बोलने की ऐसी कला की सब तुम्हारी बात माने! || Osho Hindi Speech || #Osho

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संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो प्रभावशाली संवाद के लिए आवश्यक तत्वों पर केंद्रित है। यहाँ बताया गया है कि शब्दों के पीछे का व्यक्ति और उसका अनुभव अधिक महत्वपूर्ण हैं। यदि कोई व्यक्ति अपने भीतर अनुभव, ज्ञान और प्रेम की आग जलाए तब ही उसके शब्द प्रभाव डाल सकते हैं। लोग उसे सुनते हैं जो उन्हें समझता है, सम्मान देता है और जिसका हृदय सच में प्रेम करता है।

  • शब्दों में जादू नहीं होता, वह व्यक्ति के जीवन में होता है।
  • लोगों को समझने और उनके साथ जुड़ने में समय दें; यही सबसे महत्वपूर्ण है।

शब्दों का प्रभाव और व्यक्तित्व

कुछ लोग अधिक बोलते हैं फिर भी कोई उनकी बात नहीं सुनता, जबकि कुछ लोग दो वाक्य कहकर लोगों को प्रभावित करते हैं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि शब्दों के पीछे का व्यक्ति कितना वास्तविक है। अगर व्यक्ति के भीतर सत्य और अनुभव है, तो उनके मौन में भी ताकत होती है। लोग उनके शब्दों को सुनते हैं, लेकिन सबसे पहले उन्हें भीतर की वास्तविकता देखनी होती है।

बोलने की कला

बोलने की कला केवल शब्दों का खेल नहीं है, बल्कि जीवन की सुगंध है। यदि कोई व्यक्ति खुद झूठा है, तो उसके शब्द भी झूठे लगते हैं। इसलिए, अपनी बात रखने से पहले अपने जीवन में सत्यत्व लाना जरूरी है। यदि आप किसी को जीतने की कोशिश करेंगे, तो वह आपकी बात का विरोध करेगा।

समानता और समझ

जब आप किसी की बात को समझने का प्रयास करते हैं, तब ही आपकी शब्दों में प्रभाव आ जाता है। किसी को उनकी स्वतंत्रता देना चाहिए, उनके ऊपर मजबूरियाँ नहीं डालनी चाहिए। संवाद के दौरान, जब लोग यह महसूस करते हैं कि आप उनके साथ हैं, तब वे सुनने के लिए तैयार हो जाते हैं।

आत्मा की भाषा

जब कोई व्यक्ति अपने अनुभवों को साझा करता है, तो शब्द प्रभावी बनते हैं। यदि आप अपनी बात में संघर्ष या दौड़ लगाते हैं, तो आपकी आवाज बेकार होती है। इसलिए, यदि आप दूसरों को प्रेम और सम्मान दें, तो आपकी वाणी में प्रभावशीलता आ जाएगी।

धैर्य और अनुभव

मनुष्य को वर्षों लग सकते हैं एक बात समझने में। अपनी बात कहने के बाद धैर्य रखें, क्योंकि आपके शब्दों का फल कभी समय के साथ आएगा। बोलने में धैर्य रखने का यह भी अर्थ है कि आप पहले अपने अनुभव के बारे में सोचें।

ऊर्जा की कला

बोलने की कला केवल शब्दों तक सीमित नहीं होती, यह ऊर्जा के स्तर तक पहुंचती है। यदि आपके भीतर प्रेम और शांति है, तो आपकी वाणी भी वैसी ही होगी। लोग आपकी उपस्थिति से प्रभावित होंगे और आपकी चर्चा मूल्यवान बन जाएगी।

संबंध की महत्ता

जहां संबंध नहीं होते, वहां शब्द केवल शोर बन जाते हैं। लेकिन जहां सच्चा संबंध है, वहां मौन भी संवाद बन जाता है। संवाद में सच्चाई रखनी चाहिए ताकि लोग उसे सुनें और समझें।

स्वीकृति और स्वतंत्रता

मनुष्य की सबसे बड़ी प्यास खुद को समझे जाने की होती है। जब लोग महसूस करते हैं कि आप उन्हें स्वीकार कर रहे हैं, तब वे आपकी बात सुनने लगते हैं। इसलिए, दूसरों को स्वतंत्र महसूस कराना अति आवश्यक है।

जीवित वाणी

जीवित वाणी में खोज, जिज्ञासा और विनम्रता होती है। यह स्वयं को न दिखाने की कला है, जिसमें व्यक्तित्व निखरता है। यदि आप अपने अनुभव को साझा करेंगे तो लोग आपकी बातों को ज़िन्दगी के सार के रूप में समझेंगे।

आध्यात्मिकता और संबंध

ज्ञानी व्यक्ति का काम अपने अनुभव साझा करना है ताकि दूसरे लोग स्वयं के भीतर की संभावना को पहचान सकें। जब आप दूसरों को उनके प्रकाश की याद दिलाते हैं, तब आपके शब्दों का प्रभाव बढ़ जाता है।

अंतिम विचार

बोलने की कला में सबसे अंत में, शब्दों से अधिक आपके होने की महत्ता होती है। यदि आप सच्चाई के साथ जीते हैं, तो आपके शब्द अपने आप प्रभाव डालेंगे। जीवन की गहराई में उतरना और सरलता से संवाद करना ही सच्ची कला है।

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Transcript

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0:00 तुमने कभी देखा है कि कुछ लोग बहुत अधिक बोलते हैं फिर भी कोई उनकी बात नहीं सुनता और कुछ लोग दो वाक्य बोलते हैं और लोगों के भीतर तूफान उठ जाता है। लोग उनकी बात मान लेते हैं। ऐसा क्यों होता है? क्या शब्दों में कोई जादू है? नहीं। शब्दों में कोई जादू नहीं है। जादू उस व्यक्ति में है जो शब्दों के पीछे खड़ा है। यदि भीतर कुछ नहीं है तो तुम्हारे शब्द भी खाली है। वे ऐसे ही हैं जैसे सूखी पत्तियां हवा में उड़ रही हो। उनका कोई भार नहीं। कोई सुगंध नहीं। कोई जीवन नहीं। और यदि तुम्हारे भीतर जीवन की आग जल रही है। यदि तुम्हारे भीतर अनुभव है। यदि तुम्हारे भीतर सत्य

0:48 है। तो तुम्हारा मौन भी लोगों को बदल सकता है। लोग तुम्हारी बात नहीं मानते क्योंकि तुम अच्छा बोलते हो। लोग तुम्हारी बात तब मानते हैं जब उन्हें तुम्हारे भीतर कुछ असली दिखाई देता है। एक आदमी रोज अपने पुत्र को समझाता था कि क्रोध मत किया कर और वह स्वयं हर छोटी बात पर आग बन जाता था। पुत्र उसकी एक भी बात नहीं मानता था। एक दिन उस आदमी ने पूछा मैं तुझे इतना समझाता हूं। तू मेरी बात क्यों नहीं मानता? पुत्र ने कहा क्योंकि मैं आपके शब्द नहीं देखता। मैं आपका जीवन देखता हूं। यही मनुष्य की सबसे बड़ी भूल है। वो सोचता है कि बोलने की कला शब्दों का खेल है। नहीं। बोलने की कला जीवन की सुगंध है।

1:33 यदि तुम्हारा जीवन झूठा है तो तुम्हारी वाणी भी झूठी लगेगी। तुम लाख मीठे शब्द बोलो। लोग कुछ समय तक प्रभावित हो सकते हैं लेकिन अंत में वे तुम्हारी बात नहीं मानेंगे। मनुष्य का हृदय बड़ा सूक्ष्म है। वो शब्दों को नहीं सुनता। वह तुम्हारे अस्तित्व को पढ़ता है। तुम किसी के सामने बैठो और कुछ ना बोलो। फिर भी सामने वाले को अनुभव हो जाता है कि तुम क्रोधित हो या शांत हो। तुम प्रेम से भरे हो या विष से भरे हो। जो बात बिना बोले समझी जा सकती है। वही बात बोलकर कैसे छिपाई जा सकती है। इसलिए यदि चाहते हो कि लोग तुम्हारी बात माने तो सबसे पहले अपने भीतर कुछ पैदा करो। ज्ञान पैदा करो। अनुभव पैदा करो।

2:22 शांति पैदा करो। प्रेम पैदा करो। फिर तुम्हारे शब्दों में वजन आ जाएगा। एक और रहस्य समझ लो। मनुष्य इसलिए भी असफल हो जाता है क्योंकि वह बोलते समय जीतना चाहता है। जब तुम किसी से बात करते हो तो तुम्हारे भीतर एक युद्ध चल रहा होता है। तुम सोच रहे होते हो कि मुझे इसे हरा देना है। मुझे इसे गलत साबित कर देना है। मुझे अपनी बात मनवा लेनी है। और उसी क्षण तुम्हारी वाणी विष बन जाती है। कोई भी मनुष्य हारना नहीं चाहता। तुम यदि उसे पराजित करने चलोगे तो वह तुम्हारी बात का विरोध करेगा। चाहे तुम्हारी बात सही ही क्यों ना हो। मनुष्य का अहंकार बड़ा विचित्र है। उसे सत्य से उतनी परेशानी

3:07 नहीं होती जितनी हार से होती है। इसलिए यदि चाहते हो कि लोग तुम्हारी बात माने तो उन्हें हराने मत जाओ। उन्हें समझने जाओ। जब तुम किसी मनुष्य को समझने लगते हो तभी तुम्हारे शब्द उसके हृदय में उतरने लगते हैं। एक स्त्री अपने पति से दुखी थी। वह कहती थी मैं दिनभर समझाती हूं। लेकिन वो मेरी बात नहीं सुनता। मैंने उससे पूछा जब तुम उससे बात करती हो तब समझाती हो या उस पर चढ़ बैठती हो। वो चुप हो गई। अधिकतर लोग समझाते नहीं है। वे हमला करते हैं और फिर शिकायत करते हैं कि लोग हमारी बात नहीं मानते। तुम्हारे शब्दों में यदि आक्रमण है तो सामने वाला तुरंत अपने चारों

3:53 ओर दीवार खड़ी कर लेगा। फिर तुम्हारी आवाज उसके कानों तक तो पहुंचेगी। उसके हृदय तक नहीं। याद रखना बोलने की सबसे बड़ी कला है। सामने वाले को सुरक्षित अनुभव कराना। जब किसी को लगता है कि यह व्यक्ति मुझे चोट नहीं पहुंचाना चाहता यह मुझे छोटा नहीं दिखाना चाहता। यह मुझे समझना चाहता है। तब उसके भीतर के द्वार खुलने लगते हैं। और खुले हुए हृदय में कही गई छोटी सी बात भी बीज बन जाती है। एक और रहस्य जो बहुत अधिक बोलता है। उसकी बात का मूल्य कम हो जाता है। हीरा इसलिए मूल्यवान है क्योंकि वह हर जगह नहीं पड़ा है। यदि सड़क पर हीरे बिखरे होते तो उनकी कोई कीमत ना होती। तुम्हारे शब्द भी ऐसे ही हैं। हर

4:38 समय बोलते रहोगे। हर बात पर अपनी राय देते रहोगे। हर क्षण उपदेश देते रहोगे। तो तुम्हारे शब्दों की चमक समाप्त हो जाएगी। थोड़ा मौन सीखो। जो व्यक्ति मौन जानता है उसी की वाणी में गहराई आती है क्योंकि उसके शब्द मौन की कोख से जन्म लेते हैं और मौन से जन्मे हुए शब्द तीर की तरह सीधे हृदय में उतरते हैं। एक ऋषि के पास लोग दूर-दूर से आते थे। वह बहुत कम बोलते थे। कभी एक वाक्य बोलते कभी दो वाक्य। लेकिन लोग जीवन भर उन्हें भूल नहीं पाते थे। किसी ने पूछा आपके शब्दों में इतना प्रभाव कैसे है? उन्होंने कहा मैं तब तक नहीं बोलता जब तक भीतर से शब्द जन्म लेने के

5:24 लिए बेचैन ना हो जाए। आज लोग इसके उल्टे जी रहे हैं। उन्हें कुछ कहना नहीं होता। फिर भी वे बोलते रहते हैं। उनके शब्द सिर से निकलते हैं। हृदय से नहीं। और जो शब्द सिर से निकलते हैं वे बुद्धि तक पहुंचते हैं। जो शब्द हृदय से निकलते हैं वे आत्मा तक पहुंचते हैं। यदि चाहते हो कि सब तुम्हारी बात माने तो पहले सुनना सीखो। यह सुनकर तुम्हें आश्चर्य होगा। तुम कहोगे मैं बोलने की कला सीखना चाहता हूं और तुम सुनने की बात कर रहे हो। हां क्योंकि जो सुन नहीं सकता वो कभी बोल नहीं सकता। जो दूसरों को नहीं सुनता वो यह भी नहीं जान पाता कि सामने वाला कहां खड़ा है और जो यह

6:11 नहीं जानता कि सामने वाला कहां खड़ा है वो उसके हृदय तक पहुंचने का मार्ग भी नहीं जान सकता सुनना प्रेम है जब तुम किसी को पूरे ध्यान से सुनते हो तो उसे पहली बार अनुभव होता है कि उसका भी कोई मूल्य है और जिस व्यक्ति को तुम मूल्य देते हो वो धीरे-धीरे तुम्हारे शब्दों को भी मूल्य देने लगता है यही रहस्य लोग उन लोगों की बात मानते हैं जो उन्हें सम्मान देते हैं। लोग उन लोगों की बात नहीं मानते जो उन्हें सुधारने निकले हैं क्योंकि सुधारने के पीछे छिपा हुआ अहंकार है और सम्मान के पीछे छिपा हुआ प्रेम है। प्रेम से कही गई बात पत्थर को भी पिघला सकती है। अहंकार से कही गई बात फूल को भी बंद कर देती है। और एक बात समझ लो लोग

6:58 तुम्हारी बात तब भी नहीं मानते जब तुम्हारे भीतर भय भरा हो। भयभीत व्यक्ति की वाणी कांपती है। उसके शब्दों में विश्वास नहीं होता। वह स्वयं अपनी बात पर खड़ा नहीं होता। तुम किसी से कहो कि सत्य बोलो और तुम्हारी आंखों में डर दिखाई दे तो तुम्हारी बात व्यर्थ हो जाएगी। क्योंकि मनुष्य शब्दों से अधिक तुम्हारे भरोसे को देखता है। यदि तुम्हें अपनी ही बात पर भरोसा नहीं है तो दूसरा क्यों भरोसा करेगा। इसलिए बोलने की कला का एक रहस्य यह भी है कि पहले स्वयं अपने जीवन में वही जी लो जो तुम कहना चाहते हो। जिस सत्य को तुमने जिया नहीं है उसके बारे में बोलना मत। जिस प्रेम को तुमने जाना नहीं है। उसके उपदेश मत देना। जिस शांति का स्वाद

7:43 तुमने चखा नहीं है। उसके गीत मत गाना। क्योंकि उद्धार के शब्द कभी प्रभावशाली नहीं होते। वे ऐसे हैं जैसे किसी भूखे मनुष्य ने भोजन का ग्रंथ पढ़ लिया हो और अब दूसरों को भोजन का स्वाद समझा रहा हो। जो स्वयं भूखा है वो भोजन का स्वाद क्या बताएगा जो स्वयं प्रेम से खाली है वो प्रेम की भाषा क्या सिखाएगा? जो स्वयं अशांत है वो शांति की बात कैसे करेगा? पहले स्वयं बनो। फिर बोलो और तब तुम्हें चमत्कार दिखाई देगा। तुम्हें लोगों को मनाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। वे स्वयं तुम्हारी ओर आकर्षित होने लगेंगे। एक फूल कभी मधुमक्खियों को निमंत्रण नहीं भेजता। वो केवल खिल जाता है और

8:30 मधुमक्खियां चली आती है। यही बोलने की परम कला है। तुम अपने भीतर खिल जाओ। तुम्हारे शब्दों में सुगंध आ जाएगी। फिर लोग केवल तुम्हारी बात नहीं मानेंगे। वे तुम्हारे पास बैठना भी पसंद करेंगे। वे तुम्हें सुनना चाहेंगे। वे तुम्हारे साथ रहना चाहेंगे क्योंकि तुम्हारी वाणी से उन्हें जीवन की सुगंध मिलने लगेगी और एक रहस्य लोगों को आदेश मत दो। आदेश अहंकार की भाषा है। निमंत्रण प्रेम की भाषा है। तुम कहते हो ऐसा करो। सामने वाले को चोट लगती है। तुम कहते हो यदि चाहो तो ऐसा करके देख सकते हो। सामने वाला खुल जाता है। मनुष्य स्वतंत्रता से प्रेम करता है। वह गुलामी

9:16 से घृणा करता है। इसलिए जब भी तुम किसी की स्वतंत्रता छीनने लगते हो, वह तुम्हारा विरोध करने लगता है। भले ही तुम उसका भला ही क्यों ना चाहते हो तुमने देखा होगा। कई बार माता-पिता बच्चों से कहते हैं कि यह मत करो। वहां मत जाओ। ऐसा मत बनो। और बच्चा वही सब करने लगता है। क्यों? क्योंकि उसे ऐसा लगता है कि उसकी स्वतंत्रता छीनी जा रही है और मनुष्य अपनी स्वतंत्रता के लिए लड़ने को तैयार हो जाता है। इसलिए यदि चाहते हो कि लोग तुम्हारी बात माने तो उन्हें स्वतंत्र छोड़ दो। अपनी बात कह दो फिर उसे हवा में छोड़ दो। बीज बो दो। उसके बाद खींचना मत। बीज को खींचोगे तो वह टूट जाएगा। उसे मिट्टी में

10:02 शांत रहने दो। एक दिन वही बीज अंकुर बनकर बाहर आ जाएगा। वाणी भी बीज है। आज तुमने किसी से कुछ कहा और वह नहीं माना। निराश मत हो। शायद तुम्हारे शब्द उसके भीतर कहीं बैठ गए हो। शायद समय आने पर वे जाग जाएं। सत्य को जल्दी नहीं होती। सत्य प्रतीक्षा करना जानता है। झूठ बेचैन होता है। झूठ तुरंत परिणाम चाहता है। लेकिन सत्य शांत है। वो जानता है कि उसका समय अवश्य आएगा। इसलिए बोलकर बेचैन मत हो जाओ कि मेरी बात मानी गई या नहीं। तुम अपना काम कर दो। बाकी जीवन पर छोड़ दो। और एक बात लोग तर्क से कम बदलते हैं। अनुभव से अधिक बदलते हैं। यदि तुम केवल तर्क देते रहोगे तो

10:50 सामने वाला भी तर्क देता रहेगा। और दो तर्कशील लोग अंत में केवल थक जाते हैं। कोई किसी की बात नहीं मानता। लेकिन यदि तुम्हारे शब्दों के पीछे अनुभव है तो बात बदल जाती है। एक बूढ़ा व्यक्ति एक युवक से कह रहा था कि क्रोध मत किया कर। युवक हंस पड़ा। उसे लगा कि यह भी साधारण सलाह है। तब बूढ़े ने अपना हाथ दिखाया। हाथ पर पुराने घावों के निशान थे। उसने कहा मैंने क्रोध में अपना घर जलाया है। अपने मित्र खोए हैं। अपने संबंध नष्ट किए हैं। इसलिए कह रहा हूं युवक पहली बार शांत हो गया। क्यों? क्योंकि अब शब्द नहीं बोल रहे थे। अनुभव बोल रहा था। मनुष्य अनुभव के सामने

11:37 झुक जाता है। इसलिए अपने अनुभव को बोलने दो। पुस्तकों को मत बोलने दो। उधार के विचारों को मत बोलने दो। जो तुमने जिया है। वही बोलो। कम बोलो। लेकिन सच्चा बोलो। फिर तुम्हारे शब्दों में एक ऐसी शक्ति आ जाएगी जिसे कोई शास्त्र नहीं सिखा सकता। और एक अत्यंत गहरा रहस्य कभी किसी की आत्मा पर अधिकार करने का प्रयास मत करना यह मत चाहना कि सब लोग तुम्हारी ही बात माने यह भी एक प्रकार का अहंकार है। तुम्हारी बात सत्य हो सकती है। फिर भी हर व्यक्ति को अपने अनुभव का अधिकार है। तुम मार्ग दिखा सकते हो। चलना उसे स्वयं पड़ेगा। तुम दीपक बन सकते हो। आंखें उसे स्वयं खोलनी

12:22 होंगी। इसलिए यह मत चाहो कि लोग तुम्हारे गुलाम बन जाए। यह चाहो कि लोग जाग जाएं। जागा हुआ मनुष्य तुम्हारी बात माने या ना माने इससे कोई अंतर नहीं पड़ता क्योंकि तब वो अपने सत्य से जी रहा होगा और जो अपने सत्य से जी रहा है वो तुम्हारा शत्रु नहीं है। वह तुम्हारा साथी है। दुनिया की सबसे सुंदर वाणी वही है जो दूसरे को स्वतंत्र बना दे। जो दूसरे को उसके भीतर ले जाएं। जो दूसरे को अपने पैरों पर खड़ा कर दे। ऐसी वाणी दुर्लभ है। अधिकतर लोग बोलकर दूसरों को बांधना चाहते हैं। ज्ञानी बोलकर दूसरों को मुक्त कर देता है। याद रखना तुम्हारी वाणी का मूल्य इस बात से नहीं आंका जाएगा कि कितने लोगों ने तुम्हारी बात मानी।

13:15 चेतना की एक छोटी सी लौ जल उठी। यदि एक भी मनुष्य तुम्हारी बात सुनकर थोड़ा अधिक जाग गया, थोड़ा अधिक प्रेमपूर्ण हो गया, थोड़ा अधिक शांत हो गया तो तुम्हारे शब्द सफल हो गए। और तब तुम्हें किसी को मनाने की आवश्यकता नहीं रहेगी। तुम्हारा होना ही तुम्हारी वाणी बन जाएगा। तुम्हारी आंखें बोलेंगी। तुम्हारा मौन बोलेगा। तुम्हारी उपस्थिति बोलेगी। और तब जो शब्द तुम्हारे होठों से निकलेंगे वे केवल आवाज नहीं होंगे। वे तुम्हारे संपूर्ण अस्तित्व की धड़कन होंगे और यही वह क्षण है जहां से सच्ची वाणी जन्म लेती है। जब तुम्हारे भीतर कुछ ऐसा होता है जो शब्दों से बड़ा है। तब शब्द केवल माध्यम रह जाते हैं। एक

14:01 बांसुरी को देखो। उसमें अपना कोई संगीत नहीं होता। वो भीतर से खाली होती है। इसीलिए संगीत उसमें उतर पाता है। मनुष्य भी जब अपने अहंकार से खाली हो जाता है। तब उसकी वाणी में संगीत आ जाता है। फिर वह केवल बोलता नहीं। उसके शब्दों में स्पर्श होता है। वे सामने वाले के भीतर पहुंच जाते हैं। और लोग उस व्यक्ति की बात मानते हैं जिसकी वाणी उन्हें छू लेती है। ध्यान रखना तुम किसी के मस्तिष्क को जीत सकते हो। लेकिन यदि उसके हृदय को नहीं छुआ तो तुम्हारी जीत व्यर्थ है। मस्तिष्क तर्क से प्रभावित हो जाता है। हृदय प्रेम से प्रभावित होता है और जीवन को अंततः हृदय ही चलाता है। इसीलिए तुमने देखा होगा कभी कोई साधारण किसान एक वाक्य बोल देता है और

14:47 वह तुम्हारे भीतर वर्षों तक गूंजता रहता है। और कभी कोई विद्वान घंटों बोलता है और उसके जाते ही तुम सब भूल जाते हो। अंतर कहां है? अंतर ज्ञान में नहीं है। अंतर प्रामाणिकता में जिसने जो कहा उसे जिया भी था। उसके शब्दों में उसका रक्त था। उसका अनुभव था। उसके आंसू थे। उसकी तपस्या थी। ऐसे शब्द कभी मरते नहीं। वे सुनने वाले के भीतर जीवित रहते। इसलिए यदि चाहते हो कि तुम्हारी बात का प्रभाव तो अपने जीवन को गहरा बनाओ। अपने भीतर उतरना सीखो। जो स्वयं के भीतर नहीं गया वह दूसरों तक भी नहीं पहुंच सकता। एक आदमी नदी किनारे

15:34 बैठा था। उसने एक संत से पूछा लोग मेरी बात नहीं सुनते। मुझे क्या करना चाहिए? संत ने पूछा क्या तुम स्वयं को सुनते हो? वो आदमी चौंक गया। उसने कहा इसका क्या अर्थ? संत ने कहा। दिनभर तुम बोलते रहते हो। लेकिन कभी चुप होकर स्वयं को सुना है। कभी देखा है कि तुम्हारे भीतर क्या चल रहा है। कभी समझा है कि तुम्हारे शब्द कहां से जन्म लेते हैं। कभी अपने क्रोध को देखा है। कभी अपनी ईर्ष्या को देखा है। कभी अपने भय को देखा है। कभी अपने अकेलेपन को देखा है। उस आदमी ने कहा नहीं। संत ने कहा तब फिर दूसरे तुम्हें क्यों सुनेंगे? तुम

16:20 स्वयं को नहीं सुनते और चाहते हो कि सारी दुनिया तुम्हें सुने। यह असंभव है जो स्वयं के प्रति बहरे। दुनिया भी उनके प्रति बहरी हो जाती है। इसलिए पहले अपने भीतर सुनो। अपने भीतर की आवाजों को पहचानो। अपने भीतर कितने लोग बैठे हैं। एक तुम्हें सम्मान चाहिए। एक तुम्हें प्रेम चाहिए। एक तुम्हें दूसरों से बड़ा बनना है। एक तुम्हें जीतना है। एक तुम्हें सब पर प्रभाव जमाना है। और इन सब की भीड़ में तुम्हारी असली आवाज दब जाती है। जब तक तुम्हारी असली आवाज नहीं जागेगी। तब तक तुम्हारी वाणी में कोई शक्ति नहीं आ सकती। क्योंकि शक्ति नकलीपन में नहीं होती। शक्ति केवल सत्य में होती है और सत्य को

17:08 अभिनय नहीं करना पड़ता। सूरज कभी घोषणा नहीं करता कि मैं उग रहा हूं। फूल कभी नहीं कहता कि मेरी सुगंध को पहचानो। चांद कभी नहीं कहता कि मुझे देखो। उनका होना ही पर्याप्त है। तुम्हारी वाणी भी एक दिन ऐसी हो सकती है। तुम्हें अपने शब्दों को सजाना नहीं पड़ेगा। तुम्हें चतुराई नहीं करनी पड़ेगी। तुम्हें लोगों को प्रभावित करने के उपाय नहीं खोजने पड़ेंगे। तुम्हारे भीतर जो होगा वही तुम्हारी आंखों से दिखाई देगा। वही तुम्हारी आवाज में सुनाई देगा। और तब एक अद्भुत घटना घटती है। लोग तुम्हारी बात मानने नहीं आते। लोग तुम्हारे पास स्वयं को समझने आते हैं। क्योंकि तुम्हारी उपस्थिति उन्हें अपने भीतर उतरने की प्रेरणा देती है। और एक बात

17:54 कभी किसी से उसकी भाषा में बात करना सीखो। हर मनुष्य अलग है। एक को प्रेम की भाषा समझ आती है। दूसरे को सम्मान की, तीसरे को तर्क की, चौथे को मौन की। यदि तुम हर व्यक्ति के सामने एक ही भाषा बोलोगे तो बहुत कम लोग तुम्हारी बात समझ पाएंगे। एक माली को देखो वो सभी पौधों को एक जैसा पानी नहीं देता। किसी को अधिक चाहिए। किसी को कम किसी को धूप चाहिए। किसी को छाया। इसीलिए उसका बगीचा खिल उठता है। जीवन भी ऐसा ही है। यदि तुम चाहते हो कि लोग तुम्हारी बात ग्रहण करें तो पहले यह समझो कि सामने वाला कौन है? उसकी पीड़ा

18:41 क्या है? उसकी खोज क्या है? उसकी कमजोरी क्या है? उसकी प्यास क्या है? जो मनुष्य दूसरों की प्यास पहचान लेता है उसकी वाणी अमृत बन जाती है। क्योंकि वह वही कहता है जिसकी दूसरे को आवश्यकता है। अधिकतर लोग वही कहते हैं जो वे कहना चाहते हैं। बहुत कम लोग वह कहते हैं जो सामने वाला सुनने के लिए तैयार है। और यही अंतर है। एक व्यक्ति बोलकर भी अकेला रह जाता है। दूसरा कुछ शब्द बोलकर हजारों हृदयों में स्थान बना लेता है। फिर धीरे-धीरे तुम यह भी समझने लगोगे कि बोलने की कला केवल शब्दों की कला नहीं है। यह देखने की कला है। यह सुनने की कला है। ये प्रतीक्षा की कला है। ये प्रेम की कला है। ये स्वयं को मिटा

19:27 देने की कला है। और जब यह सब तुम्हारे भीतर घट जाते हैं। तब तुम्हारी वाणी प्रार्थना बन जाती है। तब तुम किसी को बदलने नहीं जाते। तुम केवल अपने अनुभव का दीपक लेकर बैठ जाते हो। जो अंधेरे में है वह स्वयं तुम्हारे पास आ जाता है। जो प्यासा है वह स्वयं जल खोज लेता है। जो खोजी है वो स्वयं द्वार खटखटा देता है। तुम्हें किसी को खींचना नहीं पड़ता। तुम्हें किसी को मनाना नहीं पड़ता। तुम्हें किसी पर प्रभाव नहीं जमाना पड़ता। तुम केवल अपने भीतर के सत्य को जीवित रखते हो। और सत्य की एक विचित्र क्षमता है। वह बिना शोर किए भी दूर तक पहुंच जाता है। एक

20:14 दीपक यदि जल रहा हो तो उसे यह चिंता नहीं करनी पड़ती कि अंधकार कितना बड़ा है। उसका छोटा सा प्रकाश ही पर्याप्त है। उसी प्रकार तुम्हारे भीतर यदि चेतना का एक छोटा सा दीपक भी जल गया तो तुम्हारी वाणी में ऐसा आकर्षण आ जाएगा कि लोग केवल तुम्हारे शब्द नहीं सुनेंगे। वे तुम्हारे मौन को भी सुनने लगेंगे। वे तुम्हारे पास बैठकर भी कुछ पा लेंगे। वे तुम्हें देखकर भी कुछ समझने लगेंगे और तब पहली बार तुम्हें पता चलेगा कि बोलने की सबसे बड़ी कला यह नहीं कि सब तुम्हारी बात मान ले। सबसे बड़ी कला यह है कि तुम्हारी उपस्थिति में लोगों के भीतर उनकी अपनी बुद्धि जागने लगे। उनके भीतर उनका अपना प्रकाश जलने लगे। उनके भीतर उनका अपना साहस जन्म लेने लगे। क्योंकि जो दूसरों को अपने पैरों पर

21:01 खड़ा कर दे। उसकी वाणी में ही सच्चा आशीर्वाद है और जब किसी मनुष्य के भीतर उसका अपना प्रकाश जलने लगता है तब उसकी वाणी भी बदल जाती है। फिर वह शब्दों का व्यापारी नहीं रहता। वह अनुभव का स्रोत बन जाता है। उसके शब्द किसी को दबाते नहीं है। वे किसी को छोटा नहीं करते। वे किसी पर अधिकार नहीं जमाते। वे केवल भीतर सोई हुई चेतना को धीरे से स्पर्श करते हैं और यह स्पर्श ही परिवर्तन है। याद रखना मनुष्य को आदेश पसंद नहीं। मनुष्य को अपमान पसंद नहीं। मनुष्य को यह भी पसंद नहीं कि कोई उसे मूर्ख समझे। हर व्यक्ति अपने भीतर सम्मान चाहता है।

21:47 यहां तक कि जो गलत है वह भी सम्मान चाहता है। जो अज्ञानी है वह भी सम्मान चाहता है। जो क्रोधित है वह भी सम्मान चाहता है। यदि तुम किसी का सम्मान छीन लोगे तो वह तुम्हारी बात का विरोध करेगा। और यदि तुम उसे सम्मान दे दोगे तो वह धीरे-धीरे तुम्हारी बात सुनने लगेगा। एक राजा अपने मंत्री से परेशान था। मंत्री बहुत बुद्धिमान था। लेकिन कोई उसकी बात नहीं मानता था। राजा ने पूछा तुम्हारे पास ज्ञान भी है और अनुभव भी। फिर लोग तुम्हारी बात क्यों नहीं मानते? मंत्री ने कहा क्योंकि मैं लोगों को समझाता नहीं हूं। मैं उन्हें नीचा दिखा देता हूं। राजा ने पूछा। फिर उपाय क्या है? मंत्री ने कहा

22:36 आज से मैं किसी को गलत सिद्ध नहीं करूंगा। मैं केवल उसकी बात सुनूंगा। कुछ ही महीनों में लोग उसी मंत्री के पास सलाह लेने आने लगे। क्या बदल गया था? ज्ञान नहीं बदला था। शब्द भी नहीं बदले थे। केवल उसका भाव बदल गया था। और वाणी का सारा रहस्य भाव में है। तुम एक ही बात प्रेम से कहो तो वह अमृत बन जाती है। उसी बात को अहंकार से कहो तो वह जहर बन जाती है। शब्द वही रहते हैं लेकिन भाव बदल जाता है। और लोग शब्दों से अधिक भाव को सुनते हैं। तुम कभी किसी के पास बैठो और केवल प्रेम से उसकी आंखों में देखो। तुम्हें अनुभव होगा कि कुछ कहा नहीं गया। फिर भी बहुत कुछ कह दिया गया।

23:21 प्रेम की अपनी भाषा होती है। शांति की अपनी भाषा होती है। मौन की अपनी भाषा होती है। और जो इन भाषाओं को जान लेता है उसके लिए बोलना बहुत सरल हो जाता है क्योंकि तब उसे शब्दों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। तब उसकी पूरी उपस्थिति ही बोलने लगती है। और एक गहरा रहस्य समझ लो। लोग तुम्हारी बात तब भी नहीं मानते जब तुम बहुत जल्दी में होते हो। जल्दी बेचैनी है। बेचैनी डर है। डर यह है कि यदि सामने वाले ने मेरी बात नहीं मानी तो कुछ खो जाएगा। लेकिन जिसने सत्य को जाना है वो जल्दी नहीं करता। वो धैर्य रखता है। वो जानता है कि बीज को वृक्ष बनने में समय लगता है। कली को फूल बनने में समय लगता है। रात को सुबह बनने

24:08 में समय लगता है। तो फिर मनुष्य के भीतर परिवर्तन एक क्षण में कैसे हो जाएगा? धैर्य रखो। अपनी बात कहो। फिर शांत हो जाओ। कभी-कभी वर्षों बाद तुम्हारे शब्द किसी के भीतर खिलते हैं और तब तुम्हें पता भी नहीं चलता कि तुम्हारी कही हुई बात किसी के जीवन का मार्ग बदल गई। इसलिए फल की चिंता मत करो। बोलने वाला फल की चिंता करता है। ज्ञानी केवल बीज बोता है। और एक बात कभी उस विषय पर मत बोलो जिसमें तुम्हारा हृदय नहीं है। मनुष्य की आवाज तुरंत बता देती है कि उसके भीतर रस है या नहीं। तुम्हें स्वयं किसी बात में आनंद नहीं है और तुम उसके बारे में बोल रहे हो। तुम्हारी आवाज मृत लगेगी। तुम्हारे शब्द बोझ लगेंगे।

24:55 लेकिन यदि तुम्हारा हृदय किसी अनुभव से भरा है तो तुम्हारी साधारण सी बात भी लोगों को छू जाएगी। एक माएं अपने बच्चे से कहती है कि सावधान रहना। सिर्फ चार शब्द है लेकिन उन चार शब्दों में प्रेम का पूरा आकाश छिपा होता है। इसलिए वे सीधे हृदय में उतर जाते हैं। एक अजनबी वही शब्द कह दे तो उनका प्रभाव अलग होगा। शब्द नहीं बदलते। ऊर्जा बदल जाती है। और बोलने की कला वास्तव में ऊर्जा की कला है। तुम्हारे भीतर जितनी स्पष्टता होगी उतनी स्पष्ट तुम्हारी वाणी होगी। तुम्हारे भीतर जितना प्रेम होगा उतनी मधुर तुम्हारी वाणी होगी तुम्हारे भीतर जितनी शांति होगी उतनी प्रभावशाली तुम्हारी वाणी होगी और

25:42 तुम्हारे भीतर जितना सत्य होगा उतना ही वजन तुम्हारे शब्दों में होगा इसलिए बाहर शब्दों को मत सुधारो भीतर के मनुष्य को सुधारो जड़ को सींचो पत्तियों पर रंग मत पोतो आज अधिकांश लोग यही कर रहे हैं वे बोलने की कला सीखना चाहते हैं वे प्रभाव डालना चाहते हैं। वे लोगों को अपने वश में करना चाहते लेकिन वे स्वयं को जानना नहीं चाहते और जो स्वयं को नहीं जानता वह चाहे कितना भी अच्छा वक्ता क्यों ना बन जाए उसकी वाणी में गहराई नहीं आएगी। गहराई आत्मज्ञान से आती है। एक कुआं जितना गहरा होता है, उतना ही ठंडा जल देता है। एक मनुष्य जितना अपने भीतर उतरा होता है, उसकी वाणी उतनी ही शीतल होती है। तुमने

26:28 देखा होगा कुछ लोगों के पास बैठकर मन शांत हो जाता है। वे बहुत कम बोलते हैं। लेकिन उनके शब्दों में एक ठंडक होती है। जैसे गर्म दोपहर में अचानक किसी वृक्ष की छाया मिल गई हो। और कुछ लोग बहुत बोलते हैं लेकिन उनके पास बैठते ही बेचैनी बढ़ने लगती है क्योंकि उनके भीतर ही बेचैनी भरी है। वे जो हैं वही बांटते हैं। कोई भी व्यक्ति अपने पास जो नहीं है वह दे नहीं सकता। यदि तुम्हारे भीतर प्रेम नहीं है तो तुम्हारे शब्द प्रेम नहीं दे सकते। यदि तुम्हारे भीतर शांति नहीं है तो तुम्हारी वाणी शांति नहीं दे सकती। यदि तुम्हारे भीतर आनंद नहीं है तो तुम्हारे शब्द केवल सूचना देंगे परिवर्तन नहीं इसलिए अपने

27:16 भीतर खजाना इकट्ठा करो ध्यान का मौन का प्रेम का सत्य का और एक दिन तुम पाओगे कि तुम्हें लोगों को प्रभावित करने की कोई आवश्यकता नहीं रही। तुम्हारी साधारण सी उपस्थिति ही पर्याप्त है। तुम्हारे दो शब्द भी बहुत होंगे। तुम्हारी मुस्कान भी बहुत होगी। तुम्हारा मौन भी बहुत होगा। और तब लोग केवल तुम्हारी बात नहीं मानेंगे। वे तुम्हारे पास बैठकर अपने भीतर की आवाज सुनने लगेंगे। और इससे बड़ा चमत्कार मनुष्य के जीवन में दूसरा कोई नहीं और शायद तुमने इस बात पर कभी ध्यान नहीं दिया। लोग उस व्यक्ति की बात जल्दी मान लेते हैं जो स्वयं को सिद्ध करने में नहीं लगा है। जो हर समय यह सिद्ध करना चाहता है कि मैं सही हूं। मैं ज्ञानी हूं। मैं अधिक

28:03 समझदार हूं। उसके शब्द भारी हो जाते हैं। उनमें सहजता नहीं रहती। वे पत्थर की तरह गिरते हैं। और पत्थर से कोई फूल नहीं खिलता। वाणी में फूल खिलाने हैं तो उसमें विनम्रता चाहिए। विनम्रता का अर्थ यह नहीं कि तुम स्वयं को छोटा समझो। विनम्रता का अर्थ है कि तुम सत्य के सामने छोटे होने को तैयार हो। क्योंकि सत्य इतना विराट है कि उसके सामने सब छोटे हैं। एक बूढ़ा व्यक्ति गांव में रहता था। लोग उसके पास सलाह लेने आते थे। एक युवक ने उससे पूछा लोग तुम्हारी इतनी इज्जत क्यों करते हैं? बूढ़े ने कहा क्योंकि मैं किसी को यह नहीं कहता कि मैं तुमसे अधिक जानता हूं। मैं केवल इतना कहता हूं कि आओ साथ मिलकर देखें कि सत्य क्या है? युवक ने

28:50 पूछा। क्या इतना ही काफी है? बूढ़ा हंसा। उसने कहा मनुष्य को गुरु नहीं चाहिए। मनुष्य को साथी चाहिए। जिस दिन तुम्हारी वाणी में साथ होने का भाव आ जाएगा लोग तुम्हारी बात सुनने लगेंगे क्योंकि तब उन्हें ऐसा नहीं लगेगा कि तुम ऊपर खड़े हो और वे नीचे खड़े हैं। उन्हें ऐसा लगेगा कि तुम उनके साथ चल रहे हो और साथ चलने वाले की बात मानना आसान है। ऊपर से आदेश देने वाले की बात मानना कठिन है। एक और गहरी बात समझो। मनुष्य की आत्मा पर सबसे अधिक प्रभाव शब्दों का नहीं पड़ता। प्रभाव पड़ता है तुम्हारे जीवन की संगति का यदि तुम्हारे शब्द और तुम्हारा जीवन एक है तो तुम्हारी वाणी में अद्भुत शक्ति आ जाती है

29:38 लेकिन यदि तुम कुछ बोलते हो और जीते कुछ और हो तो तुम्हारे भीतर विभाजन पैदा हो जाता है और विभाजित व्यक्ति की वाणी भी विभाजित हो जाती है। वह स्वयं ही दो हिस्सों में बैठा हुआ है। उसके शब्द एक दिशा में जा रहे हैं। उसका जीवन दूसरी दिशा में जा रहा है। ऐसा व्यक्ति चाहे लाखों शब्द बोल ले उसके शब्दों में आग नहीं होगी क्योंकि आग एकता से पैदा होती है। जब तुम जो सोचते हो वही बोलते हो जो बोलते हो वही जीते हो और जो जीते हो उसी को प्रेम करते हो तब तुम्हारे भीतर एक अखंडता जन्म लेती है और अखंड मनुष्य की वाणी को संसार सुनता है क्योंकि उसमें कोई टूटन नहीं होती तुमने देखा होगा कभी-कभी कोई साधारण वृद्ध दो वाक्य कह देता है और

30:25 तुम्हारी आंखें नम हो जाती है क्यों क्योंकि वह अपने शब्दों को जी रहा होता है उसने जो कहा उसे पहले अपने जीवन में उतारा है। इसलिए उसके शब्दों में अनुभव की गर्मी होती है और अनुभव की गर्मी बर्फ जैसे हृदय को भी पिघला देती है। एक और बात बहुत लोग इसलिए असफल होते हैं क्योंकि वे सुनते नहीं। वे प्रतीक्षा करते हैं। सामने वाला बोल रहा है। लेकिन वे भीतर अपनी बात तैयार कर रहे हैं। वे सुन नहीं रहे। वे केवल अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यह सुनना नहीं है। यह केवल शिष्टता का अभिनय है। सुनना एक ध्यान है। जब कोई बोल रहा हो तो इतने शांत हो जाओ कि भीतर एक भी आवाज ना बचे। सिर्फ सुनो पूरा सुनो। बिना

31:13 निर्णय के सुनो। बिना निष्कर्ष के सुनो। तब तुम पहली बार मनुष्य को समझ पाओगे। और जो मनुष्य को समझ लेता है उसकी वाणी अपने आप प्रभावशाली हो जाती है क्योंकि वह हवा में तीर नहीं चला रहा। वो ठीक उसी स्थान पर बोल रहा है जहां सामने वाले का हृदय है। एक वैद्य यदि रोग को ना समझे तो औषधि कैसे देगा? और यदि रोग को ठीक से समझ लें तो थोड़ी सी औषधि भी काम कर जाती है। वाणी भी औषधि है। लेकिन पहले मनुष्य को समझना पड़ता है और समझने के लिए सुनना पड़ता है। याद रखना जिस दिन तुमने सचमुच सुनना सीख लिया उसी दिन तुम्हारी बोलने की कला का जन्म हो गया। फिर तुम बोलोगे कम। लेकिन हर

32:01 शब्द सार्थक होगा। फिर तुम शब्दों को फेंकोगे नहीं। तुम उन्हें चुनोगे। जैसे कोई माली फूल चुनता है। जैसे कोई संगीतकार स्वर चुनता है। जैसे कोई चित्रकार रंग चुनता है। और तब तुम्हारे शब्दों में एक लय आ जाएगी। एक संगीत आ जाएगा। एक शांति आ जाएगी और लोग केवल अर्थ नहीं सुनेंगे। वे तुम्हारे शब्दों के बीच का मौन भी सुनेंगे। हां शब्दों के बीच भी मौन होता है और कभी-कभी वही सबसे अधिक कहता है क्योंकि सत्य को हमेशा शब्दों की आवश्यकता नहीं होती यदि तुम्हारी आंखें शांत हैं। यदि तुम्हारा चेहरा प्रेम से भरा है। यदि तुम्हारा हृदय निर्मल है तो तुम्हारे

32:47 शब्दों के पहले ही तुम्हारा संदेश पहुंच चुका होगा। और तब तुम अनुभव करोगे कि बोलने की कला का अंतिम रहस्य शब्द नहीं है। अंतिम रहस्य है तुम्हारा होना। तुम जैसे हो वैसे ही तुम्हारे शब्द है। क्रोधित मनुष्य के शब्द क्रोधित होंगे। भयभीत मनुष्य के शब्द डरे हुए होंगे। लोभी मनुष्य के शब्दों में भी लोभ छिपा होगा। और प्रेमपूर्ण मनुष्य के शब्दों में प्रेम की सुगंध होगी। इसलिए यदि सचमुच चाहते हो कि लोग तुम्हारी बात माने तो शब्दों को बदलने में अपनी ऊर्जा मत खो। अपने होने को बदलो। भीतर दीपक जलाओ। भीतर शांति पैदा करो। भीतर प्रेम को जन्म दो। भीतर इतनी स्पष्टता लाओ कि तुम्हें स्वयं पर अभिनय न

33:32 करना पड़े। और जिस दिन अभिनय गिर गया उसी दिन तुम्हारी वाणी में पहली बार प्राण आ जाएंगे। तब तुम किसी सभा में खड़े होकर बोलो या किसी वृक्ष के नीचे बैठकर तुम दो शब्द कहो या बिल्कुल मौन रहो। तुम्हारी उपस्थिति ही संदेश बन जाएगी। और मनुष्य अंततः शब्दों से नहीं बदलता। मनुष्य मनुष्य की उपस्थिति से बदलता है क्योंकि चेतना संक्रामक है। एक जागा हुआ मनुष्य अनजाने में भी दूसरों को जगा देता है। एक शांत मनुष्य अनजाने में भी दूसरों को शांत कर देता है। एक प्रेम पूर्ण मनुष्य अनजाने में भी दूसरों के भीतर प्रेम की संभावना जगा देता है। यही सच्ची वाणी है। यही बोलने की कला है। और जो इस कला को जान लेता है, उसे फिर लोगों को मनाने की चिंता

34:20 नहीं रहती। क्योंकि वह जान लेता है कि शब्द केवल नाव हैं। असली यात्रा तो चेतना से चेतना तक होती है। और चेतना से चेतना तक की इस यात्रा में एक बात कभी मत भूलना। तुम किसी को अपने शब्दों से जीत सकते हो। लेकिन उसे अपने मौन से ही अपना बना सकते हो। जीत और अपनापन अलग बातें हैं। जीत में दूसरा हारता है। अपनापन में दोनों खिलते हैं। इसलिए यदि तुम्हारी इच्छा यह है कि लोग तुम्हारी बात माने तो पहले यह इच्छा छोड़ दो कि तुम्हें किसी को हराना है। मनुष्य को हराकर कभी उसके हृदय में प्रवेश नहीं किया जा सकता। हृदय के द्वार प्रेम से खुलते हैं। एक छोटा बच्चा अपनी मां की बात क्यों मान लेता है? क्या वो तर्क

35:06 समझता है? क्या वो शास्त्र समझता है? क्या वह सिद्धांत समझता है? नहीं। वह केवल प्रेम को समझता है। उसे अनुभव होता है कि यह स्त्री मुझे चोट नहीं पहुंचाना चाहती। यही विश्वास उसे समर्पित कर देता है। जीवन में भी यही नियम है। जब लोगों को अनुभव होता है कि तुम्हारे भीतर उनके लिए शुभकामना है तब वे धीरे-धीरे तुम्हारी बात सुनने लगते हैं और जब उन्हें लगता है कि तुम उन्हें बदलकर अपने अनुसार बनाना चाहते हो तब वे भीतर से बंद हो जाते हैं। मनुष्य कोई वस्तु नहीं है जिसे तुम्हारी इच्छा के अनुसार ढाला जा सके। हर व्यक्ति अपने भीतर एक बीज लेकर आया है। किसी के भीतर संगीत का बीज है। किसी के भीतर ध्यान का, किसी

35:52 के भीतर प्रेम का, किसी के भीतर करुणा का। तुम्हारा काम केवल उसे उसके बीच की याद दिलाना है। यही सच्ची वाणी है। तुम किसी को अपनी छाया मत बनाओ। उसे स्वयं बनने में सहायता दो। और तब तुम्हारी बात में आशीर्वाद होगा। एक और बात बहुत लोग बोलते समय शब्दों पर ध्यान देते हैं लेकिन ज्ञानी ऊर्जा पर ध्यान देता है। यदि तुम्हारे भीतर क्रोध चल रहा है और तुम प्रेम की बातें कर रहे हो तो सामने वाला क्रोध को ही महसूस करेगा। यदि तुम्हारे भीतर भय है और तुम साहस की बातें कर रहे हो तो सामने वाला तुम्हारे भय को महसूस करेगा। यदि तुम्हारे भीतर लालच है और तुम

36:39 त्याग की बातें कर रहे हो तो तुम्हारे शब्द खोखले लगेंगे। मनुष्य की आत्मा बहुत संवेदनशील है। वह उन बातों को भी पकड़ लेती है जो कही नहीं गई। इसीलिए कई बार तुम किसी व्यक्ति से पहली बार मिलते हो और तुरंत अनुभव कर लेते हो कि यह व्यक्ति भरोसे योग्य है या नहीं। उसने कुछ कहा नहीं। लेकिन उसका होना ही बोल रहा है। तुम्हारा होना भी हर क्षण बोल रहा है। तुम मौन हो तब भी। तुम अकेले हो तब भी तुम भीड़ में हो तब भी और यदि तुम्हारा होना सुंदर है तो तुम्हारी वाणी अपने आप सुंदर हो जाएगी इसलिए बोलने की कला को शब्दों तक सीमित मत करो यह तो पूरे जीवन की कला है कैसे चलना कैसे देखना कैसे सुनना कैसे मौन

37:26 होना कैसे क्रोध को पिघलाना कैसे प्रेम को जन्म देना कैसे अहंकार को हल्का करना करना। यह सब मिलकर तुम्हारी वाणी बनते हैं। एक और रहस्य कभी किसी से तुरंत सहमति की अपेक्षा मत करना। मनुष्य को समय दो। क्योंकि हर व्यक्ति अपनी यात्रा पर है। जो बात तुम्हें आज समझ में आ रही है। हो सकता है वह दूसरे को 5 वर्ष बाद समझ आए। और जो बात दूसरे को आज समझ में आ रही है। हो सकता है वह तुम्हें अभी तक समझ में ना आई हो। इसलिए विनम्र रहो। सत्य का मार्ग अनंत है। यहां कोई अंतिम ज्ञानी नहीं है। हर व्यक्ति सीख रहा है। हर व्यक्ति बढ़ रहा है। हर व्यक्ति खोज में है। और जब तुम इस

38:12 भाव से बोलोगे तो तुम्हारी वाणी में कठोरता नहीं रहेगी। उसमें करुणा आ जाएगी। और करुणा से भरे हुए शब्दों का प्रभाव बहुत गहरा होता है। क्योंकि वे किसी को काटते नहीं। वे किसी को चोट नहीं देते। वे धीरे से उसके भीतर प्रवेश करते हैं। जैसे सुबह की पहली किरण अंधेरे में उतरती है। जैसे शीतल हवा गर्म शरीर को छू लेती है। जैसे किसी ने थके हुए यात्री को जल पिला दिया हो। ऐसी वाणी दुर्लभ है। और इसका जन्म तब होता है जब तुम स्वयं को जानने लगते हो। अपने भीतर देखो। तुम इतनी जल्दी में क्यों रहते हो? तुम लोगों से अपनी बात क्यों मनवाना चाहते हो? तुम्हें इतना महत्व क्यों चाहिए? तुम चाहते क्यों हो कि लोग तुम्हें सही माने गहराई में जाओ

38:59 तुम्हें एक आश्चर्य दिखाई देगा तुम पाओगे कि तुम्हारे भीतर स्वीकृति की भूख है। तुम चाहते हो कि लोग तुम्हें स्वीकार कर लें। तुम चाहते हो कि लोग तुम्हारी प्रशंसा करें। तुम चाहते हो कि लोग कहें कि तुम बहुत बुद्धिमान हो। और इसी चाह से तुम्हारी वाणी दूषित हो जाती है। क्योंकि तब तुम सत्य नहीं बोल रहे होते। तुम प्रशंसा मांग रहे होते हो। याद रखना जो व्यक्ति प्रशंसा मांग रहा है वह कभी स्वतंत्र नहीं बोल सकता। उसके शब्दों में डर होगा। वो लोगों को खुश करने की कोशिश करेगा। वो वही बोलेगा जो सुनने में अच्छा लगे। लेकिन जो व्यक्ति भीतर से संतुष्ट है वह स्वतंत्र होता है। वह सत्य बोल सकता है। वह आवश्यक होने पर मौन भी रह सकता है।

39:47 उसे भीड़ की स्वीकृति नहीं चाहिए। और यही स्वतंत्रता उसकी वाणी को प्रभावशाली बना देती है क्योंकि उसके शब्द किसी उद्देश्य से नहीं निकलते। वे स्वाभाविक रूप से बहते हैं। जैसे नदी बहती है। नदी यह नहीं सोचती कि कौन उसका जल पिएगा। वो बस बहती है। फूल यह नहीं सोचता कि कौन उसकी सुगंध की प्रशंसा करेगा। वो बस खिलता है। सूरज यह नहीं सोचता कि कौन उसकी रोशनी का धन्यवाद करेगा। वह बस चमकता है। जीवन का सारा सौंदर्य इसी सहजता में है और जिस दिन तुम्हारी वाणी सहज हो गई उस दिन तुम्हारे शब्दों में भी एक नदी बहने लगेगी। लोग उसे सुनेंगे। उसमें स्नान करेंगे। उससे ताजगी पाएंगे।

40:34 और तब तुम समझोगे कि बोलने की सबसे बड़ी कला यह नहीं कि सब तुम्हारी बात मान लें। सबसे बड़ी कला यह है कि तुम्हारे शब्द लोगों को उनके भीतर ले जाएं। वे उन्हें थोड़ा अधिक जागृत कर दे, थोड़ा अधिक प्रेमपूर्ण बना दे, थोड़ा अधिक शांत बना दे और यदि तुम्हारे कुछ शब्द भी किसी मनुष्य को उसके भीतर के प्रकाश की याद दिला दे तो समझना कि तुम्हारी वाणी धन्य हो गई। क्योंकि संसार को चतुर्वक्ताओं की उतनी आवश्यकता नहीं है। संसार को उन लोगों की आवश्यकता है जिनकी वाणी में जीवन धड़कता हो। जिनकी आंखों में शांति हो। जिनके हृदय में प्रेम हो। जिनके मौन में संगीत हो और जिनके शब्दों में ऐसा स्पर्श हो कि सुनने वाला केवल सुनकर ही थोड़ा

41:20 बदलने लगे। यही तो चमत्कार है। तुम किसी मनुष्य के भीतर प्रवेश नहीं कर सकते। तुम उसके विचारों को पकड़ नहीं सकते। तुम उसके जीवन को अपने हाथों से बदल नहीं सकते। फिर भी कुछ लोग बदल जाते हैं। कैसे? वे शब्दों से नहीं बदलते। वे तुम्हारी चेतना की गर्मी से बदलते हैं। जैसे सर्दियों की सुबह में सूर्य की किरण पड़ते ही बर्फ पिघलने लगती है। सूरज बर्फ को आदेश नहीं देता। सूरज बर्फ से संघर्ष नहीं करता। वह केवल चमकता है और बर्फ अपने आप पिघल जाती है। यही बोलने की सर्वोच्च कला है। तुम चमको, तुम जलो, तुम जागो और जो सोए हुए हैं उनमें भी जागने की इच्छा पैदा हो

42:07 जाएगी। लेकिन मनुष्य एक बड़ी भूल करता है। वह बोलने की कला को प्रभाव की कला बना लेता है। वह चाहता है कि लोग उसे माने। उसकी प्रशंसा करें। उसके अनुसार चले और यहीं से सारी सुंदरता समाप्त हो जाती है क्योंकि अब उसके शब्द प्रेम से नहीं निकल रहे। अब वेत्वाकांक्षा से निकल रहे हैं। हमेशा हिंसक होती है। वो दूसरे पर चढ़ना चाहती है। प्रेम कभी नहीं चढ़ता। प्रेम हाथ पकड़ता है। कहती है कि मुझे ऊपर जाना है। प्रेम कहता है कि आओ साथ चलें। और लोग हमेशा उसी के साथ चलते हैं जो उन्हें साथ लेकर चलता है। एक बार एक व्यक्ति एक साधु के पास आया। उसने कहा मैं जहां भी जाता हूं लोग मेरी बात काट देते कोई मेरी इज्जत

42:55 नहीं करता साधु ने पूछा जब तुम बोलते हो तो तुम्हारी सबसे बड़ी इच्छा क्या होती है उसने कहा मैं चाहता हूं कि लोग समझ जाएं कि मैं सही हूं साधु हंसा उसने कहा यही भूल हो गई तुम सत्य नहीं खोज रहे तुम अपनी विजय खोज रहे हो सत्य और विजय साथ-साथ नहीं चल सकते जिसे सत्य चाहिए चाहिए। उसे हारने के लिए भी तैयार रहना पड़ता है क्योंकि कई बार दूसरा सही होता है। कई बार जीवन तुम्हारी कल्पना से बड़ा होता है। कई बार एक बच्चा भी तुम्हें ऐसी बात सिखा सकता है जो तुमने कभी ना जानी हो। जिस दिन तुमने सीखना बंद कर दिया। उसी दिन तुम्हारी वाणी बूढ़ी हो गई। और जिस दिन तुमने सीखते रहना स्वीकार कर लिया। उसी

43:41 दिन तुम्हारी वाणी जीवित हो गई। जीवित वाणी क्या है? जीवित वाणी वह है जिसमें खोज है। जिसमें जिज्ञासा है जिसमें विनम्रता है। जिसमें आश्चर्य है जो हर क्षण नया होने को तैयार है। ऐसे व्यक्ति के शब्दों में ताजगी होती है। तुम उसे सुनते हो और तुम्हें लगता है जैसे कोई खिड़की खुल गई। जैसे बंद कमरे में अचानक हवा आ गई। जैसे कहीं दूर कोई नदी बह रही हो। और कुछ लोगों को सुनते ही थकान होने लगती है। क्यों? क्योंकि उनके शब्द मृत है। वे वर्षों पुराने निष्कर्षों को ढो रहे हैं। वे जी नहीं रहे। वे केवल दोहरा रहे हैं। याद रखना जो केवल दोहराता है। उसकी वाणी में शक्ति नहीं रहती। जो खोजता

44:29 है उसकी वाणी में जीवन होता है। और जीवन को लोग सुनना चाहते हैं। एक और बात मनुष्य के भीतर सबसे बड़ी प्यास है देखे जाने की। हर व्यक्ति चाहता है कि कोई उसे समझे। कोई उसे बिना निर्णय के सुने, कोई उसके भीतर की पीड़ा को महसूस करें और जो यह कला जान गया उसकी वाणी में जादू आ गया। तुम किसी से बात करते समय उसे पूरा ध्यान दो। ऐसे सुनो जैसे संसार में उस समय केवल वही व्यक्ति है। ऐसे देखो जैसे वह कोई साधारण मनुष्य नहीं बल्कि एक रहस्य है। तब कुछ अद्भुत होगा। उसका हृदय खुल जाएगा। और खुले हुए हृदय में कही गई छोटी सी बात भी बहुत गहरे उतर जाती है। तुम लोगों को अपनी बात मनवाना चाहते हो। मैं कहता हूं लोगों

45:18 को महसूस करवाओ कि वे महत्वपूर्ण है। बाकी सब अपने आप हो जाएगा क्योंकि मनुष्य शब्दों से अधिक प्रेम की भूख रखता है। एक व्यक्ति दिनभर लोगों को सलाह देता है। दूसरा दिनभर लोगों को समझता है। शाम तक पहला अकेला रह जाता है। दूसरे के पास लोग स्वयं आकर बैठने लगते हैं। क्यों? क्योंकि सलाह देने वाला ऊपर खड़ा था। समझने वाला साथ खड़ा था और साथ होना ही संबंध है। याद रखो वाणी की जड़ संबंध में है। जहां संबंध नहीं वहां शब्द केवल शोर हैं। जहां संबंध है वहां मौन भी संवाद बन जाता है। और धीरे-धीरे तुम यह भी समझने लगोगे कि बोलने की कला का अंतिम रहस्य सुनाई देने में

46:03 नहीं है। अंतिम रहस्य उपस्थित होने में। तुम पूरे हो। तुम जागे हुए हो। तुम इस क्षण में हो। तुम्हारा मन कहीं और नहीं भाग रहा। तुम किसी को बदलने की जल्दी में नहीं हो। तुम किसी से कुछ लेने नहीं आए। तुम केवल उपस्थित हो और उपस्थिति में एक चुंबक है। लोग उसके पास खींचे चले आते हैं। तुमने कभी किसी पर्वत को देखा है। वह कुछ नहीं कहता। फिर भी लोग उसे देखने जाते हैं। तुमने समुद्र को देखा है। वो किसी को निमंत्रण नहीं भेजता। फिर भी लोग उसके किनारे बैठना चाहते हैं। क्यों? क्योंकि मौन की भी एक भाषा होती है। उपस्थिति की भी एक शक्ति होती है। और मनुष्य का अंतिम

46:50 विकास वहीं है जहां शब्द धीरे-धीरे कम होने लगते हैं और अस्तित्व बोलने लगता है। तब तुम्हें लोगों को मनाने की चिंता नहीं रहती। तब तुम केवल अपने सत्य में जीते हो। और जो तुम्हारे पास आने योग्य हैं वे आ जाते हैं। जो सुनने योग्य हैं वे सुन लेते हैं जो तैयार हैं उनके भीतर परिवर्तन होने लगता है। और जो अभी तैयार नहीं है उन्हें भी तुम प्रेम देते हो क्योंकि तुम्हारा काम बदलना नहीं। तुम्हारा काम जलना है। दीपक का काम रास्ता पकड़ कर लोगों को घसीटना नहीं है। दीपक का काम केवल जलना है। और जो अंधेरे से थक गए हैं वे स्वयं उसके पास आ जाते हैं। इसलिए अंत में मैं तुमसे केवल इतना कहूंगा यदि चाहते हो कि

47:38 तुम्हारी बात में प्रभाव हो तो शब्दों को मत साधो। स्वयं को साधो। यदि चाहते हो कि लोग तुम्हें सुने तो पहले जीवन को सुनो। यदि चाहते हो कि लोग तुम्हें माने तो पहले अपने भीतर सत्य को मानो यदि चाहते हो कि तुम्हारे शब्दों में आग हो तो पहले अपने भीतर चेतना का दीप जलाओ और जिस दिन तुम्हारे भीतर यह दीप जल गया उस दिन तुम्हारी आवाज साधारण नहीं रहेगी तुम्हारे शब्दों में तुम्हारा हृदय धड़केगा तुम्हारे मौन में संगीत होगा तुम्हारी आंखों में करुणा होगी तुम्हारी उपस्थिति में शांति होगी और तब लोग केवल तुम्हारी बात नहीं मानेंगे। वे तुम्हारे पास बैठकर अपने भीतर छिपे हुए उस मनुष्य को पहचानने

48:23 लगेंगे जो अब तक सोया हुआ था। और किसी मनुष्य को उसकी अपनी चेतना से मिला देना। इससे बड़ी वाणी, इससे बड़ी कला और इससे बड़ा आशीर्वाद जीवन में दूसरा कोई नहीं।

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