संक्षिप्त सारांश
यह प्रवचन श्रीमद्भगवत गीता में भगवान कृष्ण द्वारा की गई भविष्यवाणियों और कलयुग के अंत में आने वाले परिवर्तनों पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि कैसे धर्म का पतन हो रहा है, अधर्म बढ़ रहा है, और प्रकृति विनाशकारी संकेत दे रही है। 2026 के अंत से शुरू होने वाले परिवर्तनों के बारे में चेतावनी दी गई है, जिसमें प्राकृतिक आपदाएं, आकाशीय घटनाएं और मंदिरों में असामान्य घटनाएं शामिल हैं। यह प्रवचन लोगों को धर्म का पालन करने, भगवान कृष्ण की शरण में आने और अपने भीतर के पापों को त्यागने के लिए प्रोत्साहित करता है ताकि वे आने वाले संकटों से बच सकें।
मुख्य बातें:
- धर्म का पतन और अधर्म का उदय
- 2026 के अंत से शुरू होने वाले विनाशकारी परिवर्तन
- प्राकृतिक आपदाएं और आकाशीय घटनाएं
- मंदिरों में असामान्य घटनाएं
- भगवान कृष्ण की शरण में आने और धर्म का पालन करने का महत्व
यह प्रवचन एक असाधारण कथा के बारे में है, जो हजारों वर्षों से ऋषियों और मुनियों द्वारा साधना में पाई गई है। यह एक रहस्य है जिसे समय के गर्भ में छुपा दिया गया था, लेकिन अब वह भविष्यवाणी पृथ्वी पर उतरने वाली है। यह भविष्यवाणी श्रीमद्भगवत गीता में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को युद्धभूमि में दी थी। गीता के श्लोक केवल उस युद्ध के लिए नहीं थे, बल्कि हर युग और कालचक्र के लिए थे।
आज का समय वैसा ही है जब धर्म केवल पुस्तकों और दिखावे तक सिमट गया है। मंदिरों में आस्था से ज्यादा व्यापार चल रहा है। तपस्वी सन्यास त्याग कर लोभ, मोह, क्रोध और अहंकार के वश में आ चुके हैं। मनुष्य पशुता की सीमा लांघ चुका है और धर्म के रक्षक ही अधर्म का पोषण कर रहे हैं। यह संकेत है कि अब कालचक्र करवट लेने वाला है। गीता के चौथे अध्याय में श्री कृष्ण ने कहा था कि जब-जब इस धरती पर धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होगी, तब-तब मैं अपने आप को प्रकट करूंगा।
2026 का अंत एक अद्भुत साधि काल लेकर आएगा। एक ऐसा कालखंड जिसमें संपूर्ण विश्व परिवर्तन की दहलीज पर खड़ा होगा। मंदिरों में मूर्तियां खिसक रही हैं, शिवलिंग से रक्त स्राव हो रहा है, नदियां उल्टी बहने लगी हैं, आसमान में अनोखी ध्वनियां गूंजने लगी हैं, कभी रक्त वर्णी सूर्य तो कभी लाल चंद्रमा दिखाई दे रहा है। आधुनिक विज्ञान इसे संयोग कहेगा, पर वेद, पुराण और गीता इन्हें भविष्य का संकेत मानते हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण के द्वादश स्कंध में लिखा है कि कलयुग के अंतिम चरण में मनुष्य धर्महीन, क्रूर, कपटी और निर्दई हो जाएगा। पुत्र अपने पिता का अपमान करेगा, स्त्रियां स्वच्छंद हो जाएंगी, धरती पर भीषण अकाल और महामारी फैलेगी और देवताओं के मंदिरों में दुर्घटनाएं होंगी। यह सब संयोग नहीं बल्कि पूर्वदर्शित घटनाएं हैं।
श्री कृष्ण ने कहा था कि जब पाप अपने चरम पर होगा, जब धर्म के रक्षक धर्म छोड़ देंगे, जब लोग केवल लोभ और अहंकार में जिएंगे, तब काल अपनी गति बढ़ा देगा। प्रकृति संकेत भेजेगी, नदियां उग्र होंगी, अग्नि पर्वत जागेंगे, आकाश में अग्नि रेखाएं दिखेंगी और यह सब 2026 के अंतिम मास से आरंभ होने वाला है।
श्री कृष्ण ने कहा था कि जब लोग सारे धर्मों को छोड़कर केवल मेरा ही शरण लेंगे तभी संकट से मुक्ति मिलेगी। गीता का यही संदेश अब अंतिम सत्य बनकर सामने आ रहा है। हाल के वर्षों में महामारी आई, पृथ्वी पर भूकंपों का सिलसिला तेज हुआ, आकाश में लालिमा बढ़ी, मंदिरों में दुर्घटनाएं हुईं, मूर्तियां रोने लगीं और देवताओं के मंदिरों में अपवित्रता का बोलबाला रहा।
2026 के अंतिम दिनों में वह होगा जिसकी कल्पना तक मनुष्य नहीं कर सकता। आकाश में अद्भुत दृश्य दिखेंगे, कभी तीन सूर्य तो कभी लाल-लाल चंद्रमा दिखाई देगा, रहस्यमय ध्वनियां सुनाई देंगी, मूर्तियों से रक्त स्राव होगा, समुद्र का जल स्तर बढ़ेगा, अग्नि वर्षा होगी, भूकंप आएंगे, द्वीप डूब जाएंगे और महामारी फिर से लौटेगी।
श्री कृष्ण ने गीता में कहा था कि जो निरंतर भक्ति और श्रद्धा में लीन है, जिसे मोह, माया, क्रोध और लोभ स्पर्श नहीं कर पाते, वही मेरी शरण में सच्चा है और वही मेरी कृपा से इन आपदाओं में भी सुरक्षित रहेगा। संसार में वही बचेगा जो धर्म का मार्ग पकड़ेगा।
2026 का अंत अंतिम चेतावनी है। जो जागा वही बचेगा, जो सोया वह काल का ग्रास बनेगा। गीता के अनुसार जब चारों ओर अधर्म, भय, हत्या, पाप और अपवित्रता बढ़ने लगेंगी, जब पशु-पक्षी तक असहज हो जाएंगे, जब अग्नि पर्व धधकने लगेंगे, जब समुद्र नगरों को ललने लगेगा, तब समझ लेना कलयुग का अंतिम चरण आरंभ हो चुका है।
अब समय है केवल जागने का, श्री कृष्ण का स्मरण करने का, गीता का पाठ करने का, अपने भीतर के पाप, मोह और अहंकार को त्यागने का। क्योंकि आने वाला समय हर उस मनुष्य को छान डालेगा जो अधर्म में लिप्त है।
2026 का अंत और 2027 का आरंभ धर्म और अधर्म की अंतिम लड़ाई की दहलीज है। और उस युद्ध में विजय वहीं होगा जिसकी आत्मा सच्ची होगी, जिसकी श्रद्धा श्री कृष्ण में अडिग होगी, जो गीता के वचनों को अपने जीवन का आधार बना लेगा।
भविष्य पुराण, वायु पुराण और कालिका पुराण में लिखा है कि कलयुग का अंतिम संधि काल भयानक होगा। आकाश में अग्नि वर्षा होगी, सूर्य और चंद्रमा के स्वरूप बदलेंगे, पृथ्वी में कंपन होगा, समुद्र अपना जल उगल देगा, आकाश में विचित्र रंगीन रेखाएं दिखाई देंगी, मंदिरों में देवी देवताओं की मूर्तियां अपने स्थान त्याग देंगी, उनके मुख से अश्रुधारा बहेगी और फिर पृथ्वी पर ऐसी चीखें गूंजेंगी जो मानव जाति के कलेजे को हिला देंगी।
श्रीमद्भगवत गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन को बताया था कि यह संपूर्ण संसार माया का जाल है। जब मनुष्य इस माया में फंसकर अपना धर्म, अपना सत्व और अपनी सच्चाई भूल जाता है, तब प्रकृति उसे झगझोड़ती है।
आज का मनुष्य विज्ञान की उपलब्धियों पर इतराता है, लेकिन, श्री कृष्ण ने कहा था कि जो सृष्टि मैंने रची है, उसकी एक-एक व्यवस्था केवल मेरी आज्ञा से संचालित होती है और जो मनुष्य यह सोचता है कि वह प्रकृति को अपने अधीन कर सकता है, वह अपने विनाश को आमंत्रित कर रहा है।
2026 का अंत एक ऐसी रात लेकर आएगा जिसके बाद की सुबह इस सृष्टि का चेहरा बदल देगी। उस दिन सूर्य का रंग सामान्य नहीं होगा, आकाश में कई सूर्य प्रतीत होंगे, उस रात आकाश में विचित्र ध्वनियां होंगी, देवताओं के मंदिरों में दीपक अपने आप बुझने लगेंगे, मूर्तियां स्वयं अपने स्थान को त्याग देंगी, कई साधु संत बिना किसी पूर्व सूचना के समाधि ले लेंगे, नदियों का जल लालिमा लिए बहेगा, तारा समूह विलीन होंगे और समुद्र में ऐसी ज्वार उठेगी जो नगरों को निगल जाएगी।
श्री कृष्ण ने गीता में कहा था कि इस संपूर्ण सृष्टि में जो भी होता है वह समय के विधान से बंधा है। जब अधर्म बढ़ेगा, पाप चारों ओर व्याप्त होगा, मनुष्य धर्म विहीन, स्वार्थी और निर्दयी हो जाएगा तो प्रकृति अपना कार्य करेगी। श्री कृष्ण ने कहा था कि जो मेरी शरण में आता है, जो सच्चे हृदय से भक्ति करता है, वह इन आपदाओं से सुरक्षित रहेगा।
श्री कृष्ण ने कहा था कि कलयुग के अंत में जो भी मेरी भक्ति करेगा, जो मेरे नाम का सच्चे हृदय से जाप करेगा, मैं स्वयं उसकी रक्षा करूंगा। अब जो संकेत मिलने लगे हैं वे छुपे नहीं रह सकते। मंदिरों में शिवलिंग से रक्त स्राव, मूर्तियों का रोना, तारा समूह का गायब होना, नदियों का मार्ग बदलना, देवताओं की मूर्तियों का विलीन हो जाना, यह सब वही घटनाएं हैं जो पुराणों और गीता में वर्णित हैं।
श्री कृष्ण ने गीता में कहा था कि जो मनुष्य केवल सुख, दुख, हानि, लाभ और जन्म मरण में उलझा रहता है, वह कभी मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सकता। अब समय वही है जब सारे मायाजाल को छोड़कर ईश्वर की शरण में जाने का है।
2026 का अंत और 2027 का प्रारंभ वह घड़ी है जब अधर्म का राज्य डगमगाएगा, प्रकृति अपना रौद्र रूप दिखाएगी और धर्म का पुनर्जन्म होगा। श्री कृष्ण ने कहा था कि युगों का परिवर्तन समय के अनुसार निश्चित है। सतयुग आएगा, अधर्म का अंत होगा लेकिन उससे पहले संहार अवश्य होगा।
2026 उसी फल देने वाले समय का द्वार है और जो मनुष्य सजग रहेगा, सच्चे हृदय से श्री कृष्ण का नाम जपेगा वही सुरक्षित रहेगा। अब वक्त है अपने भीतर झांकने का, अपने पाप, अपनी वासनाओं, अपने मोह को पहचानने का। क्योंकि श्री कृष्ण ने कहा था मनुष्य स्वयं ही अपने जीवन का शत्रु है और स्वयं ही मित्र। जो अपने अंतःकरण को वश में कर लेता है वही सारे संकटों में सुरक्षित रहता है।
Transcript
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0:00 ध्यान से सुनिए जो आप आज इस वाणी में सुनने जा रहे हैं वह कोई साधारण कथा नहीं यह वह रहस्य है जिसे हजारों वर्षों से ऋषियों मुनियों ने साधनाओं में पाया था जिसे काल के गहरे गर्भ में छुपा दिया गया था और अब वह समय समीप आ गया है जब वो भविष्यवाणी अपने रूप में इस पृथ्वी लोक पर उतरने वाली है यह वही भविष्यवाणी है जिसका उल्लेख श्रीमद्भगवत गीता में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध भूमि में दिया था महाभारत के मैदान में जब अर्जुन मोहग्रस्त होकर अपने कर्तव्य से विचलित हुए तब श्री कृष्ण ने जो गूढ़ ज्ञान दिया वही गीता के रूप में हम सबके पास है और गीता के श्लोक केवल उस युद्ध के लिए नहीं थे वे हर युग के लिए थे हर कालचक्र के लिए
0:45 थे उन वचनों में केवल धर्म अधर्म की बात नहीं थी अभिदु आने वाले कल की भी भविष्यवाणी थी श्री कृष्ण ने कहा था कि जब जब धर्म की हानि होगी और अधर्म बढ़ेगा तबतब मैं इस धरती पर अवतरित होकर धर्म की पुनः स्थापना करूंगा। ध्यान दीजिए आज का समय वैसा ही है जब धर्म केवल पुस्तकों और दिखावे तक सिमट गया है। जब मंदिरों में आस्था से ज्यादा व्यापार चल रहा है। जब तपस्वी सन्यास त्याग कर लोभ, मोह, क्रोध और अहंकार के वश में आ चुके हैं। जब मनुष्य पशुता की सीमा लांघ चुका है। जब धर्म के रक्षक ही अधर्म का पोषण कर रहे हैं और यही संकेत है कि अब कालचक्र करवट लेने वाला है। गीता के चौथे अध्याय में श्री कृष्ण ने जो कहा था वह अक्षरशः आज
1:32 सत्य होता दिख रहा है। यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवती भारत अभ्युत्थानं अधर्मस्य तदात्मानंम सजाम्यहम अर्थात जबजब इस धरती पर धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होगी तब तब मैं अपने आप को प्रकट करूंगा। अब वह समय बहुत दूर नहीं क्योंकि 2026 का अंत एक अद्भुत साधि काल लेकर आएगा। एक ऐसा कालखंड जिसमें संपूर्ण विश्व परिवर्तन की दहलीज पर खड़ा होगा। आपने देखना आरंभ कर दिया होगा। कहीं मंदिरों में मूर्तियां खिसक रही हैं। कहीं शिवलिंग से रक्त स्राव हो रहा है। कहीं नदियां उल्टी बहने लगी हैं। आसमान में अनोखी ध्वनियां गूंजने लगी हैं। कभी रक्त वर्णी सूर्य कभी लाल चंद्रमा। कभी दिन दोपहर में बादलों का काला अंधकार।
2:19 इन सबको आधुनिक विज्ञान संयोग कहेगा। पर वेद, पुराण और गीता इन्हें भविष्य का संकेत मानते हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण के द्वादश स्कंध में लिखा है कि कलयुग के अंतिम चरण में मनुष्य धर्महीन, क्रूर, कपटी और निर्दई हो जाएगा। पुत्र अपने पिता का अपमान करेगा। स्त्रियां स्वच्छंद हो जाएंगी। धरती पर भीषण, अकाल और महामारी फैलेगी और देवताओं के मंदिरों में दुर्घटनाएं होंगी। यह सब संयोग नहीं बल्कि पूर्वदर्शित घटनाएं हैं। भगवत गीता के श्लोक केवल युद्ध के लिए नहीं थे। वे आने वाले समय के लिए भी थे। श्री कृष्ण ने कहा था कि जब पाप अपने चरम पर होगा। जब धर्म के रक्षक धर्म छोड़ देंगे। जब लोग केवल लोभ और अहंकार में जिएंगे तब काल अपनी गति
3:05 बढ़ा देगा। प्रकृति संकेत भेजेगी। नदियां उग्र होंगी। अग्नि पर्वत जागेंगे। आकाश में अग्नि रेखाएं दिखेंगी। और यह सब इसी 2026 के अंतिम मास से आरंभ होने वाला है। धर्म के रक्षक धर्म छोड़ चुके हैं। राजसत्ता पापाचार में लिप्त है। साधु संत स्वार्थ में लिप्त हो गए हैं और प्रजा मोह और पाप में डूब रही है। श्री कृष्ण ने कहा था कि जब लोग सारे धर्मों को छोड़कर केवल मेरा ही शरण लेंगे तभी संकट से मुक्ति मिलेंगे। सर्वधर्मान परित्यज मामेकम शरणम व्रज अहम तम सर्व पापे भ्यो मोक्षय श्याम मा शचः गीता का यही संदेश अब अंतिम सत्य बनकर सामने आ रहा है। तुम सोचो अभी हाल के वर्षों में क्या-क्या घटनाएं घटी हैं।
3:51 महामारी आई पृथ्वी पर भूकंपों का सिलसिला तेज हुआ। आकाश में लालिमा बढ़ी। मंदिरों में दुर्घटनाएं, मूर्तियां रोने लगी। देवताओं के मंदिरों में अपवित्रता का बोलबाला और अब 2026 के अंतिम दिनों में वो होगा जिसकी कल्पना तक मनुष्य नहीं कर सकता। आकाश में अद्भुत दृश्य कभी तीन सूर्य कभी लाल-लाल चंद्रमा रहस्यमय ध्वनियां, मूर्तियों से रक्त स्राव, समुद्र का जल स्तर बढ़ना, अग्नि वर्षा, भूकंप, द्वीपों का डूबना, महामारी फिर से लौटाना। श्री कृष्ण ने गीता में कहा था जो निरंतर भक्ति और श्रद्धा में लीन है जिसे मोह माया क्रोध और लोभ स्पर्श नहीं कर पाते वही मेरी शरण में सच्चा है और वही मेरी कृपा से इन आपदाओं में भी सुरक्षित
4:39 रहेगा। संसार में वही बचेगा जो धर्म का मार्ग पकड़ेगा। इस 2026 के अंतिम दिनों में जब सारे साधन विफल हो जाएंगे। विज्ञान मौन हो जाएगा। धन धूल में मिल जाएगा। सत्ता मिट्टी में मिल जाएगी। तब एकमात्र श्री कृष्ण का नाम ही सहारा होगा। श्री कृष्ण ने कहा था धर्म की रक्षा के लिए मैं समय-समय पर प्रकट होता हूं। कालचक्र की गति तेज हो चुकी है। गीता के वचनों की सच्चाई अब एक-एक करके प्रकट हो रही है। सावधान यह वही समय है जिसकी भविष्यवाणी महर्षि वेदव्यास ने की थी। वही कालखंड है जिसमें देवी देवता स्वप्नों में संकेत देंगे। मूर्तियां स्वयं स्थान त्याग देंगी। मंदिरों में रहस्यमई कंपन होगा। तारा समूह विलीन होंगे और अनगिनत ध्वनियां
5:25 आकाश मार्ग से सुनाई देंगी। श्री कृष्ण ने कहा था कर्म करते रहो धर्म का पालन करते रहो। जो सच्चे कर्म और सच्ची श्रद्धा के साथ मेरे शरण में आता है। मैं उसकी हर आपदा में रक्षा करता हूं। 2026 का अंत अंतिम चेतावनी है। जो जागा वही बचेगा। जो सोया वह काल का ग्रास बनेगा। गीता के अनुसार जब चारों ओर अधर्म, भय, हत्या, पाप और अपवित्रता बढ़ने लगेंगी, जब पशु-पक्षी तक असहज हो जाएंगे, जब अग्नि पर्व धधकने लगेंगे, जब समुद्र नगरों को ललने लगेगा, तब समझ लेना कलयुग का अंतिम चरण आरंभ हो चुका है। अब समय है केवल जागने का, श्री कृष्ण का स्मरण करने का, गीता का पाठ करने
6:11 का, अपने भीतर के पाप, मोह और अहंकार को त्यागने का। क्योंकि आने वाला समय हर उस मनुष्य को छान डालेगा जो अधर्म में लिप्त है। कालचक्र अपनी गति पकड़ चुका है। 2026 का अंत और 2027 का आरंभ धर्म और अधर्म की अंतिम लड़ाई की दहलीज है। और उस युद्ध में विजय वहीं होगा जिसकी आत्मा सच्ची होगी जिसकी श्रद्धा श्री कृष्ण में अडिग होगी। जो गीता के वचनों को अपने जीवन का आधार बना लेगा। यह वही काल है जहां प्रकृति, काल और ईश्वर की शक्ति एक साथ प्रकट होगी। 2026 का अंत बस कुछ ही महीनों की दूरी पर है। संकेत साफ है। केवल वे ही अंधे हैं जो देखना नहीं चाहते। जो जाग गया वहीं बचेगा।
6:56 जो सोया वह काल का ग्रास बनेगा। श्री कृष्ण ने कहा था कि जब मनुष्य अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर धर्म का त्याग करता है। जब लोभ और अहंकार उसकी दृष्टि को ढक लेता है। जब उसके भीतर का सत्य मर जाता है, तब वह स्वयं अपने विनाश का कारण बन जाता है। गीता में बताया गया है कि सृष्टि का संचालन केवल परमात्मा की इच्छा और कालचक्र की गति से होता है। मनुष्य चाहे लाख यत्न कर ले लेकिन समय की चाल को रोक नहीं सकता। समय ही धर्म की परीक्षा लेता है। समय ही सृष्टि का निर्माण करता है और वहीं उसका संहार करता है। 2026 का समय वहीं घड़ी है जब यह समय अपनी तेज गति पकड़ रहा है। अनेक अर्शियों मुनियों ने ध्यानावस्था में इस कालखंड को देखा था। भविष्य पुराण, वायु पुराण और कालिका पुराण
7:44 में लिखा है कि कलयुग का अंतिम संधि काल भयानक होगा। आकाश में अग्नि वर्षा होगी। सूर्य और चंद्रमा के स्वरूप बदलेंगे। पृथ्वी में कंपन होगा। समुद्र अपना जल उगल देगा। आकाश में विचित्र रंगीन रेखाएं दिखाई देंगी। मंदिरों में देवी देवताओं की मूर्तियां अपने स्थान त्याग देंगी। उनके मुख से अश्रुधारा बहेगी और फिर पृथ्वी पर ऐसी चीखें गूंजेंगी जो मानव जाति के कलेजे को हिला देंगी। श्रीमद्भगवत गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन को बताया था कि यह संपूर्ण संसार माया का जाल है। जब मनुष्य इस माया में फंसकर अपना धर्म, अपना सत्व और अपनी सच्चाई भूल जाता है, तब प्रकृति उसे झगझोड़ती है। आप देख सकते हैं पिछले वर्षों में जिस तरह से अचानक भूकंपों की संख्या बढ़ी है, समुद्र ने अपने तटीय
8:30 नगरों को निगलना शुरू किया है। महावृष्टि ने पर्वतों को तोड़ा है। यह सब संकेत उसी अनदेखे कालचक्र के हैं। आज का मनुष्य विज्ञान की उपलब्धियों पर इतराता है, लेकिन, श्री कृष्ण ने कहा था कि जो सृष्टि मैंने रची है, उसकी एक-एक व्यवस्था केवल मेरी आज्ञा से संचालित होती है और जो मनुष्य यह सोचता है कि वह प्रकृति को अपने अधीन कर सकता है। वह अपने विनाश को आमंत्रित कर रहा है। जब मनुष्य ने अपनी सीमाओं का उल्लंघन किया है, तबतब प्रलय हुआ है। सतयुग, त्रेता, द्वापर सभी में ऐसा ही हुआ। और अब कलयुग के अंत में भी वही हो रहा है। 2026 का अंत एक ऐसी रात
9:15 लेकर आएगा जिसके बाद की सुबह इस सृष्टि का चेहरा बदल देगी। उस दिन सूर्य का रंग सामान्य नहीं होगा। आकाश में कई सूर्य प्रतीत होंगे। उस रात आकाश में विचित्र ध्वनियां होंगी। देवताओं के मंदिरों में दीपक अपने आप बुझने लगेंगे। मूर्तियां स्वयं अपने स्थान को त्याग देंगी। कई साधु संत बिना किसी पूर्व सूचना के समाधि ले लेंगे। नदियों का जल लालिमा लिए बहेगा। तारा समूह विलीन होंगे और समुद्र में ऐसी ज्वार उठेगी जो नगरों को निगल जाएगी। श्री कृष्ण ने गीता में कहा था कि इस संपूर्ण सृष्टि में जो भी होता है वह समय के विधान से बंधा है। जब अधर्म बढ़ेगा पाप चारों ओर
10:02 व्याप्त होगा। मनुष्य धर्म विहीन स्वार्थी और निर्दयी हो जाएगा तो प्रकृति अपना कार्य करेगी। श्री कृष्ण ने कहा था कि जो मेरी शरण में आता है जो सच्चे हृदय से भक्ति करता है वह इन आपदाओं से सुरक्षित रहेगा। उसका कोई भी संकट उसे स्पर्श नहीं करेगा। यह समय वैसा ही है। चारों ओर भय है, पाप है, अधर्म है। मनुष्य अब ईश्वर को भूल चुका है। मंदिरों में घंटियां कम और राजनीति अधिक सुनाई देती है। पवित्रता का स्थान दिखावे ने ले लिया है। मनुष्य अब सत्य से भाग रहा है। श्री कृष्ण ने कहा था कि कलयुग के अंत में जो भी मेरी भक्ति करेगा, जो मेरे नाम का सच्चे हृदय से जाप
10:49 करेगा, मैं स्वयं उसकी रक्षा करूंगा। अब जो संकेत मिलने लगे हैं वे छुपे नहीं रह सकते। मंदिरों में शिवलिंग से रक्त स्राव, मूर्तियों का रोना, तारा समूह का गायब होना, नदियों का मार्ग बदलना, देवताओं की मूर्तियों का विलीन हो जाना। यह सब वही घटनाएं हैं जो प्राणों और गीता में वर्णित हैं। लोग चाहे तो इन्हें संयोग माने। लेकिन ज्ञानी इसे समय का संकेत समझते हैं। श्री कृष्ण ने गीता में कहा था कि जो मनुष्य केवल सुख, दुख, हानि, लाभ और जन्म मरण में उलझा रहता है, वह कभी मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सकता। अब समय वही है जब सारे मायाजाल को छोड़कर ईश्वर की शरण में
11:34 जाने का है। क्योंकि आने वाला समय मनुष्य की बुद्धि, विज्ञान और प्रयास को व्यर्थ सिद्ध कर देगा। 2026 का अंत और 2027 का प्रारंभ वह घड़ी है जब अधर्म का राज्य डगमगाएगा। प्रकृति अपना रौद्र रूप दिखाएगी और धर्म का पुनर्जन्म होगा। श्री कृष्ण ने कहा था कि युगों का परिवर्तन समय के अनुसार निश्चित है। सतयुग आएगा। अधर्म का अंत होगा लेकिन उससे पहले संहार अवश्य होगा। प्रकृति अपना संतुलन स्वयं करती है। पापी और अधर्मी को अपने कर्मों का फल मिलता है। 2026 उसी फल देने वाले समय का द्वार है और जो मनुष्य
12:19 सजग रहेगा सच्चे हृदय से श्री कृष्ण का नाम जपेगा वही सुरक्षित रहेगा। अब वक्त है अपने भीतर झांकने का। अपने पाप, अपनी वासनाओं, अपने मोह को पहचानने का। क्योंकि श्री कृष्ण ने कहा था मनुष्य स्वयं ही अपने जीवन का शत्रु है और स्वयं ही मित्र जो अपने अंतःकरण को वश में कर लेता है वही सारे संकटों में सुरक्षित रहता है।