संक्षिप्त सारांश
यह वीडियो श्री रामकृष्ण परमहंस के माया के दर्शन पर आधारित है। इसमें बताया गया है कि माया एक भ्रम है जो हमें अपनी वास्तविक पहचान से दूर रखता है। माया से मुक्ति पाने के लिए सत्य का स्मरण, आत्मज्ञान, विवेक, वैराग्य, प्रेम और मौन का अभ्यास आवश्यक है।
- माया एक जटिल जाल है जो हमारी चेतना को बाहरी जगत में उलझाए रखता है।
- माया से मुक्ति पाने के लिए सत्य का स्मरण और आत्मज्ञान आवश्यक है।
- विवेक और वैराग्य माया के किले को गिराने वाली दो तलवारें हैं।
- प्रेम और मौन माया से ऊपर उठने के सरलतम मार्ग हैं।
हम जिस संसार में रहते हैं, वह घटनाओं, संबंधों और वस्तुओं का एक जटिल जाल है, जिसे माया कहते हैं। यह माया हमारी चेतना को बाहरी दुनिया में उलझाए रखती है, जिससे हमें अपनी आत्मा की वास्तविक पहचान भूल जाती है। श्री रामकृष्ण परमहंस कहते हैं कि माया कोई बाहरी शक्ति नहीं है, बल्कि यह मन की विकृत धाराएं हैं जो हमें आत्मा से दूर कर देती हैं। हमें माया से डरने की बजाय उसे पहचानने और उससे पार होने की कोशिश करनी चाहिए।
माया को तोड़ने का एकमात्र उपाय है सत्य का स्मरण। हमें यह जानना चाहिए कि हम न तो शरीर हैं, न नाम हैं और न ही संबंध हैं, बल्कि हम केवल आत्मा हैं, शुद्ध चैतन्य हैं। श्री रामकृष्ण कहते हैं कि जब तक मन मोह से बंधा है, तब तक वह सत्य की ओर नहीं बढ़ सकता। जो एक बार भीतर की आवाज सुन लेता है, वह जान जाता है कि यह संसार एक स्वप्न है। तब उसे न तो मोह रहता है और न ही भय।
श्री रामकृष्ण कहते हैं कि माया कोई स्थूल वस्तु नहीं है, बल्कि यह एक अदृश्य शक्ति है जो मनुष्य की दृष्टि को उलझा देती है। माया दो रूपों में कार्य करती है: आवरण और विक्षेप। आवरण का अर्थ है सत्य को ढक देना, और विक्षेप का अर्थ है असत्य में उलझा देना। मन जब तक भोगों, इच्छाओं और संबंधों में उलझा रहता है, तब तक वह आत्मा के प्रकाश को नहीं देख सकता। माया से बचने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि यह माया है।
साधना, भक्ति और आत्मचिंतन ही वे शस्त्र हैं जो माया के जाल को काट सकते हैं। माया को देखकर डरने की नहीं, बल्कि उसे पार करने की आवश्यकता है। माया तुम्हें जकड़े, उससे पहले तुम सत्य को थाम लो, क्योंकि माया केवल उसी पर हावी होती है जो अपने स्वरूप को भूल चुका है। आत्मा तो सदा मुक्त है, पर उस पर माया की कंचुल चढ़ गई है। आत्मज्ञान से माया का आवरण उतर जाता है।
श्री रामकृष्ण कहते हैं कि संसार से भागने की आवश्यकता नहीं है, पर उसमें लिप्त होने की भी आवश्यकता नहीं है। जीवन के सारे कर्म करो, पर भीतर से उस चेतना से जुड़े रहो जो कभी नहीं बदलती। माया का खेल तभी तक है जब तक 'मैं' और 'मेरा' की धारणाएं जीवित हैं। जैसे ही 'मैं' मिटता है, माया भी मिट जाती है। सत्य को देखने के लिए माया की परतें हटानी पड़ती हैं, यही साधना है और यही मुक्ति का मार्ग है।
श्री रामकृष्ण कहते हैं कि माया का सिरा पकड़कर उसकी जड़ तक जाना आवश्यक है, तभी तुम उससे मुक्त हो सकते हो। माया की हर गांठ को विवेक से खोलो। पहली गांठ है देहाभिमान, दूसरी लोभ, तीसरी मोह और चौथी भय। जब तक ये गांठें नहीं खुलतीं, तब तक आत्मा स्वतंत्र नहीं हो सकती। माया का विश्लेषण करो, उससे लड़ो मत, क्योंकि माया कोई दुश्मन नहीं है, बल्कि एक परीक्षा है।
श्री रामकृष्ण कहते हैं कि माया से डरने वाला कभी मुक्त नहीं हो सकता। डर, मोह और भ्रम माया के शस्त्र हैं। जो साहसपूर्वक माया को पहचान लेता है, उसके लिए यह केवल एक स्वप्न रह जाती है। साधक जब आत्मज्ञान प्राप्त करता है, तब उसे माया एक खेल जैसी लगती है। जो भगवान का नाम लेता है, उसकी माया भी सेवा करने लगती है। माया को हराने का मार्ग है ईश्वर में गहराई से डूबना।
माया के मेले में अपने मौन को साधना सीखो। श्री रामकृष्ण कहते हैं कि यह संसार एक मेला है, जहां हर कोई खुद को खरीदने दौड़ रहा है। जो साधक मौन साध लेता है, वह इस मेले की आवाजों से अप्रभावित हो जाता है। मौन केवल वाणी का नहीं, मन का होता है। जब मौन होता है, तब माया की पकड़ ढीली हो जाती है। मौन का अभ्यास आत्मा को उसके मूल में पहुंचा देता है।
मौन ही पहला कदम है आत्मा की दिशा में, और यह माया का दर्पण है। उसमें उलझो मत। माया दर्पण की तरह है, जो केवल छवि दिखाती है, सत्य नहीं दिखाती। संसार में जो कुछ दिखाई देता है, वह क्षणिक है, परिवर्तनशील है, पर मनुष्य उसी को पकड़ना चाहता है। माया तुम्हें परछाईं से उलझा देती है। परछाईं को देखना बुरा नहीं, पर उसे वास्तविक मान लेना बंधन है।
श्री रामकृष्ण कहते हैं कि यह सांसारिक रंगमंच है और हम सब अभिनय कर रहे हैं। अभिनय करते-करते ही लोग अपने वास्तविक चेहरे को भूल जाते हैं। यही माया का जाल है। मां, बाप, पति, पत्नी, बेटा, बेटी, अधिकारी या सेवक, ये सारे अभिनय हैं, सत्य नहीं हैं। जो अपने ही अभिनय में खो गया, वह स्वयं को भूल गया। माया चाहती है कि तुम इन मुखौटों को ही अपना सत्य मान लो।
श्री रामकृष्ण कहते हैं कि यह सांसारिक सपना है, जो तब तक चलता है जब तक तुम सोए हुए हो। जो जागता है, उसके लिए यह संसार उसी क्षण बदल जाता है। माया एक सामूहिक स्वप्न है जिसमें सब उलझे हैं। मनुष्य जब आत्मचिंतन करता है, तो वह उस चेतना से जुड़ता है जो सपने से परे है। जागने के लिए सच्चे विवेक की तलवार आवश्यक है।
माया को कोई तर्क नहीं काट सकता, केवल प्रेम ही उसे गलाता है। जब मनुष्य सच्चे हृदय से ईश्वर को पुकारता है, तब माया स्वयं ही उसकी सेवा में लग जाती है। सच्चा प्रेम ही माया से ऊपर उठने का सरलतम मार्ग है। यह प्रेम मां के प्रति हो, श्री ठाकुर जी के प्रति हो या निराकार के प्रति, जब वह सच्चा हो, तब वह सब बंधनों को काट सकता है।
माया बाहर नहीं, तुम्हारे विचारों में जड़ जमाए बैठी है। मन में जो बार-बार उठने वाला 'मैं' है, वही माया की जड़ है। जब साधक विचारों का निरीक्षण करता है, तब वह देखता है कि यह विचार मेरा नहीं है, यह तो माया का खेल है। जिसने अपने विचारों को देखा, वह स्वयं को देखने लगा। विचारों की गहराई में उतरते-उतरते साधक को पता चलता है कि उसके भीतर एक शांत केंद्र है जो केवल है, जो न विचार है न इच्छा।
सच्चा विवेक माया को ध्वस्त कर देता है। माया वहीं राज करती है जहां बुद्धि सोई रहती है और मन दौड़ता रहता है। विवेक और वैराग्य ये दो तलवारें माया के किले को गिरा देती हैं। विवेक से तुम्हें दिखाई देता है कि हर वस्तु नश्वर है, हर संबंध सीमित है। तब मन पीछे हटता है और आत्मा आगे बढ़ती है।
माया का संगीत मधुर लगता है, पर छल कपट से भरा हुआ है। माया बांसुरी की तरह मधुर बजती है, पर वह तुम्हें सुला देती है, गहरी नींद में। संसार की चीजें तुम्हें लुभाती हैं। सौंदर्य, सुख, प्रशंसा, प्रेम, यह सब आकर्षक ध्वनियां हैं, पर ध्यान दो, यह स्वर तुम्हें भीतर की ओर नहीं, बाहर की ओर खींचते हैं। तभी साधक को वैराग्य में विश्राम करना चाहिए।
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Transcript
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0:01 हम जिस संसार में जीते हैं, वह केवल घटनाओं, संबंधों और वस्तुओं का समुच्चय नहीं है। वह एक जटिल माया जाल है। यह माया हमारी चेतना को बाहरी जगत में उलझाए रखती है। जिससे आत्मा की वास्तविक पहचान खो जाती है। हम रोते हैं। हंसते हैं। काम करते हैं। प्रेम करते हैं। लेकिन इन सबके पीछे गहरी भ्रम की दीवार खड़ी रहती है। यह मेरा है। यह मैं हूं। यह मुझे चाहिए। यही भ्रम यही माया का वास्तविक खेल है।
0:47 श्री रामकृष्ण परमहंस इस भ्रम के पार देखने वाले दिव्य द्रष्टा थे। वे बार-बार कहते हैं कि माया कोई बाहरी शक्ति नहीं यह तो मन की विकृत धाराएं हैं जो आत्मा से तुम्हें हटा देती है। वे माया से डरने की नहीं बल्कि उसे पहचान पार करने की बात करते हैं। उनका जीवन इस बात का साक्ष्य है कि माया के बीच रहते हुए भी कैसे आत्मा के आनंद में स्थित हुआ जा सकता है। वे कहते हैं संसार एक रंगमंच है। जहां आत्मा दर्शक है और माया है पर्दा।
1:35 जब तक आत्मा माया के पर्दे में रंगों और रूपों में मोहित रहती है। वह अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाती है। यह माया जादूगरनी की तरह है। जो असत्य को सत्य परछाई को वास्तविकता और बंधन को स्वतंत्रता के रूप में दिखाती है। मनुष्य जब शरीर, संबंध, धन और प्रतिष्ठा को ही सब कुछ मानता है। तब वह माया के भ्रम जाल में फंस जाता है। पर जैसे सूरज उगते ही रात का अंधकार मिट जाता है। वैसे ही आत्मज्ञान से माया का पर्दा गिर जाता है। माया को तोड़ने का एकमात्र उपाय है सत्य
2:21 की स्मृति। निरंतर यह जानना कि मैं ना शरीर हूं ना नाम ना संबंध। मैं केवल आत्मा हूं। शुद्ध चैतन्य श्री रामकृष्ण कहते हैं पानी में बंधी नाव जैसे किनारे में हिल नहीं सकती वैसे ही जब मन मोह से बंधा है तब तक वह सत्य की ओर नहीं बढ़ता जैसे पतंग डोहरी से बंधी उड़ती है पर स्वतंत्र नहीं होती वैसे ही आत्मा जब तक माया से जुड़ी है तब तक वह सचमुच की उड़ान नहीं भर सकती। पर जो एक बार भीतर की आवाज सुन लेता है,
3:08 वह जान जाता है कि यह संसार एक स्वप्न है। तब ना मोह रहता है, ना भय। तब आत्मा के दीपक में परम सत्य की लोह जलने लगती है। माया का पर्दा तब हट जाता है। और आत्मा स्वाभाविक रूप से मुक्त हो जाती है। यही ब्रह्म से मिलन की राह है। श्री रामकृष्ण कहते हैं माया कोई स्थूल वस्तु नहीं है यह एक अदृश्य शक्ति है जो मनुष्य की दृष्टि को उलझा देती है। जैसे धुएं में दर्पण धुंधला हो जाए वैसे ही माया आत्मा को छिपा देती है। माया दो रूपों में कार्य करती है।
3:54 आवरण और विक्षेप। आवरण का अर्थ है सत्य को धक देना। और विक्षेप का अर्थ है असत्य में उलझा देना। मन जब तक भोगों, इच्छाओं, संबंधों औरों में उलझा रहता है वह आत्मा के प्रकाश को देख ही नहीं सकता। श्री रामकृष्ण समझाते हैं माया से बचना है। तो पहले जानो कि यह माया है। अज्ञान के रहते माया हावी रहती है। पर जैसे ही विवेक जागता है। माया भाग जाती है। साधना भक्ति और आत्मचिंतन ही वह शस्त्र है जो माया के जाल को काट सकते हैं। माया को देखकर डरने की नहीं उसे पार करने
4:41 की आवश्यकता है। माया तुम्हें जकड़े उससे पहले तुम सत्य को थाम लो। क्योंकि माया केवल उसी पर हावी होती है जो अपने स्वरूप को भूल चुका है। जैसे शेर के पास पहुंचते ही नकली शेर भागता है वैसे ही माया भी भागती है। जब आत्मा जाग जाती है। श्री रामकृष्ण कहते हैं आत्मा तो सदा मुक्त है। पर उस पर माया की कंचुल चढ़ गई है। जैसे सांप के शरीर में कंचुल अलग हो जाती है। वैसे ही माया का आवरण आत्मज्ञान से उतर जाता है। लोग सोचते हैं कि माया बहुत बलवान है। पर
5:26 माया का बल केवल उतना ही है जितना हम उसे मानते हैं। जो बार-बार मैं आत्मा हूं ब्रह्म स्वरूप हूं। इसको स्मरण करता हुआ अपने अंतःकरण में बैठा लेता है। उसके भीतर माया की पकड़ ढीली होने लगती है। श्री रामकृष्ण कहते हैं संसार से भागने की आवश्यकता नहीं। पर उसमें लिप्त होने की भी आवश्यकता नहीं है। जीवन के सारे कर्म करो पर भीतर से जुड़े रहो। उस चेतना से जो कभी नहीं बदलती। जैसे कमल का फूल जल में रहकर भी जल से अछूता रहता है। माया का खेल तभी तक है जब तक मैं और मेरा
6:14 की धारणाएं जीवित है। जैसे ही मैं मिटता है माया भी मिट जाती है। सत्य को देखने के लिए माया की परतें हटानी पड़ती है। यही साधना है। यही मुक्ति का मार्ग है। श्री रामकृष्ण परमहंस कहते हैं माया का सिरा पकड़ कर उसकी जड़ तक जाना आवश्यक है। तभी तुम उससे मुक्त हो सकते हो। जैसे कोई डोरी को पकड़ कर उसके अंत तक जाए और गांठ खोल दे। वैसे ही माया की हर गांठ को विवेक से खोलो। पहली गांठ है देहाभिमान। दूसरी लोभ। तीसरी मोह चौथी भाई
7:02 जब तक यह गांठे नहीं खुलती तब तक आत्मा स्वतंत्र नहीं हो सकती। श्री रामकृष्ण कहते हैं माया का विश्लेषण करो। उससे लड़ो मत। क्योंकि माया कोई दुश्मन नहीं है बल्कि एक परीक्षा है। जो इस परीक्षा में पास हो जाता है वह परमात्मा को गले लगा लेता है। जब माया का जड़ कारण दिख जाए तब उससे ऊपर उठना सहज हो जाता है। माया को पार करने के लिए आवश्यक है सत्संग ध्यान और आत्मचिंतन यह ही है वह साधन जो तुम्हें भ्रम के जंगल से निकाल सकते हैं। और माया से डरो मत।
7:50 उसे पहचानो। श्री रामकृष्ण कहते हैं माया से डरने वाला कभी मुक्त नहीं हो सकता। डर, मोह और भ्रम यह तीन माया के शस्त्र है। पर जो साहस पूर्वक माया को पहचान लेता है। उसके लिए यह केवल एक स्वप्न रह जाती है। जैसे कोई बालक डरावनी मूर्ति को देखकर रोता है। पर बड़ा होने पर हंसता है कि मैं क्या कर रहा था। वैसे ही साधक जब आत्मज्ञान प्राप्त करता है तब उसे माया एक खेल जैसी लगती है। श्री रामकृष्ण कहते हैं जो भगवान का नाम लेता है उसकी माया भी सेवा करने लगती है।
8:36 माया को हराने का मार्ग है ईश्वर में गहराई से डूबना। जैसे नदी की धार में उतर कर तैरना सीखते हैं। वैसे ही माया में रहते हुए ईश्वर स्मरण ही रक्षा करता है। डर नहीं, प्रेम चाहिए, भागना नहीं, दृष्टा भाव चाहिए। तभी माया तुम्हें छू ना सकेगी। माया के मेले में अपने मौन को साधना सीखो। श्री रामकृष्ण कहते हैं यह संसार एक मेला है। जहां हर कोई खुद खरीदने दौड़ रहा है। क्या खरीदता है? संपत्ति संबंध सम्मान पर जो साधक मौन साध लेता है, वह इस मेले
9:23 की आवाजों से अप्रभावित हो जाता है। जैसे कोई व्यक्ति चुपचाप भीड़ में चलकर भीतर से शांति में होता है। वैसे ही माया में रहकर भी मौन आत्मा को माया से ऊपर उठा देता है। यह मौन केवल वाणी का नहीं मन का होता है। माया चाहती है कि तुम प्रतिक्रिया करो। उलझो बंध जाओ। पर जब मौन होता है तब माया की पकड़ ढीली हो जाती है। मौन का अभ्यास आत्मा को उसके मूल में पहुंचा देता है। श्री रामकृष्ण कहते हैं मौन में भगवान की आवाज स्पष्ट सुनाई देती है। संसार की भीड़ में यदि कुछ पकड़ना है तो स्वरूप को
10:09 पकड़ो। यह मौन धीरे-धीरे तुम्हें उसी क्षण में पहुंचा देता है जहां माया का कोई अस्तित्व नहीं होता। मौन ही पहला कदम है आत्मा की दिशा में। और यह माया का दर्पण है। उसमें उलझो मत। माया दर्पण की तरह है। जो केवल छवि दिखाती है। सत्य नहीं दिखाती। लोग दर्पण को ही वास्तविक चेहरा मान बैठते हैं। यही तो माया का भ्रम है। संसार में जो कुछ दिखाई देता है वह क्षणिक है। परिवर्तनशील है। पर मनुष्य उसी को पकड़ना चाहता है। बार-बार बार-बार। जैसे कोई पानी में बने प्रतिबिंब को
10:55 पकड़ने जाए। वैसे ही लोग माया में हाथ डालते हैं और निराश लौटते हैं। माया तुम्हें परछाई ही परछाई से उलझा देती है। परछाई का देखना बुरा नहीं पर उसे वास्तविक मान लेना बंधन है। श्री रामकृष्ण कहते हैं कि जो असत्य को असत्य समझ ले वही मुक्त हो जाता है। जब हम अपने अनुभवों संबंधों इच्छाओं और विचारों को निरीक्षण पूर्वक देखते हैं तब समझ आता है कि यह सब माया का खेल है। तब भीतर एक मौन हंसी उठती है और वह हंसी ही प्रारंभ होती है आत्मा की मुक्ति का। माया
11:40 के रंगमंच से उतरने का समय अभी है। श्री रामकृष्ण परमहंस कहते हैं कि यह सांसारिक रंगमंच है और हम सब अभिनय कर रहे हैं। करते ही जा रहे हैं। अभिनय करते-करते ही लोग अपने वास्तविक चेहरे को भूल जाते हैं। यही माया का जाल है। मां, बाप, पति, पत्नी, बेटा, बेटी, अधिकारी या सेवक ये सारे अभिनय हैं। सत्य नहीं है। जो अपने ही अभिनय में खो गया वह स्वयं को भूल गया। माया चाहती है कि तुम इन मुखौटों को ही अपना सत्य मान लो। पर आत्मा कोई भूमिका नहीं बनाती।
12:27 वह तो साक्षी है, नित्य है। श्री रामकृष्ण कहते हैं जब तुम जान जाते हो कि यह मंच है तब तुम मंच से उतरने को तैयार होते हो। मंच से उतरना मतलब भागना नहीं बल्कि भीतर से मुक्त होना है। तुम काम करो संबंध निभाओ। पर जानो कि यह सब अभिनय है। जो इस जागरूकता में जीता है वह माया से ऊपर उठ जाता है और आत्मा की सच्ची शांति को प्राप्त करता है। श्री रामकृष्ण कहते हैं यह सांसारिक सपना है। जो तब तक चलता है जब तक तुम सोए हुए
13:12 हो। जो जागता है उसके लिए यह संसार उसी क्षण बदल जाता है। नींद में जो सांप दिखता है, वह नींद में ही तरता है। पर जागते ही वह गायब हो जाता है। लेकिन सपने का दर तो वास्तविक था। माया ठीक वैसी ही है। एक सामूहिक स्वप्न है जिसमें सब उलझे हैं। मनुष्य जब आत्मचिंतन करता है तो वह उस चेतना से जुड़ता है जो सपने से परे है। श्री रामकृष्ण कहते हैं जागने के लिए आवश्यक है। सच्चे विवेक की तलवार साधना तलवार से माया का भ्रम घटता है और आंखें
13:59 खुल जाती है। तब ना मोह रह जाता है ना भाई केवल प्रकाश रह जाता है तब व्यक्ति केवल देखता है पर बंधता नहीं छूता नहीं लिप्त नहीं होता यही है जागना यही है मुक्ति और माया को कोई तर्क नहीं काट सकता केवल प्रेम ही उसे गलता है माया भीतर से कठोर लगती है पर प्रेम की ऊष्मा उसे पिघला देती है। जब मनुष्य सच्चे हृदय से ईश्वर को पुकारता है तब माया स्वयं ही उसकी सेवा में लग जाती है। माया तब तक बंधन है जब तक
14:45 मन खींचता है। पर जब मन भगवान के चरणों में अर्पित हो जाता है। तब माया भी उसके रक्षक बन जाती है। श्री रामकृष्ण कहते हैं सच्चा प्रेम ही माया से ऊपर उठने का सरलतम मार्ग है। यह प्रेम मां के प्रति हो श्री ठाकुर जी के प्रति हो या निराकार के प्रति। जब वह सच्चा हो तब वह सब बंधनों को काट सकता है। जैसे नदी अपनी सीमाओं को तोड़कर समुद्र से मिल जाती है। वैसे ही प्रेम की नदी आत्मा को ब्रह्म से मिला देती है। प्रेम का जल ही माया की अग्नि को बुझा देता है। माया बाहर नहीं। तुम्हारे विचारों में जड़
15:32 जमाए बैठी है। मन में जो बार-बार उठने वाला मैं है वही माया की जड़ है। यह मैं चाहता है अधिकार, प्रशंसा, संग्रह और सुरक्षा। यही इच्छा का बीज है और यही माया का प्रारंभ। जब साधक विचारों का निरीक्षण करता है, तब वह देखता है यह विचार मेरा नहीं है। यह तो माया का खेल है। श्री रामकृष्ण कहते हैं। जिसने अपने विचारों को देखा वह स्वयं को देखने लगा। विचारों की गहराई में उतरते उतरते साधक को पता चलता है कि उसके भीतर एक शांत केंद्र है जो केवल है जो ना विचार है ना इच्छा
16:22 यही केंद्र आत्मा है वही सत्य है जब तुम उस केंद्र में स्थित होते हो तब माया का बीज सूखने लगता है और एक दिन वह बीज विचारहीनता की रोशनी में जल जाता है। श्री रामकृष्ण कहते हैं सच्चा विवेक माया को ध्वस्त कर देता है। माया वहीं राज करती है जहां बुद्धि सोई रहती है और मन दौड़ता रहता है। पर जैसे ही विवेक जागता है साधक पूछता है क्या यह स्थाई है? क्या यह सत्य है? क्या यह मुझे बांध रहा है? इन प्रश्नों से माया की चमक फीकी पड़ने लगती
17:08 है। श्री रामकृष्ण बार-बार कहते हैं विवेक और वैराग्य यह दो तलवारें माया के किले को गिरा देती है। विवेक से तुम्हें दिखाई देता है कि हर वस्तु नश्वर है। हर संबंध सीमित है। तब मन पीछे हटता है और आत्मा आगे बढ़ती है। जैसे सूरज उगते ही अंधकार मिट जाता है। वैसे ही विवेक की किरणें माया के अंधकार को समाप्त कर देती है। यह माया का संगीत मधुर लगता है। पर छल कपट से भरा हुआ है। धोखेबाज है। श्री रामकृष्ण कहते हैं माया बांसुरी की तरह मधुर बजती है। पर वह तुम्हें सुला देती है नींद में। गहरी नींद में। संसार
17:57 की चीजें तुम्हें लुभाती है। सौंदर्य, सुख, प्रशंसा, प्रेम यह सब आकर्षक ध्वनियां है। पर ध्यान दो। यह स्वर तुम्हें भीतर की ओर नहीं बाहर की ओर खींचते हैं। जब तक कान इन ध्वनियों में लगे रहते हैं। हृदय ईश्वर की पुकार नहीं सुन सकता। माया की आवाजें इतनी सुंदर होती है कि आत्मा की पुकार दब जाती है। तभी साधक को चाहिए वैराग्य में विश्राम। कभी-कभी सब कुछ छोड़कर मौन में जाना। जीवन की ध्वनि को सुनना। जब वह स्वर सुनाई देता है तो माया का संगीत भटकाव लगने लगता है। और तब साधक
18:46 पहली बार शुद्ध परम रूप से गहनता को प्राप्त शांति का अनुभव करता है। [संगीत]