0:06 नमस्कार आप देख रहे हैं संसद टीवी। आपके साथ मैं हूं प्रांजलि सिंह। आज दुनिया एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहां वैश्विक शक्ति का संतुलन तेजी से बदल रहा है। आर्थिक शक्ति के नए केंद्र उभरे हैं। टेक्नोलॉजी दुनिया की दिशा तय कर रही है और ग्लोबल साउथ अब केवल विकासशील देशों का समूह नहीं बल्कि वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अपनी हिस्सेदारी की मजबूत मांग करने वाली ताकत बन चुका है। इसी बदलते परिदृश्य में ब्रिक्स की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती गई है। जिस संगठन की शुरुआत कुछ उभरती अर्थव्यवस्था के बीच संवाद के रूप में हुई थी, वह आज एक विस्तृत
0:52 अंतरराष्ट्रीय मंच बन चुका है। बात होगी आज विस्तार से ब्रिक्स 2026 समिट के बारे में। वेयर इज़ द क्लब द ब्रिक्स ah व्हाई दिस क्लब? टु बी ऑनेस्ट व्हाई द क्लब? बिकॉज़ देयर वाज़ अनदर क्लब। इट वाज कॉल्ड द जी सेवन एंड यू वोंट प्लेट एनीबडी एल्स इंटू दैट क्लब। सो वी सेड वी गो एंड फॉर्म आवर ओन क्ल
1:59 भारत brिक्स की शुरुआती चार देशों में शामिल रहा है और अब 2026 में एक बार फिर इसकी अध्यक्षता भारत के पास है। 2025 के रियो डी जेनेरियो समिट में ब्रिक्स देशों ने भारत की 2026 चेयरशिप को भारत के 18वें ब्रिक्स समिट के आयोजन का समर्थन किया। भारत के लिए यह अध्यक्षता केवल एक डिप्लोमेटिक रिस्पांसिबिलिटी नहीं है। यह उस समय मिली है जब ब्रिक्स का आकार बढ़ चुका है। इसका एजेंडा पहले से ज्यादा व्यापक है और ग्लोबल साउथ की अपेक्षा भी बढ़ी है। अब भारत के सामने चुनौती है।
2:44 विस्तारित ब्रिक्स को किस दिशा में आगे ले जाया जाए। इकोनॉमिक कोपरेशन से लेकर टेक्नोलॉजी सस्टेनेबिलिटी डेवलपमेंट और ग्लोबल गवर्नेंस तक ब्रिक्स का दायरा बढ़ा है। इसलिए 2026 का ब्रिक्स समिट केवल एक इंटरनेशनल मीटिंग नहीं बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की भूमिका को समझने का भी एक महत्वपूर्ण अवसर है। ब्रिक्स की शुरुआत भले ही चार उभरती अर्थव्यवस्था के एक विचार से हुई हो, लेकिन समय के साथ इसकी पहचान काफी बदल गई। आज यह मंच सिर्फ आर्थिक आंकड़ों या व्यापारिक सहयोग तक सीमित नहीं है। इसमें
3:30 शामिल देश की भौगोलिक स्थिति, ऊर्जा संसाधन, बाजार और तकनीकी क्षमता इसे एक अलग ताकत वाले समूह के रूप में सामने लाती है। यही विविधता ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ी चुनौती भी। अलग-अलग देशों के अलग-अलग हितों के बीच साझा एजेंडा तैयार करना आसान नहीं है। ऐसे में सवाल यह है कि इतने अलग-अलग देशों को एक प्रभावी मंच देने के रूप में कैसे आगे बढ़ाया जा सकता है? और इसी सवाल के साथ ब्रिक्स की कहानी अगले चरण में प्रवेश करती है। ब्रिक्स की कहानी शुरू होती है एक संगठन से नहीं बल्कि एक आर्थिक विचार से। साल 2001 में इकोनॉमिस्ट जिम ओनल ने
4:18 ब्राजील, रशिया, इंडिया और चाइना की तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था के लिए ब्रिक्स शब्द का इस्तेमाल किया। उस समय ब्रिक कोई औपचारिक राजनीतिक संगठन नहीं था। लेकिन इन चार देशों की आर्थिक ताकत और वैश्विक प्रभाव को देखते हुए यह विचार तेजी से चर्चा में आया। इसके बाद इन देशों के बीच राजनीतिक और आर्थिक संवाद बढ़ने लगा। साल 2006 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान चारों देशों के फॉरेन मिनिस्टर की पहली औपचारिक बैठक हुई। यहीं से ब्रिक एक स्ट्रक्चरर्ड डिप्लोमेटिक प्लेटफार्म की
5:05 दिशा में आगे बढ़ा। फिर आया साल 2008। वैश्विक फाइनेंशियल क्राइसिस ने दुनिया की आर्थिक व्यवस्था को हिला दिया। इस संकट ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया। क्या वैश्विक आर्थिक संस्था में इमर्जिंग इकॉनमी को उनकी बढ़ती ताकत के मुताबिक प्रतिनिधित्व मिल रहा है? ब्रिक देशों ने इंटरनेशनल फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन में रिफॉर्म की जरूरत पर जोर देना शुरू किया और फिर 16 जून 2009 को रशिया में ब्रिक का पहला लीडर्स समिट हुआ। यह ब्रिक के लिए निर्णायक मौका था। यहां इकोनमी और फाइनेंशियल गवर्नेंस के साथ-साथ साइंस,
5:51 एनर्जी, एजुकेशन, इंटरनेशनल ट्रेड और टेररिज्म जैसे मुद्दों पर भी कोऑपरेशन की बात हुई। यानी ब्रिक का जन्म केवल चार अर्थव्यवस्था के इकोनमी वेट से नहीं हुआ था। इसके पीछे एक ऐसी ग्लोबल ऑर्डर की मांग भी थी जिसमें इमर्जिंग कंट्रीज की आवाज ज्यादा प्रभावी हो। ब्रिक्स इस राजनीतिक सुरक्षा और आर्थिक चुनौतियों से भरे विश्व में उम्मीद का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। क्योंकि ब्रिक्स का कार्य केवल ब्रिक्स के देशों के लिए ही नहीं बिल्कुल विश्व के कल्याण के लिए भी है। विशेष करके विकासशील देशों के लिए है।
6:46 अगर 2009 ने ब्रिक को औपचारिक रूप दिया तो 2011 ने इसका भौगोलिक और राजनीतिक विस्तार कर दिया। 14 अप्रैल 2011 को चाइना में तीसरा ब्रिक समिट हुआ। इस समिट में साउथ अफ्रीका को समूह में शामिल किया गया। इसके साथ ही ब्रिक में एस जुड़ा और बन गया नाम ब्रिक्स। साउथ अफ्रीका का प्रवेश सिर्फ नाम में बदलाव नहीं था। इससे ब्रिक्स का ज्योग्राफिकल फुटप्रिंट एशिया और यूरेशिया से निकलकर अफ्रीका तक पहुंचा। ब्राजील लैटिन अमेरिका का प्रतिनिधित्व कर रहा था। रशिया और चाइना यूरेशियन शक्ति के रूप में
7:33 मौजूद थे। इंडिया साउथ एशिया की प्रमुख आवाज था और साउथ अफ्रीका अफ्रीकन कंट्री से जुड़ी आवाज बन गया था। इस समिट में टेररिज्म के खिलाफ कोपरेशन और यूएन और इंटरनेशनल फाइनेंशियल सिस्टम में रिफॉर्म की जरूरत पर जोर दिया गया। यहीं से ब्रिक्स की पहचान केवल इमर्जिंग इकॉनमी के समूह के रूप में सीमित नहीं रही। इसका पॉलिटिकल डायमेंशन भी मजबूत होने लगा। भारत के लिए साउथ अफ्रीका का जुड़ना खास महत्व रखता था क्योंकि इंडिया, ब्राजील, साउथ अफ्रीका पहले से आईबीएसए फ्रेमवर्क
8:18 में सहयोग कर रहे थे। यानी ब्रिक्स और ग्लोबल साउथ कॉरपोरेशन के बीच और गहरा रास्ता बना। ब्रिक्स की यात्रा में साल 2012 एक महत्वपूर्ण टर्निंग पॉइंट रहा। 29 मार्च 2012 को नई दिल्ली में चौथा ब्रिक्स समिट आयोजित हुआ। इस समिट में इंफ्रास्ट्रक्चर और डेवलपमेंट प्रोजेक्ट की फाइनेंसिंग के लिए एक संभावित ब्रिक्स फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन का विचार सामने आया। यह विचार अगले 2 सालों में इंस्टीट्यूशनल रियलिटी बना। 2014 में ब्राजील में हुए छठे ब्रिक्स समिट में न्यू डेवलपमेंट बैंक
9:04 यानी कि एनडीबी की स्थापना के एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर हुआ। इसी समिट में कंटिंजेंट रिजर्व एग्रीमेंट यानी कि सीआरए का ट्रीटी भी स्थापित किया गया। एनडीबी का उद्देश्य इंफ्रास्ट्रक्चर और सस्टेनेबल डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के लिए फाइनेंसिंग को उपलब्ध कराना है। इससे ब्रिक्स की भूमिका एक डायलॉग फोरम से आगे बढ़कर प्रैक्टिकल इकॉनमी कॉरपोरेशन की ओर गई। यानी ब्रिक्स अब केवल यह नहीं कह रहा था कि ग्लोबल फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन में रिफॉर्म होना चाहिए। उसने अपने स्तर पर डेवलपमेंट फाइनेंसिंग का इंस्टीट्यूशनल मैकेनिज्म भी तैयार किया।
9:52 पिछले 10 वर्षों में यह बैंक ग्लोबल साउथ के देशों के विकास के लिए महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में उभरा उभर रहा है। भारत के गिफ्ट सिटी के साथ-साथ अफ्रीका तथा रूस में रीजनल सेंटर्स के खुलने से इस बैंक की गतिविधियों को बल मिला है और लगभग 35 बिलियन डॉलर के डेवलपमेंट प्रोजेक्ट सेंशन किए गए हैं। एनडीबी को डिमांड ड्रिवन सिद्धांत पर काम करते रहना चाहिए और बैंक का विस्तार करते हुए लॉन्ग टर्म फाइनेंशियल सस्टेनेबिलिटी
10:39 हेल्दी क्रेडिट रेटिंग और मार्केट एक्सेस सुनिश्चित करने पर प्राथमिकता रहनी चाहिए। ब्रिक्स का सबसे बड़ा स्ट्रक्चरल ट्रांसफॉर्मेशन 2023 में देखने को मिला। साउथ अफ्रीका के जोहानसबर्ग में आयोजित समिट में ब्रिक्स के विस्तार का फैसला हुआ। सऊदी अरब, इजिप्ट, यूएई, इथोपिया और ईरान को नए मेंबर के रूप में शामिल करने का निर्णय हुआ और इनकी मेंबरशिप 2024 से प्रभावी हुई। वी हैव डिसाइडेड टू इनवाइट द अर्जेंटीन रिपब्लिक
11:25 द अरब रिपब्लिक ऑफ इजिप्ट द फेडरल डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ इथियोपिया द इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान द किंगडम ऑफ सऊदी अरेबिया एंड द यूनाइटेड अरब एमरेट्स टू बिकम फुल मेंबर्स ऑफ ब्रिक्स द मेंबरशिप विल टेक इफेक्ट फ्रॉम द फर्स्ट ऑफ जनवरी 2024। इसके बाद 6 जनवरी 2025 को इंडोनेशिया के फुल मेंबर बनने की घोषणा की गई। इस विस्तार ने ब्रिक्स का ज्योग्राफिकल और इकोनमी फुटप्रिंट को एक बार फिर बदला। जब ब्रिक्स में एशिया, अफ्रीका, मिडिल ईस्ट,
12:11 यूरोप, एशिया और लैटिन अमेरिका से जुड़ी बड़ी इकॉनमी को शामिल किया गया। इसका अर्थ यह रहा कि ब्रिक्स की कलेक्टिव डिस्कशन अब एनर्जी, फूड सिक्योरिटी, ट्रेड रूट्स, क्रिटिकल मिनरल्स, इंफ्रास्ट्रक्चर और डेवलपमेंट फाइनेंस जैसे कई क्षेत्रों में अधिक व्यापक हो सकता है। ब्रिक्स की ताकत को केवल मेंबर कंट्रीज की संख्या से नहीं समझा जा सकता। इस समूह के पास दुनिया के कई महत्वपूर्ण इकोनमी मार्केट हैं। इनके मेंबर्स एनर्जी, रिसोर्स, एग्रीकल्चरल प्रोडक्शन,
12:56 इंडस्ट्रियल कैपेसिटी, टेक्नोलॉजी, क्रिटिकल मिनरल्स और लार्ज कंज्यूमर मार्केट के लिहाज से महत्वपूर्ण है। लेकिन ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकत शायद इसकी डायवर्सिटी है। एक तरफ दुनिया की बड़ी मैन्युफैक्चरिंग इकॉनमी है तो दूसरी तरफ मेजर एनर्जी प्रोड्यूसर्स भी हैं। कुछ मेंबर तेजी से बढ़ती डिजिटल इकॉनमी है तो कुछ नेचुरल रिसोर्स के महत्वपूर्ण केंद्र हैं। यही कॉम्बिनेशन ब्रिक्स को एक यूनिक प्लेटफार्म देता है।
13:53 22 से 24 अक्टूबर 2024 तक रशिया के कजानन में 16वां ब्रिक्स समिट का आयोजन हुआ। इस समिट की थीम थी दुनिया के समान और सुरक्षित विकास के लिए देशों के बीच सहयोग और बहुपक्षीय व्यवस्था को मजबूत करना। कजान समिट विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि यह एक्सपेंडेड ब्रिक्स के नए फेज का पहला लीडर्स समिट था। नए मेंबर्स की भागीदारी ने समूह के बदलते स्वरूप को सामने रखा। 16वें ब्रिक्स समिट के शानदार आयोजन के लिए मैं राष्ट्रपति पुतिन को हार्दिक बधाई
14:39 देता हूं और ब्रिक्स से जुड़े नए साथियों का भी एक बार फिर से हार्दिक स्वागत करता हूं। नए स्वरूप में ब्रिक्स विश्व की 40% मानवता और लगभग 30% अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है। पिछले लगभग दो दशकों में ब्रिज ने अनेक उपलब्धियां हासिल की है। मुझे विश्वास है कि आने वाले समय में यह संगठन वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए और अधिक
15:25 प्रभावी माध्यम बन करके उभरेगा। समिट में इकोनमी और फाइनेंशियल कॉरपोरेशन रीजनल स्टेबिलिटी और सस्टेनेबल डेवलपमेंट जैसे मुद्दों पर जोर दिया गया। ब्रिक्स ने ना केवल मेंबरशिप एक्सपेंशन पर ध्यान दिया बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि बढ़ते संगठन को ग्लोबल गवर्नेंस में अधिक प्रभावी भूमिका की जरूरत है। इसी कॉन्टेक्स्ट में पार्टनर कंट्री मैकेनिज्म भी सामने आया। इससे फुल मेंबरशिप के बाहर मौजूद देशों को ब्रिक्स डायलॉग के साथ जोड़ने का रास्ता मिला।
16:13 6 और 7 जुलाई 2025 को ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में 17वां ब्रिक्स समिट आयोजित हुआ। समिट की थीम थी स्ट्रेंथनिंग ग्लोबल साउथ कॉरपोरेशन फॉर अ मोर इंक्लूसिव एंड सस्टेनेबल गवर्नेंस। रियो समिट ने ब्रिक्स के एजेंडा को ट्रेडिशनल इकॉनमी कॉरपोरेशन से आगे बढ़ाकर कई कंटेंपरेरी ग्लोबल चैलेंजेस से जोड़ा। ग्लोबल गवर्नेंस रिफॉर्म, पीस एंड सिक्योरिटी, क्लाइमेट चेंज, हेल्थ, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सस्टेनेबल डेवलपमेंट और ग्लोबल साउथ कोऑपरेशन प्रमुख विषय रहे। Brिक्स अब एक ऐसे चरण में पहुंच चुका है जहां केवल नए
16:59 मेंबर को जोड़ना ही पर्याप्त नहीं है। उसे अपनी इंटरनल फंक्शनिंग को भी विकसित करना होगा। रियो समिट ने इसी इंस्टीट्यूशनल इवोल्यूशन की जरूरत को सामने रखा। और इस समिट का भारत से सीधा संबंध भी था। ब्राजील की 2025 प्रेसिडेंसी के बाद 2026 की ब्रिक्स चेयरशिप भारत को मिली और नई दिल्ली में अगला लीडर्स समिट आयोजित करने का समर्थन किया गया। ब्रिक्स का विस्तार हो चुका है। लेकिन किसी भी संगठन की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि उसमें कितने मेंबर हैं। असली सवाल यह है कि सदस्य देश मिलकर कितना
17:46 प्रभावी सहयोग कर सकते हैं। आज दुनिया ग्लोबल इकॉनमी जैसी चुनौतियों से गुजर रही है। इन चुनौतियों का असर किसी एक देश तक सीमित नहीं है। इसलिए Brिक्स के सामने अब एक बड़ा अवसर है। अपनी कलेक्टिव स्ट्रेंथ को व्यावहारिक सहयोग में बदलना और यहीं से 2026 की भारतीय चेयरशिप महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि भारत के सामने केवल एक विस्तारित ब्रिक्स को संभालने की जिम्मेदारी नहीं है बल्कि उसे ऐसे मुद्दों पर साथ लाने की चुनौती है जिनका सीधा संबंध भविष्य की ग्लोबल इकॉनमी और विकास से है।
18:34 2026 में भारत की ब्रिक्स चेयरशिप को चार शब्दों में समझा जा सकता है। फ्रेसिलेंस, इनोवेशन, कोपरेशन और सस्टेनेबिलिटी मतलब मुश्किलों से उबरना, नई सोच अपनाना, मिलजुलकर काम करना और टिकाऊ विकास करना। प्रेसिलेंस यानी कि ऐसी ग्लोबल सिस्टम का निर्माण जो क्राइसिस के समय ज्यादा मजबूत रहे। इसमें सप्लाई चेस, एनर्जी सिक्योरिटी, फूड सिस्टम और फाइनेंशियल स्टेबिलिटी जैसे मुद्दे आते हैं। इनोवेशन मतलब टेक्नोलॉजी का डेवलपमेंट। एआई साइंस रिसर्च डिजिटल टेक्नोलॉजी और इमर्जिंग इनोवेशन इस पिलर के केंद्र में हैं।
19:21 कोऑपरेशन यानी कि ब्रिक्स देशों के बीच प्रैक्टिकल पार्टनरशिप को बढ़ाना। ट्रेड इन्वेस्टमेंट, हेल्थ, एजुकेशन, रिसर्च और पीपल टू पीपल एक्सचेंजेस में भी महत्वपूर्ण भूमिका रही ब्रिक्स की और सस्टेनेबिलिटी यानी इकोनमी ग्रोथ के साथ एनवायरमेंटल रिस्पांसिबिलिटी, क्लीन एनर्जी, ग्रीन टेक्नोलॉजी, क्लाइमेट एक्शन और सस्टेनेबल इंफ्रास्ट्रक्चर इसका हिस्सा है। इन चारों प्रायोरिटीज को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। एक रसाइलेंट इकॉनमी के लिए इनोवेशन जरूरी है। इनोवेशन को स्केल करने के लिए इंटरनेशनल कॉरपोरेशन जरूरी है और लॉन्ग टर्म डेवलपमेंट के लिए
20:09 सस्टेनेबिलिटी जरूरी है। यानी भारत की 2026 चेयरशिप का अप्रोच bricks को फ्यूचर चैलेंजेस के लिए तैयार करने की दिशा में देखा जा सकता है। अब तक हमने ब्रिक्स को सरकार और राष्ट्रध्यक्ष के मंच के रूप में देखा है। लेकिन नीतियों को कानून और जमीन पर लागू करने में संसद की भूमिका भी अहम है। संसद जनता की आवाज को नीतियों से जोड़ती है और सरकार की जवाबदेही तय करती है। आज एआई, क्लाइमेट चेंज, डिजिटल इकॉनमी और ग्लोबल सिक्योरिटी जैसे मुद्दों पर देशों के साथ-साथ संसद के बीच सहयोग भी जरूरी है।
20:55 इसलिए ब्रिक्स का पार्लियामेंट्री फोरम महत्वपूर्ण है और अब नजर डालते हैं आइए 12वें ब्रिक्स पार्लियामेंट्री फोरम पर। जहां फोकस है जन केंद्रित विकास पर। ब्रिक्स की कहानी केवल राष्ट्र अध्यक्ष और सरकारों के बीच होने वाली बैठक तक सीमित नहीं है। किसी भी अंतरराष्ट्रीय कॉरपोरेशन को जमीन पर प्रभावी बनाने के लिए संसद की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है। संसद वह संस्था है जहां नीतियों पर चर्चा होती है। कानून बनते हैं और जनता की आकांक्षा को शासन व्यवस्था से जोड़ा जाता है। इसी सोच
21:42 को आगे बढ़ाने वाला मंच है ब्रिक्स पार्लियामेंट्री फोरम। 2026 में भारत को इस संसदीय मंच की अध्यक्षता मिली और 12वां ब्रिक्स पार्लियामेंट्री फोरम 26 और 27 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित होगा। इसकी थीम है फास्टिंग पार्लियामेंट्स फॉर पीपल सेंट्रिक डेवलपमेंट यानी ऐसी संसद को बढ़ावा देना जो विकास को सीधे लोगों की जरूरत आकांक्षा और जीवन की गुणवत्ता से जोड़े। यह थीम अपने आप में ब्रिक्स की बदलती प्राथमिकता को दिखाती है। ग्लोबल कॉरपोरेशन का अंतिम उद्देश्य केवल इकोनमी ग्रोथ या इंटरनेशनल एग्रीमेंट्स नहीं हो
22:28 सकता। उसका वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होता है कि लाभ आम नागरिक तक कितना पहुंचता है। बेहतर हेल्थ केयर, क्वालिटी एजुकेशन, रोजगार, टेक्नोलॉजी तक पहुंच, सोशल सिक्योरिटी, सस्टेनेबल इंफ्रास्ट्रक्चर और एक सुरक्षित समावेशी समाज के रूप में सबसे महत्वपूर्ण यह बातें हैं। इसलिए ब्रिक्स पार्लियामेंट्री फोरम को ब्रिक्स कॉरपोरेशन का डेमोक्रेटिक डायमेंशन कहा जा सकता है। यहां मेंबर कंट्रीज के लिए पार्लियामेंट्रियंस एक दूसरे के लेजिसलेटिव एक्सपीरियंस और बेस्ट प्रैक्टिस को सांझा करते हैं और उन
23:14 ग्लोबल चैलेंजेस पर चर्चा करते हैं जिसका असर सीधे नागरिकों पर पड़ता है। इस मंच की भूमिका को समझने के लिए 2025 के 11वें ब्रिक्स पार्लियामेंट्री फोरम पर नजर डालना जरूरी है। यह फोरम 4 और 5 जून 2025 को ब्राजील में आयोजित हुआ था। इसमें उस समय के 10 ब्रिक्स मेंबर कंट्रीज की पार्लियामेंट्री डेलीगेशन ने भाग लिया। भारत के डेलीगेशन का नेतृत्व लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने किया था। 2025 का पार्लियामेंट्री फोरम कई मायनों में महत्वपूर्ण था। इसके एजेंडा में ग्लोबल हेल्थ, ट्रेड इन्वेस्टमेंट एंड फाइनेंस, क्लाइमेट चेंज, आर्टिफिशियल
24:01 इंटेलिजेंस, गवर्नेंस, मल्टीलटरल पीस एंड सिक्योरिटी आर्किटेक्चर और ब्रिक्स के इंस्टीट्यूशनल डेवलपमेंट जैसे विषय शामिल थे। यानी चर्चा का दायरा केवल संसद के बीच तक सीमित नहीं था। बल्कि उन प्रमुख चुनौतियों तक था जो आज के वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित कर रही है। 11वें फोरम का एक और महत्वपूर्ण पहलू था आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट और सामूहिक रुख। फोरम के दौरान सभी 10 पार्टिसिपेटिंग ब्रिक्स पार्लियामेंट्स ने पहलगाम आतंकी हमले की कड़ी निंदा की और आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस अप्रोच का समर्थन किया। भारत ने
24:49 आतंकवाद के फाइनेंशियल नेटवर्क को रोकने, इंटेलिजेंस शेयरिंग बढ़ाने, इमर्जिंग टेक्नोलॉजीस के दुरुपयोग को रोकने और इन्वेस्टिगेशन और जुडिशियल कॉरपोरेशन को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया। भारत की इस अप्रोच को फाइनल जॉइंट डिक्लेरेशन में शामिल किया गया। ब्रिक्स सम्मेलन के अंदर कई विषयों पर चर्चा हुई, संवाद हुआ, आपस में विचारों को साझा किया और किस तरीके से विक्स देश मिलकर हमारे संसदीय संवाद को बढ़ाना,
25:36 ए टेक्नोलॉजी के उपयोग के बारे में, आर्थिक परिदर्श के अंदर कैसे सामूहिकता के साथ मिलकर काम करना और अंतिम डिक्लेरेशन में ब्रिक्स देशों ने माना कि आतंकवाद के खिलाफ हमें सामूहिक लड़ाई लड़नी होगी। उन्होंने भारत में 22 अप्रैल को पहलगाम कश्मीर में हुई आतंकवादी घटना की निंदा की और साझे प्रयासों से मिलकर आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति बनानी चाहिए। 11वें पार्लियामेंट्री फोरम के समापन पर भारत को 12वें ब्रिक्स पार्लियामेंट्री फोरम की मेजबानी और चेयरमैनशिप को सौंपी
26:25 गई। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने औपचारिक रूप से चेयरमैनशिप ग्रहण की। अब 2026 में नई दिल्ली संसदीय संवाद का केंद्र बनने जा रही है। फस्टिंग पार्लियामेंट्स फॉर पीपल सेंट्रिक डेवलपमेंट केवल एक थीम नहीं बल्कि यह सवाल भी है कि तेजी से बदलती दुनिया में संसद किस तरह अपने नागरिकों के लिए बेहतर नीति तैयार कर सकती है। एआई बदल रहा है तो लेजिसलेशन और टेक्नोलॉजी को साथ में कैसे कदम से कदम मिलाकर काम करना है। क्लाइमेट चेंज बढ़ रहा है तो डेवलपमेंट और सस्टेनेबिलिटी के बीच संतुलन को कैसे बनाया जाएगा। ग्लोबल इकॉनमी में
27:11 अनसर्टेनिटी है तो रोजगार, इन्वेस्टमेंट और इंक्लूसिव ग्रोथ को कैसे सुरक्षित किया जाएगा? और जब आतंकवाद और इमर्जिंग सिक्योरिटी थ्रेट्स नई टेक्नोलॉजीस का इस्तेमाल कर रहे हैं तो पार्लियामेंट्स को किस तरह मजबूत लीगल और इंस्टीट्यूशनल फ्रेमवर्क को तैयार करना है। इन सवालों पर पार्लियामेंट्री डायलॉग का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि अलग-अलग देशों की संसद अपने अनुभव साझा कर सकती है।
28:12 नई दिल्ली में होने वाला 12वां ब्रिक्स पार्लियामेंट्री फोरम इसी विचार को आगे बढ़ाने का प्रयास होगा। संसद को केवल कानून बनाने वाली संस्था के रूप में नहीं बल्कि पीपल सेंट्रिक डेवलपमेंट के रूप में देखने का प्रयास किया जाना चाहिए। क्योंकि अंततः किसी भी वैश्विक साझेदारी की सबसे बड़ी कसौटी यही है। क्या बदलती दुनिया में उसके केंद्र में आम नागरिक है और 26 27 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली से ब्रिक्स की संसदीय आवाज इसी सवालों का जवाब तलाशने की कोशिश करेगी। यह देखने वाली बात होगी। आज के लिए इतना ही। आप देखते रहिए आगे भी संसद टीवी। नमस्कार।
29:31 तो