0:00 नमस्ते। लग्जरी डेस्टिनेशन पर घूमना, Apple के नए फोन या नए लैपटॉप के लिए लाइन में लगना और डेस्टिनेशन वेडिंग में करोड़ों रुपए खर्च करना। यह सब चीजें आज की लाइफ का बड़ा कॉमन फंडा बन गया है। अब एक बुक पढ़ी और उस बुक को मैंने मेरी लाइफ में कभी इस तरह की बुक नहीं पढ़ी थी। पहली बार मैंने इस बुक को पढ़ा और पढ़ने के बाद मेरे को ऐसे लगा जैसे हरियाणवी में कहते हैं खोपड़े में छेद हो गया। खोपड़े में छेद का मतलब ऐसे लगा कि यार इस लेवल पर आज से 100 साल पहले कोई बात लिखी गई है और कमाल की बात है आज भी इतने रेलेवेंट है तो मेरे को लगा यह शेयर करनी चाहिए तो पहले तो वार्निंग है जिन लोगों को आदत है पैसिव कंजमशन की पैसिव कंजमशन का मतलब देख लिया दिमाग पे जोर नहीं आना चाहिए उनके लिए ये
0:46 वीडियो नहीं है। दूसरी वार्निंग यह है कि इस वीडियो को अगर देख लिया, तो देखने के बाद कमेंट किए बिना नहीं रह पाओगे और लगे कि अच्छा कमेंट है तो आज कमेंट में एक नया काम करना। किस जगह से हैं आप उस जगह का नाम कमेंट में जरूर मेंशन करना। और तीसरी बात पूरा देखना, ध्यान से देखना। अब ऐसा नहीं है कि इस बुक को मोटी बुक है। इस बुक को पूरा पढ़ना है। इसमें से नोट्स बनाए जैसी आदत है। ठीक है? अब ये नोट्स जो है मेरे को लगा जो बातें करनी चाहिए उतने ही बनाए मैंने। तो बस ये चार पेज हैं। चार पेज की बातें करेंगे। लेकिन बड़े काम की बातें हैं। तो हम आज कैसे इस चीज को समझने वाले हैं कि हम कैसे चीजें खरीदते हैं? ये चीज डिसाइड कौन करता है? तो बुक जो है बुक का नाम है डलेक्टिक ऑफ एनलाइटनमेंट। ये जो
1:32 बुक है ये लिखा हुआ है फिलॉसोफिकल फ्रेगमेंट्स। बट एक्चुअल में ये सिर्फ फिलॉसफी नहीं है। इसकी पीडीएफ भी आपको ऑनलाइन मिल जाएगी। ठीक है? यह फिलॉसफी नहीं है। इसमें साइकोलॉजी भी है। इसमें इकोनॉमिक्स भी है। इसमें पॉलिटिकल साइंस भी है। इसमें और बहुत सारी चीजें मिक्स है। और बड़ी ही दिमाग खोल देने वाली बुक है। तो ये बुक जो है इसके ऑथर हैं मैक्स हॉकेमर। बहुत फेमस जो है क्रिटिकल थिंकर रहे हैं। अभी क्रिटिकल थिंकर क्या होता है ये भी बात करेंगे। और थियोडोर एडोर्नो मेरी तरह अगर आप साइंस से रहे हैं भले ही आप इंजीनियर हैं, डॉक्टर हैं, किसी भी फील्ड से हैं तो मेरे ख्याल से ये आपको ये फील कराएगा कि यार हमने ह्यूमैनिटीज के ये वाली चीजें क्यों नहीं पढ़ी हमने? तो क्रिटिकल थिंकिंग पे बात आज करनी है। तो
2:17 पहले तो यही देख लेते हैं कि क्रिटिकल थिंकिंग होती क्या है? तो क्रिटिकल थिंकिंग क्या चीज है? क्रिटिकल थिंकिंग ये कहती है कि आप सिर्फ एक आईडियोलॉजी को मत पढ़ो। जिन लोगों को अंदाजा नहीं है थोड़ा सा मैं बैकग्राउंड दे दूं कि इस दुनिया में दो या तीन विचारधाराएं हैं जिनकी लड़ाई चलती है। कैपिटलिज्म जिसको कहते हैं पूंजीवाद जो कहता है कि माल बनाओ बेचो और कुछ मत देखो इधर-उधर। डिमांड एंड सप्लाई अपने आप बैलेंस करेगी। इनविज़िबल हैंड की बात करते हैं कि मार्केट अपने आप एडजस्ट होता है। एक होता है सोशलिज्म। इसको ऐसे समझो इजी वर्ड में ये कहते हैं कि भ रोटी, कपड़ा, मकान सबके पास होना चाहिए। उसके बाद मार्केट आता है। पॉलिसी ऐसी बनाओ। फिर बीच में एक आईडियोलॉजी आती है मार्क्सिज्म। ये ये बोलते हैं कि
3:04 दुनिया दो चीजों से बनी है। एक वो जो एक्सप्लइट करता है, शोषण करता है। दूसरा वो जिसका शोषण होता है। अब क्रिटिकल थिंकर जो होते हैं क्रिटिकल थिंकर कहते हैं नहीं। तुम सिर्फ इकोनॉमिक्स सोसाइटी इनकी बात मत करो। तो क्रिटिकल थिंकिंग वाले लोग यह कहते हैं कि एक काम करो सोशियोलॉजी को उठाओ। समाज, सोसाइटी, फैमिली उनको उठाओ। पॉलिटिकल साइंस को उठाओ। पॉलिसी कैसे बनती है? राजनेता हमारे लीडर्स कैसे वोट मांगते हैं, कैसे एक्ट करते हैं। इकोनॉमिक्स को भी लेके आओ। आपको नॉलेज होना चाहिए कि कैसे इकोनमी इंपैक्ट होती है। और फिर उसी के अंदर लेके आओ साइकोलॉजी। और फिर इन सब चीजों को एनालाइज करो विद द पॉइंट ऑफ व्यू ऑफ साइंस का लेंस कि साइंस
3:51 क्या बिना भेदभाव के चीजें बनाती है? साइंस कोई नई वैक्सीन बनाती है तो आदमी की जान बचाती है। लेकिन नया वायरस कहां से आया? नई बीमारी कहां से आई? कहीं ऐसा तो नहीं साइंस नहीं बनाया। साइंस ने जितने लोगों की जान बचाई, एटम बम फोड़ के साइंस ने कितने लोगों की जान ली? और इस साइंस को मैनेज करने में सोशियोलॉजी का, पॉलिटी का और साइकोलॉजी का क्या रोल होता है? इन सारी चीजों को जब एक साथ कोई आदमी देखता है तो ऐसा कहते हैं कि वो क्रिटिकल थिंकिंग कर रहा है। तो ये क्रिटिकल थिंकर हैं दोनों के दोनों। अब हम इनके जो पॉइंट्स थे इंपॉर्टेंट पॉइंट्स उनको आज हम स्टडी करेंगे और बड़ा मजा आने वाला है। तो इसमें सबसे पहले तो मैं थोड़ा सा बैकग्राउंड दे देता हूं आपको कि ये जो थियोडोर एडोर्नो साहब थे
4:42 ये एक्चुअल में जर्मनी में थे। अब जर्मनी में इन्होंने क्या देखा? अच्छा ये जो है ये थे जूस थे। अब इन्होंने क्या देखा? जर्मनी के अंदर आपको पता होगा नाजिज्म आया था। नाजी लोग जो थे तो इनको यहां से भागना पड़ा। अच्छा उसी टाइम इटली में फासिज्म भी आपने सुना होगा। उसको भी इन्होंने स्टडी कर रखा था। नाजिज्म फासिज्म स्टडी कर रखा था। और ये आ जाते हैं यूएसए। यूएसए में यूनिवर्सिटीज में पढ़ा रहे थे ये। जब यूएसए में पढ़ा रहे थे तो वहां पे इन्होंने खुला खेल देखा कैपिटलिज्म का। तो इन्होंने तीनों चीजें देख रखी थी। फासिज्म, नाजिज्म और कैपिटलिज्म। अब यह इन तीनों चीजों को अपनी क्रिटिकल थिंकिंग के पॉइंट ऑफ व्यू से इवैलुएट करेंगे और उस क्रिटिकल थिंकिंग की वजह से
5:29 ये जो बात लिख के जाएंगे वो बात आज उस जमाने से ज्यादा रेलेवेंट बन गई है। तो हम देखते हैं कि ये क्या कहते हैं। तो सबसे पहले इनका अच्छा ये हो गया एक और बैकग्राउंड में इनका आपको इनका बताता हूं कि इनका जो पहला पेपर फेमस पेपर पब्लिश हुआ वो पेपर जो था वो म्यूजिक के बारे में था। हां जी म्यूजिक तो जो थियोडोर एडोर्नो थे थियोडोर एडोर्नो साहब म्यूजिक के एक्सपर्ट थे बहुत जबरदस्त इनकी म्यूजिक में रुचि थी तो इन्होंने म्यूजिक को लेके अपना पहला पेपर पब्लिश किया था ये इस बुक में भी आपको मिल जाएगा अगर बुक डाउनलोड करके पढ़ोगे या जो भी है तो अब इसके अंदर इन्होंने बात करी थी कि जो आर्ट वर्क होता है दुनिया में कुछ भी क्रिएट होता है कोई
6:14 मूवी बनती है इस दुनिया में कोई भी म्यूजिक बनता है इस दुनिया में कोई भी सॉन्ग बनता है तो वह दुनिया के हर एक सेक्शन को यहां तक कि पिटी को भी इंपैक्ट करने की कैपेसिटी रखता है। यही आज की थीम है। तो इसी के अंदर हम देखेंगे कि आज कैसे ये रेलेवेंट है। तो अब देखो ध्यान से सुनना। इन्होंने क्या कहा? इन्होंने कहा कि इस दुनिया में सबसे पहली प्रॉब्लम क्या है? डलेक्टिक ऑफ एनलाइटनमेंट है। डलेक्टिक ऑफ एनलाइटनमेंट को हिंदी में अगर मैं कहूं तो यह है एक तरह का द्वंद। कि द्वंद क्या है? एनलाइटनमेंट का मतलब होता है जागरूक हो जाना। अब देखो मैं साइंस का स्टूडेंट हूं तो हो सकता है इसके लिए आर्ट्स में कोई और टर्म हो।
7:00 जागरूक कैसे होना? तो ये कह रहे हैं कि हुआ क्या? ये जो पूरी दुनिया की हिस्ट्री है इसमें अगर हम चलें तो पहले चला करते थे मिथ। पहले चला करते थे अंधविश्वास। अंधविश्वास कैसे कि कोई आदमी मरता था तो हम ऊपर वाले को ब्लेम कर देते थे। फिर आया एनलाइटनमेंट। ध्यान से सुनना। एनलाइटनमेंट मतलब जागरूकता आई। ये एनलाइटनमेंट कौन लेके आया? ये एनलाइटनमेंट लेके आया साइंस। ये एनलाइटनमेंट आया पढ़ाई से, स्टडी से। ठीक है साहब। तो दुनिया यहां पे मैं यह कहूंगा कि बंद आंखों की दुनिया थी। एनलाइटनमेंट हुआ तो दुनिया की आंखें खुल गई एकदम से। अब दुनिया की आंखें खुलने के
7:48 बाद ध्यान से सुनना। आंखें खुलने के बाद आदमी को होना चाहिए जागरूक। जागरूक का मतलब आदमी होना चाहिए अवेयर। अब यहां पर थियोडोर एडोर्नो और मैक्स साहब क्या कह रहे हैं? बहुत ध्यान से सुनना। ये कह रहे हैं कि इन्होंने आदमी को जागरूक तो किया बट उसको उतना ही जागरूक किया गया कि वो पूंजीवादी वर्ग जो है यानी कि जो कैपिटलिस्ट है उनका एक अच्छा कंज्यूमर बन जाए। उसको इतना भी जागरूक नहीं होने देना है कि वह कल को तुम्हारे लिए प्रॉब्लम करे। उसको इतना भी जागरूक नहीं होने देना है कि वह तुमसे सवाल पूछे। उसको सिर्फ इतना जागरूक करना है कि उसको यह डाउट रहे कि मैं लोगों से
8:33 ज्यादा एजुकेटेड हूं। मैं लोगों से ज्यादा पढ़ा लिखा हूं और वो आए जिए अपनी जिंदगी और दुनिया से निकल ले। मतलब वो अवेयर रहेगा। कैसे? तो एडोर्नो की जो फिलॉसफी है, एडोर्नो की जो थिंकिंग है, क्रिटिकल थिंकिंग है, वह कहता है कि अवेयरनेस में दो चीजें होती हैं। एक होता है सेल्फ अवेयर। दूसरा सोसाइटी के लिए अवेयर है। आदमी। अब यहां पर यह कह रहे हैं कि जो डायलेक्टिक ऑफ एनलाइटनमेंट है यह जो लोग अवेयर हुए हैं यह सिर्फ और सिर्फ उतने अवेयर किए गए हैं कि ये पूंजीवाद का शिकार हो सके। अच्छे ग्राहक बन सके। अच्छे कस्टमर बन
9:20 सके। अभी बात आगे चलेगी तो बड़े अच्छे से समझ में आएगी। कैसे अच्छे कस्टमर बन सकें? तो अब ध्यान से सुनना। अब थोड़ा सा इस बात को यहां कनेक्ट करो। यह जो लाइन में खड़े हैं ऐसे प्राउड से ₹1 लाख भी देंगे। सुबह-सुबह आकर लाइन में भी खड़े हो गए। और इनको क्या मिलेगा? एक फोन और उस फोन को हाथ में लेके यह शो ऑफ करेंगे कि देखो मेरे पास यह फोन है। और इनको यह फील होगा कि देखो हम हम लोगों से ज्यादा कुछ हमारे पास है। इनसे जाके एक कोई मशीन लगाओ इनको और इनसे पूछो। तो इनको ये डाउट है कि ये दुनिया से ज्यादा अवेयर हैं क्योंकि इन्होंने कुछ हासिल किया है। इधर ये भाई साहब हैं। दुनिया भर घूम रहे हैं। ऐसे सब जगह घूमिया लेकिन डिप्रेशन का
10:06 ट्रीटमेंट चल रहा है। इस तरफ कोई लड़का लड़की है। करोड़ों रुपए खर्च किए हैं डेस्टिनेशन वेडिंग अरबों रुपए फूंक दिए। होंगे पैसे फूंक दिए। बट क्वेश्चन यह है कि क्या शादी चलेगी 4 घंटे में? या 4 साल या 40 साल जैसे पहले चल जाती थी बिना इसके। इसी चीज को लिंक करता है थियोडोर एडोर्नो का जो डलेक्टिक ऑफ एनलाइटनमेंट है। इसी चीज को लिंक करती है थियोडोर एडोर्नो और मैक्स की थिंकिंग। तो अब अपन धीरे-धीरे इन चीजों को लिंक करते हैं और देखते हैं एक-एक करके। तो म्यूजिक पे इन्होंने हथोड़ा क्यों मारा? तो ध्यान से सुनना। इन्होंने ये कहा कि दुनिया में ये जो मॉडर्न दुनिया है इसमें जो सो कॉल्ड एनलाइटनमेंट आया है। यह एक्चुअल में यह कह
10:54 रहे हैं चार स्टेप की प्रोसेस है और यह चार स्टेप की प्रोसेस इस पूरी दुनिया को धकेल चुकी है एक जाल में जिसको कहा गया कल्चर इंडस्ट्री। अभी कल्चर इंडस्ट्री की बात आएगी तो बड़ा इंटरेस्टिंग भी आएगा इसमें निकल के कि कल्चर इंडस्ट्री क्या है? तो ये म्यूजिक के हिसाब से समझा रहे हैं कि सबसे पहले तो चीजों का स्टैंडर्डाइजेशन किया जाता है। स्टैंडर्डाइजेशन का मतलब क्या है? स्टैंडर्डाइजेशन का मतलब है कि मानकीकरण। मानकीकरण का मतलब कि जो पैसे वाले लोग हैं इमेजिन करो इतने लोग पैसे वाले हैं और इतने लोग वो हैं जो मिडिल क्लास हैं। इतने लोग वो हैं जो मिडिल क्लास से कम पैसे वाले हैं। पैसे वाले लोगों ने अपनी कठपुतलियां नीचे छोड़ रखी हैं। ऐसे और वह
11:41 यह सुनिश्चित करते हैं। वह यह श्योर करते हैं कि कोई भी ऐसा म्यूजिक नहीं बनना चाहिए जो अलग हो। जो अलग होगा क्या मतलब है कि जितने भी गाने आएंगे उनका सबका म्यूजिक 1920 का फर्क होगा बाकी सेम होगा आदमी को लगेगा कि कुछ नया आया है बट एक्चुअल में कुछ भी नया नहीं होगा वो उसी चीज को सुनता रहेगा अभी इस पे भी अपन जाएंगे कि कैसे ये लिंक होगा आगे तो अब ध्यान से सुनना जैसे स्टैंडर्डाइजेशन की बात आती है तो आज के टाइम में देखो कितनी सारी पहले एक चैनल चलता था एंटरटेन ेनमेंट के लिए सिर्फ एक चैनल चलता था। कोई भी एक चैनल होता होगा। फिर दो चैनल हुए, फिर 20 चैनल हुए। आज
12:26 कितने सारे कितने सारे एप्लीकेशनेशंस हैं। आपके पास YouTube है, प्राइम है, Netflix है, Apple टीवी है, HBO है। पता नहीं क्या-क्या है। इतने सारे हैं। तो होना तो ये चाहिए ना कि हर आदमी जब भी कभी उससे पूछो कि हां भाई कैसी चल रही है लाइफ? कि साहब एंटरटेन हूं एकदम मैं तो खुश हूं एकदम। बट इफ यू विल सी तो मेंटल हेल्थ इश्यूज तो बहुत ज्यादा आ गए हैं। रीजन क्या है? पहले जब एक चैनल चला करता था या जब यह भी नहीं था तो आदमी एक गाना भी सुनता था तो उसके साथ झूमता था मस्त होके। अब क्या हो रहा है? अब सबसे इंपॉर्टेंट चीज जो अभी समझने की आएगी। अब ये कह रहे हैं कि आदमी होता जा रहा है पैसिव। कि पैसिव कैसे होता जा रहा है? उसको यह पता है पहले से ही कि नई मूवी आई है। थोड़ा
13:12 बहुत चेंज होएगा। नई वेब सीरीज आ रही है थोड़ा बहुत चेंज होएगा। इसी को कहते हैं स्टैंडर्डाइजेशन। स्टैंडर्डाइजेशन का मतलब एक जैसी चीजें बार-बार बार-बार बार-बार बनाते जाओ। लोग क्या होंगे? लोग उससे इतने इंप्रेस होंगे, इतने इफेक्ट होंगे कि वो पैसिविटी में चले जाएंगे। तो अब ध्यान से सुनना एडोर्नो साहब क्या कह रहे हैं इस बुक में? एडोर्नो साहब कह रहे हैं कि जो कल्चर इंडस्ट्री है ना कल्चर इंडस्ट्री कैसे चलती है? तो कल्चर इंडस्ट्री सबसे पहले क्या करती है कि गिल द क्यूरियोसिटी। कोई भी आदमी है उसके अंदर जिज्ञासा जो है वो मत छोड़ो। खत्म कर दो उसकी जिज्ञासा को। नंबर टू किल द क्रिएटिविटी। कि क्रिएटिविटी कैसे मरेगी? जैसे कोई भी
13:59 आदमी कुछ नया करना चाहता है। उस नए को यह कहो कि नया तो कर ले लेकिन करना इतने के अंदर ही है तुझे। यहां से यहां तक ही करना है नया। इससे बाहर जाके अगर कुछ नया करेगा तो हम एक्सेप्ट नहीं करेंगे। फंडिंग ही नहीं मिलेगी तेरे को। फिर उसके बाद तीसरी बात ये है कि तीसरा स्टेप आएगा कि वो आदमी सिस्टम को एक्सेप्ट कर लेगा। अब ध्यान से सुनना। अब इस चीज के अंदर बहुत ही इंपॉर्टेंट जो है कनेक्शन निकलेंगे। अब इसको स्टैंडर्डाइजेशन को म्यूजिक से निकाल के सोसाइटी पे लेके आते हैं। कि सोसाइटी में क्या फर्क पड़ा है इस स्टैंडर्डाइजेशन से। तो चलो चलते हैं अपन सबसे इंपॉर्टेंट चीज पे सिलेबस स्कूलों का सिलेबस तो आप जाओ स्कूलों के अंदर जाके और स्कूल छोड़ो कॉलेज बच्चा स्कूल को अपनी जिंदगी के 12
14:48 साल रोज 8 घंटे सिंसियरिटी के साथ देता है। 12 साल 8 घंटे रोज उसने अपनी लाइफ की सिंसियरिटी के साथ स्कूल को दिए। उस सिलेबस को दिए जो सो कॉल्ड इंटेलेक्चुअल्स ने डिजाइन किया है। फिर उसके बाद उसको पता लगता है कि अगर खुद को जानना है तो तुझे तो कॉलेज जाना पड़ेगा। अब वो कॉलेज जाता है। कॉलेज में फिर वो 3 साल स्पेंड करता है। फिर उसको पता लगता है नहीं तुझे तो अभी पीजी करनी है। वो फिर 2 साल स्पेंड करता है। फिर उसे पता लगता है पीएचडी करनी है। फिर वो 3 साल स्पेंड करता है। लास्ट में उसको पता लगता है कि जॉब मिलेगी या नहीं मिलेगी ये अभी तय नहीं है। बिकॉज जॉब किससे लगती है कि जॉब डिग्रियों से नहीं लगती। जॉब स्किल्स से लगती है। अब क्वेश्चन यह है कि उस बच्चे को यह सवाल पूछना चाहिए था कि 12 साल 8आ घंटे दिए।
15:38 3 साल भी दो-ती घंटे रोज दिए होंगे। 2 साल मतलब 12 और तीन 15 दो 17 तीन 20 साल एक आदमी ने अपनी जिंदगी के। और ये कौन से वाले साल हैं? जवानी वाले साल हैं। एक आदमी ने अपनी जिंदगी के 20 साल एजुकेशन को दे दिए। और एजुकेशन उसको एक नौकरी नहीं दे सकती। और ये कह रहे हैं तेरे अंदर स्किल नहीं है। अगर स्किल नहीं है तो इसको सिखाया क्या 20 साल तक? नंबर वन। नंबर टू यही बच्चा अगर 12th से पहले ही पढ़ाईवढ़ाई छोड़ के कोई काम सीख लेता और पांच एक साल काम सीख लेता वो अपने हाथों से इतना कैपेबल होता अपना परिवार पाल लेता। हो सकता है चार और लोगों को नौकरी दे देता। अब ऐसा वो डिसीजन क्यों नहीं ले पाया? रीज़ स्टैंडर्डाइजेशन। स्टैंडर्डाइजेशन का मतलब
16:23 हमने फिक्स कर दिया है कि सक्सेस का रूट है तो यही वाला है। आपको यहां से ले यहां तक जाना ही पड़ेगा। अभी और एग्जांपल लेते हैं। ठीक है? अब ध्यान से सुनना। थियोडोर अडोर्नो कहते हैं कि बात ये नहीं है कि सबको एक जैसा बना रहा है सिस्टम। बात यह है कि सबको एक जैसा बनाते बनाते हम लोगों को सिखा रहे हैं बिना क्वेश्चन पूछे एक्सेप्ट कर लेना। बिना क्वेश्चन पूछे जब कोई जनरेशन हर चीज को एक्सेप्ट करने लग जाएगी तो वह जनरेशन जो है वह जनरेशन क्राउड में कन्वर्ट हो जाएगी। ऐसी क्राउड जिसके पास सिर्फ एक चेहरा होगा। उनसे पूछोगे भाई तू यह क्यों कर रहा है? उनको कोई पता नहीं है क्यों कर रहा है। बस करना है। रीज़ आगे वाला कर रहा है, पीछे वाला कर
17:08 रहा है। 100 लोग नारा लगा रहे हैं तो 101वां भी नारा लगाएगा। यह है पैसिव कंजशन का पहला जो इंट्रोडक्शन जिसकी बात करें स्टैंडर्डाइजेशन की बात जब आती है तो अब ध्यान से सुनना। दूसरी चीज ये क्या कहते हैं? दूसरी चीज कहते हैं कि ये सिस्टम जो है जनरेट होगा इस तरह से। ये सिस्टम आपको शूडो इंडिविजुअलिज्म का फील देगा। शूडो इंडिविजुअलिज्म क्या होता है? शूडो इंडिविजुअल के लिए कहा गया है कि यह सबसे खतरनाक और सबसे चालाक चीज है इस सिस्टम की। इसमें क्या होगा? सूडो इंडिविजुअलिज्म में आपको यह बहम होगा कि आप चूज कर रहे हैं। आपको यह फीलिंग दी जाएगी कि यू आर द किंग बिकॉज़ यू आर कस्टमर। तो आप जैसे ही
17:54 अंदर घुसोगे शॉप के आपको ऐसे लगेगा अरे चार तरह की चीजें हैं। इनमें से एक चूज़ करनी है। एक्चुअल में उन्होंने डिसाइड ही ये किया है स्टैंडर्डाइजेशन। इन चार में से एक लेके ही जाएगा यहां से। बट तब तक आपको यह फील कराया जाएगा यू आर द कंज्यूमर। और आपको एक फॉल्स सेंस ऑफ़ स्मार्टनेस दिया जाएगा कि आप स्मार्ट हो। आपने चार वेबसाइट थी। चारों पे रेट कंपेयर किया और आपने वहां से ऑर्डर किया है जहां पे 5% रेट कम था। अब यहां पे थियोडोर एडोर्नो क्या बोलते हैं कि यह पूरा सिस्टम ही गड़बड़ है कि सिस्टम क्यों गड़बड़ है कि पहले क्या होता था और अब क्या होता है? तो अडोर्नो कहता है पुराना सिस्टम जो था उसमें जो कंज्यूमर था वह एक्टिव रोल प्ले
18:39 करता था। एक्टिव रोल प्ले करने का मतलब क्या है कि कंज्यूमर जो था उसकी पहले नीड जनरेट होती थी। फिर उस नीड पे वो कॉज लगाता था या लॉजिक लगाता था कि भ बिना इसके काम चल जाएगा क्या? और फिर वो तब भी काम नहीं चलता था। तो तब वो डिमांड जनरेट करता था। और जब वह डिमांड जनरेट करता था तब उस चीज की सप्लाई आती थी और फिर मार्केट रन होता था। अब जो नया सिस्टम आया है उस नए सिस्टम ने मैंने बार-बार बोला ये वर्ड कि कंज्यूमर जो है उसको बना दिया है पैसिव। अब जैसे ही पैसिव कंज्यूमर बन गया तो हो क्या रहा है सिस्टम में? पहले प्रोडक्शन हो रहा है। ध्यान से सुनना। पहले प्रोडक्शन हो रहा है। प्रोडक्शन के बाद
19:25 पहले सप्लाई हो गई है। सप्लाई होने के बाद एडवर्टाइजमेंट आएगा और एडवर्टाइजमेंट आने के बाद आदमी के दिमाग में एक थॉट आएगा और वो थॉट भी कैसा पैसिव थॉट आएगा और उस पैसिव थॉट की वजह से वो आदमी अब बनेगा कंज्यूमर। अब कहीं भी इसमें क्वेश्चन नहीं आया कि क्या आपको जरूरत थी? जैसे किसी आदमी ने अपना फोन अपडेट किया तो क्या आपको जरूरत थी कि नहीं? क्यों खरीद के लाए कि इसका कैमरा अच्छा है? मतलब कैमरा और फोन क्या कनेक्शन है? नहीं चाहिए। रीजन क्या था? बस मुझे फोटो डालनी है। कहां डालनी है? बस स्टेटस अपडेट करना है। फोन खरीद के गाड़ी खरीद के नई गाड़ी। तो ये नए वाला सिस्टम
20:12 जो है इसमें बार-बार पैसिवनेस की बात करते हैं। अब इसको पॉलिटिकल साइंस से कैसे कनेक्ट करेंगे उसकी बात भी करेंगे। तो अब यह जब शूडो इंडिविजुअलिज्म की बात करते हैं तो यह कहते हैं कि देखो मार्केट में आदमी जैसे एग्जांपल देते हैं शैंपू लेने गया तो आप शैंपू लेने जाओ तो आपको हो सकता है शैंपू के 10 ब्रांड मिले। अब उन 10 ब्रांड के सामने आपको एक शॉपिंग मॉल में ऐसे खड़ा कर देगा यह सिस्टम कि आपको ऐसे फील होगा कि आप बड़े एजुकेटेड और बड़े वो हो और फिर कई उठा उठा के आप चेक भी करोगे कौन से वाला शैंपू कैसा है और फिर आप उनमें से कोई एक विटामिन ये वो फलाना डिमाना वादे कर रखे होंगे वो आप खरीद के लाओगे एक्चुअल में वो ये कहते हैं थोडोडोर्नो कि इनको जब पढ़ोगे अंदर बैठ के इनका लेबल तो पता
20:58 लगेगा 99.9% शैंपू में सोडियम लोराइल सल्फेट या कोई और लोराइल सल्फेट वेट होगा 99% आर सेम और तो और इनके मेकर सेम है टूथपेस्ट के लिए वो आज का एग्जांपल देखोगे उसमें भी आपको सेम चीज मिलेगी सेम इज केस विद आप ने अगर कोई सिम ले रखी है कंपनी ए की आप चाहे बी की ले आओ सी की ले आओ डी की ले आओ सबके डाटा पे पैक का रेट सेम है ऑलमोस्ट सेम है सेम इज विद Ola Uber दीज़ थिंग्स। तो यह शूडो इंडिविजुअलिज्म की फीलिंग देता है आपको कि आपकी कुछ पहचान है। आपकी कुछ वैल्यू है। कोई वैल्यू नहीं है। स्टैंडर्डाइजेशन कर दिया गया है मार्केट का। आपको उसी उन्हीं दो ए और बी के बीच में बाउंस होना है। अब देखो अगली चीज
21:46 कॉमोडिफिकेशन द मोस्टेंट कांसेप्ट। कॉमोडिफिकेशन जो है यह कहता है कि पहले जो कल्चर हुआ करता था जो लाइफ के इवेंट हुआ करते थे वो हैप्पीनेस के लिए सेलिब्रेट किए जाते थे। अब आपका कल्चर आपके लाइफ के इवेंट जो हैं वो बन गए हैं कमोडिटी। वो बन गए हैं प्रोडक्ट। और अगर प्रोडक्ट बन गए हैं तो उनकी लगी है सेल। फॉर एग्जांपल वैलेंटाइंस डे। वैलेंटाइंस डे या न्यू ईयर। अब वैलेंटाइन डे पर को अगर आप देखोगे तो इतना बड़ा मार्केट तैयार हो गया है। रीजन के एक्सप्रेशन ऑफ लव। ठीक है? मदर्स डे, फादर्स डे ये सारी चीजें क्या है? ये सारी की सारी चीजें एडोर्नो साहब कहते हैं
22:32 फीलिंग्स हैं। प्यार आपका किसी के लिए भी हो सकता है। टीचर के लिए भी प्यार हो सकता है। रिस्पेक्ट हो सकती है। ये सारी चीजें क्या है? फीलिंग्स हैं। पहले सिर्फ फीलिंग्स एक्सप्रेस करी जाती थी और कभी भी कर देते थे। अब मार्केट क्रिएट करने के लिए उन फीलिंग्स का एक दिन डिसाइड करना पड़ेगा। तो यह इतने वाइज और इतने चालाक लोग हैं सिस्टम बनाने वाले। इन्होंने पूरे साल की टीचर की रेस्पेक्ट के लिए एक दिन बना दिया टीचर्स डे। अब पहले नंबर पे टीचर्स डे आया। दूसरे नंबर पे फिर के नहीं इसके साथ एक चीज और ऐड करो। गिफ्ट कहां से आया गिफ्ट? जैसे ही गिफ्ट ऐड कर दिया वो बन गया एक कमोडिटी। सेम इज केस विद वैलेंटाइंस डे। अच्छा सेम इज केस विद मुस्लिम्स, हिंदूस, क्रिश्चियंस एवरीवेयर।
23:17 यहां तक के जो स्पिरिचुअलिटी थी, ध्यान से सुनना। किसी आदमी की लाइफ में सबसे इंपॉर्टेंट चीज होती है प्राइवेसी। प्राइवेसी के अंदर उसके क्या-क्या आता है? प्राइवेसी में आती है उसकी फैमिली। क्यों भाई अपनी फैमिली के बारे में अनजान आदमी को क्यों बताएगा कोई आदमी? किसी आदमी की प्राइवेसी में दूसरे नंबर पर आती है उसकी पर्सनल लाइफ। तीसरे नंबर पर उस आदमी का सबसे प्राइवेट जो पार्ट आता है वह आता है स्पिरिचुअलिटी। उस आदमी की लाइफ की स्पिरिचुअलिटी मतलब अब स्पिरिचुअलिटी में क्या आएगा कि आप गॉड को मानते हो नहीं मानते हो। गॉड को मानते हो तो कौन से रिलीजन को फॉलो करते हो? रिलीजन में कौन से वाले कल्चर को फॉलो करते हो? ये सारी चीजें प्राइवेसी हुआ करती थी। हुआ करती थी। यह जो सिस्टम जैसे ही आया इसने
24:05 फैमिली को इसने पर्सनल लाइफ को स्पिरिचुअलिटी को हर चीज को सबसे पहले कोर सबसे सीक्रेट चीज होती थी स्पिरिचुअलिटी कि भोजन और भजन तो चुपचाप होना चाहिए। आंख बंद करो मन मन में। इसको इन्होंने बना के रख दिया प्रोडक्ट। रीज़ रीज़ इज कमोडिफिकेशन। हर चीज उनके लिए कमोडिटी है। भले ही किसी की डेथ हुई हो। भले ही किसी की डेड बॉडी के लिए कफ़न चाहिए हो। एवरीथिंग इज कमोडिटी इन मार्केट ऑफ कैपिटलिस्ट। ठीक है? अब वो रिलीजन हो सकता है। रिलीजियस कुछ भी हो सकता है। ठीक है? फिर आगे चलते हैं। मैंने कहा फीलिंग्स को ये लोग सेल करते हैं। तो आपने देखा होगा कार लेनी है तो कार लेनी नीड हुआ करती थी। बट आपने देखे होंगे ऐड
24:52 ऐसे कि ले जाओ खुशियों की चाबी। या उनके पास तो वह कार है तो वह स्मार्ट है। रीजन दे आर सेलिंग यू द फीलिंग्स। और किस आदमी को फीलिंग्स सेल करना आसान होता है। फीलिंग्स किसी भी आदमी से सेल करना या एनकैश करना उस टाइम आसान है जब वो आदमी पैसिव है। जब आदमी के अंदर लॉजिक कम है। और लॉजिक कैसे निकलेगा? लॉजिक तब दिमाग से बाहर आएगा जब आप प्रोसेस को स्टैंडर्डाइज कर दोगे। थोड़ी एक मिनट के लिए यह चीज सोचने की है कि एक कोल्ड ड्रिंक का ब्रांड आता है। वो आपको मुश्किल से यह मान के चलो 10 मिनट के लिए उसका टेस्ट रहता होगा जबान पे। लेकिन हर रोज हर सेकंड हजारों बोतल्स बिकती है। रीजन क्या है? पैसिवनेस। कारें मतलब ब्रांडेड कारें हो या कोई सी भी कार
25:40 हो। मतलब अब ये ट्रांसपोर्टेशन का मीडियम नहीं है। अब यह आपका सर्टिफिकेट बन गया। आपकी हैसियत क्या है? और इसके लिए 90% लोग ईएमआई भर रहे हैं। रीजन कि भाई बस कॉमोडिफिकेशन Instagram के ऊपर देखा होगा कहीं घूम के आए हैं तो शो ऑफ चल रहा है। ठीक है? लाइफ को एक तमाशा बना दिया स्पेक्टिकल। ठीक है? ट्रिप घूमने कम जा रहे हैं। फोटो ज्यादा खींचनी है। आपको पता है छ से सात सॉरी 60 से 70% लोग कर्जा ले लेके घूमने गए हैं। ईएमआई पे ट्रिप ली है उन्होंने। रीज़न कि यही है। और आगे चलो। कोई अपनी बॉडी से खुश नहीं है। रीजन कोमोडिफिकेशन। आपकी बॉडी जो है वो एक प्रोडक्ट बन गई है। भाई ये वाला प्रोटीन पाउडर खा लो। आप ये खा लो। आप ये क्रीम लगा लो। आप गोरे हो जाओ। आप काले हो जाओ। एनर्जी ड्रिंक्स। इस पे मैंने बात करी थी
26:25 कि कैसे मार्केटिंग हुई है इसकी? फिर उसके बाद आगे चलोगे घड़ियां। अब घड़ी जो है उसका पर्पस क्या है? टाइम बताना। नहीं। घड़ी का पर्पस है स्टेटस बताना। आपने महंगी घड़ी पहन रखी है। भले आपकी किडनी बिकी हो। आपने ऐसे लोग बहुत देखे होंगे जिन्होंने ईएमआई पे महंगा फोन लिया होगा। ईएमआई पे जिन्होंने ये रीजन उनसे पूछो बैठ के तुमको नीड थी तो तब आपको समझ में आएगा कि एक्चुअल में हुआ क्या है वो आदमी इस सिस्टम का विक्टिम है। हमारे बुजुर्ग जो हुआ करते थे वो इस सिस्टम पे चला करते थे। ओल्ड सिस्टम जिसके अंदर पहले नीड आती थी। फिर नीड पे लॉजिक लगाया जाता था। डू आई नीड दिस? क्या अभी खरीदना जरूरी है? क्या इतने का ही खरीदना जरूरी है? तब जाके वो डिमांड जनरेट किया करते थे। फिर उसके बाद
27:11 आगे अपन बात करेंगे कि भाई अब लोग क्या कर रहे हैं? पैसिव कंजमशन कर रहे हैं। पैसिव कंजमशन करने का मतलब क्या है? बस खरीदना है। मतलब आप आपने देखा है कॉफी। अब कॉफी जो होती है, कॉफी के कप के अंदर क्या है? इससे ज्यादा इंपॉर्टेंट ये हो गया कि कॉफी के ऊपर ब्रांड कौन सा लिखा हुआ है? मतलब आदमी की वैल्यू एजुकेटेड, ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट, डॉक्टेट किया हुआ आदमी सिर्फ उस कॉफी का एक ब्रांड है। मैं नाम यहां लूंगा नहीं। उसकी ऐसे फोटो डालता है स्टेटस पे। मतलब उससे ज्यादा औकात उस खाली कप के खोखे की है। ये एक अचीवमेंट है उसकी लाइफ की। भाई रिसर्च पेपर छापा है क्या तूने जो फोटो लगा रहा है यहां पे। चॉकलेट का ब्रांड। ठीक है? खा के और ऐसे दिखा रहे हैं कि यह वाली चॉकलेट खाई आज हमने। ठीक है? जूते। स्नकर के नाम पर ₹-5000 के
27:59 जूते, ₹00 के जूते, ₹ लाख के जूते लेके आए 3 महीने पहना फेंक दिया। मतलब आपसे ज्यादा वैल्यू जूतों की है। ठीक है? हर चीज जो है पैसिव कंजमशन के अंदर जब आ रही है। फॉर एग्जांपल पुराने टाइम में आदमी एक देश घूम जाता था तो वो इब्नबतूता बन जाता था। आदमी मतलब अपने आप में एक स्कॉलर हो जाता था। हिनसांग फायान इन्होंने जर्नी करी। ट्रेवल किया। डार्विन ने ट्रेवल किया। वर्ल्ड में फेमस हो गए। आज 50-50 कंट्री घूमे हुए लोग ऐसे मिल जाएंगे। आपको लगेगा यार ये मतलब स्कॉलर कहां है? रीजन वो घूमने नहीं गया था। वो गया था शो ऑफ करने। ठीक है? हेल्थ है हर सेक्टर जो है उसके अंदर आपको पैसिव कंज्यूमर बना दिया गया है। अब ये जैसे ही पैसिव कंज्यूमर बन जाता है आदमी तो उस टाइम पे क्या होता है कि वो आदमी काइंड ऑफ
28:45 रेस में दौड़ने लग जाता है। अब जब रेस में दौड़ेगा तो एक नई चीज आएगी। वो नई चीज क्या आएगी? यह भी सुनो ध्यान से। तो ओल्ड सिस्टम जो था उसमें आपने देखा होगा कि एक मेंबर जो था घर में वो कमाई किया करता था। ज्यादातर फैमिली में एक मेंबर कमाई करता था और पूरी फैमिली साथ में रहती थी। खाना खाते थे। सारे खर्चे चलते थे उनके और सबसे बड़ी चीज उनके पास जो थी वह थी हैप्पीनेस। अब नया सिस्टम आया। इसमें क्या हो रहा है? या तो दो मेंबर या दो से ज्यादा मेंबर अर्निंग कर रहे हैं। अब यह जो अर्न कर रहे हैं दो से ज्यादा मेंबर तो भी जो फैमिली है उसके पास सबसे इंपॉर्टेंट चीज नहीं है जिसको कहते हैं
29:31 हैप्पीनेस। अब जब हैप्पीनेस नहीं है तो इसका रीजन क्या है? तो उस केस में जो एक्सपर्ट्स हैं इनके ऊपर कमेंट्स भी किए हैं बाद में। बहुत सारे लोगों ने एनालाइज भी किया है। तो उन्होंने क्या कहा? उन्होंने कहा कि पहले आदमी के पास दो तरह का टाइम होता था। एक वर्क और एक सेल्फ। ध्यान से सुनना। यह आदमी का दिन हुआ करता था। वर्क एंड सेल्फ। ध्यान से सुनना। वर्क मतलब जितनी देर वो ऑफिस में या फैक्ट्री में है उतनी देर वो अपने मालिक का है। उसका टाइम उसके बॉस का है। उसका टाइम नहीं है। सेल्फ मतलब उसके बाद वो घर आ जाता था। और वो टाइम जो था उस टाइम पे उसका एंटरटेनमेंट होता था। अब ये जो नया सिस्टम आया है, इसने क्या किया है? इसने आदमी को कहा वर्क। फिर उसके बाद सेल्फ। लेकिन उसका जो सेल्फ
30:18 है उसके अंदर भी लिपटा हुआ है वर्क और फिर अगले दिन फिर वर्क। तो आदमी एक साइकिल में चल रहा है। ऐसे ऐसे ये वर्क और ये सेल्फ। अब यहां पर एक बहुत इंपॉर्टेंट डायलॉग आता है। ध्यान से सुनना। वो डायलॉग क्या है? वो डायलॉग है अम्यूजमेंट इज प्रोलोंगेशन ऑफ वर्क। अम्यूजमेंट इज प्रोलोंगेशन ऑफ वर्क। यह मैंने नहीं कहा। यह थियोडोर अडोर्नो की कही हुई बात है। अम्यूजमेंट का मतलब एंटरटेनमेंट। मतलब खाली टाइम जो है ऑफिस के बाद उस टाइम पे आप क्या करते हो? तो ध्यान से सुनना। ये ये कह रहे हैं कि आप जिनके यहां काम
31:04 करते हो। इमेजिन करो आप एंप्लई हो। और आप जिस आदमी के यहां काम करते हो जब काम से घर आए घर आओगे मतलब ये वाला पार्ट हो गया आपका वर्क वाला टाइम ठीक है मान लो 9:00 से 5 की जॉब है आपकी अब सुबह 9:00 से पहले और शाम को 5 के बाद आप क्या करोगे आप अम्यूजमेंट यानी एंटरटेनमेंट में घुसोगे अब एंटरटेनमेंट में अगर उस आदमी ने कुछ ऐसा पढ़ लिया कुछ ऐसी डिस्कवरी कर ली जो उसको सेल्फ से मिलवा दे सेल्फ का मतलब मतलब उसको यह पता लग जाए कि मैं क्या चाहता हूं। मैं कौन हूं? मेरी लाइफ का पपस क्या है? मेरी लाइफ का गोल क्या है? तो वो आदमी जो है वो आदमी बहुत ज्यादा टाइम तक
31:50 इस वर्क कल्चर में गुलाम नहीं रहेगा। वो जल्दी से इससे बाहर आ जाएगा। तो अब ध्यान से सुनना जो थियोडोर साहब हैं वह यह कह रहे हैं कि इन लोगों ने जिनके यहां आप काम करते हो इन्होंने यह सुनिश्चित किया यह इंश्योर किया कि वर्क कल्चर के बाद जब आप अम्यूजमेंट में आओ खाली टाइम में आओ तो आप जो गाना सुनोगे आप जो मूवी देखोगे आप जो टीवी देखोगे आप जो न्यूज़ सुनोगे आप जो डिबेट सुनोगे प्राइम टाइम की या आप जो न्यूज़ पेपर पढ़ोगे यहां तक कि आप जो बुक्स भी पढ़ोगे उन सब में कहीं भी ऐसा कोई कॉमोनेंट नहीं होना चाहिए जो आपको अवेयर बनाए। उन सब में कॉम्पोनेंट क्या होना चाहिए कि आपको
32:37 मैक्सिमम पैसिवनेस में धकेला जाए। आप क्वेश्चन खुद से पूछोगे तो कल को उनसे भी पूछना शुरू कर दोगे। दिस इज पर्पस ऑफ दिस सिस्टम। इसीलिए आप जब टीवी देखोगे बिग बॉस क्या है? 99% लोगों को पता है स्क्रिप्टेड है बट देखे जा रहे हैं और प्राउड से देख रहे हैं भाई और गजब की बात है यंगस्टर्स लगे पड़े हैं एक आदमी जो पता है कि भाई इसकी ना एजुकेशन है ना कोई एनलाइटमेंट है ना इसको कुछ पॉलिटी का पता है कुछ नहीं पता बेचारे को ये तो भोला आदमी है ये तो पढ़े जा रहा है जो सामने स्क्रीन पे लगा दिया वो जेब में हाथ डाल के जो बोल दिया वो बोल दिया इसने बट वो चले जा रहा है सालों से ठीक है फिर दूसरे नंबर पे आईपीएल मतलब मतलब दो टीमें लड़ रही हैं और उसमें
33:24 सेलिब्रेशनंस चल रहे हैं। रीजन कीप देम बिजी। जब तक वो बिजी रहेंगे तब तक वो हेल्थ का नहीं पूछेंगे। तब तक वो एजुकेशन का नहीं पूछेंगे। लेट देम फील फॉल्स प्राइड। और तीसरे नंबर पे महान जो लेखक हैं आपने देखा होगा कि भाई एक शो है उसके 4-400 एपिसोड चलते हैं और बैठ के देखे जा रहे हैं। और बची खुची कसर पूरी करने के लिए आ गया अपना रील कल्चर। एक रील जिस पर 20 मिलियन व्यू है। रील में क्या है? एक लड़की नाच रही है। गाना किसी और का है। 1 सेकंड के लिए 1 मिनट के लिए वो नाच के चली गई। 20 मिलियन व्यू का मतलब कभी कैलकुलेट किया है? 20 मिलियन मिनट। 20 मिलियन मिनट को जब कैलकुलेट करोगे तो पता लगेगा जीडीपी
34:10 कहां जा सकती थी। रीज़ इज द सेम कि पैसिवनेस जितना हो सके पैसिवनेस लेके आओ। अब सवाल आता है कि व्हाट इज रॉन्ग विद पैसिवनेस? ये क्यों दिक्कत क्या है आपको? हम पैसिव बन रहे हैं। पैसे हैं हमारे पास। हम खरीदे जा रहे हैं। पैसिवनेस से दिक्कत यह है थियोडोर अडोर्नो ये कहते हैं कि पहले आदमी बनता है पैसिव एंटरटेनर। कोई भी कंट्री है उस कंट्री का सत्यानाश। कोई भी सोसाइटी का सत्यानाश तीन स्टेप में होता है। कोई भी कल्चर, कोई भी सोसाइटी, कोई भी कंट्री, कोई भी रिलीजन इस बर्बाद हो सकता है इस स्टेप से। पहले नंबर पे उनको पैसिव एंटरटेनमेंट में घुसा दो। पैसिव एंटरटेनमेंट का मतलब उन्हें पता ही
34:56 नहीं कि जो देख रहे हैं उसका खोपड़े पे क्या असर होगा। उनको आदत हो जाए ऐसी चीजें देखने की जिसमें दिमाग नहीं लगाना। बस बकवास चल रही है। उनसे पूछो इसे देख के आपकी लाइफ में क्या चेंज आया? कुछ नहीं। उनको पूछो इस मूवी को देखा इससे क्या फायदा हुआ? कुछ नहीं। एंटरटेनमेंट है। कितना याद है? कुछ नहीं है। रीजन पैसिवनेस। जब वो पैसिव एंटरटेनर बन जाएंगे नेक्स्ट स्टेज आएगा पैसिव कंज्यूमर। देश बर्बाद करने की स्ट्रेटजी बता रहा हूं। ये मैं किसी की कंट्री खत्म करनी हो तो। पैसिव कंज्यूमर मतलब नई जनरेशन खरीददारी कर रही है। उसको पूछो जरूरत थी क्या इसकी? नहीं। बस ऐसे ही कल्चर चल रहा है आजकल चल रहा है फास्ट फैशन जैसे चलता है चल रहा है ठीक है कूल है इसलिए कर रहे हैं घूमने क्यों गए कूल लगता है ठीक है माय लाइफ माय
35:42 रूल माय लाइफ माय रूल में क्या है कि बस मैं डिसीजन ले रहा हूं तू नहीं ले रहा तू कठपुतली बन गया है बर्बादी का चरण आ रहा है तीसरी स्टेज फिर क्या आएगी अब ध्यान से सुनना पैसिव पैसिव अब ये लोग वर्क क्लास पे भी पैसिव हो जाएंगे वर्क क्लास पे पैसिव का मतलब बंदे को पेंटिंग करनी करनी थी बट उसने इंजीनियरिंग इसलिए कर ली क्योंकि सब कर रहे थे। ठीक है? बंदे को म्यूजिक सीखना था बट उसने एमए हिस्ट्री इसलिए कर ली क्योंकि सब कर रहे थे। उसने पीएचडी इसलिए कर ली कि सब कर रहे थे। सब फॉर्म भर रहे थे। उसने भी फॉर्म भर दिया। जिया मरा खत्म। खेल खत्म। पैसिव वर्क पे आएंगे। तभी तो क्या होगा? यह लोग आगे चल के थियोडोर अडोर्नो कहते हैं बन जाएंगे
36:28 पैसिव वोटर। पैसिव वोटर का मतलब सरकार कुछ भी करे इनमें हिम्मत नहीं रहेगी सवाल पूछने की। किसको वोट देना है कोई फर्क नहीं पड़ता। पार्टी चेंज हो गई हमें क्या लेना देना? ठीक है? कंट्री पे अटैक हो रहा है हमें क्या लेना देना? ये हो रहा है हमें क्या लेना देना? बिल्कुल पैसिवनेस आ जाएगी। जैसे ही ये पैसिवनेस एक लेवल आगे चलती है। तो फिर उन लोगों को क्या होता है? यहां आती है सोशल सीमेंटिंग। ध्यान से सुनना। सोशल सीमेंटिंग क्या होती है? सोशल सीमेंटिंग में थ्योरी आती है एलिगोरी ऑफ केव। एलिगोरी ऑफ़ केव पे फिर कभी बात करेंगे। लेकिन इसको ऐसे समझो कि अगर पूरी क्राउड जो है वो पैसिव पैसिव थिंकिंग वाली है और इनके बीच में कोई ऐसा आ गया जो एक्टिव थिंकिंग वाला है तो इनको यह बुरा
37:13 लगेगा। पैसिव पैसिव वाले आपस में मिलेंगे और मिलके यह बन जाएंगे फैन। किसके फैन बन जाएंगे? खुद के जैसे ब्रेनलेस कोई आइडियल के। तो इनके जो आइडियल होते हैं वो ज्यादातर या तो उनका ब्रेन होता ही नहीं है। खोपड़ा ही नहीं होता उनके पास या फिर उनकी एजुकेशन बहुत कम होती है। आपने इंडिया में देखा होगा यूर्स कोई दसवीं फेल है। कोई कुछ एजुकेशन कोई गालियां दे रहा है। गंदी गंदी कोई कुछ कर रहा है। कोई फुहड़ जोक्स सुना रहा है। और उनके फॉलोअ देखो मिलियंस में है। यह कौन है? यह फैन कल्चर है। टॉक्सिक फैन कल्चर। इसका क्या इंपैक्ट है? इसकी भी बात करेंगे। अब जैसे ही कोई कंट्री में फैन कल्चर इंजेक्ट हो गया तो वहां से क्या होगा? जो लोग इंटेलेक्ट्स होंगे
38:01 इंटेलेक्चुअल्स जो होंगे वो उस कंट्री से एस्केप मारना शुरू कर देंगे या वो साइलेंट हो जाएंगे। वो चुप रहना शुरू कर देंगे। बोले करने दो यार इनको जो करना है। जैसे ही ये चुप रहना शुरू होंगे तो ये शुरू कहां से होगा? यह शुरू होगा फैमिली से। फैमिली से शुरू कैसे होगा? कि फैमिली में मान लो ग्रैंडफादर वाली जनरेशन है। दादाजी बाबा जिनको बोलते हैं वो वाली जनरेशन है। दादी है। उनके नीचे मां-बाप है। फादर मदर इमेजिन कर लो यहां ग्रैंड मदर यहां मदर। और फिर उनके नीचे बड़ा भाई है। ब्रदर या सिस्टर है। और यहां पे वो सो कॉल्ड फैन। हम तो उसके फैन हैं। उस भाई के फैन हैं। यह वाले ब्रेनलेस लोग हैं यहां पे। अब यह इनकी सुन ही नहीं रहा। तो सुन नहीं रहा।
38:48 तो यह खुद को साइलेंट कर लेगा। जैसे ही यह साइलेंट कर लेगा तो अगला स्टेप क्या होगा कि फैमिली जो है वह कोलैप्स कर जाएगी। फैमिली कोलैप्स क्यों कर जाएगी? क्योंकि आपने अथॉरिटी स्नैच कर ली। अथॉरिटी स्नैच कर ली, फैमिली कोलैप्स कर जाएगी। जैसे ही फैमिली कोलैप्स कर जाएगी, यह लोग और ब्रेनलेस हो जाएंगे और इजी विक्टिम बन जाएंगे। रीज़ अब इनके पास कोई नहीं है जिससे अपनी बातें शेयर कर सके। अब ये जो ब्रेनलेस विक्टिम्स होते हैं या ये जो सोसाइटी होती है इसमें क्या होता है? इसमें बड़ा इजी होता है होप्स बेचना। फॉर एग्जांपल कोई एक कंपनी आएगी आके पढ़ी लिखी लड़कियों को बेवकूफ बना के जाएगी। पीजी पोस्ट पीजी करी हुई लड़की गोरा बनने में लग जाएगी कि मेरे को गोरा बनना है। यह
39:33 क्वेश्चन पूछना चाहिए हमें खुद से कि दुनिया में स्किल्स इंपॉर्टेंट है या स्किन का कलर इंपॉर्टेंट है। अगर नहीं है तो आप अपने चारों तरफ नजर डालो और देखो लड़कियां फिल्टर क्यों यूज करती हैं? फोटो खींचते हैं ना तो फिल्टर यूज कर रही हैं लड़कियां। रीजन उनको गोरा दिखना है। तो इनको होप सेल करनी है। इसीलिए करोड़ों रुपए का मार्केट बन गया उन क्रीम्स का जो गोरा बनाती हैं। करोड़ों रुपए का मार्केट बन गया उन चीजों का जो प्रॉमिस करते हैं कि वी विल मेक योर किड्स स्मार्टर एंड शार्पर। औरों से और शार्प करेंगे तुम्हारे बच्चों को। शार्प करके क्या मतलब यह पेंसिल है। इसको शार्पनर में डाल के शार्प करोगे तुम। ठीक है? फिर उसके बाद अगली इंपॉर्टेंट चीज आती है। जब यह विक्टिम बन जाते हैं इन चीजों के
40:19 पैसिव लोग हो जाते हैं तब आएंगे न्यूमरोलॉजी एक्सपर्ट कि भाई तुम्हारे मोबाइल नंबर जो है वो आठ से शुरू होगा ना तो तुम्हारा यह काम बन जाएगा। तुम्हारी डेट ऑफ बर्थ क्या है कि साहब 12th है तो तुम्हारा मूलांक तीन है। तीन मूलांक वाले लोग तो ऐसे होते हैं। वैसे होते हैं। फिर यहीं पे आएंगे एस्ट्रोलॉजी वाले लोग। वो आपको बताएंगे कि भाई साहब आप क्या करो? आप ये वाला करो ये करो वो करो। यहीं पे आएंगे फेंगुई वाले आप कमरे में यहां कछुआ रख लो यहां यह रख लो और गजब का ऐसेसे लोग आएंगे हाथ में दो कुछ नहीं है ऐसे दो पकड़ रखे हैं इलेक्ट्रॉनिक डमरू उनके अंदर वायर लगी हुई है लाइट जलती है ऐसे और बिठा के ₹3000 लेके तुमको कहेंगे तुम मैग्नेट पकड़ो ऐसे दो मैग्नेट पकड़ा दिए उनका कनेक्शन इनसे है वैसे कोई कनेक्शन नहीं है बस दिखाने के
41:05 लिए और वह ऐसे ऐसे करेंगे इधर झुक गया तो काम होगा इधर झुक गया नहीं होगा और ऐसे लोग रिलीजियस लीडर्स जो होते हैं उनके चंगुले बहुत जल्दी आते तो कुल मिला के थियोडोर अडोर्नो ये कहते हैं कि पैसिव ब्रेन जो होते हैं दे आर वेरी इजी टू कंट्रोल। पैसिव ब्रेनेंस आर वेरी इजी टू कंट्रोल। और यह पैसिवनेस जो है यह कहां से शुरू होती है? एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री से। एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री से। सो नेक्स्ट टाइम व्हनेवर यू आर कंज्यूमिंग एनीथिंग आस्क फ्रॉम योरसेल्फ। कि कहीं यह आपको पैसिव तो नहीं बना रहा। क्योंकि यह जो पैसिवनेस है, यह पैसिवनेस शुरू होगी एंटरटेनमेंट से। फिर धीरे-धीरे धीरे-धीरे कंज्यूमरिज्म में जाएगी और फिर कल्चर इंडस्ट्री जो है याद रखना कल्चर इंडस्ट्री अब सिर्फ प्रोडक्ट नहीं बची है। ये हमारी
41:51 लाइफस्टाइल बना दी गई है। हमारी बॉडी, हमारी फॉरेन ट्रिप्स, हमारी घूमने की चीज, हमारी खुशी हर चीज उनके लिए कमोडिटी है। हमको लगता है कि हम जी रहे हैं। एक्चुअल में हम सिर्फ उनके अकॉर्डिंग परफॉर्म कर रहे हैं। अगली बार जब एनर्जी ड्रिंक या कोल्ड ड्रिंक की बोतल उठाओ। जब अगली बार ऐसी सिचुएशन आए कि लोग दिखे सिगरेट खुले में पी जा रही है। ठीक है? बट छाछ पीने में शर्म आ रही है। ऐसे लोग दिखे जो बाहर खड़े होके बियर की बोतल गटकने में बिल्कुल शर्म नहीं आती। लस्सी पीने में शर्म आ रही है। ऐसे लोग दिखे जिनको कोल्ड ड्रिंक या चॉकलेट में टेस्ट आए। दही और दाल बुरी लगे। समझ जाओ कि यह पैसिवनेस के विक्टिम है। दिस जनरेशन विल डू अ डिग्रीस जस्ट बिकॉज़ अदर्स वर डूइंग। दिस
42:38 जनरेशन विल मैरी जस्ट बिकॉज़ ग्रैंडफादर इज़ इल एंड इज़ अबाउट टू डाई। दे विल बाय समथिंग नॉट बिकॉज़ ऑफ़ नीड बट बिकॉज़ अदर्स आर बाइंग इट। बिकॉज़ यू हैव टू रिमेंबर दैट ह्यूमन वैल्यूज वी आर ह्यूमन। व्हाट इज आवर कंट्रिब्यूशन टू सोसाइटी। गुड हेल्थ, गुड थॉट्स, आवर लाइफ, आवर वैल्यूस, आवर वर्चू, दीज़ आर द थिंग्स वी शुड टॉक अबाउट, वी शुड थिंक अबाउट। गॉट इट? अदरवाइज वी आर विक्टिम ऑफ व्हाट? वी आर विक्टिम ऑफ एजुकेटेड पैसिवनेस। वी आर विक्टिम ऑफ यू कैन से पीपल हु विल इंश्योर कि लेस एजुकेटेड पीपल जो है वो आके फिर हमें गाइड करें। और यह फैन कल्चर डैमेज कैसे करेगा? इस फैन कल्चर की वजह से बाद में क्या
43:24 होगा? जब वोट डालने जाओगे तो उस टाइम लॉजिक नहीं लगाओगे और यही तो चाहिए था लॉजिक लेस लोग होपफुली इस सेशन से कुछ सीखने को मिला होगा नीचे कमेंट्स में अच्छा लगा तो अपनी जगह का नाम जरूर मेंशन करना और अगर कोई ऐसा इंसिडेंट हुआ है जिसमें देखा है कि यस लोग बाइंग कर रहे हैं तो प्लीज मेंशन दैट आल्सो थैंक यू स्टे हैप्पी स्टे ब्लेस्ड लव यू