख रहे थे। इसी दौरान एक बीमारी जिसका नाम था अल्सरेटिव कोलाइटिस इनके रास्ते में आ खड़ी हुई तथा शारीरिक तकलीफ के चलते इन्हें वह तैयारी बीच में ही छोड़नी पड़ी। परंतु जब एक रास्ता बंद होता है तो दूसरा रास्ता वह अपनी मेहनत से खुद बनाते हैं। आरबीआई, सेकंड ग्रेड, फर्स्ट ग्रेड, हेड मास्टर जैसी प्रतिष्ठित सरकारी नौकरियों में सिलेक्शन लेकर पिछले सात वर्षों से यह ना केवल असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत है बल्कि बहुत सारे ऑनलाइन मंचों के जरिए यह भारतवर्ष के लाखों युवाओं का
1:40 मार्गदर्शन कर रहे हैं। स्वागत कीजिए शालीनता और सादगी की जीती जागती मिसाल डॉक्टर गणपत सिंह राजपुरोहित सर का। सर बहुत-बहुत स्वागत है आपका। थैंक यू। सर जब से आपका सूरतगढ़ वाला जो प्रोग्राम हुआ ज्ञानोदय जी उसके बाद से मैं कास्टेंटली आपकी टीम से कांटेक्ट करने की ट्राई कर रही थी और फाइनली जो है आपने हां कह दिया। मेरे तो सर इतने सब्सक्राइबर भी नहीं है। मुझे कोई जानता भी नहीं है। मेरा इससे पहले सिर्फ एक पडकास्ट हुआ है। ना मुझे कोई एक्सपीरियंस है। तो आपने क्या सोच कर हां किया? सबसे पहले आपका बाड़मेर में स्वागत। जी शुक्रिया। और ये मेरी एक उपलब्धि कह सकते हो।
2:27 जी कि कोई सूरतगढ़ गंगानगर से चलकर बाड़मेर केवल इसलिए आए कि मारवाड़ के एक विद्यार्थी की बात राजस्थान के बच्चों तक पहुंचे। जी तो आपका बाड़मेर में स्वागत। थैंक यू। दूसरा आपको शुभकामनाएं कि आपने जो पडकास्ट की ये अपनी जो एक हॉबी होती है उसको स्टार्ट किया। एक नारी शक्ति के रूप में आप अपनी हॉबी को समय दे रहे हैं और ये चीजें आपकी बहुत बढ़िया चले। इस हेतु आपको शुभकामनाएं। तीसरा पॉइंट था आपका कि आप क्या इतना बड़ा मंच नहीं है। उसके बावजूद भी मैंने हां बोल दी। देखिए मैं इतना बड़ा व्यक्ति नहीं हूं और मैं एक साधारण शिक्षक हूं और एक
3:12 विद्यार्थी हूं। विद्यार्थी का जीवन आज भी जी रहा हूं। तो मुझे बहुत अच्छे से पता होता है कि जब भी कोई व्यक्ति शुरू करता है तो शुरुआत हमेशा जीरो से होती है और हम अगर उसको कोपरेट नहीं करते हैं तो निश्चित तौर पे वह व्यक्ति आगे बढ़ने में दिक्कतें महसूस करता है तो किसी न किसी को कोपरेट करना पड़ता है। पहली चीज। दूसरी बात यह कि आपको हां क्यों बोल दिया? क्योंकि देखो जब आपकी इच्छा है कि आप मेरा पडकास्ट करो और मेरे विचार बच्चों तक पहुंचाओ तो मैं इतना बड़ा कब हो गया कि मैं मेरे विचार बच्चों तक पहुंचाने के लिए भी भावुक हूं कि नहीं मेरे लिए तो मिलियंस सब्सक्राइबर वाले यूर्स चाहिए। वो तो उनके मंच पे तो वैसे भी बड़े लोग वैसे ही आ जाते हैं। जी लेकिन गांव ढाणी या बाड़मेर जैसे क्षेत्र
4:00 से किसी व्यक्ति के विचार पहुंचाने के लिए कोई प्रयास कर रहा है तो मेरा धर्म बनता है कि मैं मंच की साइज ना देखूं बल्कि उनके इंटेंशन देखूं। उनके उद्देश्य क्या है वो देखूं। इस वजह से मैंने बहुत ही ईजीली हां बोल दिया। मैं सही बताऊं तो मैं हां बोल देता हूं। ठीक है। थोड़ा टाइमिंग का इशू रहता है। जी। और क्योंकि क्लासेस रहती है, बहुत सारी चीजें रहती हैं। तो कई बार मैनेज नहीं कर पाते। बट आपने बड़े विनम्रता साथ में बड़ी अच्छी तरीके से एज ए स्टूडेंट बात करी तो मैंने बहुत अच्छी तरीके से हां बोलिए। मुझे उसमें कोई दिक्कत वाली बात नहीं। जी ये तो आपका बड़प्पन है कि आप इतने उच्च कोटि के विचार रखते हैं। सर हम शुरुआत करेंगे आपकी कक्षा 10 के मार्क्स से। आपने
4:46 49% मार्क्स जो है वो लिए तो क्या आप उस टाइम पढ़ाई नहीं करते थे या फिर आपको याद नहीं होता था और ऐसा क्या हुआ कि सडनली जिस स्टूडेंट के 49% मार्क्स आ रहे थे वो इतना अच्छा लाइफ के अंदर अचानक से करने लगे। यह अह प्रश्न मेरे सामने कई बार पहले भी आया है। अह देखिए मेरे 49% थे और इस प्रश्न को आपने कई भागों में बांट दिया है। तो देखो सबसे पहली बात है कि ये परसेंटेज कम क्यों थे? तो उसके पीछे एक बहुत बड़ा कारण था। है ना? पढ़ाई में मैं वैसे ठीक था ना। इतना वो ठोट स्टूडेंट होते ना वैसा भी नहीं था। और बहुत ब्राइट स्टूडेंट होते वैसा भी नहीं था। एक आप लेबोरियस स्टूडेंट कह सकते
5:31 हो जो मेहनती हो है ना जिसको बहुत अधिक याद नहीं होता लेकिन मेहनती इतना है कि दूसरे लोग दो बार पढ़ सकते हैं तो हम उसको चार बार पढ़ लेंगे है ना तो इस तरह से थोड़ा सा मेहनती स्वभाव मेरा शुरू से ही रहा है इतना जीनियस स्टूडेंट नहीं रहा कि भाई मैं बहुत अच्छी तरीके से एक बार पढ़ लिया मुझे याद हो गया दो बार से याद हो गया ऐसा नहीं था हां ये है कि मेहनत में कसर नहीं रखता और पढ़ने का तरीका थोड़ा यूं रहता है कि समझ समझ के पढ़ने की कोशिश करता हूं। रटा इतना जाता है। तो एक तो यह बात थी। दूसरी बात थी परसेंटेज कम क्यों थी? इसके पीछे एक बड़ा रीजन था। हालांकि मैंने कभी किसी मंच पे बोला नहीं है। चाहता तो यह हूं ना बोलूं और कभी भविष्य में कुछ लिखूंगा तो निश्चित
6:18 तौर पर मैं उन स्थितियों को शब्दों के माध्यम से लेखनी के कलम के माध्यम से मैं शायद ज्यादा उनके साथ इन स्थितियों के साथ न्याय कर पाऊंगा। फिर भी मैं एक संक्षिप्त में कि आपने पूछा है तो पडकास्ट का मतलब यही होता है कि हम बिना कुछ छुपाए हुए बात को क्लियर बोले। तो ऐसी स्थिति बनी थी कि तकरीबन साल भर जो 10थ क्लास थी वहां मेरा एक आप हरासमेंट कह सकते हो। जहां मुझे गजब तरीके से टॉर्चर होना पड़ा था। टॉर्चर की इंतहा यह थी कि मैं घर से तकरीबन 200 कि.मी. 250 कि.मी. दूर
7:06 पढ़ने के लिए मुझे भेजा था। तो मैं पहली बार ही गांव से बाहर निकला था। उससे पहले मैं आठवीं तक गांव में ही था। है ना? तो वहां पे इतनी ज्यादा सुविधाएं भी नहीं थी। मैं एक किस्सा सुना हूं इस बीच में। तो मैं जब पहली बार हॉस्टल गया पढ़ने के लिए जालौर हॉस्टल में तो मुझे ये नहीं पता था कि जो ब्रश करते हैं ये टूथपेस्ट का जानकारी नहीं थी मुझे। ठीक है? हम लोग नीम से और करते थे घर पे। पापा करते थे नीम से और केयर से करते थे तो हम भी उससे कर लेते थे फॉर्मेलिटीज या एक लाल दंत मंजन से मम्मी करती थी तो हम उस हिसाब से करते थे। तो वहां पर जब मैंने यह चीजें वहां मुझे नहीं पता थी तो एक बार मैं किसी के रूम में मांगने गया तो मेरे को
7:51 उन्होंने वो एक खुजली की दवाई आती है ना क्या नाम था उसका एक दवाई आती है जब कोई खुजली होती है उस पे लगाते हैं ऐसे तो मेरे को वो देख मिक्स करके और दे दी के यही ब्रश करना मैंने उसी से 10 दिन ब्रश किया अच्छा हां मुझे ये नहीं पता था कि कोलगेट क्या होता है और ये क्या होता है ठीक है तो अब आप समझ सकते हो कि मैंने पहली पहली बार ट्रेन की यात्रा करी थी। ये 2002 की शायद बात रही होगी। जी नहीं एक की बात है ना। तीन में मेरा 10थ हुआ। ये नाइंथ की बात है। तो आप सोच सकते हो कि कितनी समझ रही होगी। हम तो मैं बता रहा था कि वो जो एट्रोसिटी की मैं बात कर रहा था एक हरासमेंट का। तो मैं उस मैं जालौर से जालौर पढ़ता था ना
8:36 मैं नाइन 10थ में। जी। वहां से नंगे पैर में गांव आया था बिना किसी टिकट के हम भाग के बड़ी मुश्किल से कभी ट्रेन की नीचे की सीट में सो के और इतनी अट्रोसिटी अत्याचार था उस पूरे लगभग छ महीने लास्ट में बहुत बुरी तरीके से ये सब चीजें हुई थी क्यों हुई थी ये बहुत बड़ी लंबी कहानी है जी जो कभी मैं बताऊंगा वैसे मंच पे बता नहीं पाऊंगा क्योंकि बहुत अपने लोग थे तो शायद नाराज हो जाएंगे और मैं इस समय ये चीज उचित नहीं समझता था। इस वजह से मेरे परसेंटेज कम थे। क्योंकि आप लास्ट समय यह समझ लीजिए कि मेरी एग्जाम जो 10थ की लगी थी उस समय मेरे पास दो महीने तक मेरे पास कोई पुस्तक भी नहीं थी। एक गणित की किताब मेरे हाथ लगी थी जाते
9:22 भागते-भागते। और कुछ भी नहीं था पास में। कोई एक दो कुंजी और रही होगी पास में। जी। इस कारण से मैं पिट गया था बुरी तरह से। मेरा पढ़ाईवढ़ाई से मन उड़ गया था। जी। फिर 11थ में आने के बाद मैंने थोड़ा-थोड़ा वापस अपने आप को मानसिक रूप से ठीक करना शुरू किया। कुछ-कुछ जगह तो मेरे शरीर पर निशान आज भी बने हुए हैं। इस टाइप से हरासमेंट जी। आप उसको मतलब बहुत कुछ चीजों से जोड़ के देख सकते हैं। जी। तो इस वजह से मेरे मार्क्स कम थे। फिर जब 11 12th में आ गया तो वापस ठीक-ठीक पढ़ना शुरू किया। भाषाएं कमजोर रह गई अंग्रेजी वगैरह सारी। फिर 12वीं में 61% बने। उस समय तक मैं उस दसवीं के उस जिस रिगोरियस
10:10 स्थिति से मैं गुजरा था ना उससे मैं बाहर नहीं निकल पाया था। ये हकीकत की बात है। हम और घरवाले भी ऐसे मैं बिल्कुल खामोश हो गया था। मतलब इतना एक दब गया था ना कि मुझे डर लगने लगा था इस दुनिया से भी ऐसा। क्योंकि आप उस कच्ची उम्र में किसी को इस तरह से पीटते हो, टॉर्चर करते हो। निरंतर टॉर्चर टीचर करते थे या नहीं। ये हमारे ही कोई लोग थे। मैं यह ऑन कैमरा नहीं बोल पाए। सर थोड़ा हिंट अगर आप देना चाहे तो अब रिलेटिव ही थे जो भी थे। पर सर अगर इस तरह से अगर आप उनका नाम नहीं बताएंगे तो हो सकता है वो ये किसी और के साथ करें। नहीं वो किसी और के साथ करने की स्थिति में अब रहे नहीं क्योंकि कर्मा हम लेकिन अब मैं उस चीजों को वापस नहीं लाऊंगा क्योंकि मैं बहुत क्लोज लोग हैं। तो
10:58 इस वजह से वो चीजें हुई थी। फिर जब मैं 12th करके बाहर निकला फिर कॉलेज में आ गया और उसके बाद में बड़े अच्छे साथी मिले। आपकी बॉडी वैसे ही काम करती है जैसा आप सोचते हैं। जी। आपने सोच लिया कि या जैसे होता है ना अच्छा म्यूजिक सुनते हैं तो हमारा मूड अच्छा हो जाता है। सैड सॉन्ग सुनते हैं तो हमारा मूड थोड़ा सा डाउन हो जाता है। या पार्टी सॉन्ग सुनते हो तब आप डांस करने का मन हो जाता है। आपके हार्मोन वैसे ही काम करते हैं जैसा आप सोचते हो। हम तो अगर आप अच्छा सोचते हैं कि भाई मुझे सिविल सर्वेंट में जाना है या मुझे बढ़िया जगह जाना है तो आपके बॉडी के हार्मोन वैसे ही काम करते हैं और धीरे-धीरे आप वैसा बन जाते हैं। तो और ये सोच कहां से आती है? ये सोच आती है आपके आसपास कौन है?
11:44 जी। आप जैसे लोगों के साथ रहते हैं ना आपके दिमाग में वही सोच फीड कर दी जाती है। हम तो आप अच्छे लोगों के साथ रहोगे तो निश्चित तौर पे आप भी एक अच्छा सोचोगे। अब मैं जब कॉलेज फर्स्ट ईयर सेकंड ईयर से निकला था तो मेरे साथ बड़े अच्छे लोग थे। रघुनाथ था, भगवान साईं शर्मा थे, भवानी सिंह था, सुजल था। मतलब ये ऐसे लोग हैं जो आज सभी अच्छी-अच्छी जगहों पे हैं। और इन्होंने एक अच्छा ड्रीम दिया था कि भाई हम सब यूपीएससी करेंगे दैट टाइप। तो अब आप सोच सकते हो जब सेकंड ईयर फाइनल ईयर में जब किसी बच्चे के दिमाग में ये चीज डाली जाती है तो फिर उसकी उसकी क्रियाएं भी उस अनुसार होती है। जी। और धीरे-धीरे चीजें चेंज होती गई होती गई और फिर मैं कब बन गया यह मुझे पता ही
12:29 नहीं चला। जी तो सर जैसे आपने बताया कि आप आईएएस की तैयारी जो है आपने चार बार मेंस लिखे तो कुछ आपके दोस्त ऐसे भी रहे होंगे जो आज प्रश्निक सेवाओं में हैं। हां काफी दोस्त हैं। तो आपको क्या लगता है कि उनकी क्या राय है? आप बेटर कर रहे हैं या फिर वो बेटर कर रहे हैं? मेरे जो मित्र थे आज भी हैं। खैर बात कम हो पाती है क्योंकि सब अपने-अपने फील्ड में बिजी हो गए हैं। तो जब मेरा नहीं हुआ और मेरे साथी हो गए थे तो उनको बहुत अच्छे से रीजन पता थे कि बंदा बीमारी से टूट गया है। जी सबको अच्छे से पता था क्योंकि मैं टेबल पे कम था और बेड पे जाता था। जी। तो आपके सच्चे साथी वही होते हैं जो संकट
13:19 में खड़े हो सकते हैं। जी और आपकी प्रसिद्धि को लोकप्रियता को डाइजेस्ट कर सकते हैं। सच्चे साथी वही होते हैं। जी। तो जब मैं इन स्थितियों से गुजर रहा था तो मेरे लगभग सारे साथियों को ये बात पता थी कि भाई मैं जो है वो इस फील्ड से दूर इसलिए हो रहा हूं कि मजबूरी है मेरी और बीमारी की स्थितियों को मैं झेल रहा था। कभी जीटीबी हॉस्पिटल में, कभी एम्स में, कभी राजस्थान हॉस्पिटल में, कभी सिविल हॉस्पिटल में। तो ये जब चीजें चल रही थी तो मेरे साथी मुझे एक मोटिवेट ही कर रहे थे कि कोई इशू नहीं है। आप जिस फील्ड में जाओगे इवन रघुनाथ तो डेली कहता था कि तू अच्छा शिक्षक ही बनेगा और तुझे इसी फील्ड में जाना चाहिए। तो मेरे लिए शायद यही
14:04 फील्ड था। तो फिर सभी साथियों ने मुझे मोटिवेट ही किया कि भाई हम बीमारी से लड़िए बाकी चीजें तो होती रहेगी। तो किसी ने भी यह कहा ही नहीं कि भाई आपको क्या करना चाहिए क्योंकि उनको पता है नियति जो सेट करके रखी है आपको वही चीजें मिलनी है। अब जब हमारी बात होती है तो मुझे वो यही कहते हैं कि गुरु आपने बहुत बढ़िया काम किया है। बहुत अच्छा कर रहे हैं आप। हम लोगों की रीच इतनी नहीं है जितनी आपकी है। हम लोग ठीक है हमारे कार्य में सेटिस्फाई है लेकिन आप हमारे से कई गुना आगे चले गए। वो कहते हैं। मैं इस बात को एक्सेप्ट नहीं कर सकता। बिल्कुल उनका पर्सेक्टिव है। हां उनका पर्सपेक्टिव ही है जो आपने पूछा। मैं तो सिर्फ यही समझता हूं कि मैं एक शिक्षक हूं। मैंने अपने आप को समाज को समर्पित कर दिया है। जी और मैं उनके लिए प्रयास कर रहा हूं।
14:51 बच्चों के लिए हर दिन 50 100 बच्चों से मिलता ही हूं और मैं कर्तव्य निष्ठा के साथ काम कर रहा हूं। और जब तक मेरी शरीर मुझे अनुमति देगा तब तक मैं यह करता रहूंगा। मेरे अंदर ना तो कोई प्रसिद्धि की चाह है, ना मुझे पैसे की कोई लालसा है और ना मेरे अब कोई बहुत बड़े ड्रीम रहे। अब सिर्फ यह सोचता हूं कि सुबह से शाम तक मैं मेरे कर्तव्यों को ठीक तरीके से निभा निभा लूं। तो मेरे लिए वो सुकून है। इससे ज्यादा कुछ नहीं है। तो सब साथी यही कहते हैं कि आप हमसे बेहतर कर रहे हैं। सिविल सर्वेंट आप बनते तो शायद उस पोस्ट के साथ आप न्याय नहीं कर पाते। जी क्योंकि इस हेल्थ के साथ पॉसिबल भी नहीं था। जी तो ये चीज है सर आपकी डडीिकेशन, डिवोशन और डिटरमिनेशन तीनों ही काबिले तारीफ है। आपने कहा कि
15:38 मैंने खुद को जो है समाज को समर्पित कर दिया है। तो आपको कई बार यह नहीं लगता कि सक्सेस तो मिल रही है, प्रतिष्ठा भी मिल रही है, सम्मान भी मिल रहा है। लेकिन कहीं ना कहीं रिश्ते जो है वो पीछे छूट रहे हैं। क्या आप अपने परिवार को इतना समय दे पाते हैं? देखो जब व्यक्ति पब्लिक हो जाता है। पब्लिक होने का मतलब अपना जीवन सार्वजनिक रूप से सब लोगों को समर्पित कर देता है। जैसा हमने थोड़ी देर पहले कहा तो व्यक्ति का परिवार है ना बेसिकली समाज हो जाता है। या मेरा समाज का मतलब है कि किसी भी जाति धर्म का बच्चा वो समाज ही हो गया। सारा सोसाइटी मतलब सब कुछ तो सार्वजनिक होने के बाद में आप केवल परिवार के व्यक्ति नहीं रहते हैं। आप सबके हो जाते हैं।
16:26 और मैं अब हकीकत यह है कि मैं सबका हो चुका हूं। तो ऐसी स्थिति में पहली बात तो यह मुझे ऐसा कुछ अभाव महसूस नहीं होता कि मैं समय नहीं दे पा रहा हूं। अब मैं अगर परिवार के पर्सपेक्टिव से देखता हूं उनकी दृष्टिकोण से तो उनको निश्चित तौर पे लगता है जैसे बिटिया को लगता है डेली कहती है पापा आपसे बात नहीं हो पाती। आप हमारे साथ नहीं चल पाते। कई बार सुबह जल्दी निकलता हूं। रात को लेट आता हूं तो बच्चे सोते हुए होते हैं। निकलता हूं। जब वापस आता हूं तब तक सो जाते हैं। तब एक हल्का सा एहसास होता है कि यार इन बच्चियों को टाइम नहीं दे पा रहा हूं। तब सोचता हूं कि चीजें कम कर दूं। अब कम करना मेरे हाथ में नहीं है। क्योंकि अब मैं इतना जुड़ गया हूं कि मैं कम कर ही नहीं पा रहा हूं। डिमांड ज्यादा है तो सप्लाई तो हां क्योंकि अब बच्चे अब जैसे कोई
17:12 स्टूडेंट है वो कहते हैं सर हमारे कार्यक्रम में चलना पड़ेगा। एक ही तो कार्यक्रम की बात है। उनके लिए एक होता है मेरे लिए उदास हो जाते हैं ऐसे। जी। फिर क्लासेस वगैरह होती है, कोचिंग वगैरह है। सारी चीजें ऐसी होती हैं कि दिन में 2030 बच्चे तो हर दिन कॉलेज कोचिंग वगैरह मिलने के लिए आते हैं अपनी विभिन्न प्रकार की प्रॉब्लम्स लेके। तो जब पूरा दिन इन लोगों से मिलता हूं या मेरी वजह से किसी बच्चे के चेहरे पे जब स्माइल आती है तो फिर मुझे यूं लगता है कि ठीक है मैं परिवार को थोड़ा कम दे पा रहा हूं। लेकिन जितना दे रहा हूं वो भी तो श्रेष्ठ ही है ना। कई लोगों के परिवारों में तो लोग चले जाते हैं। उनको तो बिल्कुल टाइम नहीं मिलता। एटलीस्ट मैं कुछ तो दे रहा हूं। जी मतलब आप जितना भी परिवार के साथ में टाइम स्पेंड करते हैं वो क्वालिटी हां वो तो दे रहा हूं।
17:58 तो परिवार वालों को इसीलिए शुक्रगुजार हो जाना चाहिए कि कुछ तो दे रहा है। जी कई लोग छोड़ जाते हैं। बीच में छोड़ जाते हैं। बीच राह में छोड़ जाते हैं। जी बिल्कुल। उस कुछ में बहुत कुछ है और मानेंगे तो बहुत कुछ है। मैं 24 घंटे घर पे बैठा रहूंगा तब भी कई बार सेटिस्फेक्शन नहीं होते। जी ये बात है। बिल्कुल सर आपने बहुत सारे जो है गवर्नमेंट जॉब्स में सिलेक्शन लिए। मान लीजिए कि इन सभी का पे ग्रेड सेम है और सभी के सभी पदों के साथ में आने वाली अगर प्रतिष्ठा भी जो है अगर वो समान हो तो आप किस जॉब को चूज़ करना चाहेंगे और क्यों? अच्छा जो वापस जो मैंने जितनी जॉब्स करी है वगैरह हां बिल्कुल मुझे स्कूल लेक्चरर ज्यादा सही लगा था करेक्ट विद्यालय में जो व्याख्याता था मैं खड़ी
18:44 में लगा था विद्यालय के अंदर जो स्कूली सिस्टम जो है ना वो बड़ा प्यारा है। उसमें बच्चे टीचर से बहुत दिल से कनेक्ट होते हैं। नियमित क्लासेस होती है। प्रेयर होती है। बच्चों में भय भी होता है। बच्चा आपका बड़ा फैन होता है उस जगह पे। आप जैसा कहते हो बच्चा वैसा ही करता है। आप उसकी लाइफ को चेंज कर सकते हो। हम वरना लगता है कि सच में कुछ हो रहा है काम। हम जब कॉलेज में आए तो देखो हमें पेमेंट ठीक मिल गया। पद का नाम मिल गया। लेकिन पढ़ा के इतने सेटिस्फाई नहीं। कॉलेज में एक या दो क्लासेस मुश्किल से मैं ले पाता हूं। मतलब इतनी मिलती है हमें। कॉलेज में नियम बने हुए हैं। तो जैसे अब हम इतिहास में
19:30 यहां पर बाड़मेर में पांच प्रोफेसर हैं। तो एक दो क्लासेस भी बड़ी मुश्किल से मिल पाती है। वहीं हम 11 12th में थे तो वहां पे हमें छह सात क्लासेस ईजीली मिल जाती थी। मतलब बड़े नादान से बच्चे हैं। बड़ा अच्छा लगता था। तो मुझे वो जॉब आज भी है ना ऐसे लग सताती है कि मुझे वहां चले जाना चाहिए। फिर वापस वही है ह्यूमन बिहेवियर कि थोड़े पैसे ठीक मिलते हैं पद ठीक है वापस जाएंगे तो समाज वापस कहने लग गया कि कहने लग जाएगा कि वापस कैसे गए ये वो इसलिए बैठे हैं और तो क्या अब यही है कि इन बच्चों को अच्छा पढ़ा लो जितना अपने से हो पाता है जितने बच्चे अपने को कोपरेट करते हैं तो कॉलेज में भी बच्चे अच्छे आते हैं बट यही है कि स्कूल में पूरा सिस्टम से काम चलता है कॉलेज में अब यह होता है कि कई बार प्रशासनिक काम होते हैं। कई बार
20:17 इलेक्शन के काम आते हैं। कई बार एडमिशन की प्रक्रिया चलती है। तो ऐसे कामों से कई बार क्लासेस कम भी होती है तो फिर बच्चे नियमित नहीं हो पाते। फिर बच्चे कंपटीशन में लग जाते हैं। कोचिंग्स वगैरह पकड़ लेते हैं। स्कूलिंग में ऐसा नहीं होता। वो बड़े यूनिफार्म में आते हैं। बैग लेके आते हैं। तो यहां पे तो यूनिफार्म बैग जैसा कुछ है नहीं। प्रेयर जैसा कुछ है नहीं। तो ये थोड़ी सी रहती है। कमी महसूस होती है। सर आप असिस्टेंट प्रोफेसर तो हैं ही। आप पढ़ाते भी हैं और आपका अभी तो है एक स्कूल भी चल रहा है सक्सेस पॉइंट नाम से और बहुत ही बेहतरीन काम हो रहा है वहां पर। इवन मुझे जानकारी मिली कि वहां से जो है बहुत ज्यादा स्टूडेंट्स जो है वो बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटीज में जो है वो एडमिशन ले पा
21:04 रहे हैं। उस एग्जाम क्रैक कर रहे हैं। तो कितना कुछ जुगाड़ हो जाता है। मतलब सेटिस्फेक्शन के लेवल पे या इनकम के लेवल पे। दोनों के लेवल पे सेटिस्फेक्शन तो है नो डाउट आप कह रहे हैं कि मेरा स्कूल वगैरह मेरा कुछ भी नहीं है। मैं बता रहा हूं यहां पे सक्सेस पॉइंट के अंदर तकरीबन 150 प्लस लोग लगे हुए हैं। रात दिन एक करके वो संस्था चला रहे हैं। मैं इस संस्था को मुश्किल से दो घंटे का टाइम देता हूं। जी 3:00 बजे तक तो मैं कॉलेज से हिलता भी नहीं हूं। जी। 3:00 बजे के बाद में मैं कोचिंग साइड आता हूं। वहां पे आधा घंटा पौना घंटा नाश्ता करता हूं। थोड़ी रेस्ट करता हूं और उसके बाद में कोई एक आधी ऑनलाइन क्लास लेता हूं तो वह सारी निशुल्क है और उसके बाद में
21:52 कोई टीम को मोटिवेट कर लिया क्या करना है क्या नहीं करना है उनकी एक दो मीटिंग्स ले ली एक दो क्लासेस बच्चों से मिल लिया फिर चला जाता हूं बाकी 22 घंटे का काम टीम देखती है जी तो बड़ी टीम है बड़ा काम है और ये सारे लोग मिलके करते हैं मैं सिर्फ इस टीम का एक हिस्सा हूं पहली चीज दूसरी बात सक्सेस पॉइंट संस्था 2013 से है और मैं इस संस्था से जुड़ा हूं 2015 के आसपास से। तो इस संस्था के अंदर मेरा कोई ऐसा रोल नहीं है। मैं सिर्फ और सिर्फ इन लोगों ने मुझे इसलिए यहां पर बैठा रखा है यहां बुलाया जाता है कि मैं इनको ठीक-ठीक रास्ता दिखाता रहूं। बस और इसमें मेरा समय
22:40 भी अच्छा चल रहा व्यतीत हो जाता है क्योंकि तीन चार बजे के बाद मैं फ्री रहता हूं तो 6 सात घंटे मेरे यूटिलाइज हो जाते हैं और साथ में हजारों बच्चों से मिलके एक सेटिस्फेक्शन क्योंकि देखो कोचिंग से जुड़ने के पीछे मेरे दो उद्देश्य थे पहला सीधासीधा उद्देश्य था पैसे का जी क्योंकि मैं ठीक-ठीक करोड़ों में नीचे गया हुआ था और मुझे उससे बाहर आने के पास मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। मैं गलत काम तो कर नहीं सकता। जी। सैलरी से मैं बाहर आ नहीं सकता। जी। क्योंकि उस समय मेरी सैलरी ₹100 थी। ठीक है। और मेरे ऊपर मैं अगर बात करूं तो मंथली 5 से 6 लाख का ब्याज था उस पे। जी। तो मैं कैसे बाहर निकलूूंगा? तो मेरे पास क्या विकल्प रहा? तब मेरे पास
23:27 सिर्फ एक ही विकल्प था कि मैं कुछ ऐसा करूं जो लीगल हो। किसी का बुरा भी नहीं हो और मैं पढ़ ही सकता था। अब मैं कोई स्मगलिंग तो कर नहीं पाऊंगा। वो ना मेरे से होगी। इससे अच्छा मैं मर जाऊं। हम मेरे पास इतनी प्रॉपर्टीियां थी नहीं कि मेरे बाप पिताजी के पास में घर वगैरह जमीन है कि मैं पूरे बेच दूं ना तब भी 50 लाख ही ना उतरे। करोड़ों में तो कैसे उतरेंगे। हम और बाकी कोई परिवार में इतना समर्थ है नहीं कि वो सारा पेमेंट उतार सके। मेरे पापा पहले एडॉक बेसिस पे सहकारी समिति में व्यवस्थापक रहा। इनकी आज भी पेंशन आती है ₹34000 मंथली तो इनकी सैलरी ₹1000 थी हम और फिर खेती करते थे मम्मी और हाउसवाइफ है बड़ा परिवार जैसा कि आपको पता है हम
24:12 छोटा भाई पढ़ रहा था बड़े भैया के पास में कोई इतना जॉब नहीं जी करे कौन सही है तो मेरे पास यही विकल्प था कि मैं संस्थान से जोड़ता हूं और पढ़ा लेता हूं जी दूसरा कारण था बीमारी ठीक है बीमारी इस बीमारी का मेन रीजन है वो है आपके स्ट्रेस तनाव जी और ये ऑटोइ्यून डिजीज चीजें हम अब जब अकेला बैठता हूं फ्री बैठता हूं तो पूरा माइंड चला जाता है पेट पे हम दिमाग में ऑल टाइम रहता है बीमार हूं बीमार हूं और उस चक्कर में कोविड में मुझे हॉस्पिटलाइज करना पड़ा बिल्कुल जब मैं बहुत बिजी रहता हूं तो मुझे इन चीजों के बारे में याद भी नहीं आता हम तो मुझे पता ही नहीं चलता कि मैं बीमार हूं। मैं सुबह से शाम इसीलिए दौड़ता रहता हूं। कोई काम नहीं होता तो खेलने चला जाता हूं। बट अपने आप को बिजी रखता हूं ताकि मेरा दिमाग बीमारी पे ना जाए। हम
24:58 ये दो ही कारण थे। कोई तीसरा कारण नहीं है। ठीक है। अब क्यों जुड़ा हुआ हूं? अब इकोनॉमिकली दिक्कत नहीं है। सब मैंने सेटल कर दिया है ईश्वर की कृपा से। जी। और दूसरा बीमारी का इशज़ आज भी है। टेबलेट्स खाता हूं। हम तो उसके लिए मुझे संस्थाओं से जुड़े रहना जरूरी है। खुद को कहीं ना कहीं बिजी रखना जरूरी है। हम तो एक माध्यम यही है मेरे पास। मेरे पास यही स्किल है और कोई स्किल नहीं है। जी। तो इस वजह से है ये सब चीजें। तो सही चल रहा है। बट मैं चाहता हूं कि मेरे मार्गदर्शन से अगर संस्था चल रही है तो मैं चाहता हूं कि वो बहुत तरीके से काम करें। जी बिल्कुल इनकम आपने अब भी नहीं बताई। सर इनकम तो मेरे पास कुछ है ही नहीं। सही बता
25:43 रहा हूं। जी। अभी घर बनाया है। लोगों के पैसे उतार दिए हैं। जी। गाड़ी के नाम पे मेरे पास कुछ है नहीं। एक creta गाड़ी है पुरानी। जी। और बाकी गाड़ियां तो अब आप कहोगे सर वो लेजेंडर किसकी है? वो स्कर्पियो किसकी है? सब साथियों की गाड़ियां कृपा से चल रहा है सब कुछ। अच्छा बाकी अभी एक इंटरेस्टिंग बात बताऊं मैंने आज दिन तक सक्सेस पॉइंट से वगैरह से कभी ना तो कोई हिसाब किया ना कभी पीरियड के काउंटिंग की जो ऐसा शिक्षक करते हैं। हम मैंने आज तक नहीं की। मैं झूठ नहीं बोल रहा हूं। हम मुझे ये भी नहीं पता कि मेरे पैसे बनते कितने हैं, लिए कितने हैं, मुझे नहीं पता। हम मेरी जरूरतें थी पूरी हो गई। अब मैं मांगता नहीं। जी। मेरी गाड़ी का पेट्रोल भी मैं मेरे पैसे से भरवाता हूं। जी। मेरे घर के खर्चे मैं मेरे हिसाब से देता
26:30 हूं। मेरी सैलरी मैं यूटिलाइज करता हूं। वेतन तो वो है जो मुझे गवर्नमेंट देती है। बिल्कुल। बाकी की चीजें थी वो पूरी कर दी। अब मैं ठीक हूं। ठीक है। वेतन का तो पता ही नहीं है। सर आपने अभी बताया कि आपको स्टेरॉइड लेने पड़ते हैं, दवाइयां लेनी पड़ती है। कितने सालों से ले रहे हैं और आपको ये कब तक दवाइयां जो है कंटिन्यू करनी पड़ेगी और कितनी लगभग डे में मेडिसिन आपको लेनी पड़ती है? 2009 से जब से अल्सरेटिव कोलाइटिस हुआ था तब से ही मैं कंटीन्यूअसली ले रहा हूं। मैंने होम्योपैथी ट्राई किया। हम आयुर्वेद भी ट्राई किया। मैंने योग शास्त्र वाला ये भी ट्राई किया। और मोस्टली सारा कर लिया। अच्छा कुछ भी मुझे किसी पैथी में सुधार नजर आया नहीं। ठीक है। YouTube वगैरह पे खूब सारा ज्ञान झाड़ते
27:15 हैं। मैंने खूब कोशिश है कि सब व्यू बढ़ाने के लिए करते हैं। सही बात तो ये है कि मैं तो ठीक नहीं हुआ इन सब से। अब वर्तमान स्थिति ये है कि स्टेरॉइड खानी पड़ती है जो लिवर कॉर्न सीधा डैमेज करती है। ओके। और अमना करिल करके एक मेसाकोल लेनी पड़ती है जो 800 एमg का है। हम तो ज्यादा खराब होती है। दो लेता हूं नहीं तो एक लेनी पड़ती है। एक इम्यूनिटी सुपर सैडर लेनी पड़ती है जो इम्युनिटी को कम करती है। तो तीन टेबलेट तो मेरी डेली लाइफ का हिस्सा है। ये मुझे लेनी पड़ेगी। और साथ में खानपान में बहुत कुछ छोड़ा हुआ है। जी। मार्केट का कुछ भी नहीं खाता। कभी कबभार महीने में एक आध बार कुछ खा लिया तो खा लिया। बाकी जैसे दूध बिल्कुल छोड़ा हुआ है। तेलीय पदार्थ है। मिर्च मसाले हैं।
28:03 मांस मदिरा तो वैसे हम खाते नहीं है। ब्राह्मण है तो जी और दूसरा शराब, कोल्ड ड्रिंक्स, कॉफी, चाय। चाय ब्लैक टी कभी-कभी पी लेता हूं। बाकी हालांकि चाय की कोई ऐसे सौगंध नहीं है कि नहीं पिएंगे। कोई कह देता है तो कभी-कभी पी लेता हूं। की नशा नहीं है। हम दूध की मिठाइयां, दूध प्रोडक्ट वगैरह सब बंद किए हुए हैं। दाल रोटी खाता हूं, दाल चावल खा लेता हूं। बस ऐसी जिंदगी चलती है। और बाहर जाते हैं तो फिर चलाते हैं कैसे करके ऐसे। जी। तो अब क्या है कि ये टेबलेट मुझे लाइफ टाइम लेनी पड़ेगी। अच्छा। इसमें होता यूं है कि जब मेडिसिन काम करना बंद कर देती है आपकी। हम डॉक्टर पहली प्रयास तो ये करता है कि मेडिसिन से कंट्रोल रहे। हम आपकी आंत की जो डैमेज मेरी 92% आंत डैमेज
28:51 हो रखी है बड़ी वाली। अच्छा तो कोशिश पहले यह रहती है कि मेडिसिन से वह कंट्रोल हो जाए। फिर भी नहीं होती है तब लास्ट में डॉक्टर क्योंकि वो कोलाइटिस लास्ट में कोलोन कैंसर में कन्वर्ट हो जाता है। जी। कोलोन कैंसर में होने के बाद में आपकी बड़ी आंत काटनी पड़ती है। बड़ी आंत जब कट जाती है तो फिर आपको बहुत जिंदगी में दिक्कतें आती है। फिर आपके यहां पे लैट्रिन की थैली लगा दी जाती है साइड में। जी फिर वह थैली के साथ आप कुछ नहीं कर सकते। हम फिर थैली दिन में तीन चार बार साफ करनी पड़ती है। वह बंधी हुई रहती है। जी तो उसके बाद जो है वो बॉडी आपकी एकदम से यूं समझ लीजिए कि आप दिव्यांग हो जाते हैं एक टाइप से। ओके। शरीर का एक अहम हिस्सा आपको खो दिया जाता है। तो दिव्यांग व्यक्ति को कम से कम
29:36 फायदे भी मिलते हैं वगैरह। ऐसे व्यक्तियों को तो लोग सही भी समझते हैं। हमारे साथ क्या दिक्कत है? हम हमारे साथ दिक्कत ये है कि हम बीमार हैं। जी। और लोग हमें बीमार नहीं समझते। हम अब मेरी कंडीशन क्या है कि मुझे जब अभी ये फ्लेयर में होता है तो मुझे 20 से 25 बार लेट्रिन जाना पड़ता है। बाथरूम जाना पड़ता है। जी और भरपूर ब्लीडिंग होती है हम जिस तरह से महावारी में महिला की होती है। जी फिर नीचे पैर से लेके कमर तक पूरी बॉडी पेन करती है। जी ब्लीडिंग से। जी। उसके बाद में आपका पेट दर्द होता है, कमर दर्द होती है। फिर आपको रात को भी एक साइड सोना पड़ता है। जी और फिर मरोड़े भी आ जाती है। रात को भी नींद में भी तीन-तीन चार-चार बार कई बार
30:22 उठ के बाथरूम जाना पड़ता है। बिल्कुल। तो हम ना फिर फंक्शन में जा पाते ना यात्रा हो पाती है। कुछ भी नहीं हो पाता। आपकी लाइफ पूरी स्पॉइल हो जाती है। और पूरा दिन जब ये चीजें दो दिन चलती है ना तो आदमी का दिमाग क्या करता है? मर जाओ। इस प्रकार से जीने से अच्छा व्यक्ति छुकता है सांस। यह फ्लेयर मेरा आठ साल रहा है। सात से आठ साल और ये कभी भी साल में दो-ती महीने तो अभी भी होता है। अच्छा फिर मैं बिल्कुल खान पीना छोड़ देता हूं। सिर्फ खिचड़ी पेन लिक्विड पे ना आ जाता हूं। हम अब हम इस कंडीशन में हैं। लेकिन समाज हमें लोग इस स्थिति में नहीं समझते। जी। किसी को लगता है कि जैसे झूठ बोल रहे होंगे।
31:08 एक आदमी ने मेरे दोस्त ने एक पोस्ट लिखी थी एक बार। मैंने पढ़ी थी। हालांकि मैं पढ़ता नहीं हूं। कई बार कोई साथी भेज देते हैं तो देख लेते हैं। उसने लिखा है कि बीमारी के नाम पे सिंपैथी बटोरी जा रही है। तो वो आपका दोस्त कहां हुआ? फिर मैं मानता था पहले लेकिन दोस्त बहुत होते हैं। फिर अपने उनमें से कौन है? ये पहचान इस तरह से हो जाती है। बिल्कुल। मैंने मन में सोचा बेटा सिंपैथी की मुझे कोई जरूरत नहीं है क्योंकि टेबलेट सी मुझे खानी है। हम बीमारी को मुझे झेलना है। बिल्कुल। और बाकी बच्चों का मुझे इतना प्रेम मिलता है कि मैं दवाओं पे नहीं दुआओं पे जी रहा हूं। जी। तो मुझे किसी की सिंपैथी की आवश्यकता नहीं है। जब तक दौड़ रहा हूं। मेरा डॉक्टर कह रहा है कि 16 साल की बीमारी के बाद ये पहला आप ऐसा पेशेंट है जो दबा के काम कर रहा है। हम मैं शारीरिक रूप से जरूर टूटा हूं। मैं
31:53 मानसिक रूप से आज भी कमजोर नहीं हूं। आज भी मैं गेम खेलता हूं। मेरे बराबर आप सामान्य व्यक्ति भी काम एक दिन करके दिखा दे। मेरी सुबह 6:00 बजे शुरू होती है दिन की और रात को 11:00 बजे खत्म होती है। बीच में 15 मिनट भी रेस्ट करता नहीं हूं कभी-कभी तो। मुझे कहीं से पता चला कि आप स्टेट लेवल पे जो है गेम्स में गए हैं। ये सब बिल्कुल गेम्स में गया हूं। मैं नेशनल खेला हूं। बहुत फिट बॉडी थी। आज भी फिटनेस है। यह जब फ्लेयर होता है तब यह स्थितियां आती हैं। अगर थोड़ा बहुत महीने में साल में एक दो महीने ऐसा रहता है। लेकिन उसको मैंने एक्सेप्ट कर लिया है। जी तो हमारे साथ में ये होता है कि जब ये चीजें सुनते हैं कई बार तो थोड़ा अंदर फील होता है कि भगवान आपको कभी ऐसी किसी को
32:39 बीमारी ना दे। शत्रु को भी ना दे। जी। कम से कम कोई दिव्यांग व्यक्ति है। टांग कटी हुई है। दिखती तो है कम से कम। हम आंख नहीं है तो दिखती तो है कम से कम हाथ नहीं है तो दिखता तो है आंत नहीं है अंदर दिखती नहीं है बस तो हम चाहते हैं कि हमारे साथ में थोड़ा ठीक व्यवहार होना चाहिए जितने भी इस प्रकार के पेशेंट है बिल्कुल ये कोई सामान्य बीमारी नहीं है सर बिल्कुल बिल्कुल लोग रोते हैं इसमें मेरे पास बच्चे आते हैं खूब सारे हर चौथे पांच दिन एक अल्सर का पेशेंट मेरे पास आता है कि सर ये सिम्टम्स आ रहे हैं क्या करें हम मन में सोचता हूं बेटा दुखी मैं भी बहुत हूं। क्या कहूं तो ये चीजें हैं बट ठीक है। ये माना ये जाता है कि आप दिमाग पे बीमारी को हावी
33:26 नहीं होने दोगे तब तक आप जी लोगे। जिस दिन ये दिमाग पे हावी होगी उस दिन आप बिस्तर पे आ जाओगे। और मेरे ऊपर हावी ना हो इसलिए मैं कोचिंग संस्थानों में वगैरह में दौड़ता रहता हूं। बस इसी कारण दौड़ता हूं। और जब मुझे कोई यह कहता है ना कि खूब कमा लिया है अब रेस्ट करो मेरा माथा खराब हो जाता है। बिल्कुल मन में सोचता हूं बेटा तुझे पता ही नहीं कुछ हम कमाने की चाह मुझे कभी नहीं रही। हम मैंने आज दिन तक ये कपड़े वगैरह ये बच्चे लाते हैं गिफ्ट में। हम यह घड़ी तक गिफ्ट में आई हुई है। ऐसा शरीर के ऊपर कोई ऐसी यह पेन है ना यह भी गिफ्ट में आई हुई है। यह मोबाइल भी गिफ्ट में आया हुआ है। हम ये शर्ट भी गिफ्ट का है ये पट भी गिफ्ट की है। ये बेल्ट भी मैंने आज दिन तक कभी कुछ
34:12 जाके शॉपिंग नहीं करी होगी। शौक ही नहीं है मुझे। मुझे कोई शौक नहीं है। लेकिन जब भी कोई यह कहता है ना खूब कमा लिए तब एक तो इस समय दुख होता है। बीमार व्यक्ति को बार-बार पूछने से भी दुख होता है। कब मुझे कोई कहता है ना कि बाहर अब कुछ खा पी लो। मेरे अंदर से ना मैं हर्ट हो जाता हूं। ऐसे लगता है दुख थी नब्ज़ पे कोई हाथ रख रहा है बार-बार। खा पी लो का क्या मतलब? हम क्या मैं इतना कंजूस हूं मैं खाता नहीं हूं। बिल्कुल। भगवान आपको ऐसे एहसास नहीं करवाए। तो मैं सभी साथियों से कहना चाहता हूं। सभी स्टूडेंट से कहना चाहता हूं कोई बीमार है तो उसके लिए अपनी थोड़ी सी माइंडसेट चेंज करो। उसको मत पूछो बार-बार या मत कहो कि आप थके हुए क्यों हो? मेरे को कोई थका हुआ कहता है मेरा माथा खराब हो जाता है। मैं कोई जानबूझ के थोड़ी हूं। अगर आपको
34:59 अपनी स्टेमिना पे गर्व है तो मेरे साथ दौड़ लो एक बार दो घंटे। बिल्कुल। बट फील होता है। हम अब ये बात कोई जानना ही नहीं चाहता। चलो आज मैंने आपको यह बात मैंने पहली बार किसी पडकास्ट में बोली है कि एक बीमार व्यक्ति के साथ एक अच्छा व्यवहार होना चाहिए। कुछ भी लिखने से पहले बोलने से पहले कई कुछ कई बार सोच के बोलिए कि सामने ऊपर क्या गुजरती है। तो ये चीजें हैं। परंतु जिस हिसाब से आप अपनी पर्सनल लाइफ और प्रोफेशनल लाइफ मैनेज कर रहे हैं वो वाकई में काबिले तारीफ है। सर मेरे मन में एक सवाल आ रहा है। क्या कभी किसी कोचिंग इंस्टट्यूट ने आपको खरीदने की कोशिश नहीं की? नहीं कोविड के काल में कुछ ऑफर्स मेरे पास अच्छे ऑफर्स आए मैं यहां नाम तो किसी का
35:45 नहीं ले पाऊंगा। जी क्योंकि वो फिर प्राइवेसी भी होती है अपनी-अपनी। तो एक कोचिंग का था कि सर आपको 5 साल का डील का था करोड़ रुपए साल के उस हिसाब से। हम हम तकरीबन ₹6 करोड़ टैक्सेशन के कट कटा के इस टाइप से हम और फिर आपको डेली एक क्लास देनी है और आप कहीं और नहीं पढ़ा सकते। अच्छा। तो फिर मैंने मना कर दिया था। मैंने कहा डेली वाला मेरे से नहीं हो पाएगा। हम हम और कहीं और नहीं पढ़ा सकता ये भी नहीं हो पाएगा मेरे से। हां और एक क्लासेस ने बोला था कि ₹1 लाख सालाना के हिसाब से बोला था। वो ऑफलाइन के लिए बोला था। ठीक है। तो फिर मैंने कहा मैं बाड़मेर नहीं छोड़ सकता क्योंकि मेरे लिए ये जगह बहुत ज्यादा सही है। तो ऐसे एक दो को मना कर देते हैं
36:31 तो फिर 30 का कोई प्रयास करता भी नहीं है। मार्केट में चला जाता है कि ये व्यक्ति नहीं करेगा। अब गवर्नमेंट जॉब में था नहीं तो क्या पता कर भी लेता। उस समय मेरी आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि मैं कर भी लेता क्योंकि मेरी स्थितियां तो 2022-23 में थोड़ी ठीक हुई है। 22 तक तो मैं भुगतता ही हूं। तो मैं किसी के साथ भी डील कर लेता। नौकरी नहीं होती तो नौकरी के साथ आप डील नहीं कर सकते। शायद इस वजह से नहीं करी। बाकी ऑफर तो जब आदमी परेशानी में होता है तो ₹10 में भी काम कर लेगा। तो मैं काम करने के लिए रेडी था। बट मैं जॉब नहीं छोड़ना नहीं चाहता था। इस वजह से फिर मैंने कहा नहीं होगा। सॉरी। सर आप जहां पर अपनी सेवाएं देते हैं मान लीजिए वहां पर अगर कोई लड़की है या फिर महिला है अगर कोई विधवा हो तलाकशुदा हो या फिर कोई
37:18 स्टूडेंट हो जो स्पोर्ट्स में बहुत अच्छा हो लेकिन फाइनेंशियली उनका बैकग्राउंड इतना साउंड ना हो तो क्या आप उनकी हेल्प करते हैं फीस जो है उसका कंसेशन देते हैं बिल्कुल देखो मैं बताऊं यहां पे कि जैसे कोचिंग सेंटर है जनरली यहां पे ही बच्चे आते हैं तो आपने जो कैटेगरी बताई ना इनको तो हम ऑन रिकॉर्ड छोड़ देते हैं। अच्छा हां जैसे विधवा वगैरह है या फिर कोई अनाथ बच्चा है उनको फ्री कर देते हैं और जैसे ये जो सैनिक भूतपूर्व सैनिक है या कोई किसी ने बलिदान दिया देश के लिए उनके बच्चे उनको फ्री कर देते हैं। ठीक है? और कोई जैसे देने में सबल है तो कोई 50% ले लिया तो पता नहीं। बाकी ऑन रिकॉर्ड है
38:05 पूरा है ना? इसको तो करते ही है। इसके अलावा मैं बात करूं आपको वो तो कोचिंग सेंटर की पूरी नियमावली है। बकायदा उसको फ्री करते हैं। अच्छा हां लेकिन इसके साथ-साथ में कुछ बच्चे ऐसे हैं जो इस कैटेगरी में नहीं है लेकिन पैसे नहीं। हम हर बैच में तकरीबन तकरीबन जैसे 500 का बैच है। तो 50 से 60 बच्चे ऐसे होते हैं जिनको हम मैं मेरे लेवल पे कर लेता हूं। और कैसे पता चलता है कि यह सच बच्चा आता है तो जनरली पता चल जाता है कि बात करने से कई बार रोने लग जाता है। फेशियल एक्सप्रेशन हां और फिर फिर मैं उसको देख लेता हूं कई बार कई बार कुछ झूठ भी बोल देते हैं हम तो हर बैच में तकरीबन 10% बच्चे ऐसे होते हैं जिनसे एक रुपया भी नहीं लिया जाता और उनका सक्सेस रेशियो कितना होता है बैच
38:50 पूरा होने के बाद में ये हम पता नहीं करते क्योंकि हमने दो-ती साल पहले ही रूल्स बना लिया था कि किसी को नहीं पूछेंगे सिलेक्शन हुआ कि नहीं हुआ तो वो खुद से हम पढ़ा के छोड़ देते हां खुद से आते हैं तो हमें पता नहीं रहता कि हमने इसकी फीस कम करवाई थी। अच्छा एक चीज मैंने देखी है कि ऑलमोस्ट जितने भी इंस्टट्यूट है वो अपनी पब्लिसिटी करते हैं जितने भी हमारे फेमस न्यूज़पेपर है तो वहां पर जो है फ्रंट पेज पे उनकी जो है एडवर्टाइजमेंट आती है। सर हमने आपको कभी नहीं देखा कि आप अपने कोर्स ल्च कर रहे हैं या फिर जो आप पढ़ा रहे हैं पीछे लिखा हुआ आ रहा है कि फलाना बैच जो है वो ₹200 में वो दूसरा बैच है वो ₹300 में। ऐसा क्यों? आपको नहीं लगता कि मतलब इस तरह से आपके कोर्स बिकेंगे नहीं और आपको भी ये करना चाहिए। देखो जब आपको किसी की जरूरत होती है ना तो आप ढूंढ लेते
39:35 आपने लिया ढूंढ लिया ना मेरे को जी सूरतगढ़ से बाड़मेर आ गए जी आपको अगर जरूरत होती ना तो आप दुनिया के किसी भी कोने से वो चीज निकाल लोगे अगर आपको जरूरत नहीं है ठीक है तो मैं चिल्ला-चिल्ला के कहूंगा ना कि मेरा पडकास्ट लो पडकास्ट लो आप नहीं लोगे मेरा आप कह दोगे कि सर मेरे पास टाइम नहीं है ओके तो बच्चे को अगर जरूरत होगी तो मुझे ढूंढ लेगा हम अगर जरूरत नहीं है ना तो तो मैं डेली YouTube पे आके हर जगह कितनी भी जुगलियां कर लूंगा हम बच्चा आपको परचेस नहीं करेगा हम पहली बात तो ये और दूसरी बात मार्केटिंग नहीं करना भी बड़ी मार्केटिंग ऑलराइट ठीक है
40:21 ठीक है इंफॉर्मेशन दे दो आप हम कि भाई ये अपना बैच है हमने ले लिया है अब आपको ठीक लगता है तो जाइन कर लो मैं फोर्स नहीं करता। मैं इस स्ट्रेटजी पे विश्वास नहीं करता। तो वो बात पूरी नहीं हुई। मैंने कहा ना कि बच्चों को फ्री करता हूं। मैं इसमें एक चीज और जोड़ना चाह रहा हूं। मैं बताना नहीं चाह रहा हूं। फिर भी मैं मेरी जो सैलरी आती है उसका एक हिस्सा उन बच्चों को हर महीने देता हूं। जो बच्चे घर से अफोर्ड नहीं कर पाते। किसी की डाइट पढ़ता हूं। किसी का लाइब्रेरी का देता हूं। किसी का बुक्स का देता हूं। किसी की बीएड फीस देता हूं। किसी की कोचिंग फीस किसी दूसरे में जा रहा है तो वहां जमा करवा देता हूं। किसी की टेस्ट सीरीज़ के देता हूं। 20 से ₹25,000 मंथली।
41:08 यह पिछले लगभग पांच एक साल मुझे लगभग लगता है हो गया। वो मैं उन बच्चों की हेल्प करता हूं। मुझे नाम तक नहीं पता। बच्चों के हालांकि अब थोड़े-थोड़े नाम याद रह जाते हैं। जब फोन पे से ट्रांसफर करता हूं तो उनका नाम आ जाता है। और जो गांव के बच्चे हैं उनके तो मैं नाम भी जानता हूं। कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं जिनको मैं नहीं जानता उनका गांव कौन सा है वो कर लेता हूं। हिस्ट्री पॉइंट पे हिस्ट्री के कम से कम 80 से 90 लाख के कोर्स मैंने बच्चों को फ्री दिए हैं। अच्छा अब इसमें कई बच्चे नाराज हो सकते हैं। कई बार क्या होता है कि अब दिन में 2030 मैसेज आते हैं फ्री के। सबके अब आपको पता है कि करोगे तो कैसे मैनेज होगा। हम
41:54 अब उनमें से फिर दूसरी बार, तीसरी बार, चौथी बार किसी का मैसेज आता है तब हमें लगता है कि यार यह जरूरतमंद है। फिर उससे कुछ डॉक्यूमेंट्स मांग लेते हैं तो वो डॉक्यूमेंट्स भी भेज देता है। उसके बाद टीम उससे बात करती है। लगता है कि यह है तो हम उसको कर देते हैं। तो किसी से 50% ले लेते हैं। किसी से 30 ले लेते हैं। बहुत जरूरतमंद होते हैं। तो वो भी करते हैं। तो जितना हमारे से सामाजिक सरोकार हो पाता है। कई बार कॉलेज में बच्चों के पास में एग्जामिनेशन फीस नहीं होती है। हम दे देते हैं। आज दिन तक किसी ने हमें ना तो वापस कोई देने आया ना कभी हमने वापस मांगे किसी से। दे दिए बस नेकी कर दरिया में डाल हम इससे ज्यादा सोचता नहीं हूं। और अपने सबबल है जितना हो सकता है उतना कर
42:42 लेते हैं। और नहीं होता है उसमें अपने हाथ खड़े कर देंगे। ये बात है सर कुछ कोचिंग इंस्टट्यूट्स है वो एक एक दो लाख जो है कोर्सेज के चार्ज कर रही है ऊपर से एक नया ट्रेंड है कि फिर वो कहेंगे कि यू आर पार्ट ऑफ आवर फैमिली तो आपको नहीं लगता कि ये जो है अपनी कमर्शियल नीड्स को फुलफिल करने के लिए स्टूडेंट्स के इमोशंस के साथ में खेल रहे हैं। देखो क्या होता है कि मैं यह मानता हूं कि मार्केट दो चीजों से बना हुआ है। जिसमें एक सेलर होता है, एक बायर होता है। मतलब एक बेच खरीद बेचने वाला, एक खरीदने वाला। जी। और दोनों की नीड होती है। ठीक है? अब जैसे स्टूडेंट है तो स्टूडेंट को
43:30 टीचर्स की नीड है और टीचर्स को स्टूडेंट की नीड है। टीचर्स मतलब कोचिंग सेंटर। अब क्या होता है कि अगर कोचिंग वाला एक अच्छी फैकल्टी रखेगा, अच्छा पढ़ाएगा तो उसकी फीस भी उसको ठीक करनी पड़ेगी क्योंकि देखो बिना बेनिफिट्स तो कोई काम करेगा नहीं। बिल्कुल। हां ये जरूर है कि थोड़ी फीस थोड़ी सी लिमिट होनी चाहिए और थोड़ा बहुत एक मानवता भी होनी चाहिए। ह्यूमिनिटी होनी चाहिए कि कोई अफोर्ड नहीं कर पाता तो थोड़ी हेल्प कर ली जाए। तो जितनी बढ़िया क्वालिटी देंगे, जितने अच्छे शिक्षक रखेंगे तो फीस तो उनकी मजबूरी होती है। पहली बात और बच्चे की भी मजबूरी होती है पढ़ने के लिए। तो अब बात उसकी आती है इमोशनल अटैचमेंट। एक बच्चा
44:17 अगर 1500 घंटे हजार घंटे किसी शिक्षक को सुनता है। आपको पता है शिक्षक यहां से होके यहां प्रवेश करता है। शिक्षक बच्चे के अंदर दिमाग से दिल में प्रवेश करता है। टीचर बच्चे के हृदय में बसता है। आप हजार घंटे किसी को सुनोगे ना वो आपके यहां बसता है। और उस स्टूडेंट के खिलाफ आप उस टीचर को टीचर के बारे में कुछ कहोगे ना तो स्टूडेंट की नजर में टीचर खलनायक नहीं बनेगा। आप ही बनोगे। मेरे बारे में कोई विरोध करेगा मान लो मेरे किसी बच्चे के सामने वो बच्चा एक्सेप्ट नहीं करेगा। नहीं करेंगे। वो बच्चा भले मत बोले कुछ लेकिन मन में ये सोचा कि आप लोगों की ईर्ष्या है इसलिए आप
45:02 सर के बारे में बोल रहे हो। सर ऐसे व्यक्ति नहीं है। जी। तो उन हजार घंटों में वह टीचर बच्चे के दिल में उतर जाता है। दिल में प्रवेश कर जाता है। हम और फिर स्थिति ये बनती है कि उनके इमोशनल बॉन्ड बन जाता है। ये ये कृत्रिम बॉन्ड नहीं है। ये बहुत सच में बॉन्ड है। मैं बताऊं हम हालांकि ₹1.5 लाख की फीस नहीं लेते। हमारा तो पेइंग कैपेसिटी बाड़मेर के लोगों की कम है। हम तो यहां फीसेस 12-15 से ज्यादा नहीं होती। साल भर पढ़ाते हैं। तो बच्चों को देने में ज्यादा दिक्कत भी नहीं होती। महीने के ₹1000 के हिसाब से फीस आती है। 1000100 मैक्सिमम बता रहा हूं। अब यह बच्चे मेरे से इतने जुड़े हुए हैं कि आज कोई प्रोग्राम होगा ना सक्सेस पॉइंट में बच्चे यहां पे पानी पिला रहे होंगे। बच्चे सफाई कर रहे होंगे। मेरे खेत का काम करने के बच्चे चलते हैं।
45:48 श्रमदान और कहते हैं सर हम आपके खेत चलेंगे। आज इस बार हम इस बैच को लेके गए थे। अगली बार हमें ले जाओ। वाओ। ये बॉन्ड बनाए हुए नहीं बनता। है अपने आप बनता है। तो जो वो डेढ़ लाख की जो आप फीस की बात कर रहे थे वो कोचिंग की मजबूरी है। और इमोशनल बॉन्ड जो बनता है ना वो एक्चुअली क्या है कि वो शिक्षकों की उपलब्धि है कि वो बच्चों में प्रवेश कर गए। मैं बताऊं बच्चों का कोचिंग के प्रति प्रेम नहीं है। हम बच्चों का टीचर के प्रति टीचर्स के प्रति बच्चा उस कोचिंग को गलियां निकाल देगा। लेकिन सर से याद हां बिल्कुल। तो जो आप जिस बात लाखों फीस की बात कर रहे हो उसमें भी बच्चा बाहर निकलने के बाद शिक्षक से इमोशनल बॉन्ड है। कोचिंग का झाड़ू नहीं निकालेगा वो हम ये चीज
46:34 बिल्कुल सर एक जो है अभी पेपर लीक वाला जो है एक अलग ही ट्रेंड सा चल पड़ा है। एक तरफ तो जितने भी एग्जाम्स है वो इतने उनका लेवल बहुत हाई होता जा रहा है। टफ होता जा रहा है। सर कुछ केसेस में ऐसे भी देखने को मिला कि खुद एक शिक्षक जो है वह ऐसी गतिविधियों में संलिप्त पाए गए हैं। तो आपको ये कितना मतलब अनएथिकल नहीं लगता आपको कि आप क्या दूसरों को सिखा रहे हैं? बिल्कुल जेन्युइन बात है। मैं बताऊं कि पेपर आउट करवाना करना यह काम चलो गैंगस्टर लोग भी कर लेते हैं। ड्रगिस्ट भी कर लेते हैं। जिनका पढ़ाई से कोई मतलब ही नहीं है। वो अधिकारियों को पैसेवैसे देके बिक खरीद के और कर लेंगे। लेकिन बुरा तब लगता है जब
47:19 उसको सॉल्यूशन करवाने के लिए टीचर आगे आते हैं। चंद प्यासों के लिए हम तो असली दोषी जो है ना जितने वो दोषी उससे अधिक दोषी वो शिक्षक हैं। जी आपको मैं बताऊं यूरोपियन कंट्री के अंदर कुछ देश ऐसे हैं यूरोप यूरोपियन कॉन्टिनेंट में जहां पे जो सजा दी जाती है उसमें टीचर के लिए पनिशमेंट अलग है और वह अधिक दिया जाता है। एक ही अपराध के लिए एक सामान्य नागरिक ने अपराध किया है तो उसकी पनिशमेंट अलग है। अगर टीचर ने अपराध किया तो उसकी पनिशमेंट कई गुना ज्यादा है कि जब आप लोग समाज को दिशा देने वाले लोग अगर गलत करोगे रोल मॉडल होते हैं। हां तो दूसरों से हम क्या एक्सपेक्टेशन
48:05 रखें? बिल्कुल। तो शिक्षकों का यहां इसमें शामिल होना कहीं ना कहीं हमारी यूं कहिए कि असफलता है। इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है? मुझे लगता है वे शिक्षक खुद पहले इसी सिस्टम से आए हुए हैं। हम और अब बड़े लंबे चौड़े पैसे देके आए हैं। तो ये करके वो अपना पैसे का कोटा पूरा कर रहे हैं। जी। तो गवर्नमेंट को ऐसे सिक्स को ना लिस्ट बनाने और इनको तो सच में ना बहुत कम टाइम में इनको टर्मिनेटेड करके और पूरी लिस्ट के साथ में इनको चिपका देना चाहिए कि ये ये लोग हैं जो ये काम करते हैं क्योंकि ऐसे के चक्कर में कई अच्छे शिक्षक भी साथ में बदनाम होते हैं। भरोसा भी उठ जाता है। सिस्टम उठ जाता है। सिस्टम से भरोसा
48:51 सिस्टम से भरोसा उठेगा। जी बिल्कुल सर क्या कभी ऐसा हुआ कि लोगों ने आलोचनाओं के द्वारा आपको भटकाने की कोशिश की है और सराहनाओं के द्वारा आपको बहलाने फुसलाने की कोशिश की है? अं आलोचना देखो आप अगर जीवन में आगे बढ़ोगे तो होगी तो स्वाभाविक है। आप सबको कभी भी खुश नहीं रख सकते। हम और आजकल हर व्यक्ति वही सुनना चाहता है जो वह सोच रहा है जैसी उसकी आईडियोलॉजी है और वही देखना चाहता है जैसी उसकी समझ है। अब आप अगर हर व्यक्ति के अनुसार बोलोगे तो यह पॉसिबल नहीं है क्योंकि आप जो बोलोगे वो कईयों को पसंद होगा। कईयों को नहीं होगा। ऐसे भी लोग खिलाफ हो जाएंगे। अच्छा आप अगर
49:36 कमर्शियल एक्टिविटीज करोगे जैसे मैंने कोर्स पढ़ाना शुरू कर दिया या नोट्स देने शुरू कर दिए तो इससे कईयों के हित मारे जाएंगे वो वर्ग आपके खिलाफ हो जाएगा तीसरा आपके साथ जो लोग थे हो सकता है वो आपसे ज्यादा योग्य हो लेकिन आपने ज्यादा कंसिस्टेंसी के साथ मेहनत कर ली हम तो आप आगे बढ़ गए वे लोग भी धीरे-धीरे धीरे-धीरे आपके खिलाफ हो जाते हैं। कुछ आपके कॉम्पिटिट आपके खिलाफ हो जाते हैं। हालांकि कॉम्पिटिट होते ही नहीं है। हम तो मानते ही नहीं उनको। फिर भी उनके मस्तिष्क में ही रहता है। तो ये आलोचनाएं होना एक स्वाभाविक सी बात है और हम इसको एक्सेप्ट करते हैं और इसका जवाब हमारे पास रहता है। इसका जवाब सिर्फ ये रहता है कि हम लोग हैं वो ध्यान ही नहीं देते। सिर्फ अपने काम पे
50:22 ध्यान देते हैं। आप क्या बोल रहे हो? कि आपका माइंडसेट है, आपकी सोच है। वो मेरी नहीं है। अगर आप मेरी बाहर जाके कहीं बुराई करते हो तो मैं इतना जरूर नोटिस करता हूं कि जो बुराई की है ये किस मैटर की है तब लगता है कि हां इस मैटर के मरने दो। क्यों? क्योंकि मैं गलत नहीं हूं। अब आप क्या बोल रहे हो? ये आपका माइंडसेट है। ये आपकी सोच है। मेरे को फर्क नहीं पड़ना चाहिए। अगर मेरे को फर्क पड़ रहा है तो ये आपकी सफलता है। बिल्कुल। अच्छा आप ज्यादा परेशान है ये करके। क्यों? आपके इस प्रकार की प्रतिक्रियाओं से मेरे फर्क नहीं पड़ रहा है। तो आप और दुखी हो कि यार इस फर्क क्यों नहीं पड़ रहा है? हम आप और ज्यादा हरकतें करोगे। मैं बिल्कुल और प्रतिक्रिया नहीं दूंगा। आप और परेशान होंगे यार मैं इतना कुछ कर रही हूं और इसको फर्क ही नहीं पड़ रहा।
51:08 आपके आप बहुत नेगेटिव हो जाओगे। आप इतने नेगेटिव होंगे कि आपके चेहरे पे दिखने लग जाएगा। आप फ्रस्टेट हो जाओगे एकदम से और कुंठा में कुछ भी लिखना पढ़ना बोलना शुरू कर दोगे। पढ़ना तो सॉरी होता ही नहीं है। हम तो इससे क्या होता है कि धीरे धीरे धीरे धीरे आपका स्वयं का पतन होता जाता है और हम हमारा काम करते हैं। तो आलोचनाएं होती रहती है। अब बात आती है प्रशंसा की। अब प्रशंसाएं उस व्यक्ति को गिराती है जो व्यक्ति अचानक उड़ता है। राइट? मेरे जैसा व्यक्ति जो पिछले 15 साल से है ना? मेरे में भी था। अहम के भाव मेरे में भी हम कि पहले अटेम्प्ट मेंस लिखा आईएस का आरएस का लिखा सीडीएस एसएसबी देके आया असिस्टेंट
51:53 कमांडेंट का फिजिकल दे के आया यूपीएससी पास करी हम मेरे में भी अहम भाव था थोड़ा बहुत हम लेकिन फिर बीमार हुआ और बीमार होने के बाद में फिर धीरे-धीरे चीजें ऐसी चली कि अंदर से ना आदमी धीरे-धीरे धीरे-धीरे स्थिर होता गया। ठहराव आ गया। हां। धीरे-धीरे स्थिर होता गया। और फिर इकोनॉमिकली क्राइसिस आ गए। हम फिर फिर पुलिस कोर्ट वगैरह यह सब चक्कर शुरू हो गए। यह देखतेदेखते मैं इतना धीरे-धीरे धीरे-धीरे ऊपर उठा हूं ना हम कि प्रशंसाओं का मेरे ऊपर असर ही नहीं होता। प्रशंसा जब सुनता हूं तो ये लगता है कि सही रहा चल रहा हूं। ठीक है। चलता रहूं और बढ़िया काम करूं। हम और दिक्कत तब होती है ना मेरे को दिक्कत हालांकि नहीं होती लेकिन कई बार अपने लोग
52:39 होते हैं ना उनकी बातें एक बार के लिए आहत जरूर करती है हम एक बार के लिए तब कई बार मैं ऐसे मुझे वो चार लाइनें याद आती है जी ना जाने किसकी है मुझे याद नहीं है हम ना मैं गिरा ना मेरी उम्मीदों की मैं रेगिरी मेरे को गिराने के लिए कई कई लोग कई बार गिरे। बात जहर की नहीं थी। वो तो मैं पी गया। तकलीफ तो तब हुई फिर भी मैं जी गया। बहुत खूब। ये उन सबके लिए जिनको मेरे से परवर परेशानी होती है। और जिनको जो मेरी इन
53:24 सारी चीजों को सह नहीं पाते। जी ये उनके लिए है और ये लोग मुझे अच्छे लगते हैं। जी जी ये लोग अच्छे लगते हैं। जब भी मैं ऐसे शांत हो जाता हूं ना तब मेरे को वापस पुश करने का काम यही लोग करते थे। बाकी मैं एक दिन एक स्वभाव ऐसा था मैं आलसी हुआ करता था। हम भगवान की कृष्ण बहुत आलसी था। अच्छा और बहुत संतुष्ट व्यक्ति था जिसको ज्यादा कुछ काम करने का कोई मन नहीं होता था। लेकिन फिर कोई कुछ बोल देता फिर सोता और काम करेंगे। जवाब हमेशा से मैंने काम करके दिया है। हर बार दिया है। सर अच्छा बोल रहे हैं आप। अगर कोई और भी अगर आपको लाइनें याद आ रही है तो जावेद अख्तर की कुछ पंक्तियां हैं जो शायद एग्जजेक्टली नहीं पता फिर भी मैं बोल रहा
54:11 हूं कि जिन रास्तों से जिस ओर सब चलते हैं उस ओर चलना अच्छा नहीं लगता। पामाल रास्तों का सफर मुझे अच्छा नहीं लगता। गलत बात को खामोशी से सुनना और हां हां बोलने के फायदे बहुत है। परंतु मुझे अच्छा नहीं लगता। और दुश्मन से भी खुददारी की उम्मीद रखता हूं। सिर चाहे दुश्मन का भी हो परंतु कदमों में अच्छा नहीं लगता। वाओ इट्स ग्रेट। आई मीन इट्स सुपर कैलोफजलिस्टिक एक्सपोशियस। ये क्या था? सर ये वाला बहुत शानदार बहुत बहुत शानदार
54:57 सर आपने एक सेमिनार में कहा था कि बेवक़ बेवजह बेशुमार मुस्कुरा देता हूं आधे दुश्मनों को तो यूं ही हरा देता हूं आपके भी दुश्मन है एक आधे दुश्मन का अगर आप नाम बताना चाहे तो देखो मेरे दुश्मन तो मेरे हालात ही रहे हैं मोस्टली तो जी और अच्छे दुश्मन है ये और दूसरा ऐसे मैं किसी को शत्रु नहीं मानता हां प्रतिस्पर्धी जरूर है मार्केट में हम और मेरे में यह अहम भाव आप कह सकते हो कि मैं उनको प्रतिस्पर्धा में नहीं मानता क्योंकि मेरा फील्ड अलग है। मैं मेरा काम कर रहा हूं। और वो सब अपना काम कर रहे हैं। ठीक है? खूब आलोचनाएं करते रहते हैं। मुझे फर्क पड़ता नहीं। बच्चे जवाब दे देते हैं। मैं
55:44 जवाब देता नहीं हूं। हम मेरी आदत सिर्फ इतनी है कि मैं जिन बिंदुओं पर प्रश्न खड़े किए जाते हैं मैं वो करके उसको काउंटर करके और रिस्पांस करता हूं। साल लगते हैं मुझे एक साल दो साल बड़े जबरदस्त करता हूं। जी आप इसको अहम भाव कह रहे हैं बट मेरी नजर में आई थिंक यू जस्ट माइंड योर ओन बिजनेस और आई थिंक वो बहुत अच्छी बात है। सर एक सवाल काफी स्टूडेंट्स के मन में है कि हम 21 से 22 साल की उम्र में तैयारी करते हैं। 30 से 35 साल की उम्र हो जाती है। आज भी बेरोजगार हैं। कुछ स्टूडेंट्स ऐसे भी हैं जिनका फोर्थ ग्रेड के अंदर भी सिलेक्शन नहीं हो रहा है। आपकी नजर के अंदर वो कौन सी ऐज है जहां पर गवर्नमेंट जॉब की तैयारी छोड़ देना एक हेल्दी ऑप्शन
56:31 रहेगा। देखो एज का तो यूं है कि मुझे लगता है कि पढ़ने का जो मन होता है, पढ़ने का जो उत्साह होता है, पढ़ने के लिए जो जज्बा होता है, एक एंथूसियाज्म जिसे आप कहते हो वो 5 साल ही होता है। इससे ज्यादा नहीं होता। मतलब फिर उसके बाद ना मन होता नहीं। फिर किताबें लेके बाली अपन बैठ गए। फिर ठीक है। पढ़ रहे हैं लेकिन उस गति में नहीं। उस उत्साह में नहीं। एक काम होता है ना आप दो तरीके से। या तो आप उत्साह से करो। बिल्कुल या मजबूरी से करो। राइट? उत्साह से पढ़ाई पांच साल ही होती है। हम उसके बाद तो मजबूरियां हैं। पांच का आप छह कर लो। इससे ज्यादा जोर नहीं है। राइट? अब मैं ये मानता हूं कि आप जिस दिन तैयारी
57:18 एग्जामिनेशन की शुरू करते हो। कोई बच्चे लेट जागृत होते हैं। वहां से छ साल भर लो आप बस ठीक है छ साल में आपको लग रहा है कि बहुत बाउंड्रीज पर आकर रह गए हैं तो एक आधा अटेमप्ट और ले लो अब आप 20 के लगे हो तो 26 27 पे छोड़ दो आपको 25 में समझ में आया कि नहीं मुझे पढ़ना है तो 25 से 31 तक ले लो इससे ज्यादा फिर समय को लेना मुझे लगता है क्योंकि देखो छ साल में आदमी तीन अटेम्प्ट तो ले ही लेता है किसी एग्जामिनेशन के तीन में नहीं हो रहा है इसका मतलब साफ है कि हमें कोई दूसरी चीजें देखनी चाहिए क्योंकि नौकरी के लिए केवल पागल नौकरी के लिए होना यह कोई तर्कसंगत बात तो नहीं है। इतनी अच्छी उम्र है। आप इसको कहीं और भी डाल सकते हो। मैंने
58:05 2017-1 में परीक्षा देनी छोड़ दी थी। मेरी उम्र उस समय 29 वर्ष थी। मुझे लग गया था कि अब मैं कंपटीशन की पढ़ाई नहीं कर पाऊंगा। छोड़ दिया सारा। तो मुझे लगता और मैंने पढ़ाई भी 20 साल 19 में तो मैं नौकरी लग गया था। हम तो 15 से 25 10 12 साल मैं पढ़ लिया तो पहले कॉलेज के टाइम पढ़ा इस तरह से तो मुझे लगता है छ सात साल ही उम्र होती पढ़ने की उसके बाद तो मैंने बताया मजबूरियां हैं। बिल्कुल सर आप बहुत सारे सेमिनार्स अटेंड करते हैं। बहुत सारे कोचिंग्स के उद्घाटन में भी आपको बुलाते हैं। जिस हिसाब से आपकी मार्केट के अंदर अभी जो साख है आप मुझे लगता है कि जितना चार्ज करें वो देने को एग्री हो जाएंगे। क्या आप
58:52 कुछ चार्ज करते हैं? नहीं अभी तक की मैं बात बताऊं मैंने कोई 50 से लगभग सेमिनार कर लिए होंगे। ज्यादा ही किए होंगे। मुझे एग्जैक्ट याद नहीं है। मैं 2015-16 से ही कर रहा हूं। अच्छा। हां। मैंने आज दिन तक किसी भी आयोजक से ₹1 भी नहीं लिया। ठीक है। और हालांकि पूछा होगा उन्होंने अपनी मजबूरी से हम लेकिन मैंने कभी रुपया नहीं लिया। ठीक है। इवन मेरा आने जाने का मेरा गाड़ी का पेट्रोल किराया वो भी मैं खुद बियर करता हूं। वो तो उन्हें देना ही चाहिए। हां मैं वो भी नहीं लेता क्योंकि मैं किसी का एहसान नहीं चाहता। हम इकोनॉमिक्स में एक सिंपल सा वर्ड आता है। कि जिस दिन व्यक्ति की कीमत लगती है उस दिन उसकी वैल्यू खत्म हो जाती है। ठीक है?
59:38 आपकी कीमत लग गई उसके बाद आपकी कोई वैल्यू नहीं है कि इस आदमी को 500 से बुला सकता है। जब तक आपकी कीमत नहीं लगती तब तक आपकी वैल्यू बनी रहती है। जब तक समर्थ हैं खुद देख के जाएंगे। असमर्थ नहीं होंगे तब जाएंगे नहीं। हां ये जरूर है कि जैसे कोई अब बीच में चेन्नई गया था या आगे पटना प्रोग्राम है। तो ऐसे हवाई यात्राएं वगैरह होती है। कोई बड़ा आयोजक होते हैं। तब वो लोग कई बार ऐसे एयर फेयर वगैरह जो है वह हैंडल कर लेते हैं। बाकी छोटे-मोटे जैसे राजस्थान के अंदर कहीं पर भी जाते हैं तब तो मैं एक भी नहीं लेता। पर सर अभी जैसे बाड़मेर से सूरतगढ़ भी बहुत दूर है। आप खुद की गाड़ी भी लेकर जाते हैं। ड्राइवर भी होता है। उसका भी काफी खर्चा रहता है।
1:00:23 खर्चा आ जाता है। ये कार्यक्रम ठीक-ठाक खर्चा करवा लेता। हां। तो वो तो बेयर मिनिमम है। वो तो उनको खुद से करना चाहिए। ये तो कोई करना चाहिए। मुझे यू लगता है कि देखो हम किस उद्देश्य के साथ जा रहे हैं। हम बच्चों से मिलने जा रहे हैं। जी। अब हम अगर उनसे चार्ज करेंगे वह बच्चों से लेंगे। ओके? वापस वही बात है कि बेचारा बच्चा ₹200 देकर मुझे सुनने आ रहा है। ये मुझे क्यों ठीक लगेगा आपके? मैं क्यों ₹200 लूं? मेरी बात सुना। अपने पास अनुभव है। हालातों से गुजरे हुए अनुभव है। तो मैं आपको अगर सही वैसे निस्वार्थ रूप से दूंगा तो मुझे लगेगा वो ज्यादा प्रभावी है। पता नहीं ऐसी सोच है मेरी। हालांकि लोग ये कहते हैं मुझे कि आप पैसे लिए करो लेके वो संस्थान में दान दे दिया करो। हम मुझे भी सही लगता है कि जैसे किसी संस्था में गए वहां जैसे
1:01:10 ₹2,000 ले लिए आपने 2000 अपने मिला लो और ₹3,000 उसको डोनेट कर दो। हम वो संस्था में किसी जरूरतमंद के काम आ जाएंगे। लेकिन ऐसी संस्था वाले कम होते हैं ना क्योंकि जैसे प्राइवेट कॉलेज ने बुला लिया वो फिर वो पैसे तो कौन नहीं यूज़ करेगा? आजकल तो बड़ी ममारी चल रखी है बीएड कॉलेजों में वगैरह में ना आप जाओ ना डोनेशन के नाम पे बच्चों को लूट मचा रखी है वो लोग क्या ₹00 लोगों की हेल्प करेंगे सर और भी बहुत सारे मतलब हां कुछ ऐसा स्कोप बन रहा है मैं आगे सोचूंगा ऐसा कुछ हुआ तो वहां पैसे लेके उसी जगह पे अपन सर आप गरीब लड़कियों की जो सामूहिक विवाह है उसके अंदर कंट्रीब्यूट कर सकते हैं क्योंकि एक समाज के अंदर अलग करना चाहिए मैं ऐसे इस पे सोचूंगा आगे काफी क्योंकि मेरे एक डॉक्टर मित्र हैं उन्होंने मुझे सुझाव दिया था हम कि हर जगह जाते हो तो एटलीस्ट कुछ लिया
1:01:57 करो। उस पैसे को आप अपनी तरफ से कुछ मिला के कोई सामाजिक कार्य में डोनेट कर देना चाहिए। तो अभी तक तो नहीं लिए हैं और आगे इन लूंगा तो भी इस कार्य के लिए लूंगा। मैं मेरे पर्सनल खर्चे के लिए रुपया एक बार हमें लिफाफा जरूर दिया था। हम हां दिया था मुझे याद नहीं। मेरे ड्राइवर ने ले लिया। मुझे पता ही नहीं था। अच्छा 20-40 कि.मी. जाने के बाद मैंने कहा साहब ये लिफाफा दिया रे। मैंने कहा तूने लिया? तो सर दो लिफाफे दे दिए तो थे। फिर मैंने ले लिए एक उसके लिए था। अरे वाह। नहीं ये अच्छा है। मैंने कहा नहीं लेना था। उन्होंने कहा सर हम जबरदस्ती दे दिया बाकी नहीं लेते। एक पता नहीं कौन सी जगह थी वो। मुझे याद ही नहीं आ रहा ऐसे। ठीक है। सर एक पढ़ाई और प्रेम की जो है सेम ही उम्र रहती है। तो आपकी प्रिपरेशन
1:02:43 के दौरान क्या आपका जो है कोई डिस्ट्रैक्शन रहा या कोई क्रश रही? सर मैं नहीं पूछ रही हूं। आपके स्टूडेंट्स ने पूछा है। मैंने नहीं पूछा। अरे नहीं ऐसा नहीं है। देखो मैं बताऊं तो हम 12वीं तक पढ़ते थे तो उस समय लड़के ही थे क्लासेस में। लड़कियां एक दो आती थी तो भी उस समय ना कुछ था नहीं। कॉलेज में आए तो भी यहां पे हमने लड़कियां देखी भी नहीं। फिर हॉस्टल दूर था तो फिर दिल्ली चले गए और उसके बाद में फिर अच्छे लोग साथ में आ गए। उन्होंने कहा कि इन चीजों से बचो बचो बचो। हम तो फिर बचते रहे और बचे हैं तो भी किससे बचें? वैसे ऐसा कोई अवसर भी नहीं था कि कहां जाके भिड़ जाए। ऐसा कोई अवसर भी नहीं था। बचना ही एकमात्र ऑप्शन था। तो ऐसा कुछ हुआ
1:03:29 नहीं। उससे पहले नौकरी लग गई। पहली चीज तो ये और दूसरा ये उम्र है। इस समय बैलेंस करके चलना पड़ता है। एक वो शेर है ना एक मुझे याद आता है कि हर उम्र के शौक जुदाज। कभी खिलौने, कभी मांसूखा, कभी रुतबा और कभी खुदा-खदा। तो पहली उम्र होती है उसमें खिलौने चाहिए। उसके बाद में मासूका मतलब वापस वही प्रेम वाली बात आ जाती है। फिर रुतबा चाहिए व्यक्ति को। वो लास्ट में खुदा को याद करता है। तो ये मासूका की उम्र और पढ़ाई की उम्र साथ में रहती है। मैं तो बच्चों को यही कहता हूं कि एक बार स्टैंड हो जाओ
1:04:15 कहीं पे। उसके बाद में भी आप ये चीजें तो बाद में भी की जा सकती है। और मुझे लगता है कि व्यक्ति को खुद से ही सब चीजें प्रेम करना चाहिए। बाद में तो ये सब चीजें वैसे होनी है। नहीं तो क्या डिस्ट्रिक्ट हो गया, बर्बाद हो गया ना तो लोग यूज़ लेके छोड़ देंगे। हम लोग बर्बाद कर देंगे आपको। आप किसी जैसे किसी लड़की के साथ प्रेम में हैं या कोई लड़की लड़के के साथ प्रेम में दोनों में से जो भी पहले सक्सेस होगा ना वह उसको छोड़ देगा। यह तय बात है। ठीक है? और कोई हो सकता है 1% कोई एक्सेप्शनल आप देयर हर जगह होते हैं। फिर वो सेलेक्ट हो के अपना काम करेगी या करेगा। आप फिर वही इससे अच्छा है कि आप पहले स्टैंड हो जाओ। आपका आपके कम से कम घर से जो पैसे आते हैं ना जिस मकसद से आते हैं उसी से यूज़ होने चाहिए। बिल्कुल। बाकी आप अपने शौक पूरे करते हो
1:05:01 तो उसके लिए पैसे खुद कमाने चाहिए। मैं तो यह मानता हूं। बिल्कुल सर हमने जो है Instagram के जरिए और इवन WhatsApp स्टेटस ईमेल के जरिए स्टूडेंट से कहा था कि हम गणपत सिंह राजपुरोहित सर के साथ में पॉडकास्ट करने जा रहे हैं। तो अगर आपकी रियल लाइफ सिचुएशन से रिलेटेड कोई भी क्वेश्चन है तो आपकी नाम और आपका जो पूरी पहचान है बहुत प्रश्न आए होंगे। बहुत सर 60 से 70 आए थे। पर उसमें से 40 के आसपास में क्वेश्चन जो है वो रिलेशनशिप से रिलेटेड थे। तो उसमें से जो एक क्वेश्चन मैंने लिया मुझे लगा कि वो लड़की काफी परेशान थी। वो बहुत लंबा चौड़ा मैसेज था। पर उतना तो मैं नहीं बता पाऊंगी बट ब्रीफ के अंदर मैं उसे बताना चाहूंगी कि ये लड़की का कहना छात्रा का कहना है कि 2 साल पहले उसे किसी लड़के
1:05:49 ने शादी के लिए प्रपोज किया था। अभी पीछे पटवारी का रिजल्ट आया और वो लड़का पटवारी बन चुका है। अब वो शादी से मना कर रहा है। सांकेतिक नौकरी है या सच वाली है? अ सांकेतिक सच है। नहीं सच है। पटवारी सांकेतिक है या सच है? सच है। हां। अभी लड़की डिप्रेशन है। लड़का कह रहा है कि अब मेरे पास में गवर्नमेंट जॉब है तो मैं गवर्नमेंट जॉब वाली लड़की से ही शादी करूंगा और वो भी खुद की कास्ट से। हम आप उसे क्या सलाह देंगे? देखो मैं लड़कियों को, लड़कों को सभी को यही कहूंगा कि इस समय कोई किसी का नहीं है। आपसे अगर कोई आप जैसे आप लड़की हो और कोई लड़का है आपके साथ में लड़का मीठी बातें कर रहा है,
1:06:34 अच्छे सपने दिखा रहा है या कोई अच्छे आपको बढ़िया-बढ़ कल्पनाएं कर रहा है। इमेजिनेशंस भाई 1% की मैं बात नहीं करूंगा। 99% वो आपको यूज़ लेने के प्रयास में है। उसको साथ चाहिए। महानगरों में बैठे हैं और इस वजह से वो ऐसे प्रयास कर रहा है। तो आप समझदार बनिए नहीं तो आपका यूज़ ले लिया जाएगा। क्लियर बात तो ये है। तो मैंने जैसा आपको पहले भी कहा कि सफल होने के बाद में वही लड़का क्योंकि मन भर जाता है व्यक्ति का। हम कुछ टाइम बाद में यह स्थिति आती है कि देखो पहले जब प्रेम होता है या साथ होते हैं शुरुआत में तो एक दूसरे के बारे में बहुत अधिक जान नहीं पाते हैं। तब तक तो चीजें ठीक चलती है। जितने जैसे-जैसे समय बढ़ता है रिलेशनशिप
1:07:21 में वैसे-वैसे क्लोज आते जाते हैं। सहज होते जाते हैं। जैसे-जैसे सहज होते हैं, हम अपने आप को अभिव्यक्त करते हैं। जैसे-जैसे अभिव्यक्त करते हैं, हमारे बारे में दोनों को एक दूसरे के बारे में बहुत कुछ पता चलने लगता है। कुछ आदतों के बारे में, कुछ स्वभाव के बारे में, कुछ पास्ट के बारे में, कुछ फ्यूचर के बारे में पता चलने के बाद धीरे-धीरे चीजें टकराना शुरू होती है। विचारधाराएं खुल के बाहर आती है। शुरुआत में तो क्या होता है कि एक व्यक्ति कॉम्प्रोमाइज कर लेता है। लेकिन रिलेशन आगे बढ़ने के बाद कॉम्प्रोमाइज नहीं हो पाते और फिर धीरे-धीरे लड़ाईयां शुरू हो जाती है। उनमें से एक सफल हो गया तब उसको लगेगा कि लड़ाई हो है। साइड कर दो। और फिर एक को तो डिप्रेशन में जाना ही है। तो बेहतर तो यह है कि कोशिश करो कि इन चीजों में ना आओ। कम
1:08:07 से कम आप किसी के साथ रिलेशनशिप में पड़ रहे हो तो यह तो सोचिए उसके साथ अपना फ्यूचर क्या है? हम इतने मूर्ख कैसे हो सकते हैं? सोचना चाहिए कि भाई आप किसी के साथ रिलेशनशिप में जा रहे हो ना तो एटलीस्ट इतना तो विवेक यूज़ करना पड़ेगा ना कि जिसके साथ जा रहे हो उसके साथ अपना आगे फ्यूचर है कि नहीं है। अच्छा नहीं है तो कम से कम हमें हमारे भावनाओं को कंट्रोल में करना चाहिए और वो भावनाएं पढ़ाई में लगानी चाहिए। फिर भी आप बर्बादी की ओर जाओगे तो भगवान ही मालिक है। पहली बात। अच्छा दूसरी और अब चले गए हैं। चीजें हो चुकी। अब क्या करें? अब मूव ऑन करने की आवश्यकता है। क्योंकि आप उस चीज पे सोच के कुछ भी नहीं हासिल कर सकते। जिसने डिनाई कर दिया है एक बार के लिए। अब उसको आप जबरदस्ती नहीं करवा सकते। और जबरदस्ती करवाई तभी आपकी हैप्पी फैमिली लाइफ नहीं
1:08:53 गुजरेगी। हम मूव ऑन करने में फायदा है। और मूव ऑन कैसे करना है? मूव ऑन करने के लिए आपका दिमाग किसी और जगह डाइवर्ट करना पड़ेगा। और किसी और जगह का सबसे बढ़िया तरीका होता है पढ़ाई। और दूसरा तरीका ये होता है कि खुद पढ़ो, अच्छी जॉब लगो, खुद को बिजी कर दो और दुनिया में अच्छे-अच्छे लोग खूब आएंगे। एक के जाने से जिंदगी खत्म थोड़ी होती है। कई आएंगे कह और वो वैसे योग्य नहीं था। जब इस मोड़ पे ही छोड़ चुका है तो भविष्य में और छोड़ देता। कई बार तो जो होता है वो अच्छी के लिए होता है। बाकी एज ए लड़की मैं आपके विचार जानना चाहूंगा कि आप क्या कहती है इस सर? सर मेरा तो विचार आपसे मिलताजुलता है। पहला तो यही कि अगर ऐसे रो के डिप्रेशन में जाके भीख मांग के अगर वो मिल भी गया तो वो प्यार तो नहीं है। दूसरा मुझे दो ऑप्शन नजर आते हैं। पहला ये
1:09:39 कि जब रिलेशन में साथ थे तो डिप्रेशन में अकेले क्यों? आपको जाकर उस लड़के के घर पे सारी बात बता देनी चाहिए। पर मुझे दूसरा विकल्प है वो ज्यादा बेहतर लगता है कि आप जो सत्य है उसे स्वीकार करें और और वैसे भी हर किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता। किसी को जमीन नहीं मिलती तो किसी को आसमान नहीं मिलता तो आप जाने दें। जाने देने का नाम ही जिंदगी है। आप खुद पर काम करें। खुद को बेहतर बनाएं। वर्क हार्ड अर्न मनी खुद का घर लें। खुद की गाड़ी लें। और जाकिर खान की एक लाइन है कि प्रेम की पराकाष्ठा कितनी भी हो परंतु आत्मसम्मान से कोई कॉम्प्रोमाइज नहीं होना चाहिए। बहुत बढ़िया। तो व्हाई टू सर्कुलेट योर लाइफ अराउंड ए बॉय। जस्ट बी द मास्टर ऑफ
1:10:25 योर ओन डेस्टिनी। अब तक जो हुआ वो ठीक है। परंतु आगे की कहानी आपकी खुद की है। तो इसे आप कमाल लिखो। बाकी हमारी शुभकामनाएं आपके साथ में हैं। सर नेक्स्ट क्वेश्चन लेते हैं। एक छात्र का है वो जयपुर आरएस की तैयारी करने गया। परंतु वहां पर ड्रिंक और सिगरेट की लत लगा बैठा है और अभी तनाव में है। ना वो घर वालों के सामने प्रश्न है ये। जी किसी छात्र का अह तो अभी ना वह यह चीज़ घर वालों के सामने एक्सेप्ट कर पा रहा है। वह कैसे इस लत को छोड़े? देखो लत अगर डल डाल दी गई है। वैसे यह तो क्या है कि कॉमन प्रॉब्लम हो चुकी है महानगरों में। चाहे वो सूरतगढ़ में जाओ, चाहे वो आप जयपुर में जाओ, चाहे जोधपुर
1:11:10 में जाओ। जनरली यह बना दिया जाता है कि सिगरेट पीने से कंसंट्रेशन बनता है। यह चीजें मार्केट में फैली हुई है और इस वजह से कई बार नया-नया बच्चा शहर में जाता है तो ढल जाता है। तो मुझे यूं लगता है कि आत्म मंथन करना चाहिए स्टूडेंट को कि मैं क्या करने आया हूं? कर क्या रहा हूं। हर दिन 40-50 खर्च कर रहा हूं उस पे ड्रिंक पे उस पे। हम फिर उसके बाद पढ़ाई होती नहीं है। डिप्रेशन होता है। उसको ना दुनिया में कोई नहीं सुधार सकता स्वयं के अलावा। उसको खुद खुद को ना सबसे पहले उस ग्रुपिंग से दूर होना चाहिए जो ये चीजें करते हैं या जिन्होंने उनको करवाई है। और उसके लिए सबसे पहले उस स्थान छोड़ना चाहिए।
1:11:55 हम सबसे पहला काम ये करें वो उस स्थान को छोड़ दो आप। जिस जगह रह रहे हो वो जगह छोड़ दो। उसके बाद धीरे-धीरे उसकी इंटेंसिटी कम करो। धीरे-धीरे कम होगी और प्रण ले लो कि आगे चार या पांच महीने बाद कुछ नहीं करेगी और इसके साथ-साथ में थोड़ी स्पोर्ट एक्टिविटी जो जोगिंग वगैरह या रनिंग वगैरह शुरू कर दो क्योंकि स्पोर्ट एक्टिविटी में आपके अच्छे हार्मोंस रिलीज होते हैं। तो आप इन चीजों को आउटकम अच्छे से कर सकते हो। नहीं तो नहीं हो पाएगा। तो स्थान छोड़ दो। थोड़ा रनिंग वगैरह शुरू कर दो और धीरे-धीरे उसकी इंटेंसिटी कम करते जाओ। तो 5 छ महीने बाद ऐसी स्थिति आएगी आप उसके ऊपर डिपेंड नहीं होगी। और बहुत अधिक लत पड़ गई तो घर पे बात करिए मां से बात करिए कि मां ऐसी हो गया है
1:12:40 मुझे ये सब चीजें छोड़नी है बस दुनिया की कोई मां ऐसी नहीं होगी जो उसको डांटेगी बिल्कुल वो यही कहेगी बेटा घर आ तेरे को अच्छा खिलाती पिलाती हूं तू छूट छोड़ देगा हम और मैं आपको दावे के साथ कह सकता हूं वो बच्चा 4 महीने 5 महीने में उस स्थिति से बाहर आ जाएगा क्योंकि नशा छोड़ने के लिए पपरिंग भी चाहिए थोड़ा बिल्कुल वो इमोशनली रोने लगता है हम उसको साथ चाहिए और मां से अच्छा साथ तो मुझे लगता है इस दुनिया में कोई नहीं दे सकता। बिल्कुल तो ये तरीके हैं छूट सकता है। थोड़ा सा विल पावर रखनी पड़ेगी। जी सर मैंने जो है थोड़ा अल्सरेटिव कोलाइटिस के बारे में जो है रिसर्च करी अपने लेवल पर। मैंने कहीं पढ़ा था कि अल्सरेटिव जो सिगरेट है वो अल्सरेटिव कोलाइटिस के विकास के जोखिम को कम करती
1:13:26 है। तो क्या आपके मन में नहीं आया कि यार इसको ट्राई करते हैं या फिर आपके दोस्तों ने कभी नहीं कहा कि एक घूंघट तो ले। भाई एक घूंघट से क्या हो रहा है? हम दोस्त हैं हमारे साथ में उठ बैठ रहे हो। हमारे लिए इतना नहीं कर सकते। और जनरली मैंने देखा है कि ये जो ड्रिंक की शुरुआत है वो शादियों में रिश्तेदार करवाते हैं या फिर आपका बहुत ही करीबी दोस्त करवाता है। तो आपने उस प्रेशर को कैसे टैकल किया? आपने जो अपने स्टैंडर्ड्स थे उसको कैसे मेंटेन किया? देखो एक ये बात ठीक है। मैंने भी रिसर्च पेपर पढ़े थे एक दो कि सिगरेट हील करता है अल्सर वाला उसको। अ ये ठीक है। फिर मैंने इसलिए नहीं लिया उसको कि भाई गलत है नशा नहीं करना ये वो। बट मुझे पता है यू लगता है कि मैं एक शिक्षक हूं।
1:14:13 और मैं अगर सिगरेट सेवन करूंगा तो एक तो मैं उसका आदि हो जाऊंगा। आधी मैं बहुत जल्दी हो जाता हूं। मतलब मैं तीन दिन चाय पी लूं तो चौथे दिन मेरे को नशा गजब हो जाता है। फिर मैं जहां कहीं भी जाऊंगा करूंगा। मुझे सिगरेट की नीड रहेगी। पर मैं कहां जाता हूं? मैं बच्चों के साथ जाता हूं। प्रोग्राम्स में जाता हूं। मैं सिगरेट कहां पऊंगा? हम हर जगह मैं सिगरेट फिर मैं कोने ढूंढता रहूंगा। बिल्कुल। मेरी व्यक्तित्व पे कितना गंदा असर पड़ेगा। जितना बीमारी के कारण नहीं पड़ रहा है। सच बात है। प्लस फिर वो दिखती भी है क्योंकि आप सिगरेट ज्यादा पीते हैं। आपके लिप्स भी ब्लैक हो जाते हैं। हम पता चल जाता है। सिगरेट पीने वाले का पता चल जाता है। उसकी बॉडी से भी उसका वो स्वेट भी उस हिसाब से बदबू मारना शुरू कर देता है। और मैं दिन में कितने बच्चों से मिलता
1:14:59 हूं। हम 1000 बच्चे कम से कम क्योंकि 500 700 की क्लास होती है। 4050 इधर मिलने आते हैं। 100 200 कॉलेज में आते हैं। हर दिन 1000 बच्चों से इंटरेक्शन होता है। फिर मैं किस मुंह से जाके बच्चे को मंच पे जाके कहूं कि बेटा नशा नहीं करना। क्योंकि जो बात बोलते हैं ना वो हमें पहले हमें करनी पड़ती है। कुछ ये चीजें सोच के ना मैं कभी इसके नजदीक भी नहीं गया। अब बीमारी का जो भविष्य है वो नियति में देख लेंगे। लेकिन यह सब नहीं करेंगे। सर किसी छात्रा का क्वेश्चन है कि मैडम मेरा सेकंड ग्रेड का एग्जाम है। मेरा पटवारी और वीडियो के अंदर मैं थोड़े नंबरों से रह गई थी। मेरे रिश्तेदार और पड़ोसी जो है मेरी शादी का दबाव मेरे पेरेंट्स पर डालते हैं और पेरेंट्स वो दबाव मेरे ऊपर शिफ्ट करते हैं। जब भी मैं
1:15:46 लाइब्रेरी में पढ़ाई करने जाती हूं तो यह मेरी जो पढ़ाई का टाइम है वो काउंटर
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