0:00 ओरिएंटेशन कर सकते हैं। एफआईपी कंपलसरी है फॉर एवरीवन। पहले एफआईपी होता है और रिफ्रेशर कोर्स होता है। सर इंडक्शन और ओरिएंटेशन तो केवल स्टार्टिंग में होगा। एक ही बार होगा सर। एक ही बार। चलिए स्टार्ट करें। आई रिक्वेस्ट अजय कुमार सर तो प्लीज स्टार्ट द सेशन। ओके सर। सब लोग आ जाइए। अपना कैमरा ऑन कर लीजिए। अब अभी 37 आए हैं। अभी करते हैं शुरू। दो मिनट बचा है। हां सर। तो ठीक है ना? तो कभी हम भी तो स्टार्ट करते हैं तो लोग पांचप मिनट बाद आते हैं तो हम भी दो मिनट पहले स्टार्ट करके देख लेते हैं। ओके। ओ कोई दिक्कत नहीं है सर।
0:46 यस सर। स्टार्ट करिए। गुड इवनिंग एवरीवन। आई वुड लाइक टू बिगिन बाय एक्सटेंडिंग माय सिंसियर ग्रेटट्यूड टू आवर एक्सट्रीम कन्वेनर प्रोफेसर संजीव पांडे सर फॉर गिविंग मी दिस वंडरफुल अपोरर्चुनिटी ऑन बिहाफ ऑफ आवर कन्वेनर प्रोफेसर संजीव पांडे सर एंड मायसेल्फ अजय कुमार जाड़ आई वुड लाइक टू वेलकम ऑल ऑफ यू टू टुडे सेशन द टॉपिक ऑफ आवर रिफ्रेशर कोर्स एनवायरमेंटल स्टडीज एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट दैट इज वेरीेंट टू ऑल ऑफ अस वी आर वेरी ऑनर्ड टू हैव विद अस टुडे ए डिस्टिंग्विश पर्सनालिटी डॉक्टर जी के
1:32 चंडोक मैडम डॉक्टर चंडोक इस करली द प्रिंसिपल ऑफ गुरु रामदास खालसा इंस्टट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी इन जबलपुर शी हैज ए पीएचडी इन केमिस्ट्री एंड ओवर 30 इयर्स ऑफ एक्सपीरियंस इन टीचिंग एंड रिसर्च व्हाट मेक्स हर प्रेजेंस सो वैल्यूएबल टू आवर टॉपिक इज हर डवर्स बैकग्राउंड अलोंग विद हर वर्क इन केमिस्ट्री शी आल्सो होल्ड आल्सो होल्ड्स ए पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन कंप्यूटर इन कंप्यूटर एप्लीकेशन एंड डिप्लोमा इन रिन्यूएबल एनर्जी हर रिसर्च ऑन सब्जेक्ट लाइक सेमीकंडक्टर नैनो पार्टिकल्स एंड लुमिनेसेंस
2:19 आल्सो कनेक्ट डायरेक्टली टू सस्टेनेबल सॉलश डॉक्टर चंडोक इस एन ऑथर ऑफ फाइव बुक्स एंड हैज पब्लिश मोर देन 30 रिसर्च पेपर्स शी आल्सो शी नोन फॉर हर डायनेमिक पर्सनालिटी एंड हर ग्रेट कंट्रीब्यूशन टू हायर एजुकेशन एंड साइंटिफिक डेवलपमेंट वी आर ट्रूली प्रिविलेज टू हैव हर इनाइट्स टुडे मैडम ऑन बिहाफ ऑफ एवरीवन वी एक्सटेंड ए वार्म वेलकम वेरी वार्म वेलकम टू यू थैंक यू मैडम थैंक यू थैंक यू अजय सर फॉर रीडिंग माय प्रोफाइल अ वेरी गुड आफ्टरनून टू वन एंड ऑल ऑनरेबल राजेश वर्मा जी सर कुलगुरु रानीग्र दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर प्रोफेसर एस एस संधू जी प्रोफेसर संजीव
3:06 पांडे कन्वीनर ऑफ दिस प्रोग्राम आई एम ग्रेटफुल टू ऑल ऑफ यू फॉर प्रोवाइडिंग मी सच एन अपॉर्चुनिटी टू डिववर अ लेक्चर एट मदन मोहन मालवीय टीचर्स ट्रेनिंग सेंटर आरडी वीवी इन रिफ्रेशर कोर्स ऑन एनवायरमेंटल स्टडीज एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट माय मायसेल्फ, डॉ. जी के चंडोक, प्रोफेसर ऑफ केमिस्ट्री एंड प्रिंसिपल ऑफ गुरु रामदास खालसा इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी जबलपुर। टॉपिक ऑफ़ माय टॉक टुडे इज़ एनवायरमेंटल इशूज़ एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट। इन दिस सेशन वी विल डिस्कस ऑन ओवरव्यू ऑफ एनवायरमेंट दैट व्हाट यू बीन बाय एनवायरनमेंट इट्स कंपोजिशन डिफरेंट पार्ट्स ऑफ अर्थ फेयर एटमॉस्फेयरेंस और सिग्निफिकेंस ऑफ द स्टडी ऑफ़ एनवायरमेंट एनवायरमेंटल इशूज़ लाइक ग्रीन हाउस इफेक्ट ग्लोबल वार्मिंग ओजोन लेयर डिप्लशन एसिड
3:53 रेन डिफॉरेस्टेड एंड डिस डेजर्ट डिस्टिप्लिकेशन डिफरेंट टाइप्स ऑफ पोल्यूशन लाइक एयर वाटर एंड नॉइज़ एज वेल एज द इफेक्ट ऑफ दिस ऑन इकोसिस्टम। व्हाट आर द सस्टेनेबल डेवलपमेंट व्हिच विल गिव अस अ क्लीन एंड ग्रीन एनवायरमेंट एंड पाथ टुवर्ड्स इट ऑफ द ग्रीन फ्यूचर टू लिव इन? कैन आई शेयर द स्लाइड प्लीज? फ्रॉम स्टार्ट। शल आई स्टार्ट? द टॉपिक ऑफ माय टुडेेस टॉक इज़ एनवायरमेंटल इश्यूज एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट।
4:40 फर्स्ट ऑफ़ ऑल वी शुड नो दैट व्हाट इज़ व्हाट द इज़ द मीनिंग ऑफ़ एनवायरमेंट और व्हाट इज़ एनवायरमेंट? द डेवलपमेंट दैट नीड्स टू प्रेजेंट विदाउट कॉम्प्रोमाइजिंग द एबिलिटी ऑफ फ्यूचर जनरेशन टू मीट देयर नीड्स इज द सस्टेनेबल एंड द एनवायरमेंटल इशूज़ प्रॉब्लम्स हैविंग आवर प्लेनेट्स लाइक अह फाइंडिंग द बैलेंस फॉर इकोनॉमिक ग्रोथ सोशल ग्रोथ फॉर वेल बीविंग एंड एनवायरमेंटल प्रोटेक्शन नेक्स्ट दिस स्टार्ट स्टार्ट। सो, लेट अस सी व्हाट इज द एनवायरमेंट। एनवायरमेंट इज़ द कॉम्बिनेशन ऑफ द नेचुरल
5:27 थिंग्स वी गेट एंड द मैनमेड थिंग्स। एनवायरमेंट का मतलब हमारे आसपास का जो वातावरण है वो एक तो नेचुरल है जो हमें शुरू से नेचर ने दिया है। लाइक ग्रीनरी, फॉरेस्ट, रिवर, ओशन, माउंटेंस, एनिमल्स, एटमॉस्फेयर, ऑक्सीजन ये सब चीज हमें नेचर ने दी है। इसके अलावा जो हमने अपना एनवायरमेंट बनाया है, दैट आर द बैन मेड थिंग्स लाइक सिटीज, बिल्डिंग्स, रोड्स, व्हीकल्स, डैम्स, इंडस्ट्रीज एटसेट्रा इन दोनों का जो इंटरेक्शन है, दैट इज़ एनवायरमेंट। एनवायरमेंट कम कंप्लीट्स ऑल द लिविंग थिंग्स एंड ऑल द नॉन लिविंग थिंग्स ऑन अर्थ व्हिच इज़ अराउंड अस। एवरीथिंग दैट सराउंड्स एंड इफेक्ट्स अस आल्सो। दीज़ आर नेचुरल थिंग्स एंड मैनमेड थिंग्स
6:13 आर ऑल इंटरकनेक्टेड व्हिच सपोर्ट लाइफ ऑन अर्थ। द कंपोज़िशन ऑफ़ एनवायरनमेंट एनवायरमेंट कंपोजज़ ऑफ द बायोटिक एंड एबायोटिक थिंग्स। तो बायोटिक मींस द लिविंग थिंग्स एंड एबायोटिक थिंग्स व्हिच आर द नॉन लिविंग थिंग्स लाइक एयर, माउंटेंस, बिल्डिंग्स एक्सट्रा एंड लिविंग थिंग्स आर प्लांट्स, एनिमल्स, एक्सेट्रा द कंपोनेंट्स इंटरेक्ट विथ इन लार्जर एनवायरमेंट्स। जो कंपोनेंट्स हैं इसके जैसे हमने बताया लिविंग एंड नॉन लिविंग ये आपस में इंटरेक्ट करते हैं जिसको मिला के दोनों को हम एनवायरनमेंट बोलते हैं। ये सारे के सारे एक एनवायरमेंटल स्फीयर पे रहते हैं और ये स्फीयर जो है डिफरेंट पार्ट्स में डिवाइडेड है लाइक एटमॉस्फेयर, हाइड्रोस्फीयर, लिथोस्फीयर एंड बायोस्फीयर। एटमॉस्फेयर वो पार्ट है जो एयर पार्ट है जो हमें दिखता नहीं है बट
7:00 हमारे आसपास हम उसे महसूस कर सकते हैं। जो गैसेस हैं लाइक ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड ये सारी गैसेस जो हमारे ब्रीथिंग के लिए जरूरी है। प्लांट्स के लिए जरूरी है। जैसे कार्बन डाइऑक्साइड प्लांट्स लेते हैं हम ऑक्सीजन लेते हैं। ये सारा एटमॉस्फेयर कहलाता है। इसके अलावा जितना भी वाटर बॉडी है लाइक रिवर, लेकक्स, ओशन दीज़ ऑल आर हाइड्रोस्फीयर। इसके बाद लिथोस्फीयर। लिथोस्फीयर इज द लैंड पार्ट ऑफ द अर्थ। जो रक्स हैं, सोइल्स हैं, मिनरल्स हैं। यह सारे पार्ट जो है यह कहलाता है लिथोस्फीयर। और इसके अलावा इसके बीच में जब हम रहते हैं दैट इज़ बायोस्फीयर। ऑल द लिविंग थिंग्स जो लाइफ है जिसमें भी चाहे वो प्लांट्स हो, चाहे एनिमल्स हो, चाहे ह्यूमन बीइंग्स हो, ऑल दीज़ आर अंडर बायोस्फीयर। इन सबको गवर्न करता है सन। सन की एनर्जी से ही यह सारा
7:47 कुछ है। अगर सन ना हो, तो फिर अर्थ जो है एक डार्क, कोल्ड और लाइफलेस जगह रह जाएगी। सन के कारण ही हमारे पास लाइफ है। जो बायोटिक और थिंग्स हैं वो सारे सन के कारण ही हैं। और ये सब जो मिलके बनते हैं कंपोज़िशन ऑफ एनवायरमेंट। द एनवायरमेंट इज़ द इज़ डिफाइंड एज़ द सम ऑफ़ ऑल लिविंग एंड नॉन लिविंग एलिमेंट्स एंड देयर इफ़ेक्ट दैट इन्फ्लुएंस ह्यूमन लाइफ। इट इंक्लूड्स बोथ बायोटिक एलिमेंट्स एंड लाइक ह्यूमंस, एनिमल्स, प्लांट्स एंड एबायोटिक लाइक एलिमेंट्स सच एज वाटर, लैंड, एयर एक्ससेटरा। तो अर्थ को हम डिफरेंट स्फीयर्स में बांटते हैं। जहां हम रहते हैं हमारा अर्थ जिसको हम अपना एनवायरमेंट कहते हैं। वह चार भागों में डिवाइडेड जैसे मैंने बताया लिथोस्फीयर, हाइड्रोस्फीयर, एटमॉस्फयर और
8:32 बायोस्फीयर। इन सबको हम एक-एक करके देखेंगे। तो लिथोस्फीयर जो है वो हमारा लैंड है जहां हम रहते हैं जिसको हम वर्चुअल देख सकते हैं। जो हमारा जो प्लेेंस हैं, डेजर्ट्स हैं, हिमालयज है, प्लांट्स हैं ये सारी चीज जो हैं वो लिथोस्फीयर में है। एटमॉस्फेयर जैसे मैंने बताया सारी गैसेस जो हैं जिसमें मेनली तीन तरह की गैसेस होती हैं नाइट्रोजन, ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड। नाइट्रोजन जो है दैट इज अबाउट 78% ऑक्सीजन इज 21% और इसके अलावा बहुत कम अमाउंट में कार्बन डाइऑक्साइड एंड H2O तो दीज़ आर ऑल कॉम्बिन कंबाइन एंड फॉर्म द लाइफ ऑन अर्थ जो एटमॉस्फेयर है जैसे हमने लैंड की बात कर ली और हाइड्रोस्फीयर की बात कर ली एटमॉस्फेयर जो है वो पांच लेयर्स में डिवाइडेड है जिस लेयर में हम जहां से सांस
9:18 लेते हैं वो कहलाता है ट्रोपोस्फीयर इसके जो 10 से 12 किलोमीटर जहां हम अर्थ पे रह रहे हैं। जमीन पे रह रहे हैं। इससे 10 से 12 कि.मी. जो है दैट इज़ ट्रोपोस्फीयर। उसके ऊपर का जो 35 कि.मी. का एरिया है वो कहलाता है स्ट्रेटोस्फीयर। उसके ऊपर का मिज़ोस्फीयर। उसके ऊपर थर्मोस्फीयर और लास्ट में एग्जोस्फीयर व्हिच इज़ द एंड ऑफ द एटमॉस्फयर। जिस लेयर पर हम रहते हैं, वह पहली लेयर कहलाती है। जो उसके सेकंड वाली जो है वह ओजोन लेयर कहलाती है। जिसमें हम जो एक प्रोटेक्टिव शील्डिंग है जो सन की लाइट अर्थ पे आती है। तो अर्थ और सन के बीच में जो प्रोटेक्टिव शील्डिंग लेयर की रहती है वो लेयर जो है ओजोन लेयर है जो एक ब्लैंकेट की तरह है। जो सन से जितनी भी है सन की एनर्जी बहुत ज्यादा होती है जो सन
10:04 अर्थ पे आती है। जिसमें से जो सिर्फ 30% जो है वो वापस रेडिएट हो जाती है। सिर्फ 70% रहती है। वह भी अब रेडिएशन के थ्रू थोड़ी कम हो जाती है। तो मेनली जो हमको ऑक्सीजन जरूरत जो हमको एयर की जरूरत पड़ती है वो उतनी ही आती है जितनी ओजोन लेयर बचा के वापस भेजता है। इसके ऊपर की जो लेयर है वो बहुत ही टेंपरेचर उसमें कूल रहता है। उसके ऊपर फिर हॉट एयर रहता है। और फिर उसके ऊपर आर्टिफिशियल सेटेलाइट वगैरह जहां हम लॉन्च करते हैं वो एरिया जो कहलाता है आयनोस्फीयर। और ये सारी जो लेयर्स हैं, डिफरेंट लेयर्स हम इसमें स्क्रीन पर देख रहे हैं। ये सारी एटमॉस्फेयर की डिफरेंट लेयर्स हैं। इसका नेक्स्ट दिखाएं। यह भी यह जो लेयर है, इसमें सबसे नीचे जो ट्रोपोस्फीयर है, सिर्फ हम यही एरिया देख सकते हैं और यूज़ करते हैं। इसके ऊपर का जो है वो हायर एटीट्यूड एरिया कहलाता है।
10:51 ट्रोपोस्फीयर जो है वो सबसे लोएस्ट लेयर एटमॉस्फेयर का है जो बहुत ही अर्थ के नजदीक रहता है जहां पे हम रहते हैं। ट्रोपो का मतलब होता है टर्निंग और चेंजिंग। यहां पे जो ये लेयर है एयर के साथ हमेशा चेंज होती रहती है। जैसे हम वेदर चेंज कहलाते हैं। रेल रेन होता है यहां पे क्लाउड्स होते हैं, स्टॉर्म्स होते हैं। तो ये लेयर जो है लगातार कभी भी मौसम के हिसाब से चेंज होती रहती है। जितना भी मौसम चेंज होता है वो इसी लेयर में होता है। और ये जो है थिनेस्ट लेयर है। जितने भी लेयर्स अभी हम देखेंगे पांच लेयर एटमॉस्फेयर की। इसमें से सबसे थिनेस्ट लेयर जो है वो यही लेयर होती है। इसमें जितना भी मास होता है बाकी ऊपर जो है सिर्फ गैसेस होती हैं यही लेयर ऐसा है जिसमें मास होता है जैसे स्मॉल डस्ट पार्टिकल्स या पार्टिकल्स हम देखते हैं सॉलिड पार्टिकल्स रहते हैं वो इसी लेयर में रहते हैं। ये 10 से 15 कि.मी. तक ऊपर
11:38 रहता है। और जैसे-जैसे एलटीट्यूड इनक्रीस होता है, हाइट इनक्रीस होते जाती है, टेंपरेचर वहां पे डिक्रीज होता है। जैसे हम देखते हैं जैसे हम पहाड़ों की तरफ जाते हैं तो टेंपरेचर जो है वो कम होता जाता है। और नॉर्मल जहां हमारे आसपास का है वह टेंपरेचर जो है वह कम रहता है। इसके ऊपर क्लाउड्स वगैरह रहते हैं जिससे टेंपरेचर जो है वो ऊपर कम रहता है। सेकंड लेयर जो है स्ट्रेटोस्फीयर की। ये सेकंड लेयर है एटमॉस्फियर की। यहां पे जब हम पहुंचते हैं तो ये 50 अराउंड 50 कि.मी. अबोव अर्थ सरफेस तक है। मींस 20 से लेकर 50 कि.मी. तक। स्ट्रेटो का मतलब होता है स्प्रेड आउट। इसमें पूरा स्प्रेड आउट है। इसी में हमको जो हम बता रहे हैं ओजोन लेयर होती है। जो ब्लैंकेट होती है जो वॉर्म हेयर को जो सन के यूवी रेडिएशंस को यहां तक आने में रोकती है। तो ये जो ब्लैंकेट
12:25 है ये सिर्फ जो यूजफुल यूवी रेडिएशंस है वो सिर्फ यहां तक आने देती है अर्थ तक। बाकी को वह वहीं पे रोक देती है। जितने जेट प्लेन वगैरह हैं, यह इसी लेयर पे फ्लो करते हैं, फ्लाई करते हैं। और इसमें भी जैसे-जैसे टेंपरेचर बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे अल्टीट्यूड भी बढ़ता जाएगा। और ये हमारी जो इंपॉर्टेंट लेयर है जो हमारे एक ब्लैंकेट की तरह यूज़ होता है जो हमारा प्रोटेक्टिव लेयर कहलाता है। जो हार्मफुल यूवी रेडिएशंस को सन से जो अर्थ में आती हैं उसको रोकता है। उसके ऊपर जो थर्ड लेयर है, वह मिसोस्फीयर। मिसो का मतलब होता है मिडिल लेयर। ये मिडिल लेयर जो है वो धरती से 80 कि.मी. तक के सरफेस तक रहता है। ये धरती को प्रोटेक्ट करता है ताकि जितने भी ये मेट्रियोटर्स हैं या ये जितने भी बहुत कूल एरिया रहता है। मेट्रियोर्ड्स जो हैं वो
13:11 ब-बन हो के इसी लेयर पर खत्म हो जाते हैं। उसको यहां तक अर्थ तक पहुंचने नहीं देते। इसमें भी जैसे-जैसे अल्टीट्यूड इनक्रीस होता जाता है, टेंपरेचर कम होता जाता है। जैसे यहां से सेकंड लेयर में होता है, वही प्रोसीजर इसमें भी होती है। अब जो इसके बाद लेयर आती है, वो है थर्मोस्फीयर। थर्मो से जैसे हम नाम समझते हैं थर्मो का मतलब होता है हीट। तो ये हीटेस्ट लेयर है या हॉटेस्ट लेयर होती है। ये आउटर मोस्ट लेयर है अपने एटमॉस्फेयर की। ये 80 कि.मी. से और ऊपर तक जाती है। थर्मो का मतलब थिक थर्मो लेयर जो है वो सबसे थिकेस्ट लेयर है और यहां पे बहुत ही ज्यादा जो टेंपरेचर है वो हाई रहता है। इसमें भी जैसे-जैसे टेंपरेचर बढ़ता जाएगा वैसे-वैसे एटीट्यूड इनक्रीस होता जाएगा। इसके अंदर दो एयर रहती है। जहां जैसे आयनोस्फीयर भी बोलते हैं। इसमें जो जितने भी गैसेस होती हैं वो आयंस के
13:56 फॉर्म में रहती हैं। इसीलिए टेंपरेचर यहां पे बहुत ज्यादा रहता है। इन सब के बाहर जो आउटर लेयर होती है मींस एक्सोस्फीयर। आउटर लेयर एग्जो लेयर जो होती है वो थर्मोस्फीयर के बाहर वाली लेयर कहलाती है जो 600 कि.मी. तक रहती है धरती से। और यहां पे हम जो भी जैसे सेटेलाइट वगैरह लांच करते हैं अपने टेंपरेचर या कम्युनिकेशन के लिए या अपने हाल जानने के लिए अपने स्पेस का ये सारे स्पेस शेटल्स और सेटेलाइट जो हैं यहीं पे ऑर्बिट में स्टेबल रहते हैं। नेक्स्ट ये एटमॉस्फियर की सारी लेयर्स एक बार फिर अपन देखेंगे। सबसे नीचे ट्रोपोस्फीयर है जहां पे हम रह रहे हैं। इसके ऊपर स्ट्रेटोस्फीयर है जिसमें एक कवरिंग रहती है जो हार्मफुल यूवी रेडिएशंस को अर्थ में आने से रोकती है। उसके ऊपर मेजोस्फीयर जो मिडिल लेयर कहलाती है। उसके ऊपर थर्मोस्फीयर जो आयनोस्फीयर भी कहलाता है
14:43 जिसमें आयंस में गैसेस रहती हैं और उसके बाद एग्जोस्फीयर नेक्स्ट। अब जब हमने यह जान लिया कि हमारा अर्थ और उसके आसपास का एनवायरमेंट है वह किससे इफेक्ट होता है तो हमें इस बारे में जानना बहुत जरूरी है कि अब एनवायरमेंट में के बारे में जितनी भी स्टडी होती है मींसेंस ऑफ स्टडिंग द एनवायरमेंट क्यों हम को एनवायरमेंट के बारे में जानना है तो स्टडीिंग द एनवायरमेंट इज मोर क्रूशियल देन एवर बिफोर इट्स नॉट मेयरली इन पर्स्यूड बट अ नेसेसिटी ऑफ़ द सर्वाइवल ऑफ द वेल बीइंग इससे हमें यह पता चलता है कि हमें अर्थ इसके बारे में खाली एकेडमिक नहीं है कि हमें मालूम होना चाहिए कि आसपास क्या हो रहा है क्या। जबकि यह हमारे वेल बीइंग के लिए बहुत जरूरी है कि नॉट जस्ट यह नेसेसिटी है हमारे लिए क्योंकि हमें जब हेल्दी स्टे करना है।
15:34 अगर हमें आसपास के बारे में मालूम नहीं होगा। वी डू नॉट नो अबाउट द कॉज ऑफ थिंग्स इन एनवायरमेंट। जब तक हमें उसके प्रॉब्लम के बारे में नहीं पता चलेगी। हमको तब तक हम यहां पे हेल्दी नहीं रह पाएंगे। इसीलिए हमको एनवायरमेंटल सिस्टम जो भी है उसके में उसकी जो भी प्रॉब्लम हो रही है वो हमें पहले आइडेंटिफाई करनी है। उसका क्या फ्यूचर चेंज होगा उसे प्रेडिक्ट करना है और उसके बाद उनके सॉलशंस भी निकालने हैं। तो इसीलिए एनवायरमेंट की स्टडी जो है वो बहुत जरूरी है। ये एक बहुत वास्ट सब्जेक्ट है। इसका छोटा सा ओवरव्यू हम देखेंगे कि जो एसेंशियल पार्ट है। अंडरस्टैंडिंग स्टैंडिंग द इंटरकनेक्टिविटी। जैसे मैंने बताया एनवायरमेंट में बायोटिक और एबायोटिक दो चीजें होती हैं। तो अगर हमें आवश्यकता की चीजें जो हैं वो कम तो नहीं हो रही हैं जो
16:20 हमारे बायोटिक के लिए लिविंग थिंग्स के लिए जो अगर जो भी पर्याप्त चीजें हमें चाहिए वो कम तो नहीं हो रही है। इसका हमें आईडेंटिफाई करना है और अगर कम हो रही हैं तो इसका हमें सलूशन निकाल के उसका निदान निकालना है। तो हमें पहले इसकी इंटरकनेक्टिविटी पता करनी है कि अगर हम लिविंग बीइंग हैं जैसे हम प्लांट्स और एनिमल्स और ह्यूमन को हम लिविंग बीइंग्स में कर रहे हैं। तो इससे इसकी जो कनेक्टिविटी है नॉन लिविंग थिंग्स के साथ उसमें कोई प्रॉब्लम तो नहीं आ रही है। मींस नॉन लिविंग थिंग्स के कारण हमें कोई प्रॉब्लम नहीं है या हमारे कारण नॉन लिविंग थिंग्स को तो कोई प्रॉब्लम नहीं है। तो इसको हमको पहले अंडरस्टैंड करना है। और इसके बाद इसके कारण जो क्लाइमेट चेंज हो रहा है। तो क्लाइमेट चेंज कब होता है? जब इसमें डिस्टरबेंस हो जो नेचर ने बनाया है वह तो बिल्कुल सही बैलेंस बनाया है पर कुछ उसके कारण इशूज़ के कारण यह जो
17:05 क्लाइमेट है वो चेंज हो जाते हैं। तो इस क्लाइमेट चेंज का सबसे पहला एग्जांपल है ग्लोबल वार्मिंग जिसको हम राइजिंग सी लेवल बोलते हैं या मेल्टिंग ऑफ ग्लेशियर्स बोलते हैं। तो ये क्यों हो रहा है इसका हमें पहले कारण जानना है और फिर इसका सॉल्यूशन ढूंढना है। फिर रिसोर्स मैनेजमेंट हमारी धरती के पास बहुत जो नेचर ने हमें दिया है वास्ट रिसोर्सेज दिया है। जितने भी वहां पर रिन्यूएबल सोर्सेस हैं जो नॉन रिन्यूबल सोर्सेस हैं यह सारे हमें मिले हैं पर वो एक लिमिटेड अमाउंट में है। तो उसकी लिमिट कहां तक है या कहां तक खत्म हो रही है उसको हमें कैसे कंजर्व करना है कैसे बचाना है ताकि वो सस्टेन कर सके हमारे तो हम तो इसको यूज़ कर ही रहे हैं पर हमारे फ्यूचर जो जनरेशन आएगी उसके लिए भी वो इस्तेमाल वो भी इस्तेमाल कर सके इसके लिए हम उसे कैसे कंजर्व करेंगे इसके बारे में हमें स्टडी करना है। फिर प्रोटेक्टिंग
17:50 ह्यूमन डेथ हेल्थ हमारी जो हेल्थ है इस पे इनका कोई असर तो नहीं पड़ रहा है। जो इफेक्ट है टेंपरेचर का या क्लाइमेट चेंज का इसके कारण हमारे ऊपर हमारी हेल्थ के ऊपर या प्लांट्स के ऊपर या एनिमल्स के ऊपर कोई अगर गड़बड़ हो रही है तो इसको हमें इसकी स्टडी करनी पड़ेगी और ये पढ़ के फिर हमें इसके बारे में जानकारी लेकर हमें इंफॉर्मेशन इनफॉर्मिंग पॉलिसी एंड डिसीजन मेकिंग अगर कुछ गड़बड़ हो रही है तो हमें कोई एक ऐसा डिसीजन लेना पड़ेगा गवर्नमेंट को ऐसा डिसीजन लेना पड़ेगा कुछ एथिक्स बनाने पड़ेंगे जिससे कि यह जितनी भी प्रॉब्लम हो रही है यह इसको हम दूर कर सकें और यह दूर हम कैसे करेंगे बाय फॉस्टिंग द इनोवेशन कोई ऐसी नई टेक्निक निकाल के कुछ ऐसे अवेयरनेस आपस में लाकर जितने भी एनवायरमेंट की प्रॉब्लम्स हैं वो न्यू इनोवेशन से हमें सुधारनी है जिससे हम
18:39 दिस अर्थ में बी फिट फॉर लिविंग और इसके साथ ही साथ हमें जितने लोग हम यहां रह रहे हैं उसको भी हमें एथिकल रिस्पांसिबिलिटी प्रमोट करनी है। उनकी मोरल ड्यूटी समझानी है। मोरल वैल्यू समझानी है कि हम ऐसा कुछ ना करें जिससे हमारे अर्थ को हमारे एनवायरमेंट को कोई नुकसान पहुंचे। क्योंकि अगर अर्थ और एनवायरमेंट को कुछ ना नुकसान पहुंचेगा तो इनडायरेक्टली हम भी इफेक्ट होंगे इससे। इसीलिए हमारी एथिकल रिस्पांसिबिलिटी कुछ बनती है। इसको भी हमें जानना है और यह जो की रीज़ंस हैं कि एनवायरमेंटल स्टडी क्यों जरूरी है। यह सब चीजें अगर हम जान जाएंगे और इसका हम अगर रिजल्ट निकालेंगे, कुछ इसका प्रॉब्लम को सॉल्यूशन निकालेंगे तो दिस अर्थ विल बी अ गुड प्लेस टू लिव इन फॉर ऑल ऑफ अस। यह था ऑफ स्टडिंग द एनवायरमेंट कि हमें पहले तो अंडरस्टैंड करना है जितना अपना
19:24 इंटरकनेक्टिविटी है। फिर एड्रेसिंग द क्लाइमेट चेंजेस देन रिसोर्स मैनेजमेंट जो भी हम रिसोर्स यूज कर रहे हैं अर्थ से उसको एक लिमिट में यूज करें ताकि वो हमेशा के लिए सर्वाइव कर सके। देन प्रोटेक्टिंग द ह्यूमन हेल्थ हमको पॉल्यूशन से जैसे हमने अभी जो बर्निंग केस चल रहे हैं अभी स्मोग ऑफ दिल्ली या वाटर डिजीज जो है इसके कारण सबके कारण जो भी प्रॉब्लम हो रही है ह्यूमन हेल्थ पे उस पे हम उसकी हमें जानकारी चाहिए और उस पे हमें प्रोटेक्ट करना है ह्यूमन लाइफ को और प्लांट लाइफ को उससे ये सारे इनोवेटिव आइडियाज लेके हम अपने अर्थ को एक गुड प्लेस बना सकते हैं और ये जो एनवायरमेंटल इश्यूज हैं जो जो प्रॉब्लम आ रही है हमारे अर्थ के कारण जो हमने अभी पता बोला कि इससे हमें पता लगाना है। तो ये जो इशूज़ है इसका हम पहले कैसे पता
20:10 लगाएंगे? जो अपना प्लेनेट है ही इज़ फेसिंग अ रेंज ऑफ कॉम्प्लेक्स एंड इंटरकनेक्टेड एनवायरमेंटल चैलेंजज़ लास्टली ड्रिवन बाय द ह्यूमन एक्टिविटी। जो नेचर में चल रहा है वो तो कभी-कभी नेचुरल कैलेमिटीज आती हैं। बट जो ह्यूमन एक्टिविटीज है उसके कारण जो अपने एनवायरमेंट को प्रॉब्लम आ रही है। हमें इस इशूज़ को एड्रेस करना है और एक कंप्रहेंसिव अंडरस्टैंडिंग बनानी है ताकि उसके हमें कॉज पता चल सके। उसके इंपैक्ट क्या है एनवायरमेंट पे वो पता चल चल सके और फिर उसका पोटेंशियल सलूशन हम बना सकें। टू सॉल्व द प्रॉब्लम वी मस्ट अंडरस्टैंड द कॉजेस एंड फैक्ट्स एंड पॉसिबल सॉलशंस। तो यह ओवरव्यू है। नेक्स्ट एनवायरमेंट एनवायरमेंटल इश्यूज का कि जो क्लाइमेट चेंज हो रहे हैं इसके लिए भी हम रिस्पांसिबल हैं। जो बायोडायवर्सिटी लॉस
20:56 हो रही है, पोल्यूशन, रिसोर्स डिप्लीशन एंड वेस्ट मैनेजमेंट। ये जो मेन की इशूज़ हैं, ये जितने भी हैं ये सब ह्यूमन के एक्टिविटीज के कारण हो रही हैं। तो इन एक्टिविटीज को हमें पता लगाना है और एक मोरल वैल्यू जनरेट करके ये सारे इशूज़ को सॉल्व करना है जिसे सिर्फ हम ही सॉल्व कर सकते हैं। जैसे क्लाइमेट चेंज है। तो राइज इन टेंपरेचर। क्लाइमेट चेंज कब होता है? जब राइज़ इन टेंपरेचर या डाउनफॉल होता है टेंपरेचर का। और यह किसके कारण होता है? कुछ ऐसे फ़ूलेज़ हैं, कुछ ऐसे इशूज़ हैं जैसे हमने ग्रीन हाउस इफ़ेक्ट होता है। इसको हम आगे देखेंगे ग्रीन हाउस इफ़ेक्ट क्या होता है? इसके कारण जो क्लाइमेटिक चेंज होता है, दिस इज़ वेरी डेंजरस फॉर ह्यूमंस एंड प्लांट्स एंड एनिमल्स। फिर बायोडायवर्सिटी लॉस जो हो रही है, जो इंस्टिंक्ट हो रहे हैं एनिमल्स और प्लांट्स। इसके इसका भी जो मेन रीज़न है, वह ह्यूमन एक्टिविटीज़ ही है।
21:44 जो हमारे स्पीशीज़ जो हैं, वह रिडक्शन हो रहे हैं। पोल्यूशन एक सबसे बड़ा कारण है। एयर पोलॉल्यूशन, वाटर पोलूशन, सयल पोलशन, नॉइसज़ पोलूशन। डिफरेंट टाइप के जो पोल्यूशन है यह भी जो है यह भी इंसान की एक्टिविटीज के कारण ही है। देन रिसोर्स डिप्लीशन जो हमारे को अर्थ नेचर ने हमें जो भी नेचुरल रिसोर्सेज दिए हैं हम उसका जब ओवर यूज करते हैं तब वो चीज जो है लिमिट से ज्यादा हम यूज कर रहे हैं। उससे हमें प्रॉब्लम भी होती है और फिर वो आगे के लिए सस्टेन भी नहीं रहते हैं। इसके कारण हमसे हमें जो सबसे चीज मेन चीज देखनी है वो है वेस्ट मैनेजमेंट। जितना भी वेस्ट हम इंडस्ट्रीज का या एग्रीकल्चर का या डोमेस्टिक वेस्ट जितना भी है उसको हम अगर प्रॉपर उसका मैनेजमेंट करेंगे तो यह टॉक्सिक केमिकल्स वगैरह जो हैं यह कम हो सकता है और जो एनवायरमेंटल इशू है यह
22:32 सॉर्ट आउट हो सकता है। देन ग्लोबल एनवायरमेंटल इशूज़ अब हम ग्लोबली देखें अर्थ की हम बात करें अपने एनवायरमेंट की बात कर रहे हैं तो जो प्राइमरी ग्लोबल एनवायरमेंटल इशू इज़ द ह्यूमन इंपैक्ट ऑन प्लनेटरी सिस्टम्स लीडिंग टू अ कास्केड इंटरकनेक्टेड प्रॉब्लम्स। जितनी भी प्रॉब्लम्स हैं बीइंग लिविंग की और नॉन लिविंग की ये सारी इंटरकनेक्टेड है। द मोस्ट सिग्निफिकेंट ऑफ दिस इज क्लाइमेट चेंज। जैसे हमने बताया क्लाइमेट चेंज किसके कारण होता है? ग्रीन हाउस गैसेस के कारण। प्राइमरी फ्रॉम द बर्निंग ऑफ़ फॉसिल फ्यूल्स। जब फॉसिल फ्यूल्स जो हम ज्यादा इस्तेमाल करते हैं ज्यादा उसका यूज़ कर रहे हैं। तो दिस इशू इज़ नॉट आइसोलेटेड। इट इज़ डीपली इंटरविंड विद द अदर क्रिटिकल कंसर्न्स। इसके कारण और भी बहुत सारे क्रिटिकल प्रॉब्लम है जो अराउज़ होते हैं। लाइक पॉल्यूशन, बायोडायवर्सिटी लॉस एंड
23:18 रिसोर्स डिप्ल्यूशन। सबसे पहले हम थोड़ी सी छोटी ब्रीफ़ जानकारी ले लें ग्रीन हाउस इफ़ेक्ट की कि यह क्या होता है ग्रीन हाउस इफ़ेक्ट? ग्रीन हाउस इफेक्ट जैसे हमने अभी एटमॉस्फेयर के बारे में पढ़ा था कि जो सन की रेज हैं वो जब अर्थ पे आती हैं तो ऑलमोस्ट बहुत सारी अमाउंट जो हार्मफुल गैसेस होती हैं जो फार्म हार्मफुल रेडिएशंस होती हैं वो ओजोन लेयर जो है वो वहीं पे एक्सेप्ट करके उसको धरती पर आने नहीं देता है। पर जो नीचे आती हैं जो ये ग्रीन हाउसेस गैसेस होती हैं अर्थ में जो अपने एटमॉस्फियर में लाइक कार्बन डाइऑक्साइड मीथेन, नाइट्रोजन ऑक्साइड, हाइड्रोजन ऑक्साइड और ओजोन। ये सारी गैसेस जो हैं ये उस हीट को जो सन की लाइट आती है उसको अब्जॉर्ब करती हैं और उसके कारण जो अर्थ है वो वार्म रहता है। उसका टेंपरेचर नॉर्मल रहता है जो हमारे
24:04 रहने के लायक रहता है। जैसे अगर ग्रीन हाउस इफेक्ट ना हो तो धरती का टेंपरेचर -18° से 15° सेंटीग्रेड रहेगा। जिसमें हम लोग सर्वाइव बहुत मुश्किल से कर पाएंगे। तो ग्रीन हाउस इफेक्ट नेचर का एक रोल है जिससे हम मौसम को एनवायरमेंट को रहने या अर्थ की सरफेस को रहने लायक बनाता है। तो यह जितने भी गैसेस हैं ग्रीन हाउस गैसेस हैं यह अर्थ के एटमॉस्फियर से जितनी भी हीट होती है उसको ट्रैप करके और प्रिवेंट करता है ताकि वो गैसेस पूरी वापस एस्केप ना हो जाए और जो अर्थ है उसका टेंपरेचर जो है वो ना बहुत ज्यादा ठंडा हो और ना बहुत ज्यादा गर्म हो जो इन हैबिटेबल हो अपने लिए जितने भी लाइफ फॉर्म्स हैं चाहे वो प्लांट्स एनिमल्स और प्लांट्स एनिमल्स और ह्यूमंस हो उनके लिए
24:51 रहने लायक बनेगा। ने जो ग्रीन हाउस इफेक्ट है इसका हम एक देखेंगे कि जो सोलर रेडिएशन आता है अर्थी पे अर्थ पे सोलर रेडिएशन व्हेन रीचेस अर्थ एनर्जी फ्रॉम द सन प्राइमरी इन द फॉर्म ऑफ शॉर्ट वेव विजिबल लाइट एंड यूवी रेडिएशन पाससेस थ्रू अर्थ्स एटमॉस्फियर ये जो गैसेस हैं जो एनर्जी है सन की वो अर्थ के एटमॉस्फेयर पे आती है तो इसको एब्सॉर्प्शन और रिफ्लेक्शन होता है इसका क्योंकि पूरी की पूरी सन की जो एनर्जी है वह अर्थ जो है अब्सॉर्ब नहीं करता है। सिर्फ 30% जो सोलर रेडिएशन है वो रिफ्लेक्ट बैक हो जाता है और कहां जाता है वो क्लाउड्स में, आइस में, स्नो में इन सब जगह जाता है और वो वापस रिफ्लेक्ट होता
25:37 है। जिसको जो फार्मूला जो प्रोसेस है वो कहलाता है एल्बिडो। एल्बिडो का मतलब होता है कि पूरी की पूरी सनलाइट जो है वो अब्सॉर्ब नहीं होती। उसमें से 30% जो है रिफ्लेक्ट बैक हो जाती है। और यह रिफ्लेक्ट बैक कौन करता है? जितने भी ट्रांसपेरेंट जैसे क्लाउड्स हैं, आइस हो गया, ग्लेशियर्स हो गए, स्नो हो गए इनसे रिफ्लेक्ट हो के वो वापस चली जाती है। बाकी जो रिमेनिंग 70% है, द रिमेनिंग 70% इज़ अब्सॉर्ब्ड बाय द अर्थ सरफेस लाइक लैंड्स एंड ओशंस। अर्थ में हम देखेंगे तो या तो लैंड है या पानी है। तो लैंड और ओशन जो है इन दोनों में जो वॉटर बॉडीज हैं ये उस 70% सन रेज सन रेज को अब्सॉर्ब करता है अपने एटमॉस्फेयर में और प्लनेट को वार्म करता है। अर्थ रीरेडिएट्स हीट। अब इसके बाद भी जितनी हीट अर्थ ने अब्सॉर्ब की है
26:23 उसको भी वो रीरेडिएट करता है। जैसे शाम के समय अपन देखेंगे कि सन तो नहीं होता फिर भी लैंड से हीट रेडिएट होती है। तो जो अर्थ की सरफेस है वो जब वार्म हो जाती है इट रीरेडिएट्स दिस अब्जॉर्ब्ड एनर्जी बैक टुवर्ड द स्पेस। स्पेस की तरफ वो वापस रेडिएट करती है। बट इन द फॉर्म ऑफ लॉन्गर वेव। आईआर रेडिएशन के फॉर्म में उसको वापस करती है। तो ये आईआर रेडिएशन जो है इससे हमको हीट फील होती है। जो अर्थ के सरफेस से या लैंड से हमें धरती से हमें जो हीट निकलती दिखती है वो आईआर रेडिएशन है जो रेडिएट हुई है ऑफ सनलाइट। ग्रीन हाउस गैसेस जो हैं वो कहलाती हैं कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, N2O और वाटर वेपर्स। यह सारी गैसेस जो हैं, यह मेन इंपॉर्टेंट रोल प्ले करती हैं जो सन की हीट को, सन की जो रेज़ है, उसको रेडिएशन को
27:11 एब्सॉर्ब करने की। दे हैव अ मॉलिक्यूलर स्ट्रक्चर दैट अलाउज़ देम टू अब्सॉर्ब दिस आउटगोइंग इंफ़्रारेड रेडिएशन। यह जो इंफ़्रारेड रेडिएशन वापस जा रही हैं इनको ये गैसेस जो हैं ग्रीन हाउस गैसेस बोलते हैं इनको। ये उनको अब्सॉर्ब कर लेती हैं। उसके बाद रीएमिशन एंड वार्मिंग। वंस अब्सॉर्ब दीज़ ग्रीन हाउस गैसेस रीएमिट द इंफ्रारेड रेडिएशन। एक बार अब्सॉर्ब करने के बाद ये जो ग्रीन हाउस रेडिएशंस हैं, जो ग्रीन हाउस गैसेस हैं, ये इन रेडिएशंस को वापस रीएमिट करती है इन ऑल डायरेक्शंस इंक्लूडिंग बैक टुवर्ड्स द अर्थ सरफेस। अर्थ सरफेस पे वापस रीरेडिएट करती हैं। दिस प्रोसेस ट्रैप्स हीट विद इन द लोअर एटमॉस्फियर वार्मिंग द प्लनेट टू टेंपरेचर सूटेबल फॉर लाइफ। ये जो ग्रीन हाउस गैसेस हैं ये वापस जो गैसेस हैं जो ग्रीन हाउस गैसेस जो हैं ये हीट को अब्सॉर्ब करती हैं
27:58 और यहां का टेंपरेचर जो लोअर एरिया का टेंपरेचर है लोअर एटमॉस्फेयर का टेंपरेचर है इसको थोड़ा सा राइज रखती हैं ताकि ये टेंपरेचर पे हम सर्वाइव कर सकें। यह ग्रीन हाउस इफेक्ट का एक डायग्राम है जिसमें हम देख रहे हैं कि सोलर रेडिएशन धरती पर आ रहा है और एटमॉस्फियर से होकर आ रहा है जिसमें यह ग्रीन हाउस गैसेस हैं ये इसको ट्रैप कर लेती हैं अब्सॉर्ब करती हैं और फिर कुछ अमाउंट में रीरेडिएट कर देती हैं रीएमिट कर देती हैं इन द फॉर्म ऑफ इंफ्रारेड रेडिएशंस इसका अब ये ग्रीन हाउस इफेक्ट का ह्यूमन इंपैक्ट क्या है? ये तो हमने बताया अभी तक कि नेचुरल प्रोसेस ये है कि हमारी धरती को गर्म रखने के लिए ग्रीन हाउस गैसेस जो हैं वो टेंपरेचर को मेंटेन करती हैं ताकि हम वहां पे रह सके उस एटमॉस्फेयर में। बट प्रॉब्लम कहां आती है कि जब ह्यूमन
28:45 एक्टिविटीज से जैसे कौन-कौन सी ह्यूमन एक्टिविटीज होगी जो हम फ्यूल जलाते हैं जो हम इंडस्ट्रीज हैं हमारे यहां पे। तो इन सब की जो एक्टिविटीज होती हैं ये और कोल, ऑयल, गैस, नेचुरल गैस ये सब का जब हम यूज करते हैं तो ये एनर्जी के लिए या डिफॉरेस्टेशन, इंडस्ट्रियल और एग्रीकल्चर प्रैक्टिसेस करते हैं। ये एक्सेसिव अमाउंट ऑफ ग्रीन हाउस गैसेस रिलीज करता है। मतलब जितना नेचर में होना चाहिए उससे बहुत ज्यादा अमाउंट में ग्रीन हाउस गैसेस एटमॉस्फेयर में आ जाती हैं। अब ग्रीन हाउस गैसेस का क्या काम है? एनर्जी को ट्रैप करना, हीट को ट्रैप करना। अब एटमॉस्फेयर में जब ये गैसेस रहेंगी तो ये इंटेंसिफाई करती है नेचुरल ग्रीन हाउस इफेक्ट को जो नेचुरल ग्रीन हाउस इफेक्ट था जिससे टेंपरेचर जो है मॉडरेट रह रहा था इससे वो एनहांस एनहांस हो जाता है और धरती का
29:32 टेंपरेचर जो है वो बहुत ज्यादा बढ़ जाता है टेंपरेचर राइज हो जाता है और ये जो फिनोमिना है इस फिनोमिना के कारण धरती का टेंपरेचर बढ़ जाता है जिसको हम ग्लोबल वार्मिंग के नाम से जानते हैं या इसी के कारण क्लाइमेट चेंज होता है जो ग्रीन हाउस इफेक्ट ये अपन देखते हैं कि जो यह तो नॉर्मल सिस्टम हो गया ऊपर वाला नेचुरल ग्रीन हाउस इफ़ेक्ट पर नीचे जो ह्यूमन इंपैक्ट है जो इंडस्ट्री से कचरा आ रहा है या जो धुआं आ रहा है और यह जो अर्थ रीरेडिएट कर रही है हीट ये ग्रीन हाउसेस गैसेस जो है वो एक्सेस हो जाती हैं और इसके कारण ग्लोबल वार्मिंग होती है। ग्लोबल वार्मिंग जो है यह रिजल्ट है ग्रीन हाउस इफेक्ट ग्रीन हाउस गैसेस के एक्सेस होने का। ग्लोबल वार्मिंग रिफर्स टू द लॉन्ग टर्म हीटिंग ऑफ अर्थ क्लाइमेट सिस्टम ऑब्ज़र्व सिंस द प्री इंडस्ट्रियल
30:17 पीरियड। जब तक इंडस्ट्रीज ज्यादा डेवलप्ड नहीं थी तब तक चीजें नॉर्मल थी। पर उसके बाद 1850 से 1900 के बीच में ये जो ग्लोबल वार्मिंग है ये कंटीन्यूअस धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है ड्यू टू ह्यूमन एक्टिविटीज जो प्राइमरी फॉसिल फ्यूल को हम बर्न करते हैं। फॉसिल फ्यूल क्या कहलाते हैं? कोयला हो गया, गैस हो गया। तो ये सारे फॉसिल फ्यूल वुड हो गया। ये सारे फ्यूल्स जो हैं ये इसको जब हम बर्न करते हैं इसमें से गैसेस जो हैं वो कार्बन डाइऑक्साइड और जितनी भी ग्रीन हाउस गैसेस हैं ये लिबरेट होती हैं जो हीट ट्रैप करती हैं और ग्रीन हाउस लेवल की गैसेस जो हैं वो अर्थ का टेंपरेचर बढ़ा देती हैं। अब ग्लोबल वार्मिंग जो हम बोल रहे हैं जो अर्थ का टेंपरेचर बढ़ रहा है उसका जो की कॉज है सबसे पहला है बर्निंग ऑफ फॉसिल फ्यूल डिफॉरेस्टेशन। डिफॉरेस्टेशन का मतलब
31:03 है जब जो अभी हम डेवलपमेंट के नाम पे या और ज्यादा एनहांस करने के लिए अपना अर्थ के डेवलपमेंट के लिए इसको हम जो जितने भी जंगल है उसको हम काटते जा रहे हैं। चाहे हम इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाना हो चाहे इंडस्ट्रियलाइजेशन करना हो इसके कारण जो डिफॉरेस्टेशन हो रहा है। डी जो फॉरेस्टेशन जो होता है जो फॉरेस्ट है वो भी ग्रीन हाउस गैसेस को कुछ अमाउंट में कंट्रोल करके रखती हैं। पर जब जंगल कट रहे हैं तो इसके इसका भी एक बहुत बड़ा कारण है ग्लोबल वार्मिंग का जो इंडस्ट्रियल प्रोसेस है उनकी चिमनियों से जो धुंआ निकलता है वो भी ग्रीन हाउस गैसेस को बढ़ाता है एग्रीकल्चर प्रोसेस जो है वो भी उसमें से जो मीथेन गैस निकलती है जो उसका एग्रीकल्चर वेस्ट होता है उससे मिथेन गैस निकलती है जो कि एक ग्रीन हाउस गैस है वह भी एनवायरमेंट को का टेंपरेचर बढ़ाती है और वेस्ट
31:50 डीकंपोजिशन अगर हम प्रॉपर वे में नहीं करते हैं तो यह भी ग्रीन हाउस गैसेस को बढ़ाता है जिसके हमारी जो पृथ्वी है वो धीरे-धीरे उसका टेंपरेचर बढ़ता जा रहा है। नेक्स्ट इसके अलावा हम एक और लेयर का देखेंगे। ओजोन लेयर जो है जो हमारे फर्स्ट लेयर से सेकंड लेयर में आती है। ओजोन लेयर क्या होती है? जैसा अभी मैंने बताया स्ट्रेटोस्फीयर की एक लेयर है जो सन की हार्मफुल लेयर जो रेडिएशंस है लाइक अल्ट्रावायलेट रेडिएशन है। इसको अब्सॉर्ब करती है ताकि हार्मफुल रेडिएशन जो है अर्थ पे ना आ पाए। इट एक्ट्स एज अ अर्थ नेचुरल सनस्क्रीन जिसको हम सनस्क्रीन बोलते हैं। जैसे आजकल लोशंस और क्रीम आ रहे हैं कि जो यूवी रेडिएशंस हैं वो हमारी स्किन को इफेक्ट करती हैं। तो ये तो जो रेडिएशंस
32:36 हैं वो स्किन को इफेक्ट करती है। पर अगर हायर अमाउंट में यूवी रेडिएशन धरती पे आएंगी। तो यह लाइफ के लिए ह्यूमन लाइफ के लिए, प्लांट लाइफ के लिए, एनिमल लाइफ के लिए अच्छी नहीं है। तो उनकी लाइफ को प्रोटेक्ट करने के लिए नेचर ने ये सिस्टम बनाया है। नेचर ने ऐसी एक लेयर दी है ओजोन की जिससे ये जो हार्मफुल यूवी और यूवीसी रेज है। ये वहीं ट्रैप हो जाती हैं और हमारे अर्थ को ये प्रोटेक्ट करती हैं, सेफ रखती हैं। तो इंपोर्टेंस क्या है ओज़ोन का? ये एक शील्ड है या एक ब्लैंकेट बोलते हैं इसको। द ओजन लेयर प्राइमरी रोल इज़ टू ऑब््सॉर्ब मोस्ट ऑफ द बायोलॉजिकली डैमेजिंग यूवी रेडिएशंस। जितनी बायोलॉजिकल डैमिनेशन डैमेजिंग रेडिएशंस है जो हमको ह्यूमंस को बायोलॉजिकल लिविंग बीइंग्स को डैमेज करती है। लाइक यूवीबी और यूवीसी इन सबको वहीं पे ट्रैप करती है। अब्सॉर्ब कर
33:23 लेती है। धरती तक आने नहीं देती। इस फील्ड इस शील्ड के अलावा इस शील्ड के इस प्रोटेक्टिव शील्ड के कारण ही हाई एनर्जी रेज जो है वो अर्थ सरफेस पे नहीं पहुंच पाती हैं। हायर कंस्ट्रेशन पे नहीं पहुंच पाती है। बहुत कम अमाउंट पे पहुंच पाती हैं जो कि हम हमारे लिए एक लिमिट में सही है। देन प्रोटेक्शन फॉर लाइफ बाय ब्लॉकिंग हार्मफुल यूवी रेडिएशन। द ओजोन लेयर प्रिवेंट सीिवियर इंपैक्ट्स ऑन ह्यूमन हेल्थ, इकोसिस्टम्स एंड मटेरियल्स। सिवाय सिर्फ ह्यूमन हेल्थ ही नहीं बल्कि इको सिस्टम और जो मटेरियल्स है बट जैसे आपने देखा मार्बल जो है ओजोन लेयर के ब्रेक होने से ओजोन होल होने से जो लिविंग नॉन लिविंग थिंग्स है जो मार्बल है और भी जितने भी इकोसिस्टम्स है वो इफेक्ट करते हैं जिससे कि ह्यूमन लाइफ जो है जो नॉन लिविंग थिंग्स और लिविंग थिंग्स मींस अपना
34:09 एनवायरमेंट जो है वो डिस्टर्ब हो सकता है। तो ये यूवी जो ओजोन लेयर है ये बहुत इंपॉर्टेंट है हमारे लिए जिससे हम सारा जितना भी लिविंग ऑर्गन अपना एनवायरमेंट है वो सेफ रह सकता है। ये क्यों होता है कॉजेस ऑफ ओजोन लेयर डिप्लीशन। अब ओजोन लेयर डिप्लीशन क्या है? जैसे हमने बताया एक लेयर है पूरी ओजोन की जो यूवी रेडिएशन को अर्थ में आने से रोकती है। और डिप्लीशन मतलब इसका टूटना। ओजोन डिप्लीशन इज़ प्राइमरी कॉज्ड बाय द ह्यूमन मेड केमिकल्स नोन एज ओजोन डिप्लीटिंग सब्सटेंसेस। ओडीएस जो है वो कुछ ऐसे केमिकल्स हैं जो ओजोन की लेयर को ओजोन लेयर मतलब क्या उसमें O3 होगा तो वो वो ऐसे रिएक्शंस वहां पे होते हैं तो जो O3 को ब्रेक कर देता है ऑक्सीजन और मोनोऑक्साइड में तो ये जब ब्रेक होता है
34:54 ओजोन तो वो वहां पे उस जगह पे एक होल हो जाता है एक गैप बन जाता है पूरी लेयर में जिसको हम ओजोन होल बोलते हैं। ये ओजोन होल जो है किसके कारण होता है? जितने भी क्लोरोफ्लोरोकार्बस हैं ये क्लोरोफ्लोरोकार्बस ऐसे केमिकल्स हैं जो मैनमेड एक्टिविटी से जनरेट होते हैं। जैसे अब जो रेफ्रिजरेटर्स हैं इसमें ये गैस यूज होती है। वहां से अगर लीक हो जाए गैस तो ये एनवायरमेंट में जाती है और वहां तक वहां से ओजोन लेयर तक पहुंचती है। जो रेफ्रिजरेटर में और एयर कंडीशंस में एयर कंडीशंस में भी जो गैसेस हैं क्लोरोफ्लोरोकार्बंस ये जब एनवायरमेंट में आ जाती हैं या एरोसोल होते हैं, प्रोप्लेंट्स होते हैं एंड फॉर्म ब्लोइंग एजेंट्स। ये जितनी भी एक्टिविटीज ह्यूमन एक्टिविटीज हैं ये ओजोन लेयर के लिए खतरा हैं। इसके अलावा हैलों्स जो हैं जो फायर
35:40 एक्सटिंग्विश में केमिकल्स यूज़ होते हैं। इसके अलावा और अदर ओडीज जो हैं मिथाइल क्लोरोफॉर्म कार्बन टेट्राक्लोराइड, हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बंस एंड ये भी जो है इन कंट्रीब्यूट करते हैं ओजोन डिप्लीशन में। इनका जो इफेक्ट होता है ओजोन लेयर डिप्लीशन का ह्यूमन हेल्थ पर तो होता ही है। जैसे स्किन कैंसर होता है जिसके कारण हम अपनी स्किन को प्रोटेक्ट करके रखते हैं। सनस्क्रीन लगाते हैं कि हमारी स्किन खराब ना हो। इसके अलावा आई डैमेज हो जाता है। जो आई में प्रॉब्लम आ जाती है। इसके कारण हमारा इम्यून सिस्टम जो है वह सप्रेस हो जाता है। तो यह किसके इसके जो इफेक्ट हैं ओजोन लेयर डिप्लीशन के ये ह्यूमन हेल्थ में है। इकोसिस्टम में होता है। इकोसिस्टम इस में क्या होता है कि जो डैमेज होता है हमारी मरीन लाइफ पे या जो ओशन में जो एक्वेटिक एनिमल्स हैं एक्वेटिक
36:27 प्लांट्स हैं इनका जो डैमेज होता है। यह भी किसके कारण होता है? ओजोन लेयर डिप्लिशन के कारण। हमारे जो टेरेस्ट्रियल प्लांट्स हैं लाइक क्रॉप है, फॉरेस्ट है, ये भी इससे अफेक्टेड होते हैं। और एफीबियंस हैं मतलब जो ना एक्वेटिक हैं ना लैंड एनिमल्स हैं। ये जो एफीबियंस होते हैं जो लैंड और पानी में दोनों में एक साथ रहते हैं। इनके ऊपर भी इफेक्ट होता है ओज़ोन लेयर डिप्लीशन का। और मटेरियल डिग्रेडेशन भी होता है। जैसे प्लास्टिक, प्ले पेंट और फैब्रिस। जैसे बहुत दिन तक अगर आप किसी प्लास्टिक के सामान को या प्लास्टिक चेयर को अगर आप बहुत दिन तक ओपन में रखेंगे तो वह बहुत जल्दी डिग्रेड हो जाती है। ऐसे ही जो पेंट्स हम बाहर लगाते हैं वो कुछ समय बाद डिग्रेड हो जाते हैं। कपड़ा अगर अपन सूखने जाते हैं उसका डालते हैं बहुत देर तक बाहर धूप में तो उसका कलर जो है वो फेड हो जाता है। ये सारी चीजें जो हैं मटेरियल पे जो इसका नुकसान होता है
37:13 ये ओजोन लेयर डिप्लिशन के कारण होता है। इसके अलावा एक सबसे बड़ा इशू है एसिड ड्रेन फॉर्मेशन का। एसिड रेन फॉर्मेशन क्या है? कि जो एमिशन ऑफ प्रीकर्स द मेन पॉलटेंट्स दैट कॉज एसिड रेन आर गैसेस रिलीज्ड इनू द एटमॉस्फियर। अब ये भी जो है ये मैनमेड एक्टिविटी के कारण है। जो सल्फर डाइऑक्साइड है या फिर नाइट्रोजन ऑक्साइड है। ये दो ऐसी गैसेस हैं। इसको ये कहां से निकलती हैं? जब हम फॉसिल फ्यूल बर्न करते हैं, कोल बर्न करते हैं, लकड़ी जलाते हैं, कोयला जलाते हैं। इससे जो गैसेस निकलती हैं लाइक सल्फर डाइऑक्साइड जैसे कोल का कंपोजिशन जो होता है वो कार्बन, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, सल्फर होता है। कोल जब हम बर्न करते हैं तो जो धुआं निकलता है उसमें से ये सारी गैस चीजें जो हैं सारी गैसेस जो हैं सल्फर डाइऑक्साइड और
37:58 नाइट्रोजन के सारे ऑक्साइड्स और या जो पावर प्लांट्स होते हैं, इंडस्ट्रियल फैसिलिटीज होती है इनके चिमनी से। यह धुआं जो है जो व्हीकल एग्जॉस्ट है जो हमारी गाड़ी से धुआं निकलता है। यह पूरा एयर में जाता है और वहां पे वाटर जो वाटर बॉडी रहती है या वहां पे जो हाइड्रोजन ऑक्साइड रहता है जो वाटर पार्ट रहता है उससे रिएक्ट करके ये एसिड बनता है। जैसे सल्फर डाइऑक्साइड जो है वो H2SO4 बनेगा। नाइट्रोजन के जो ऑक्साइड्स है वह रिएक्ट करके HNO3 बनते हैं। HNO3 और HSO4 जो H2SO4 वो केमिकल रेंज में आते हैं। जो एटमॉस्फयर में बन जाते हैं। जो एटमॉस्फेरिक ट्रांसपोर्ट है जैसे कैरिड आउट बाय विंड्स ओवर द लॉन्ग
38:44 डिस्टेंस। अब ये जो एटमॉस्फेयर में आ गए जैसे हमने यहां पे जलाया फ्यूल को और वो जब एनवायरमेंट में आ गए जब एटॉम में आ गया तो जो हवाएं हैं उसको उड़ा के बहुत दूर तक ले जाती हैं और बहुत बड़ा एरिया जो है इससे इफेक्ट होता है। जो केमिकल ट्रांसफॉर्मेशंस हैं जैसे एटमॉस्फेयर में बताया सल्फर डाइऑक्साइड और एनएक्स है ये केमिकल रिएक्शन होते हैं। इसमें कंप्लेक्स केमिकल रिएक्शन होते हैं। वाटर के साथ वाटर में जो H2 है, O है जो ऑक्सीजन में अम् O2 है, यह सारे सब्सटेंस मिलके जो हैं वह एसिड बनाते हैं। द एसिड कंपाउंड्स जो हैं वह फिर वापस रेन के साथ धरती पे आते हैं। और एज अ एज वेट डीकंपोज़िशन। तो, वेट डीकंपोजिशन जब बारिश के साथ आते हैं, तो उसको हम एसिड रेन बोलते हैं। जिसके कारण स्नो होता है, फॉग होता है। तो, ये सारे जो प्रॉब्लम्स होते
39:30 हैं, ये एसिड रेन का जो प्रॉब्लम है या ड्राई डिपोजिशन है एसिडिक गैसेस का और पार्टिकल्स का। यह ह्यूमन एक्टिविटीज के कारण ही है और यह एनवायरमेंट के लिए एक बहुत बड़ा नुकसान है। ये अपन इसकी डिटेल देखें जो इंडस्ट्रीज हैं इंडस्ट्री से जहां सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड गैसेस निकल रही हैं। जो केमिकल ट्रांसफॉर्मेशंस होता है इनका HNO3 और H2SO4 में और यह डैमेज करता है फॉरेस्ट को एक्वेटिक लाइफ को एसिड एसिड सोइल जो है वो एसिडिफाई हो जाती है जिसके कारण वहां पे जो भी क्रॉप उगेगा वो भी एसिडिक उगेगा जो हमारे मोन्यूमेंट्स है जैसे ताजमहल का एग्जांपल हम देते हैं कि ताजमहल का कलर जो है वो फेड होता जा रहा है वाइट से वो येलोइश होता जा रहा है ड्यू टू दिस एसिडिक रेन वेट डिपोज़िशन जो होता है ड्राई डिपोज़िशन ये दोनों जो है यह अर्थ
40:18 के लिए हमारे एनवायरमेंट के को बहुत बुरी तरह इफेक्ट करते हैं। इसके अलावा डिफॉरेस्टेशन जो अभी हमने देखा कि जो जंगल की कटाइयां हो रही हैं अपने को बहुत ज्यादा एडवांस करने के लिए, इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिए, इंडस्ट्रीज बनाने के लिए। जब हम पेड़ काट देते हैं, पेड़ काटने से जितना भी हमारा वुडेन एरिया है, वह धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। और दिस कटिंग डाउन एंड रिमूवल ऑफ़ ऑलमोस्ट ऑफ़ द ट्रीज़ इन वुडेन एरिया। डिफॉरेस्टेशन कैन इरोड सइल। से सोइल इरोजन होता है और इसके कारण कारण जो लैंड है वो बंजर होती जा रही है जिसको हम डिजर्टिफिकेशन बोलते हैं एंड पोल्यूशन ऑफ वाटर वेज़ जो जिसके साथ जितने भी केमिकल्स हैं वो बह जाते हैं तो वो वाटर वेज का पोल्यूशन कहला का कारण बनता है। बायो डायवर्सिटी जो है रिली डिक्रीज
41:04 होती है। मींस जो रहने वाले हमारे यहां पे जीव हैं उनकी धीरे-धीरे जो स्पीशीज हैं वो कम होती जा रही हैं। बिकॉज़ यह जो है, यह जो अह डिस्ट्रक्शन ऑफ़ फ़ॉरेस्ट सिर्फ़ अह जंगल की कटाई नहीं है। इसके अलावा बहुत सारे हैबिटेट जो हैं, इसके साथ खत्म हो जाते हैं। और इनका कारण क्या है? जो हमें लकड़ी के फर्नीचर वगैरह बनाने हैं। टिमबर लॉजिंग जो होती है, इसके कारण हम जंगल काट देते हैं। इंडस्ट्रियल एरिया के लिए काट देते हैं। जहां वहां रहने के लिए काट देते हैं। अपने एग्रीकल्चर लैंड बनाने के लिए या फिर एग्रीकल्चर में यूज़ करने के लिए हम फॉरेस्ट डिफॉरेस्टेशन कर देते हैं। माइनिंग के लिए जहां नीचे हमें पता चलता है कि यहां कोयला है या यहां गोल्ड है। तो इसके कारण हम वहां पे माइनिंग कर देते हैं। और माइनिंग करने से पहले हम वहां के सारे जंगल जो है उसकी कटाई कर देते हैं।
41:49 जैसे हाईवेज बन रहे हैं, मेन रोड बन रहा है। तो इन सब के लिए भी हम स्पेस खाली करने के लिए जंगल को जंगल को ही खत्म करते हैं जिससे कि हम एडवांसमेंट कर सके इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ा सके। इसके कारण जो है क्लाइमेट चेंज हो रहा है। अपने डिफॉरेस्टेशन के कारण क्लाइमेट जो है वह बिल्कुल चेंज हो रहा है। क्योंकि जो कार्बन डाइऑक्साइड वह लेके और हमें फ्रेश ऑक्सीजन देते थे प्लांट्स वो अब धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं। तो इसके कारण क्लाइमेट भी चेंज हो रहा है। यह सारे वो इफेक्ट ऑफ डिफॉरेस्टेशन है। लॉस्ट ऑफ बायोडायवर्सिटी इंक्रीज्ड एटमॉस्फेरिक प्रेशर जो कार्बन डाइऑक्साइड क्योंकि कार्बन डाइऑक्साइड ट्रीज जो हैं वो ले के बदले में हमें ऑक्सीजन देते थे। पर ट्रीज ही नहीं रहेंगे। तो एटमॉस्फेरिक में जो कार्बन डाइऑक्साइड का जो लेवल है जो बहुत मिनिमम होता है वो धीरे-धीरे
42:36 बढ़ता जा रहा है। इंक्रीज्ड वाइल्ड फायर्स जो वाइल्ड फायर्स हैं वो बढ़ती जा रही हैं। जिसके कारण जंगल में आग जिसको बोलते हैं वो सारा इनक्रीस हो रहा है। फ्लड हो रहा है। ड्रॉट हो रहा है। है ना? ड्रॉट सूखा पड़ रहा है। फ्लड आ रहा है। ये सब काहे के कारण हो रहा है? डिफॉरेस्टेशन के कारण। तो डी फॉर डिग्रेडेशन ऑफ मतलब जो लैंड जो पैरेंट लैंड होती जा रही है या सूखा पड़ता जा रहा है इसके दो या तो कुछ नेचुरल कॉजेस होते हैं लाइक लॉस ऑफ सोइल कवर बहुत ज्यादा बारिश हो गई जो कि हमारे हाथ में नहीं है। तो उससे क्या होता है? सोइल इरोजन हो जाता है। वहां की जो अच्छी वाली सॉइल है ऊपर का जो लेयर है सोइल का वो रेनफॉल से बढ़ बढ़ के रन ऑफ हो जाता है और वहां पे जो लैंड है वो ड्राई हो जाती है। वाटर इरोजन होता है। वाटर इरोजन से भी जो
43:23 10.98 और ऑलमोस्ट 11% जो है वो डिजर्टिफिकेशन हो रहा है। फिर विंड इरोजन हो रहा है। विंड से जो ऊपर की लेयर की लैंड है जो सोइल है वह बह के कहीं उड़ के कहीं और चली जाती है। जिससे लैंड जो है वह उतनी ज्यादा उपजाऊ नहीं रहती है। यह तो नेचुरल कॉज हो गए। पर हम जो धरती को बिगाड़ रहे हैं, हम जो अपनी लेयर खराब कर रहे हैं, उसको हम बोलते हैं एंथ्रोपजेनिक कॉजेस या मैनमेड या ह्यूमन मेड कॉजेस। इस ये किसके कारण है? पुअर एग्रीकल्चर प्रैक्टिससेस। जो हमारी लैंड बैरन हो रही है, वो किस लिए हो रही है? क्योंकि क्रॉप मल्टीप्लिकेशन नहीं हो रहा है। मल्टीपल क्रॉप हम नहीं रोटेशन नहीं कर रहे हैं। एक ही क्रॉप को बार-बार उगा रहे हैं। जिसके कारण वहां का जो भी न्यूट्रिएंट्स है वो खत्म होता जा रहा है। डिफॉरेस्टेशन इसका बहुत बड़ा कारण है। फिर अर्बनाइजेशन जो बढ़ रहा है जहां जहां पे भी लैंड है उसको हम वहां पे बिल्डिंग बनाए जा रहे हैं।
44:09 जिसको हम माउंटेन या रॉक डेजर्ट बोल रहे हैं कि पेड़ों की जगह वहां पे मकान खड़े हो रहे हैं। दिस इज़ डायवर्टिंग लैंड फ्रॉम एग्रीकल्चर लैंड टू अर्बन डेवलपमेंट। तो अर्बन डेवलपमेंट के नाम पे हम ज़मीन को डेजर्टिकेशन करते जा रहे हैं और या फिर ओवर ग्रेजिंग हो रही है। ओवर ग्रेजिंग मतलब एक ही जगह पे हम बहुत ज़्यादा जानवरों को जानवर जो हैं वो ग्रेजिंग की प्रैक्टिस कर रहे हैं। जबकि उनको स्कैटर करके करना चाहिए। अलग-अलग एरिया में करना चाहिए। पर एक ही जगह की जब बाज बहुत ज्यादा ओवर गगजिंग हो जाएगी तो यह सस्टेनेबल नहीं है। तो यह जितने भी कारण थे इसके कारण जो ह्यूमन पे इफेक्ट आता है। अभी तो अभी हमने देखा कि ये जितने भी चीजें थी जो भी इश्यूज थे उससे ह्यूमन जो है वो एनवायरमेंट को खराब कर रहा है। जितने भी एक्टिविटीज है जितने भी इशूज़ हैं वो
44:55 मैनमेड ज्यादा है। अब इसके कारण मैन को भी खतरा हो रहा है जिसको हम पोल्यूशन के नाम से जाना जाता है। तो इसकी डेफिनेशन अगर अपन देखें पोलशन की तो कोई भी चीज अगर एक्सेस में हो तो वह पोल्यूशन कहलाती है। तो कोई भी चीज लिमिट में सर्वाइवल है पर लिमिट से अगर वो एक्सेस हो जाती है तो दैट इज नोन एज पोल्यूशन। इट इज द इंट्रोडक्शन ऑफ कंटैमिनेंट इंटू द नेचुरल एनवायरमेंट दैट कॉज एडवर्स चेंज इन द फॉर्म ऑफ किलिंग ऑफ लाइफ टॉक्सिसिटी ऑफ एनवायरमेंट डैमेज टू इकोसिस्टम एंड एस्थेटिक्स ऑफ द सराउंडिंग। जिसके कारण टॉक्सिसिटी बढ़ रही है। इन सारे इशूज़ के कारण दिस दीज़ आर नोन एज पोलूशंस। पोलॉलशंस अब जैसे सबको पता ही है वो चार तरह के मेन इंपॉर्टेंट पोलशंस होते हैं। एयर पोल्यूशन, वाटर पोलूशन, सोयल पोल्यूशन और नॉइज़ पोल्यूशन। तो एयर
45:42 पोल्यूशन जो है यह हमें ही इफेक्ट कर रहा है और इसका कारण भी हम ही हैं। सबसे पहले जैसे हम देखें इंडस्ट्री और एनर्जी सप्लाई जो इसके कारण हम कोल जला रहे हैं या जो जितने भी रिसोर्सेज जला रहे हैं नेचुरल रिसोर्सेज जला रहे हैं। इसका जो स्मोक है वो एयर पोल्यूशन कॉज करता है। डस्ट जो है वो इसके कारण होता है। जब भी जब भी हम ये इंफ्रास्ट्रक्चर को डेवलपमेंट करते हैं उससे जो डस्ट डेवलप होती है। इसके अलावा जो एग्रीकल्चर प्रैक्टिससेस है हमारी उसके कारण एयर पोल्यूशन हो रहा है। फिर ट्रांसपोर्टेशन में जो हम फ्यूल यूज कर रहे हैं उसके कारण एयर पोल्यूशन हो रहा है। जो वेस्ट मैनेजमेंट है वो हमारा सही नहीं है। जो एग्रीकल्चर वेस्ट है जो इंडस्ट्रियल वेस्ट है उसका हम प्रॉपर मैनेजमेंट से उसको डीकंपोज नहीं कर रहे हैं। जिसके कारण एयर पोल्यूशन हो रहा है और हमारी जो हाउसहोल्ड एनर्जी है जिसका आजकल बहुत ज्यादा हो गया। पहले जैसे
46:29 हाउसहोल्ड में एनर्जी इलेक्ट्रिसिटी बहुत कम इस्तेमाल में की जाती पर आज हर इक्विपमेंट जो है वह इलेक्ट्रिसिटी मांगता है। चाहे वह मोबाइल से लेके एसी तक हो सब में हमें इलेक्ट्रिसिटी लगती है। और इसमें जो एनर्जी यूज़ होती है इसके कारण जो गैसेस रिलीज होती हैं वो एयर पोल्यूशन कहलाती है। एयर पोल्यूशन जो है सबसे पहले हमारे रेस्पिरेटरी डिजीज कॉज करता है। हमारी हेल्थ को खराब करता है। हार्ट डिजीज करता है। इवन कैंसर तक होता है इससे और न्यूरोलॉजिकल डैमेज हमारी बॉडी में जो होता है यह सारा जो इंप्योर गैस इन्हेल करने से होता है। उसका कारण है ये। फिर क्लाइमेट में जो इफ़ेक्ट पड़ता है जैसे हमने बताया एयर पॉल्यूशन के कारण जो एयर है एयर में जैसे हमने टेंपरे वो बताया कंपोज़िशन है एयर का सिर्फ कार्बन डाइऑक्साइड
47:15 नाइट्रोजन और ऑक्सीजन है और बाकी सारी गैसेस जो बहुत माइनर अमाउंट में है। पर इसमें जब ये सारे पर्टिकुलेट मैटर मिल जाते हैं। ओजोन बढ़ जाता है और सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड ये सारे बढ़ जाते हैं तो इससे क्लाइमेट भी चेंज होता है। वेदर जो है एक्सट्रीम हो जाता है। या तो बहुत ज्यादा ठंड पड़ने लगी है या तो बहुत ज्यादा गर्मी लगी है। गर्मी हो गई है। तो यह सारा एक्सट्रीम वेदर जो है यह एयर पोल्यूशन के कारण है। जो सी लेवल है वो भी राइज कर रहा है। इसके कारण जो हमारा इकोसिस्टम है इसके बारे में भी बात करेंगे। इकोसिस्टम क्या होता है? हमारा इकोसिस्टम जो है वो सबसे ज्यादा इससे डिस्टर्ब होता है। ये हम अभी देख चुके हैं। सोर्सेस ऑफ वाटर पोल्यूशन क्या-क्या है? फैक्ट्री डिस्चार्ज, एग्रीकल्चर रन ऑफ, ऑयल स्पिल्स, सेवेज का प्रॉपर मैनेजमेंट नहीं होना और प्लास्टिक वेस्ट। तो, यह हमारे
48:04 ह्यूमन लाइफ को तो खराब करता ही इफ़ेक्ट करता ही है। इसके साथ-साथ जो है वाटर पोल्यूशन है जो एक्वेटिक लाइफ से इफेक्ट हो रहा है, उससे ह्यूमन लाइफ इफेक्ट हो रहा है। तो, यह सारे इफ़ेक्ट्स इस पॉल्यूशन के कारण हैं। फिर नॉइज़ पोलशन। नॉइज़ पोलुशन जो है एक दिखने वाला चीज नहीं है क्योंकि वाटर पोलुशन तो हमें दिखता है कि पानी गंदा है। एयर हम जब ब्रीथ करते हैं तो हमें समझ में आता है कि जो एयर है वो हमारे को चोक कर रही है गला। पर नॉइज़ पोल्यूशन जो है यह विजिबल नहीं है बट ये ऐसे साउंड है वो जो पीपल को हार्म करता है और उनका जो हियरिंग कैपेसिटी है वो या तो कम कर देता है या ऑलमोस्ट बंद कर देता है। जैसे आजकल जितने ये मोबाइल सिस्टम और जो साउंड सिस्टम है जो अनाउंसमेंट्स होते हैं जो एयरप्लेन की नॉइज़ है जो रोड ड्रिगिंग
48:49 की नॉइज़ है जो भी हाई जो हियरिंग कैपेसिटी हियरिंग डेसीिबल जो है हमारे हैं उससे हायर डेसीिबल की अगर साउंड हो वो लाउड म्यूजिक हो चाहे वो इरिस्पांसिबल हॉकिंग वगैरह हो यह कॉज करता है और हमारे बॉडी को नुकसान पहुंचाता है इससे एंग्जायटी हो जाती है ट्रॉमा हो जाता है हेडेक हो जाता है और कई बार बंदा डेफ भी हो जाता तो ये सारे जो प्रॉब्लम थे वो पोल्यूशन के थे जो हमारे ही क्रिएट किए हुए और एनवायरमेंट को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं और हमारे हमें भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। और ये सारे का इफेक्ट किसमें होता है? इकोस सिस्टम में। हम जो एनवायरमेंट की बात करते हैं। एनवायरमेंट जैसे हमने बताया लिविंग और नॉन लिविंग थिंग से मिलके बना है। तो नेचर ने एक ऐसा सिस्टम बनाया है। एक ऐसा बैलेंस बनाया है जिससे हर चीज नेचुरली स्मूथली चल सकती थी। पर हमारे
49:36 इंटरवीन करने से, हमारे ह्यूमन एक्टिविटी के इंटरवीन करने से जो इकोसिस्टम डिस्टर्ब होता है उसके कारण हमें प्रॉब्लम होती है। तो इकोसिस्टम क्या है? वो एक कम्युनिटी है लिविंग ऑर्गेनिज्म्स की जो इंटरेक्ट करती है नॉन लिविंग एनवायरमेंट से। जैसे हम रह रहे हैं प्लांट्स हैं, एनिमल्स हैं। वो जब इंटरेक्ट करते हैं किसी नॉन लिविंग एनवायरमेंट का मतलब जैसे सन हो गया, रॉक हो गया, सोइल हो गया, वाटर हो गया, एयर हो गया। इन सब से जो इंटरेक्शन है, यह मिलके एक सिस्टम बनाता है वि इज नोन एस इकोसिस्टम। इकोसिस्टम जो है वह नेचुरल इकोसिस्टम भी होता है और आर्टिफिशियल इकोसिस्टम भी होता है। नेचुरल इकोसिस्टम जो नेचर ने हमें बना के दिया है जिसको एक टेरेस्ट्रियल मतलब जो लैंड के ऊपर है एक्वेटिक जो पानी के अंदर है। टेरेस्ट्रियल इकोसिस्टम में हमें देखेंगे ग्रासलैंड नेचर ने हमको बना के दिया है। यह नेच ग्रासलैंड है, फॉरेस्ट
50:23 है, डेजर्ट है। एक्वेटिक सिस्टम जो है वो मरीन है, मरीन जो सी है, ओशन है या फ्रेश वाटर है। इन सबके अंदर अपना एक इको सिस्टम होता है जो बैलेंस ऑफ लिविंग एंड नॉन लिविंग है। ये नेचर ने बना के दिया है। हमने भी कुछ ऐसे इकोसिस्टम बनाए हैं जिसको हम आर्टिफिशियल सिस्टम या मैनमेड सिस्टम बोलते हैं। जैसे एग्रीकल्चरल फील्ड हो गया, एक्वेरियम हो गया, पोल्ट्री फार्म हो गया, ज़ हो गया। ये सिस्टम हमारे बनाए हुए हैं। पर नेचर का जो है वास्ट सिस्टम बनाया हुआ है। दैट इज नोन एज इकोसिस्टम। इकोसिस्टम जो है उसमें एक फूड चेन डेवलप होती है। वो फूड चेन में सब के लिए सब कुछ दिया है। नेचर ने दिया है। सब कुछ सर्वाइवल उनके सर्वाइवल के लिए हर चीज है। जैसे सबसे पहले हम देखते हैं ग्रास उगती है। सब जो लैंड है
51:09 सोइल है। सोइल, वाटर, एयर ये सब मिलके सन मिलके ग्रास उगाते हैं। ग्रास मतलब फोटोसिंथेसिस होता है। फोटोसिंथेसिस में वाटर की भी जरूरत पड़ती है। सनलाइट की भी जरूरत पड़ती है। सोइल की भी जरूरत पड़ती है। यह तीनों नॉन लिविंग थिंग्स मिलके एक लिविंग थिंग्स को जनरेट करते हैं व्हिच इज ग्रास। अब यह ग्रास जो है उसके वहां पर ग्रासहॉपर्स होते हैं। तो वह ग्रास को खाते हैं या प्लांट्स को खाते हैं। ग्रासहॉपर्स उन पे फीड करते हैं। उसके जो ग्रासहॉपर्स जब ज्यादा अमाउंट में हो जाते हैं तो माइस होते हैं, रैट्स होते हैं, चूहे होते हैं जो इन ग्रासहॉपर्स को खाते हैं, वह उन पे फीड करते हैं और उनका बैलेंस बनाए रखते हैं धरती पे। अगर ग्रासहॉपर्स अगर माइस और रैट ना हो तो ग्रासहॉपर्स इतने अमाउंट में हो जाएंगे कि आधे से ज्यादा धरती जो है वो ग्रासहॉपर से फिल हो जाएगी। पर उसका मेंटेन करने के लिए बैलेंस करने के लिए छोटे एनिमल्स होते हैं
51:57 जो इन पे रैट्स और रोडेंट्स होते हैं जो इस पे रिलाई करते हैं। और जब माइस ज्यादा हो जाते हैं तो इनको बैलेंस करने के लिए स्नेक्स हैं। स्नेक्स जो हैं वो माइस और रैट्स को ईट करते हैं। फिर जब स्नेक्स ज्यादा हो जाते हैं इनको खत्म करने के लिए इनको बैलेंस करने के लिए ईगल्स हैं बर्ड्स हैं। ये बर्ड्स और जो हॉक्स हैं ये सारा बैलेंस करते हैं। और ये जो हॉक्स ये जब खत्म हो जाते हैं अब इनको खाने के लिए अब कौन है? तो जो फंजाई या बैक्टीरिया या जो माइक्रो ऑर्गेनिज्म्स हैं ये सारे जो है इनकी बॉडी को ब्रेकडाउन करते हैं और इनके न्यूट्रिएंट्स को वापस धरती पर डाल देते हैं जो नॉन लिविंग थिंग्स में कन्वर्ट हो जाते हैं। तो ये जो न्यूट्रिएंट्स हैं ये फिर से सन वाटर के साथ मिलके ग्रास ग्रो करते हैं। तो ये एक साइकिल नेचर ने बनाई है जिससे सबके लिए सब कुछ है। सबके
52:44 सर्वाइवर के लिए सफिशिएंट चीजें हैं। इसको हम तीन भाग में डिवाइड करते हैं जो नेचर की फूड चेन है। सबसे पहले प्रोड्यूस प्रोड्यूसर्स जैसे हमने देखा घास है तो जो घास है, ट्रीज हैं, एल्ग हैं पानी के अंदर एल्ग होते हैं, बेरीज हैं, फ्रूट्स हैं, प्लांट्स हैं ये सब प्रोड्यूस कौन करता है? नॉन लिविंग थिंग्स मिलकर प्रोड्यूस करते हैं। सनलाइट है, वाटर है, स लैंड है, सोयल है, ये सब मिलके पहले प्रोड्यूसर्स बनाते हैं। व्हिच आर प्रोड्यूसर्स ऑफ एनर्जी। जो सन की एनर्जी है उसका इस्तेमाल करके ये प्रोड्यूसर्स खाने लायक चीजें बनाते हैं। ये जो प्रोड्यूसर्स हैं इनको डीकंपोजर जो हैं वो कंज्यूमर्स जो हैं उसको कंज्यूम करते हैं। उनके खाते हैं उन पे सर्वाइव करते हैं और वो एनर्जी जो सन की एनर्जी है प्रोड्यूसर्स के थ्रू उनके पे उनके पास आ जाती है। तो ये जो कंज्यूमर्स हैं चाहे वो छोटे हर्बीवोरस हो
53:31 चाहे ओमनी ओमनीवोरस हो चाहे कार्निवोरस होवोरस वो कहलाते हैं जो सिर्फ प्लांट्स पर रिलाई करते हैं। ओमनीवोरस वह होते हैं जो प्लांट्स भी खाते हैं और एनिमल्स को भी खाते हैं। कार्निवोरस वो होते हैं जो सिर्फ एनिमल्स पे रिलाई करते हैं। तो ये सारे कंज्यूमर्स कहलाते हैं। ये सेकंड लेवल के जीव-जंतु होते हैं जो प्रोड्यूसर्स पे रिलाई करते हैं। और जब ये इनका जब अमाउंट ज्यादा हो जाता है इनको बैलेंस करने के लिए फिर डीकंपोजिसर्स होते हैं। ये डीकंपोजर्स जो हैं लाइक फंजाई हो गया, मोल्ड हो गया, बैक्टीरिया हो गया, वर्म्स हो गए। यह इन सारे कंज्यूमर्स को डीकंपोज करके वापस नॉन लिविंग में कन्वर्ट कर देते हैं। जिससे यह नेचर की सली साइकिल जो है युगों युगों तक कंटिन्यू रहती है। तो ये नेचर ने जो बनाया है पूरा बैलेंस हमारे लिए हमारी अब आज की जरूरत यह है कि हम इस जो नेचर की साइकिल है इसको हम
54:19 सस्टेन करें। इसको लगातार चलने दें। जो हमारे पहले लोग थे, जो हमारे पूर्वज थे, उन लोगों ने बहुत कम नेचुरल रिसोर्सेज का इस्तेमाल किया और वो ताकि वो चीजें हमाल तक आई। पर हमारी जो जनरेशन है, उन्होंने इतने ज्यादा इस्तेमाल किया इन नेचुरल रिसोर्सेज का कि उसको आगे सस्टेन करना बहुत मुश्किल हो रहा है। तो अभी बहुत सारे पॉलिसीज बन रही हैं। बहुत सारे डेवलपमेंट हो रहे हैं। बहुत सारे रूल्स एंड रेगुलेशंस आ रहे हैं जिससे कि ये चीजें जो हम भी इस्तेमाल कर सकें और हमारे जो आगे जनरेशन हैं वो भी इस्तेमाल कर सके। यह वाला प्रोग्राम जो है एरिया यह कहलाता है सस्टेनेबल डेवलपमेंट। सस्टेनेबल का मतलब है मीटिंग द नीड्स ऑफ़ प्रेजेंट विदाउट कॉम्प्रोमाइजिंग एबिलिटी ऑफ़ फ्यूचर जनरेशंस टू मीट देयर ओन नीड्स। हम अपनी
55:05 नीड का भी फुलफिल करें और हमारे जो फ्यूचर जनरेशन में लोग आएंगे, उनकी नीड भी उससे पूर्ण हो सके। तो, यह सस्टेनेबल का मतलब हम भी इस्तेमाल करें और हमारा फ्यूचर भी इस्तेमाल करें। यह सस्टेनेबल डेवलपमेंट है। ऐसा डेवलपमेंट हो कि वह चीजें जो हैं चिरकाल तक रहे। तो सबसे पहले ये तीन चीज पे डिपेंड करता है। एक तो इकोनॉमिक हमारा कंडीशन क्या है? एनवायरमेंटल कंडीशन क्या है? और सोशल कंडीशन क्या है? इकोनॉमिक कंडीशन हम इसलिए ले रहे हैं क्योंकि पैसा बनाने के लिए, कमाने के लिए या और अपने आप को डेवलप करने के लिए हम एनवायरमेंटल का एनवायरमेंट का की चीजों का हरास कर रहे हैं। और यह जो सोसाइटी है, सोसाइटी में जो ह्यूमन वेल बीइंग है, उनके एजुकेशन के लिए, उनकी कम्युनिटी के लिए इसको सस्टेन करना बहुत जरूरी है। क्योंकि अगर ये चीज सस्टेन नहीं
55:51 होगी जो एनर्जी है जो एनवायरमेंट है वो सस्टेन नहीं होगा तो हमारी जो सोशल वेल बीइंग है वो एनवायरमेंटल पे पूरी तरह डिपेंडेंट है और इकोनॉमिक के चक्कर में हम इसको बर्बाद ना करें इसीलिए ये तीनों इंटर रिलेटेड हैं। इसमें ये है कि इकोनॉमिक ग्रोथ तो हमें चाहिए ही पर इकोनॉमिक ग्रोथ के साथ-साथ हमें नेचुरल रिसोर्सेज जो हैं उसका भी प्रोटेक्शन करना है। जो रिन्यूएबल सोर्सेस हैं उसको इस्तेमाल नहीं इस्तेमाल करें। जो जैसे सोलर हो गया, विंड एनर्जी हो गई, जियोथर्मल एनर्जी हो गई। तो न्यूक्लियर एनर्जी हो गई, न्यूक्लियर फ्यूजन फीज़ से जो एनर्जी आ रही है। तो ये सारी जो न्यू वैरायटी ऑफ एनर्जी को हम डेवलप करें जिससे जो नेचुरल रिसोर्सेज हैं वो हमारे मेंटेन हो सके या कम से कम इस्तेमाल हो सके और उनका प्रोटेक्शन हो सके।
56:36 इनको यूज़ करके हम अपना ग्रोथ भी करना है। यह नहीं कि हम अब एनर्जी का इस्तेमाल ही नहीं करेंगे। तो हमारे डेवलपमेंट के लिए जो ग्रोथ है उसका भी करना है। एंप्लॉयमेंट का, फेयर ट्रेड का ये जितनी भी चीजें इकोनॉमिकली हमें भी आगे बढ़ना है। पर एक बेरेबल अमाउंट में कि वायरेबल अमाउंट में एक बेरेबल अमाउंट में एक लिमिट में हमें इसका इस्तेमाल करके आगे इकोनॉमिक ग्रोथ करनी है। और इसके साथ-साथ ही एनवायरमेंट प्रोटेक्शन करना है नेचुरल रिसोर्सेज का। जिससे हम कैसे कर सकते हैं? पोल्यूशन को रिड्यूस करके अपनी बायोडायवर्सिटी को बचा के जो हमारी स्पीशीज हैं उनको बचा के हमको आगे डेवलप करना है। और आगे हमें एक ग्रीन फ्यूचर की तरफ बढ़ना है। मींस जो अभी ग्रीनरी दिख रही जैसे हमने बताया कि प्लांट्स जो फॉरेस्ट है वह खत्म होते जा रहे हैं। तो आगे आने वाली जनरेशन के लिए ऑक्सीजन की कमी हो सकती है
57:23 या और जो बायोड डायवर्सिटी है स्पीशीज है उसकी कमी हो सकती है। तो एक ग्रीनर फ्यूचर की तरफ हमें बढ़ना है। और यह जो जर्नी है, इसका हमें रास्ता ढूंढना है। द जर्नी टुवर्ड्स द सस्टेनेबल एंड हेल्दी प्लेनेट इज़ अ कलेक्टिव एफर्ट दैट रिक्वायर्स अ फंडामेंटल शिफ्ट इन हाउ ह्यूमन सोसाइटी इंटरेक्ट्स विथ द एनवायरमेंट। हम कैसा इंटरेक्ट करते हैं एनवायरमेंट के साथ ताकि वह भी सर्वाइव कर सके और हम भी सर्वाइव कर सके। इट इनवॉल्व्स कॉन्शियस चॉइसेस। हमें बड़ी कॉन्शियसली अपना ब्रेन यूज करके अपना सारी एक्टिविटी को लिमिट करके ऐसे चॉइसेस करने हैं। टेक्नोलॉजिकल इनोवेशन करने हैं। नई-नई टेक्नोलॉजी लानी है। जैसे अभी न्यूक्लियर फिशर न्यूक्लियर फ्यूजन की एनर्जी आने वाली है। तो ये सारे हम इनोवेशन करें। ये सारे टेक्नोलॉजिकल इनोवेशन करें। जिससे हम एनवायरमेंट को और
58:08 अपने आप को बचा सकें। एक ऐसा कमिटमेंट करें कि जो अपना नेचुरल वर्ल्ड है, उसको हम प्रिजर्व कर सकें अपने फ्यूचर जनरेशन के लिए। बाय वर्किंग टुगेदर वी कैन बिल्ड अ फ्यूचर व्हेयर ह्यूमन प्रोग्रेस एंड इकोलॉजिकल हेल्थ आर इन हार्मोनी। क्रिएटिंग अ वर्ल्ड दैट इज़ मोर रेजिलेंट, इक्विपबल एंड वाइब्रेंट फॉर एवरीवन। हमें एक ऐसा एनवायरमेंट बनाना है। साथ मिलके हम सबको मिलके हर इंडिविजुअल को मिलके एक ऐसा एनवायरमेंट बनाना है। एक ऐसे रूल बनाने हैं जिसको सब फॉलो करें और ऐसा फ्यूचर बनाएं जिससे हम भी प्रोग्रेस कर सकें। हमारा इकोलॉजिकल हेल्थ भी जो है वो हार्मोनी में रहे और एक ऐसा संसार ऐसा विश्व बनाएं जो सबके लिए अच्छा हो। हियर इज़ द इमेज ऑफ़ डिपिटिंग नेक्स्ट। इसके तीन मेन पिलर है। कैसे हम ग्रीन फ्यूचर बना
58:55 सकते हैं। सबसे पहला रिन्यूएबल एनर्जी सोर्सेस जो है उसका इस्तेमाल करें। हम नेचुरल रिसोर्सेज को ना खत्म करें। जिससे हम ट्रांजिशन करें किस पे? फोसिल फ्यूल से क्लीन रिन्यूएबल एनर्जी सोर्सेस पे। जो पहले हम कोयला और तेल यूज करते थे। इसकी जगह हम और एडवांस टेक्नोलॉजी में जाएं। जैसे कि सोलर एनर्जी हमारे पास लिमिटलेस है। तो हम सोलर एनर्जी यूज़ करें। सोलर कुछ ऐसे इनोवेशंस बनाएं, कुछ ऐसी टेक्नोलॉजी बनाएं जिससे सोलर एनर्जी का हम ज्यादा से ज्यादा यूज़ करें। विंड एनर्जी का यूज़ करें जो नेचर ने हमें बहुत अथा सागर में दी हुई है और हाइड्रो पावर का इस्तेमाल करें। जैसे मैंने बताया अभी न्यूक्लियर फ्यूज़ और न्यूक्लियर फ्यूज़ से न्यू टेक्नोलॉजी से पावर जनरेशन होने वाली है। तो इसका हम इस्तेमाल करें। रिन्यूएबल एनर्जी का इस्तेमाल करें। व्हिच डज़ नॉट रिड्यूसेस एयर पोल्यूशन जिससे ना तो पोल जो सिर्फ
59:42 पोल्यूशन कम नहीं होगा बल्कि हमारा ग्रीन हाउस गैस एमिशन जो है वह भी कम होंगे और न्यू इकोनॉमिकल अपॉर्चुनिटीज और एनर्जी इंटरडिपेंडेंस आएगी। मींस एनर्जी तो हमें चाहिए ही डेवलपमेंट के लिए पर वो एनर्जी हम न्यू टेक्नोलॉजी से न्यू इनोवेशन से इस्तेमाल करें और अपने जो पुराने अपने फॉसिल फ्यूल्स हैं जो हमारा नेचुरल रिसोर्स है उसका प्रोटेक्शन करें। उसको बचा के चलें। नेक्स्ट है अपना सस्टेनेबल लिविंग। दिस इनवॉल्व्स अडॉप्टिंग अ लाइफ स्टाइल दैट मिनिमाइज आवर एनवायरमेंटल फूटप्रिंट्स। इट इंक्लूड्स प्रैक्टिससेस सच एज रिड्यूसिंग कंजमशन, रयूजिंग मटेरियल्स एंड रिसाइक्लिंग। जो हमारे नेचुरल रिसोर्सेज है उसका हम कम से कम इस्तेमाल करें। ऐसी प्रैक्टिस करें। ऐसे लाइफस्टाइल जिए जिससे कि जो कंजम्पशन ऑफ
1:00:30 नेचुरल रिसोर्सेज हैं वो कम हो जाए। हमारे जो मटेरियल है जो हम नेचुरल रिसोर्सेज यूज कर रहे हैं उसको हम रीयूज करें। जैसे हमने वुड काट के पेपर तो बना लिया पर पेपर को हम रीयूज कर करें या आजकल तो ऑनलाइन है तो इसमें पेपर का रिडक्शन हम बहुत हद तक कर चुके हैं पर फिर भी बाकी जितने जैसे प्लास्टिक हो गया इन सबको हम रीयूज करें ताकि जो नेचुरल रिसोर्सेज है वो बच सके। अर्बन प्लानिंग जो है वो भी प्रमोट करती है सस्टेनेबिलिटी को। जो ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर आजकल जो घर बन रहे हैं उसमें ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर बन रहे हैं कि हमको बहुत ज्यादा एसी और फैन और इन सबके कूलर की जरूरत ना पड़े। एयर का ट्रांसपोर्ट जो है वो अच्छे से रहे जिससे जिसको हम ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर बोलते हैं जिससे हमारी जो इलेक्ट्रिसिटी है उसका कंजम्पशन कम हो जाएगा। पब्लिक ट्रांसपोर्टेशन यूज़ करें। आज हर घर में
1:01:17 चार-चार पांच-प कारें हैं तो उसमें हम ऐसा ना करें। पब्लिक ट्रांसपोर्ट का यूज़ करें या एक ही गाड़ी में तीन-चार लोग अगर यूज़ कर सकते हैं उसको तो वह यूज़ करें और कम्युनिटी गार्डंस बनाएं। अपने आसपास के एरिया में ग्रीनरी लाएं। जैसे टेरेस गार्डन्स हो गया या अपने घर के आसपास गली में कहीं भी जहां जगह बचती है तो कॉलोनी वाले मिलके कमेटी बना के एक सोसाइटी बना के वहां पे गार्डन बनाएं जिससे ग्रीनरी ज्यादा हो और आपको ज्यादा से ज्यादा ऑक्सीजन मिल सके। नेक्स्ट इज़ कंजर्वेशन एंड रिस्टोरेशन। प्रोटेक्टिंग एकिस्टिंग इकोसिस्टम। जैसे हमने अभी इकोसिस्टम देखा तो उसका बैलेंस जो है वो कब बिगड़ता है? जब ह्यूमन एक्टिविटीज ज्यादा होती हैं। तो इस इकोसिस्टम को हमें रिस्टोर करना है और जो डैमेज हो गई है उसको भी हमें रिस्टोर करना है। एसेंशियल फॉर मेंटेनिंग बायोडायवर्सिटी। हमारी बायोडायवर्सिटी जो
1:02:03 है हमारी स्पीशीज हैं जो हमारे इंस्टिंक्ट एनिमल्स हैं, प्लांट्स हैं इनको वापस हमें नेचुरल सर्विस करना है। नेचुरल सर्विस देना है इनको। दिस इंक्लूड्स रिफॉरेस्टेशन। जैसे अभी हमने री डिफॉरेस्टेशन पढ़ा। ऐसे ही आजकल प्लांटेशन के बहुत ज्यादा माहौल चल रहा है। अभी मौसम भी है फॉरेस्टेशन का तो रिफॉरेस्टेशन करें जिससे ज्यादा से ज्यादा पेड़ उगाएं जिससे हमें और हमारी आने हमें भले फायदा ना हो पर हमारी आने वाली जनरेशन को उससे ऑक्सीजन की कमी ना हो। अपनी मराइन लाइफ को हम प्रिजर्व करें। और एक अर्थ को अपने एनवायरमेंट को एक इतना सुंदर स्थान बनाएं जिससे हम तो अच्छे से सर्वाइव करें ही। हमारी सारी नीड उससे पूरी हो। जो नॉन लिविंग थिंग्स हैं वो भी प्रोटेक्टेड हो और इसके अलावा सस्टेनेबिलिटी बनी रहे जिससे हमारा फ्यूचर
1:02:50 जो है हमारी फ्यूचर जनरेशन जो है वो भी इस एनवायरमेंट में खुली सांस लेके आराम से रह सके। थैंक यू थैंक यू सो मच। थैंक यू सर। मैम एक क्वेश्चन है। यस अभी क्लाउड बहुत ज्यादा हो रहा है। इसके क्या रीज़ है? आवाज थोड़ा सा जोर से बोलेंगे मैम आवाज क्लाउड ब्रस्टिंग मैम क्लाउड ब्रस्टिंग बादल फटने की अभी ज्यादा समस्या है उत्तराखंड वगैरह एरिया में तो ये क्या है एनवायरमेंटल इशू भी थैंक यू मैडम आवाज नहीं समझ में आ रहा क्वेश्चन नहीं समझ में आ रहा है मैम आपका क्लाउड क्या बोल रहे हैं आप क्लाउड हो रहे हैं बादल फटने की घटनाएं
1:03:38 यस क्लाउड बादल फट रहे हैं। अभी जो हां अभी जो पंजाब में आपने पंजाब बहुत हमारा सफर कर रहा है इस चीज से क्लाउड फटने का। ये सारी जो है वो ह्यूमन एक्टिविटीज के कारण ही हैं। जो गैसेस हैं जो जैसे मैंने एटमॉस्फेरिक गैसेस बताया था जो ग्रीन हाउस इफेक्ट वाली गैसेस हैं या जो भी गैसेस हैं ये प्रॉपर उस एरिया में जो जैसे एक्टिविटी होनी चाहिए जो रिएक्शंस होने चाहिए वो नहीं हो पा रहे। जैसे रेनी सी रेन होना चाहिए। क्लाउड्स बन के फिर रेन होना चाहिए। पर वो प्रोसेस जो है वो इतनी डिले हो जाती है कि क्लाउड ऊपर ही बस्ट हो रहे हैं जिसके कारण जो लार्ज अमाउंट ऑफ वाटर है वो एक साथ एक ही जगह पर हो रहा है। अदरवाइज क्या होता है क्लाउड्स बनते हैं और वो विंड उसको अलग-अलग जगह लेके जाती है और अलग-अलग जगह बारिश होती है। पर ये एक्टिविटी जो प्रोसेस है वो
1:04:24 पूरी नहीं हो पाती और उसी जगह पे क्लाउड जो है वो बस्ट हो जाते हैं और ह्यूज अमाउंट ऑफ रेनफॉल जो है वहां पे हो रहा है। ये सारा जो है ये पोल्यूशन का कारण है और ह्यूमन एक्टिविटी के कारण है। इसके पीछे एक रीजन मैडम यह भी है कि जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर जो प्रोजेक्ट है उनमें जो डस्ट पार्टिकल उड़ रहे हैं जो एटमॉस्फयर में जाते हैं उनके चारों तरफ वेपर उसको न्यूक्लियााई की तरह काम करते हुए बड़ी स्पीड से एक्यूमुलेट होती हैं और फिर वो स्पीड से एक साथ बूंदों के बनना और उसके कारण भी एक रीजन बताया जा रहा है कि क्लाउड ब्रस्ट होने के पीछे का रीजन यह भी है जो नेचुरल प्रोसेस है उसमें कुछ प्रॉब्लम यह जो डिफेक्ट आ रहा है इसके कारण मेनली है जैसे आपने बताया कि वो उसके डस्ट
1:05:10 पार्टिकल्स के कारण है तो दैट इज अ कॉज ऑफ एयर पोल्यूशन तो एयर पोल्यूशन से जब सिर्फ पार्टिकल जब इवापोरेशन होता है तो सिर्फ प्योर वाटर ऊपर जाता है बट अभी इतना ज्यादा कंटैमिनेशन हो गया है कि वाटर के साथ कुछ पार्टिकल्स जो हैं वो भी हमारे एनवायरनमेंट में साथ में रहते हैं और वह उस लेवल तक जाते हैं क्योंकि वो लोअर लेवल पे भी है क्लाउड्स जो हैं वो नीचे वाले लेवल पे तो वहां तक वो पार्टिकल्स जो है वो भी इसका एक कारण जी मैम तो मैम ये एक्चुअली ज्यादा हिली एरिया में क्यों हो रहा है इधर साउथ में हमारे राजस्थान में उधर क्यों नहीं हो रहा बादल फटने का वसा क्यों हो रहा है हिमाचल में इधर जम्मू में और हायर एटीट्यूड के एरियाज जो होते हैं वहीं पे ज्यादा होता है क्योंकि ओोग्राफिक इफेक्ट कह सकता है मैम उसमें
1:05:56 हिली एरिया में मैम ओरोग्राफिक इफेक्ट भी हो सकता है और वहां का टेंपरेचर जो वो कम होता है। बाकी जगह नीचे क्लाउड तक आने तक टेंपरेचर इफेक्ट कम रहता। टेंपरेचर डिफरेंस जो है कम रहता है। हिली एरिया में क्योंकि हायर एटीट्यूड है वहां पे टेंपरेचर बहुत कम होता है। इसके कारण ये प्रोसेस होती है। गुड इवनिंग मैम। एक एक बड़ा दो शब्दों के बीच में जो है एक बड़ा कन्फ्यूजन सा रहता है। कॉमनली इकोलॉजी और एनवायरमेंट मतलब हाउ वी डिफरशिएट बिटवीन दी टू?
1:06:44 एनवायरमेंट जो है वो भी बायोटिक और एबायोटिक से मिलके बनता है। इकोलॉजी जो है वो एक इकोलॉजी में सर एनवायरमेंट के बारे में जो हम स्टडी करते हैं इकोलॉजी इस एक्चुअली अ स्टडी डिपार्टमेंट या क्या बोलना चाहिए उसको एक कोर्स है एक स्टडी है अबाउट एनवायरमेंट इकोलॉजी इज द स्टडी ऑफ एनवायरमेंट ओके थैंक यू मैम थैंक यू मैम।
1:07:29 थैंक यू सर। थैंक यू मैम। थैंक यू। थैंक यू मैम। थैंक यू वेरी मच मैम। थैंक यू मैम। थैंक यू मैम। थैंक यू सो मच मैम। हेलो। थैंक यू। थैंक यू। थैंक यू मैम। और कोई थैंक यू चलिए बहुत बढ़िया हो गया आप लोग का लेक्चर अच्छा जी सर मैं तो सुन नहीं पाया क्योंकि यहां पर जैसे प्रोग्राम चल रहा था अच्छा हुआ
1:08:14 हां लेकिन अजय हां सर तुम तुम लोग यार डीप स्टेट की रिसर्चेस मत पढ़ा करो यार। कौन सी पढ़ दी सर? है ना? ये जो डीप स्टेज के जो आर्टिकल्स होते हैं ना वो बड़े खतरनाक होते हैं। ऐसा लगता है बिल्कुल सही है। ऐसा लगता है बिल्कुल एटमॉस्फेयर के बारे में और फिर उसके बाद पोशन वगैरह के बारे में जो चीजें अब क्लाउड ब्लस्ट बस्ट होता है। क्या नुकसान किया क्लाउड बस्ट में? कुछ नहीं किया। आप उसके रास्ते में जाकर बैठ के घर बना के बैठे हो तो आप जाओगे ही उसके नीचे। अभी तक आप मानते हैं कि पंजाब में बाढ़ का वो प्रकोप आया वो ठीक है। कभी-कभी ऐसा होता है। मगर बहुत समय के बाद में बिना
1:09:01 कोई आंधी तूफान के वर्षा आई तो तो होना ही था थोड़ा बहुत। लेकिन क्लाउड बस्ट का रीजन तो बिल्कुल डिफरेंट है ना। बिल्कुल डिफरेंट क्लाउड और जो ऊपर में झील बनती है जो झीलों का डैमेज होना नेचुरल वो तो नेचुरल प्रोसेस है लेकिन एक चीज मुझे एक बात बताओ तुम्हारे इस पूरे अर्थ में ठीक है 74 से 75% सिर्फ पानी ही पानी यस सर अर्थ को इतना छोटा सोर्स अब बचा तुम्हारे पास 25 26% उसमें से कम से कम 12 से 14% तक में सिर्फ
1:09:47 फॉरेस्ट ही फॉरेस्ट है। सिर्फ फॉरेस्ट है। बल्कि ज्यादा समझ जाओ करीब पापुलेशन पापुलेशन एंड सिटी एरिया जो है आपका अरे
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