0:00 हेलो दोस्तों, कभी आपने सोचा है कि कुछ लोग ऐसा कैसे कर जाते हैं? जो दुनिया कहती है इंपॉसिबल? वो लोग जो अपनी सीमाओं को तोड़कर हर नियम को पीछे छोड़कर ऐसी ऊंचाइयों तक पहुंचते हैं जहां पहुंचने का सपना भी बाकी लोग नहीं देख पाते। क्या उनके पास कोई अलग दिमाग होता है? कोई स्पेशल पावर या फिर कुछ ऐसा जो हमारे अंदर भी छुपा हुआ है। बस हमें उसका तरीका नहीं आता। यही तो रहस्य है। हमारी हदें उतनी नहीं है जितनी हम मान बैठे हैं। प्रॉब्लम यह नहीं है कि हम क्या कर सकते हैं। प्रॉब्लम यह है कि हम सोचते ही नहीं कि हम क्या कर सकते हैं। लेकिन अगर आपको पता चल जाए कि इंपॉसिबल को पॉसिबल बनाने का एक ब्लूप्रिंट है। एक ऐसा साइंटिफिक तरीका जो
0:47 मोटिवेशन, लर्निंग, क्रिएटिविटी और फ्लो को इस तरह जोड़ता है कि इंसान अपनी सबसे बड़ी लिमिट्स को भी पार कर जाए। तो इमेजिन करो। अगर आप हर सुबह उठे और आपकी लाइफ किसी सुपर परफॉर्मर की तरह ऑपरेट करें। जहां आपका माइंड रेजर शार्प हो, आपका फोकस अनस्टपेबल हो और आपके गोल्स क्लियरली डिफाइंड हो। कोई डिस्ट्रैक्शन ना हो, कोई कंफ्यूजन ना हो। सिर्फ एक्शन हो, क्लेरिटी हो और वह एनर्जी जो आपको हर दिन अपने ड्रीम की तरफ और पास ले जाए। द आर्ट ऑफ इंपॉसिबल यही अनलॉक करता है। एक ऐसा सिस्टम जो साइंटिफिकली प्रूवन है जिसे फॉलो करके कोई भी इंसान अपनी लाइफ में एक्स्ट्राऑर्डिनरी रिजल्ट्स हासिल कर सकता है। यह किताब आपको सिखाती है कि किस तरह आप पैशन बिल्ड कर सकते हैं। किस तरह ग्रिड
1:35 को हैबिट बना सकते हैं और कैसे आप उस पीक परफॉर्मेंस के स्टेट यानी फ्लो में बार-बार एंटर कर सकते हैं। जहां इंसान असली चमत्कार करता है। तो अगर आपकी जिंदगी में कुछ ऐसा है जो आप अचीव करना चाहते हैं। लेकिन अब तक कर नहीं पाए। तो अब वक्त आ गया है उस लॉक को खोलने का जो आपको रोक रहा है। बिकॉज़ द की इज नॉट आउटसाइड इट्स इनसाइड यू। अब शुरू होती है वह जर्नी जहां इंपॉसिबल सिर्फ एक शब्द नहीं बल्कि एक टारगेट बन जाएगा। चैप्टर वन द पैशन रेसिपी। कभी सोचा है कि वह लोग जो अपनी दुनिया में बदलाव लाते हैं जो इतिहास में अमर हो जाते हैं। उनमें ऐसा क्या खास होता है? क्या वह बचपन से ही पैशनेट होते हैं? क्या उनके पास कोई डिवाइन इंस्पिरेशन होती
2:21 है जो उन्हें बाकी सबसे अलग बना देती है? या फिर क्या वह अपने अंदर की एक छोटी सी चिंगारी को धीरे-धीरे एक आग में बदल देते हैं। सच तो यह है कि पैशन किसी जादुई पल में नहीं आता। यह अचानक नहीं फूटता। पैशन एक केयरफुली तैयार की गई रेसिपी है और अगर उसके इंग्रेडिएंट सही हो तो कोई भी इंसान वह आग अपने अंदर जला सकता है जो उसे असंभव रास्तों पर भी चलने की हिम्मत दे। जरा अपनी जिंदगी की तरफ नजर घुमाइए। क्या आपने कभी ऐसा कुछ किया है जो आपके अंदर एक्साइटमेंट की लहर दौड़ा दे? वह काम जिसे करते हुए वक्त उड़ता हुआ महसूस हो। वह छोटे-छोटे इंटरेस्ट्स जो कभी दिलचस्पी बनते हैं। फिर धीरे-धीरे आदत बन जाते हैं
3:10 और फिर एक दिन वह आपके पूरे अस्तित्व का हिस्सा बन जाते हैं। यही तो है पैशन की शुरुआत। एक बच्चा जो स्कूल के प्रोजेक्ट में क्यूरियोसिटी से भरा रहता है। हर सवाल के पीछे क्यों पूछता है? वह बड़ा होकर एक साइंटिस्ट बनता है। एक लड़की जो छोटे से गांव में मोबाइल से मेकअप वीडियो बनाती है। एक दिन लाखों फॉलोवरर्स की ब्यूटी इन्फ्लुएंसरर बन जाती है। एक लड़का जो हर शाम गिटार से एक नई धुन निकालने की कोशिश करता है। वही एक दिन रॉकस्टार बनकर मंच हिला देता है। लेकिन इन सबके पीछे कोई चमत्कार नहीं होता। होता है तो सिर्फ एक प्रोसेस पैशन का असली सीक्रेट है। फॉलो योर क्यूरियोसिटी। जब आप किसी चीज के बारे में लगातार सोचते हो, उसे समझने की कोशिश करते हो, बार-बार उसी डायरेक्शन में ध्यान
3:57 जाता है। वहीं से उस सीड का अंकुरण होता है, जिसे हम पैशन कहते हैं। लेकिन यह इतना आसान नहीं होता क्योंकि दुनिया हमें सिखाती है कि हम सेफ रास्ता चुने, स्टेबल फ्यूचर सोें और ज्यादा रिस्क ना लें। पर क्या कोई भी बड़ा काम कभी सेफ जोन में रहकर हुआ है? पैशन को डेवलप करना एक इमोशनल जर्नी है। इसमें कंफ्यूजन होता है, रिजेक्शन होता है और सबसे बड़ी चीज सेल्फ डाउट होता है। लेकिन जो लोग इस स्टॉर्म से गुजरते हैं, वही अपनी क्लेरिटी को पा लेते हैं। पैशन सिर्फ वह काम नहीं होता जिसमें आपको मजा आता है। वह एक संघर्ष होता है जिसमें आप बार-बार गिरते हैं लेकिन हर बार उठते हैं क्योंकि अंदर कोई आवाज कहती है।
4:45 तू इससे भाग नहीं सकता। पैशन आपको मजबूर करता है, खींचता है, जलाता है और फिर गढ़ता है। अब सोचिए अगर किसी को उसका पैशन मिल जाए और वह उस पर पूरी इंटेंसिटी से काम करे तो क्या वो इंपॉसिबल को पॉसिबल नहीं बना सकता? एक लड़का था जो हर दिन माउंटेन बाइकिंग करता था। किसी ने कहा इसमें करियर नहीं बनता। किसी ने ताना मारा। मिट्टी में खेलकर क्या मिलेगा? लेकिन वह रुका नहीं। उसका इंटरेस्ट धीरे-धीरे ऑब्सेशन बना और एक दिन उसने वर्ल्ड रिकॉर्ड तोड़ा। क्यों? क्योंकि उसने पैशन को एक हैबिट बना लिया था। पैशन कभी एक दिन में नहीं बनता। यह धीरे-धीरे क्यूरियोसिटी, एक्सपेरिमेंटेशन और इंटेंस
5:31 फोकस से इवॉल्व होता है। और फिर एक दिन जब पूरी दुनिया कहती है कि तू पागल है। वो शख्स कामली मुस्कुराता है और कहता है हां मैं पागल हूं। लेकिन मैं रुका नहीं। पैशन आपको एवरेज से हटाकर एक्स्ट्राऑर्डिनरी की तरफ ले जाता है। वह आपके हर दिन को मीनिंगफुल बनाता है। और जब एक इंसान अपने पैशन के रास्ते पर निकलता है तब वह सिर्फ अपनी जिंदगी नहीं बदलता। वह दुनिया की दिशा भी मोड़ सकता है। तो अगर आज आप कंफ्यूज्ड हैं, लॉस्ट हैं या स्टक हैं? तो खुद से एक सवाल पूछिए। क्या है वह चीज जिसे करने में मैं अपना आप भूल जाता हूं? वहीं से शुरुआत कीजिए। पैशन मिलना नहीं होता। पैशन बनाया जाता है। और जब यह बन जाता है तो इंपॉसिबल
6:19 शब्द अपनी मीनिंग खो देता है। क्या आप तैयार हैं उस आग को जलाने के लिए? चैप्टर टू द हैबिट ऑफ वेरोसिटी। क्या आपने कभी किसी इंसान को देखा है जो हर बार गिरने के बाद और जोर से उठता है जिसे हार डराती नहीं बल्कि उकसाती है। जो दर्द से पीछे नहीं हटता बल्कि उसे फ्यूल बना लेता है। ऐसे लोग दूसरों जैसे नहीं होते। उनकी आंखों में एक अलग आग होती है। वह आग जिसे कहते हैं फेरोसिटी। फेरोसिटी कोई गुस्सा नहीं होता। यह वह इंटेंस ड्राइव है जो इंसान को हर ऑब्सकल के पार जाने की हिम्मत देता है। और सबसे चौंकाने वाली बात यह एक टैलेंट नहीं है। यह एक हैबिट है। एक आदत जिसे कोई भी इंसान अपने अंदर डेवलप कर सकता है। सोचिए एक माउंटेन क्लाइबर को जो
7:07 बर्फीली हवाओं में टूटते शरीर के साथ हर कदम पर मौत को करीब महसूस करता है। लेकिन फिर भी एक और कदम बढ़ाता है। एक लड़की को जो पूरे समाज के ताने सहकर भी अपना सपना नहीं छोड़ती। एक एंटरप्रेन्योर को जो बार-बार फेल होता है लेकिन फिर भी अगली सुबह उसी इंटेंसिटी के साथ काम पर लग जाता है। इन सब में एक चीज कॉमन होती है। फेरोसिटी एज अ हैबिट। अब सवाल यह उठता है ऐसी आदत बनती कैसे है? शुरुआत होती है एक सिंपल डिसीजन से। मैं रुकूंगा नहीं। जब हम यह फैसला करते हैं कि अब पीछे नहीं हटना तो दिमाग खुद को नए हिसाब से ढालना शुरू कर देता है। डर अब डर नहीं लगता बल्कि एक सिग्नल बन जाता है कि अब एक्शन का समय है।
7:53 कंफर्ट जोन अब सफोकेशन जैसा लगता है और हर दिन हर कदम उस डिसीजन को और मजबूत करता है। लेकिन यह सफर आसान नहीं होता। फेरोसिटी की राह में सबसे बड़ी लड़ाई बाहर नहीं भीतर होती है। अपने ही माइंड से उस इनर वॉइस से जो कहती है थक गया हूं। अब नहीं हो पाएगा। क्यों इतना पुश कर रहा हूं? लेकिन वहीं से तो फेरोसिटी की असली पहचान होती है। जब इंसान उस आवाज को सुनकर भी आगे बढ़ता है। जब वह कहता है यस आई एम टायर्ड। बट आई एम नॉट डन। एक एमएमए फाइटर की कहानी याद आती है। एक फाइट के दौरान उसकी एक हड्डी टूट गई। डॉक्टर ने कहा तुरंत रुकना होगा। लेकिन उस फाइटर ने ना सिर्फ फाइट पूरी की बल्कि जीत भी गया। बाद
8:41 में जब पूछा गया कि कैसे किया? उसने सिर्फ इतना कहा। आई ट्रेंड माय माइंड टू फाइट इवन व्हेन माय बॉडी क्विट। यही है फेरोसिटी की ताकत। अब सोचिए अगर यह ताकत आप भी अपनी लाइफ में ले आए तो क्या रुकावटें आपको रोक पाएंगी? इस हैबिट को डेवलप करने के लिए जरूरी है कि आप खुद को बार-बार अनकंफर्टेबल जोन में ले जाएं। इजी काम करते हुए कोई फिरोसिटी नहीं बनती। जब आप थके हुए हो तब एक और स्टेप लें। जब लोग कहें अब बस कर तब अपने आप से कहें बस अब शुरू हुआ है और धीरे-धीरे आपका माइंड कंडीशन हो जाता है। एडवर्सिटी को फेस करने के लिए ना भागने के लिए। फिरोसिटी वह क्वालिटी है जो ग्रेटनेस की फाउंडेशन है।
9:29 यह वह स्पार्क है जो मीडकिटी को आग में बदल देता है। और जब यह आपकी हैबिट बन जाए तो आप दुनिया की कोई भी लिमिट तोड़ सकते हैं। अब सवाल है क्या आप इस हैबिट को डेवलप करने के लिए तैयार हैं? क्योंकि वंस यू बिल्ड द हैबिट ऑफ फिरोसिटी देन दी इंपॉसिबल बस एक नेक्स्ट टारगेट बन जाता है। चैप्टर थ्री गोल्स। एक सवाल दिल से पूछिए। क्या आपने कभी अपनी जिंदगी में कोई ऐसा गोल सेट किया है जिसे सोचते ही रोंगटे खड़े हो जाए? ऐसा सपना जो डराता हो लेकिन साथ ही खींचता भी हो। ऐसा टारगेट जो इतना बड़ा हो कि नींद तक उड़ा दे। अधिकतर लोग सिर्फ जी रहे होते हैं। बिना किसी साफ डायरेक्शन के। रोज एक जैसे दिन, एक जैसी
10:15 सोच और फिर वही कल से बदललूंगा वाला झूठा वादा। लेकिन जो लोग इंपॉसिबल को पॉसिबल बनाते हैं उनके पास एक क्रिस्टल क्लियर गोल होता है। एक ऐसा लक्ष्य जो उनकी हड्डियों में आग लगा देता है। गोल सिर्फ एक विश नहीं होता वह एक कंपास होता है। जब आपका गोल सच्चा होता है तो हर डिस्ट्रैक्शन फीका पड़ जाता है। आप बार-बार मोटिवेट होने की जरूरत नहीं महसूस करते क्योंकि आपके अंदर एक एनर्जी जल रही होती है। 24 और से पर अफसोस ज्यादातर लोग दो गलतियां करते हैं या तो वह बहुत छोटे गोल बनाते हैं जो उन्हें चैलेंज नहीं करते या फिर इतने बड़े सपने देखते हैं जिन्हें कभी एक्शन में कन्वर्ट नहीं कर पाते। अब
11:01 सोचिए अगर कोई क्लाइबर यह सोचे कि मुझे एवरेस्ट चढ़ना है लेकिन यह ना पता हो कि पहले बेस कैंप तक कैसे पहुंचना है तो क्या वह चढ़ पाएगा? नहीं। और अगर कोई सिर्फ बेस कैंप तक जाने का सपना लेकर निकले तो क्या वह एवरेस्ट फतेह कर पाएगा? बिल्कुल नहीं। इसलिए जरूरी है दो चीजें। हाई हार्ड गोल्स और क्लियर डेली टारगेट्स। हाई हार्ड गोल्स वह होते हैं जो आपको स्ट्रेच करते हैं। यह वह सपने होते हैं जो आपका वर्जन 2.0 मांगते हैं। एक ऐसा आप जो आज आप नहीं हैं लेकिन बन सकते हैं। यह गोल्स आपको डराते हैं। लेकिन साथ ही आपको ऐसा फील कराते हैं कि बस यही करना है। और फिर आते हैं क्लियर डेली टारगेट्स। वह छोटे-छोटे स्टेप्स जो
11:47 उस बड़े सपने को डेली ग्राइंड में बदलते हैं। यही वह मैजिक है जिससे इंपॉसिबल धीरे-धीरे रियलिटी बनता है। एक कहानी याद आती है। एक लड़का था जो पढ़ाई में एवरेज था। बोलने में हक लाता था और किसी को यकीन नहीं था कि वह कभी कुछ कर पाएगा। लेकिन उसने एक गोल बना लिया। मुझे पब्लिक स्पीकर बनना है। हर दिन उसने शीशे के सामने प्रैक्टिस की। हर रिजेक्शन को एक्सेप्ट किया। हर फेलियर को सीख में बदला और आज वही लड़का हजारों लोगों के सामने स्टैंडिंग ओवेशन पाता है। क्यों? क्योंकि उसका गोल सिर्फ एक ख्वाब नहीं था। वो एक ऑब्सेशन था। गोल क्लेरिटी आपको सिर्फ रास्ता नहीं दिखाती। वो आपको उस माइंडसेट में डालती है जहां आप एक्सक्यूज नहीं
12:34 सिर्फ एग्जीक्यूशन सोचते हैं। जहां फेलियर बस एक चेक पॉइंट बन जाता है। और प्रोग्रेस एक एडिक्शन। एक स्ट्रांग गोल का मतलब है कि आप उस गोल के लिए 100 बार गिरने को भी तैयार हैं। और जब आप इतनी शिद्दत से किसी गोल से जुड़ते हैं तो दुनिया की कोई ताकत आपको रोक नहीं सकती। अब एक बार फिर सोचिए आपका ऐसा कौन सा गोल है जो आपकी रातों की नींद चुरा लेता है जिसे सोचकर आपका दिल तेज धड़कने लगता है। क्योंकि वही है आपका असली रास्ता। वही है आपकी फायर। और जब आप उस रास्ते पर निकलते हैं तो जिंदगी ऑर्डिनरी नहीं रहती। अब वक्त आ गया है ड्रीमिंग बंद करने का और टारगेट लॉक करने
13:19 का। चैप्टर फोर फाइव नॉट सो ईजी स्टेप्स फॉर लर्निंग ऑलमोस्ट एनीथिंग। एक सच्चाई बताऊं। इस दुनिया में असली ताकत पैसों में नहीं, शोहरत में नहीं बल्कि सीखने की काबिलियत में होती है। जो इंसान सीखना जानता है वो कुछ भी बन सकता है। आर्टिस्ट, साइंटिस्ट, एंटरप्रेन्योर या फिर कुछ ऐसा जो आज तक किसी ने सोचा ही नहीं। पर क्या सीखना इतना आसान है? नहीं। असली लर्निंग सिर्फ किताबें पढ़ लेने से नहीं आती। वह तो तब शुरू होती है जब कंफर्ट जोन से बाहर जाना पड़ता है। जब दिमाग का रेजिस्टेंस शुरू होता है। जब हर नया कांसेप्ट एक चुनौती की तरह लगता है और हर फेलियर एक थकाऊ झटका देता है। लेकिन जो इस केओस में
14:06 भी आगे बढ़ना सीख जाता है। वही फ्यूचर बदलता है। अब सोचिए आपने कितनी बार कोई नई स्किल सीखने की कोशिश की। जैसे गिटार, कोडिंग, कोई लैंग्वेज या ट्रेडिंग। शुरू में एक्साइटमेंट फिर थोड़ी मुश्किल फिर फ्रस्ट्रेशन और आखिर में छोड़ देना। यही तो होता है लर्निंग का पैटर्न लेकिन उसमेंस्ट वहीं पाता है जो सही ढंग से इस प्रोसेस से गुजरता है। लर्निंग एक आर्ट है और इसे समझने के लिए सबसे पहले एक बात पकड़ लीजिए। इंफॉर्मेशन से ट्रांसफॉर्मेशन नहीं होता। एक्शन से होता है और उस एक्शन के पीछे होती है एक सॉलिड प्रक्रिया जिसमें मेहनत है, डिसकंफर्ट है और सबसे ज्यादा कंसिस्टेंसी है। कल्पना कीजिए एक बच्चा जो तैरना सीख रहा है। पहले डर फिर
14:53 पानी में डूबना, फिर छींटों से घबराना। लेकिन जब वह रोज-रोज जाता है, जब मसल्स पानी के साथ तालमेल बिाना सीखती हैं, तब कहीं जाकर एक दिन वह पानी में उड़ता है। लर्निंग भी ऐसा ही है। यह एक फिजिकल, इमोशनल और मेंटल अभ्यास है। इस प्रोसेस की शुरुआत होती है क्यूरियोसिटी से। जब आप जेनुइनली किसी चीज को समझना चाहते हैं, तब दिमाग उसकी तरफ खुलता है। फिर आता है स्ट्रगल। जहां दिमाग इंफॉर्मेशन को इंटरनलाइज करने की कोशिश करता है, कंफ्यूजन से लड़ता है। और अगर आप उस कंफ्यूजन से भागे नहीं, तो फिर आता है वह मोमेंट इनसाइट जब पजल पीसेस एकदम से जुड़ जाते हैं। लेकिन यह ब्रेक थ्रू तभी आता है जब आप इस प्रोसेस को बार-बार रिपीट करें।
15:40 एक राइटर को ही ले लीजिए जो पहले दिन 500 वर्ड्स भी नहीं लिख पाता। लेकिन जब वह हर दिन लिखता है, बार-बार गलतियां करता है, खुद को एडिट करता है, तो एक दिन उसका पेन सैकड़ों दिलों को छू जाता है। लर्निंग के इन स्टेप्स में सबसे अहम होता है डीप प्रैक्टिस। यानी वह प्रैक्टिस जो सिर्फ दोहराव नहीं बल्कि अवेयरनेस के साथ की जाती है। जब आप बार-बार फेल होते हैं और हर बार पूछते हैं, गलती कहां हुई? तभी आपके ब्रेन में नए न्यूरल कनेक्शंस बनते हैं। अब गौर करिए आज की दुनिया में सबसे तेज उभरते हुए लोग कौन है? वह जो तेजी से सीख सकते हैं। टेक्नोलॉजी बदल रही है। काम करने का तरीका बदल रहा है और ऐसे में वह
16:26 इंसान जो एडप्टिव लर्निंग का मास्टर है वही आगे है। लर्निंग अब लग्जरी नहीं रही। यह सर्वाइवल स्किल बन चुकी है। इसीलिए अगर आप कुछ बड़ा करना चाहते हैं तो सबसे पहले अपनी लर्निंग मसल को ट्रेन कीजिए। रोज थोड़ा डिसकंफर्ट, रोज थोड़ी स्ट्रगल और रोज थोड़ा इंप्रूवमेंट। यही है वह जर्नी जहां से की शुरुआत होती है। क्योंकि जो इंसान हर दिन कुछ नया सीखता है, वह एक दिन कुछ ऐसा कर जाता है, जो बाकी लोग लाइफ लॉन्ग सिर्फ सोचते रह जाते हैं। चैप्टर फाइव द स्किल ऑफ स्किल। कभी सोचा है जो लोग हर फील्ड में एक्सपर्ट बनते हैं वह आखिर ऐसा कैसे कर लेते हैं? कोई इंसान एक बार मास्टर बने समझ आता है।
17:12 लेकिन अगर कोई बार-बार मास्टरी हासिल करता है स्पोर्ट्स में, बिजनेस में, कम्युनिकेशन में, आर्ट में तो उसके पास कोई सीक्रेट जरूर होता है। और वह सीक्रेट है स्किल सीखने की स्किल यानी द स्किल ऑफ स्किल। यह वह सुपर पावर है जो दुनिया के सबसे तेज लर्नर्स के पास होती है। यह वह हैबिट है जो एवरेज इंसान को एक्स्ट्राऑर्डिनरी बना देती है। यह वह माइंडसेट है जो आपको एक बार नहीं बार-बार जीतना सिखाता है। अब ध्यान से सुनिए। दुनिया में कोई भी स्किल चाहे वह पेंटिंग हो या प्रेजेंटेशन, गिटार हो या ग्राफिक डिजाइन, फाइनेंस हो या फोकस सीखी जा सकती है। लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि कोई
17:57 स्किल कैसे सीखी जाए? असली सवाल है क्या आप स्किल सीखने की स्किल जानते हैं? सोचिए अगर आपके पास ऐसा सिस्टम हो जिससे आप हर 30 दिन में एक नई स्किल सीख पाएं और छ महीने में उस परस्ट हासिल कर लें तो आपकी लाइफ की स्पीड क्या हो जाएगी? यही सिस्टम बनता है चार चीजों से। अवेयरनेस, पैटर्न रिकॉग्निशन, इटरेशन और इमोशनल कंट्रोल। जब आप कोई नई स्किल सीखना शुरू करते हैं तो दिमाग कंफ्यूजन से भर जाता है। हर चीज अजीब लगती है, स्लो लगती है। लेकिन इसी जगह पर स्किलफुल लर्नर्स खुद को पीछे नहीं खींचते। वह खुद से बस एक सवाल पूछते हैं। व्हाट इज द पैटर्न? और जैसे ही वह पैटर्न पकड़ लेते हैं, वह स्किल अनरोल होने लगती
18:44 है। पैटर्न रिकॉग्निशन ही है जो आपको तेज बनाता है। आप देखना शुरू करते हैं कि कौन सी चीज बार-बार होती है। कहां आप फंसते हैं। कहां आपका प्रोग्रेस ब्लॉक होता है। फिर आता है इटरेशन। हर गलती को बार-बार ठीक करना। बार-बार ट्राई करना। जब तक वह परफेक्टली सिंक ना हो जाए। और सबसे जरूरी इमोशनल कंट्रोल। क्योंकि स्किल सीखते वक्त सबसे बड़ी लड़ाई स्किल से नहीं फ्रस्ट्रेशन से होती है। आप बार-बार फेल होंगे। आप कंपैरिजन से टूटेंगे। आप डाउट में जाएंगे। लेकिन वहीं से आपको खुद को खींचना होता है। आई एम नॉट देयर येट। बट आई विल बी। यही कॉन्फिडेंस एक लर्नर को अनस्टपेबल बनाता है। एक रियल लाइफ एग्जांपल सुनिए। एक आदमी था जिसे 40 की
19:32 उम्र में लगा कि उसे पियानो सीखना है। सब ने कहा अब क्या सीखेगा? लेकिन उसने हार नहीं मानी। हर दिन प्रैक्टिस, हर दिन वीडियो देखना, नोट्स समझना, इमोशंस कंट्रोल करना और 2 साल बाद उसने अपना पहला कांसेप्ट प्ले किया। फ्लोलेसली। क्यों? क्योंकि उसने स्किल सीखने की स्किल सीख ली थी। आप चाहे जो भी करना चाहते हो, अपना YouTube चैनल बनाना हो या नई लैंग्वेज सीखनी हो, ट्रेडिंगस्ट करनी हो या पब्लिक स्पीकिंग में एक्सपर्ट बनना हो, अगर आपने यह स्किल पकड़ ली कि कोई भी चीज कैसे सीखी जाती है तो दुनिया की कोई भी चीज आपके लिए दूर नहीं। स्किल सीखने की स्किल ही है जो आपको हर बार ग्राउंड जीरो से उठाकर ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती है। क्योंकि जब
20:18 यह आदत बन जाती है तो आप किसी भी मैदान में उतरने के लिए रेडी होते हैं। और एक बार जब आपने स्किल ऑफ स्किल हासिल कर ली तो कोई भी इंपॉसिबल आपके लिए सिर्फ एक नेक्स्ट लेवल बन जाता है। चैप्टर सिक्स हैकिंग क्रिएटिविटी। अब सोचिए एक बंद कमरा है। चारों तरफ अंधेरा है और आपके हाथ में एक छोटा सा टॉर्च है। आप दीवारें टटोल रहे हैं। रास्ता ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन जैसे ही आप टॉर्च को थोड़ा अलग एंगल में घुमाते हैं। सामने एक दरवाजा चमकता है जिसे आपने पहले कभी देखा ही नहीं था। यही तो है क्रिएटिविटी जो आपको वह देखने की ताकत देती है जो बाकी लोग मिस कर जाते हैं। क्रिएटिविटी कोई लग्जरी नहीं है। यह
21:03 कोई सिर्फ आर्टिस्ट, राइटर या म्यूजिशियन की चीज नहीं है। यह वह सर्वाइवल टूल है जो आज की दुनिया में हर इंसान को चाहिए। चाहे वह बिजनेस कर रहा हो, जॉब में हो, कंटेंट बना रहा हो या अपनी लाइफ के किसी प्रॉब्लम से जूझ रहा हो। लेकिन दिक्कत यह है कि हमें बचपन से सिखाया जाता है सही जवाब क्या है? पर कभी यह नहीं सिखाया जाता कि सवाल कैसे पूछें और क्रिएटिविटी वहीं से पैदा होती है जब हम सवाल पूछने लगते हैं जब हम मानना छोड़ देते हैं और सोचना शुरू करते हैं। अब यह सोचिए क्रिएटिविटी कोई रैंडम इंस्पिरेशन नहीं है। यह कोई मैजिक नहीं बल्कि एक प्रोसेस है। एक ऐसा सिस्टम जिसे हैक किया जा सकता है। और यही तो असली गेम चेंजर है।
21:50 हर बार जब आप किसी नए आईडिया को सोचते हैं, कुछ नया कनेक्ट करते हैं। तो आपके दिमाग में नए न्यूरल पाथवेज बनते हैं और यह कनेक्शंस अचानक नहीं होते। वह तब होते हैं जब आप जानबूझकर खुद को अलग-अलग इंफॉर्मेशन से एक्सपोज करते हैं। जब आप बोर्डम को टोलरेट करते हैं। जब आप डीप थिंकिंग को इनवाइट करते हैं। क्रिएटिविटी हैक करने का पहला दरवाजा है डायवर्जेंट इनपुट। जितनी ज्यादा डवर्स चीजें आप करेंगे उतनी ही ज्यादा कनेक्शंस आपका ब्रेन बना पाएगा। एक शेफ अगर आर्किटेक्चर पढ़ता है तो वह अपनी प्लेट को एक बिल्डिंग की तरह डिजाइन कर सकता है। एक कोडर अगर म्यूजिक सीखता है तो वह एल्गोरििदम को सिमफनी की तरह सोच सकता है। दूसरा जरूरी
22:36 एलिमेंट है डिस्कनेक्शन। जब आप कास्टेंट नॉइज़ में रहते हैं। नोटिफिकेशंस, रील्स, कॉल्स। तब आपका ब्रेन सिर्फ रिएक्ट करता है, क्रिएट नहीं करता। क्रिएटिविटी तब आती है जब दिमाग शांत होता है। जब वह खुद से बातें करता है। इसलिए दुनिया के सबसे क्रिएटिव लोग अपनी रूटीन में बोर्डम टाइम रखते हैं। जहां वह कुछ नहीं करते। बस सोचते हैं और फिर आता है पैटर्न डिसरप्शन। जब आप रोज एक ही तरीके से सोचते हैं, एक ही तरह से काम करते हैं, तो दिमाग ऑटो पायलट में चला जाता है। लेकिन जब आप उस पैटर्न को तोड़ते हैं, जैसे नए रास्ते पर चलना, नई भाषा सीखना या दिन की शुरुआत उल्टे क्रम में करना तब दिमाग चौंकता है
23:24 और वहीं से क्रिएटिव स्पार्क्स उड़ते हैं। अब जरा एक कहानी सुनिए। एक लड़का था जो ग्राफिक डिजाइनर था। रोज क्लाइंट ब्रीफ्स, फोटोशॉप, सेम कलर पैेट्स। क्रिएटिविटी धीरे-धीरे डल हो रही थी। एक दिन उसने रैंडमली कालीग्राफी सीखना शुरू किया। फिर फोटोग्राफी, फिर 3D मॉडलिंग और 6 महीने में उसका काम इतना ट्रांसफॉर्म हो गया कि उसने अपना खुद का स्टूडियो खोल लिया। क्योंकि अब वह सिर्फ डिजाइनर नहीं था। वो एक विजुअल इनोवेटर बन चुका था। क्रिएटिविटी हैक करने का मतलब है अपने दिमाग को नई डायरेक्शंस में पुश करना। नई पर्सपेक्टिव से चीजों को देखना और सबसे जरूरी रिस्क लेना। क्योंकि क्रिएटिविटी तब
24:09 नहीं आती जब आप सेफ होते हैं। वह तब आती है जब आप गलतियां करने को तैयार होते हैं। जब आप सवाल पूछते हैं जिनका जवाब नहीं पता और जब आप उस खाली पन्ने से डरते नहीं बल्कि उसे कैनवस समझते हैं। अगर आप चाहते हैं कि आपकी थिंकिंग अलग हो। आपकी पहचान अलग हो तो अब वक़ है उस क्रिएटिव बीस्ट को अनलॉक करने का जो आपके अंदर छुपा बैठा है। क्रिएटिविटी आपके अंदर है। बस उसे हैक करने की हिम्मत चाहिए। चैप्टर से फ्लोर ट्रिगर्स। क्या आपने कभी वह पल महसूस किया है जब सब कुछ रुक जाता है जब ना वक्त का होश रहता है ना थकान महसूस होती है। जब आप किसी काम में इतने डूब जाते हैं कि पूरा जहां जैसे आपकी गति से चलने लगता है। आप
24:56 खुद से बाहर लेकिन खुद के बिल्कुल करीब होते हैं। यही तो है वह जादू फ्लो स्टेट। फ्लो कोई कल्पना नहीं है। यह साइंस है। यह उस स्टेट ऑफ माइंड का नाम है जहां इंसान अपनी सारी क्षमताओं को एक साथ एक्टिवेट कर देता है। आइडियाज तेजी से आते हैं। डिसीजंस खुद ब खुद हो जाते हैं और परफॉर्मेंस पीक पर होती है। पर असली सवाल यह है। क्या हम फ्लो को कंट्रोल कर सकते हैं? जवाब है हां, फ्लो कोई एक्सीडेंट नहीं है। वह ट्रिगरर्ड होता है। और अगर आप इन ट्रिगर्स को समझ जाए, तो आप जानबूझकर खुद को उस ज़ोन में ले जा सकते हैं जहां इंपॉसिबल टास्क भी एफर्टलेस लगते हैं। फ्लोट ट्रिगर्स वो कंडीशंस होते हैं जो
25:41 आपके ब्रेन को उस मैजिक ज़ोन में धकेलते हैं। जहां डिस्ट्रैक्शंस खत्म हो जाती हैं और आप एक लेजर बीम की तरह फोकस करने लगते हैं। सोचिए एक माउंटेन क्लाइबर जब चट्टान के किनारे लटकता है। उसकी फोकस लेवल क्या होती है? एक पेंटर जब बिना रुके 8 घंटे तक कैनवस पर काम करता है। उसका माइंड किस स्टेट में होता है? एक राइटर जब वर्ड्स की दुनिया में ऐसा खो जाता है कि भूख प्यास सब भूल जाए। उस वक्त क्या चल रहा होता है? फ्लो उसी इंटेंस इन्वॉल्वमेंट से पैदा होता है और उसके ट्रिगर्स बहुत क्लियर हैं। सबसे पहला ट्रिगर है क्लियर गोल्स। जब आपको बिल्कुल पता होता है कि आपको क्या करना है तब दिमाग अपने आप डिस्ट्रैक्शन को
26:26 एलिमिनेट कर देता है। जब डायरेक्शन क्रिस्टल क्लियर होती है तो अटेंशन बिना बंटे एक ही जगह टिकती है। दूसरा ट्रिगर है चैलेंज स्किल बैलेंस। अगर काम बहुत आसान है तो बोर्डम। अगर बहुत कठिन है तो ए्जायटी। लेकिन जब काम थोड़ा चुनौतीपूर्ण होता है, जहां आपकी स्किल स्ट्रेच्ड होती है, तब माइंड अलर्ट होता है, इंगेज्ड होता है और वहीं से फ्लो शुरू होता है। तीसरा है इमीडिएट फीडबैक। जब आप इंस्टेंटली समझ पाते हैं कि आप सही कर रहे हैं या नहीं तो आप नेचुरली ज्यादा फोकस्ड रहते हैं। यही रीजन है कि गेम्स, स्पोर्ट्स और आर्ट में फ्लो जल्दी आता है क्योंकि फीडबैक तुरंत मिलता है और फिर आता है सबसे पावरफुल
27:13 ट्रिगर डीप फोकस। आज की दुनिया में जहां हर 5 सेकंड में एक नोटिफिकेशन ध्यान खींचता है, वहां डीप फोकस एक लग्जरी बन चुकी है। लेकिन जब आप डिस्ट्रैक्शन फ्री एनवायरमेंट में उतरते हैं, अपने फोन को साइलेंट करके सोशल मीडिया को बंद करके सिर्फ एक टास्क पर लग जाते हैं। तो दिमाग खुद को रिसेट करता है। और जैसे-जैसे मिनट्स गुजरते हैं, आप फ्लो की शुरुआत महसूस करने लगते हैं। फ्लो ट्रिगर्स आपकी जिंदगी बदल सकते हैं। क्योंकि फ्लो में आप सिर्फ तेज नहीं होते। आप स्मार्ट भी होते हैं, क्रिएटिव भी होते हैं और सबसे ज्यादा फुलफिल्ड भी। एक रियल एग्जांपल सुनिए। एक प्रोग्रामर था जो रोज सिर्फ 3 घंटे काम
27:58 करता था। लेकिन उन 3 घंटों में उसका फोकस इतना इंटेंस होता था कि वह दूसरों के 10 घंटे के बराबर आउटपुट देता था। क्यों? क्योंकि उसने फ्लोट ट्रिगर्स को सिस्टम में बदल दिया था। वह हर दिन वही रिचुअल्स फॉलो करता था। क्लियर टास्क, साइलेंट रूम, नो डिस्ट्रैक्शंस एंड डीप चैलेंज। फ्लो कोई गिफ्ट नहीं है। यह एक डिसिप्लिन है। और जब आप इन ट्रिगर्स को समझकर प्रैक्टिस करने लगते हैं, तब आपके दिन सिर्फ प्रोडक्टिव नहीं बल्कि एक्स्ट्राऑर्डिनरी बन जाते हैं। तो अब सवाल है क्या आप अपने फ्लो को सिर्फ चांस पर छोड़ेंगे? या अब आप जानबूझकर हर दिन उसे ट्रिगर करने की पावर हासिल करेंगे क्योंकि एक बार फ्लो आपके
28:44 कंट्रोल में आ जाए तो आपकी परफॉर्मेंस सिर्फ बेहतर नहीं होती वह लेजेंडरी बन सकती है। तो दोस्तों अब तक हमने जाना कि वह लोग जो अपनी दुनिया की सीमाओं को तोड़ते हैं जो असंभव को अपनी मुट्ठी में भर लेते हैं वह कोई जादू नहीं करते। उनके पास कोई अलौकिक शक्ति नहीं होती। उनके पास होता है एक अलग माइंडसेट, एक अलग डिसिप्लिन और सबसे जरूरी, एक अलग आग जो उन्हें ऑर्डिनरी से एक्स्ट्राऑर्डिनरी बनने की हिम्मत देती है। हमने समझा कि पैशन कैसे जन्म लेता है। फिरोसिटी को हैबिट कैसे बनाया जाता है। गोल्स को वेपन कैसे बनाया जाता है और लर्निंग, क्रिएटिविटी और फ्लो को कैसे हैक किया जाता है। यह कोई एक दिन की बात नहीं है।
29:30 यह एक पूरे सिस्टम की कहानी है जो हर उस इंसान के लिए बना है जो कहता है मैं रुकूंगा नहीं जब तक कर नहीं दिखाऊंगा। इस किताब ने हमें सिखाया कि अगर हम सही ट्रिगर्स, सही माइंडसेट और सही हैबिट्स के साथ चले तो इंपॉसिबल सिर्फ एक इल्लुजन है। आप और हम सबके अंदर वह ताकत है जो दुनिया को चौंका सकती है। फर्क सिर्फ इतना है कि कोई उस ताकत को एक्टिवेट करता है और कोई उसे पूरी जिंदगी सोने देता है। अब फैसला आपके हाथ में है। क्या आप फिर से उसी रूटीन में लौटेंगे या आज से अपने अंदर की उस स्लीपिंग जॉइंट को जगाएंगे जो हर चुनौती को जीत में बदल सकता है क्योंकि याद रखिए जो लोग असंभव को पॉसिबल बनाते
30:15 हैं वह हमसे अलग नहीं होते वह बस अपने आप से एक वादा ज्यादा करते हैं। अगर आपको यह वीडियो पसंद आया हो तो दिल से एक लाइक जरूर दीजिए। नीचे कमेंट करके बताइए कि आपको इस किताब की कौन सी बात सबसे ज्यादा पावरफुल लगी और अगर आप चाहते हैं कि हम ऐसी ही लाइफ चेंजिंग किताबों को इस तरह की डीप और इमोशनल स्क्रिप्ट्स में लाते रहें तो चैनल को अभी सब्सक्राइब करें और बेल आइकॉन दबाना मत भूलिए ताकि अगली बार जब हम कोई नया समरी लेकर आएं तो आप सबसे पहले देखें। मिलते हैं एक नई किताब, एक नई कहानी और एक नए सफर के साथ। तब तक याद रखिए इंपॉसिबल सिर्फ एक सोच है और सोच बदली जा सकती है। दिस इज बुक पीडिया जहां
31:02 किताबें सिर्फ पढ़ी नहीं जाती जी जाती हैं। धन्यवाद।