100 करोड़ कमा लो, फिर भी सुकून नहीं मिलेगा — क्यों? || आचार्य प्रशांत, मंथन (2026)

संक्षिप्त सारांश

इस वीडियो में आचार्य प्रशांत ने जीवन के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की है, जिसमें जिम्मेदारी, प्रेम, पहचान, स्वतंत्रता, स्वयं को देखना, और अनुभव बनाम समझ की बातें शामिल हैं। उन्होंने यह बताया है कि जीवन के सत्य और अनुभवों का गहरा संबंध है और हमें अपने अहंकार को पहचानने और समझने की आवश्यकता है।

  • समझना कि जिम्मेदारी क्या होती है और यह कैसे हमारी स्वतंत्रता को बाधित करती है।
  • प्रेम और आसक्ति के बीच का अंतर और अपनी आंतरिक स्वाभाव को पहचानना आवश्यक है।
  • व्यक्तिगत पहचान के पिंजरे से मुक्त होकर आत्मज्ञान प्राप्त करना संभव है।

किसके प्रति जिम्मेदार?

आचार्य प्रशांत ने चर्चा की है कि हम अपनी जिम्मेदारियों को कैसे समझते हैं और ये जिम्मेदारियां हमें किस हद तक स्वतंत्रता से दूर कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि अगर आपकी जिम्मेदारियां आपकी आंतरिक सच्चाई से मेल नहीं खातीं, तो वे केवल भ्रम पैदा करती हैं। उन्होंने यह भी बताया कि अहंकार के कारण हम कुछ झूठी जिम्मेदारियों में फंसे रहते हैं।

प्रेम या आसक्ति?

इस अनुभाग में आचार्य प्रशांत ने प्रेम और आसक्ति के बीच के विभाजन पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने कहा कि अधिकांश लोगों को प्यार के नाम पर केवल आसक्ति होती है, जो उनके अहंकार को बढ़ावा देती है। प्रेम का वास्तविक अर्थ है आत्म-अन्याय से मुक्ति पाना, जबकि आसक्ति केवल स्वार्थ की पूर्ति होती है।

उधार की मान्यताएँ

यहां आचार्य ने बताया कि कई मान्यताएँ हमें दी जाती हैं जो हमारी पहचान को प्रभावित करती हैं। ये मान्यताएँ अक्सर दूसरों द्वारा निर्धारित होती हैं और हमें अपने वास्तव में होने से काटती हैं। हमें चाहिए कि हम अपने विश्वासों की जड़ें खोजें और समझें कि क्या वे हमारे दृश्यता को प्रभावित कर रहे हैं या नहीं।

पहचान का पिंजरा

इस भाग में, आचार्य ने बताया कि कैसे पहचान की अवधारणाएँ हमें सीमित कर सकती हैं। उन्होंने जोर दिया कि पहचान केवल बाहरी चीजों से नहीं बनती है, बल्कि हमारी आंतरिक स्वाभाव का हिस्सा होना चाहिए। हमें अपने आत्म को खोजने और पहचान के पिंजरे से मुक्त होने की आवश्यकता है।

आज़ादी की दिशा

आचार्य ने स्वतंत्रता की आवश्यकता और उसे पाने के तरीके के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि यदि हम अपने भीतर की बेचैनी को समझने की कोशिश करें, तो हम वास्तविक स्वतंत्रता पा सकते हैं। उन्होंने कहा कि निरंतर दौड़ते रहने से हम स्वतंत्रता नहीं पा सकते; इसे समझना और गहराई में जाना आवश्यक है।

स्वयं को देखना

इस अध्याय में, आचार्य ने आत्मावलोकन की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि हमें अपने भीतर के अहंकार को पहचानने की जरूरत है ताकि हम अपने सत्य को समझ सकें। आत्मवत्सलता और अपनी असली पहचान को जानना ही आत्मा के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।

तथ्य से सत्य तक

यहां, आचार्य ने तथ्यों और सत्य के बीच भेद को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि केवल तथ्य जानने से हमें सत्य की प्राप्ति नहीं होती है। हमें अपने अनुभवों को समझना होगा ताकि हम सही ज्ञान और सिद्धांत प्राप्त कर सकें।

अनुभव बनाम समझ

आचार्य ने बताया कि अनुभव और समझ के बीच का अंतर महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि केवल अनुभव करने से कुछ सीखना नहीं होता है, बल्कि उसे समझना भी आवश्यक है। वास्तविक समझ वही होती है जो अनुभवों को सही तरीके से आत्मसात करती है।

युवा को संदेश

आचार्य ने युवाओं के लिए संदेश दिया कि उन्हें अपने ज्ञान और प्रेम का उपयोग करके अपनी पहचान और दुनिया को समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि युवा समाज के लिए महत्वपूर्ण हैं और उन्हें अपने भीतर की सच्चाई को पहचानकर आगे बढ़ना चाहिए।

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Transcript

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0:00 प्लीज टू हैव एन एप्रोड फॉर आचार्य प्रशांत जी नाउ ही इज ऑन स्क्रीन। ही इज सिटी ओवर देयर। आचार्य जी नमस्कार। नमस्कार। द ओनली फिलोसोफर एक्सिस्टिंग इन आवर कंट्री। देयर इज सो मेनी फॉलो एंड वी आर ग्लैड टू सी इट इन द एक्सिस्टिंग। द मिलियंस ऑफ यूथ आर ट्रैकिंग यू, लिसनिंग यू, क्रिएटिंग योर वर्ड्स, कोटिंग योर कोटेशंस। सो कहीं ना कहीं ऐसा लगता है कि यूथ लिसन आचार्य प्रशांत। मेरे पास मेरा कंपनी का सीईओ बैठे हुए हैं। अगर मेरा सेल्स ग्राह को 100 करोड़ का एक्स्ट्रा टारगेट लेना है। कैन ही डील दैट टारगेट विदाउट ईगो? आपका टारगेट यह है कि आपके सीईओ आपसे प्रसन्न रहे। लेकिन वो भी आपका प्राइमरी टारगेट नहीं है। आप अपने सीईओ को प्रसन्न रख के कुछ और पाना चाहते हैं। लेकिन आप अपने सीईओ को कितना भी प्रसन्न रख लें।

0:47 आपके सीईओ आपको कभी वो नहीं दे सकते जो आपका केंद्रीय टारगेट है। आपके सीईओ में क्या दुनिया के किसी सीईओ में वो क्षमता नहीं कि आपको वो दे दे जिसके लिए आप सचमुच प्यासे हो। हम सबका एक ही टारगेट है। किसी तरह ब्रह्मा सत्य जगत मिथ्या अहम ब्रह्मस्म। ये सब कुछ अगर झूठ है। व्हाट अबाउट दी प्रोडक्टिविटी आपकी नजर से। ये नहीं कहा जा रहा है कि आप तो सत्य हो और आपके चारों ओर जो जगत है वो झूठा है। जगत ही मिथ्या है। तो जो जगत का अनुभता है फिर उसमें कुछ खोट है। उसमें कुछ गड़बड़ है। गीताकार कहते हैं कि कर्तव्य तो नासमझी की सजा है। जो लोग चाहते हैं कि आप झूठी जिम्मेदारियों में फंसे रहे वो आपको सत्य के निकट जाने नहीं देना चाहते।

1:33 थैंक यू आचार्य जी। अब हम दूसरा पड़ाव में चलते हैं। एक ही चीजों में इतना बहुत हो गया। बट तो इतना सब्जेक्ट से आप थोड़े से निराश लग रहे हैं मेरे उत्तरों से। मैं निराश नहीं हूं। मैं सोच रहा हूं कि मैं आपका कौन सा लाइन को कोट करूं। मैं मुक्ति के बारे में सोचती ही नहीं हूं। फिर कैसे कहा जा सकता है कि हम सब किसी ना किसी तरह आजादी के लिए जी रहे हैं। वो करते रहते हैं जो हम करते हैं। कोई इधर को दौड़ रहा है, कोई उधर को दौड़ रहा है, कोई कूद रहा है। कोई किसी रिश्ते में घुस रहा है, कोई किसी नौकरी में घुस रहा है। यह अपनी बेचैनी को अनुभव करने के कारण ही है। मेनी पीपल्स आर सेइंग विदाउट डूइंग पूजा, आई नेवर टेक अ ड्रॉप ऑफ वाटर। यह उनका अहंकार है या समर्पण? पूजा करे बिना जल की बूंद भी ना लेना।

2:19 प्लीज टू हैव एन एप्ल फॉर आचार्य प्रशांत जी नाउ ही इज ऑन स्क्रीन ही इज सिटी ओवर देयर आचार्य जी नमस्कार। नमस्कार। ऑन बिहाफ ऑफ एव्री ऑडियंस सिटी ओवर हियर फ्रॉम प्रार्थना टीवी एंड ओसा टेलीविज़। हमें खैर कि आपको इन पर्सन इस मंच पे हमें नहीं मिले आप बट एनीवे हम आपके साथ जुड़ गए हैं। आई एंड आई वांटेड टू कम देयर वर देयर वर प्रिपरेशंस बीइंग मेड आई वांटेड टू कम एंड नॉट ओनली दिस इवेंट देयर वर अ कपल ऑफ मोर इवेंट्स शेड्यूल्ड एट भुवनेश्वर बट द कंडीशंस हियर दे जस्ट डिडट अलाउ मी। सो जस्ट फ्यू डज़ बिफोर द डिपार्चर द प्लांस

3:06 हैड टू बी चेंज्ड। सो आई रियली वांटेड टू बी देयर बट आई एम ग्लैड आई एम इंटरेक्टिंग वि द ऑडियंस ऑन द स्क्रीन एंड थैंक यू फॉर इनवाइटिंग मी। मेरा पास आपकी किताब है आचार्य जी। जी मैं इस ये किताब से पहले औदित डेली लाइफ पढ़ चुका था। देन कैन यू से दैट इट इज अ मॉडर्न गीता ऑफ नाउ डेज क्योंकि यहां जितना कुछ लोग आए थे सबके हाथ में यह किताब था। नहीं देखिए श्रीमद् भगवत गीता तो एक ही है और अनूठी है। तो ये दृष्टता तो मैं नहीं करूंगा कि भगवत गीता के सम्मुख

3:54 इस किताब को रखूं या किसी भी और किताब को रखूं। लेकिन हां भगवत गीता वेदांत अद्वैत दर्शन और जितने भी प्राचीन से लेकर आधुनिक दर्शन हैं वो आज के इंसान को क्या संदेश देते हैं और आज के मनुष्य के लिए कैसे उपयोगी हो सकते हैं। वह रस मैंने इस किताब में निचोड़ना चाहा है। तो इस किताब

4:40 का संदर्भ अलग है, काल अलग है, आयाम अलग है और कोशिश मेरी यह रही है कि इसमें जो सब प्रकरण है, अध्याय हैं, चैप्टर्स छोटे संक्षिप्त रखे जाएं। ताकि आज हम जैसे हैं जैसा हमारा मन है ध्यान देने की हमारी जो क्षमता है जो अटेंशन स्पैन है जो आज की हमारी समस्याएं हैं उनको यह किताब संबोधित कर सके। धन्यवाद। मैं बात आगे बढ़ाने से पहले आपको पहले बधाई देता हूं कि 60 मिलियन से ज्यादा सब्सक्रिप्शंस आपके फॉलोअर्स आज

5:28 क्रश कर चुके हैं। वी कैन हैव अ क्लब फॉर आवर दी। द ओनली फिलोसफर एकिस्टिंग इन आवर कंट्री। देयर इज सो मेनी फॉलोअर्स फॉर इट। एंड वी आर ग्लैड टू सी इट इन द एकिस्टिंग। द मिलियंस ऑफ यूथ आर ट्रैकिंग यू, लिसनिंग यू यू नो डेकोरेटिंग योर वर्ड्स, कोटिंग योर कोटेशंस। सो कहीं ना कहीं ऐसा लगता है कि यूथ लिसन आचार्य प्रशांत। अब मेरा सवाल यह रहा यह मेरा पर्सनल सवाल है कि ऑन ए सेंचुरी शंकराचार्य ने बड़ा उद्घोषक होके बात किया कि ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या अहम ब्रह्मस्म एंड हम 10 साल पहले एक धारावाहिक

6:13 प्रिपेयर किए थे ऑन श्री शंकराचार्य इन आवर जीसी चैनल सो तभी मुझे थोड़ा सौभाग्य मिला था कि उस उनका जो अद्वैत का लाइंस है थोड़ा समझने के लिए और यह जो किताब है यह भी आपने यहां लिखने के लिए लिख रखे हैं कि दिस बुक इज फॉर दोज़ टायर्ड ऑफ स्वीट लाइज वी आर फेब्रिकेटिंग लाइकोरेटिंग लाइज वी आर टॉकिंग अबाउट लाइज ये सब कुछ अगर झूठ है इलुजन है तो हम लोग सब जो यहां बैठे हुए हैं हर किसी के लिए टारगेट का सवाल है, रेवेन्यू का सवाल है, करियर का सवाल है, फैमिली का सवाल है। सो ये सारे चीज को अगर हम इल्लुजन समझ लें तो उसका 100% ओनरशिप हम

7:03 नहीं कर पाएंगे। इफ यू डोंट ओन 100% ऑफ एनीथिंग देन इट विल टपर द प्रोडक्टिविटी एंड फाइनली वी मे लैंड ऑन अ फेलर। सो हम इसको अगर इलुजन सोचे या झूठ सोच लें। व्हाट अबाउट द प्रोडक्टिविटी आपकी नजर से आपने दो-तीन बातें बोली इल्ल्यूजन और प्रोडक्टिविटी और मोटिवेशन देखिए अद्वैत यह नहीं कहता कि प्रथमतया

7:48 मूलतः जगत झूठ है। कारण सीधा है कि जगत का तो जो दृष्टा है वो अहंकार ही है ना। जगत का दृष्टा तो अहंकार है। तो हम ऐसे हैं कि हमें जो कुछ दिखाई देता है हम उसमें अपने स्वार्थ अनुसार कुछ अर्थ भर देते हैं। इसलिए यह सब कुछ झूठा हो जाता है। यह नहीं कहा जा रहा है कि आप तो सत्य हो

8:38 और आपके चारों ओर जो जगत है वह झूठा है। वास्तव में जगत तो आपके ही लिए है। जगत आपके ही संदर्भ में है। तो अगर आदिशंकर कहते हैं कि यह जगत ही मिथ्या है। तो उससे आशय बिल्कुल स्पष्ट है। उन्होंने यह नहीं कहा कि जगत की दो चार वस्तुएं मिथ्या है। उन्होंने ऐसा तो नहीं कहा। वह कह रहे हैं कि समूचा जगत ही मिथ्या है। समूचा जगत किसके लिए मिथ्या हो सकता है? समूचा जगत अगर किसी को लाल दिख रहा है तो इससे हमें क्या जगत के बारे में कुछ पता चलता है? अगर कोई भी बात जगत के एक दो विषयों के बारे में नहीं। अपितु समस्त जगत के बारे में ही कही जा

9:24 रही है। तो इससे हमें जगत के बारे में कुछ भी पता नहीं चलता। अगर मैं कहूं अभी मैं देख रहा हूं अपनी स्क्रीन पर मैं कहूं कि आपने काले रंग का कुछ परिधान पहन रखा है। ठीक है? और मैं कहूं कि आपके पीछे जो सज्जन बैठे हैं उन्होंने सफेद रंग की शर्ट पहन रखी है। तब तो ठीक है। इससे पता चलता है कि भाई वहां क्या चल रहा है? स्क्रीन पर क्या चल रहा है? लेकिन अगर मैं कहूं कि स्क्रीन पर जितने हैं सब काले हैं या सब सफेद हैं और इसी स्क्रीन पर नहीं जिस दिशा में जितनी स्क्रीनें हैं उन पर जो भी कोई है सब काले ही काले हैं। तो इससे स्क्रीन पर जो भी लोग हैं उनके बारे

10:11 में कुछ भी पता नहीं चलता। इससे बस यह पता चलता है कि मेरी आंख में कुछ समस्या है। तो आदि शंकर का जो वचन है वह समस्त जगत पूरे ब्रह्मांड के बारे में है और पूरे ब्रह्मांड को ही मिथ्या कह रहे हैं। तो इससे पता चलता है कि वह ब्रह्मांड के बारे में बात ही नहीं कर रहे हैं। अगर किसी को सब कुछ काला या सब कुछ लाल दिखाई देता हो तो जो दिखाई दे रहा है उसके बारे में कोई बात नहीं कही जा रही। फिर तो बात देखने वाले के बारे में कही जा रही है। अगर समस्त ब्रह्मांड ही मिथ्या है। जगत ही मिथ्या है। तो जो जगत का अनुभक्ता है, फिर उसमें कुछ खोट है। उसमें कुछ गड़बड़ है। तो बात अहंकार के बारे में करी जा रही है। यह जो मैं है, ये जो दृष्टा है, जो अनुभोक्ता

10:58 है, ये जो ज्ञाता है, इसके बारे में बात करी जा रही है। तो, यह हम सोच लेते हैं और यह कोई बहुत सटीक अर्थ नहीं हुआ कि जैसे कहा जा रहा हो कि दुनिया में कुछ मायावी है कि जैसे जगत इल्लुजरी है। नहीं नहीं नहीं अहंकार इल्लुजरी है। और इसीलिए उसने अपने चारों ओर जो कुछ भी रच रखा है और जो कुछ भी वो कहता है कि है अस्तित्वमान है वो सब झूठा होता है। अब आप बताइए आप अपने जगत के केंद्र में हैं और मैं भी अपने जगत के केंद्र में हूं और अभी जितने लोग दिखाई दे रहे हैं सब पीछे सब लोग भी अपने जगत के केंद्र में। हम सब अपनेप जगत के केंद्र में होते हैं। और क्योंकि हम अपने जगह केंद्र में होते हैं

11:43 तो इसीलिए हमने अपने चारों ओर जो कुछ भी खड़ा कर रखा है हमें उसका सत्य नहीं पता होता क्योंकि उसको देखने वाला उसको जानने वाला मैं ही हूं। मैं माने अहंकार और क्योंकि वो खुद झूठा है। क्योंकि वो खुद झूठा है। इसीलिए वो जो कुछ भी देखता है अपने झूठ की रक्षा करने के लिए ही देखता है। वो जो कुछ भी देखता है उसको वास्तव में देखता नहीं है। प्रक्षेपित करता है। क्योंकि उसका प्रयोजन देखने से कम है और आत्म सुरक्षा से ज्यादा है। उसका सरोकार इससे नहीं है कि क्या है मैं यह जानू। उसका प्रयोजन इससे है कि किसी तरह अपनी जान बचाऊं क्योंकि वह स्वयं मिथ्या है ना। अहंकार क्या है? देह के साथ

12:28 पैदा हुआ एक भ्रम है। एक झूठ है जो कहता है मैं हूं मैं हूं। देह तो फिर भी तथ्य हो सकती है। व्यवहारिक तल पर देह तो फिर भी तथ्य हो सकती है। पर यह जो अहम भाव है, अहम वृत्ति है, यह तो खुला झूठ है। यह ना भी हो तो देह रहती है और देह के संचालन के लिए और जगत के व्यापार के लिए अहंकार की कोई जरूरत नहीं है। उसके बिना भी दुनिया मस्त चल सकती है। लेकिन फिर भी अहंकार कहता है मैं हूं। तो अहंकार पहला झूठ है। क्योंकि अहंकार झूठ है। इसलिए उसने अपने चारों तरफ जो जगत रच रखा है वो झूठ है। इसलिए शंकराचार्य कह रहे हैं कि जगत मिथ्या। इसलिए कह रहे हैं। तो एक सवाल आ रहा है अहंकार झूठ है और आपने भी इस किताब में अच्छी तरह से लिखा है कि इकोसेंट्रिक एंबिशन वर्सेस कॉन्शस

13:17 एस्पिरेशन। पर अभी मैंने वो आपकी प्रोडक्टिविटी वाली बात का जवाब नहीं दिया। मैं दे दूं? प्लीज प्लीज। अब आप एक बात बताओ मैं बैठा हूं अपनी दुनिया के केंद्र में और मेरे चारों ओर मेरी दुनिया है और क्योंकि मैं भीतर से झूठा हूं इसीलिए उस दुनिया में मैंने सारे झूठे अर्थ भर रखे हैं। कौन सी चीज कैसी है मुझे कुछ नहीं पता। बस उसको मैं वही परिभाषा देता हूं जिस परिभाषा से मेरे अपने झूठ की रक्षा हो सके। तो अब आप बताइए मेरे लिए एफिशिएंसी प्रोडक्टिविटी उत्पादकता का या यह जो सामाजिक आर्थिक राजनैतिक धार्मिक व्यवस्था चल रही है इसको बचाए रखने में मेरा क्या लाभ है?

14:02 यह सारी व्यवस्था तो मेरे झूठ का उत्पाद है। इसको चलाए रखने से मुझे क्या मिलेगा? आपने कहा रिस्पांसिबिलिटी। कौन सी रिस्पांसिबिलिटी? झूठ को बचाने की रिस्पांसिबिलिटी। अहंकार जिन भी बातों को कहता है कि यह मेरी रिस्पांसिबिलिटी है, कर्तव्य हैं, वह सब बातें उसके अपने झूठ की उपज है। तो उन बातों को बचाकर क्या मिलेगा? इसीलिए आपने जब अभी आरंभ में ही गीता की बात करी तो वहां पर तो गीताकार कहते हैं कि कर्तव्य तो नासमझी की सजा है। कर्तव्य तो उनके लिए ही होते हैं जो नासमझ होते हैं। और जिनके पास समझ होती है उनके लिए तो कोई कर्तव्य बचता ही नहीं है। इसका मतलब यह

14:48 नहीं कि वो कुछ करते नहीं। वो बहुत बड़े-बड़े काम कर जाते हैं। पर उनके कर्तव्य फिर उन्हें कोई बताने नहीं आता बाहर से कि तुम यह करो, तुम यह करो। तो उनके उनके जो कर्तव्य होते हैं वो स्वतः स्फूर्त होते हैं। इसी तरह से आगे और जाकर के कहते हैं श्री कृष्ण कि सारे ही अपने कर्तव्यों को छोड़कर वो धर्म का नाम लेते हैं कि सारे ही अपने धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ। इसीलिए तो कहते हैं ना क्योंकि आपने जिस चीज को अपना धर्म या कर्तव्य समझ रखा है वह आपके अहंकार की ही पैदाइश है। तो इसीलिए उसके पीछे भागने से आपको कुछ मिलेगा नहीं। बस इतना होगा कि आप जैसे हो वैसे और बने रह जाओगे। आप अपने ही झूठ में और दृढ़ता से स्थापित होते जाओगे।

15:34 मैं मैं बिल्कुल नशे में हूं और मैं इस चीज को कुछ समझ रहा हूं। उसे कुछ समझ रहा हूं। उसे कुछ समझ रहा हूं। हर चीज को वो समझ रहा हूं जो वो है ही नहीं। और मैं दो और दो पांच करने के लिए पूरी जिंदगी लगाए दे रहा हूं और कह रहा हूं यह तो मेरा कर्तव्य है। मुझे कर्तव्य सौंपा गया है परिवार द्वारा, परंपरा द्वारा, धर्म द्वारा कि मैं दो और दो पांच करके दिखाऊं और वह पूरी जिंदगी हो नहीं सकता दो और दो पांच। लेकिन मैंने उसको अपनी सांस्कृतिक सामाजिक पारिवारिक धार्मिक जिम्मेदारी समझ रखा है। और फिर अगर कोई मुझसे सत्य की बात करे तो मुझे डर लगता है कि अगर मैंने सत्य जान लिया तो मेरी जिम्मेदारियों का क्या होगा? आपकी जिम्मेदारियां झूठ हैं। इसीलिए तो वो सत्य के सामने टिक नहीं पाती। इसीलिए जो लोग चाहते हैं कि आप झूठी जिम्मेदारियों में फंसे रहे वो आपको उस सत्य के निकट जाने

16:20 नहीं देना चाहते। आपको सच्चाई पता चल गई तो आप झूठी जिम्मेदारियों के जाल से मुक्त हो जाओगे। क्योंकि वो जिम्मेदारियां सब आपके झूठ से ही उपज रही हैं। जी बताएं आप कुछ कह रहे थे। कोई सोच रहा था कि मेरे पास मेरा कंपनी का सीओपो बैठे हुए हैं। सो आई वास थिंकिंग ऑफ कि सपोज इन दिस इट्स अ मंथ ऑफ मार्च यू नो दिस एंटायर मंथ वी ऑलवेज थिंक एंड ग्रो वि टारगेट। अगर मेरा सेल्स ग्राह को 100 करोड़ का एक्स्ट्रा टारगेट लेना है। कैन ही डील दैट टारगेट विदाउट ईगो? नहीं वो जो टारगेट आपको दे रहे हैं उनको वो थोड़ी चाहिए कि 100 करोड़ एक्स्ट्रा चाहिए। 100 करोड़ वह सो रहे होते हैं। कोई उनके ऊपर लाकर के रख दे तो उनको कोई आनंद थोड़ी आएगा। 100 करोड़ अहंकार को चाहिए।

17:08 सो रहे हो आप और आपके पेट पर आकर कोई 100 करोड़ की गड्डी रख दे आपको कोई बहुत आनंद आ जाएगा या आप सो रहे हैं। 100 करोड़ आपके अकाउंट में ट्रांसफर हो गया। आपको नहीं उसका ज्ञान है। तो आपके जो सोने के आनंद में कोई कमी आ जाएगी या कुछ बढ़ोतरी हो जाएगी। पैसा अहंकार को चाहिए और अहंकार को पैसा नहीं चाहिए। अहंकार को पैसे के माध्यम से संतुष्टि चाहिए। समस्या यह है कि आप जो टारगेट बना रहे हो वो टारगेट आपके असली टारगेट को पूरा नहीं कर रहा। आप 100 नहीं 1000 करोड़ का टारगेट बना लो। जो अहम का असली टारगेट है वो उस टारगेट से पूरा ही नहीं होगा। आप अपने टारगेट को और अचीव कर लो। अहम का टारगेट अहम इसलिए थोड़ी होता है कि उसको आप 100 करोड़ दे दोगे तो उसकी भूख

17:54 मिट जाएगी। वह बेचारा तो पैदाइशी आशिक है और पैदाइशी झूठा है। और इन दोनों चीजों में वो फंसा रहता है कि अपने झूठ को बचाऊं या अपने प्रेम को पाऊं। उसका टारगेट ये है ही नहीं कि मुझे 100 करोड़ और मिल जाए। आप हो कि आप हो कि आप हो कि जितने भी लोग अभी सभा में बैठे हो कोई भी हो। हम सबका एक ही टारगेट है। किसी तरह पूर्णता मिले, तृप्ति मिले, संतुष्टि मिले, शांति मिले, मुक्ति मिले। यह असली टारगेट है। लेकिन इस टारगेट को पूरा करने के लिए हम एक सेकेंडरी टारगेट बनाते हैं। उस सेकेंडरी टारगेट का नाम है ₹100 करोड़ मार्च के महीने में। सेकेंडरी टारगेट अच्छा है। अगर वो प्राइमरी टारगेट को पूरा कर रहा होता।

18:39 समस्या ये है कि आपने जिंदगी में जितने सेकेंडरी टारगेट बना रखे हैं वो कोई भी आपके मूल लक्ष्य की प्राप्ति में प्राइमरी टारगेट को पाने में सहायक नहीं होते हैं। इसीलिए तो आप इतना कुछ पाए जाते हो फिर भी प्राइमरी टारगेट नहीं मिलता। प्राइमरी टारगेट का ही नाम लिबरेशन है। मुक्ति है, शांति है, सत्य है, आकाश है। तो आप जगत में जी रहे हो, आप लक्ष्य बनाओगे, टारगेट्स बनाओ। लेकिन इतनी ईमानदारी होनी जरूरी है। स्वयं से पूछना जरूरी है कि आप यह जो टारगेट्स बना रहे हो, यह आपको आपके प्राइमरी टारगेट तक पहुंचा रहे हैं कि नहीं पहुंचा रहे हैं। कुछ भी पाके क्या होगा? अगर जो पाया उससे खुद को ना पाया। जी।

19:24 सवाल है कि अगर बोर्ड रूम में बैठ के पसीना के साथ और मेरा गुस्सा हुआ सीईओ जो मेरे सामने खड़ा हुए अगर आचार्य जी का लैंग्वेज मैं उनको सुना हूं वो मुझे क्या आंसर देंगे वो मैं सोच रहा हूं कि दिस एफर्ट्स इज नॉट गोइंग टू प्राइमरीली फुलफिल द रियल हैप्पीनेस आपका टारगेट ये है कि आपके सीईओ आपसे प्रसन्न रहे लेकिन वो भी आपका प्राइमरी टारगेट नहीं है। आप अपने सीईओ को प्रसन्न रख के कुछ और पाना चाहते हैं लेकिन आप अपने सीईओ को कितना भी प्रसन्न रख लें। आपके सीईओ आपको कभी वो नहीं दे सकते जो आपका केंद्रीय टारगेट है। आपके सीईओ में क्या दुनिया के किसी सीईओ में वो क्षमता नहीं कि आपको वो दे दे जिसके लिए आप सचमुच प्यासे हो। सो आचार्य जी हाउ कैन वी शिफ्ट अकॉर्डिंग टू यू फ्रॉम ए ईगोसेंट्रिक एंबिशन टू ए कॉन्शस एस्पिरेशन ताकि हमें ईगो ना लगे।

20:10 बाय बाय बाय बाय बाय वाचिंग द ईगो बाय वाचिंग द ईगो हम जो कुछ भी कर रहे हैं हम अपनी जान तो अहंकार की तृप्ति के लिए ही कर रहे हैं ना और जब तक वो है जब तक उसको लगता है वो है हम वही कर्ताधर्ता बन के बैठा रहेगा अहंकार ही डअर है। द ईगो इज़ द डअर, द मूअर, द प्लानर, द एग्जीकटर सब कुछ वही करता है। तो बस उसको यह ख्याल रखना है कि कर तो मैं रहा हूं यह सब कुछ पर इससे क्या वास्तव में मुझे वह मिल रहा है जो मुझे चाहिए। इसको हम जो हमारा गीता कम्युनिटी का फ्रेमवर्क है एपी फ्रेमवर्क उसमें हम इसको आत्मवलोकन कहते हैं। खुद को देखो और पूछो कि जो कर रहे हो इससे सचमुच तुम्हें मिल क्या रहा है। देखो कि तुम जो कर रहे हो वो

20:58 चीज किस केंद्र से आ रही है। क्या वो केंद्र भी ईमानदारी का? ईमानदारी का केंद्र माने कि मुझे अगर प्यास लगी है तो मैं डीजल ना पीूं। भले ही डीजल पानी से महंगा आता हो। लगी है प्यास और डीजल पी रहे हैं और खुद को बता रहे हैं मैं बड़ा आदमी हो गया। पहले तो मैं सस्ता पानी पीता था। अब डीजल पी रहा हूं। और ये सब घूम रहे हैं। इनकी तो जिंदगी में कुछ है नहीं। यह तो सिर्फ पानी पीते हैं। मैं बड़ा आदमी हूं। मैं डीजल पीता हूं। तो यह पूछना जरूरी है कि तुम जो कर रहे हो और तुम जो सचमुच चाहते हो जो तुम्हारी गहनतम आकांक्षा है इनमें आपस में कोई मेल कोई तारतम्य कोई एलाइनमेंट है कि नहीं है दौड़ धूप तो खूब कर रहे हो दिन भर दौड़ रहे हो जान लगा रहे हो लेकिन यह सब जो कर रहे हो इससे

21:45 तुम्हें वह मिल रहा है क्या जिसके लिए तुम पैदा हुए हो और अगर वह नहीं मिल रहा तो जन्म व्यर्थ ही गवा रहे हो फिर थैंक यू आचार्य जी। अब हम दूसरा पड़ाव में चलते हैं। एक ही चीजों में इतना बहुत हो गया बट ये तो इतना सब्जेक्ट आप आप आप थोड़े थोड़े से निराश लग रहे हैं मेरे उत्तरों से। मैं निराश नहीं हूं। मैं सोच रहा हूं कि मैं आपका कौन सा लाइन को कोट करूं ताकि आई कैन डू माय डिफेंड। आचार्य जी अक्सर क्या होता है कि आप कई सारी बातों में अटैचमेंट को फोकस किए हैं कि इट्स आल्सो अ कॉज ऑफ़ सफरिंग। आप इसको बॉन्डेज कहते हैं आपकी लैंग्वेज में। सो हम कैसे फर्क करें कि यह अटैचमेंट है और यह बॉन्डेज है और ये अटैचमेंट सही

22:30 कोई अटैचमेंट सही नहीं होता। कोई कोई अटैचमेंट सही नहीं होता। और अटैचमेंट और बॉन्डेज में फर्क करने की कोई जरूरत ही नहीं है क्योंकि अटैचमेंट बॉन्डेज होता है अनिवार्य रूप से। अनपवाद रूप से विदाउट एनी एक्सेप्शनंस। तो अटैचमेंट तो बॉन्डेज होता ही है। शायद प्रश्न यह होना चाहिए कि हम कैसे अंतर करें कि अटैचमेंट है माने लगाव है, जुड़ाव है, आसक्ति है या प्रेम है। इन दो में तो अंतर करा जा सकता है। अटैचमेंट और लव में आसक्ति में, प्रेम में। इन दो में तो अंतर करा जा सकता है। अटैचमेंट और बॉन्डेज में कोई अंतर नहीं है। अटैचमेंट इज बॉन्डेज। देखिए समझते हैं। आमतौर पर हम अटैचमेंट की बात किसी व्यक्ति के संदर्भ में ही करते हैं। यद्यपि किसी वस्तु से भी हो सकता है। कोई कह सकता है आई एम अटैच्ड टू माय कार। पर आमतौर पर ऐसा

23:18 उपयोग कम होता है। ज्यादा किसी व्यक्ति के संदर्भ में होता है। आई एम अटैच्ड टू सच अ सच पर्सन। इससे मेरा ऐसे ऐसे आ सकती है। अब आप जिस चीज से जुड़ रहे हो उससे जुड़ थोड़ी रहे हो पूरे तरीके से अटैचमेंट में। अटैचमेंट का मतलब होता है सुपरफिशियल एफिलिएशन। सतह से सतह के संपर्क में आ जाना। और खालखाल से चिपक गई। अटैचमेंट हुआ है। डिसोल्यूशन नहीं हो गया है। अटैच्ड ही है। सबमर्ज नहीं है, डिजॉल्व्ड नहीं है, इमर्ज नहीं है, डूबे नहीं है। आप प्लावन नहीं हो गया।

24:03 हम गले नहीं है, विगलित नहीं हुए हैं। सिर्फ अटैच्ड हैं। अटैच्ड हैं। और अटैचमेंट का मतलब है ऐसे जाकर सतह सतह से खालखाल से जुड़ गई है और खालखाल से जुड़ी है। अभी ऐसे अलग भी हो जाएंगे। तो इसमें अहंकार तो जैसा था वैसा ही रह गया ना। बल्कि अहंकार ने उस दूसरे व्यक्ति को या विषय को अपने आप को और सुदृढ़ करने के लिए इस्तेमाल कर लिया है। तो अहंकार अटैचमेंट में मस्त रहता है। लेकिन प्रेम से बहुत घबराता है। यद्यपि हम अपने अटैचमेंट को ही प्रेम का नाम दे के खुश हो लेते हैं। हमें लगता है कि मैं तो बड़ा प्रेमी हूं। मेरा इससे प्रेम है। मेरा उससे प्रेम है। मेरा उससे प्रेम है। आई लव माय फ्रेंड्स। आई लव माय

24:50 फैमिली। लेकिन सही बात तो यह है कि हम सब अहंकारी हैं और अहंकार और प्रेम साथ-साथ नहीं चल सकते। अहंकार माने एक भीतरी झूठ और प्रेम का अर्थ होता है उस भीतरी झूठ को हटाने की चाहत। अहंकार कहता है भीतरी झूठ कायम रहे। मैं रहूं मैं रहूं। और प्रेम का अर्थ ही है कि भीतरी झूठ हटे। प्रेम माने एक आकर्षण। प्रेम एक चाहत। कौन सी चाहत? मैं जो हूं मैं वैसा ना रहूं। मेरा होना मेरे लिए ठीक नहीं। क्या मैं किसी ऐसे से जुड़ सकता हूं जो मुझे मिटा दे? और अटैचमेंट कहता है मैं जैसा हूं वैसे ही रहूं। हां अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए मैं जाकर के किसी से ऊपरी सतही

25:36 सुपरफिशियल रिश्ता बना लूं। अटैचमेंट में आप बदलते नहीं। अटैचमेंट में आप मिटते नहीं। अटैचमेंट में आप और बढ़ जाते हो। आप और दृढ़ और पुख्ता और सॉलिडिफाई और रिइंफोर्स हो जाते हो। तो कैसे पता करें कि अटैचमेंट है कि प्रेम है, लव है। बस यह देख लीजिए कि आप जिससे रिश्ते में हैं उस रिश्ते में आपके भ्रम कट रहे हैं कि नहीं कट रहे हैं। सामने वाला आपके जीवन में आया है तो आपके भीतरी अंधेरे को प्रकाशित कर रहा है या भीतरी अंधेरे को और बढ़ा रहा है। जिसको आप जिंदगी में लाए हैं वो क्या चाह रहा है? आपको और स्वतंत्रता देना या आपको और कैद

26:23 देना कि बंधन देना प्रेम में जो आपके साथ होता है आप उसे मुक्ति स्वतंत्रता आजादी देते हो फ्रीडम देते हो आसमान देते हो पंख देते हो अटैचमेंट मेंकि आप गए ही हो दूसरे से बस बाहर बाहर से जुड़ के कुछ अपनी स्वार्थ सिद्धि करने के लिए तो अटैचमेंट में आप हमेशा उसको बॉन्डेज दोगे जो आपके सवाल की शुरुआत थी अटैचमेंट इज बॉन्डेज अटैचमेंट में आप जिससे जुड़े हो उसको बिल्कुल पकड़ कर रखोगे। उससे दस्तखत करा लोगे कि तू कहीं भागेगा नहीं। तरीके से उस पर बंधन लगाओगे। यह अटैचमेंट है। प्रेम माने मुक्ति और अटैचमेंट माने शोषण। ऐसे अंतर कर लीजिए। एक हमारे यहां गीता

27:09 कम्युनिटी पर एक उक्ति चलती है जो बड़ी पसंद है गीता छात्रों को हमारे वो ये चलती है कि ऐसे कि एक आदमी कह रहा है कि अरे उसने पिंजरे में एक चिड़िया रखी हुई है। अरे ये मेरी चिड़िया मुझसे बहुत प्यार करती है। मेरी चिड़िया मुझसे बहुत प्यार करती है। हम तो पीछे से आचार्य जी बोल रहे हैं तो ठीक है पिंजड़े का दरवाजा खोल दो। हम देखें कि सचमुच तुम्हारी चिड़िया तुमसे कितना प्यार करती है।" हम या इसी का एक दूसरा संस्करण है कि वो व्यक्ति कह रहा है मैं अपनी चिड़िया से बहुत प्यार करता हूं। मैं अपनी चिड़िया से बहुत प्यार करता हूं। चिड़िया को पिंजरे में रख के बोल रहा है मैं अपनी चिड़िया से बहुत प्यार करता हूं। बहुत प्यार करता हूं। तो उससे कहा जा रहा है तो ठीक है पिंजड़े

27:55 का दरवाजा खोल दो। देखते हैं तुम्हारी चिड़िया भी तुमसे कितना प्यार करती है। ये अटैचमेंट है। दूसरे को अपनी जिंदगी में रखना अपने स्वार्थ के लिए। जी एक मां और बच्चों के साथ और या कोई एक इंटिमेसी रिश्ते को आप किस नजर में देख रहे हैं? ये क्या सेम अटैचमेंट है? दोनों बातें हो सकती हैं। आप इसको बंधन भी कह सकते हैं। एक बच्चों और मां का रिश्तों में तो वो बंधन भी है। नहीं नहीं मां और मां में बहुत अंतर होता है। एक मां होती है प्रकाशित समझदार जानकार और एक मां होती है अहंकारी। जैसे सब जीव होते हैं दो तरह के। तो जिस मां के माध्यम से उसका अहंकार काम कर रहा होगा। वह बच्चे को भी अपनी इच्छाओं

28:42 की पूर्ति का साधन बना लेगी। जब हम कहते हैं ना मां और बच्चे का रिश्ता तो पवित्र होता है तो हम ऐसे कहते हैं जैसे सब माएं एक जैसी होती हैं। माएं भी बिल्कुल दो तरह की होती हैं। जैसे सब जीव दो तरह के होते हैं। हम तो मैंने बोला है मैंने कहा पूत का पूत हो सकता है। तो भाई माता भी कुमाता हो सकती है। बिल्कुल हो सकती है क्योंकि मनुष्य है। और मनुष्य उठ भी सकता है। मनुष्य गिर भी सकता है। एक मां होगी। जो कहेगी कि भले ही मेरे शरीर से बच्चे का जन्म हुआ है पर बच्चा शरीर मात्र नहीं है। मुझे सिर्फ यही नहीं देखना है कि नहला दिया, धुला दिया, मालिश कर दी, खाना खिला दिया। मुझे यह भी देखना है कि इसके भीतर क्या चल रहा है। मुझे

29:28 इसकी चेतना पर ध्यान देना है। यह जागृत मां है। यह असली मां है। यह सुमाता है। यह पूजनीय मां है। और एक दूसरी मां होगी जो कहेगी कि बेटा चाहिए, बेटा चाहिए। भारत में इतनी भ्रूण हत्याएं होती हैं, वह मांओं की सहमति के बिना तो नहीं हो जाती ना। इतनी जो लड़कियां मार दी जाती हैं, कोख में ही या पैदा होने के ठीक बाद वो माओं की सहमति के बिना तो नहीं मार दी जाती। पूरी सहमति नहीं होगी मांओं की पर कुछ तो रहती है। बेटियों को उल्टेपुल्टे संस्कार देने में और बेटियों को दबाकर रखने में मांओं का भी पूरा योगदान होता है। तो किसने कह दिया कि मां तो देवी ही होती है। तो जब हम मां और बच्चे के रिश्ते की बात कर रहे हैं तो वो किसी भी अन्य रिश्ते से

30:15 भिन्न नहीं है। जैसे कोई भी रिश्ता एक अच्छे सुंदर सच्चे केंद्र से भी हो सकता है और एक गिरे हुए घटिया केंद्र से भी हो सकता है। वैसे ही मां और बच्चे का रिश्ता भी दोनों तरह का हो सकता है। बहुत ऊंचा रिश्ता भी हो सकता है मां और बच्चे का और बहुत गिरा हुआ रिश्ता भी हो सकता है मां और बच्चे का निर्भर इस पर करता है कि मां आध्यात्मिक रूप से कितनी जागृत है। मां अगर जगी हुई होगी तो उसके उसके जगने का उसके जागरण का प्रकाश उसके बच्चे से उसके संबंध में भी दिखाई देगा और मां अगर जगी हुई नहीं होगी। तो उसके बच्चे से उसके रिश्ते में भी अंधकार होगा और उसके जितने रिश्ते होंगे दुनिया में उस मां के उन सब रिश्तों में बराबर का अंधकार होगा। ये जो हमने एक परंपरा से संस्कृति से बात पकड़ ली है कि सिर्फ इसलिए कि आपने बच्चे

31:02 को जन्म दे दिया तो अब आप में कुछ गरिमा आ गई, कुछ दैवीयता आ गई। यह बात गलत है। ऐसा कुछ नहीं होता है। बच्चे को जन्म देने भर से अहंकार में कोई परिवर्तन नहीं आ जाता। हां उसको एक बेचारा कोमल नाजुक निरीह दुर्बल और आश्रित विषय मिल जाता है जिस पर अब वो अपनी मनमानी चला सकता है। मां-बाप जो जो बेहोश मां-बाप हैं वो सबसे ज्यादा शोषण और किसका करते हैं? अपने बच्चे का ही तो करते क्योंकि बच्चा उन पर आश्रित है। तो यह जो हमने पारंपरिक बात पकड़ रखी है कि साहब मां तो भगवती है और पिता तो भगवान है। इस बात में कोई दम नहीं है। मां-बाप बच्चों का शोषण भी जमकर के करते

31:48 हैं क्योंकि वह है ही ऐसे। जब वो हर चीज का शोषण कर रहे हैं तो अपने बच्चे का नहीं करेंगे क्या? जब वो जाकर के नहीं कंट्रोवरर्शियल नहीं है। बहुत सीधी बात है। ये जो बात है यह भारत के मौलिक धर्म से आ रही है। और अगर हम इस बात को कंट्रोवरर्शियल कह रहे हैं तो फिर हम तो सनातन को ही कंट्रोवर्शियल कह रहे हैं। जो मैं बात कह रहा हूं वो वेदों के दर्शन वेदांत से आ रही है। वह कंट्रोवरर्शियल हमें सिर्फ इसलिए लग रही है क्योंकि हमारा जो लोक धर्म है वह जो हमारी प्रचलित अभी संस्कृति चल रही है वह वेदांत से बहुत दूर छिटक चुकी है। तो अब जब असली धर्म हमारे सामने प्रस्तुत किया जाता है तो वो हमारे लिए सनसनीखेज हो जाता है। आपत्तिजनक हो जाता है। कंट्रोवर्शियल हो जाता है।

32:34 चलिए यह एक आध्यात्मिक असर है और यह सवाल मुझे जरूर पूछना चाहिए कि जब हम भक्ति की बात कर रहे हैं और सुबह तीन चार सेशन जा चुका है पूरी की पूरी किताब में आपकी अद्वैत में और जहां भी है कि आपने फोकस किया कि यू मस्ट आस्क हमें पूछना चाहिए इन यू कैरी इज द कोर डीएनए ऑफ योर टीचिंग बट बहुत बड़ा बिरादरी देश में जो फॉलो करते हैं बिना पूछ के सो क्या हमें हर कुछ पूछ पूछना चाहिए या कुछ चीजों को फॉलो करना चाहिए। हम कैसे समझे कि क्या पूछे और क्या फॉलो करें? यह भी तो आप पूछ ही रहे हैं। जी हां ये पूछ तो प्रश्न ही अवैध प्रश्न ही अवैध हो गया

33:20 ना। अरे जो नहीं भी पूछ रहे उन्हें भी बताया गया है। समस्या यह है कि उन्हें बिना पूछे बता दिया गया। उनको पता ही नहीं है कि कब उनको बता दिया गया और जो उनको बता दिया गया उसे उन्होंने चुपचाप अपनी बेहोशी में मान लिया। आप जाते हो किसी को फॉलो करने बाबा जी को फॉलो करने आप चले जाते हो। क्या आपको बचपन से पता था बाबा जी को फॉलो करना है? आपने पूछा नहीं भले ही कि फॉलो किसको करना है और फॉलो करना चाहिए भी कि नहीं। पर आपको बताया गया है। हवाओं ने आपको बता दिया। चुपचाप प्रचलित संस्कृति ने आकर के आपके कान में फूंक दिया और आपके मन में यह बात स्थापित कर दी। चुपचाप साजिशन एक षड्यंत्र की तरह आपके भीतर ये बात बैठा दी गई कि फॉलो करो।

34:07 आपने पूछी नहीं पर बताई गई है आपको। कोई आपके भीतर से ये बात थोड़ी निकल रही है। तो जब बात बाहर से ही आ रही है सारी तो मैं प्रश्न करूं ना। जब मुझे बाहर की ही किसी बात को अपने भीतर प्रवेश देना है तो कम से कम वो प्रश्न की छन्नी से होकर के गुजरे बाहरी बात। मैं फिर पूछ रहा हूं बाबा जी को फॉलो करना है। फलानी रस्म को फॉलो करना है। फलाने पंथ को फलानी धारा को फॉलो करना है। आपने फॉलोअरशिप की बात करी। फॉलो करना है। यह बात भी आपको किसी ने सिखाई है। आपकी अपनी नहीं है। जब आपको बाहर से ही किसी से कुछ जानना है। जब बाहर से ही किसी से कुछ सीखना है। तो प्रश्न के माध्यम से सीखिए। अपनी चेतना के माध्यम से सीखिए। देखिए फॉलो तो पशु भी कर लेता है। मनुष्य को

34:52 मनुष्य बनाती है उसकी जिज्ञासा। यह एक काम है जो पशु नहीं कर सकता। और जो जिज्ञासा ही करने से इंकार कर दे, जो अपने जीवन में प्रश्नों को वर्जित कर दे वो फिर पशु जैसा हो जाता है। आप आप जानवर को ट्रेन कर दीजिए। ऐसा करना है वो करता रहेगा। अगर आपने इंसान को भी ऐसा ही कर दिया है कि चलो उस दिशा चलो, वैसे चलो, उस कतार में लग जाओ, वहां जाकर के ये कर लो, वहां जाकर वो कर लो। तो इंसान भी फिर पशु जैसा हो गया। इंसान की पहचान ही है उसकी जिज्ञासु चेतना तो प्रश्नों का कोई विकल्प नहीं होता है और याद रखिएगा ऐसा नहीं है कि जो प्रश्न नहीं पूछ रहा हम वो कुछ स्वीकार ही नहीं कर रहा बाहरी

35:37 बात उसकी हालत ज्यादा खराब है जो प्रश्न नहीं पूछ रहा वो बाहरी बात को स्वीकार कर रहा है लेकिन बिना प्रश्न पूछे स्वीकार तो वो भी बाहरी ही बात को कर रहा है लेकिन बिना प्रश्न पूछे स्वीकार कर रहा है। यह कितनी खतरनाक चीज है। सोचिए आपने ना जाने कितनी बातें मान रखी हैं। आप अपनी मान्यताएं लेकर के चल रहे होंगे। मैं आपसे पूछूं इनमें से कितनी मान्यताएं आपकी अपनी हैं। निजी हैं, मौलिक हैं। एक भी आपकी अपनी नहीं है। बहुत कम। आप जिस परिवेश में, जहां पैदा हुए, जिस युग में पैदा हुए, जिस काल, जिस संदर्भ में, वहां से आपको मान्यताएं मिल गई। आपने बिना प्रश्न पूछे उनको स्वीकार कर लिया। आप कहीं और किसी देश में होते, किसी दूसरे लिंग में होते, किसी दूसरे धर्म में, किसी दूसरी जाति में होते, किसी दूसरी आर्थिक स्थिति में होते, किसी दूसरे राष्ट्र में

36:22 होते, आपकी मान्यताएं दूसरी होती। तो चल तो आप सब बाहरी चीजों पर ही रहे हो। जब आप बाहरी चीजों पर ही चल रहे हो तो उन बाहरी चीजों पर कम से कम सवाल तो उठा दो स्वीकार करने से पहले। कर लेना स्वीकार। हम नहीं कह रहे हर बाहरी चीज को अस्वीकार ही करो। तुम्हें स्वीकार भी करना है तो कर लेना स्वीकार। पर भाई पूछ के स्वीकार कर लो कम से कम। आचार्य प्रशांत कोई भजन गाते हैं? खूब गाते हैं। भजन ही भजन गाते हैं। आप हमारी गीता कम्युनिटी में आइए। वहां भजन ही भजन चलते हैं। अद्वैत के हिसाब से यह सवाल होता है कि पूजा नहीं। अरे अद्वैत में कैसे भजन नहीं होंगे? आधे शंकराचार्य भज गोविंदम भज गोविंदम कर रहे थे। आप कह रहे हैं अद्वैत में भजन नहीं है। हम्म और जो ना भजे उसको क्या बोल रहे थे?

37:10 के मूढ़ मति हो तुम। भज गोविंदम मूढ़ मते वहां भी उसने मूढ़ मति बोल दिया हम तो भजना तो लेकिन लेकिन लेकिन भजने का बड़ा साफ स्पष्ट और सुंदर अर्थ होना चाहिए भजने का मतलब तोते की तरह दोहराना नहीं होता भज शब्द का अर्थ होता है दूरी विभाजन हम देखना कि मैं जो बना बैठा हूं। मैं वह नहीं हूं जो मैं सचमुच हूं। एक दूरी दिख रही है मुझे मेरे तथ्य में और मेरी संभावना में और यह दूरी कष्ट देती है। इसी कष्ट से सब भजन उठते हैं। उसको

37:58 भजन बोलते हैं। भजन बिना ज्ञान के नहीं उठ सकता। 10 लोग कुछ गा रहे हैं तो आप भी वहीं पर मस्त होकर के गाने लग गए। इसको भजन नहीं बोलते। जो गा रहे हैं उसका अर्थ भी नहीं पता ठीक से। बस दोहराए जा रहे हैं, दोहराए जा रहे हैं, नाचे जा रहे हैं। इसको भजन नहीं बोलते। भजने के लिए सबसे पहले घोर पीड़ा उठनी चाहिए। वो विरह ही प्रेम का आधार है। भज भज देखना कि ये मैं कहां आकर के पड़ गया हूं। मैं कौन हूं और अपने आप को क्या माने बैठा हूं। क्या मेरी सच्चाई है और कैसा मैं जीवन जी रहा हूं। कितनी दूरी हो गई इन दोनों में। कितना भेद हो गया इन दोनों में? जब यह दिखाई देता है तो फिर उससे स्वतः ही भजन

38:43 फूटता है। वह आंसुओं के साथ फूटता है। फिर भजन तो वो असली भजन होता है। ये जो आप आमतौर पे भजनवजन देखते हैं ये सब ऐसे ही है। ये तो मनोरंजन है। भजन नहीं है। अच्छा ठीक है। आचार्य जी आपने बहुत सारे बातें सोशली प्री कंडीशनंस के बारे में भी बोले हैं कि थिंग्स आर वेरी मच प्रीकंडीशन। वी प्रिटेंड दी वे पीपल एक्सपेक्ट आंसर फ्रॉम अस वी बिहेव दी पर्सनालिटी इट इज आल्सो कंडीशन एवरीथिंग इज अ कंडीशन डोंट यू थिंक कि द कंडीशन इज़ सम सॉर्ट ऑफ़ डिसिप्लिन जैसे मैं कोई क्रिकेट खेल रहा हूं मान लीजिए और मेरा चार बॉल बाकी है स्कोर करने के लिए सो मैं उस चार बॉल को ही ऑनर करके मुझे स्कोर करना है या मैं मार्च के टारगेट में हूं। मुझे इतना और

39:30 कमाना है रुपया व्हाटएवर काइंड ऑफ़ थिंग्स देयर इज़ सम सॉर्ट ऑफ डिसिप्लिंस इनडायरेक्टली दिस प्री कंडीशन आप क्रिकेट क्यों खेल रहे हैं? आपने कहानी की शुरुआत ही बीच में से कर दी है। आप खेल ही क्यों रहे हो क्रिकेट? आप बीमार हो। आपको क्रिकेट खेलना ही नहीं चाहिए। आपको कुछ और करना चाहिए। आपको कैसे पता आपको क्रिकेट खेलना चाहिए? आप क्यों लगे हुए हो आप मार्च के महीने में अपनी रेवेन्यू पूरी करने में? आपको कहीं और होना चाहिए था। आप जो कर रहे हो वो आपको करना ही नहीं चाहिए। लेकिन आप जो कर रहे हो आप इसलिए कर रहे हो क्योंकि आपको पता ही नहीं है कि आप वो हो ही नहीं जो अपने आप को मानते हो। मैं यूं ही क्रिकेट खेलने पहुंच गया। क्यों? क्योंकि मुझे दुनिया ने बोल दिया तुम्हें क्रिकेट खेलना चाहिए। क्रिकेट से मेरा वास्तव में कोई नाता नहीं। अब मैं कहूं कि मैं क्रिकेट खेलने

40:16 आया हूं तो मुझे क्रिकेट के नियमों का पालन तो करना पड़ेगा ना। तो यह कोई तर्क हुआ? असली बात तो यह है कि तुम क्रिकेट खेलने आए ही क्यों हो? तुम्हें यहां होना ही नहीं था। हर पल जो तुम इस झूठे मैदान में बिता रहे हो तुम्हारे जीवन की बर्बादी है। तुम आए क्यों हो क्रिकेट के बाद? क्यों आए हो? क्योंकि बगल में टिंकू भैया, सामने झुनू भैया, इधर वो ये सब लोग क्रिकेट खेलते थे। टीवी पर खूब देखते थे क्रिकेट। तो आपके भीतर भी अनजाने में यह बात प्रवेश कर गई कि क्रिकेट तो खेलना ही होता है। तो इसलिए आप क्रिकेट खेलने पहुंच गए। और अब क्रिकेट खेलने के पक्ष में आप तर्क दे रहे हैं कि क्रिकेट खेलना है तो नियम तो मानने पड़ेंगे ना। कंडीशनिंग का मतलब यह नहीं होता कि आपने बाहर के नियम मान लिए। कंडीशनिंग का मतलब होता है कि आपको एक झूठी पहचान दे दी गई। बाहरी नियम कायदे तो

41:03 मानने ही होते हैं। मैं भी क्या सड़क पर चलता हूं तो जो ट्रैफिक के कायदे हैं उनको नहीं मानता। मैं बैंक में अगर कुछ काम करूंगा तो जो बैंक का नियम कायदा अनुशासन होगा उसका पालन करूंगा। मैं किसी देश में जाऊंगा तो उनके वीजा की और उनके देश की जो सब कायदे होंगे उनका मैं मुझे भी पालन करना होगा। इसको कंडीशनिंग नहीं बोलते हैं। भारत में हमारे यहां पर राइट हैंड ड्राइव होता है। कहीं जाऊंगा वहां पर लेफ्ट हैंड ड्राइव है। सड़क के नियम दूसरे हैं तो पालन करूंगा। इसको कंडीशनिंग नहीं बोलते हैं। हम कंडीशनिंग होता है जब आपको आपके बारे में ही कुछ ऐसा जता दिया जाए जो एकदम झूठ

41:51 है। कंडीशनिंग मौलिक झूठ है। कंडीशनिंग का मतलब है कि आपको बता दिया गया है कि तुम फलाने लिंग के हो, फलाने वर्ग के हो। इसलिए अब तुमको इस हिसाब से काम करना है। कंडीशनिंग का मतलब है कि आपको बता दिया गया है कि तुम्हारे घर में सब लोग पैसा कमाने के लिए ही जीते हैं। तो तुम्हें भी यही करना है। कंडीशनिंग का मतलब है आपको बता दिया गया है कि आप स्त्री पैदा हुए हैं और आप फलाने वर्ण में पैदा हुए हैं। तो अब आपको इस इस तरीके से पूरी जिंदगी अपने कर्तव्यों का पालन करना है। यह कंडीशनिंग है। भाई मैं रेलवे कोच में घुस हूं और वहां पर मुझे टिकट दिया गया है और उसमें मेरी सीट बता दी गई है। तो मैं अपनी सीट पर ही जाकर बैठूंगा। यह कोई कंडीशनिंग नहीं हो गई। यह

42:36 व्यवहारिक बुद्धि है। इसमें कुछ नहीं हो गया। यह बिल्कुल ठीक है। कंडीशनिंग मतलब आइडेंटिटी कंफ्यूजन। कंडीशनिंग मतलब क्रिएशन ऑफ अ फॉल्स आइडेंटिटी। आप अपने आप को वो मानने लग जाओ जो आप कहीं से नहीं हो। यह कंडीशनिंग होती है। एक सवाल मैं पढ़ रहा था इस किताब में। उस किताब का चैप्टर होगा। बड़ इंटरेस्टिंग था मेरे लिए। बहुत सारे सारे चैप्टर्स कि पीपल हैव किल्ड द चाइल्ड इनसाइड अस। वो सब्जेक्ट था एक्चुअली 1001 का एंड बड़ा बड़ा इंटरेस्टिंग था वो। और यह जो द सोसाइटी एक्सप्लइटेड द चाइल्ड इन अस एंड इफ वी आर कंडीशन दैट इज़ व्हाई

43:24 वी आर सफरिंग कि आप यह भी लिखें कि जो लीप यूज्ड टू एप्रिशिएट मी यस्टरडे नाउ इट इज़ क्रिटिसाइजिंग मी टुडे। सो आई शुड नॉट बदर अबाउट इट। बट इफ आई आई वास अ गुड बॉय एंड द लिप व्हिच वास अप्रिशिएटिंग मी एंड टुडे आई एम अ बैड बॉय बिकॉज़ ऑफ सम बैड एडिक्शन एंड पीपल आर यूजिंग बैड लिप्स फॉर मी डोंट थिंक कि दोज़ काइंड ऑफ यू नो द प्री कंडीशन थिंग्स कैन आल्सो सेट सम सॉर्ट ऑफ डिसिप्लिन इनडायरेक्टली अदरवाइज द मोरल अकाउंटेबिलिटी एंड रिस्पांसिबिलिटी विल नॉट बी टपर्ड आपको कैसे पता चलेगा आपको कैसे पता चलेगा कि आपसे जो बातें कही जा रही हैं उसमें क्या स्वीकार करना करना है क्या नहीं स्वीकार करना है कैसे पता चलेगा

44:10 पहला सवाल दूसरा आपको पता भी चल गया कि क्या सही है आप उसको क्यों स्वीकार करोगे तो दो सवाल है मेरे आपके लिए कैसे और क्यों आपसे मैं कोई बात बोल रहा हूं आपसे 10 और दूसरे लोग आकर के बोल रहे हैं हिंदुस्तान में हर दवां आदमी आचार्य है बाबा जी बाबा जी चारों तरफ तो सब घूम ही रहे हैं। सब आपसे बात कर रहे हैं। आपको कैसे पता चलेगा किसने आपसे सही बात करी? यह पहला सवाल था। कैसे? और दूसरा था आपको पता चल भी गया कि किसने सही बात करी? तो आप उसे क्यों स्वीकार करोगे?

44:56 पहले का उत्तर है विवेक। और दूसरे का उत्तर है प्रेम। और यह दोनों ही बातें आंतरिक होती हैं। बाहर से किसी की बात सुनने पर कोई मनाही नहीं है। किसी ने बाहर से आपसे कुछ कहा उसको सुन लेने से आपकी कंडीशनिंग नहीं हो जाती। बाहर से जो कहा जा रहा है बेशक सुनिए। मैं कितनी किताबें पढ़ता हूं। आप भी पढ़िए। मैं सबको प्रेरित करता हूं। और पढ़ो और देखो। मूवीस देखो। घूमो। बाहर के सब प्रभावों को आने दो अपने ऊपर। बाहर से आपने किसी से सुना। अभी भी मैं बोल रहा हूं तो सब यहां पर लोग बैठे हैं। श्रोता सब सुन ही रहे हैं। बाहर से किसी

45:42 की बात सुन लेने से आप कंडीशंड नहीं हो जाते। लेकिन सवाल यह है कि बाहर से तो इतनी बातें हम सुन रहे हैं। टीवी, मोबाइल, होल्डिंग लगातार बाहर ही बाहर से हमारे कानों में पड़ रहा है, आंखों में पड़ रहा है। कैसे पता चले कि उसमें से कौन सी बात सही है, कौन सी बात नहीं है? वह पता चलता है तब जब मुझ में एक ईमानदार जिज्ञासा होती है सच जानने की। ज्यादातर लोग सच जानने के लिए नहीं सुनते। ज्यादातर लोग खुद को बचाने के लिए सुनते हैं। जो चीज मेरे अहंकार के विरुद्ध जाती है, मेरे कान उसको स्वीकार करने से इंकार कर देते हैं। जो चीज मेरे अहंकार को अनुकूल पड़ती है,

46:27 वह नहीं भी कही गई तो मैं सुन लेता हूं। मनुष्य ने तो धार्मिक ग्रंथों तक को विकृत कर दिया। श्लोक के श्लोक बदल डाले। और अगर श्लोक नहीं बदल पाए तो उनके अर्थ विकृत कर दिए। आज इतनी गीताएं चल रही हैं। प्रचलन में है। आप श्लोक को देखिए और नीचे उसकी जो व्याख्या करी गई है उसको देखिए। आप सर पकड़ लेंगे। कहेंगे ये क्या करा है? श्लोक क्या बोल रहा है? और ये क्या अर्थ कर दिया उसका? अहंकार ऐसा है। उसको आप जाकर सच बता दें। आप छोड़िए। गीता भी सच बता दे। श्री कृष्ण भी जाकर के सच बता दें। तो उसका अर्थ उल्टा कर लेगा। तो यह मेरा पहला प्रश्न था। कैसे? उसके लिए चाहिए ईमानदार जिज्ञासा विवेक। दूसरी बात किसी तरीके से आपको आश्वस्त कर भी दिया गया। मान लीजिए मैं आपको आश्वस्त

47:12 कर देता हूं कि मैं आपसे जो बात बोल रहा हूं वो बिल्कुल सही है। यथार्थ है। तो भी आप मना कर सकते हो कि नहीं स्वीकारूंगा। और यह खूब होता है। आप बिल्कुल अंत में ही कह सकते हो। बात तो ठीक है पर हमें नहीं माननी। आपने देखे होंगे ऐसे लोग जो आपसे कह देंगे बात होगी ठीक पर हम नहीं मानते। तो जो बात आपको ठीक भी लग रही है उसको जीवन में उतारने के लिए अपने प्रति बड़ा प्रेम चाहिए। हमारे पास ना जिज्ञासा होती है ना प्रेम होता है। और जब तक ज्ञान और प्रेम का यह संगम नहीं होगा तब तक जीवन में परिवर्तन भी नहीं आएगा। लोग बात करते हैं ज्ञान मार्ग की प्रेम मार्ग की जैसे ही दोनों अलग-अलग हो। एक ही मार्ग है जिसमें ज्ञान और प्रेम दोनों होते हैं। जहां कहीं भी

47:59 ज्ञान और प्रेम को दो अलग-अलग मार्ग करके बताया जा रहा है। वहां बात मूढ़ता की हो रही है। ज्ञान बिना प्रेम के कुछ नहीं कर सकता। और प्रेम बिना ज्ञान के अंधा है। बिल्कुल। ज्ञान और प्रेम का संगम जहां होता है वहां जीवन परिवर्तन होता है। विवेक चाहिए और प्रेम चाहिए। विवेक आपको बताएगा किसकी बात सुने। विवेक आपको बताएगा कौन सी बात मानने लायक है और प्रेम आपसे उस बात को जीवन में उतरवाएगा। विवेक बताएगा यह बात ठीक है। और प्रेम कहेगा अब जब बात ठीक है तो उसको जिंदगी

48:44 बना लो। यह दोनों जब होते हैं तो जीवन में उतर आते हैं। इसे कंडीशनिंग नहीं कहते। बात तो सब बाहर से ही आनी है। पर जब विवेक और प्रेम होता है तो फिर सिर्फ असली बात भीतर जाती है और जिंदगी बन जाती है। ये बहुत अच्छी बात है। अब हम शुरू करते हैं बट आप जान आपकी जानकारी के लिए कि जगन्नाथ मंदिर आप कब आए हैं मुझे पता नहीं। आए होंगे या नहीं आए होंगे। उसमें बड़ा अच्छी बात होते हैं कि वी हैव हियर ह्यूमनाइज द गॉड। गॉड इज वाकिंग अमंग अस। गॉड इज स्लीपिंग। गॉड इज सफरिंग फ्रॉम फीवर। गॉड टेकिंग फूड लाइक अस एंड स्टार्टेड फ्रॉम अद्वैत फ्रॉम शंकराचार्य से लेके अद्वैत मधवाचार्य से लेके ऑल प्रॉफेट्स लास्ट 1000 इयर्स में इफ यू

49:30 इनसाइड द टेंपल यू विल नॉट फील दैट इट इज़ मोर और लेस इंटरेक्शन विथ एनी गॉड इट इज़ ऑल अबाउट वी आर लिविंग विथ दिस कल्चर वी डोंट हैव वी आर नॉट नॉट मच रिचुअल ड्रिवन वी डोंट हैव अ फीलिंग्स दैट देयर इज़ अ गॉड एंड वी नीड टू गो डाउन एंड प्रेयर फॉर हिम मोर और वी हैव अ कॉम्बिनेशन ऑफ़ अद्वैत एंड द्वैत एंड सम हाउ इट हैज़ स्प्रेड ओवर द स्टेट टू टेक इट फॉरवर्ड। वैसे इस पर मैं एक बात आपको जोडूंगा अगर आप अनुमति देंगे तो। जी अद्वैत और द्वैत का कॉम्बिनेशन जैसा वास्तव में कुछ होता नहीं है। क्योंकि अद्वैत में द्वैत पहले ही समाहित है। देखिए अद्वैत वास्तविकता के तीन तलों की बात करता है।

50:20 जिसमें जो नीचे के दो तल हैं वो तो पहले ही द्वैतात्मक हैं। सबसे निचला तल होता है प्रातिभाषिक जिसको आप काल्पनिक कह सकते हो। वहां भी द्वैत है क्योंकि अहंकार द्वैत के लिए अहंकार जरूरी है। द्वैत के दो हां द्वैत के दो छोर होते हैं ना द्वैत माने दो छोर। एक छोर पर हमेशा अहंकार होता है। तभी तो दूसरे छोर पर कुछ होगा। तो अद्वैत में द्वैत के लिए पूरी जगह है। अद्वैत और द्वैत को दो अलग-अलग मानने की जरूरत नहीं है। अद्वैत तीन तलों की बात करता है। जिसमें नीचे के दो तल है प्रातभाषिक और व्यवहारिक। और इन दो तलों पर द्वैत पहले से ही बैठा हुआ है। हां जो

51:05 आपकी उच्चतम संभावना है पारमार्थिक वहां पर द्वैत नहीं होता। वहां अद्वैत है। तो द्वैत तो अद्वैत में बैठा है। आपको कॉम्बिनेशन करने की कोई जरूरत नहीं होती है। अद्वैत तो द्वैत को पूरी मान्यता देता है। वास्तव में जितनी विधियां हैं वो द्वैत में ही लागू हो सकती हैं। ये जो हमारी सारी बातें हो रही हैं ये द्वैत में ही हो सकती हैं। भाषा पूरी द्वैतात्मक होती है। जब तक खाल है तब तक तो द्वैत रहेगा। क्योंकि खाल है। मान लीजिए आप कह दो कह भी दो सैद्धांतिक रूप से कि भीतरी अहंकार मिट गया लेकिन अभी भी दूरी तो रहेगी ना क्योंकि यह शरीर इस खाल पर समाप्त हो जाता है। आपका शरीर आपकी खाल पर समाप्त हो जाता है। तो आपकी एक सीमा खींच गई। मेरी एक सीमा खींच गई। तो अद्वैत

51:53 द्वैत को पूरी तरह मान्यता देता है। अद्वैत में अलग से द्वैत को मिलाने की कोई जरूरत ही नहीं है। क्योंकि अद्वैत में द्वैत निहित है, समाहित है। एक तरह से समझिए कि वो उसका सबसेट है। और अद्वैत कहता है कि द्वैत के तल पर ही ईमानदारी से जी करके तुम पारमार्थिक तल पर प्रवेश पा सकते हो। हम इसको कहा करते हैं फैक्ट्स आर द डोर टू ट्रुथ। अहंकार को तो व्यवहारिक तल पर ही जीना है। और व्यवहारिक तल पर तो सब द्वैतात्मक है। मैं हूं आप हैं। दो अलग-अलग हो गए ना। हो गया द्वैत। मैं हूं यह सोफा है। आप हैं वो माइक है। मैं हूं। यह माइक है। ये सब द्वैत है। तो द्वैत की पूरी जगह है। और द्वैत के तल

52:39 पर ही हमें जिज्ञासा करनी है। जितनी विधियां हैं, जितने साधन है, साधन चतुष्टय है उसमें सब द्वैतात्मक ही तो है। वैराग्य कैसे होगा बिना द्वैत के? जिज्ञासा कैसे होगी बिना द्वैत के ततक्षा उपरति कहां से आ जाएंगे बिना द्वैत के मुमुक्षा भी कैसे होगी अगर द्वैत नहीं है तो तो द्वैत तो अद्वैत द्वारा स्वीकार्य है क्योंकि अहंकार है तो द्वैत होगा और अहंकार है तभी तो वो अपनी मुक्ति के लिए यत्न करेगा ना तो इन दोनों को अलग-अलग धारा समझने की जरूरत नहीं है। अद्वैत में द्वैत पहले ही विराजमान है। कुछ भक्तिवादी सिद्धांत और विद्वान का यह भी कहना है। हमने सुने हैं कि अद्वैत जो है कि डज नॉट बिलीव एनी फॉर्म ऑफ गॉड कि कोई रूप नहीं है, कोई आकार नहीं है, निराकार है, एट्रिब्यूटलेस

53:25 है, कलरलेस है। अद्वैत डज नॉट अलाउ स्क्रिप्चर्स लाइक महापुराण जो है अदर देन वेद, उपनिषद और गीता। अद्वैत डज नॉट अप्रूव और अलव एनी अदर स्क्रिप्चर्स। नहीं अद्वैत क्या करेगा? जो जितने भी पुराण हैं सब स्मृति के अंतर्गत आते हैं। स्मृति साहित्य के और श्रुति और स्मृति दोनों खुद ही कहते हैं कि स्मृति का जो भी वचन श्रुति के विरुद्ध जाएगा उसको तत्काल अस्वीकार कर दो। तो पुराणों की बातें जहां तक श्रुति संगत है उनको स्वीकार किया जाएगा और पुराण की कोई बात हो कोई श्लोक हो कोई कथा हो अगर वह श्रुति का माने वेदांत का

54:10 और उपनिषद का उल्लंघन करेगी तो यह नियम है कि उसको आपको अस्वीकार करना पड़ेगा। यह सनातन का नियम है। यह कोई अद्वैत की हठ नहीं है। यह नियम है कि श्रुति अपौरुषेय होती है। स्मृति तो इंसान ने बनाई है। स्मृति में आपकी ये सब धर्मशास्त्र आ गए, धर्म ग्रंथ आ गए, आपके इतिहास ग्रंथ आ गए और आपके पुराण आ गए। यह सब स्मृतियों में गिने जाते हैं। और स्मृतियां अस्वीकार करी जा सकती हैं। स्मृतियों को हम जरूर स्वीकार करेंगे। स्मृतियों में भी सौंदर्य हो सकता है। यदि वो श्रुति का अनुगमन करती हो। स्मृति श्रुति का अनुगमन करेगी तो स्वीकार है। पर स्मृति अगर श्रुति का उल्लंघन करेगी तो श्रुति को तो श्रुति को ऊपर रख के स्मृति

54:58 को तत्काल अस्वीकार करना पड़ेगा। जी आचार्य प्रशांत की नजर से आचार्य प्रशांत क्या है? जरूरत नहीं पड़ती है। प्रश्न प्रासंगिक है। आपकी नजर से मैं क्या हूं? आपके लिए उपयोगी वो है। वी शुड टेक नाउ क्वेश्चंस प्लीज एनीवन आचार्य जी नमस्ते। जी नमस्ते। मैं आपसे गीता कार्यक्रम से तीन साल से लगभग जुड़ी हूं। सर मेरी क्वेश्चन है अ टी डब्ल्यूए चैप्टर 144 से। सर आप बोलते हैं वहां पे फ्रीडम फ्रॉम बॉन्डेजेस इज व्हाट वी ऑल हैव टू लीव फॉर कॉन्शियसली और अनकॉन्शियसली द डिफरेंस अमोंग पीपल देन

55:45 लाइ इन द पाथ दे टेक फॉर देयर लिबरेशन अ सर मेरे क्वेश्चन है इसमें सर मेरे आसपास के लोग और जब मैं खुद को देखती हूं मैं मुक्ति के बारे में सोचती ही नहीं हूं जैसे अपनी सभी शारीरिक जरूरतों को पूरा करना अपनी फैमिली के कुछ कर्तव्यों को पूरा करना और इसी में लगी रहती हूं फिर कैसे कहा जा सकता है कि हम सब किसी ना किसी तरह आजादी के लिए जी रहे हैं? नहीं आजादी के लिए ही जी रहे हैं। पर जैसा आपने उद्धृत करा ना कि कॉन्शियसली और अनकॉन्शियसली अनफॉर्चूनेटली इट इज मोर अनकॉन्शियसली देन कॉन्शियसली। बात समझ रहे हैं? मोर अनकॉन्शियसली देन कॉन्शियसली। जैसे

56:32 अभी बात हो रही थी कि पैसा कमाना है। पैसा कमाना है। इस महीने का या इस क्वार्टर का मुझे रेवेन्यू टारगेट पूरा करना है। जो भी व्यक्ति जो कुछ भी कर रहा है वो कर तो इसीलिए रहा है क्योंकि उसका अहंकार छटपटा रहा है। हम लेकिन जरूरी नहीं है कि आप जो कर रहे हो उससे उस छटपटाहट को शांति मिलेगी ही। अगर आपने उस छटपटाहट को सिर्फ अनुभव करा है, सिर्फ अनुभव करा है तो आप जो करोगे वो छटपटाहट को और बढ़ाएगा। लेकिन आपने अगर अपनी छटपटाहट, अपनी बेचैनी को सिर्फ अनुभव ही नहीं करा है। समझा है

57:21 तो आप जो करोगे उससे वो बेचैनी घटेगी। इन दोनों बातों में जमीन आसमान का अंतर है। मैं दोहराता हूं आपके लिए। आप बेचैन रहते हो भीतर से? सब रहते हैं। जो पैदा हुआ है वो बेचैन है। इसीलिए नींद अच्छी लगती है। क्योंकि नींद जब सोते हैं तो कुछ घंटों के लिए चैन मिल जाता है। शांति मिल जाती है। इसीलिए जब सो के उठते हैं तो कहते हैं बड़ा तरोताज़ा हो रहा है अनुभव। हम ये बेचैनी अनुभव तो सबको हो रही है। लेकिन अनुभव करने का मतलब जानना या समझना नहीं होता। ठीक वैसे जैसे आप अपना पेट दर्द अनुभव करते हो। पर क्या आप जानते हो कि पेट में दर्द क्यों हो रहा है? वो डॉक्टर बताता है। अनुभव तो करते हो पर जानते नहीं हो कि यह पेट दर्द चीज क्या है। वैसे ही अहंकार एक बेचैनी का नाम है जिसको सब अनुभव करते हैं। और अनुभव करने के कारण ही हम पूरी

58:08 जिंदगी वो करते रहते हैं जो हम करते हैं। कोई इधर को दौड़ रहा है, कोई उधर को दौड़ रहा है, कोई कूद रहा है। कोई किसी रिश्ते में घुस रहा है, कोई किसी नौकरी में घुस रहा है। कोई कहीं जाकर के दोस्तियां बना रहा है। कोई राजनीति में जा रहा है। कोई मंदिरों की तरफ जा रहा है। कोई कह रहा है नहीं अब मैं नास्तिक हो गया। यह सब जो तरीके हैं, यह अपनी बेचैनी को अनुभव करने के कारण ही हैं। लेकिन हमें भ्रम यह हो जाता है कि अगर मेरी बेचैनी मुझे अनुभव हो रही है तो मैं उस बेचैनी को समझता भी हूं। नहीं समझते नहीं है। हम समझते नहीं है। जब आप अपनी बेचैनी को समझोगे तो उससे बिल्कुल एक अलग तरह का कर्म पैदा होगा। क्योंकि वह एक अलग केंद्र एक अलग कर्ता से आ रहा है। समझ एक

58:53 अलग केंद्र होती है। तो सबसे नीचे क्या है? हमारे हमारे जीवन का हमारे कर्मों का जो ड्राइवर है जो चालक है हम वो क्या है? वो तो बेचैनी ही है। बेचैनी ही है। लेकिन बेचैनी को हम दो तरीके का ट्रीटमेंट दे सकते हैं। बेचैनी के साथ हमारा दो तरह का रिश्ता हो सकता है। एक क्या रिश्ता है? मैंने आपसे क्या बोला कि आप बेचैनी को सिर्फ अनुभव करते हो। बेचैनी तो है। एक आदमी है जो उसे सिर्फ अनुभव करता है। दूसरा आदमी है जो सिर्फ अनुभव करने पर रुक नहीं जाता। वो कहता है अनुभव हुई है कोई बात तो उसको समझूंगा भी कि वो बात क्या है। अब यहीं पे सारा अंतर आ जाता है। जिसने सिर्फ अनुभव

59:40 करा है हम वो बिल्कुल एक गलत दिशा में चल देगा। तो जिनसे अब आपको एक एक पागलपन भीतर से उठता है। दर्द हो रहा है। दर्द हो रहा है। दर्द क्यों हो रहा है? किस दिशा जाना है आपको पता नहीं। परकि दर्द हो रहा है तो आप दौड़ पड़ते हो। यह है अनकॉन्शियस एक्शन। यह भी आया दर्द से ही है। पर दूसरा है कि दर्द हो रहा है और मैं जानता हूं कि यह दर्द क्या है। क्योंकि मैं इस दर्द को जानता हूं तो मैं इसकी दवा भी जानता हूं। यह है कॉन्शियस एक्शन। तो आपको अपने बारे में यह आत्मविश्वास छोड़ना पड़ेगा कि अपने सब अनुभवों को आप

1:00:26 जानते भी हो। मान्यताएं होती हैं ना वो आपको ज्ञान से रोक देती हैं। सिर्फ इसलिए कि आप किसी चीज से परिचित हो। किसी बात का आपको अभ्यास है। किसी बात का आपको बार-बार अनुभव हो रहा है। आप उस चीज को जान नहीं गए। हो सकता है किसी चीज का आपको दिन में 70 बार अनुभव होता हो। तो आप जान गए क्या? हो सकता है कि किसी आप आप सांस लेती हैं, लगातार सांस लेती हैं। क्या आप जानती हैं कि किस तरह से फेफड़े इस हवा में से ऑक्सीजन को निकाल लेते हैं और फिर खून तक पहुंचा देते हैं। अनुभव तो लगातार हो रहा है। पर जानते तो कुछ नहीं है ना। इसीलिए जब लंग कैंसर होगा तो आपको पता भी ना चले। वो फिर डॉक्टर ही बताएगा कि अरे लंग कैंसर है आगे बढ़ गया। सांस तो

1:01:13 आप ले रही थी रोज-रोज़। लंग कैंसर डॉक्टर को क्यों बताना पड़ा? क्योंकि अनुभव लेना और जानना एक ही बात नहीं होते। आप बात समझ रहे हैं? कितने ही शब्द हैं जिनका आप इस्तेमाल हर समय करती रहती हैं। उदाहरण के लिए प्रेम। बताइए प्रेम क्या है? पर आप दिन में 100 बार प्रेम शब्द का उपयोग करती होंगी। आप जान नहीं गई उपयोग करने से। पैसा कैरियर जीवन संबंध ईश्वर स्वर्ग, नर्क, मुक्ति यह सब शब्द हैं जिनका इस्तेमाल आप दिन भर करते हो। करते हो कि नहीं करते हो? रिलेशनशिप, जॉब, मनी, करियर, रिस्पांसिबिलिटी। रिस्पांसिबिलिटी। बाप रे बाप कितना भारी शब्द है। रिस्पांसिबिलिटी। इसका इस्तेमाल आप हर समय

1:01:59 कर रहे होते हो। पर क्या आप रिस्पांसिबिलिटी का मतलब समझते हो? तो आप जिस चीज के अभ्यस्त हो, जिस चीज का आप खूब अनुभव लेकर बैठे हो, जरूरी नहीं है कि आप उसे जानते हो, बल्कि ज्यादा संभावना यह है कि जिस चीज का आपको जितना अभ्यास और जितना अनुभव है, आप उसे उतना कम जानते होगे। और इसीलिए हम सबके एकशंस अनकॉन्शियस होते हैं। अभ्यास और अनुभव हमें यह भ्रम दे देते हैं। हमें इस भुलावे में धोखे में डाल देते हैं कि हमें कुछ पता है। जबकि पता हमें कुछ नहीं है। हमें सिर्फ अभ्यास हो गया है। हमें सिर्फ अनुभव हो गया है। अनुभव से आप कुछ जान नहीं गए। अभ्यास से आप ट्रेंड हो गए हो। रियलाइज्ड नहीं हो गए। किसी को किसी चीज

1:02:45 में ट्रेन कर देना और किसी को किसी चीज की अंडरस्टैंडिंग दे देना। इन दोनों में जमीन आसमान का अंतर है। ट्रेनिंग दे के आप मैकेनिक बना सकते हो। पर मैकेनिक जिस चीज पे काम कर रहा है वो चीज क्या है? ये साइंटिस्ट जानता है। हम लोग ज्यादातर मैकेनिक की तरह जीते हैं। ये अनकॉन्शियस एक्शन है। हम नेक्स्ट क्वेश्चन। आचार्य जी चरण स्पर्श प्रणाम। हमारे साथ डॉक्टर श्रीनिवास कटवारे। फर्स्ट क्वेश्चंस मेनी पीपल्स आर सेइंग विदाउट डूइंग पूजा आई नेवर टेक अ ड्रॉप ऑफ वाटर। पूजा करने से पहले मैं एक भी बूंद पानी नहीं लेता हूं। ये उनका अहंकार है या समर्पण? सेकंड क्वेश्चन एक-एक करके एक-एक करके एक-एक करके एक-एक करके एक-एक करके

1:03:31 एक-एक करके मैं याद नहीं रख पाऊंगा। आप जो बोलते हो ना उस पर एक बस उसी समय तात्कालिक मेरी ओर से एक उत्तर आता है। स्मृति में मैं कुछ नहीं रख पाता। हम पूजा करे बिना जल की बूंद भी ना लेना बड़ा गहरा और बड़ा सुंदर प्रतीक है। दुर्भाग्य की बात यह है कि लोगों ने इसका अर्थ नहीं समझा और इसको बस भौतिक तल पर लागू कर दिया। अहंकार प्यासा होता है। प्यासा कौन है? शरीर नहीं। अहंकार। प्यासा कौन है? शरीर नहीं। अहंकार। ठीक है? उसको जो जरूरत है वह सिर्फ भौतिक चीजों की नहीं है।

1:04:20 भौतिक चीजों की जरूरत किसको होती है? शरीर को होती है। अहंकार को आप कोई भी भौतिक चीज दे दो, उसके खजाने भर दो, फर्नीचर भर दो, गाड़ियां भर दो, इमारतें भर दो, राज्य भर दो, उसको चैन नहीं मिलता। अहंकार प्यासा है। अहंकार किसके लिए प्यासा है? अहंकार उसके लिए प्यासा है। वह एकमात्र जो सचमुच पूजनीय है उसको सत्य बोलते हैं। तो जब कहा जाता है कि पूजा करे बिना पानी की बूंद भी मत लेना। तो उससे आशय यह है कि सत्य ही है एकमात्र जो अहंकार की प्यास बुझा सकता है। और सत्य को अगर तुम जीवन में नहीं ला रहे तो बाकी तुम अपने आप को जो कुछ भी दे रहे हो व्यर्थ है। उसको मत

1:05:06 लेना। इसका मतलब यह नहीं है कि जिंदगी झूठ में बिता रहे हो और अगर पानी नहीं पी रहे, पूजा कर रहे हो तो इससे तुम्हारा कल्याण हो जाएगा। इससे कोई कल्याण नहीं होगा। उसका जो गहरा संकेत है वो समझना पड़ेगा। पूजा किसकी हो सकती है? मातृसत्य की। वही तो पूजनीय अहंकार को वही तो चाहिए। उसी का तो प्रेम है अहंकार को। तो उसको पूजो और उसको पूजे बिना किसी भौतिक वस्तु की ओर मत भागो। यह है संकेत। धन्यवाद। कुछ देर से पहले हम लोग यह बात कर रहे थे कि कुपुत्र जायती कचपि कुमाता न भवती एंड यू सेड दैट वी आर ह्यूमन सो कुमाता कैन बी देर कुमाता कैन बी अवेलेबल इन द सोसाइटी। सो कैन वी थिंक दिस द एस पर दी प्रेजेंट रिक्वायरमेंट कैन वी चेंज दी रूल एंड रेगुलेशंस ऑफ पुराणास एंड वेदास

1:05:54 व्हाट वी आर फॉलोइंग फ्रॉम एजेस एंड नहीं ये ये ये जो बात है ये आज की नहीं है ये बात सदा की है। ऐसा नहीं है कि प्रेजेंट टाइम में ही माता को माता हो सकती है। माता सदा को माता हो सकती है। और वेद वेदांत उपनिषद आपसे कभी भी नहीं कहेंगे कि माता को माता नहीं हो सकती। कभी भी नहीं कहेंगे। यह सब तो बाकी बातें जो हैं यह सब तो देखिए स्मृतियों से आ जाती हैं और स्मृतियों की सारी सर परिकुलर दैट कैन वी चेंज द रूल एंड रेगुलेशन व्हाट वी आर फॉलोइंग इयर्स एंड नहीं नहीं चेंज की बात नहीं आपकी पहली बात ये थी कि मॉडर्न कॉन्टेक्स्ट में शायद माता को माता होने लगी है। कह रहा हूं कि मेनी रूल्स आर देयर वी आर फॉलोइंग एवरीथिंग

1:06:40 एवरीथिंग एवरीथिंग चेंज करने की कोई जरूरत ही नहीं है। क्योंकि मनुष्य आज जैसा है वैसा ही हमेशा से था। हमेशा से था जो नियम है उनके साथ समस्या ये नहीं है कि इंसान बदल गया है तो इसलिए नियम बदलो। समस्या यह है कि आपने नियम ना आज समझे ना पहले समझे। जैसे बहुतों को लगेगा कि पहले के लोग बहुत अच्छे होते थे। आज के लोग बहुत खराब हैं। खूब सुनते हैं ना आप इस तरह की बातें कि अरे पहले के लोग और होते थे आज के खराब हैं। नहीं मनुष्य पहले भी भ्रष्ट था। मनुष्य आज भी भ्रष्ट है। जैसे आपसे बहुत लोग बोलते हैं कि अरे पहले की ये चीज दूसरी होती थी। पहले का यह दूसरा होता था। नहीं मनुष्य जैसा रहा है

1:07:27 वृत्तियों से अपनी। पहले आज भी वैसा ही है। हां, बस आज के विषय बदल गए हैं। बाहरी विषय बदल गए हैं। भीतरी वृत्ति नहीं बदल गई है। तो जो सनातन बातें हैं उन सनातन बातों को आपको समझना है। नियम बदलने की कोई बात नहीं है। क्योंकि नियम वही बदलना पड़ता है जो काल सापेक्ष हो। जो काल पर आश्रित नियम हो उन्हीं को बदलने की जरूरत पड़ती है। पर काल पर आश्रित नियम मैं मानूं ही क्यों? यदि मैं सनातन सत्य में जी रहा हूं तो मुझे काल पर आश्रित किसी नियम को मानने की कोई जरूरत ही नहीं है। मुझे करना क्या है? नियम बदलने की कोई बात नहीं है। बात यह है कि जो सनातन तथ्य है आप उसको समझे और वो यह है कि अहंकार

1:08:13 को अहंकार ही होता है। इसीलिए माता को कुमाता होना पड़ता है। पिता को कुपिता होना पड़ता है। पुत्र को कुपुत्र होना पड़ता है। क्योंकि मैं मैं शब्दों को थोड़ा तोड़ मरोड़ रहा हूं पर समझाने के लिए। क्योंकि अहंकार कु अहंकार ही होता है। तो इसीलिए पुत्री को भी कुपुत्री होना पड़ता है और पति को कुपति होना पड़ता है और राजा को कुराजा होना पड़ता है। क्योंकि ये जितने भी हमने बोले ये सब है तो मूलत अहंकार ही ना। मनुष्य हैं तो अहंकार है। तो उसको ठीक कर लीजिए। बाकी बाहरी नियम कायदे बदलने से कोई बहुत लाभ नहीं होने वाला। अहंकार को ठीक कर लीजिए। पूरी दुनिया ठीक हो जाएगी। पहले भी यही बात लागू होती थी। आज भी वही बात लागू होती है।

1:08:59 एक सेकंड यहां लाइए कैमरा इनके पास कुछ है आज जी को दिखाने के लिए पहले दिखा लीजिए अरे और आपका सवाल क्या है अभी पूछिए श में नमस्ते आचार्य जी और आपको कला संस्कृति और मंदिरों का राज ओसा में स्वागत है। जैसे हमारा देश आज एक ऐसी तरफ जा रहा है जब हम एक ते सीमा तक विकसित भारत के लक्ष्य में आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन यह देश विकसित तब तक नहीं हो सकता जब तक हमारा 60% युवा अपने दम पर कुछ ना कर ले। जब मैं गांव जैसे मैं गांव से आता हूं। वहां के लोग

1:09:45 अभी भी कहते हैं कि यह सरकार ऐसी है, यह सरकार ऐसी है। इसने इतना घोटाला कर दिया है। उसने इतना घोटाला कर दिया है। लेकिन आज की युवा यह समझ सकती है कि जब तक युवाओं ने अपनी हिम्मत से कुछ नहीं करेंगे तब तक यह देश विकसित नहीं हो सकता। इसीलिए मेरा सवाल आपको यह है कि क्या आप कुछ ऐसी बात बता सकते हैं जो आज की हर युवा हर युवा पीढ़ी उसे फॉलो कर सकता है और भारत के विकसित होने के संदर्भ में अपना कुछ कर सकता है। धन्यवाद। धन्यवाद। तो अभी तक जो सारी बताएं वह किसके लिए थी? अभी तक जितनी बातें बोली वह किसके लिए थी कि अब मैं युवाओं के लिए अलग से क्या

1:10:31 बताऊंगा? युवा मनुष्य नहीं है क्या? सारी बातें मनुष्यों के लिए कर रहा हूं। मनुष्य मात्र के लिए कर रहा हूं। अहंकार उसी में तो होता है। तो युवा कुछ मनुष्य से अलग होता है क्या? जो बात है वो बच्चे, बूढ़े, जवान, स्त्री, पुरुष सब पर एक बराबर लागू होती है। युवा के लिए कुछ अलग से नहीं बोला जाता बेटा। अब अब क्या करें? वह बात आज से 2000 साल पहले जितनी लागू थी वह बात आज भी उतनी ही लागू है। वो बात अफ्रीकन पर जितनी लागू होती है चीनी पर भी उतनी ही लागू होती है। वो बात 15 साल वाले पर जितनी लागू होती है 85 साल वाले पर भी

1:11:17 उतनी ही लागू होती है। तो युवाओं के लिए या भारतीय युवाओं के लिए या ओसा के युवाओं के लिए कुछ अलग से नहीं बोला जाता। हम सब मनुष्य हैं। पहले ध्यान रखो। बाकी सारे जो भेद हैं वह सत ही है नकली हैं। स्त्री हो कि पुरुष हो कि कोई हो इंसान है। मनुष्य की चेतना है और उसका एक ही बंधन होता है। अविद्या अज्ञान अपने बारे में बड़ा आत्मविश्वास उसी से मुक्त होना है। यही संदेश है युवाओं को भी। जी नमस्कार आचार्य जी। जी काश आप यहां पर होते आपसे मिल पाते तो फिर शायद ये अरे हूं पूरी तरह हूं। मेरा प्रश्न ये है अ सबके मूल में अहंकार है और अहंकार को यदि मैं निकाल दूं तो मैं

1:12:03 रहूंगी क्या? अहंकार को मैं निकाल दूं माने कौन निकाल देगा? मैं या हम कोई भी अहंकार को यदि कोई भी माने क्या अरे मेरा प्रश्न अरे अहंकार कोई मैं समझ रहा हूं बात को। पर अहंकार आपका कोई विषय नहीं है। अहंकार आपका ऑब्जेक्ट नहीं है। अहंकार को मैं निकाल दूं। यह प्रश्न ऐसा ही है कि अहंकार को अहंकार निकाल दे, मैं ही तो अहंकार है। अहंकार को मैं निकाल दू ऐसा थोड़ी है कि अहंकार कही ट्यूमर हो गया उसको सर्जरी से निकाल देंगे। जी। ये जो बोल रहा है यही अहंकार है। यही अहंकार है। यही अहंकार है। ये अभी जो ऐसे सर हिला रहा है, जो नोडिंग कर रहा है यही तो अहंकार है। जो मुस्कुरा रहा है। इसको संभालने की बात आपने की थी। तो नहीं इसको संभालने की नहीं। इसको जानना है। मुझे ही जानना है मुझको ही।

1:12:52 मुझे ही जानना है मुझको ही। ये नहीं कहना है मैं अहंकार को जानना चाहती हूं। ऐसा लगता है फिर अहंकार जैसे इस टेबल पर रखा कोई मग है। जैसे कोई बाहर की वस्तु है। जैसे मुझसे अलग कोई विषय है। नहीं नहीं नहीं मैं ही अहंकार हूं। अहंकार को ऑब्जेक्टिफाई मत करिए। वो सब्जेक्ट है। उसे विषय मत बनाइए। वो विषयता है। उसे दृश्य मत बनाइए। वो दृष्टा है। हम मैं ही अहंकार हूं। मैं ही अहंकार हूं। और मुझे स्वयं को ही जानना है। इसीलिए उसको बोलते हैं आत्मज्ञान। आत्मज्ञान माने आत्मा को जानना नहीं होता। आत्मज्ञान माने अहंकार को जानना ही होता है। और उसकी विधि होती है आत्म अवलोकन। अहंकार को कैसे देखें? सारी अपनी हरकतें देख के। क्योंकि हमारी सारी हरकतें करने वाला तो अहंकार ही बैठा है। हमारी जो हरकतें होती हैं ना वह कोई

1:13:39 प्राकृतिक नहीं होती। हमारी हरकतें प्राकृतिक अधिक से अधिक बस हो सकती हैं। जब हम सो रहे हैं। आप सो रहे हैं। आपने करवट बदल ली। आप सो रहे हैं। आपका हाथ ऐसे चला गया। तब तो आप कह सकते हो कि आप प्राकृतिक हो। आप जब जगे होते हैं ना तो वो सक्रिय हो जाता है अहंकार। सारी हरकतें वही कराता है। तो अहंकार को जानने के लिए उसकी हरकतों को देख लो। देखो कि वो क्या बोल रहा है। देखो वो क्या सोच रहा है। देखो किधर को वो अपने कदम बढ़ा रहा है। देखो किसकी बात मान रहा है। देखो कहां सर झुका दिया। देखो कहां डर गया। देखो क्या इच्छाएं कर रहा है। बस ऐसे जाना जाता है अहंकार को और अहंकार को जानना माने स्वयं को जानना। मैं और अहंकार दो अलग-अलग बात नहीं है। अक्सर हम ये भूल कर देते हैं हम ऐसे ही कहते हैं कि मैं अपना अहंकार समाप्त करना चाहता हूं। मैं अपना अहंकार तो ऐसे ही हो गया जैसे मैं अपना पेन उधर

1:14:25 रखना चाहता हूं। अहंकार आपका पेन नहीं है। अहंकार आपका केंद्र है। अहंकार आपकी हस्ती है। अहंकार ही है जो आपके मुंह से बोल रहा है। अहंकार ही है जो आपकी आंखों से देख रहा है। आप ही अहंकार हैं। सो आचार्य जी। सो फाइनली वी विल ट्राई टू लिव अ लाइफ विदाउट ईगो। कोशिश तो जरूर करेंगे। होगा नहीं होगा पता नहीं। इसको वी विल ट्राई टू लिव अ लाइफ विदाउट ईगो। कुछ नहीं होता। क्योंकि आप अभी भी कह रहे हैं ईगो नहीं होगी मैं होऊंगा और मैं नहीं होऊंगा वी होगा। वी क्या होगा? ईगो के बिना लाइफ मात्र होती है। कोई उसे जीने वाला लिवर नहीं होता। देयर इज लाइफ बट नोबडी लिविंग एंड देन देयर इज लाइफ टोटल, लाइफ होल,

1:15:11 लाइफ कंप्लीट, लाइफ प्योर एंड लाइफ ब्लिसफुल। मेरा पर्सनली मानना है कि यह जितने भी किताब आचार्य जी ने लिखे हैं यह हर किसी को सशक्त कर रहा है। यह जो अंदर का जो डर है, जो कंफ्यूजन है, कहीं ना कहीं जो लगता है यह शायद इट्स द पावर ऑफ़ अद्वैत एंड आचार्य जी, आपका जो इंटरप्रिटेशन है, वो इंटरप्रिटेशन में कुछ मैजिक तो है, बिकॉज़ दैट इज़ हाउ दी मोर देन 60 मिलियन पीपल आर ट्रैकिंग यू टू नो इट। एंड आज के लिए हम आभारी हैं। ओब्लाइज्ड हैं कि आपके साथ इतना बात हो पाया। क्योंकि हम लोगों ने जितना क्वेरीज मिला था हमको यह मंथन कार्यक्रम करने से पहले हर किसी ने फोन करके आपको ही ढूंढ रहे थे।

1:15:58 मैं पूरी कोशिश करूंगा फिर आने की और सम्मुख बैठ पाऊं साथ बात हो पाए पूरी इस बार भी आने वाला था। कुछ कारण हो गए। जी तो लेकिन अभी जनवरी में आया था। कोशिश करूंगा कि फिर से उड़ीसा आ पाऊं। सबसे बात हो पाए सामने की। जी धन्यवाद। धन्यवाद आचार्य प्रशांत जी। आपकी हुई थी आज। हमारे हार्ट के तरफ से धन्यवाद। आपको खुशी होगी इस नाते जो हमारी अपनी ऐप है जिसमें हमारे गीता और बाकी सब कार्यक्रम चलते हैं। यहां पर बुद्ध हैं, गीता है, उपनिषद है, अष्टावक्र हैं। यह मुझे मिले मेरी जिंदगी बदली। यह तुम्हें मिलेंगे तुम्हारी जिंदगी भी बदलेगी। सच पूछिए तो मतलब लाखों नहीं तो कम से कम हजारों जिंदगियां तो हैं जो बिल्कुल बदली हैं।

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