0:01 [संगीत] हम दुनिया में दो तरीके की प्रोग्रेस करते हैं और जहां पे कंपटीशन होता है वहां पे कभी भी कैपिटलिज्म नहीं होता। हमारे भारत में सरकारी नौकरी का बहुत ज्यादा क्रेज है। पैसा जो बनता है इसी प्रोग्रेस में बनता है। और हम सब भागते हैं किस में? हॉरिजॉन्टल प्रोग्रेस में। क्योंकि ये जितनी भी डिफरेंट कंपनीज़ होती हैं वो
0:47 कंपटीशन से हमेशा दूर रहती हैं। जब ये बड़ी-बड़ी कंपनीज़ स्टार्ट हुई थी ना Google, Apple, Tesla इनका कोई कॉम्पिटिट नहीं था। अगर आप अपने बिजनेस में अपनी मर्जी से प्राइस नहीं घटा बढ़ा पा रहे हो तो समझ लीजिए कि आप कॉम्पिटिट का शिकार हो। अगर आप कोई ऐसा बिजनेस करते हैं या फिर जॉब करते हैं या फिर कोई ऐसी पढ़ाई कर रहे हैं जिसे और लोग भी कर रहे हैं तो उसमें कंपटीशन है। आपके जैसा प्रोडक्ट कोई और बना ही नहीं रहा है। जब बनाएगा ही नहीं तो कस्टमर आपके पास आएंगे। आपको भी यही लगता है कि सक्सेस सिर्फ किस्मत वालों को मिलती है। किस्मत के भरोसे बैठे या फिर हम मेहनत करेंगे। देखो बिजनेस वर्ल्ड में पैरटो प्रिंसिपल चलता है। सोचो आपको एक ऐसा सीक्रेट मिल जाए जो किसी को नहीं पता और उसी सीक्रेट के द्वारा आप एक बिजनेस बनाते हो और आप एक बिलियन डॉलर की कंपनी खड़ा कर देते हो। [संगीत] क्या यह पॉसिबल है? हां, यह पॉसिबल है। आपने एक बात अक्सर सुनी होगी। अगर आपको बहुत बड़ा बनना है,
1:33 तो आपको बहुत हार्ड वर्क करना होगा। बहुत मेहनत करनी होगी। लेकिन यह सच नहीं है दोस्तों। जब आप अपने बिजनेस को स्टार्ट करते हैं, आपकी स्टार्टिंग ही बता देती है कि आपका बिजनेस कितना लंबा जाएगा। आप लोगों ने दुनिया भर में माफिया गैंग देखी होंगी, [संगीत] लेकिन आपने एक ऐसी गैंग नहीं देखी होगी जो फेमस है अपनी सक्सेस को लेकर। बिजनेस और स्टार्टअप में फर्क यह होता है कि बिजनेस [संगीत] में लोग सिर्फ सैलरी के लिए काम करते हैं। आपका प्रोडक्ट कितना भी अच्छा क्यों ना हो, लोग उसे नहीं खरीदेंगे। जब कोई भी [संगीत] टेक्नोलॉजी या मशीन बनाई जाती है यह सोच कर नहीं बनाई जाती तो वो ह्यूमंस को रिप्लेस करेगी वो यह सोच कर बनाई जाती है कि वो ह्यूमंस की उसमें हेल्प करेगी और उसमें इंप्रूव [संगीत] करेगी। आप लोग अपने बिजनेस को स्टार्ट करो तो अपने आप से ये तीन सवाल जरूर पूछना जो भी फाउंडर्स को इंपॉसिबल लगता है वो उसे पॉसिबल कर देते हैं। हाय मेरा नाम है रथ ग्रेव्स और मैं ही इस
2:19 मूवी का होस्ट हूं। मैं आपको विस्तार से हर एक चीज बताऊंगा और आपको ध्यान से सुनना होगा एक-एक कांसेप्ट को और मेरा यकीन कीजिए आपका एक सेकंड भी बर्बाद नहीं जाएगा। ऐसा कांसेप्ट आपको पूरे YouTube पे कभी भी नहीं मिलने वाला। ये फर्स्ट वीडियो होगा आपकी लाइफ का नंबर वन वीडियो। फ्यूचर कभी भी अपने आप नहीं बनता। फ्यूचर को बनाया जाता है और दुनिया उन लोगों को याद रखती है जो इन्वेंशंस करते हैं। आपको लगता होगा कि आपका दिल्ली में कोई बहुत बड़ा शोरूम है या फिर कोई बहुत बड़ा रेस्टोरेंट या फिर कोई दिल्ली का सबसे फेमस जिम। अगर आप कोई ऐसा बिजनेस करते हैं जो कहीं पर भी एग्जिस्ट करता है तो वह चीज आपको फाउंडर नहीं बना सकती। ना आप एंटरप्रेन्योर कहलाओगे क्योंकि आप एक कंपटीशन की साइकिल में घूम रहे हो। आपको लगता है कि आप वाकई अपने एरिया के सबसे अमीर व्यक्ति हो। यह बिल्कुल नहीं हो सकता क्योंकि आपने बनी बनाई चीजों को बेचना चालू किया है ना कि आपने कुछ नया बनाया है। मैं आपको [संगीत] एक छोटी सी चीज बताता हूं। मान लीजिए कि
3:05 आपका कोई साबुन बनाने की फैक्ट्री है और वो वर्ल्ड में कहीं भी एग्जिस्ट करती है। तो आप एक कंपटीशन की साइकिल में हो। साबुन हर कोई कंपनी अलग-अलग अपनी वैरायटीज की बना रही है तो आप कभी भी एंटरप्रेन्योर नहीं कहलाओगे। आप फाउंडर नहीं कहला सकते क्योंकि वो चीज कोई और पहले से करता आ रहा है या फिर कोई और भी कर रहा है। और जहां पे कंपटीशन होता है वहां पे कैपिटलिज्म नहीं होता कभी भी। और जब कोई भी बिजनेस या फिर जॉब वाला बंदा किसी कंपटीशन का शिकार होता है तो वो हमेशा स्ट्रगल करता है। [संगीत] आप अपनी मर्जी से अपने प्रोडक्ट का प्राइस कभी बढ़ा ही नहीं सकते क्योंकि आपके एरिया में आपके आसपास वर्ल्ड में एग्जिट करते हैं आपके कॉम्पिटिटर्स। अगर आपका बिजनेस मोनोपोली नहीं है, मैं इस कैपिटलिज्म के बारे में आपको आगे समझाऊंगा। हम दुनिया में दो तरीके की प्रोग्रेस करते हैं। आप चाहे पैसा कमा सकते हैं उसमें, आप बड़े आदमी बन सकते हैं या फिर आप कोई काम कर सकते हैं या फिर आप कोई स्टडी करते हैं। तो वही प्रोग्रेस
3:51 होती है और वो प्रोग्रेस होती है हमारी एक हॉरिजॉन्टल प्रोग्रेस, एक होती है वर्टिकल प्रोग्रेस। यही प्रोग्रेस आपको पहुंचाती है आपके [संगीत] गोल तक। अगर आपने अपनी प्रोग्रेस गलत चुन ली है तो आपको यही बताती हैं कि आपको यह प्रोग्रेस कहां तक लेके जाएगी और इन प्रोग्रेस को आप डिकोड करते हैं। यह प्रोग्रेस कैसे काम करती है। आप हॉरिजॉन्टल प्रोग्रेस में आप बनी बनाई चीजों को बेचते हैं। पहले से कोई चीज एग्जिस्ट करती [संगीत] है। आप उसी को एक्सपेंड करते हैं। वो आपकी कोई पढ़ाई हो सकती है या फिर कोई जॉब हो सकती है या फिर कोई बिजनेस हो सकता है। और वही पुरानी एजुकेशन सिस्टम को आप फॉलो करके अपना फ्यूचर देखते हैं कि हमारा इसमें फ्यूचर है। लेकिन सच यह है कि ये कभी काम नहीं करता है। तो ये हमेशा [संगीत] आपसे स्ट्रगल कराता रहता है और हॉरिजॉन्टल प्रोग्रेस में होता है कंपटीशन और जहां पे कंपटीशन होता है वहां पे [संगीत] कभी भी कैपिटलिज्म नहीं होता।
4:37 तभी तो आपको देखने के लिए मिलता है कि लोगों के पास आज नौकरियां नहीं है और इतना कंपटीशन है आज बहुत ज्यादा। पूरे देश विदेश में सेम बुक्स और सेम कांसेप्ट सभी को समझाया जाता है। सभी को एक जैसा बनाया जाता है उस कांसेप्ट को समझाकर। एजुकेशन के मामले यह देश विदेश का हाल है। आपको स्कूल्स में वही बुक्स, वही सेम कांसेप्ट सबको एक तरीके से समझाया जाता है और वही चीज सबको एक समान बनने के लिए प्रेरित करती है कि सबको एक जैसा ही बनता है। जब सब लोग बुक्स में एक ही कांसेप्ट पढ़ेंगे तो नया कैसे बनेगा कुछ? और ऐसे में इन्वेंशन होना इंपॉसिबल है। इन्वेंशन के बारे में लोगों को पता ही नहीं कि इन्वेंशन होंगे कैसे। हमारे भारत में सरकारी नौकरी का बहुत ज्यादा क्रेज़ है और इसमें लोग जाने के लिए अपनी पूरी साल अपना पूरा जीवन व्याप्त कर देते हैं ताकि वह सरकारी नौकरी ले सकें। लोग यह भूल जाते हैं कि उसमें कितना कंपटीशन है। उसमें
5:23 कितनी भीड़ है और जहां पे भीड़ होती है आप चाहे कितने भी टैलेंटेड क्यों ना हो अगर आपके एग्जाम्स में आपके एम्स में कंपटीशन है, भीड़ है तो आप शायद से वहां तक कभी नहीं पहुंच सकते क्योंकि वहां पे टैलेंटेड लोग नहीं बैठते। वहां पे पावरफुल लोगों को मिलती है जगह। अब हम वर्टिकल प्रोग्रेस को समझेंगे। अब ये वर्टिकल प्रोग्रेस कैसे काम करती है? देखिए, मान लीजिए कि कोई ऐसा काम है जो कहीं पे भी एग्जिस्ट नहीं करता जो कभी पहले से हुआ ही नहीं है। जिसकी कभी कॉपीज़ बनी नहीं है, वो पहली बार होगा वो होता है वर्टिकल प्रोग्रेस। वो कुछ भी हो सकता है दोस्तों। चाहे आप कोई बिजनेस खड़ा कर सकते हैं। चाहे आपको कोई नौकरी चाहिए, चाहे आपकी कोई एजुकेशन हो, वो कुछ भी हो सकता है। अगर उस काम को कोई कर रहा है या पढ़ रहा है या फिर उसमें कोई बिजनेस डाल चुका है पहले से तो वो वर्टिकल प्रोग्रेस नहीं होगी। वर्टिकल प्रोग्रेस वो होती है जो कभी भी कहीं पे भी एग्जिस्ट नहीं करती। जो आपके द्वारा बनती है और पहली बार बनती
6:11 है वही होती है वर्टिकल प्रोग्रेस और इस चीज में कंपटीशन [संगीत] नहीं होता। इसमें हाई कैपिटलिज्म होता है। मतलब पैसा जो बनता है इसी प्रोग्रेस में बनता है और हम सब भागते हैं किस में? हॉरिजॉन्टल प्रोग्रेस में पैसा बनाने के लिए। जहां पे आज इतना कंपटीशन है बहुत ज्यादा। लेकिन वर्टिकल प्रोग्रेस के बारे में लोगों को इंफॉर्मेशन ही नहीं है कि यहां पे सबसे ज्यादा पैसा बनता है। लेकिन याद रखना दोस्तों इस चीज में आपको बहुत ज्यादा हार्ड वर्क करना होता है। वर्टिकल प्रोग्रेस आसान नहीं होती। बिल गेट्स, ईलॉन मस, मार्क जुगबर यह सारे के सारे वर्टिकल प्रोग्रेस से आगे बढ़ते हैं ना कि हॉरिजॉन्टल प्रोग्रेस से। और आप हॉरिजॉन्टल प्रोग्रेस में अपनी पूरी कमाई, अपनी पूरी जिंदगी लगा लेते हैं और आप सोचते हैं कि आप करोड़पति बन जाएंगे। बिल्कुल भी नहीं। आपकी प्रोग्रेस ही डिसाइड करेगी आप करोड़पति बनोगे या फिर नहीं। अगर आपको धनवान बनना है तो आपको वर्टिकल प्रोग्रेस पे काम करना होगा। आपको
6:57 वो चीज बनानी होगी जो अर्थ में कभी एग्जिस्ट नहीं करती। अब मैं बात करने वाला हूं चैप्टर 2 के बारे में जिसका नाम है पार्टी लाइक इट्स 1999। एक ऐसा टाइम था लोगों को लग रहा था कि इंटरनेट उनकी दुनिया बदल देगा। मैं बात कर रहा हूं डॉट बबल की। अब यह डॉट बबल क्या है? अब देखिए जिस भी कंपनी के पीछे लोग डॉट लगा देखते थे लोगों को लगता था यह बिलियन की कंपनी बनने वाली है। मतलब डॉट एक ऐसी पहचान बन चुकी थी उस टाइम कि जिस कंपनी के पीछे लोग डॉट लगा देखते थे। लोग उसको सोचते थे कि यह कंपनी बहुत ही बिलियन की कंपनी है। और वही चीज देखते-देखते लोगों में एक बूम आया। लोग अपनी छोटी से छोटी कंपनी के पीछे.com लगाने लगे ताकि लोग और इन्वेस्टर्स उनकी कंपनी में पैसा लगा सकें। और यह चीज इतनी ज्यादा बड़ी हो गई कि लाखों करोड़ों इन्वेस्टर ने आंखें बंद
7:43 करके.com वाली कंपनीज़ पे पैसा लगाना चालू कर दिया। आपने सुना भी होगा amazon.com, flipkart.com तो इसी तरीके से xyz.com ऐसे ही छोटे से बड़े व्यापारी नेट का यूज़ करना चालू कर दिया और इन्वेस्टर ने इसी चीज को लेकर अपने पैसे उस कंपनी में डालना चालू कर दिए। जो कंपनीज़ अपने पीछे.com का यूज करती थी और इन्वेस्टर भी उन पर आंख बंद करके पैसा लगा रहे थे क्योंकि उस टाइम इंटरनेट नया-नया आया था। आपने देखा भी होगा कि आपके घर में कोई नई चीज आती है तो वो आकर्षित करती है। उसी तरीके से जब 90ज में इंटरनेट नया आया था तो लोगों को यही लग रहा था कि ये बहुत बड़ा बदलाव हुआ इस पूरे वर्ल्ड के लिए। लेकिन ये बबल एक ऐसा बबल बनता जा रहा था जो कि कुछ ही टाइम में एक बहुत बड़ा ब्लास्ट होता है जिसमें लाखों करोड़ों लोगों के बहुत सारे पैसे बिलियन डॉलर्स पैसे डूब जाते हैं मार्केट
8:30 के अंदर और यह चैप्टर हमें यह सिखाता है कि जब भी कोई ट्रेंड आए या फिर कोई भी हाइप बनती है बिजनेस को लेके एजुकेशन को लेके या फिर किसी भी कांसेप्ट को लेके तो आपको उस चीज में आंख बंद करके पैसा या फिर उसे पढ़ना नहीं चाहिए। देखो एक चीज याद रखना जो भी ट्रेंड के साथ चीज उठ रही है वह हमेशा एक बबल की तरह फटेगी और जैसे सडनली आई थी सडनली उसका खात्मा होगा। कभी भी आप ट्रेंड वाली चीजों पे पैसा मत लगाइएगा। कम से कम 10 साल पुरानी वाली कंपनी हो उसमें पैसा लगाइए और कोई भी बिजनेस स्टार्ट मत कीजिए। अगर कोई ट्रेंड कर रहा है तो सोच समझ के अपने पैसे को लगाएं। क्योंकि आज के जमाने में पैसा ही आपकी पहचान है ना कि आपके वो रिजल्ट कार्ड। आपके दिमाग में अक्सर सवाल आता होगा ये बड़ी-बड़ी कंपनीज़ Google, Apple, Tesla ये कंपनीज़ इतनी बिलियन डॉलर की कंपनी कैसे बन गई जो बाकी कंपनीज़ नहीं बन पाई? मैं बात कर रहा हूं चैप्टर थ्री के
9:16 बारे में जिसका नाम है ऑल हैप्पी कंपनीज़ आर डिफरेंट। सवाल यह है कि ये जितनी भी बड़ी-बड़ी कंपनीज़ हैं, यह ऐसा क्या करती हैं जो इतना बिलियन डॉलर की कंपनी बन जाती है? देखिए, अगर आपको एक सक्सेसफुल कंपनी बनानी है, आपको डिफरेंट रास्तों पे चलना होगा कि कैसे यह बिलियन डॉलर की कंपनी बनती है। इनकी हर एक कांसेप्ट को आपको फॉलो करना होगा। आपकी भी कंपनी इनके जैसा बन सकती है। बिल्कुल। आइए उन कांसेप्ट को जानते हैं कि वो कौन से कांसेप्ट्स हैं जो यह इतने बिलियन डॉलर की कंपनीज़ बना के रख देते हैं। देखिए कंपटीशन हमारे लिए अच्छा नहीं होता। अगर आप कोई ऐसा बिजनेस ओपन करने की सोच रहे हैं जिसमें कंपटीशन है जो कहीं भी एग्जिट करता है और उसमें ढेरों सारा कंपटीशन है तो आप एक बिलियन डॉलर की कंपनी नहीं बना सकते क्योंकि ये जितनी भी डिफरेंट कंपनीज़ होती हैं जो हैप्पी कंपनीज़ होती हैं वो कंपटीशन से हमेशा दूर रहती हैं। वो मोनोपोली कंपनीज़ होती हैं। वो दुश्मन मानती हैं कंपटीशन को और जिस चीज
10:04 में कंपटीशन होता है वो हैप्पी कंपनी कभी नहीं बन सकती। वो इनसिक्योर रहती हैं अपने कंपिटर से। आपको वह बिज़नेस करने होंगे जिसमें कोई कंपटीशन नहीं है और कंपटीशन से आपको हमेशा दूर रहना होगा। जिस दिन आपके बिज़नेस में कंपटीशन आ गया तो समझ लीजिए कि आपका बिज़नेस खतरे में है। जब ये बड़ी-बड़ी कंपनीज़ स्टार्ट हुई थी ना Google, Apple, Tesla इनका कोई कॉम्पिटिट नहीं था। इसलिए आज ये बिलियन डॉलर की कंपनीज़ हैं और आज ये इनके बिज़नेस मोनोपोली क्रिएट करते हैं। मतलब आप इन्हें कंट्रोल नहीं करते। यह कंपनीज़ आपको कंट्रोल करती हैं और इनका कोई कॉम्पिटिट नहीं है। यह अपने प्राइस अपनी मर्जी से घटा बढ़ा सकते हैं। यह कॉम्पिटिट को नहीं देखते कि उसने इतने का कर दिया, हमने इतने का कर दिया। नहीं, यह मोनोपोली कंपनीज़ होती हैं। ये अपने तरीके से सोचती हैं। अपने तरीके से आपको अपडेट देती हैं। अपने तरीके से अपने प्रोडक्ट को सेल करती हैं। और इसे बनाने के लिए आपको हमेशा
10:50 कंपटीशन से दूर रहना होगा। मैं आपको एक एग्जांपल के जरिए समझाता हूं। देखिए मान लीजिए कि आप कोई ऐप बनाते हैं और वो ऐप कहीं पे और अवेलेबल नहीं है। मतलब वो ऐप कभी पहले बनी नहीं है। आप एक मोनोपोली बिज़नेस हो। आप उस ऐप के कभी भी प्राइस बढ़ा सकते हो। कोई भी अपडेट अपनी तरीके से दे सकते हो। मतलब आप अपनी मर्जी के मालिक हैं। आपका कोई कॉम्पिटिट नहीं है। अगर आप अपने बिजनेस में अपने प्रोडक्ट के अपनी मर्जी से प्राइस घटाते हो, बढ़ाते हो तो आप एक मोनोपोली बिज़नेस हो और यही होती हैं हैप्पी कंपनीज़। अगर आप अपने बिजनेस में अपनी मर्जी से प्राइस नहीं घटा बढ़ा पा रहे हो तो समझ लीजिए कि आप कॉम्पिटिट का शिकार हो। आपका बिजनेस आपके हाथ में नहीं है। और हैप्पी कंपनीज़ में डिफरेंट यह होता है कि वो अपनी मर्जी से अपने प्रोडक्ट का प्राइस बढ़ा सकती हैं, घटा सकती हैं। और अगर आपकी कंपनीज़ और आपके प्रोडक्ट इस तरीके के नहीं है तो आप कभी भी एक हैप्पी
11:36 कंपनीज़ नहीं बना सकते। आप कभी भी बिलियन डॉलर की कंपनी खड़ा नहीं कर सकते। मुझे उम्मीद है कि यह कांसेप्ट आपको समझ आया होगा। हमें स्कूल्स और कॉलेज हमेशा यही सिखाते हैं कि कंपटीशन में भाग लो। कॉमटीशन हमारे लिए अच्छे हैं। कॉम्पिटिटिव एग्जाम की तैयारी करो और बस यही चक्कर फिर चलता जाता है। चलता जाता है। लोगों के अंदर एक मानसिकता बैठ जाती है कि मुझे इसको बीट करना है। मुझे क्लास में टॉप करना है। मुझे सबसे अच्छा व्यापारी बनना है। इसी कंपटीशन के कारण लोग अपनी फाइनेंशियल कंडीशन को और बहुत ज्यादा इकॉनमी डाउन कर लेते हैं। कंपटीशन की आईडियोलॉजी किसी को भी बर्बाद कर सकती है। आप कितने भी बड़े व्यापारी क्यों ना सही। आप कोई स्टूडेंट हो या फिर कोई टीचर। अगर आपके अंदर कंपटीशन की आइडियोलॉजी है तो आप बर्बाद हो जाओगे और आपको स्कूल्स और इंस्टट्यूट और सारे कॉलेजेस यही चीज आपको सिखाते हैं कि आपके लिए कंपटीशन अच्छा है।
12:22 ये कंपटीशन की मानसिकता बहुत बुरी होती है दोस्तों। सबसे बड़ी बीमारी होती है कम बीट करने की। मुझे उसे बीट करना है और कुछ लोग तो इस चीज को इस तरीके से भी लेते हैं। मान लीजिए कि आपने क्लास में टॉप कर दिया है तो वो लोग समझते हैं कि वो किसी अचीवमेंट पे पहुंच गए। हां, वो सक्सेसफुल हो गए क्योंकि कंपटीशन में रहने वाले व्यक्ति कभी भी नहीं जीत सकते। और यह कंपटीशन की आइडियोलॉजी हर चीज में होती है। चाहे आप स्टडी करते हो या फिर कोई बिजनेसमैन हो या फिर आप कहीं पे जॉब करते हो या फिर कुछ भी काम करते हो तो आपको इस आइडियोलॉजी से बच के रहना है। कभी भी कंपटीशन में पार्टिसिपेट मत कीजिए। अगर आप कोई ऐसा बिज़नेस करते हैं या फिर जॉब करते हैं या फिर कोई ऐसी पढ़ाई कर रहे हैं जिसे और लोग भी कर रहे हैं तो उसमें कंपटीशन है और जहां पे कंपटीशन होता है वहां पे हमेशा स्ट्रगल होता है। वहां पे कैपिटलिज्म नहीं होता। मैं आपको एक एग्जांपल के जरिए समझाता हूं। मान लीजिए कि आप एक चाय के
13:08 आउटलेट खोलते हैं और आपकी चाय का प्राइस है ₹10 और कुछ टाइम बाद वहां पे चार और आउटलेट खुल जाते हैं चाय के। अब ऐसी कंडीशन में क्या हुआ? कॉम्पिटिटर्स आ गए आपके साइड में। अब इस चीज को कैसे आप सॉल्व करोगे? आपके जो कस्टमर थे जहां पे पहले आप अकेले चाय के आउटलेट चला रहे थे। अब आपके साथ में कॉम्पिटिट भी आ गए हैं। अब जो आपके हाफ कस्टमर थे, आपके कस्टमर अब बढ़ चुके होंगे। कोई तीसरे आउटलेट पे चाय पी रहा होगा, कोई दूसरे पे चाय पी रहा होगा, कोई चौथे पे पी रहा होगा। अब सीधा सा आंसर होगा इसका। आप अपनी चाय के प्राइस घटा दोगे ताकि आपकी तरफ आपके कस्टमर अट्रैक्ट हो। जब आप ₹9 में चाय दोगे और दो बिस्किट फ्री दोगे। कॉमन सी बात है कि कस्टमर अट्रैक्ट होगा और ऐसी स्थिति में आपके पास कस्टमर तो आ जाएंगे लेकिन आपने एक स्थिति नहीं देखोगे कि आपका जो प्रॉफिट मार्जिन होगा वो माइनस में जाता रहेगा। और यही काम इंडिया के अंदर एक बड़े से छोटा
13:54 व्यापारी करता है। जब कॉम्पिटिट दिखते हैं तो वो अपने प्राइस गिराना चालू कर दें। और इसी काम को भारत के अंदर छोटे से बड़ा व्यापारी करता है और इसका नतीजा यह होता है कि वह कभी ग्रो नहीं हो पाते। आपको क्या लगता है जो पहले आता है वह जीतता है? बिल्कुल भी नहीं। जीतता वो है जो लास्ट तक टिकता है। मैं बात कर रहा हूं चैप्टर फाइव के बारे में जिसका नाम है लास्ट मूवर एडवांटेज। देखो आपको स्टार्ट करने वाले लाखों लोग मिल जाएंगे। लेकिन दुनिया उन्हीं को याद रखती है जो लास्ट तक टिके होते हैं। आपको क्या लगता है? Google दुनिया का सबसे पहला सर्च इंजन है। बिल्कुल भी नहीं। सबसे पहला सर्च इंजन था Yahoo और Lesco। यह सबसे पहले सर्च इंजन थे। लेकिन यह मार्केट में लॉन्ग टर्म नहीं टिक पाए। Google ने सिर्फ दो चीज पे फोकस किया था अपनी इंटरनेट स्पीड पे और यूज़र्स पे ताकि लोग जो भी सर्च करें उनको बहुत ही स्पीडली वो मिल पाए। और यूज़र्स के बारे
14:40 में सोचा कि यूज़र्स उसको लेके कैसे हैप्पी हो सकते हैं। और इसका नतीजा यह हुआ कि आज Google दुनिया का सबसे बड़ा सर्च इंजन है। ऐसा कुछ नहीं होता है कि जो पहले स्टार्ट करेगा उसी को सक्सेस मिलेगी। सक्सेस लास्ट मूवर एडवांटेज को मिलती है। जो लास्ट में स्टार्ट करता है उसको भी सक्सेस मिलती है। जिस तरीके से Google को सक्सेस मिली। आप काफी देर से यह सुन रहे हैं कि यह फर्स्ट मूवर लास्ट मूवर ये है क्या? आइए इस चीज को मैं आपको बताता हूं। देखिए फर्स्ट मूवर वो होता है जो पहले मार्केट में आता है और लास्ट मूवर वो होता है जो मार्केट में लास्ट में आता है और मार्केट में डोमिनेट होता है। तो कंक्लूजन यह है कि विनर वो होता है जो मार्केट में लास्ट तक सर्वाइव करता है। अपनी कंपनी को मोनोपोली बनाओ। अब यह मोनोपोली क्या है? अब मोनोपोली कंपनी कैसे बनती है? थोड़ा सा आपको डिटेल्स में बताता हूं। आपका प्रोडक्ट 10x बेटर होना चाहिए किसी भी कंपनी के प्रोडक्ट से।
15:25 स्टेप टू उसकी स्ट्रांग ब्रांडिंग। आपकी प्रोडक्ट की ब्रांडिंग और आपके बिजनेस की ब्रांडिंग बहुत ही [संगीत] यूनिक होनी चाहिए। स्टेप थ्री टेक्नोलॉजी का एडवांटेज। आज के जमाने में टेक्नोलॉजी बहुत बूम कर रही है। तो आपको टेक्नोलॉजी के साथ चलना होगा। नेक्स्ट है हमारा नेटवर्क इफेक्ट। नेटवर्क इफेक्ट बहुत ज्यादाेंट होता है। और यह कमाल की चीज होती है एक हर एक बिज़नेस के लिए। और लास्ट है हमारा कस्टमर लॉक इन। कस्टमर लॉक इन का मतलब यह होता है जो आप प्रोडक्ट सेल कर रहे हो अपने कस्टमर को वो कस्टमर को सिर्फ आपके पास मिले। वो कस्टमर कहीं और से खरीद ही ना पाए। मतलब कि जो आप सेल कर रहे हो कस्टमर आप ही के पास से खरीदेगा क्योंकि आप एक मोनोपोली कंपनी हो। आपके जैसा प्रोडक्ट कोई और बना ही नहीं रहा है। जब बनाएगा ही नहीं तो कस्टमर आपके पास आएंगे। तो यह होता है लॉग इन। मतलब आपके जैसा प्रोडक्ट कोई नहीं बना रहा है तो कस्टमर आप ही के पास रहेंगे। आप लोग जब भी बिज़नेस
16:12 स्टार्ट करते हैं तो आप अपने आप से सिंपल चार क्वेश्चन कीजिए। पहला सवाल यह कि क्या आपका बिजनेस 10 साल चल सकता है? दूसरा सवाल यह कि क्या आप सब बिजनेस से यूनिक हो? तीसरा सवाल यह है कि क्या आप फ्यूचर में मोनोपोली क्रिएट कर सकते हो? क्या आपका बिजनेस मोनोपोली बन सकता है? और लास्ट सवाल यह है कि क्या आपका प्रॉफिट मॉडल क्लियर है? और आपको जानकर खुशी होगी कि आपने चैप्टर फाइव कंप्लीट कर लिया है। अगर आपको कोई भी डाउट या फिर कोई भी कांसेप्ट या पॉइंट समझ नहीं आया तो आप कमेंट सेक्शन में पूछ सकते हैं। क्या आपको भी यही लगता है कि सक्सेस सिर्फ किस्मत वालों को मिलती है? [संगीत] किस्मत के भरोसे बैठे या फिर हम मेहनत करें। मैं बात कर रहा हूं चैप्टर सिक्स के बारे में जिसका नाम है यू आर नॉट ए लॉटरी टिकट। हमें किस्मत के भरोसे बैठे रहना चाहिए या फिर मेहनत करनी चाहिए। इस चीज का जवाब आपको आज मिल जाएगा। देखिए अगर आप ऐसा सोचते हैं कि सक्सेस सिर्फ किस्मत वालों
16:58 को मिलती है तो आप अपने आप को एक लॉटरी टिकट समझते हैं। सक्सेस आपको प्लान से मिलती है। सक्सेस आपको मकसद से मिलती है। और सोसाइटी भी हमें इसी चीज को सिखाती है कि अपने ऑप्शंस खुले रखो। सेफ खेलो। अपनी किस्मत पर भरोसा रखो। आपने एक चीज़ देखी होगी जब किसी भी जॉब की वैकेंसी या फिर फॉर्म निकालते हैं। लोग दुनिया भर के फॉर्म को फिल अप करते [संगीत] हैं। लेकिन उन्हें पता नहीं होता कि उनका नंबर कहां आएगा। उनसे अगर आप पूछेंगे तुम्हारा नंबर कहां पे आने वाला है। तुमने किस टाइप की जॉब के लिए अप्लाई किया है। उन्हें पता नहीं होता। बोलते हैं कि हमें नहीं पता जो होगा देखा जाएगा। इस टाइप के डायलॉग के साथ वो जीते रहते हैं अपनी पूरी जिंदगी में। उन लोगों के पास कोई ठोस प्लान नहीं होता। ना उनके पास कोई क्लेरिटी होती कि उन्होंने करना क्या है। बस वो किस्मत और होप के साथ डूबे रहते हैं इस पूरी [संगीत] जिंदगी पर। मुझे अपने दोस्त की एक चीज याद आई। जब मैंने उससे पूछा था कि तूने इंडियन रेलवे का भी फॉर्म फिल किया है और इंडियन पुलिस का भी तो मैंने उससे पूछा कि तुझे
17:44 क्या लगता है इसमें किस चीज में तेरा नंबर आएगा? तो शायद से उसका आंसर था कि मुझे नहीं पता जो होगा देखा जाएगा। उसके पास कोई ठोस क्लेरिटी थी नहीं कि उसका नंबर किस में आएगा। बस वो होप के साथ जी रहा था। बस किस्मत के भरोसे बैठा था। और नतीजा यह हुआ कि आज वो बेरोजगार है। और जो लोग होप के साथ जीते हैं, जो किस्मत के भरोसे बैठे रहते हैं, वह कभी क्रिएटर्स नहीं बन पाते। और रियल भाषा में इन लोगों को बोला जाता है गुलाम। यह धरती पर एक गुलामों की तरह रहते हैं। इनको लगता है कि कोई आएगा इन्हें बना के चला जाएगा। दोस्तों को यह हमेशा दोषी ठहराते हैं कि इनकी वजह से नहीं हुआ। ऐसे टाइप के लोगों को बोला जाता है इनडेफिनेट थिंकिंग। [संगीत] ये आते हैं, जन्म लेते हैं और बस होप के सहारे जीते रहते हैं। और ये लोग अपने फ्यूचर को अपने लक पर छोड़ देते हैं। किस्मत पर छोड़ देते हैं। और दूसरे वो लोग होते हैं जिन्हें हम बोलते हैं डेफिनेट थिंकिंग। इन्हें सब कुछ पता होता है। यह अपने
18:29 रचयिता होते हैं। इन्हें बोलते हैं क्रिएटर्स। जिनके पास अच्छे विज़ंस होते हैं, क्लेरिटी होती है और इनकी पूरी जिंदगी इन्हीं के कंट्रोल में होती है। यह लोग हमेशा लॉन्ग टर्म विज़ंस रखते हैं। इन्हें पता होता है कि इन्हें करना क्या है और इनकी जिंदगी इन्हीं के कंट्रोल में रहती है और इन्हें यह भी पता होता है कि आने वाला फ्यूचर कैसा होगा। यह रचयिता होते हैं अपनी लाइफ के अपनी जिंदगी के और ऐसे लोगों के द्वारा ही इन्वेंशंस होते हैं। अगर तुम्हें यह नहीं पता कि आपको क्या बनना है। आपको क्या चाहिए तो आपको वो चीज कभी भी नहीं मिल सकती। एक सक्सेसफुल स्टार्टअप और एक सक्सेसफुल बिजनेस कभी भी लक से नहीं बनाया जाता। उसके पीछे पूरा विज़न और क्लेरिटी होती है और बहुत सारे फंडामेंटल्स। तब जाके एक बड़ा बिजनेस बनता है। ईलॉन मस्क की Tesla हो या फिर बिल गेट्स का Microsoft ये सब इनको किस्मत से नहीं मिले। इन्होंने पूरी प्लानिंग के साथ इस चीज को आज बनाया है। और अगर आपसे कोई
19:16 पूछता है कि एंटरप्रेन्यर्स की डेफिनेशन क्या है? एंटरप्रेन्यर्स होते क्या है? तो आप उनको सीधा सा जवाब देना। एंटरप्रेन्यर्स वो होते हैं जो खुद के प्लान खुद ही क्रिएट करते हैं और उन्हें पता होता है कि कितना रिस्क लेना है। वो हर चीज के मामले में अंडरस्टैंडिंग होते हैं। वो अपनी फ्यूचर को और दुनिया के फ्यूचर को डिजाइन करते हैं। देखिए जब ईलॉन मस्क ने अपने बिजनेस को बनाया था टेस्ला या spcex उसके पास कोई होप नहीं थी या फिर उसके साथ कोई किस्मत नहीं थी। ईलॉन के पास थी सिर्फ दो चीजें। पहली थी क्लेरिटी और दूसरा था उसके पास रीज़न। इन्हीं के द्वारा आज ईलॉन मस्क इतने बड़े आदमी हैं। किस्मत के भरोसे नहीं बैठे हो। तो याद रखना किस्मत सिर्फ लोगों के लिए होती है। फाउंडर्स के लिए नहीं। जब आप कामयाब हो जाओगे, कोई बड़े बिजनेसमैन बन जाओगे तब लोग आपके लिए बोलेंगे कि शायद से इसको किस्मत से मिल गया है। हां, लेकिन आपको पता है कि आपने उसके लिए कितनी मेहनत करी होगी। किस्मत एक गंदा वर्ड है जो समाज ने
20:02 बनाया है। लोगों को कभी आगे नहीं बढ़ने देता। अब जो मैं आपको बताने जा रहा हूं उस चीज को ध्यान से सुनना। सोचो एक क्लास में 40 स्टूडेंट हैं और सभी को लगता है कि उनके मार्क्स ना इक्वल आएंगे और उसमें से 30 स्टूडेंट अपने एवरेज मार्क्स लेके आते हैं और बाकी के नाइन स्टूडेंट्स के मार्क्स थोड़े अच्छे आते हैं और वो जो एक स्टूडेंट है वो स्कूल में टॉप करता है और सेम कंडीशन बिजनेस और स्टार्टअप में होती है। 100 में से कोई दो ही स्टार्टअप या बिजनेस होते हैं जो बिलियन डॉलर के स्टार्टअप बनते हैं। और मैं बात कर रहा हूं चैप्टर सेवन के बारे में जिसका नाम है फॉलो द मनी। इस चैप्टर में हम बिजनेस के डार्क कांसेप्ट को समझेंगे। देखो बिजनेस वर्ल्ड में पैरिटो प्रिंसिपल चलता है वो मैं आपको आगे बताऊंगा। पैरिटो प्रिंसिपल को समझने के लिए हम बात करेंगे पहले बीसी की वेंचर कैपिटलिस्ट की। वेंचर कैपिटलिस्ट वो होते हैं जो बड़े-बड़े बिजनेस और बड़े-बड़े स्टार्टअप्स में पैसा लगाते हैं। मान लीजिए कि कोई टॉम नाम का इन्वेस्टर है जो कि पैसा लगाता है 50
20:49 स्टार्टअप्स के अंदर $1 बिलियन। और होता क्या है कि 50 में से सिर्फ पांच स्टार्टअप्स होते हैं जो उसको हाई रिटर्न देते हैं और जो बाकी स्टार्टअप्स होते हैं वह एवरेज रह जाते हैं। और ऐसा नहीं होता है कि आपने 50 के 50 स्टार्टअप्स में पैसा लगाया या फिर 50 स्टार्टअप करे वो सारे के सारे सक्सेसफुल हो गए। नहीं उनमें से कुछ चुनिंदा स्टार्टअप्स होते हैं जो बिलियन डॉलर की कंपनी बन जाती है। अब जो टॉम ने जो पैसा लगाया था 50 कंपनीज़ के अंदर। अब यह जो पांच कंपनी बिलियन डॉलर की बनी है। अब ये पांच ही कंपनी टॉम का सारा पैसा वापस कर देंगे। वो भी दो गुना तरीके से। अब हम समझेंगे कि यह पैरिटो प्रिंसिपल क्या है? पैरिटो प्रिंसिपल यह होता है जब आप थोड़ा काम करते हैं और आपको हाई रिजल्ट मिलते हैं और वहीं दूसरी तरफ आप ज्यादा काम करते हैं लेकिन आपको कम रिजल्ट मिलते हैं। इसी [संगीत] चीज को हम बोलते हैं 80-20 रूल। थोड़ा मैं आपको इजी तरीके से समझाता हूं। तुम अपने सिलेबस का 20% पढ़ते
21:36 हो और 80% पेपर वहीं से आता है। आपने स्मार्टली चीजों को पढ़ा। आपको पहले से पता था कि कौन सी चीज इंपॉर्टेंट [संगीत] है और वही चीज आपको अच्छे रिजल्ट निकाल कर देती है। मतलब आपने छोटी मेहनत करी और हाई रिजल्ट आपको मार्क्स में मिले जब आप सारी चीजों कोेंस ना देके कुछ चुनिंदा चीजों को निकाल कर उन चीजों को इन्वेस्टमेंट करते हो और यही काम बिजनेस और स्टार्टअप्स में होता है। सही चीजों पर पैसा लगाओ और सही स्टार्टअप्स ओपन कीजिए। और अब मैं आपको एक फार्मूला देने वाला हूं। और इसको नोट जरूर कर लेना। M = P, C = S। इसका मतलब क्या है? आइए समझते हैं। एम का मतलब होता है मोनोपली। सी का मतलब है यहां पे कंपटीशन। जहां पे मोनोपोली होती है वहां पे प्रॉफिट ज्यादा होता है और जहां पे कंपटीशन होता है वहां पे स्ट्रगल होता है। वहां पे प्रॉफिट कम होता है। वहां पे आपको कंपटीशन मिलेगा। इसलिए अपने बिजनेस को ग्रो करने
22:22 के लिए आपको अपनी कंपनी को मोनोपोली बनाना होगा जहां पे कोई आपका कॉम्पिटिट ही ना हो। सोचो आपको एक ऐसा सीक्रेट मिल जाए जो किसी को नहीं पता और उसी सीक्रेट के द्वारा आप एक बिजनेस बनाते हो और आप एक बिलियन डॉलर की कंपनी खड़ा कर देते हो। क्या यह पॉसिबल है? सुनने में थोड़ा अजीब लग रहा होगा। लेकिन हां, यह पॉसिबल है। आपने सभी लोगों को बोलते हुए देखा होगा कि अब कोई इन्वेंशन नहीं हो सकता। अब सारे रिसोर्सेज खत्म हो चुके हैं। लेकिन यह सच नहीं है दोस्तों। आज भी अर्थ पे बहुत सारे सीक्रेट्स छुपे हुए हैं। उनका सॉल्यूशन अभी तक नहीं हुआ है। बहुत सारी अर्थ पे अभी भी प्रॉब्लम्स हैं। लेकिन उन्हें देखेगा कौन? जो इन्वेंशंस करेंगे जो वर्टिकल प्रोग्रेस करने वाले हैं। लेकिन आज वर्टिकल प्रोग्रेस करने वाले आज बहुत कम लोग हैं। सारे लोग हॉरिजॉन्टल प्रोग्रेस में लगे हुए हैं। उन्हें कौन बताएं कि आज भी अर्थ पे बहुत सारे रिसोर्सेज हैं। और यह प्रोग्रेस सिर्फ वही
23:09 कर सकता है जिसको दुनिया में सबसे अलग बनना है जो वर्टिकल प्रोग्रेस करना चाहता है। दुनिया आपके कंट्रोल में जब आती है जब आप कुछ नया इन्वेंट करते हैं। तब नहीं जब आप हॉरिजॉन्टल प्रोग्रेस में वर्क करते हैं। आप लोग अपने आप से एक सवाल कीजिए। ऐसा क्या सच है जो आपको पता है? लेकिन दुनिया उसे गलत बोलती है और यही चीज आपको आपके सीक्रेट तक ले जाएगी और इसी के रास्ते आप एक कुछ नया इन्वेंट कर सकते हो। यही होगी आपकी वर्टिकल प्रोग्रेस। आपको सोसाइटी हमेशा यही सिखाएगी रिस्क मत लो। सरकारी नौकरियों में जॉब करो, यह करो, वो करो जो दुनिया कर रही है उसी के साथ मिल जाओ। और इस टाइप के लोगों को हम बोलते हैं गुलाम। गुलामों की जिंदगी। इन्हें पता नहीं होता। यह उन लोगों के दौर में चलते हैं जो लोग पहले से ही कुछ ना कुछ बना चुके हैं। उन्हीं की चीजों को वो छापते रहते हैं, बिकते रहते हैं, पढ़ते रहते हैं। आपने एक बात अक्सर सुनी होगी अगर आपको बहुत बड़ा बनना है तो आपको बहुत
23:56 हार्ड वर्क करना होगा। बहुत मेहनत करनी होगी। लेकिन यह सच नहीं है दोस्तों। अगर आपको वाकई बहुत बड़ा बनना है तो आपको चाहिए सिर्फ डिपेंड थिंकिंग। आपको सोच अलग करनी है। बड़ा बनने के लिए आपको सिर्फ थिंकिंग को डिपेंड करना होगा। जो बाकी लोगों की नहीं होती। बिग सक्सेस आपको तभी मिलती है जब आपकी थिंकिंग डिपेंडेंट [संगीत] हो। और यह डिसाइड आपके हार्ड वर्क पे नहीं होती। आप कितने मेहनती हैं, आप कितना हार्ड वर्क कर रहे हैं उस चीज में। आप बड़े आदमी तब बनते हैं जब आपकी सोच बहुत डिफरेंट होती है। [संगीत] और यही फंडामेंटल होता है एक सक्सेस का। तो याद रखना बिग सक्सेस तब मिलती है जब आपकी थिंकिंग डिफरेंट होती है लोगों से। जब आप अपने बिजनेस को स्टार्ट करते हैं। आपकी स्टार्टिंग ही बता देती है कि आपका बिजनेस कितना लंबा जाएगा, टिकेगा या फिर वो नहीं टिकेगा। मैं बात कर रहा हूं चैप्टर नाइन के बारे में जिसका नाम है फाउंडेशन। मान लीजिए कि आप एक छोटा सा बिजनेस ओपन करते
24:41 हैं और आपकी उसमें फाउंडेशन ही गलत हो जाए मतलब कि शुरुआत ही गलत हो जाए वह 10001% बिजनेस डूब जाएगा। वो बिजनेस फेल हो जाएगा और बहुत से लोग ऐसा करते हैं जब वह कोई भी स्टार्टअप या बिजनेस स्टार्ट करते हैं तो वह अपने रिश्तेदारों को और दोस्तों को उसमें सम्मिलित कर लेते हैं और नतीजा यह होता है कि बिजनेस फेल हो जाता है। कंपनी को स्टार्ट करने से पहले आपकी फाउंडेशन बहुत इंपॉर्टेंट है। आपके फाउंडर्स, आपके टीम, आपकी एंप्लाइजज़ बहुत इंपॉर्टेंट रोल निभाती है। जब आप कोई कंपनी स्टार्ट करो और स्टार्टअप स्टार्ट करो, अपने को-फाउंडर को ठीक से चुनाव करना। अगर आपके पास एक राइट फाउंडर है, अगर आपके पास एक राइट कल्चर है कंपनी का और आपके पास राइट ओनरशिप है और वो लोग अपनी रिस्पांसिबिलिटी समझते हैं तो आपका बिजनेस अच्छा चलेगा। मुझे एक छोटी सी बात याद आ गई और शायद से आपके लिए एग्जांपल भी बन जाएगा। मेरे दोस्त का एक रेस्टोरेंट था और उसके पास में चार से पांच कर्मचारी भी हैं। लेकिन
25:27 कुछ ही सालों में उसका रेस्टोरेंट बंद हो जाता है। लेकिन मैं उससे पूछता हूं कि यह कैसे हुआ अचानक? उसने जो अपने रीज़ंस बताए वो यह थे कि मार्केट में डिमांड बहुत कम है। मार्केट गलत है, लोकेशन गलत है। कंपटीशन ज्यादा हो चुका है। लेकिन सच यह था कि उसकी जो फाउंडेशन थी वो ही गलत थी। वो दूसरी चीजों को दोषी ठहरा रहा था कि ये लोकेशन गलत है। कंपटीशन बहुत ज्यादा है। कंपटीशन हर चीज में ही जानते हैं। बिजनेस कभी भी बंद होता है तो वह आपके अंदर के कल्चर से होता है ना कि बाहर वालों की वजह से। देखिए स्टार्टअप में फाउंडर्स और को-फाउंडर का रोल एकदम हस्बैंड और वाइफ की तरह होता है। अगर आपने अपने को-फाउंडर को गलत चुन लिया तो आपकी कंपनी फेल हो जाएगी। आपके करोड़ों रुपए डूब जाएंगे। इसलिए अपने को-फाउंडर को ठीकली और स्मार्टली चुनें कि कभी भी अपने फाउंडर्स को इमोशनली चूज़ मत करना। कोफाउंडर को इस तरीके से चुनिए जो आपकी कंपनी को ऊपर लेके [संगीत] जाएं जो
26:13 स्किल्ड हो। इमोशनली मत चुनिए। आप भी कभी अपने दोस्तों को लेके बैठ जाओ या रिश्तेदारों को। नहीं आप उस बंदे को चुनिए। उस इंसान को चुनिए जिसके अंदर वाकई आपके बिजनेस को ग्रो करने की स्किल्स हैं। अगर आपने गलती से भी इमोशनली कोफाउंडर बना लिया तो याद रखना आपका बिजनेस और आपका स्टार्टअप तुरंत बंद हो जाएगा। यह 10001% गारंटी है। आप लोगों ने दुनिया भर में माफिया गैंग देखी होंगी लेकिन आपने एक ऐसी गैंग नहीं देखी होगी जो फेमस है अपनी सक्सेस को लेकर। मैं बात कर रहा हूं PayPal माफिया की। ऐसी गैंग है जिसने बिलियन डॉलर्स के स्टार्टअप बनाए। YouTube, Facebook, Lindin, Spcex यह उन गैंग्स की कंपनीज़ हैं जिन्होंने यह बिलियन डॉलर्स के स्टार्टअप कराए थे। और यह गैंग दुनिया की सबसे पावरफुल गैंग है। और यह गैंग फेमस है अपने सक्सेस को लेकर। देखिए स्टार्टअप्स में सबसे ज्यादा पावर होती है आपकी टीम कल्चर की। आपकी यूनिटी कैसी है?
27:00 आपकी लॉयलिटी कैसी [संगीत] है? बिजनेस और स्टार्टअप्स में फर्क यह होता है कि बिजनेस में लोग सिर्फ सैलरी के लिए काम करते हैं। उनका मकसद यह नहीं होता कि आपकी कंपनी की ग्रोथ होनी है। नहीं, उन्हें सिर्फ पैसे से मतलब होता है और वहीं पे स्टार्टअप्स में लोग साथ काम करते हैं एक टीम [संगीत] की तरह। उनका मकसद होता है वो सैलरी के लिए काम नहीं करते। वो कंपनी की ग्रोथ के लिए काम करते हैं। स्टार्टअप्स में टीम एक मिशन [संगीत] के लिए काम करती है और कंपनीज़ में एंप्लई पैसे के लिए काम करते हैं। स्टार्टअप्स की जो टीम होती है वो साथ ही एक इतनी छोटी होती है कि उन्हें कोई दिक्कत ना हो और एक सक्सेसफुल स्टार्टअप बनाने के लिए एंप्लाइजज़ की नहीं एक टीम की जरूरत होती है। और हमेशा याद रखना सक्सेसफुल स्टार्टअप बनाने के लिए आपको एक माफिया बनना पड़ेगा। मैं उस माफिया की बात नहीं कर रहा हूं जो क्रिमिनल माफियास होते हैं। मैं माफिया की बात कर रहा हूं जिनके पास एक बड़ी ठोस टीम होती है और बहुत बड़ा विज़न होता है कुछ
27:45 देश को देने के लिए दुनिया को देने के लिए। आप सभी को कांग्रेचुलेशंस। आपने अब तक 10 चैप्टर कंप्लीट कर लिए हैं। मुझे उम्मीद है कि आपको ये सारी चीज समझ आ रही होंगी। अगर आपको कोई डाउट या क्वेश्चन है तो आप कमेंट सेक्शन में पूछ सकते हो। आप जो मेरे हाथ में हाइलाइटर देख रहे हो, यह हमारी कंपनी का हाईलाइटर है। मार्केट में ऐसे और भी हाईलाइटर हैं। लेकिन यह सबसे यूनिक हाईलाइटर बनाया गया था। और फिर 2 साल बाद हमारी हाईलाइटर की एक छोटी सी कंपनी फेल हो जाती है। पता है किस कारण फेल हुई थी? हमने पूरी ताकत प्रोडक्ट को बेस्ट बनाने में लगा दी थी। क्योंकि यह हाईलाइटर्स मार्केट में सबसे यूनिक हाईलाइटर्स थे और हमें लग रहा था कि अभी आसानी से बिक जाएंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। आपका प्रोडक्ट कितना भी अच्छा क्यों ना हो लोग उसे नहीं खरीदेंगे जब तक उसकी मार्केटिंग नहीं हो सकती। और याद रखना जो हमने गलती करी थी वो आप गलती मत करना। प्रोडक्ट को बनाना ही काफी नहीं होता। प्रोडक्ट को सेल करना भी आना चाहिए। और मैं बात कर रहा हूं चैप्टर 11 के बारे
28:31 में। बहुत सारे फाउंडर्स को यह लगता है कि अगर हमारा प्रोडक्ट अच्छा होगा तो कस्टमर खुद चल के आएगा। लेकिन यह सच नहीं है दोस्तों। आपके प्रोडक्ट कितना भी अच्छा क्यों ना हो प्रोडक्ट को सेल करना मार्केटिंग करना वो बहुत ज्यादाेंट होता है। और एक चीज लिख कर रख लेना। आपके बिजनेस की बैकबन होती है मार्केटिंग। उसके बिना आपका बिजनेस नहीं चल सकता। और आप लोगों ने देखा भी होगा मार्केट्स में हाई क्वालिटी के प्रोडक्ट्स काफी ज्यादा है लेकिन वो इतने बिकते नहीं है। वहीं पर लो क्वालिटी के प्रोडक्ट्स काफी ज्यादा बिकते हैं। सारा खेल है मार्केटिंग का। आप अपनी मार्केटिंग में ताकत लगाते हो तो आपका प्रोडक्ट कैसा भी सही वो बिकेगा। लोग आज डरते हैं कि एi इंसान की नौकरियां खा जाएगा। लोग टेक्नोलॉजी को अपनी रिप्लेसमेंट समझते हैं। हम चैप्टर 12 के बारे में बात कर रहे हैं जिसका नाम है मैन एंड मशीन। एi का फियर दुनिया के अंदर बहुत ज्यादा है। लेकिन क्या सच में एआई रिप्लेस कर देगा दुनिया को? बहुत बड़ा सवाल है। देखो मशीनंस हमें फुल्ली तरीके से रिप्लेस
29:17 नहीं कर सकती कभी भी। और एक बात ध्यान से सुन लेना। मशीन के बिना ह्यूमंस कभी भी फ्यूचर नहीं बना सकते। आपको पता है बेस्ट रिजल्ट कब मिलते हैं? जब ह्यूमन प्लस मशीन साथ में वर्क करते हैं। जब कोई भी टेक्नोलॉजी या मशीन बनाई जाती है ये सोच कर नहीं बनाई जाती तो वो ह्यूमंस को रिप्लेस करेगी। वो यह सोच कर बनाई जाती है कि वो ह्यूमंस की उसमें हेल्प करेगी और उसमें इंप्रूव करेगी ताकि इंसानों को काम आसान हो सके और जल्दी से जल्दी हो सके। मुझे आप लोग एक बात बताइए। Google एल्गोरिथम से पावरफुल बनाता। नहीं बिल्कुल भी नहीं। Google ह्यूमन प्लस मशीन से पावरफुल बना था। एक बात ध्यान से सुन लो जिनको एआई का फियर है। एआई या फिर कोई भी टेक्नोलॉजी ह्यूमंस को अभी रिप्लेस नहीं कर सकती क्योंकि ह्यूमंस ना क्रिएटिव होते हैं और काफी ज्यादा इमोशनली इंटेलिजेंस। तो फाइनल बात ये है दोस्तों टेक्नोलॉजी इसलिए नहीं बनाई जाती ताकि वो आपको रिप्लेस करे। वो तो आपके लिए कोलैबोरेशन के लिए बनाई जाती है ताकि आप मशीन और
30:03 टेक्नोलॉजी को लेके आप अपने काम को और अपनी जिंदगी को इंप्रूव कर पाओ। मशीन आपके लिए एक पार्टनर के जैसा है। अगर आप ऐसा सोचते हैं कि मशीन आपको रिप्लेस कर देंगी। एआई हमें रिप्लेस कर देगा। एआई हमारी जॉब खा जाएगा। हां बिल्कुल खा जाएगा। आप जैसा सोचेंगे आपके साथ मशीन उसी तरीके का बर्ताव करेंगी। बस आपकी थिंकिंग पावर डिसाइड करेगी कि आपको मशीन की हेल्प लेनी है या फिर वो आपको रिप्लेस कर देगी। और एक चीज याद रखना फ्यूचर उसी का बनेगा जो मशीन और एi को कॉम्पिटिट ना समझे एक पार्टनर समझे। वो आपकी हेल्प के लिए बनाए जाते हैं ना कि रिप्लेसमेंट के लिए। आई होप आपको यह डाउट पूरा क्लियर हो गया होगा। 200 में सभी को यही लग रहा था कि ग्रीन एनर्जी इज द फ्यूचर। और सभी लोगों को यही लगता था कि सोलर लगाओ और पैसा कमाओ। लेकिन यह क्लीन टैक स्टार्टअप एक दिन फेल हो जाता है। हुआ क्या था? लोगों ने बिना सोचे समझे सोलर स्टार्टअप में इन्वेस्टमेंट करना चालू कर दिया। ना कोई इनके पास क्लेरिटी थी, ना
30:48 विज़न था, ना अच्छा टाइम था। और आप लोग हमेशा याद रखना मार्केट के ट्रेंड को कभी फॉलो करके अपना बिजनेस खड़ा मत करना। जैसे कि सोलर स्टार्टअप का बबल फटा था। सेम उसी तरीके से आपके भी लाखों करोड़ों रुपए डूब सकते हैं इस चीज में। जब आप लोग अपने बिजनेस को स्टार्ट करो, तो अपने आप से ये तीन सवाल जरूर पूछना। क्या हम जो स्टार्टअप बनाने जा रहे हैं, क्या उसमें टेक्नोलॉजी हमारी 10x बेटर है? क्या यह एक सही टाइमिंग है स्टार्टअप को करने के लिए? क्या आपके पास कोई डिस्ट्रीब्यूशन प्लान है? अगर आप इन तीन सवालों का जवाब ढूंढ लेते हैं तो आप स्टार्टअप के लिए रेडी हैं दोस्तों। देखो एक स्टार्टअप को जिताने के लिए आपको ये पांच चीज़ चाहिए होती हैं। पहला है इंजीनियरिंग, दूसरा है सही टाइमिंग और थर्ड है हमारा मोनोपली और फोर्थ है हमारा टीम और लास्ट है हमारा डिस्ट्रीब्यूशन प्लान। और इन पांचों को नोट जरूर कर लेना क्योंकि यह बहुत ही बेसिक और बहुत ही ज्यादाेंट होते हैं हर एक स्टार्टअप प्लान के लिए। और इन पांचों में से कोई भी एक चीज भी लूज हुई तो आपका
31:34 गेम ओवर। और अब है हमारा इस बुक का लास्ट चैप्टर। और चैप्टर का नाम है द फाउंडर पैराडॉक्स। और ये बहुतेंट है हर एक फाउंडर के लिए। देखिए जो लोग दुनिया बदलने की ताकत रखते हैं ना वो कभी भी नॉर्मल नहीं होते। वो काफी एोगेंट और टॉक्सिस होते हैं और उनकी पर्सनालिटी काफी ज्यादा एक्सट्रीम होती है। अब सवाल होगा कि ऐसा क्यों होते हैं वो लोग? फाउंडर्स जो होते हैं वो पहली बात तो बड़ी से बड़ी सोच रखते हैं। और उनके लिए सबसे बड़ा रिस्क सबसे छोटा रिस्क होता है। उन्हें रिस्क से बहुत प्यार होता है। जहां रिस्क नहीं वहां फाउंडर्स नहीं होते। वो किसी के बनाए हुए रूल्स को नहीं मानते। वो खुद के रूल्स बनाते हैं और रूल्स को तोड़ना भी जानते हैं। और वो लोग कभी भी अपने से ऊपर किसी को नहीं मानते। वो अपने आप को सबसे ऊपर रखते हैं। उनको लगता है कि उनके अलावा इस काम को कोई नहीं कर सकता और यह वाकई सच है। एक फाउंडर जानता है कि वो कितना एक्सट्रीम होता है अपने पैशन के लिए अपने इस स्टार्टअप के लिए। जो भी फाउंडर्स को इंपॉसिबल लगता है
32:20 वो उसे पॉसिबल कर देते हैं। ये फाउंडर के पैराडॉक्स होते हैं। स्टार्टिंग में आपको फाउंडर्स पागल लगेंगे। थोड़े से लगेंगे एोगेंट, थोड़े से कभी जीनियस लगेंगे तो कभी आपको टॉक्सिक लगेंगे और उन्हें कोई भी पसंद नहीं करता है। बिल्कुल भी नहीं। क्योंकि उन्हें हर एक चीज परफेक्ट चाहिए होती है। मान लीजिए कोई हाई क्लास मीटिंग चल रही हो गलती से ग्लास अगर आपने टेबल के बीच में रख दिया फिर दाएं बाएं रख दिया तो ऐसी स्थिति में फाउंडर आपको आपकी कंपनी से निकाल भी सकता है। वो इतने ज्यादा एक्सट्रीम होते हैं हर एक चीज को लेकर। मुझे उम्मीद है दोस्तों कि आपको ये सारे चैप्टर्स समझ आए होंगे इस बुक के और यह बुक अब समाप्त होती है और आपका कोई भी क्वेश्चन या डाउट रह गया हो तो कमेंट सेक्शन में पूछ सकते हो।