Bhagvati Sutra Vachana -212 I Shatak 9, Uddeshak 32 I Jul 4, 2026

संक्षिप्त सारांश

विषय जैन धर्म के सिद्धांतो और जीवों के जन्म-मरण पर आधारित है। इस वीडियो में जैन धर्म के अनुसार नरक गति, देव गति, और मनुष्य गति के बारे में चर्चा की गई है। मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • नरक में जाने वाले जीवों की संख्या देवताओं की तुलना में कहीं अधिक है।
  • जीवों के कर्म और उनकी प्रवृत्तियाँ उनके अगली गति को निर्धारित करती हैं।
  • मनुष्य गति में आने वाले जीव बहुत कम होते हैं, जबकि तिर्यंच गति में जीवों की संख्या असंख्य होती है।

अभ्यंतर की चर्चा

वीडियो की शुरुआत में अभ्यंतर के सिद्धांतो और शिक्षाओं पर बात की गई है। यह स्पष्ट किया गया है कि जन्म और मृत्यु की प्रक्रिया में जीवों की संख्या और गति की स्थिति कैसे निर्धारित होती है। विशेष रूप से जैन धर्म में इसके कारणों का विवेचन किया गया है।

विशेष सत्र की घोषणा

डॉक्टर अरुणविजय ने एक विशेष सत्र की घोषणा की है जिसमें नेमिनाथ भगवान की नौ भव और राजुल माता का चित्रण किया जाएगा। यह सत्र 5 जुलाई 2026 को आयोजित किया जाएगा और इसमें सभी जैन अनुयायियों को आमंत्रित किया गया है।

पहली क्लास का सारांश

पहली क्लास में भगवती सूत्र के नौवें शतक के 32वें उद्देश्य का सारांश प्रस्तुत किया गया। जीवों के जन्म-मरण की निरंतरता और उसकी प्रक्रियाओं को पार्श्व और महावीर स्वामी के संवाद के माध्यम से समझाया गया। जीवों की गति और उनके जन्म-मरण के स्थितियों पर चर्चा की गई है।

नरक गति का विवेचन

नरक गति में कितने जीव रहते हैं और वह कैसे निर्धारित किया जाता है, यह विस्तार से बताया गया। जीवों की संख्या और विभिन्न नरक के प्रकारों पर चर्चा की गई और यह स्पष्ट किया गया कि अधिकतर जीव पहली नरक में जाते हैं।

पुण्य और पाप का प्रभाव

संसार में पाप और पुण्य का महत्व बताया गया। पाप का प्रमाण अधिक होता है, जिसके कारण जीवों की संख्या नरक की ओर अधिक होती है। इस संदर्भ में पाप करने वालों की तादाद और उनके कर्मों का प्रभावित करना विस्तार से समझाया गया है।

जन्म लेने की प्रक्रिया

वीडियो में बताया गया कि मनुष्य गति में जीवों का जन्म कैसे होता है। गर्भज मनुष्यों की संख्या सीमित है जबकि समुच्चिम मनुष्यों की अधिकता होती है। इस तरह जीवों के जन्म का विश्लेषण किया गया है कि किस प्रकार से ये प्रक्रिया काम करती है।

तिर्यंच गति का विवेचन

तिर्यंच गति की स्थिति और उसमें जीवों की संख्याओं का विवेचन किया गया। वीडियो में यह स्पष्ट किया गया कि तिर्यंच गति में पंचेंद्रिय जीवों की संख्या अधिक नहीं होती, जबकि अन्य प्रकार के जीवों की संख्या अधिक होती है।

समापन और निष्कर्ष

वीडियो का समापन जैन धर्म के सिद्धांतों और जीवन की प्रक्रियाओं के द्वारा किया गया है। यह दर्शाया गया कि कैसे कर्म और संसर्ग का प्रभाव जीवों की गति को निर्धारित करता है।

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Transcript

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0:00 अब अभियंतर रायम खामे इच्छम खामे रायम जंची अपत्यम परिपत्यम भत्ते पाण विनय भयाव आलावे सनावे उचासने समास अंतर भाषाए उरी भाषाए ज विनय परहण सुम बाहर वा जान न जानाम तसच्छाम दुम तो सात इच्छामी खमासो वंदे जा वंदाम इच्छा संस भगवान संस

0:46 इच्छा इच्छामिमा वंदे जा वंदाम इच्छा संस भगवान देशो इच्छाम इच्छामिसो वंदे जा वंदाम इच्छी भग पसाय करीना प्रसाद कराो जी नमो अरतां नमो सिं नमो नमो सबसा नमोकारो सब पाप मंगलम चिन

1:33 पम जय जगजी जोो जग गुरु जगंद जगना जग बंधु जय जग प्रिया जय सुया भव पश्चिमो जय जय गुण लोग जय महा सर्व प्रणाय सर्वदा सर्व निधानाय

2:19 श्री गौतम स्वामीने सुधानी स्वामी अज्ञानम ज्ञान शलायम नेत्रम तस्मै श्री गुरुवे नम धर्म भागशालियों ऐसा बहन जी पहले अनाउंसमेंट कर दो बाद में सब हां जी सर जी ये कल जो हमारा ये कल कल का कल के लिए साहब जी अनाउंसमेंट हां जी साहब जी हां

3:05 प्रणाम सभी को सो एस अगेन आई एम जस्ट शेयरिंग के कल हमारा एक स्पेशल सेशन हम लोग रख रहे हैं जिसमें हम कल प्रभु नेमिनाथ भगवान का जो नौ भव माता राजुल और नेमिनाथ प्रभु के जो नौ भव है उसका हम पूरा पिक्टोरियल वीडियो के साथ म्यूजिक [गला साफ़ करने की आवाज़] के साथ एक ट्राई किया है हमने आप सभी तक पहुंचाने के लिए तो कल हमारा ये स्पेशल सेशन रहेगा नेम और राजुल के सम्यक से सिद्धि प्राप्त सिद्धत्व प्राप्ति तक की भाव यात्रा और उसके साथ हम गिरनार की भाव यात्रा भी करेंगे। अ कल हमारा जो तो आप सभी को समस्त

3:53 जो जैन हमारे सभी उनको सबको सपरिवार आमंत्रण है। आप सबको बताइएगा कि ये बहुत दुर्लभ अद्भुत है और बहुत मेहनत करके बनाया है। आप सभी के तक पहुंचाने के लिए म्यूजिक वगैरह से से जोड़कर और यह जो सेशन रहेगा कल टुमारो इट विल बी ऑन फिफ्थ जुलाई 2026 के दिन संडे को रात को 7 पीm इवनिंग में रहेगा। हमारा जो YouTube चैनल है उस पर भी लाइव रहेगा और जो ये zूम का डिटेल्स जो है वो हमारा सेम ही रहेगा। सो आप सभी उसमें जरूर जुड़िएगा। कल 7 ओ क्लॉक इंडिया

4:41 टाइम एंड जो यूएस का ईस्टर्न स्टैंडर्ड टाइम रहेगा वो 9:30 am है। सो आप सभी प्लीज जुड़िएगा। थैंक यू एंड मथन वंदामि साहिब जी अगेन और प्रणाम सभी को। आज फोर्थ ऑफ जुलाई 2026 के दिन अभी हमारी जो तीसरी क्लास है वो भगवती सूत्र आगम वाचना की है। आज हमारी 213 वी क्लास है और मैं विभाजन से विनती करूंगी कि वो हमें जो लास्ट क्लास की समरी है वो दे थैंक यू धन्यवाद वंदा साहिब जी और जी प्रणाम सभी को

5:30 लास्ट क्लास में भगवती सूत्र के नौवे शतक के 32 वे उद्देश्य में गंगे मुनि जो पार्व भगवान की परंपरा के थे उनके और महावीर स्वामी के बीच हुए सवाल जवाब के माध्यम से जीवों के जन्म मरण की निरंतरता और अंतराल के बारे में साहिब जी ने हमें समझाया था। संसार के नरक गमन करने वाले जीवों की संख्या अनंत है। लेकिन गतियां केवल चार ही है। संसार का अटल नियम है कि जन्म मरण अनिवार्य है। संसार में रहेंगे जो जीव संसार में है उनका जन्म मरण अनिवार्य रूप से होगा। महाराज साहिब जी ने स्पष्ट समझाया था कि नरक गति में केवल संग पंचेंद्रिय मनुष्य और तीरज पशु पक्षी ही जा सकते हैं।

6:15 कोई भी देवी देवता युगलिक मनुष्य एकेंद्रिय से लेकर असंग्नी पंचेंद्रिय तक का कोई भी जीव नरक में नहीं जाएगा। यह एक शाश्वत त्रिकाल व्यवस्था है। जैन धर्म में कोई भी व्यवस्था अंधाधुंध से या ईश्वर की मर्जी से नहीं चलती बल्कि यह कारण कार्य कारण भाव और कर्मों के हिसाब से है। साहिब जी ने आधुनिक युग का उदाहरण देते हुए कहा था कि यदि 99% जनसंख्या मांसाहारी है तो यह पंचेंद्रिय जीवों की हिंसा के कारण प्रतिदिन निरंतर नरक की ओर गमन कर रहे हैं। निरंतर का मतलब है बिना किसी समय के अंतराल के प्रति समय जीवों का गमन और सांतर का मतलब है जहां कुछ समय का अंतराल पड़ जाए। मनुष्य सीमित है लेकिन त्रियंच

7:01 पंचेंद्रिय असंख्य है। इसीलिए नरक के जीवों की संख्या हमेशा असंख्य ही रहती है। यह अनंत काल से कभी कम नहीं हुई और अनंत भविष्य काल में कभी कम नहीं होगी। एकेंद्रिय जीवों का मृत्यु के बाद गमन निरंतर चलता रहता है क्योंकि इनकी संख्या अनंत है और इनमें मृत्यु का अंतराल भी नहीं पड़ता है। बे्द्र से पंचेंद्रिय में सांतता संभव है क्योंकि इनकी संख्या एकेंद्रिय की तुलना में कम होती है। देवगति के देवताओं के जन्म को उपपात और मरण को चवन अर्थात अथवा उर्ध्वर्तन कहते हैं। जिनका आयुष कम होता है उनका उधवर्तन दर अधिक होता है। निगोद के जीवों का आयुष 256 आवली का मात्र होने से बार-बार जन्म

7:48 मरण होता रहता है। साहिब जी ने हमें बताया था कि नरक के दुखों से भी बड़ा दुख जीवो का जन्म मरण की प्रक्रिया से होता है। जब तक जीव संसार में है वह बिना शरीर धारण किए या बिना छोड़े रह नहीं सकता है। और साहिब जी विनती करते हैं कि आगे आप हमें समझाएं। बहुत-बत धन्यवाद। देखिए भगवती सूत्र आगम शास्त्र के अंदर अभी मुख्य रूप से जो है नौवे शतक का ये उपदेश चल रहा है। आप अपनी आंखों के सामने पूरा लोक लीजिए और पूरे लोक के अंदर जीवो को देखिए। अब जीवों

8:36 का चारों गतियों में विभाजन किया है और पांच इंद्रियों में विभाजन किया है। अब इनके अंदर प्रवेशक शब्द यहां प्रयोग किया है। किस गति में कौन से जीव किस जाति में कितने जीव कम ज्यादा कौन कितने ज्यादा आते जाते रहते हैं। किसकी संख्या कितनी है? निरंतरता कितनी है? प्रमाण कितना है? यह हमें पूरा संसार का चित्र एक आंखों के सामने आ जाएगा। जैसे कि संसार भावना आपने देखी है और 12 भावनाओं के अंदर लोक दुर्लभ भावना भी है। तो लोक साख्यात भावना के अंदर भी

9:22 आप देखेंगे तो पता चलेगा। तो यहां पर भी विषय यही उठाया है। पारश्वनाथ भगवान की पाठ परंपरा के एक संतानीय शिष्य जिनका नाम गांगेय मुनि है। वो भगवान महावीर के पास आए। उन्होंने आकर के महावीर प्रभु को अपनी तरफ से कुछ प्रश्न पूछे। उन प्रश्नों के अंदर जैसे कि अभी आपने सुना नरक गति में असंख्य नारकी जीव रहते हैं। देव गति में असंख्य नारकी जीव रहते हैं। लेकिन अब इनके अंदर कम ज्यादा का प्रमाण कहां है? किसका प्रमाण कितना कम

10:07 है? किसका प्रमाण कितना ज्यादा है? और प्रवेश का मतलब यह हुआ कौन कितने ज्यादा आकर के उस गति में जन्म ले अब देख लो पहली नरक दूसरी नरक तीसरी नरक चौथी नरक पांचवी नरक छठी नरक सातवी ध्यान दीजिए नियति की निश्चित नियति की शाश्वत व्यवस्था ऐसी है कि सात ही नरक आठ आठवीं नरक अनंत भूतकाल में भी थी नहीं और भविष्य में होगी। सात से कम नहीं होगी। छह नहीं होगी। सात से बढ़कर आठ नहीं होगी। यह बात ध्यान में

10:53 ले। अब प्रश्न यहां गांगे मुनि क्या पूछ रहे हैं कि हे भगवन क्या पहली नरक में जीव ज्यादा रहेंगे? दूसरी नरक में उससे ज्यादा होंगे, तीसरी नरक में ज्यादा होंगे या कम होंगे? तो असंख्य की संख्या के अंदर किस तरह से कैसे महावीर कह रहे हैं हे गांगी सबसे ज्यादा नारकी जीव पहली नरक उससे कुछ कम दूसरी नरक में दूसरी नरक से और कम तीसरी नरक में तीसरी नरक से और कम चौथी नरक में चौथी नरक से और कम पांचवी नरक में पांचवी नरक से और कम छठी नरक में और सबसे

11:40 लास्ट में सातवी नरक में सबसे कम समारे क्या कारण लगता है इसका बोलो विजय भाई ख्याल आया बोलो निखिल भाई अब यहां पर इसके कारण के अंदर ये स्पष्टता की जा रही है कि यहां से जाने वाले जीव और जाने वालों की संख्या और उनमें भी सबसे कम ज्यादा पाप करने वाले कौन? कम ज्यादा पाप के अंदर

12:25 लेष्या की तीव्रता वाले जिन कौन से हैं? कि जिनके अंदर जो नरक में जाए कौन से नरक में जाए? अब आप जान गए कि नरक में जाने वाले तो असंख्य नाथ असंख्य जीव यहां से जाएंगे वो नरक में पहुंचेंगे पैदा होंगे वहां पर जन्म लेंगे लेकिन सबसे ज्यादा जीव पहले नरक सबसे कम जीव सातव नरक में अब इसका कारण स्पष्ट कर रहे हैं कि कम पाप करने वाले लोग ज्यादा होते हैं। मैक्सिमम ज्यादा भारी पाप करने वाले बहुत

13:10 कम होते हैं। और इतनी तीव्र लेष्या के साथ इतने भारी पाप करने वाले और ज्यादा कम होते हैं। सभी लोग इस लेवल का इतना भारी पाप कर भी नहीं पाते। सभी जीवों के लिए संभव नहीं है कि वो इतना भारी पाप इतना सातव नरक में जाने वालों की संख्या अब इतनी कम है क्योंकि इतने कम लोग इतने भारी पाप करते सभी के लिए संभव नहीं है। अब जैसे दृष्टांत ले लो मांसाहार करने वाले

13:58 लाखों करोड़ों लोग हैं लेकिन कत्ल खाने चलाने वाले बहुत कम है। अब मांसाहार करने वाले जीवों की संख्या बहुत बड़ी है होना नहीं लेकिन हर परिवार वाले के हर कुटुंब वाले वो अपनी तरह से कितना लाए कितना खाया कितना किया हो गया लेकिन एक कत्लखाना चलाने वाले वो जो है इतने प्रमाण में रोज पंचेंद्र जीवों की हिंसा करेंगे तब जाकर के उनका कत्लखाना चलेगा स्लॉटर हाउस में तो नहीं अब करोड़ों लोग खाने वाले हैं। लेकिन शायद हजारों की संख्या में ही कत्ल खाने चलाने

14:44 वाले होंगे। ऐसे खाने वाले अगर मान लो तीसरी चौथे नरक में जाए तो कत्ल खाने उत्पन्न बनाने और चलाने वाले सातवे नरक में जाए। ऐसा प्रमाण आ रहा है। अब आप देखिए परिग्रह रखने वाले भी नरक में जाए लेकिन वह पहले नरक में जाए। अब महारंभ परिग्रह करने वाले वो सातवी नरक तक भी जा सकते हैं। छठी नरक भी जा सकते। स्त्रियां जो है छठी नरक तक जाती है और पुरुष सातवी नरक तक जाते हैं। क्योंकि दोनों के अंदर लेष्या में फर्क पड़ जाता है। और पाप के प्रमाण में फर्क पड़ जाता

15:30 है। यह है परिस्थिति। हालांकि पहली नरक से दूसरी नरक कोई छोटी नहीं है। दूसरी नरक से कोई तीसरी नरक छोटी नहीं है। क्यों नहीं है? बोलिए रेखा जी ख्याल आ रहा है आपको? नहीं साह जी क्योंकि सातों नरक एक एक रज्जु प्रमाण एक एक लोक में छोटे बड़े का प्रश्न नहीं आ रहा है नरकावास कम ज्यादा जरूर है पहला अब नरकावास जिस हिसाब से कम ज्यादा होंगे उस हिसाब से जीव आएंगे उत्पन्न होंगे आपने देखा चार लाख नरक की योनिया है नरकी जीवों

16:18 को जन्म लेने की उत्पत्ति योनिया ज्यादा लेकिन उन सबका गणित अगर हम बैठा विचार करें कि पहले नरक में सबसे ज्यादा है फिर दूसरी नरक में कम है। तीसरे नरक में कम है। ऐसे कम ज्यादा कम ज्यादा होता जा रहा है। अब आप देख लीजिए महावीर स्वामी खुद अपनी तरह से 19 वे जन्म में सातवे नरक में गए। क्यों गए भाई साहब? तो 18 वे जन्म के अंदर जब उन्होंने इतने भारी पाप कर्म किए उसके परिणाम स्वरूप उनको 19 वे जन्म में सातवी नरक में जाना है। नंबर एक एक तरफ तो

17:05 सातवीं नरक नंबर दो वहां का आयुष इतना बड़ा 35 सागरों पर तक का आयुष बड़ा अब सोचिए एक जीव 35 सागरों पर तक सातवी नरक में रहे तो उसकी सजा कितनी बड़ी हो गई उसका दुख जो है कितने प्रमाण कितने गुना बड़ा हो गया सो ये क्यों पाया इतने प्रमाण में इतने ज्यादा प्रमाण में उसने इतना भारी पाप कर्म किया तब जाने नहीं तो नहीं हालांकि उन्होंने कोई 18व भाव में कोई स्लॉटर हाउस कत्लखाना नहीं चलाया

17:52 ये तो हिंसा ही की उन्होंने भी मनुष्यों की जो शैया पालकों की हिंसा की फिर पंचेंद्रिय में सिंह की हिंसा की अब जो पंचेंद्रिय जीवों की हिंसा करेगा तो तो फिर परिणाम यही अब इस तरह से सातों नरक को देख लीजिए और सातों नरक के अंदर देख के सबका आयुष देख लो क्योंकि आयुष जैसे जैसे आप नीचे नीचे के नरक में जाते हो आयुष बढ़ता जाता तो फिर आयुष उतना बड़ा आयुष भोगने वाले जीवों की संख्या कम होती जाती।

18:38 पहले नरक रत्न प्रभा के अंदर आयुष वहां पर द हजार बरस से लेकर के एक सागरोपम तक। दूसरी नरक में जाओगे एक सागरोपम से तीन सागरोपम तक का आयुष बढ़ गया। तीसरी का प्रभा में जाओगे तो तीन सागर पम से सात साप तक आयु से बढ़ गया। चौथी पंक प्र नरक में जाओगे तो वहां 10 सात सापम से 10 सागरम तक बढ़ता जा रहा है। पांचवी नरक में धूम प्रवाह में जाओगे तो वहां पर आपको 10 से लेकर 17 सागरों को तक की

19:24 ऐसे वेरिएशन में रेंज मिलती है अब आप उसके बाद भी छठी नरक तम प्रभा में जाओगे तो वहां आपने ये देखा 17 से लेकर 22 तक आपको आपको आयुष मिलता है और सात नरक में 22 से लेकर 35 11 का डिफरेंस है। आप सोचिए समझे अगर हम सातों नरकों के अंदर मिनिमम से मैक्सिमम जगन्य से उत्कृष्ट तक का हिसाब करने जाए तो बीच में एवरेज के अंदर आप प्रमाण कितना ज्यादा बढ़ता जाता। लेकिन फिर भी भगवान को केवली को पूछा जाए

20:11 कि हे भगवान क्या प्रतिदिन नरक में जाते हैं? इतने जाते हैं केवल ज्ञानी तीर्थंकर भगवान उत्तर देते हैं प्रति दिन नहीं प्रति घंटे प्रति घंटे नहीं प्रति मिनट प्रति मिनट नहीं प्रति सेकंड और प्रति सेकंड नहीं प्रति समय आ रही है बात समझ में अंशा बहन जी बोलो ख्याल आ गया अब दो अंशाह जी है कौन जिसको बोलना है चलिए अब यहां पर प्रति समय अगर जब कह रहे हैं अब उसमें संख्या निकाली जाए हे भगवान

21:00 प्रति समय नरक में कितने जीव जाते होंगे इसका मतलब क्या हुआ एक समय भी खाली नहीं जाता है कि कोई जीव नरक में ना आया हो ना गया हो अब जाने वाले तो दो ही या तो मनुष्य और या फिर दो ही जीव है लेकिन मनुष्य लोक में और तीरछा लोक में असंख्य देव समुद्रों के अंदर असंख्य तिर्यंच गति के जीव तिर्यंच गति के भले हो लेकिन चौेंद्रिय तक के जीव नहीं जाएंगे। पंचेंद्रिय वाले जाएंगे। अब कितने प्रमाण में जाए सोचिए संख्या तो

21:48 भाई असंख्य द समुद्र है असंख्य द समुद्र में मछलियां वगरे बड़ी-बड़ी मछलियां वगरे कितने हो गए मगरमच्छ कितने हो गए आप सोचिए और इसी तरह से पशु कितने हो गए पक्षी कितने हो गए काली पशु पक्षी जचर हैचर है खेचर है ये तो आकार प्रकार बदला है लेकिन वहां भी हिंसा की वृत्ति तो देखी आपने आकाश में उड़ता हुआ ईगल पक्षी वो एक स्पीड में नीचे आकर कुत्ते को उठा जाए बकरी को उठा जाए ऐसा होता है। अब उसकी क्षमता कितनी होती है कि एक झपट में आकर के सीधा पंच बकरी को

22:37 कुत्ते को उठा के चला जाए। आकाश में उड़ जाए और फिर जहां जाकर के उसको खाना है खा लो। अब जो जीव पंचेंद्रिय जीवों की हिंसा पर ही जीवन जी रहे हैं उनका तो ऐसे ही चलने वाला है। पूरी जिंदगी ऐसे ही चलेगा। इसलिए ऐसे हिंसक वृत्त वाले जीव तो नरक में जाने की संभावना उनके अनेक गुने पड़ जाए। चलो अभी आप देव गति में देखिए। अब भगवान को पूछा जाए हे भगवन कि देव गति में जाने वाले कौन है? तो दो पशु पक्षी

23:24 कोई एक इंद्र दो इंद्री देवोक में देव गति में नहीं जाते। अधिकार किसका रहा? मनुष्यों का रहा और तिर्य पंचेंद्रिय पंच पशु पक्षियों का तो अब पशु पक्षी में से कोई इतना पुण्य उपार्जन करे इतना प्रबल पुण्य उपार्जन करे कि वो देव गति में जाने लायक बने। लेकिन देव गति के अंदर सबसे निचला स्तर आ रहा है भवनपति का। उसके बाद ऊपर आ रहा है व्यंकरों का। उनके बाद ऊपर आता है ज्योतिषी का। उनके बाद ऊपर आता है कल्पो भवन।

24:13 यहां पर अब देव गति में जातियां बहुत है। नरक गति में इतनी जातियां नहीं है। वहां सात नरक के हिसाब से विभाजन कर दिया। तो यहां पर देव गति में भवन पति के अंदर असुर कुमार भी है। भव पति के अंदर परमादामी भी है। अब आप सोच लो हे भगवन 15 प्रकार की परमादामी में भी क्या रोज जीव आकर के जन्म लेते हैं? प्रश्न ध्यान में लीजिए साहब। तो महावीर स्वामी साफ कह रहे हां परमागामी में भी

24:58 रोज आकर के देव जन्म ले रोज आ अब कितने आ रहे हैं कितनी संख्या में आ रहे हैं बोले सबसे थोड़े आ रहे हैं कह आ तो रहे हैं सब हे भगवान असुर कुमार आदि 10 प्रकार है उनके अंदर बोले बहुत आते हैं बहुत ज्यादा आते अब असुर कुमार से आगे व्यंतर में बहुत आते हैं। व्यंतर में से वाण व्यंतर में कितने आते हैं? व्यंतर से कम और वाण व्यंतर में भी बहुत आते हैं। हे भग में बहुत आते हैं। हां जरूर आते हैं साहब।

25:45 अब व्यंतर जाति के अंदर यह व्यंतर आठ बाहर आठ और 10 के लिए लगभग ये 26 हो इसमें एक से दूसरे में कम ज्यादा कम ज्यादा कैटेगरी की संख्या है बहुत आते हैं सब जन्म लेकर अब सबके लिए व्यवस्था बनी हुई है। हमारे रत्न प्रभा पृथ्वी के नीचे जो संख्या है जैसा कि हमने भूगोल में पहले भी समझा वहां पर कई व्यतरंतर कई बार कई के लिए ब्रह्मक जाति के देवता आते हैं जन्म लेते हैं जीव

26:31 कोई ना अब इनसे ऊपर कौन है ज्योतिषी देवता वे कहां पर है तिरछा लोक के अंदर मनुष्य क्षेत्र के अंदर संतरा भूमि से 790 योजन से शुरू होते हैं और 900 योजन तक है 110 योजन के बेल्ट के अंदर सतत मेरु पर्वत की प्रदक्षिणा करने वाले हैं तो वहां भी ज्योतिष के मंडल के अंदर रोज आ रहे रोज आकर के जीव जन्म लेते हैं। ख्याल आया। अब उसमें भी कौन किस में जाएगा? कोई सूर्य में जाए, कोई चंद्र में जाए, कोई ग्रहों में जाए, कोई नक्षत्र में

27:19 जाए, कोई तारा सब अलग-अलग तरीके के विभाग तो उस हिसाब से कर्म बांधने वाले होने चाहिए। अब जिन जीवों ने जिस प्रकार से जैसे कर्म बांधे हैं तो जाएंगे सब। अब इस तरह से ज्योतिषी विमान में आए। इससे बहुत कम संख्या के अंदर 12 कल्पों के देवोक में जीव जाकर जन्म लेते थे। संख्या घट गई। बहुत कम होते गए। अब आप सोचिए अब इनको चो जी को वगरे किसी को जो है

28:06 देवलोक में जाना है कहां जाओगे कल्पो बंद में जाओ अगर आप कल्पोप में नहीं जाकर के व्यंतर में जा रहे हो तो व्यंतर में नहीं जाकर के असुर कुमार में जा रहे हो तो कहने के लिए तो सभी देव गति के देवता है कोई ना नहीं है किसी को कहने के लिए तो देव गति बोली जाएगी लेकिन कहां जा रहे हो कहां तो मिले देव गति में जाओ तो वहां पर भी ध्यान रखिए गोत्र कर्म साथ में है और गोत्र कर्म के अंदर उच्च गोत्र और नीच गोत्र की व्यवस्था है

28:52 कि सिख आदि नीच गोत्र में है और कुछ उच्च गोत्र में है इंद्रा आदि तो ऐसे वहां पर गोत्र कर्मुारी व्यवस्था तो चल ही रही है आप ना नहीं कह सकते सब जगह पर है गोत्र कर्मा सब जगह अब कल्पोप में जाओ उसके अंदर धीरे धीरे जैसे जैसे हाइट बढ़ती जाएगी ऊपर ऊपर जाओगे उसमें शरीर की अवगना घटती है और आयुष बढ़ता है आ गई बात ध्यान में आपको बोलिए छोड़ जी बोलिए पहले ये वाक्य बोल मास्टर साहब आप फरमा रहे हैं कि जैसे जैसे

29:38 ऊपर में ऊपर के देवोक में जाएंगे शरीर की अफगाना घटती है और आपका आपका आयुष बढ़ता जाता है जैसे जैसे आप कल्प बंद में 12 देवोक में ऊपर ऊपर के देवोक में जाएंगे आयुष बढ़ता जाएगा फिजिकल हाइट बढ़ती जाएगी और रिद्धि सिद्धि समृद्धि संपत्ति वैभव ऐश्वर्य बढ़ता बढ़ता बढ़ता जाए वो वहां की नियत नियति है निश्चित नियति लेकिन एक बात ध्यान में रखिए इतना वहां पर रिद्धि सिद्धि समृद्धि बढ़ती जाएगी लोभ आदि घटता जाएगा ऊपर ऊपर जाने

30:23 में लोभ घटता है नीचे नीचे आने में लोभ बढ़ता है [हंसी] ये ध्यान में रख ऐसे इसी तरह से जो है जीवों का है अब 12 देवलोक से ऊपर आप नौ ग्रेवेड में जाइए जाने वाले जीवों की संख्या बहुत कम होती है देवगति है ना देवलोक है ना नहीं है लेकिन वहां संख्या कम क्यों होती है भाई क्योंकि इतना प्रबल पुण्य करने वाले भी कम है और दूसरी तरफ नौ ग्रेनेट में जाने के बाद किसी का दो चार जन्मों के अंदर किसी का थोड़े ज्यादा जन्मों के अंदर किसी का कम ज्यादा जन्मों

31:10 में उनका कल्याण होता है। मोक्ष में गमन होता है। लेकिन शास्त्र यहां तक कह रहे हैं कि नौ ग्रह य तो अभिक जीव भी चला जाता है। ध्यान में रखिए देव गति प्राप्त करना पुण्य से होता है काम मात्र जो है निर्जरा से नहीं हो रहा है वहां पुण्य उपार्जन किया जाता है इसलिए वहां पुण्य से होगा अब आप नौ ग्रह एक से भी ऊपर गए पांच अनुत्तर में गए पांच अनुत्तर में जाने वाले देवताओं की संख्या क्या कंपेरेटिवली सबसे कम

31:58 सबसे कम इतनी कम है इतनी कम है कि बात पूछो और देवोलोक विस्तार का भी बड़ा है सत्य है पांच अनुत्त मानव का विस्तार भी काफी बड़ा है लेकिन वहां संख्या बहुत कम है क्यों कम है अब जिनके कर्म बहुत थोड़े प्रमाण में रहते हैं वही वहां जाए और वहां से निकल कर के महाविद में जाकर एक भ में ही मोक्ष में जाना है। विजय वैजय वाले देवलोक वाले कोई हो भले ही दो भव करे तीन भ करे तो भी उनको वहां से मोक्ष में जाना अनिवार्य है। अच्छा सबसे बड़ी बात

32:45 क्या ध्यान में रखने जैसी है? जैसे जैसे सम्यक दर्शन आपका विशुद्ध ज्यादा होगा वह ऊपर ऊपर के देवलोक में ज्यादा जाएंगे। आ रही बात बहन जी बोली मन वंदनामी महाराज साहब आपने ये कहा कि जैसे जैसे आपका सम्यक दर्शन विशुद्ध होता जाएगा वैसे वैसे आप ऊपर चढ़ते देवलोक में जाओगे। मिथ्या के कारण अगर देवलोक में है तो नीचे नीचे के देव सबसे ज्यादा मिथ्यात्व के कारण पवन पति में रहने वाले जीवों

33:30 हालांकि यहां पर सम्यक दर्शन को पुण्य के कारण हुआ नहीं बताया गया। सम्यक दर्शन आपके पास है तो ज्यादा उच्च कक्षा का देवोक मिलेगा। अगर सम दर्शन से भी आगे आप पांचवे गुणस्थान पर धारी हो तो भी ऊपर का देवोक मिलेगा और आप अगर छठे गुणस्थान पर साधु साध्वी हो तो भी आपको ऊपर ऊपर के देवलोक मिलते हैं क्योंकि पुण्य प्रबल है ना ये विशेषता बन रही है। अब पूछा जाए कि भगव क्या देव गति के अंदर रोज आकर के जीव जन्म ले रहे हैं? हां गौतम देव गति के अंदर जीव

34:17 रोज आ रहे हैं। रोज जन्म ले रहे हैं। क्या भगवान प्रति दिन नहीं प्रति घंटे प्रति कला प्रति मिनट प्रति सेकंड प्रति समय भी आ रहे हैं। जन्म ले रहे हैं। संख्या बहुत अब आप ध्यान दीजिए कि हे भगवान नरक में भी असंख्य संख्या में जीव जा रहे हैं। देव गति में भी असंख्य संख्या में जीव जा रहे हैं। तो ये भगवान नरक में ज्यादा जा रहे हैं कि स्वर्ग में ज्यादा जा रहे हैं? बोलो विजय भाई ध्यान में आए जी साहब जी नरक में ज्यादा जा रहा है।

35:04 अब नरकती में जाने वाले जीवों की संख्या क्यों ज्यादा है? जबकि दोनों तरफ असंख्य है। देवताओं में भी असंख्य की संख्या है। नरक में नारकी में भी असंख्य की संख्या है। लेकिन असंख्य की भी जो डिफरेंट कैटेगरीज है उसमें सबसे ज्यादा नरक गति में जाने वाले जीवों की संख्या है। देव गति में जितने जाते हैं भले ही देव गति में असंख्य है लेकिन देव गति में जितने जाते हैं उससे असंख गु ज्यादा जीव नरक गति में जाते हैं। बोलिए वंदना माता जी ख्याल आया जी महाराज साहब देव गति में जितने जीव

35:50 जाते हैं उससे असंख्य गुना ज्यादा जीव नर्क गति में जाते हैं। अब इसका कारण क्या है? इसका कारण एक ही है कि संसार के अंदर पुण्य का प्रमाण बहुत कम होता है। पाप का प्रमाण ही अनेक गुना ज्यादा होता है। आप देख लो संसार में पाप की प्रवृत्ति बहुत ज्यादा होती है। पुण्य का प्रमाण इतना ज्यादा नहीं होता है। पुण्य पाप की प्रवृत्ति से तो पुण्य कई गुना कम है। बहुत बड़ी मात्रा में कम चल रहा है। आप अपने संसार में अपने चारों तरफ देखिए। आज अगर हम पंचम काल के कलयुग के अंदर

36:37 पूछने जाए कि हे भगवन इस पंचम काल के कलयुग के अंदर पुण्य का प्रमाण ज्यादा होता है कि पाप का प्रमाण ज्यादा होता है। आप समझ गए। अब इसको परसेंटेज में निकाल के कहा जाए तो महावीर स्वामी सिमंदर स्वामी केवली भगवन कहेंगे भाई पुण्य का प्रमाण मुश्किल से 20 30% लेकिन 60 70% से ज्यादा जो है पाप की प्रवृत्ति संसार में जा रहा है। आप देख अब इतनी बड़ी पाप की प्रवृत्ति अगर संसार में लोग करेंगे तो कितना गुना नरक में जाएंगे देव गति से अनेक गुना ज्यादा जीव

37:25 नरक में जाएंगे हालांकि देवलोक भी सात राजक प्रमाण और सातों नरक भी सात राज प्रमाण कोई नाम नहीं रज्जुलों के हिसाब से लेकिन देव देवता तो उध्व लोक में भी है। तीच्छा लोक में भी है। लोक में भी है। नरक के नारकी जीव सिर्फ अधो लोक में है। वो बाहर तीनों लोक में अन्यत्र कहीं पर भी नहीं है। बोलो जी ध्यान में आ रही है बात बोलिए। देव गति के अपना देव सभी लोक में है पर

38:12 नरक के नारकी जीव सिर्फ नरक गति में ही है। यहां पर आपको यह ख्याल आ जाएगा कि नरक के नार के जीव है क्योंकि पाप प्रवृत्ति इतनी ज्यादा है। इतने प्रमाण में ज्यादा है कि पाप करने वाले जीव नरक में बहुत ज्यादा जाएंगे। उसकी तुलना में नरक में तुलना में देव गति के अंदर संख्या प्रमाण कम रही। देव गति प्रबल पुण्य से मिल रही है और देव गति के पुण्य से भी देव लोक में जाने वालों का पुण्य और गुना ज्यादा है। देव लोक में भी कल्पोप्पन्न के 12 देवोक

39:00 में जाने वालों के पुण्य के हिसाब के तुलना में तो नौ वैक और पांच अनुत्त में जाने वालों का पुण्य कई गुना ज्यादा और इतना प्रबल पुण्य उपार्जन कर नहीं पाते हैं। इसलिए वहां पर संख्या बहुत कम। अब आज का काल ले लो। आज तो पंचम काल का कलयुग है। अब आज तो सबसे ज्यादा जीव जा रहे हैं भवन कुमार में असुर कुमार में फिर व्यंतरों में फिर वाहतरों में तिर त्रंबक में जाएंगे और फिर ऊपर जो है ज्योतिषी देवोक तक जाए और सबसे ज्यादा ऊपर कल्पोप में पहले दूसरे देवलोक तक ही जा सकते।

39:47 हम आज की बात कर रहे हैं। वर्तमान काल में अगर मनुष्य में से या पशु पक्षी में से कोई जाए देव गति में तो कोई कहां तक जाए? कोई कहां तक जाए? सोचिए तो सबसे मैक्सिमम ज्यादा संख्या हो गई भवनपति। भवनपति में वापस असुर कुमार आ गए। और फिर आपने व्यंतर आदि के अंदर देख लिया सबसे बड़ी अब व्यंतरों की तुलना में वैमानिक देवलोक के अंदर जाने वाले असंख्या से भाग्य कम हो गई और फिर व्यंतर आदि में जाने की अपेक्षा भी कल्पोप से कल्पातीत में जाने वालों की

40:33 संख्या बहुत कम हो गई। अब आज हम लोग तो यहां से जा नहीं सकते। पूरे पांचो भरत क्षेत्र के और पांचो ऐरावत के द क्षेत्र के जीव ऊपर ऊपर ऊपर टॉप कक्षा में सिर्फ दूसरे त्रिलोक तक जा सकते हैं। उससे ज्यादा आगे आप जा नहीं सकते हो तो बाकी के तो महाविद क्षेत्र में से ही ज्यादा जाएंगे। पांचों महाविद में से रोज जाएंगे। कोई नाम नहीं निखिल भाई बोलो हैं निखिल भाई बै बोलो

41:20 चलो नहीं बोलना है किसको बोलना है हसा ही बोलो अब जिन जिन जीवों के अब जैसे कर्म है और जो जितने प्रबल प्रमाण में पुण्य उपार्जन करते हैं उनके ऊपर आधार क्योंकि उत्कृष्ट कक्षा का पुण्य उपार्जन करने वाले बहुत थोड़े होते बहुत थोड़े होते सामान्य कक्षा का पुण्य उपार्जन करने वाले बहुत अंधेरी लेकिन पुण्य उपार्जन करने वाले जीवों की तुलना में भी सबसे ज्यादा जो है

42:08 पाप करने वाले जीवों के प्रमाण ज्यादा होते बहुत कम ज्यादा प्रमाण में फर्क है। अब आइए मुख्य रूप से बात किसकी? मनुष्य गति में। तो भगवंत को प्रश्न पूछा गया हे भगवंत क्या मनुष्य गति में संख्यात जीव प्रवेश करते हैं या असंख्य जीव आते हैं प्रवेश करते हैं? बोलो विजय भाई प्रश्न ख्याल जी साहब जी मनुष्य गति में क्या असंख्यात जीव प्रवेश करते हैं? बोलो अब इसके उत्तर में क्या देंगे निखिल

42:54 भाई उत्तर क्या होगा 2 96 संख्यात सा संख्यात होगा और 2 96 और मनुष्य बोलो आशा बहन जी क्या उत्तर होगा तो यहां पर श्रीमंदर स्वामी ये शब्द प्रयोग कर रहे है मनुष्य गति में असंख्य जीव आते हैं। जरा एक मिनट शांति से सुनना नहीं तो रिएक्शन मत करना तुम। भगवान कह रहे हैं मनुष्य गति में भी असंख्य जीव आ रहे हैं। लेकिन वो असंख्य जीव जा रहे हैं। समुच्च मनुष्य में अब मनुष्य में गर्भज मनुष्य में संख्यात

43:41 ही आ रहे हैं। साथ अब दो में फर्क क्या समझा जी? बोलिए क्या फर्क है फर्क का हमारे साथ समोशन समोशन के मन नहीं होते और जो आप ऐसे मत बोलिए क्या कारण क्या दिया यहां पर ये बोलिए ना से समन होता है कि नहीं होता है ये तो पूछा ही नहीं मैंने आयुष 48 मिनट्स अंतर है बोलिए भाई समूछ जीव का आयुष मैक्सिमम अंतर्मूत तक ही होता है। समूछ मनुष्य का जन्म दुर्लभ नहीं है। गर्भज संग पंचेंद्रिय मनुष्य का जन्म

44:29 दुर्लभ है। अब समको 14 प्रकार के मलमूत्र आदि में उत्पन्न होना है तो असंख्य आएंगे। असंख्य जन्म लेंगे। मैं नहीं बोल रहा हूं। यहां भगवती सूत्र में ऐसा पाठ है। अब यहां पर जो इसी बात को लेकर चल रहे ना तो गर्भज संधि पंचेंद्र पर्याप्त प्राप्त करने वाले मनुष्य बहुत थोड़े होते उनकी संख्या कम है। 2 96 दो की संख्या का 96 टाइम स्क्वायर करते जाओ। यह जो 29 का

45:14 डिजिट का फिगर आएगा वह गर्भ सम पंच मनुष्यों का है। बोलो साहब जी यहां पे आपने बोला 14 प्रकार के मल मूत्र और और ऐसी जो दुर्गंधा रूप द्रव्य है वो तो पूरे लोक में भरभ के पड़ी तो असंख्य की बजाय अनंता क्यों नहीं कह सकते? आवाज तो नहीं आई क्योंकि यहां बारिश ज्यादा है ना इसलिए पतरे की आवाज से सुनाई नहीं दे रहा है। साहब जी पूछ रहे हैं कि अभी आवाज आ रही है मेरी आवाज आ रही है हां तो साहब जी मल मूत्र तो बहुत भरे पड़े हैं तो असंख्यात क्यों है? अनंत क्यों नहीं है? ये निखिल भाई का प्रश्न है। लेकिन पंचेंद्रिय में अनंत की संख्या नहीं

46:00 आती। पंचेंद्रियों की संख्या सिर्फ असंख्यात है। तो यहां पर असंख्य भी कोई कम फिगर नहीं है। जैसे अनंत के वेरिएशन अलग-अलग होते हैं। असंख्य के भी अलग-अलग वेरिएशन बहुत होते हैं। मल, मूत्र आदि जो भी भरे पड़े आते जन्म लेते मरते आते जन्म लेते मरते आते जन्म क्योंकि दो घड़ी का ही तो जीवन है। अंत मूर्त का आयुष अंतर् में उनको पर्याप्तियां करनी है। इसलिए अपर्याप्त ही रहते हैं। जीवन भी ज्यादा नहीं है। अब ऐसे जीव आए मनुष्य जन्म में आप उनके मनुष्य जन्म को दुर्लभ तो नहीं कह

46:46 सकते। उत्कृष्ट तो नहीं कह सकते भाई। गति तो मनुष्य की है। ऐसे अगर मनुष्यों के जन्म को गिनती करने जाए तो छोटे जी ध्यान से सुन लेना। एक एक आत्मा ने हमने अनंत अनंत बार जो है मनुष्य गति में प्रवेश किया हुआ है। हमने अनंत अनंत बार मनुष्य भव लिए हुए हैं। लेकिन उसमें अनंत अनंत की संख्या कौन सी रहेगी? समुच्च मनुष्यों के जितने अनंत भव हमने समुच्च मनुष्य के किए हैं उसके अनंत में भाग के ही गर्भज पंच मनुष्य के किए बोलिए

47:32 छोटिया जी यही वाक्य बोलना है अभी दूसरा मत बोलना जितने अनंत गुने भाव हमने गर्भज मनुष्य गर्भज मनुष्य के किए हैं उसके अनंतवे भागी सम उल्टा उल्टा बोल गए बोल गए आपका ध्यान नहीं है उल्टा बोल गए बोलिए जी बोलो जी महाराज साहब जितने अनंत भव हमने समछ मनुष्य के किए हैं। उसके अनंत वे भाग के ही जन्म हमने गर्भज मनुष्य के किए हैं। जितने अनंत गुने भव हमने समूछ मनुष्य के किए हैं उसकी तुलना में अनंत

48:22 भाग के ही गर्भज पंच संग मनुष्य के भव की रेखा बेटे ऐसी लाइन बोलिए सेंटेंस बराबर बना के दो जितने अनंतवे भाव हमने समुचित मनुष्य के किए हैं उसके अनंत भाग के भाव ही हमने गर्भज संगी मनुष्य के किए हां जी ऐसे आप देखिए कि सम अब समुच्च मनुष्य की तो क्या कीमत है जब दो घड़ी का उनका आयुष है ये तंच गति से भी बेचारे गए गुजरे ऐसी हालत हो जाती है उनकी तो जीवन ही इस प्रकार का है लेकिन उत्पत्ति तो होती है मनुष्य तो मनुष्य ही

49:10 कहलाएंगे गति की दृष्टि से आप उनको मनुष्य ही कहोगे। आप उनको तिरियंच गति के जीव नहीं कहोगे। और नियम क्या है? एक योनि में आकर जिसने जन्म ले लिया शरीर बना लिया अब उसकी योनि बदलती नहीं है। तुरंत वो वापस ये नहीं मैं इसमें से इसमें चला जाऊं। ऐसा नहीं होता है। यद्यपि मनुष्य के जन्म के लिए 14 लाख योनियां 14 लाख में तो सम पंचेंद्र की भी आएगी कि नहीं आएगी? बराबर आएगी। तो ये जो प्रक्रिया चल रही है चलेगी। अब लास्ट में बात आ रही है हे भगवन तिर्यंच

49:57 गति में जीवों की संख्या का प्रमाण कितना है? तो तिर्यंच पंचेंद्र्रियों की संख्या असंख्य है। लेकिन यहां सबसे बड़ी बात क्या है? तिर्य गति में पंचेंद्र जीव भी आएंगे, चौेंद्र जीव भी आएंगे, जीव भी आएंगे, दो इंद्रिय वाले भी आएंगे, एक वाले स्थावर भी आएंगे। गति की दृष्टि से सबकी गणना तिरंच गति में की जाती है। बोलिए अंजना जी बोलेंगे आप? जी तिरियंच गति में पंचेंद्रिय तिरंच भी आएंगे चौेंद्रिय भी आएंगे तेदिय भी आएंगे ब्दिय भी आएंगे और स्थावर जीव भी आएंगे तो गिनती इनकी तिरियंच में होगी

50:46 यह है विशेषता आप देखिए समझे कि नहीं अब जो जीव तिर्यंच गति में आए हे भग उसमें सबसे कम ज्यादा कौन किस में है तो वहां वहां पर भगवान कह रहे हैं कि त्रियंच गति में भी सबसे कम संख्या पंचेंद्रिय तिरियंच उससे कई गुनी ज्यादा चौेंद्रिय है उससे कई चुनी ज्यादा ती्रियों की है उससे कई गुनी ज्यादा दो इंद्रिय वाले जो बैक्टीरिया वग है वायरस उनकी है और सबसे ज्यादा एक इंद्रिय जीवों की संख्या बहुत एकेंद्रियों में भी आइए तो सबसे ज्यादा

51:32 अनंता अनंत की संख्या साधारण वनस्पति काय ध्यान दीजिए थोड़ा पृथ्वी काय की राशि में अनंत जीव अब काय में अनंत जीव अग्नि काय में अनंत जीव आत्मा है वायु काय में भी अनंत जीव आत्माएं है और साधारण वनस्पति काय में अनंत अनंत जीवात्माएं हैं और साधारण वनस्पति का में एक शरीर में भी अनंत जीवात्मा है और साधारण के अंदर प्रत्येक वनस्पति का के अंदर असंख्य जीवात्माएं हैं। उनका इस तरह से प्रमाण में संख्या में कम ज्यादा जन्म होता है।

52:20 अब क्यों ऐसा कहा गया है? ध्यान रखिए पृथ्वी काय के एक शरीर में अनंत नहीं कहा पृथ्वी काय की कुल जाति में अनंत जीव कहे आ रहा है ध्यान में अब का की कुल जाति में अनंत काय एक पानी की बूंद में असंख्य जीव नहीं कहा अनंत जीव नहीं कहा है अग्नि काय के अंदर एक शरीर में एक ही जीव है अनंत नहीं है लेकिन लेकिन अग्नि काय की संपूर्ण जाति में कितने एक जीव है? बोले अनंत जीव राशि है। वायु काय में भी ऐसा उत्तर दिया है। लेकिन प्रत्येक वनस्पति काय में जितने जीव

53:06 है उनसे अनंत गुने जहां जीव जो है साधारण वनस्पति काय प्रत्येक वनस्पति काय में सभी फल फूल सब्जी इकटठी कर लो। उससे अनंत गुने जीव जो है एक साधारण [हंसी] बाद वनस्पतिय में आ रहा है ध्यान में आपको देख लो नेम भाई छा बोल चलो मेघा बहन जी बोलना है आपको हंसा बहन जी बोली नहीं बोलिए आशा जी आपने बताया कि प्रत्येक वनस्पति में जितने अनंत जीव है उसके अनेक गुने ज्यादा

53:52 साधारण वनस्पति काय के बाद साधारण में होते हैं। [नाक से की जाने वाली आवाज़] पृथ्वी पानी अग्नि वायु वनस्पति में बात की है। पृथ्वी काय में भी अनंत जीव है। एक शरीर में एक है। एक शरीर में ज्यादा मत बोलिए। क्या है? नहीं तो सब लोगों को यही भ्रम होता है कि नहीं नहीं ऐसे लेकिन समग्र संपूर्ण वनस्पति काय में जितने जीव है उससे तो अनंत में भाग के जीव पृथ्वी काय में आएंगे ये फर्क तो पड़ेगा ना इसको ध्यान में लीजिए पहले समझे तो आपको ख्याल आ जाए तो

54:38 फरमा रहे आप फरमा रहे समग्र वनस्पति का में जितने अनंत गुण जीव है उसके अनंत भाग ही पृथ्वी का में है आवाज कट रही है महाराज आवाज कट रही है आवाज वो पूछ रहे हैं कि जितने साधारण वनस्पति काय के जीव एक में एक में है उसके अनंत भाग के ही एक इंद्रिय पृथ्वी काय अपय देव काय में है ऐसा पूछ रहे हैं नहीं नहीं ऐसा नहीं है मैंने जाति बोली ना पृथ्वी काय की जितनी जाती है सब मिलाकर पृथ्वी काय में भी अनंत जी इसका कारण क्या है अंगुल असंख्यात भाग्य जितना छोटा सा शरीर

55:25 लेकिन वहां पर एक शरीर में एक ही जीव होता है [नाक से की जाने वाली आवाज़] 14 लोक के जितने जीव है सबका प्रवेश और फिर उनका जो है कम ज्यादा स प्रमाण में विचार विमर्श किया तो प्रश्न पूछते हैं आज हम बिहार करके यहां पनवेल में आए हैं और हैवी रेंज थोड़ी बारिश भी बहुत ज्यादा चल रही है और पास में पतरे हैं। आवाज बहुत आ रही है। की व्यवस्था नहीं हो पाई।

56:18 गो अहेड आशा बहन और हु एवर वास आस्किंग हेलो साहब मैं एक क्वेश्चन पूछू। पूछिए पूछिए जस्ट गो अहेड एंड आस्क प्लीज। जी महाराज साहब तो इसका मतलब एक इमेजिनरी देखो कि हम जितने पाप करते हैं वो भारी होने के कारण हम नीचे नीचे जाते हैं और जितने हम पाप कम करते हैं उसी के हिसाब से स्वर्ग में ऊपर ऊपर देवलोक में जाते हैं। चलो चलो कल बात करेंगे कल ज्यादा लेना [गला साफ़ करने की आवाज़] नमो नमो नमो सब

57:04 एसो पंच नमोकार पापणासम मंगलम चम मंगलम भगवानो मंगलम गम प्रभु मंगलम जय धर्मोस्तु मंगलम चतारी मंगलम अरिहंता मंगलम सि मंगलम साहू मंगलम केवले पतो मंगलम चारी लोगमा अरिहता लोगमा सिद्ध लोगत्तमा साहू लोगमा सार शरणम पवजम अरिहंते शरणम पवजम

57:50 सिद्ध शरणम पव्याम साह शरणम पवम केवल पत्तम धमम शरणम पव सर्व मंगल मंगलम सर्व कल्याण कारणम प्रधानम सर्व धरणम जय

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