0:00 हेलो दोस्तों, क्या आप जानते हैं कि हम में से ज्यादातर लोग अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण फैसले बिना सोचे, समझे और जानेबूझे सिर्फ आदत, भावनाओं और भीड़ की नकल में ले लेते हैं। कभी-कभी हमें लगता है कि हम खुद के सोचने के तरीके को कंट्रोल कर रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि हमारी सोच के पीछे छुपे हैं। दर्जनों ऐसे मानसिक जाल, मेंटल ट्रैप्स जो चुपचाप हमारे निर्णयों को बिगाड़ते हैं और हम जानते भी नहीं। आज के इस वीडियो में हम लेकर आए हैं द आर्ट ऑफ थिंकिंग क्लियरली कि एक दमदार और दिल को झकझोड़ देने वाली बुक समरी। यह सिर्फ एक किताब नहीं है बल्कि आपकी सोच को साफ, तेज और बुद्धिमान बनाने की एक कुंजी है। आप जानेंगे कि
0:48 क्यों ज्यादातर लोग सिर्फ सफल लोगों की कहानियां देखकर गलत निर्णय ले बैठते हैं। क्यों हमारा दिमाग हर बार वही गलतियां दोहराता है और कैसे आप इन ट्रैप्स से बच सकते हैं। इस वीडियो को देखने के बाद आप अपनी सोच के उस चश्मे को साफ कर पाएंगे जिससे आप इस दुनिया को देखते हैं। तो चलिए शुरू करते हैं बुक पीडिया पर जहां किताबें बोलती हैं और सोच बदलती है। चैप्टर वन सर्वाइवरशिप बायस एक गहरी रात थी। आसमान में तारे चमक रहे थे लेकिन जमीन पर कुछ लोग अपनी आंखों में ऐसे सपने लिए बैठे थे जो हर किसी की किस्मत में नहीं होते। वो सपने कामयाबी के, शोहरत के, अमीरी के। कुछ लोग एक कप
1:33 चाय के साथ YouTube पर सक्सेस स्टोरीज देख रहे थे। किसी की आंखें ईलॉन मस्क की तरह चमक रही थी। कोई स्टीव जॉब्स जैसा बनने की सोच रहा था और किसी के दिल में बस यही सवाल था। अगर यह लोग कर सकते हैं तो मैं क्यों नहीं? लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि उन हजारों लाखों लोगों का क्या हुआ जो उसी रास्ते पर चले। लेकिन कहीं गुम हो गए जिनके नाम आज कोई नहीं जानता जिनकी कहानी कभी किसी टेड टॉक में नहीं सुनाई गई। वहीं से जन्म लेता है एक ऐसा मानसिक धोखा जो हमारे सोचने के तरीके को जड़ से हिला देता है। नाम है सर्वाइवरशिप बायस। आपने गौर किया होगा जब भी हम किसी सफल इंसान को देखते हैं तो हम उनकी मेहनत, लगन और काबिलियत पर ध्यान देते हैं। लेकिन हम भूल
2:20 जाते हैं उन अनगिनत लोगों को जिन्होंने वही किया। शायद उससे भी ज्यादा किया। लेकिन आज उनका नाम कहीं नहीं है। क्यों? क्योंकि हम सिर्फ उन लोगों को देख पाते हैं जो जिंदा बचे हैं जो सर्वाइव कर गए। जैसे एक युद्ध के मैदान में सिर्फ वह सैनिक दिखाई देते हैं जो वापस लौट आते हैं। हम उनकी कहानियों से सीखते हैं। उनके मेडल्स से प्रेरणा लेते हैं। लेकिन जो कभी लौटे ही नहीं। उनकी कहानियां इतिहास में दब जाती हैं। अब एक कहानी सुनिए। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका की एयरफोर्स ने एक मिशन चलाया। उन्होंने उन बम वर्षक विमानों की स्टडी की जो युद्ध से सही सलामत लौटे थे। हर प्लेन पर गोलियों के
3:06 निशान थे और इंजीनियर तय कर रहे थे कि अगली बार उन्हीं हिस्सों को और मजबूत बनाया जाए जहां गोलियां लगी थी। लेकिन तभी एक शांत आवाज आई। नहीं। हमें उन हिस्सों को मजबूत करना चाहिए जहां गोलियां नहीं लगी। सब चौंक गए। क्यों? क्योंकि जो विमान लौटे वह गोलियों के बावजूद बच गए। लेकिन जो नहीं लौटे शायद उन्हीं हिस्सों में गोली लगी थी जो अब तक अनटच्ड लग रहे थे। इसका मतलब हमें सिर्फ बच जाने वालों को देखकर निर्णय नहीं लेना चाहिए। वरना हम गलत दिशा में सोचते हैं। अब जरा सोचिए आपने कितनी बार किसी सक्सेसफुल यूबर की स्टोरी देखी है जिसने बताया मैंने कॉलेज छोड़ा एक साल तक वीडियो बनाए और आज मेरे
3:53 पास करोड़ों का एंपायर है। और आपने भी सोचा मुझे भी यही करना चाहिए। लेकिन क्या आपने देखा कि उन हजारों लोगों का क्या हुआ जिन्होंने कॉलेज छोड़ा वीडियो बनाए और फिर किसी जॉब के लिए हाथ फैलाते रहे। इसी भ्रम का नाम है सर्वाइवरशिप बायस। आप जिम जाते हैं और एक ट्रांसफॉर्मेशन वीडियो देखते हैं। एक लड़का 6 महीने में छह पैक बना चुका है। आप सोचते हैं मैं भी कर सकता हूं। लेकिन कोई नहीं बताता उन 100 लड़कों की कहानी जो 3 महीने में ही हार मानकर घर बैठ गए क्योंकि प्रोग्रेस नहीं हो रही थी। क्योंकि उनकी स्टोरी YouTube के लिए इंस्पायरिंग नहीं थी। असल में दुनिया को सिर्फ जीतने वालों की आदत है। पर जो लोग हारते हैं उनकी खामोशी में वह सच्चाई होती
4:40 है जिसे हम सुनना ही नहीं चाहते। अब सोचिए अगर आप एक किताब लिखना चाहते हैं और सोचते हैं जे के रोलिंग ने भी रिजेक्शन झेला और फिर दुनिया की सबसे बड़ी लेखिका बनी तो मैं भी बन सकता हूं। यह सोच प्रेरणादायक है। लेकिन अधूरी। आपने उन हजारों लेखकों को नहीं देखा जिनकी किताबें कभी छपी ही नहीं। जिनकी कहानियां कोई जानना नहीं चाहता। सर्वाइवरशिप बायस हमारे सपनों को अंधेरे में नहीं ले जाता लेकिन हमें एक झूठा उजाला दिखाता है। जिससे हम ठोकर खा बैठते हैं। इस दुनिया में हर सफल इंसान की कहानी के पीछे सैकड़ों अधूरी कहानियां दबी होती हैं। हमें सीखना चाहिए, समझना चाहिए। लेकिन
5:25 आंखें मुंह कर किसी का अनुकरण करना वह सबसे खतरनाक गलती हो सकती है। कभी-कभी सबसे बड़ी सीख हमें हारने वालों की चुप्पी में मिलती है ना कि जीतने वालों की चमक में। तो अगली बार जब आप किसी की सफलता से प्रेरित हो तो एक पल रुक कर सोचिए। मैं क्या पूरी तस्वीर देख पा रहा हूं या मैं सिर्फ उन चेहरों को देख रहा हूं जो मंच पर हैं। जबकि मंच के पीछे सैकड़ों गुमनाम चेहरे चीख रहे हैं। हम भी वही रास्ता चले थे। सोचिए क्या आप भी उन गुमनाम चेहरों में शामिल होना चाहेंगे जो सिर्फ किसी कहानी की छाया बन जाते हैं या आप उस इंसान की तरह बनना चाहेंगे जो सोच समझकर पूरी सच्चाई देखकर अपनी राह खुद चुनता है। अब फैसला आपका है दोस्तों अगर आप इस चैनल पर
6:12 नए हैं और अभी तक चैनल सब्सक्राइब नहीं किया है तो अभी करें। चैप्टर 2 कंफर्मेशन बायस सुबह के 8:00 बजे हैं। आपने मोबाइल उठाया, Instagram खोला और वहां एक पोस्ट थी। सपनों का पीछा करो। कॉलेज तुम्हें कुछ नहीं सिखाता। आपने तुरंत लाइक किया और मन में एक आवाज आई। देखा मैं जो सोच रहा था वही तो सही है। कुछ देर बाद आपने YouTube पर एक वीडियो देखा। एक लड़का बोल रहा था। मैंने स्कूल छोड़कर 3 साल में करोड़ों की कंपनी बना ली। और आप फिर मुस्कुरा दिए जैसे आपकी सोच को किसी ने हरी झंडी दे दी हो। लेकिन क्या आपने कभी यह महसूस किया है कि आप सिर्फ उन्हीं बातों को ज्यादा मानते हैं जो पहले से आपके मन में बैठी हुई होती
6:59 हैं और बाकी सारी बातें जिन्हें सुनना चाहिए जिनसे सीखना चाहिए। आप बस नजरअंदाज कर देते हैं। यहीं से शुरू होती है एक बेहद गहरी और खतरनाक मानसिक भूल कॉन्फर्मेशन बायस। यह वह चुपचाप चलने वाला खेल है जो हमारे दिमाग में रोज होता है। बिना शोर किए, बिना बताए और हम हर दिन उसमें हार रहे होते हैं। सिर्फ इसलिए क्योंकि हम सिर्फ अपनी सोच को ही सच मान बैठते हैं। अब सोचिए अगर आप मानते हैं कि आप भाग्यशाली हैं तो आपको हर छोटी चीज में अपनी किस्मत नजर आएगी। कोई रास्ता खाली मिल गया। देखो मैं कितना लकी हूं। लेकिन जिस दिन कुछ गलत हो गया तो आप कहेंगे शायद आज का दिन ही बुरा है। आप कभी
7:46 यह नहीं सोचते कि आपकी सोच ने ही आपको वह देखने पर मजबूर किया जो आप देखना चाहते थे। इंसान को सबसे ज्यादा खुशी तब मिलती है जब वह सुनता है। तुम सही थे। और सबसे ज्यादा तकलीफ तब होती है जब कोई कहे तुम गलत हो। इसी दर्द से बचने के लिए हम अपनी आंखें बंद कर लेते हैं और कॉन्फर्मेशन बायस हमारे लिए एक सुरक्षित चादर बन जाता है। मान लीजिए आपने ठान लिया कि शेयर मार्केट में पैसा लगाना बेवकूफी है। अब आप हर उस खबर को ढूंढेंगे जहां लोग पैसे गमवा चुके हैं। आपको राकेश झुनझुनवाला जैसे निवेशकों की बातें बकवास लगेंगी। आप हर बार वही उदाहरण खोजेंगे जो आपकी सोच को सही साबित
8:31 कर दें। अब जरा सोचिए क्या आप सीखना चाहते हैं या सिर्फ वही सुनना चाहते हैं जो पहले से जानते हैं। क्फर्मेशन बायस हमें हमारी ही सोच की जेल में कैद कर देता है। एक ऐसी जेल जिसकी दीवारें दिखती नहीं लेकिन जिसकी जकड़ सबसे मजबूत होती है। एक कहानी सुनिए। एक शहर में दो दोस्त रहते थे। अजय और विजय। अजय मानता था कि दुनिया बहुत बुरी है। लोग सिर्फ अपने मतलब के लिए अच्छे बनते हैं। और विजय सोचता था कि दुनिया में अच्छाई बाकी है। बस देखने का नजरिया चाहिए। अजय जब बाजार में गया और किसी ने उसे धक्का दिया तो उसने कहा देखा लोग कितने बुरे हो गए हैं। और विजय जब बाजार
9:17 में गया और किसी ने उसे रास्ता दिया तो उसने कहा देखो इंसानियत अब भी जिंदा है। सच क्या था? बाजार वहीं था। लोग वहीं थे। फर्क सिर्फ नजरिया देखने का था। कंफर्मेशन बायस ने दोनों की सोच को वैसा ही अनुभव दिया जैसा वह पहले से सोचते थे। इससे भी खतरनाक बात यह है कि कंफर्मेशन बायस अकेले नहीं आता। यह दोस्त लेकर आता है ईगो का, एोगेंस का और सबसे बुरा इग्नोरेंस का। हम सोशल मीडिया पर उन्हीं लोगों को फॉलो करते हैं जो हमारी तरह सोचते हैं। हम उन्हीं वीडियोस को लाइक करते हैं जो हमारे विचारों की पुष्टि करते हैं और फिर धीरे-धीरे हम उस एकको चेंबर में फंस जाते हैं जहां सब हमारी बात दोहराते हैं और
10:04 हमें लगता है कि पूरी दुनिया हमारी तरह सोचती है। लेकिन असल में हम दुनिया नहीं देख रहे होते। हम सिर्फ अपना प्रतिबिंब देख रहे होते हैं और जब कोई हमारे विचारों से अलग बात करता है, हम उसे काट देते हैं, अनफॉलो कर देते हैं, ब्लॉक कर देते हैं। क्यों? क्योंकि हमें वह सुनने की आदत नहीं जो हमें असहज करे। हमें बस वही सुनना पसंद है जो हमारे भीतर बैठे विश्वास को और मजबूत कर दे। लेकिन यहीं पर रुकना जरूरी है। अगर आप वाकई समझदार बनना चाहते हैं तो आपको उन विचारों से भी टकराना होगा जो आपकी सोच के विपरीत हो। क्योंकि सच्चा ज्ञान वहीं जन्म लेता है जहां विरोध होता है। जहां तकरार होती है। जहां मैं गलत भी
10:51 हो सकता हूं जैसी विनम्रता होती है। कॉन्फर्मेशन बायस एक मीठा जहर है। वह हमें तुरंत राहत देता है। लेकिन धीरे-धीरे हमारी सोच को संकीर्ण, अहंकारी और कमजोर बना देता है। तो अगली बार जब आप कोई वीडियो देखें, कोई खबर पढ़ें या किसी की बात सुने, एक पल रुकिए और खुद से पूछिए। क्या मैं यह इसलिए मान रहा हूं क्योंकि यह सच है या सिर्फ इसलिए क्योंकि मैं चाहता हूं कि यह सच हो। यही सवाल आपकी सोच को साफ करने की शुरुआत हो सकता है। चैप्टर थ्री सोशल प्रूफ। एक दोपहर आप किसी नए शहर की सड़कों पर अकेले घूम रहे हैं। भूख लग रही है। चारों तरफ रेस्टोरेंट्स की भरमार है। एक दुकान बिल्कुल खाली है चमचमाती
11:36 हुई। लेकिन अंदर कोई नहीं। और कुछ दूरी पर एक छोटा सा ढाबा है। भीड़ लगी है। लोग बाहर खड़े इंतजार कर रहे हैं। आप बिना ज्यादा सोचे सीधे उसी ढाबे की ओर बढ़ जाते हैं। क्यों? क्योंकि हमें लगता है अगर इतने लोग वहां जा रहे हैं तो वह जगह जरूर अच्छी होगी। यही है वह मानसिक जाल जो हम सबको दिन में ना जाने कितनी बार फंसा लेता है। सोशल प्रूफ। हम इंसानों की सबसे बड़ी ताकत है समाज में रहना। और यही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी भी है। जब हम खुद तय नहीं कर पाते कि क्या सही है तो हम दूसरों को देखने लगते हैं और वहीं से हमारी सोच दूसरों की भीड़ में खोने लगती है। सोचिए एक बिल्डिंग में आग लग गई है। अगर चार लोग
12:23 भाग रहे हो तो बिना आग देखे ही बाकी लोग भी दौड़ पड़ेंगे। लेकिन अगर सब शांत खड़े हो तो शायद आप भी सोचें कुछ नहीं हुआ होगा। भले ही अंदर धुआं भर चुका हो। अब आप कहेंगे यह तो इमरजेंसी सिचुएशन है। चलिए एक आसान सा उदाहरण लेते हैं। आप YouTube पर कोई वीडियो ढूंढ रहे हैं। दो वीडियो एक जैसे टाइटल वाले हैं। एक के 2 लाख व्यूज हैं। दूसरे के 300। बिना सोचे आप पहले वाले पर क्लिक करते हैं। क्यों? क्योंकि आपके दिमाग ने कहा अगर इतने लोग देख रहे हैं तो यह बेहतर होगा। हम इसे लॉजिक का नाम देते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि हम हर दिन यह मानने लगते हैं कि जो ज्यादा लोग कर रहे हैं वह सही है। भले ही वह गलती
13:10 ही क्यों ना हो। जैसे किसी मूर्खतापूर्ण ट्रेंड को फॉलो करना, बिना समझे किसी स्टॉक में निवेश करना, किसी धर्म या राजनीति के नाम पर झूठ फैलाना। बस इसलिए क्योंकि बाकी सब कर रहे हैं। एक कहानी याद आती है। एक आदमी शहर की मुख्य सड़क पर खड़ा होकर ऊपर आसमान की तरफ देख रहा था। शुरुआत में लोग हंसे लेकिन कुछ ही देर में वहां और लोग आकर खड़े हो गए। वो भी ऊपर देखने लगे। फिर कुछ लोग अपनी गर्दनें ऊपर कर मोबाइल कैमरा भी ऑन करने लगे। किसी ने पूछा नहीं। क्या हो रहा है? सब ने मान लिया। कुछ तो होगा। यह है सोशल प्रूफ जो हमें सोचने नहीं देता बल्कि सिर्फ दिखाता है कि सोचने की जरूरत नहीं। बाकी लोग जो
13:56 कर रहे हैं वही करो। अब सोचिए कितनी बार आपने भीड़ देखकर किसी दुकान से सामान खरीदा। कितनी बार आपने बिना रिव्यु पढ़े सिर्फ पाइप स्टार देखकर कोई प्रोडक्ट ले लिया या फिर कितनी बार किसी रील को सिर्फ इसलिए लाइक किया क्योंकि उसके लाखों लाइक्स थे। सोशल प्रूफ हमारा भरोसा छीन लेता है खुद पर और धीरे-धीरे हम दूसरों की भीड़ से अपनी पहचान तय करने लगते हैं। आपने कभी नोटिस किया जब कोई सेलिब्रिटी कुछ पहनता है तो वह फैशन बन जाता है। चाहे वह कपड़ा अजीब हो या बेमेल लेकिन लोग उसे अपनाने लगते हैं। क्यों? क्योंकि अगर वह कर सकते हैं तो शायद मुझे भी करना चाहिए। यह मानसिकता खतरनाक हो जाती है जब हम जिंदगी के बड़े फैसलों में भी सोशल प्रूफ
14:44 को गाइड मान लेते हैं। किस करियर को चुनना है, कहां शादी करनी है, कौन सी लाइफस्टाइल अपनानी है, हमारा डर अलग दिखने का, हमारा डर गलत साबित हो जाने का और हमारा लालच वैलिडेशन का। यह तीनों सोशल प्रूफ को और ताकतवर बनाते हैं। लेकिन हर बार भीड़ सही नहीं होती। टाइटेनिक के डूबने से पहले भी लोग डांस कर रहे थे और वह सब एक दूसरे को देखकर निश्चिंत हो रहे थे। किसी ने खुद जाकर नहीं देखा कि आइसबर्ग कितना बड़ा है और जब देखा तब बहुत देर हो चुकी थी। सोशल प्रूफ का मतलब यह नहीं कि आप अकेले चलें। लेकिन इसका मतलब यह जरूर है जब भी कोई फैसला लें तो सोें। क्या यह मैं खुद सोच
15:29 कर कर रहा हूं या सिर्फ इसलिए क्योंकि सब ऐसा कर रहे हैं क्योंकि अगर आप खुद नहीं सोचेंगे तो कोई और आपके लिए सोचेगा और तब आपकी जिंदगी किसी और की भीड़ में गुम हो जाएगी। अब जरा रुकिए और अपने आज के डिसीजंस को दोबारा देखिए। क्या उनमें से कोई डिसीजन ऐसा था जो सिर्फ इसलिए लिया गया क्योंकि बाकी सब यही कर रहे थे। अगर हां तो आज से उसे बदलिए क्योंकि सच्चा सोचने वाला वह होता है जो भीड़ में भी अपनी सोच को जिंदा रखे। चैप्टर फोर शंख कॉस्ट फैलेसी। सोचिए आप एक मूवी थिएटर में हैं। आपने ₹300 का टिकट खरीदा है। फिल्म शुरू होती है और पहले 15 मिनट में ही आपको
16:14 लगने लगता है। यह फिल्म तो बकवास है। लेकिन फिर भी आप उठते नहीं बाहर नहीं जाते। क्यों? क्योंकि आपके दिमाग में एक आवाज चल रही होती है। ₹300 दिए हैं। अब तो पूरी देखनी पड़ेगी। यही जन्म लेता है एक ऐसा मानसिक धोखा जो दिखता तो बड़ा समझदारी वाला है लेकिन अंदर ही अंदर हमें गलत फैसलों में बांधता चला जाता है। इसका नाम है संख कॉस्ट फैलेसी। कई बार हम किसी रिश्ते में होते हैं जो टूट चुका है जिसमें अब कोई वार्मथ नहीं बची ना समझदारी। लेकिन फिर भी हम टिके रहते हैं क्योंकि हमने उसमें सालों दिए हैं। हमारी भावनाएं, हमारी मेहनत, हमारी उम्मीदें सब कुछ लगा रखा है। हम सोचते हैं इतना कुछ दे
17:00 चुके हैं। अब छोड़ना बेवकूफी होगी। लेकिन सच्चाई यह है कि वहीं टिके रहना। असल बेवकूफी है। कभी आपने किसी प्रोजेक्ट पर महीनों लगाए हो और फिर आपको समझ आ जाए कि यह काम नहीं करेगा। लेकिन फिर भी आप उसे छोड़ नहीं पाते। क्यों? क्योंकि आपने उसमें ऑलरेडी इतना समय और ऊर्जा खर्च कर दी होती है कि अब पीछे हटना ईगो की हार लगती है। लेकिन क्या आपने सोचा है वो समय, वो पैसा, वो मेहनत जो आप पहले ही खर्च कर चुके हैं, वह अब कभी वापस नहीं आएगी। वो संख हो चुकी है। जैसे पानी में डूबा जहाज जो अब फिर नहीं उभरेगा। और अगर आप उसी के नाम पर आगे भी और नुकसान करते जाएं तो वह नुकसान सिर्फ बड़ा होता जाएगा। एक बार की
17:47 बात है। एक आदमी रेगिस्तान से गुजर रहा था। उसका ऊंट मर गया। लेकिन उसके पास इतना सामान था कि वह सोच नहीं पा रहा था। क्या छोड़ूं और क्या साथ ले जाऊं। हर चीज से उसका लगाव जुड़ा हुआ था। हर बोझ उसके पैसों से खरीदा गया था। वो आगे चलता गया। सामान नहीं छोड़ा। और कुछ ही किलोमीटर बाद डिहाइड्रेशन से उसकी जान चली गई। अगर उसने पहले ही अनावश्यक बोझ छोड़ दिया होता तो शायद आज वह जिंदा होता। हम भी ऐसा ही करते हैं। अपने डिसीजंस में, अपने रिश्तों में, अपने करियर में। हम सोचते हैं मैंने 3 साल इस कॉलेज में पढ़ाई की है। अब तो डिग्री लेकर ही छोडूंगा। भले ही वह कोर्स आपकी आत्मा को मार रहा हो या फिर मैंने इस
18:36 बिजनेस में लाखों डाले हैं। अब छोड़ दिया तो सब बेकार चला जाएगा। लेकिन जरा रुक कर सोचिए। क्या आप उसी रास्ते पर चलते रहेंगे जो सिर्फ अंधेरे में ले जाता है? सिर्फ इसलिए क्योंकि आपने उस रास्ते पर अब तक चलने में बहुत कुछ खोया है। क्या आप अपने भविष्य को भी उसी गलती के हवाले कर देंगे जो अतीत में हो चुकी है। संख कॉस्ट फैलेसी हमें गिल्ट का एहसास देता है कि अगर हम अभी पीछे हटे तो मानो सब कुछ व्यर्थ चला जाएगा। लेकिन जो व्यर्थ हो चुका है वह पहले ही हो चुका है। अब जरूरत है खुद को बचाने की, आगे की राह को बदलने की। सच तो यह है बहादुरी तब होती है जब आप यह स्वीकार करते हैं कि मैंने गलती की और फिर
19:22 उस रास्ते से वापस मुड़ते हैं क्योंकि वहीं से एक नई शुरुआत होती है। वहीं से असली बुद्धिमानी की पहचान होती है। तो अगली बार जब आप खुद को यह कहते हुए सुने अब तो बहुत पैसा लग चुका है। अब छोड़ना नहीं चाहिए। तो खुद से एक सवाल जरूर पूछिए। क्या मैं आगे नुकसान से बच रहा हूं या सिर्फ पुराने नुकसान को सही ठहराने की कोशिश कर रहा हूं? जवाब अगर सच्चे दिल से देंगे तो शायद आपकी जिंदगी की दिशा हमेशा के लिए बदल जाएगी। चैप्टर फाइव हैंडसाइड बायस। एक दोपहर की बात है। बारिश हो रही थी। खिड़की के बाहर पानी की बूंदे लगातार शीशे पर गिर रही थी। कमरे में बैठे दोस्त चाय पी रहे थे और एक बड़ा मैच टीवी पर चल
20:07 रहा था। आखिरी ओवर, आखिरी बॉल और तभी चौका लग गया। टीम जीत गई। एक दोस्त बोला, मैंने तो पहले ही कहा था यही प्लेयर मैच जिताएगा। दूसरे ने मुस्कुरा कर पूछा, "कब कहां था?" पहला बोला, "यार, पहले ही पता था मुझे। इसका अंदाजा था। ऑब्वियस था। लेकिन सच्चाई यह थी कि उसने ऐसा कुछ नहीं कहा था। उसे भी नहीं पता था क्या होने वाला है। यही हैसाइड बायस। एक ऐसा भ्रम जो हर किसी को कभी ना कभी जरूर होता है और सबसे खतरनाक बात यह है कि हमें इसका एहसास भी नहीं होता। हम सोचते हैं मुझे पहले ही लग रहा था कि यह होने वाला है। लेकिन सच्चाई हम सिर्फ बाद में जानकर उस जानकारी
20:54 को अपने भूतकाल के अनुभव में फिट करने लगते हैं। हम मान लेते हैं कि हमें पहले से पता था जबकि असल में हमें नहीं पता था। हम उस वक्त भी उतने ही अनजान थे जितना कोई और इसे समझने के लिए एक और कहानी सुनिए। एक लड़की एमबीए कर रही थी। उसे दो जॉब ऑफर मिले। एक बड़ी कंपनी से और एक स्टार्टअप से। सब ने उसे कहा बड़ी कंपनी सेफ है। वही जॉइ करो। लेकिन उसने रिस्क लिया और स्टार्टअप ज्वाइन किया। 2 साल बाद वो स्टार्टअप यूनिकॉर्न बन गया और वह लड़की करोड़ों की मालकिन बन गई। अब वही लोग कहते हैं हमें तो पता था यह लड़की कहीं ना कहीं धमाका करेगी। लेकिन 2 साल पहले वही लोग उसे पागल कह रहे थे। क्यों? क्योंकि नतीजा
21:40 सामने आ चुका है। और जब नतीजा सामने होता है तो हमारा दिमाग बड़ी सफाई से पीछे की कहानी को नया रूप दे देता है। जैसे सब कुछ पहले से तय था। हैंडसाइट बायस। हमारे दिमाग को धोखे का चश्मा पहना देता है जिससे हम अपनी ही समझ को ओवरएस्टीमेट करने लगते हैं। हम सोचते हैं मैं तो पहले से होशियार था। मुझे तो सब मालूम था। पर जब वही चीज घट रही होती है तब हम भी डर, संदेह और भ्रम से जूझ रहे होते हैं। यही बायस हमें सबसे ज्यादा नुकसान तब पहुंचाता है जब हम सीखने की कोशिश करते हैं। अगर हमें लगता है कि हमें सब पहले से पता था तो हम कुछ नया सीख ही नहीं सकते। हम हर गलती को ऑब्वियस मान लेते हैं। जबकि असल
22:28 में वह ऑब्वियस नहीं थी। वह सिर्फ हैंड साइड में साफ लग रही है। सोचिए एक स्टॉक गिर गया। हम कहते हैं यह तो गिरना ही था। इसका तो पहले से पता था। पर जब वही स्टॉक दो दिन पहले उछल रहा था तब कोई नहीं बोल रहा था। अब यह गिरेगा। एक एक्सीडेंट हुआ तो हम कहते हैं इस रोड पर तो पहले भी हादसे हुए हैं। किसी ने ध्यान क्यों नहीं दिया? हम इतिहास को ऐसे देखते हैं जैसे वह एक सीधी रेखा थी जिसकी दिशा पहले से तय थी। लेकिन हकीकत यह है कि भविष्य हमेशा धुंधला होता है। उसमें अनिश्चितता होती है, डर होता है, कंफ्यूजन होता है। और जो इंसान यह मान ले कि उसे सब पता था, वह ना तो खुद से सीख सकता है, ना दूसरों से।
23:16 हाइडसाइट बायस ना सिर्फ हमारे सोचने के तरीके को प्रभावित करता है बल्कि यह हमारी दूसरों की गलतियों के प्रति समझ को भी मार देता है। हम कह देते हैं इसने गलत फैसला लिया जबकि यह तो साफ था कि ऐसा होगा। पर क्या सच में जब वह इंसान उस मोड़ पर खड़ा था तब क्या उसका रास्ता वाकई इतना साफ था? हर कोई अपने टाइमलाइन में अंधेरे में चल रहा होता है। हमें रास्ता तभी दिखता है जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं। इसलिए सच्ची समझदारी तब है जब हम अपनी पुरानी सोच को ईमानदारी से देख पाएं ना कि उसे अपनी आज की जानकारी से रंग दें। तो अगली बार जब आप कहें मुझे पहले से पता था तो एक पल रुकिए
24:01 और खुद से पूछिए क्या सच में या यह सिर्फ मेरा दिमाग मुझे जीत दिलाने की कोशिश कर रहा है? क्योंकि जो इंसान यह मान ले कि वह हमेशा सही नहीं था, वही आगे जाकर सबसे ज्यादा समझदार बनता है। चैप्टर सिक्स लॉस वर्जन एक आदमी था। नाम था रोहन। उसकी जिंदगी में सब कुछ ठीक चल रहा था। एक स्टेडी जॉब, परिवार, सेविंग्स और एक सिंपल सा सपना अपनी खुद की दुकान खोलने का। सालों से वह पैसे बचा रहा था। रिसर्च कर रहा था। प्लान बना रहा था। और जब आखिरकार वह दिन आया जब वह अपने सपने की शुरुआत कर सकता था तो उसने रुक जाने का फैसला किया। क्यों? क्योंकि अगर दुकान नहीं चली तो कहीं सारी जमा पूंजी चली गई तो कहीं लोग
24:48 पसंद ना करें तो उसका दिमाग बार-बार सिर्फ एक ही चीज सोच रहा था। अगर मैंने खो दिया तो क्या होगा? यहीं से जन्म लेता है एक बेहद गहरा मानसिक जाल। लॉस अवर्जन। हम इंसान किसी चीज को पाने की खुशी से ज्यादा उसे खोने का डर महसूस करते हैं। और यही डर हमें कई बार अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी संभावनाओं से दूर कर देता है। रोहन अकेला नहीं है। हम सभी कभी ना कभी उस मोड़ पर खड़े होते हैं जहां दो रास्ते होते हैं। एक जो शायद हमें बहुत कुछ दे सकता है और दूसरा जो हमें नुकसान से बचा सकता है। और ज्यादातर बार हम उस रास्ते पर जाते हैं जो सुरक्षित लगता है। भले ही वह हमें कहीं ना
25:34 ले जाए। सोचिए किसी ने आपको कहा यह सिक्का उछालो। अगर हेड आया तो आवर्स मिलेंगे। लेकिन अगर टेल आया तो आर्स 500 देने होंगे। आपका मन क्या कहेगा? ज्यादातर लोग मना कर देंगे। क्योंकि हारने का डर जीतने की उम्मीद से ज्यादा भारी लगता है। आर000 कमाने की खुशी आरना खोने के डर के सामने फीकी लगती है। यह है लॉस वर्जन वो मनोवैज्ञानिक ताकत जो हमारे फैसलों को डर के इर्द-गिर्द बांध देती है। एक बच्चा भी जब खेल में हारता है तो वह उस हार को दिनों तक महसूस करता है। लेकिन अगर वही बच्चा जीत जाए तो खुशी बस कुछ मिनटों की होती है। क्यों? क्योंकि हमारा दिमाग
26:19 नुकसान को थ्रेट की तरह देखता है। यह हमें असुरक्षित महसूस कराता है और इंसान की सबसे गहरी बायोलॉजिकल प्रोग्रामिंग यही है खुद को बचाना। लेकिन यहीं पर सबसे बड़ा सवाल उठता है। क्या हम सिर्फ इसलिए अपने सपनों से पीछे हट जाएं क्योंकि कहीं हम कुछ खो सकते हैं? अगर हर बड़ा काम करने से पहले हम सिर्फ यह सोचते कि अगर नुकसान हो गया तो तो दुनिया में कोई नई चीज बन ही नहीं पाती। कोई भी लेखक किताब नहीं लिखता। कोई भी बिजनेसमैन शुरुआत नहीं करता। कोई भी प्यार में नहीं पड़ता। अगर लॉस को ही हम जीवन का गाइड बना लें। पर यहीं एक और सच छिपा है। हम हर नुकसान से नहीं डरते। सिर्फ खास नुकसान से डरते हैं जो हमारी
27:04 पहचान को हिला दे। हमारी इज्जत को तोड़ दे या फिर हमारे ईगो को चोट पहुंचाए। सोचिए कोई अपने टॉक्सिक रिश्ते में इसलिए पड़ा रहता है क्योंकि अगर वह रिश्ता टूटा तो लोग क्या कहेंगे या फिर इसलिए कि इतने साल दे दिए अब छोड़ दिया तो सब बेकार चला जाएगा। हम चीजें नहीं छोड़ते क्योंकि हमने उन्हें पाने में बहुत कुछ खर्च कर दिया होता है। वक इमोशन पैसा पहचान लॉस वर्जन हमारी यादों में इतना गहराई से बैठ चुका होता है कि हम भविष्य की संभावना की जगह अतीत के निवेश से बंधे रहते हैं। लेकिन अगर हर डर को आप सच मान लेंगे तो आप कभी आगे नहीं बढ़ पाएंगे। लॉस वर्जन को समझने
27:50 और उससे ऊपर उठने के लिए हमें खुद से एक सीधा सवाल पूछना होगा। क्या मैं इस फैसले से पीछे हट रहा हूं क्योंकि वह सही नहीं है या सिर्फ इसलिए क्योंकि मैं नुकसान से डर रहा हूं। जवाब अगर ईमानदारी से देंगे तो आपको समझ आ जाएगा कि ज्यादातर बार आप उस दरवाजे को खोलने से डरते हैं जिसके पीछे पूरी जिंदगी आपका इंतजार कर रही होती है। तो अगली बार जब जिंदगी आपको कोई मौका दे तो सिर्फ यह सोच कर पीछे मत हटिए। अगर मैं हार गया तो कभी यह भी सोचिए अगर मैंने यह मौका खो दिया तो क्योंकि असली नुकसान वो नहीं होता जो हमारे पास है और चला जाता है। असली नुकसान वो होता है जो हमारे पास आ सकता था। पर हमने डर के कारण उसे अपनाया
28:35 ही नहीं। चैप्टर से हेलो इफेक्ट। एक लड़की कॉलेज के पहले दिन क्लास में दाखिल होती है। उसका चेहरा शांत है। कपड़े सलीके से पहने हुए हैं। चाल में आत्मविश्वास है। मुस्कान सौम्य है। क्लास के बाकी छात्र उसे पहली ही नजर में पसंद करने लगते हैं। कोई सोचता है यह तो जरूर टॉपर होगी। कोई कहता है बहुत कल्चरर्ड लगती है। कुछ लड़के उसे स्मार्ट, सिंसियर और इंटेलिजेंट समझने लगते हैं। बस पहली झलक से। लेकिन किसी को नहीं पता कि वह पढ़ाई में औसत है। घर में टूटे हुए रिश्तों से जूझ रही है और कॉलेज में बस खुद को दोबारा ढूंढने आई है। अब सोचिए इतना सब कुछ सिर्फ उसके चेहरे, चाल और मुस्कान से क्यों मान लिया गया? यही है हेलो इफेक्ट। एक ऐसा
29:23 भ्रम जो हमारी सोच को एक सुंदर मुखौटे के पीछे छिपे सच से भटका देता है। हेलो इफेक्ट का मतलब है अगर किसी इंसान का एक गुण हमें अच्छा लगता है तो हम मान लेते हैं कि उसके बाकी सारे गुण भी वैसे ही अच्छे होंगे। किसी का लुक अच्छा है तो हम मान लेते हैं कि वह समझदार भी होगा, ईमानदार भी होगा, मेहनती भी होगा। किसी की इंग्लिश शानदार है तो हम सोचते हैं यह तो बहुत इंटेलिजेंट होगा। किसी की सोशल मीडिया प्रोफाइल एस्थेटिक है तो हम सोचते हैं यह जरूर खुशहाल जिंदगी जी रहा होगा। लेकिन सच्चाई क्या होती है? हो सकता है वही सुंदर चेहरा दूसरों का इस्तेमाल करता हो। वही पॉलिश्ड एक्सेंट वाला इंसान आपकी
30:09 पीठ पीछे आपकी बेइज्जती करता हो और वही परफेक्ट दिखने वाली जिंदगी अंदर से पूरी तरह खाली हो। हेलो इफेक्ट एक तरह का मानसिक शॉर्टकट है। हमारा दिमाग पूरी सच्चाई जानने की मेहनत नहीं करना चाहता। वह चाहता है जल्दी फैसला लेना और अगर उसे कुछ अच्छा दिख गया तो वह बाकी सब कुछ वैसा ही मान लेता है। एक इंटरव्यू में अगर उम्मीदवार स्मार्टली ड्रेस्ड है, अच्छे से मुस्कुरा रहा है और आत्मविश्वास से बोल रहा है तो इंटरव्यूअर अक्सर यह मान लेते हैं कि वह जॉब के लिए परफेक्ट होगा। भले ही उसकी स्किल्स औसत हो। किसी प्रोडक्ट की पैकिंग अगर दमदार है तो लोग खरीद लेते हैं बिना इंग्रेडिएंट्स पढ़े। क्योंकि पैकिंग
30:55 देखकर दिमाग कहता है, यह चीज अच्छी होगी। हेलो इफेक्ट हमें धोखा नहीं देता। हम खुद को धोखा दे देते हैं। अब सोचिए आपने कितनी बार सिर्फ इसलिए किसी को पसंद किया क्योंकि वह अच्छा दिखता था या फिर आपने किसी से पहली ही मुलाकात में यह तय कर लिया कि वह भरोसेमंद है। सिर्फ इसलिए क्योंकि उसकी आंखों में मासूमियत थी। हम इंसानों को लेबल्स पसंद है। हम चीजों को जल्दी कैटेगराइज करना चाहते हैं। यह अच्छा है, यह बुरा है, यह काबिल है, यह बेकार है। लेकिन इंसान किसी एक क्वालिटी से परिभाषित नहीं हो सकता। अच्छाई एक चेहरे से नहीं टपकती और बुराई हमेशा गंदे लिबास में नहीं आती। हेलो इफेक्ट का सबसे बड़ा
31:40 नुकसान यह है। हम किसी की एक क्वालिटी से प्रभावित होकर उसके फ्लॉस को नजरअंदाज कर देते हैं। एक बार की बात है। एक स्कूल में नया टीचर आया। दिखने में शार्प, एक्सेंट, शानदार, बातें मन मोह लेने वाली। पहले हफ्ते में ही बच्चे, माता-पिता और बाकी स्टाफ ने उसे पसंद करना शुरू कर दिया। पर धीरे-धीरे सामने आने लगा कि वह बच्चों के डाउट्स अनदेखा करता है। क्लास की असल जरूरतों से कटा कटा रहता है। लेकिन तब भी लोग बोले अरे नहीं वो तो बहुत अच्छा टीचर है। इतना चाम है उसमें। वो चाम जो सच्चाई को ढक रहा था। हेलो इफेक्ट का जाल सिर्फ दूसरों के लिए नहीं हमारे खुद के लिए भी खतरनाक होता है। अगर किसी ने एक बार हमें
32:27 स्मार्ट कहा तो हम मान लेते हैं कि हम हर चीज में स्मार्ट हैं। और जब कोई हमारी किसी गलती की तरफ इशारा करता है तो हमें बुरा लगता है। ईगो हर्ट होती है। क्यों? क्योंकि हमने खुद को एक इमेज में बांध लिया होता है और जब कोई उस इमेज को तोड़ता है तो हमें खुद से डर लगने लगता है। इसलिए अगली बार जब आप किसी को देखकर या सुनकर उसके बारे में कोई फैसला लें तो एक पल रुकिए। सोचिए क्या मैं इस इंसान को पूरी तरह जानता हूं या सिर्फ उसकी किसी एक चीज से इतना प्रभावित हूं कि बाकी सब क्वालिटीज मैं खुद ही जोड़ रहा हूं। क्योंकि हर चमकती चीज सोना नहीं होती और हर मुस्कुराता चेहरा खुश नहीं होता। कंक्लूजन कभी आपने गौर किया है कि हम दिन
33:13 भर फैसले लेते रहते हैं। छोटे, बड़े, जरूरी, बेवजह। लेकिन इन फैसलों के पीछे जो असली कहानी चलती है, वह हमारी सोच के तरीके में छुपी होती है। द आर्ट ऑफ थिंकिंग। क्लियरली सिर्फ एक किताब नहीं है। यह एक दर्पण है जो हमें हमारे अंदर छिपी उन मानसिक गलतियों को दिखाता है जिन्हें हम हर दिन दोहराते हैं और अनजाने में खुद को ही नुकसान पहुंचाते हैं। चाहे वह सर्वाइवरशिप बायस हो जो हमें सिर्फ जीतने वालों की कहानी दिखाता है या कंफर्मेशन बायस जो हमें वही सुनने पर मजबूर करता है जो हम पहले से मानते हैं या फिर लॉस एवर्जन जो हमें डर के कारण सपनों से दूर कर देता है इन सभी बायसीज में एक
33:59 बात समान है यह हमारे सोचने की शक्ति को चुपचाप अंदर से खोखला करते हैं और जब तक हमें इनका पता नहीं चलता हम समझते रहते हैं कि हम बहुत सही सोच रहे हैं। जबकि असल में हम एक इल्लुजन में जी रहे होते हैं। लेकिन इस किताब ने हमें वह चाबी दी है जिससे हम अपनी सोच की असल जड़ को खोल सकते हैं। अब जब आप अगली बार कोई फैसला लें तो सिर्फ दिमाग से नहीं जागरूकता से सोचिए क्योंकि साफ सोच वही है जो बायस से ऊपर उठकर सच्चाई को खुले दिल और खुले दिमाग से देख सके। आपकी जिंदगी में क्लेरिटी तभी आएगी जब आप खुद की सोच पर सवाल करना सीख जाएंगे। तो चलिए अब जब आप इस वीडियो से जा रहे हैं तो एक सवाल लेकर जाएं। मैं अपनी
34:46 सोच को कितना साफ देख पा रहा हूं। अगर यह सवाल आपके अंदर कुछ हिला गया है तो समझिए आपने किताब नहीं पढ़ी। आपने खुद को पढ़ा है। अगर आपको यह वीडियो पसंद आया तो इसे लाइक करें। कमेंट में अपनी राय जरूर बताएं और ऐसे ही जीवन बदलने वाली किताबों की गहराई तक पहुंचने के लिए बुक पीडिया को अभी सब्सक्राइब करें क्योंकि यहां किताबें बोलती हैं और सोच बदलती है। मिलते हैं अगले वीडियो में एक नई किताब के साथ। तब तक के लिए सोचिए साफ समझिए गहराई से। धन्यवाद।