बढ़ती निराशा, घटता संघर्ष : समाधान क्या है? || आचार्य प्रशांत (2025)

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संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो लक्ष्यों को निर्धारित करने और उनसे निराश न होने के बारे में है। इसमें बताया गया है कि कैसे बड़े लक्ष्य निर्धारित करने से जीवन में अधिक आनंद और उद्देश्य मिल सकता है, जबकि छोटे लक्ष्य अक्सर असंतोष और निराशा की ओर ले जाते हैं। वीडियो में अर्जुन और कृष्ण की कहानी का उदाहरण दिया गया है, जिसमें अर्जुन को गीता का ज्ञान तभी प्राप्त हुआ जब उसने एक बड़े युद्ध में उतरने का फैसला किया।

मुख्य बातें:

  • बड़े लक्ष्य निर्धारित करें जो दुनिया के लिए सार्थक हों।
  • अपनी क्षमताओं को कम न आंकें।
  • सही काम करें, भले ही वह मुश्किल हो।
  • खुशी के पीछे न भागें, सार्थकता की तलाश करें।

लक्ष्य और अपेक्षाएं

जब लक्ष्य बड़े होते हैं, तो अपेक्षाएं भी बढ़ जाती हैं। यदि हम उन अपेक्षाओं के अनुसार काम नहीं कर पाते हैं, तो निराशा होना स्वाभाविक है। छोटी जिंदगी जीने और छोटे लक्ष्यों को अपना उद्देश्य बनाने से कभी सुख नहीं मिलेगा। लक्ष्य हमेशा आसमान जैसा बड़ा होना चाहिए।

सच्चे काम की पहचान

सच्चे काम की पहचान यह है कि वह हमारे भीतर उस ताकत को जगाता है जिसके बारे में हमें पता भी नहीं होता। जब कोई काम दुनिया के लिए जरूरी होता है और हमारे लिए भी, तो उसमें उम्मीदों और समय सीमा की कोई बात नहीं होती। हम उस काम को पूरी लगन से करते हैं।

ऊंचे संघर्षों में उतरना

ऊंची चीजों को पाने के लिए यह स्वीकार करना जरूरी है कि हमें ऊंचे संघर्षों में उतरना होगा। अर्जुन को गीता का ज्ञान तभी मिला जब उसने महाभारत के युद्ध में उतरने का फैसला किया। यदि हम जीवन में बड़ी चुनौतियों का सामना नहीं करते हैं, तो हमारी काबिलियत भी छोटी ही रह जाएगी।

अपनी क्षमताओं को पहचानना

हमारे भीतर बहुत ताकत है, लेकिन वह तभी सक्रिय होगी जब हम जिंदगी में बड़ी चुनौती आने देंगे। हमें यह नहीं देखना चाहिए कि हमारी काबिलियत क्या है या हम खुद से कितनी उम्मीद रख सकते हैं। हमें बस वह करना चाहिए जो सही है, भले ही वह मुश्किल हो।

असली सुख

असली सुख असली चीजों में ही मिलता है, असली जिंदगी जी के ही मिलता है। छोटी-छोटी बातों से असली सुख नहीं मिलता। उपनिषद कहते हैं कि छोटी जिंदगी जी करके छोटे विषयों को अपना उद्देश्य बना करके छोटे-छोटे लक्ष्य रख के तुम्हें कभी सुख नहीं मिलेगा। अपने आप को अनंत को समर्पित करो, लक्ष्य अपना आसमान जैसा बनाओ, तब आनंद में जीते हो।

सार्थकता का महत्व

दुनिया में सबसे बेकार खोज खुशी की खोज है। जो सीधे-सीधे कहता है कि मुझे खुशी चाहिए, उसे सिर्फ दुख मिलेगा। जो कहता है मुझे खुशी नहीं चाहिए, मुझे सार्थकता चाहिए, उसे चुपचाप आनंद मिल जाता है। सार्थकता मांगिए, आनंद अपने आप मिल जाएगा।

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Transcript

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0:00 जब गोल्स अपने बड़े होते हैं तो उतनी अपनी एक्सपेक्टेशन होती [संगीत] है। तो एक्सपेक्टेशन जैसी है अगर उस हिसाब से अपन अब वो चीज अचीव नहीं कर पा रहे तो उससे अपन फ्रस्ट्रेटेड या फिर डिसहार्टेंड कैसे नहीं हो? छोटी जिंदगी जी करके छोटे विषयों को अपना उद्देश्य बना करके छोटे-छोटे लक्ष्य रख के तुम्हें कभी सुख नहीं मिलेगा। लक्ष्य अपना आसमान जैसा बनाओ। आपका कोई बहुत प्यारा दोस्त है। वो अस्पताल में भर्ती है। तो डॉक्टर ने कहा फलानी चीज है। जल्दी से ले आओ। जल्दी से जल्दी ऑपरेशन करना है। तो उसमें आप एक्सपेक्टेशन थोड़ी रखेंगे कि मैं जाऊंगा आऊंगा तो कम से कम जो एवरेज स्पीड है वो 80 की निकलनी चाहिए टीकेएमपीएच। यह एक्सपेक्टेशन थोड़ी रखोगे। आप तो वास्तव में डैशबोर्ड को स्पीडोमीटर को देखोगे भी नहीं। [संगीत] जितना आपके बस में होगा आप उतनी तेजी से गाड़ी भगाओगे और उतनी तेजी

0:46 से वापस लाओगे। असली काम की पहचान ही यही है कि वो तुम्हारे भीतर वो ताकत खड़ी कर देता है जितनी तुम्हें पता ही नहीं थी। उसके बाद काम जिंदगी बन जाता है। वो बल तुम्हें दिखाई नहीं देगा जब तक तुम उसका आह्वान नहीं करोगे। इनवोकेशन नमस्कार आचार्य जी। जैसे आपने अभी बोला कि गोल्स अपने आसमान को इतना अपन को करना चाहिए। तो जब गोल्स अपने बड़े होते हैं तो उतनी अपनी एक्सपेक्टेशन होती हैं। तो एक्सपेक्टेशन जैसे ही है अगर उस हिसाब से अपन अब वो चीज अचीव नहीं कर पा रहे या फिर उसके लिए अपन डेली उतनी मेहनत नहीं कर पा रहे उस फुल एफिशिएंसी से तो उससे अपन फ्रस्ट्रेटेड या फिर डिसहार्टेंट कैसे नहीं हो और अगर हमें इतना एक्सपेक्ट नहीं

1:33 करना चाहिए तो उस लिमिट में कैसे एक्सपेक्ट करें बेटा एक्सपेक्टेशन तो अपने हाथ का खिलौना होती है। तुम तय कर सकते हो मुझे इतना करना है। मुझे इतना नहीं करना है। यह बात एक्सपेक्टेशन की नहीं होती है। और बात यूं ही कोई ऊंचा गोल बना लेने की नहीं होती है। वह जो गोल है ना वह दो तरह की समझदारी से निकलना चाहिए। टू काइंड्स ऑफ अवेयरनेस। पहला मैं कौन हूं? मैं फंसा कहां पर हुआ हूं? और दूसरा यह काम तो मैं जो भी करूंगा दुनिया में ही करूंगा ना। तो दुनिया की आज की हालत क्या है? और दुनिया की जरूरत क्या

2:19 है? और जब इन दोनों बातों को एक साथ देखते हुए आप एक काम में उतरते हो तो उसके बाद बात एक्सपेक्टेशन की नहीं इमर्शन की हो जाती है। क्योंकि मैं काम में यूं ही नहीं उतरा हूं। मैं जानता हूं कि कुछ जरूरी है इसलिए कर रहा हूं। मैं जानता हूं मैं जो काम कर रहा हूं वह आज दुनिया के लिए बहुत जरूरी है और मैं जानता हूं मैं जो काम कर रहा हूं वह मैं ना करूं तो मैं भी नहीं जी पाऊंगा। मैं इसलिए उसमें उतरा हूं। अब इसमें उम्मीद की या डेडलाइन की या रोज कितना काम करना इसकी कोई बात नहीं होती है। आपका कोई बहुत प्यारा दोस्त है। वह अस्पताल में भर्ती है। डॉक्टर ने कहा फलानी चीज है। जल्दी से

3:04 ले आओ। जल्दी से जल्दी ऑपरेशन करना है तो उसमें आप एक्सपेक्टेशन थोड़ी रखेंगे कि मैं जाऊंगा आऊंगा तो कम से कम जो एवरेज स्पीड है वो 80 की निकलनी चाहिए 80 केएमपीएच ये एक्सपेक्टेशन थोड़ी रखोगे आप तो वास्तव में डैशबोर्ड को स्पीडोमीटर को देखोगे भी नहीं जितना आपके बस में होगा आप उतनी तेजी से गाड़ी भगाओगे और उतनी तेजी से वापस लाओगे बल्कि कोई पूछेगा कि एवरेज स्पीड कितनी रखी तो आपको पता भी भी नहीं होगा। जब सही फैसले लिए जाते हैं तो उसमें काम एक्सपेक्टेशन का मुंह देख के नहीं किया जाता। ना अपनी एक्सपेक्टेशन ना दूसरों की। फिर काम उतना हो जाता है जितने कि तुम कभी

3:51 एक्सपेक्टेशन कर भी नहीं सकते थे। असली काम की पहचान ही यही है कि वह तुम्हारे भीतर वह ताकत खड़ी कर देता है जितनी तुम्हें पता ही नहीं थी। छोटा काम करोगे ना तो उसके लिए ताकत भी छोटी ही चाहिए और छोटे काम करते-करते स्वयं से भी हमारी अपेक्षा उम्मीद एक्सपेक्टेशन क्या हो जाती है कि मैं तो इतना ही कर सकता हूं तो एक्सपेक्टेशन रख के बड़ा काम नहीं किया जाता बड़ा काम बस किया जाता है और फिर तुम क्या देखते हो कि बाप रे बाप मैं इतना कर गया इतना तो मैं कभी कर भी नहीं सकता था यह मैंने इतना किया है तुम खुद हैरान रह जाओगे कि मुझसे इतना कैसे हो गया| अगर मैं अपने लिए कोई लक्ष्य टारगेट गोल्ड डेडलाइन बनाता मैं तो भी इतना ना कर पाता।

4:40 जितना मैं सोचता हूं कि करने के काबिल हूं मैंने उससे कहीं ज्यादा कर दिया। वो हो गया। वो हो गया क्योंकि जरूरी था। काम वो करो जो तुम्हारी समझ से निकला हो। काम वो करो जो दुनिया के लिए जरूरी हो। उसके बाद घंटे गिन के काम नहीं करोगे। उसके बाद अपनी थकान देखकर काम नहीं करोगे। उसके बाद काम जिंदगी बन जाता है। और ऊंची चीज तुम्हें मिले उसके लिए जरूरी है पहले कि तुम यह स्वीकार तो करो कि ऊंचे संघर्षों में उतरना है। अर्जुन इतने दिनों से थे श्री कृष्ण के पास। कृष्ण उनके दोस्त की तरह रहते थे। संबंधी

5:26 भी हैं और सखा भी हैं। रहते थे। कृष्ण मिले हुए थे अर्जुन को। तो गीता नहीं मिली अर्जुन को। गीता तभी मिली जब अर्जुन ने सबसे भयानक युद्ध में उतरना स्वीकार किया। तब मिलती है गीता। जो बात अर्जुन को पता चली वो कभी नहीं पता चलती अगर अर्जुन युद्ध से भाग गए होते। अर्जुन ने अपना ही जो प्रचंड रूप देखा अर्जुन की अपनी उम्मीदों एक्सपेक्टेशन से आगे का अर्जुन ने जो अपना योद्धा रूप देखा वो अर्जुन खुद भी कभी नहीं देख पाते गीता को अर्जुन कभी नहीं पाते अगर अर्जुन ने महाभारत का युद्ध स्वीकार नहीं किया होता और अर्जुन भागने को तैयार हो रहे थे तो पहले जीवन में बड़े संघर्षों को आने तो दो

6:14 छोटी मोटी सुरक्षित जिंदगी जिओगे तो तुम्हें लगेगा कि तुम्हारी काबिलियत भी छोटी मोटी ही है। तुम्हारी बहुत बहुत बड़ी काबिलियत है। पर वो काबिलियत सक्रिय नहीं होगी। एक्टिवेट नहीं होगी अगर तुम जिंदगी में बड़ी चुनौती आने ही नहीं दोगे। अब तय कर रखा है जिंदगी में कि मच्छर ही मारने हैं। और बहुत लोग जिंदगी में सिर्फ मच्छर ही मारते हैं। और भीतर तुम्हारे एक टैंक बैठा हुआ है। तो उस टैंक का तुम्हें कभी पता लगेगा भी? क्योंकि मच्छर मारने के लिए टैंक की तो जरूरत होती नहीं ना। तो टैंक तुम्हारे भीतर पड़ा रह जाएगा जंग खाता हुआ और तुम कभी जान नहीं पाओगे कि कितनी ताकत तुम्हारे भीतर थी। क्योंकि तुमने चुना ही

6:59 है कि जिंदगी में मच्छर मारने हैं। बड़ा संघर्ष चुनो तो तुम्हें भी अचंभा हो जाएगा। मेरे पास टैंक भी है। हां, टैंक है तुम्हारे पास। पर वो तुमको उपलब्ध तभी होगा जब तुम पहले उतना बड़ा दुश्मन अपने सामने पाओगे। और हमारा यह है कि बड़ा दुश्मन हो तो हम लौट जाते हैं। चाटुकारिता करने लग जाते हैं। चरण वंदना करते हैं। कहते हैं इतना इनके पास बल है। इनसे पंगे थोड़े ही लेंगे। किसी के पास कितना भी बल हो तुम्हारे पास उससे ज्यादा बल है। पर वो बल तुम्हें दिखाई नहीं देगा। [प्रशंसा] वो बल तुम्हें दिखाई नहीं देगा जब तक तुम

7:45 उसका आह्वान नहीं करोगे। इनवोकेशन और वो इनवोकेशन सिर्फ एक तरीके से होता है। यह मत देखो कि मेरी काबिलियत क्या है? यह मत देखो कि मैं खुद से कितनी उम्मीद रख सकता हूं। कितनी एक्सपेक्टेशन कहो सही है तो करना पड़ेगा। सही है तो करना पड़ेगा। अब सर फूटे, माथा फूटे, तकलीफें आए, जूझना पड़े, दुनिया रूठे, सही है तो करना पड़ेगा। और जब करना शुरू करते हो तो पता चलता है अरे यह तो होने भी लग गया। मैं यह कर सकता था। मुझे तो पता भी नहीं था। वो करके ही पता चला कि कर सकता हूं। आप जवान लोग हैं। आपको पूरी जिंदगी जीनी है। अपने आप से पूछिए व्हाट टू वैल्यू। व्हाट इज रियलीेंट?

8:35 इनके सस्ते जवाब स्वीकार मत करो। किसी और की बात को उधारी स्वीकार मत करो। उधार की ही वरना जिंदगी रह जाएगी। खुद पूछो अपने आप से। मैं इस काम में क्यों उतरूं? मैं फलानी बात को मैं क्यों महत्व दूं? कुछ चल रही है। रस्म, रवायत, प्रथा, परंपरा। मैं जानना चाहता हूं कि मैं उसका पालन क्यों करूं? यह सवाल जरूरी है। हम कितनी नकली जिंदगी जी रहे हैं। यह सबसे ज्यादा पता है कब चलता है? हमारे

9:21 सेलिबेशंस में, हमारे उत्सवों में। ऊपर ऊपर से सब ऐसे दिखा रहे होते हैं जैसे खुश हैं, सुखी हैं। और सेलिब्रेशन से ज्यादा कहीं नहीं पता चलता कि हम कितने ज्यादा बेचैन हैं, खोखले हैं, दुखी हैं। कहीं पर पार्टी जैसा कुछ हो रहा हो, वहां चले जाना और समझ जाओगे कि यह सुख चीज क्या होती है। हुआ था मेरे साथ एक बार आपकी उम्र उसका था उससे भी जरा सा पहले की ही बात है तो भाई

10:06 सच्चिदानंद घन हम कहते हैं भीतरी बात असली बात आनंद को हम कहते हैं स्वभाव है आनंद सबको चाहिए मैं भी पार्टीज में जाता था और गया दो बार चार बार और फिर जाना बंद कर दिया। साथ वालों ने कहा कि क्या बात है? तुझे नहीं आना। डोंट यू लव फन? बिल्कुल यही शब्द थे चार। एग्जैक्टली आज भी याद है। डोंट यू लव टू हैव फन? डोंट यू वांट टू हैव फन? तो मैंने जवाब दिया था, आई डिडट फाइंड एनीबडी देयर हैविंग फन। एंड हेंस आई विल नॉट कम। हां, हां। मुझे भी तब जॉय वाला शब्द नहीं था। तब फन की बात हुई थी। बिल्कुल साफ याद है। फन तब उन्होंने कहा था फन। आओ वी विल

10:52 हैव फन। गुड फन। मैंने कहा आई आल्सो वांट टू हैव गुड फन। बट वेयर इज द फन? मैं अपने आप से झूठ नहीं बोल सकता। वहां लोग बहुत सारे थे और बहुत कुछ हो रहा था और बहुत शोर था और म्यूजिक था और डांस था और ये वो खाना पीना हर तरह की चीज चल रही थी। बट टू टेल यू द ट्रुथ। आई डिडन्ट फाइंड एनीबडी रियली हैविंग फन। मुझे वो सब के सब मिज़रेबल लगे। उदास और भीतर से हताश और उन्होंने ऊपर ऊपर खुशी पोत रखी थी। ऐसे हे हां जी हां जी आइए जी आइए जी गुड मॉर्निंग जी आज तो बहुत अच्छा दिन है जी कम ऑन

11:40 क्या ऐसा ही नहीं है बोलो क्या ऐसा ही नहीं है तो जिंदगी इसलिए थोड़ी है कि ये जो खोखला सुख है इसके पीछे जाते रहो सुख बुरा नहीं है पर फिर असली सुख चाहिए और वो को असली सुख असली चीजों में ही मिलता है। असली जिंदगी जी के ही मिलता है। ये छोटी-छोटी बातों से असली सुख नहीं मिल जाता। उपनिषद कहते हैं ना अल्पे सुखम। अल्प माने छोटा। छोटी जिंदगी जी करके छोटे विषयों को अपना उद्देश्य बना करके छोटे-छोटे लक्ष्य रख के तुम्हें कभी सुख नहीं मिलेगा।

12:26 भूमा तत सुखम भूमा माने बड़ा विशाल अनंत अपने आप को अनंत को समर्पित करो लक्ष्य अपना आसमान जैसा बनाओ तब आनंद में जीते हो आसमान जिंदगी के आखिरी पल तक नहीं मिलना पर जिंदगी मौज में बीतेगी जिंदगी मौज में बीतेगी क्योंकि लक्ष्य ऐसा बनाया कि उसके लिए आराम से जिए फिर मरे और छोटी सी चीज उसको लक्ष्य बनाया उसको पा भी लिया तो भी वैसे ही मिज़रेबल रहोगे जैसे हमेशा से थे मिज़रेबल समझते हो ना क्या दुखी संतप्त

13:11 पा लिया लोग आ रहे हैं बधाइयां दे रहे हैं। अरे वाह बंटू का तो बड़ा पैकेट लग गया है। और बंटू कह रहा है क्या बताएं। बंटू कह रहा है यह पैकेज वगैरह से ज्यादा मजा तो मुझे Instagram में आता है। वो पैकेज वाली जॉब में जाकर भी वहां बाथरूम में छुप-छुप के रील्स ही देख रहा होगा। आपको पता है ना यह बहुत बड़ी-बड़ी कंपनियां हैं। जिन्होंने अब यह करा है कि लेबेटरीज में माने शौचालयों में वो ब्लॉकर्स लगाते हैं। कौन से ब्लॉकर्स? कि वहां पर नेट नहीं चल सकता। और यह मैं बिल्कुल कई फॉर्च्यून 500

13:57 कंपनीज हैं। उनकी बात कर रहा हूं। बोर में भी ऐसा खूब हो रहा है। अब वो इतना पैसा दे रहे हैं। और वो कहते इतनी बड़ी-बड़ी बातें ये वो ऐसा वैसा टॉप की जॉब बढ़िया लड़की मिलेगी। दहेज अच्छा मिलेगा। इधर-उधर प्रेस्टीज 50 बातें पर वो जो वो जो लड़का ही नहीं 35 35 साल के मैनेजर हैं वो भाक के जा रहे हैं वहां पर बंद कर रहे हैं अंदर कमोड के ऊपर बैठ जाते हैं और वहां क्या कर रहे हैं स्क्रॉलिंग कर रहे हैं और करते ही जा रहे हैं। करते ही जा रहे हैं। हारकर यह करना पड़ा कि यहां पर जो है आपका वाई-फाई चलेगा ही नहीं। नेट ब्लॉक करो। यह होता है जब आप छोटी चीज को लक्ष्य बनाते हो। वह मिल भी जाती है। तो भी भीतर छटपटाहट बनी रहती है और आप फिर

14:45 टुच्चे कामों पर अपनी भड़ास निकालते हो। यह सारा जो होता है वर्क प्लेस में क्या बोलते हैं? एब्सेंटिज्म एंप्लई डिसटिस्फेक्शन, डीमोटिवेशन यह सब क्यों होता है? इसीलिए होता है क्योंकि तुम जिस नौकरी में हो सबसे पहले तुम्हें करनी ही नहीं चाहिए थी। तुम गलत काम में हो। तो सही काम क्या है? वह तुमने कभी अपने आप से ना पूछा ना तलाशा। तुम तो पत्ते की तरह थे। समाज की और संयोग की हवा तुमको जहां ले आई तुम वहां आकर पड़ गए। संयोग से इस नौकरी में हो। अब यह अर्थ नहीं रखता कुछ काम तुम्हारे लिए। तो जिओगे कैसे इसके लिए? तो घड़ी ताकते रहते हो। कब समय हो जाए घर

15:31 भागे। और कब 30 तारीख आए तो सैलरी मिले। किसी ने कहा है दुनिया में सबसे अगर बेकार कोई खोज है द मोस्ट फ्यूटाइल ऑफ ऑल पर्स्यूट्स वो है द पर्स्यूट ऑफ हैप्पीनेस जब कोई सीधे-सीधे कहता है कि मुझे खुशी चाहिए तो उसे सिर्फ दुख मिलेगा जो कहता है मुझे खुशी नहीं चाहिए मुझे सार्थकता चाहिए उसे चुपचाप आनंद मिल जाता है जो खुशी के लिए इधर-उधर हाथ पांव फेंकता है उसे खुशी तो क्या ही मिलती है दुख मिलता है और जो कहता है खुशी हटाओ खुशी वगैरह की हम परवाह नहीं करते मुझे

16:18 सार्थकता चाहिए पपस चाहिए सही जिंदगी चाहिए उसने मांगी थी सार्थकता उसे सार्थकता के साथ में आनंद मुफ्त मिल जाता है सार्थकता मांगिए आनंद अपने आप मिल जाएगा [प्रशंसा] हम [संगीत]

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