दलित बहन का दर्द: राम को मानें हम, या बौद्ध हो जाएँ? || आचार्य प्रशांत (2024)

संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो जाति व्यवस्था और धर्म के सच्चे अर्थ पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि कैसे जाति व्यवस्था समाज में शोषण का उपकरण रही है और कैसे सच्चे धर्म का उद्देश्य आंतरिक शांति और मुक्ति प्राप्त करना है, न कि बाहरी रीति-रिवाजों का पालन करना।

  • जाति व्यवस्था समाज में शोषण का उपकरण है।
  • सच्चा धर्म आंतरिक शांति और मुक्ति प्राप्त करने पर केंद्रित है।
  • धार्मिक प्रतीकों का उच्चतम अर्थ समझना चाहिए।
  • जातिवाद का विरोध आधुनिक नहीं है, बल्कि प्राचीन काल से चला आ रहा है।

परिचय

इस वीडियो में एक दर्शक आचार्य प्रशांत से सवाल करती हैं कि वह सनातन धर्म और बौद्ध धर्म के बीच किसे चुनें, क्योंकि वह एक दलित समुदाय से आती हैं और उन्होंने सनातन धर्म में भेदभाव और शोषण के बारे में कहानियाँ सुनी हैं। वह यह भी कहती हैं कि उन्होंने बाबा साहब अंबेडकर के बारे में सुना है कि उन्होंने हिंदू धर्म में जन्म लिया था, लेकिन वह इसमें मरना नहीं चाहते थे।

जाति और शोषण का इतिहास

आचार्य प्रशांत बताते हैं कि जो लोग जागृत हुए हैं, वे जाति के खिलाफ ही पाए जाएंगे। वे कहते हैं कि गौतम बुद्ध के हाथ में कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं था, और वहां शोषण तो बहुत दूर की बात है, वहां बस प्रेम और करुणा है। वे महात्मा बुद्ध को सबसे सशक्त वेदांती भी बताते हैं।

धर्म की सच्ची परिभाषा

आचार्य प्रशांत धर्म की सच्ची परिभाषा बताते हैं। वे कहते हैं कि धर्म वह है जो हमारे भीतर की बेचैनी को दूर करता है। यह किसी एक मत या संप्रदाय की परिभाषा नहीं है, बल्कि यह वह बात है जो महात्मा बुद्ध और ऋषियों ने भी कही है। वे कहते हैं कि सच्चाई की दुनिया में बात एक ही होती है, भले ही उसे कहने के तरीके अलग हों।

महात्मा बुद्ध का पहला सूत्र

आचार्य प्रशांत महात्मा बुद्ध के पहले सूत्र, "दुख है सब कुछ" के बारे में बताते हैं। वे कहते हैं कि धर्म दुख की समस्या का इलाज है। इसके अलावा धर्म कुछ नहीं है। वे कहते हैं कि धर्म बस एक चीज है: भीतर से असंतुष्ट हूं, मुझे संतुष्ट होना है।

मुक्त पुरुष बनाम समाज की दूषित प्रथाएँ

आचार्य प्रशांत कहते हैं कि हमें उन लोगों से रिश्ता रखना चाहिए जो किसी दम के हैं, किसी स्तर के हैं। जो लोग ओछी बातों में पड़े हुए हैं, जैसे कि जाति, लिंग, अमीर या गरीब, उनसे हमें ताल्लुक रखना ही क्यों है? वे कहते हैं कि हमें उन लोगों को खोजना है जिनको कुछ सच्चाई पता हो।

तथाकथित धार्मिक व्यक्ति की पहचान

आचार्य प्रशांत कहते हैं कि एक तथाकथित धार्मिक आदमी अंधविश्वासी और रूढ़िवादी होगा। वह सोच नहीं पाता होगा और बस प्रथा परंपरा का अंधानुकरण कर रहा होगा। वे कहते हैं कि हमें इन लोगों को धर्म पर कब्जा क्यों कर लेने देना चाहिए?

वज्रसूची उपनिषद

आचार्य प्रशांत वज्रसूची उपनिषद के बारे में बताते हैं। यह उपनिषद इस बात पर समर्पित है कि जाति झूठ है। वे कहते हैं कि वेदांत का धर्म यही है।

समाज की अभद्रता

आचार्य प्रशांत कहते हैं कि समाज अपने विकृत धर्म को सनातन धर्म बोल रहा है। यह समाज की बदतमीजी है। वे कहते हैं कि जो असली सनातन धर्म है, वह अच्छा है। वहां शोषण तो बहुत दूर की बात है, वहां बस प्रेम और करुणा है।

धर्म बनाम परंपरा

आचार्य प्रशांत कहते हैं कि धर्म रीति-रिवाजों का पुलिंदा नहीं होता। धर्म अंधविश्वास और परंपराओं की धारा को नहीं बोलते। वे कहते हैं कि धर्म का संबंध तो यहां भीतर की छटपटाहट से होता है।

आधुनिक समाज में धर्म की पहचान

आचार्य प्रशांत कहते हैं कि आधुनिक समाज में धर्म से दूर कर दिया गया है। बुद्धिजीवियों, आधुनिक लड़कियों और दलितों को धर्म से दूर कर दिया गया है। यह सारी कारस्थानी कट्टरपंथियों की है, जिन्होंने धर्म का मतलब यही बना दिया है: किस्सा कहानी, अंधविश्वास, फलानी रूढ़ी, फलानी परंपरा।

बच्चों मे अविकसित ज्ञान

आचार्य प्रशांत कहते हैं कि बच्चों को भी धर्म के बारे में कुछ नहीं पता है। उन्हें आधा-आधा बाबा साहब के बारे में पता है, आधी नफरत उन्हें राम से है, आधी नफरत उन्हें हिंदू सनातन धर्म से है। वे कहते हैं कि हमें उन्हें यह समझाना चाहिए कि आध्यात्मिक ज्ञान के लिए कैसे भगवान को याद करो।

झूठा आत्मविश्वास

आचार्य प्रशांत कहते हैं कि जो लोग गलत आचरण करते हैं, दुर्व्यवहार करते हैं, शोषण करते हैं, वे मानने को तैयार नहीं होते कि वे गलत कर रहे हैं। वे कहते हैं कि उनमें आत्मविश्वास कूट-कूट कर भरा हुआ है कि वे जो कर रहे हैं वही बिल्कुल ठीक है।

धर्म की वैज्ञानिकता और तार्किकता

आचार्य प्रशांत कहते हैं कि सच्चा धर्म बहुत वैज्ञानिक और तार्किक होता है। वे कहते हैं कि दो लोग जन्म लेते हैं, उनके शरीर में अंतर ही कितना है? तो तुमने कैसे दोनों में भेद कर दिया कि एक जन्म से ऐसा है, एक जन्म से वैसा है?

जाति का विरोध

आचार्य प्रशांत कहते हैं कि जाति का विरोध आधुनिक नहीं है। वज्रसूची उपनिषद भी विरोध कर रहा था। जाति प्रथा किसकी है? समाज की है। उसका विरोध आदिकाल से हो रहा है।

मध्यकालीन संतों का सत्य से प्रेम

आचार्य प्रशांत कहते हैं कि मध्यकालीन संत, जो ज्यादातर तथाकथित निचली जातियों के थे, उन्होंने कहा कि उन्हें सच से प्यार है और जाति से घृणा है। वे कहते हैं कि जाति माने देह, देह माने बंधन, मुझे मुक्ति से प्यार है।

समापन

आचार्य प्रशांत कहते हैं कि भारत का विभाजन सिर्फ हिंदू मुसलमान की बात नहीं है। वह दलितों के शोषण की बात भी है। वे कहते हैं कि इस्लाम भारत में फैला उसके बहुत कारण थे, पर एक कारण यह भी था कि जिनको हमने सता रखा था उन्होंने मुसलमान बनने में अपनी भलाई देखी।

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Transcript

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0:00 जैसे कि सर डॉक्टर बाबा साहब आंबेडकर की बात करूं तो मैंने यह देखा उन्होंने यह भी बोला है सर कि मैं जन्मा जरूर हूं हिंदू जाति में बट मैं मरना पसंद नहीं करूंगा तो सर ये सब देख के सर ना मेरी प्रगति हो पा रही है ना मेरा ब्रांड एक्सेप्ट नहीं कर पा रहा है कि मैं सनातन में जाऊं कि मैं बुद्धिस्ट हो जाऊं। अब यहां आ के मैंने देखा कि कौन जात कौन जात कौन जात अस्त्र शस्त्र रखते इसलिए थे कि उनको खतरा रहता था कि ये हमारे संग कोई मारपीट करे तो हम उन्हें काटेंगे। भाई अगर हम गौतम बुद्ध की बात करते तो उनके हाथ में कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं है। वहां पर शोषण तो बहुत दूर की बात है। वहां बस प्रेम है और करुणा है। मैं इसी कारण महात्मा बुद्ध को सबसे सशक्त वेदांती बोलता हूं। बहुत लोगों को तकलीफ हो जाती है। पर मैं अपनी बात पर

0:46 अडिग हूं। जो भी जागृत हुए हैं उनको जाति के आमूलचूल खिलाफ ही पाएंगे। प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी मेरा नाम वाल्मीकि है और मैं मध्य प्रदेश से के सागर शहर से बात कर रही हूं। आचार्य जी मेरा प्रश्न ये है कि जैसे कि मैं ऐसी कम्युनिटी से आती हूं और जैसे कि बार-बार हमें सनातन धर्म भगवान राम भगवान कृष्ण का परिचय दिया जाता है। तो परिचय सुनके तो अच्छा लगता है कि चलो इन्होंने बुराई पर अच्छाई की जीत होती है इनकी कहानियां सुनके। बट जब मैं यूपीएससी का सिलेबस पढ़ती हूं यानी कि रील्स देखती हूं तो कई बारी उन्होंने एक वीडियो में यह बोला है कि श्रीलंका में कौन राम है? वहां कोई राम

1:33 को नहीं जानता। तो ऐसे कमेंट सुनकर सर मन में कुछ क्वेश्चन उठते हैं क्योंकि जैसे मैंने आपको बताया कि मैं ऐसी कमेट से आती हूं तो जैसे अगर मैं अपने समाज के अंदर जाती हूं तो वहां पर सर सख्त विरोध होता है सनातन धर्म का भगवान का और वो ये बोले जाते हैं कि शुरू से इन्होंने हमसे शिक्षा का अधिकार छीन के रखा हमें वेद नहीं पढ़ने दिए। अगर कोई दलित शंभू ने इनका वेद शास्त्र सुना है तो उनके कान में शीशा पिघला के डाल दिया गया है। तो सर जब ऐसे एकदम कुछ स्टोरी सुनती हूं तो रिस्पेक्ट उठती है। फिर बस वापस ये स्टोरी सुनती हूं जाकर सर डिसरिस्पेक्ट होती है मुझे। तो मैं अपने मन को समझा नहीं पा रही हूं कि मैं आध्यात्मिक से जुड़ के भगवान को या भगवत प्राप्ति कैसे करूं। सर मैं मुझे समझ में नहीं आता है। बहुत कंफ्यूजन है इस चीज

2:20 को ले। स्टोरी का हां बोलिए। जी जैसे कि सर डॉक्टर बाबा साहब अंबेडकर की बात करूं तो मैंने यह देखा उन्होंने यह भी बोला है सर कि मैं जन्मा जरूर हूं हिंदू जाति में बट मैं मरना पसंद नहीं करूंगा ये भी बहुत अंदर उठता है दर्द पीड़ा होती है सुनके इतने महान अनुभवी जिन्होंने भारतीय संविधान लिखा महिलाओं को शिक्षा का अधिकार दिया जबकि हिंदू सनातनी धर्म की सुनू तो वहां महिलाओं को वेद सुनने की वो नहीं थी परमिशन तो सर ये सब देख के सर ना मेरी प्रगति हो पा रही है। मेरा ब्रेन एक्सेप्ट नहीं कर पा रहा है कि मैं सनातन में जाऊं कि मैं बुद्धिस्ट हो जाऊं। आपने सुना होगा सर बहुत सारे जो दलित थे वो बुद्धिस्ट में कन्वर्ट हो गए

3:05 हैं। तो ये सब चीजें सर जब चलती है ना तो मेरी लाइफ बहुत कंजस्टेड हो गई है देख के। बट आपका जब सुनती हूं सर मेरे को सुकून भी मिलता है ये आध्यात्मिक ज्ञान सुन के। बहुत सारी व्यर्थ की चीजें इकट्ठा हो गई है। हां जी। इसलिए भीतर बड़ा कोलाहल मचा रहता है। उन चीजों की कोई जरूरत नहीं है। कथाएं धर्म में आवश्यक अनिवार्य वगैरह थोड़ी होती हैं। हम कथाएं किसी के काम आ रही हो तो वह उनका उपयोग करें। नहीं तो कथाओं की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है। शांति के, मुक्ति के, सच के रास्ते में कथा अगर अनुपयोगी हो रही है बल्कि

3:54 बाधा बन रही है तो कथा के रास्ते से मंजिल की ओर जाना जरूरी है ही नहीं। कुछ नहीं है। छोड़िए। राम किसी कथा के हिस्से थोड़े ही हैं। हां, जिन लोगों में देह भाव बहुत होता है, जो कि इंसान के सब दुखों का मूल कारण है। वो परम सत्य को भी देह रूप में ही देखना चाहते हैं। ये अच्छे से समझिएगा। हम कौन हैं? धर्म का अर्थ क्या है? हम वह हैं जो अपने होने से परेशान हैं। धर्म किस लिए है? ताकि हमारे भीतर जो लगातार बेचैनी बनी रहती है और अपने होने

4:39 के वह बहुत सारे अलग-अलग कारण ढूंढती रहती है। एक कारण हटा दो दूसरा कारण आ जाता है। उस बेचैनी को हटाना ही धर्म है। इतनी सीधी परिभाषा है। एकदम उलझने की जरूरत नहीं। और यह परिभाषा किसी एक मत की या संप्रदाय की नहीं है। हम आप जाएंगे आप महात्मा बुद्ध से पूछेंगे वह यही बात बोलेंगे आप ऋषियों से पूछेंगे वह यही बात बोलेंगे यही बात सनातन है जो सनातन है वही बात बौद्ध है जो सनातन है वही बात वेदांत की है सब कुछ अलग-अलग थोड़ी हो सकते हैं अलग-अलग तो सब हमारे खंडित मन में संसार में होता है सच्चाई की दुनिया में बात एक ही होती है भले उसको कहने के तरीके अलग हो यह हो

5:26 वह हो जो तरीका ऐतिहासिक सामाजिक कारणों से हमारे उपयोग का नहीं रहा है उस तरीके की कोई विशेष आवश्यकता है ही नहीं। फिर समझाता हूं। हमें जो निर्गुण निराकार सत्य है हमें वहां तक जाना है क्योंकि हम दुखी ही सब तरह की सगुणता से हैं। सगुणता माने क्या यही सब जो माल मसाला बिखरा हुआ है पूरी दुनिया में हम जिसको हम अपनी देह के माध्यम से भोग लेना चाहते हैं। इसी को बोलते हैं सगुण। यह सब माल मसाला यह भी माल मसाला। हम चाहते हैं इस माल मसाले को इस माल मसाले से भोग लें। भोगते भी हैं। और बाद में पछताते भी हैं। कितना भी भोग लो चैन मिलता नहीं है। ठीक है ना? हम सगुण

6:12 से परेशान हैं। इसलिए समझाने वालों ने कहा कि हमें निर्गुण चाहिए। नहीं तो निर्गुण कोई चीज नहीं है। इसको निर्गुण थोड़ी बोलते हैं। निर्गुण कुछ है थोड़ी कि उसको परिभाषा में आ जाएगा या उसकी कोई जगह बता देंगे कि आसमान में बैठा है कि धरती के नीचे बैठा है कि दिल के अंदर बैठा है। निर्गुण कुछ भी नहीं होता। बात यह है कि हम सगुण से परेशान हैं। हम देहधारी हैं। देह माने पदार्थ और हम पदार्थ को ही लीलने में पूरी जिंदगी बिता देते हैं और दुखी रह जाते हैं। हम भगवान बुद्ध का भी पहला सूत्र क्या है? पहला आर्य सत्य क्या है? कि दुख है सब कुछ सर्वम दुखम दुख ही दुख है। तो धर्म दुख की समस्या का इलाज है। इसके अलावा धर्म नहीं है। किससे कहानियों को धर्म नहीं बोलते बिल्कुल भी। ये अच्छे से समझिए। धर्म बस दुख की समस्या का इलाज मात्र है

6:58 और यह मानव मात्र की समस्या है। एसेंशियल ह्यूमन कंडीशन है। बच्चा पैदा होता है तभी से दुखी रहता है। हम मर रहे होते हैं उस वक्त भी दुखी रहते हैं। तो दुख की समस्या के इलाज को धर्म बोलते हैं। इसके अलावा धर्म कुछ नहीं है। बाकी आपको धर्म के नाम पर जो कुछ दिखाई दे वह ऐसा ही है। माल मसाला है। बच्चों का खेल है। किसी ने सोचा मनोरंजन कर ले। किसी ने सोचा उत्पीड़न कर लें। वह सब धर्म बन गया। उसको धर्म बोलते नहीं है। उसको समाज ने धर्म का नाम दे दिया होगा। वह धर्म है नहीं। जिसको हम आमतौर पर धर्म बोलते हैं ना ये हमें बहुत स्पष्ट होना चाहिए। वो धर्म है ही नहीं। क्योंकि धर्म बस एक चीज है। मैं भीतर से असंतुष्ट हूं। मुझे संतुष्ट होना इसको धर्म बोलते हैं। धर्म किसके लिए होता है? ये जो भीतर मैं बैठा

7:45 है ना अहम धर्म इसके ही लिए होता है। तो उसकी संतुष्टि के काम को धर्म बोला जाता है। एकमात्र धर्म यही है। मैं भीतर से अतृप्त हूं। अपूर्ण हूं। मुझे संतुष्ट होना है, पूर्ण होना है। यही धर्म है मेरा। ठीक है? इसके अलावा कुछ नहीं धर्म होता। यही सनातन धर्म है। इस धर्मों से अनंतन हूं। इसी बात को कहा था और कुछ भी नहीं। कि भीतर तुम जो अपूर्णता लेकर बैठे हो और उसको मैं बोलते हो वह सारी बात झूठी है। उसको शून्य करो। उस बात को हटाओ यह अपूर्णता। यही बौद्ध मत है। हम वो कहते हैं हटाओ अपूर्णता। अपूर्णता को शून्य करो। वेदांत इसी को ऐसे कहता है अपूर्णता को हटाओ पूर्ण हो तुम। दोनों ही जगह बात अपूर्णता को हटाने की हो रही है।

8:30 ठीक है? अब जब बात आती है धार्मिक प्रतीकों की वहां पर यह देखिए कि उनका उच्चतम अर्थ क्या है? उच्चतम अर्थ वह उच्चतम अर्थ लेना है हमें नहीं तो इंसान क्या करता है कि हम अपने आदर्शों को महापुरुषों को भी लाकर बिल्कुल अपने जैसा बना देते हैं बिल्कुल अपने जैसा और फिर हम कहते हैं देखो वो वही तो कर रहे हैं जो हम कर रहे हैं तो हम जो कर रहे हैं हमें करने दो यह गजब तर्क है अगर बंदर किसी भगवान की रचना करेंगे तो निश्चित रूप से केलेलों का प्रसाद मांगता होगा। होगा कि नहीं होगा? और फिर बंदर

9:17 कहेंगे देखो जब हमारा भगवान केले खाता है तो हम भी खाएंगे। वो यह नहीं कहेंगे कि इस भगवान को हमने ही रचा है। वो कहेंगे देखो भगवान केले खाता है हम भी खाएंगे। हमें उन सब बातों से कोई मतलब नहीं है। हमें बहुत अच्छे से पता है कि कृष्ण का अर्थ है गीता का निष्काम कर्म। और नहीं कोई अर्थ है कृष्ण का और राम का अर्थ है इतनी बार बोलता हूं। इतना सुंदर है निर्गुण सगुण दो से न्यारा कहे कबीर सो राम हमारा हम राम निरंजन न्यारा रे यह जो परायापन है पूरी दुनिया से जो चीज दुनिया की हो ही नहीं सकती दुनिया से न्यारी है उसको राम कहते हैं। दुनिया से इतनी न्यारी है कि संत कबीर जिन्होंने जातिवाद पर एकदम हथौड़ा लेकर के प्रहार करें। उन्होंने कहा

10:04 कि अरे वह सगुण तो है ही नहीं। वह निर्गुण भी नहीं है। जाओ। क्योंकि तुम निर्गुण बोल के भी उसको सगुण बना देते हो। निर्गुण भी नाम हो गया ना। सगुण का ही नाम हो सकता है। तो बोले निर्गुण भी नहीं है। निर्गुण सगुण दो से न्यारा कहे कबीर सो राम हमारा। ये न्यारापन राम निरंजन न्यारा रे। न्यारा माने क्या? दुनिया से अलग। तो हम उसे दुनिया की किसी कहानी का किरदार क्यों बनाएं? और लोगों ने बनाया होगा तो उनका कुछ हित होगा। होगा कुछ। उन्हें उसमें कुछ लाभ होता होगा। शायद होता हो लाभ। हमें नहीं पता। हमें यह पता है कि दुनिया में जो कुछ है वही हमारे दुख का कारण है। हमें कोई ऐसा चाहिए जो दुनिया से न्यारा हो। यह जो दुनिया से न्यारा है इसको राम बोलते हैं। इसको राम बोलते हैं। उस राम का लंका से, अयोध्या से, विभीषण से, रावण से और

10:51 शंभूक से कितना वास्ता है बताइए? वह जो राम है जहां तक पहुंचने के लिए हमारा मन बेकरार रहता है। उसका क्या वास्ता है कथाओं से? हां कथाएं किसी को उपयोगी लगती हो तो उसका स्वागत है उपयोग करता रहे। पर कथाएं जिसके रास्ते की बाधा हो उसको तो सीधे जो असली तत्व है जिसको राम आपको नाम देना हो तो दें। नाम नहीं राम देना हो तो आप कोई और नाम दे लें। हमें तो अपना असली तत्व से रिश्ता जोड़ना है ना। ये दुनियादारी से हमें क्या लेना देना? आप बात समझ रही हैं? दुनिया वालों ने जो उच्चतम है उसको भी घसीट कर जमीन पर गिरा दिया और उससे वह

11:37 सारे काम करवा लिए जो वह खुद करते हैं। वह खुद शोषक हैं। तो जो उच्चतम है उससे भी उन्होंने कहीं-कहीं शोषण के और यह सब काम करवा लिए और इसी कारण फिर समाज के बहुत सारे जो समुदाय हैं वो उच्चतम से ही दूर हो जाते हैं। और उनके पास बिल्कुल वाजिब तर्क होता है। वह कहते हैं कि जो तुम्हारा किरदार है अगर इसने हमारे समुदाय के साथ हिंसा करी और भेदभाव रखा तो हम उसको आराध्य क्यों माने अपना? उनकी बात को काटा नहीं जा सकता। सही बात बोल रहे हैं। लेकिन यह बात भी तो समझिए कि हम इंसान पैदा हुए हैं। हम सब नहीं फर्क पड़ता कि वर्ग क्या है, वर्ण क्या है? और इंसान की मूल चाहत मुक्ति की है।

12:25 भाई जिसको मुक्ति कहता है वेदांत उसको बुद्ध कह गए निर्वाण। वो हमारी मूल चाहत है। वो तो हमें चाहिए [संगीत] ना। रुकिए रुकिए रुकिए रुकिएगा। आवाज कट रही है। क्या हो रहा है? उनकी ओर से। रुकिएगा रुकिएगा। [संगीत] अब ठीक है। बोलिए। नहीं ये मेरी आवाज है क्या?

13:18 अनम्यूट अनम्यूट अनम्यूट अनम्यूट बोलिए हां जी सर सुन पा रहे हैं हां ठीक है आप सुन पा रही हैं हां जी सर सर बस मेरा ये था कि अभी जैसे मैं बड़ी हो रही हूं समझदार हो रही हूं मेरे पापा डिफेंस में थे जब से मतलब सेवा दी है पापा ने सेना में तब तक मुझे कुछ पता नहीं था कि मैं ऐसी हूं कि ऐसी हूं मैं क्या हूं जब मेरे पापा रिटायरमेंट हो गए फिर हमने यहां पर मकान लिया तो यहां पर कुछ स्वर्ण जाति के लोग थे। तो सर हम जब परिचय देते हैं तो हमें फौज में ये सिखाया गया हम सैनिक हैं। हम फौजी है बस आगे हमारा कुछ नहीं रहता था। अब यहां आके मैंने देखा कि कौन जात कौन जात कौन जात तो मैंने बाबा से पूछा बाबा ये क्या होता है? मैं सोची सरनेम होगा तो मैंने बोला मैं मेरा ये सरनेम है। अब सर जब सरनेम हुआ मेरा तो ये किस जाति

14:06 में आते हैं? तो मतलब इतना ज्यादा सर दिमाग खराब हुआ पढ़ते समय स्कूल में। फिर सर हंसारी की जगह मेरा टाइटल लिखती हूं मैं लक्ष्मी हंसारी। फिर वहां पर भी मतलब एसडीएम साहब ने कहा साफ अपनी जात लिखी है इसमें। तो उसमें मेरा लक्ष्मी वाल्मीकि जो वाल्मीकि समाज आता है तो मैंने सुना है कि इनको बहुत गंदा तरीके से बोला जाता है। इनकी कोई समाज में रिस्पेक्ट नहीं है। टोटल इनका शोषण होने के लिए ये बने हैं और ये स्वर्ण जाति का गंध और इनकी औरतें जो इनके यूज़ के लिए बनी है। ऐसा मैंने अपने कानों से सुना है। और जब ये मैंने सुना था ना सर मैं अंदर से बहुत कूट के रोई थी कि मेरे पापा इतनी सेवा दी। हम लोगों ने इतनी अच्छी शिक्षाएं ग्रहण करी है। अब हम इनके संग बैठ के कैसे? अब दूसरा सा जैसे पूजा पाठ होती है भगवान के किस्से सुनाए जाते हैं तो मुझे बड़ा इंटरेस्ट आता है मैं सुनती हूं। अब मैं जब अपने समाज के लोगों के बीच में जाती हूं तो बोलते हैं हिंदू

14:52 देवी देवता अस्त्र-शस्त्र रखते इसलिए थे कि उनको खतरा रहता था कि ये हमारे संग कोई मारपीट करे तो हम उन्हें काटेंगे। भाई अगर हम गौतम बुद्ध की बात करते तो उनके हाथ में कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं है। गुरु नानक जी के हाथों में कोई अस्त्र शस्त्र नहीं है। वो कोई अस्त्र शस्त्र नहीं है। तो राम को तोती हूं उसमें उन्होंने बोला है कि श्रीलंका में राम को कोई नहीं जानता क्योंकि उन्होंने जिस ऐसासा करा है किसी शू शीशा तो सर जब शुरू से सनातन धर्म में को वेद नहीं पढ़ने दिए गए और भी एक्स्रा जो शोषण और फिर हम कैसे इनकी मतलब बातें सुन ले हम कि नहीं नहीं आपको वो बातें नहीं सुननी है और और श्रीलंका में लोग राम को नहीं जानते

15:40 जानते लेकिन श्रीलंका में लोगों को चैन तो चाहिए ना मुक्ति तो चाहिए ना आजादी तो चाहिए ना चाहिए ना हां वही जो हमको चाहिए हां वही जो हमको चाहिए उसको कभी निर्वाण बोल देते हैं कभी मुक्ति बोल देते हैं और कभी राम बोल देते हैं कभी उसको गॉड भी बोल देते हैं वो जो हमको चाहिए तो यह कहना कि श्रीलंका में कोई राम को नहीं जानता। यह बहुत छोटी बात है। जी। हम सबको एक ही तत्व चाहिए। उस तत्व को आप नाम अलग-अलग दे सकते हैं। किसी ने उसको नाम राम दे दिया। आवश्यक नहीं आप वही नाम दें। आप कोई दूसरा नाम दे सकते हैं। बात

16:26 यह नहीं है कि आप किसी विशिष्ट धर्म से अलग हो जाए। बात यही कहीं आप धर्म से ही ना अलग हो जाए। धर्म को समझना जरूरी है। और धर्म के रास्ते में फिर कह रहा हूं किसी को अगर कथा कहानी उपयोगी पड़ती है तो उपयोग करें और जिसको नहीं उपयोगी पड़ती बल्कि जिसको बाधा मिल रही है कष्ट मिल रहा है उसको बिल्कुल नहीं उपयोग करना चाहिए। हमें हमें किसी स्वर्ग तक नहीं जाना है। हमें धर्म द्वारा निर्धारित किसी एक खास जगह तक नहीं जाना है। मैं जो भीतर से ही परेशान हूं मेरी बीमारी का इलाज है धर्म। ठीक है? और जो लोग इस बात को नहीं

17:14 समझते हमें उनको अधिक से अधिक यह रिश्ता रखना है कि सिखा दें उन्हें। सबसे पहले तो हमें यह पता होना चाहिए कि जो धर्म का विकृत अर्थ करके बैठे हुए हैं। वो लोग किसी स्तर के नहीं है। वह यह हैसियत नहीं रखते कि उनकी बात को गंभीरता से लिया जाए। उनकी बात का बुरा क्या मानना है? बल्कि हो सके तो उनको शिक्षा देनी है। अशिक्षित लोग हैं वो जो व्यक्ति धर्म से उन्होंने अपने को मान के रखा है ना। हम जो बोलेंगे वो सही है। हम जो बताएंगे वो सही है। वो तो अभी तो हम सुनेंगे क्यों उनकी बात? तो हम

18:00 सुनेंगे क्यों उनकी बात? तो यही है पंडाल लगते हैं। वो श्री राम चरित्र सुनाते हैं। हनुमान जी का चरित्र सुनाते हैं। उधर वो शबरी को भी झूठे बैर खाते हैं। या फिर उनके शंभु के बारे में बताते हैं। तो ये दोनों चीजें समझ इमेज क्या ले चले सर? एक इमेज क्या ले चले? सुनिए ये कोई इमेज लेके चलने की जरूरत नहीं है। वो क्या कर रहे हैं ये हमारे लिए महत्व की बात नहीं है। हमारे लिए महत्व की बात यह है कि हम भीतर से कैसे हैं। हमें बेहतर होते जाना है होते जाना है और ओछे लोगों को पीछे छोड़ते जाना है। यह हमारा काम है। इसी को धर्म बोलते हैं। मैं बहुत ज्यादा अगर परेशान रहूंगा कि दुनिया क्या कर रही है तो फिर मैं सही काम नहीं कर पाऊंगा। मुझे तो सही काम करना है ना। श्री कृष्ण क्या बोल रहे थे? गत संघ गत संघ का

18:47 क्या मतलब है? समाज से बहुत सरोकार ना रखने वाला। और समाज कोई एक चीज नहीं होती है। दुनिया 800 करोड़ लोगों की है। भारत 150 करोड़ लोगों का है। समाज में हम उनसे रिश्ता रखें ना जो किसी दम के हैं किसी स्तर के हैं। जो लोग ओछी बातों में पड़े हुए हैं कि तू कौन? तेरी जात क्या? तू स्त्री है कि तू पुरुष है, तू अमीर है कि तू गरीब है? यही सब बातें तो कि किसी का स्तर कैसे नापना है? उसकी जाति पूछ लो। उसका लिंग देख लो और उसकी प्रतिष्ठा देख लो। उसके पैसे देख लो। ऐसे ही तो उसका स्तर नापते हैं संसार में। ऐसे लोगों से हमें ताल्लुक रखना ही क्यों है? ऐसे लोग अगर हमें इज्जत भी दे दे तो उस इज्जत की हैसियत क्या है? हमें उनकी इज्जत भी नहीं चाहिए। हमें तो उन लोगों को खोजना है।

19:35 जिनको कुछ सच्चाई पता हो। हमें उनके साथ रिश्ते बनाने हैं। हमें उनके साथ अपना रहना है। अपनी गुजर बसर करनी है। यह थोड़ी है कि हम जिसको धर्म बोलते हैं उस पर मूर्खों का हम कब्जा होने देंगे। हम ऐसा क्यों सोच रहे हैं कि धर्म वो है जिसको वो परिभाषित कर रहे हैं। नहीं हम परिभाषित करेंगे ना धर्म को। उन्होंने तो धर्म को ऐसे ही परिभाषित किया है कि किसी को निचली जाति का बोल दो उसका शोषण कर दो। स्त्रियों को एक छोटे से दायरे में कैद कर दो। जीवन को जानने पर जोर नहीं है। तमाम तरह की नैतिकताओं और वर्जनाओं पर सारा जोर है। उन्होंने तो धर्म को ही परिभाषित कर दिया। उनके देखे धर्म यही है। बस 100 तरह के

20:22 अंधविश्वास उनके नाम से धर्म है। यही है ना? आप किसी तथाकथित धार्मिक आदमी से मिलो तो कैसे पहचाना जाएगा? अंधविश्वासी होगा। रूढ़िवादी होगा। सोच नहीं पाता होगा। बस ऐसे ही जो प्रथा परंपरा चल रही है उसका अंधानुकरण कर रहा होगा। यही है ना? तो हम इन लोगों को धर्म पर कब्जा क्यों कर लेने दें इन मूर्खों को? आप भी इंसान है। हम कट गई आवाज। अगर सर आप आपने सर पंडालों में देखा होगा कुछ। मैं नहीं जाता पंडाल में। मैं क्यों देखूंगा? नहीं जाता ना मैं पंडाल में। आप भी क्यों जाते हो? सर हमने हम नहीं जाते। हमने देखा है। पढ़े

21:07 लिखे बच्चे। अरे क्यों देखा है? करते हैं ना तो यहीं पे बात अटक जाती है ना आप क्यों देख रहे हो वो सब कुछ इतनी मूर्खताएं हो रही है हम नहीं देखते ना देखिए वो आपको कुछ बोलते हैं बुरा बोलते हैं तो बुरा लगता है ना आपको हमें दिन में दर्जनों में नहीं सैकड़ों में नहीं हजारों में गालियां आती हैं और आपने जितनी भी गालियां खाई होंगी ठीक है ना आप अपना पूरा कुल कुबा खानदान इकट्ठा इकठा कर लीजिए। दोस्त यार भी इकट्ठा कर लीजिए। सब उन्होंने साल भर में जितनी गालियां खाई होंगी, अपशब्द सुने होंगे या ताने सुने होंगे उनसे ज्यादा ताने और अपशब्द मैं एक दिन में सुनता हूं। तो मैं क्या करूं? मैं उसको मन पर ले चलता

21:53 रहूं। नहीं मैं उनको हटा देता हूं। मैं ब्लॉक कर देता हूं। मैं आगे बढ़ता हूं। मुझे मुझे आपसे बात करनी है ना। मैं ऐसों से क्यों बात करूं? जो मूर्ख भी हैं और आत्मविश्वासी भी हैं। उन्हें अपनी मूर्खता पर बड़ा भरोसा है। मुझे उनके साथ थोड़ी समाज बनाना है। मुझे ऐसों के साथ जाना है ना जो जो सचमुच आगे बढ़ने में रुचि रखते हो। ये ये हमेशा के लिए बना लीजिए। जो आपको नीचा दिखा रहा है ना वह खुद नीच है। जो अच्छा और ऊंचा आदमी होता है किसी स्तर का वह दूसरे को दबा सकता ही नहीं है। जो आपको जन्म के या लिंग के आधार पर नाप रहा हो वो आदमी किसी हैसियत का नहीं

22:41 है। उसकी बात का बुरा नहीं मानते। आगे बढ़ जाते हैं। और प्रयास यह करते हैं कि इसके संपर्क में जितना कम आना पड़े उतना अच्छा है। और धर्म वह बिल्कुल भी नहीं है जो इन्होंने चला रखा है। इन्होंने मूर्खता चला रखी है। तो हम यह नहीं कहेंगे कि धर्म बुरा हो गया। वो फिर हो जाता है थ्रोइंग द बेबी आउट विद बाथ वाटर। हम कि भूसे के साथ भूसे के बीच में कुछ हीरे भी थे वो भी बाहर फेंक दिए। ऐसा तो हम नहीं करते हैं ना। तो जो असली चीज है हमें उसको बचा के रखना है और मूर्खों को दूर हटा देना है। असली चीज है सचमुच है। जिस हम वेदांत की बात कर रहे हैं

23:29 उसमें जातिवाद के लिए कोई स्थान नहीं। ठीक है? मुक्तिका है। उपनिषद है। वह 108 उपनिषदों की सूची देती है। वह 108 उपनिषद प्रमाणिक है। उनमें नाम आता है वज्र सूची उपनिषद या वज्र सूचिका उपनिषद बोलते हैं। वो छोटा सा उपनिषद है। वह समर्पित ही इस बात पर है कि जाति झूठ है। झूठ है। झूठ है। यह बोलता है वेदांत। यह वेदांत का धर्म है। जनता ने अपना झूठा धर्म चला रखा है। इसमें वेदांत की क्या गलती? वह जो जनता ने चला रखा है जनता को मुबारक हो ले बैठे रहे अपना बात समझ रहे हैं क्यों जो जो वैदिक धर्म है जिसका

24:16 दर्शन वेदांत है उसमें आपको बस एक चेतना जाना गया है और मुक्ति का अर्थ है चेतना की छटपटाहट को दूर करना जाति को तो नाम लेकर के लिख के बोला गया है कि झूठी बात है समाज चल चलता है वर्णाश्रम धर्म पर और आप अष्टावक्र गीता के पास जाएंगे रिभु गीता के पास जाएंगे वहां बार-बार कहते हैं कौन सा वर्ण कौन सा आश्रम सब झूठ है बात समझ रहे हैं तो जिसको आप हिंदू धर्म बोलते हैं ना उसके उसके उसके दो पहलू हैं। एक वह पहलू जो हमको समाज में अक्सर दिखाई देता है और दूसरा वह जो सचमुच हिंदू धर्म है, सनातन धर्म है। पर जिसको बहुत कम लोग जानते हैं। समाज अपने विकृत धर्म को सनातन धर्म

25:04 बोल रहा है। यह समाज की बदतमीजी है। कि आप जिस चीज पर चल रहे हो आपने बोल दिया यही सनातन धर्म है। समाज जिस चीज पर चल रहा है वो सनातन धर्म है ही नहीं। जो असली सनातन धर्म है वह अच्छा है। आप निश्चिंत रहिए। वहां पर शोषण तो बहुत दूर की बात है। वहां बस प्रेम है और करुणा है। हम मैं इसी कारण महात्मा बुद्ध को सबसे सशक्त वेदांती बोलता हूं। बहुत लोगों को तकलीफ हो जाती है। पर मैं अपनी बात पर अडिग हूं। मैं कहता हूं वेदांत को अगर किसी ने सचमुच समझा वह थे बुद्ध। जितने लोग अपने आप को वेदांती बोलते रहे वह भी नहीं वेदांत को समझ पाए। वेदांत को

25:51 सचमुच तो बस बुद्ध ने ही समझा है। और उनके बाद मैं कहता हूं कि उनके बाद फिर नंबर लगता है संत कबीर का। यह लोग हैं जिन्होंने वेदांत को समझा और वही असली धर्म है। वही असली सनातन धर्म है। समाज मूर्खों से भरा हुआ है। और यकीन जानिए वो जितना आपको परेशान करते हैं उतना ही हमें भी परेशान करते हैं। क्योंकि वह खुद बहुत जाहिल और परेशान लोग हैं। उनको जो मिल जाए वो उसी को परेशान करते हैं। बहुतों को लगता है वो देखते हैं मेरा नाम कहते हैं त्रिपाठी लिखा हुआ है। कहते हैं ब्राह्मण है। इसको तो समाज वाले बिल्कुल सर आंखों पर रखते होंगे। ऐसी कोई बात नहीं है। जितनी तरीके की परेशानियां

26:38 हमारे लिए पैदा की जा सकती हैं, यह सब लोग कर रहे हैं। वही लोग जो आपको जाति करके परेशान करते हैं ना, ठीक वही लोग हैं जो मेरे सबसे बड़े दुश्मन हैं। सर, बहुत गंदे कमेंट्स करते हैं। हां जी। हां जी। हां जी। आपके ऊपर है मेरे ऊपर? नहीं मेरे ऊपर। आपके ऊपर तो आपके जो जान पहचान के मोहल्ले के लोग होंगे वो करते होंगे। मेरे ऊपर तो सारा हिंदुस्तान कर रहा है। हम तो लेकिन ये लोग वही हैं जो आपके साथ अभद्रता करते हैं। बिल्कुल वही लोग हैं जो मेरे साथ भी रोज बदतमीजियां करते हैं। ठीक है? और मेरा इनको जवाब यह है कि मैं तुम्हें दो कौड़ी का नहीं समझता। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता तुम क्या कर रहे हो। मैं अपना काम करे

27:24 जाऊंगा। मैं जानता हूं धर्म क्या है? तुम जिसको धर्म बोल रहे हो वह बदतमीजियों का एक पुलिंदा मात्र है। वह धर्म है ही नहीं। और मैं धर्म को पूरे संसार तक ले जा रहा हूं। मैं असली धर्म का प्रचार कर रहा हूं। हम ऐसा ही विश्वास आपको भीतर होना चाहिए कि यह मूर्ख लोग हैं जो मुझ पर ताने कसते हैं। इनका बुरा क्या मानना है? इनको तो अगर कभी मौका मिलेगा तो कोने में बुला के बैठाएंगे। नीचे बैठो। और तुम्हें कुछ एजुकेशन दे रहे हैं। कुछ सीखो पहले। तुम कुछ नहीं जानते हो। और तुम कुछ नहीं जानते। इसलिए तुम्हारी अपनी जिंदगी इतनी बेकार है। तुम्हारी जिंदगी अपनी बेकार नहीं होती। तो तुम दूसरों की जिंदगियां क्यों खराब करते? बात समझ रही हैं? हम कृष्ण माने

28:12 गीता। गीता दर्शन है। हां। हम कहते हैं कोई मुझसे पूछता है कृष्ण कौन है? मैं कहता हूं जिन्होंने गीता कही। गीता पहले है। जिसने भी गीता कही है उसका नाम कृष्ण है। और कृष्ण क्यों पूजनीय है? क्योंकि गीता है बाबा गीता है। ऐसे थोड़ी कि नहीं कोई कृष्ण है वह तो पूजनीय है ही। और उन्होंने गीता बोल दी तो चलो गीता पढ़ लेते हैं। नहीं वह बात नहीं है। क्योंकि गीता है इसलिए कृष्ण बहुत पूजनीय है। बात समझ में आ रही है? राम कौन है? राम वही है। जिनको संत कबीर लगातार गाया करते हैं। एक कबीरा नाम रे जाके राम

28:59 आधार। तो राम कौन है? जिनके निर्भय निर्गुण गुण रे गाऊंगा। कि जिन निर्गुण राम के गुण संत कबीर सदा गाते हैं, वह मेरे राम है। राम ब्रह्म परमार्थ रूपा। ठीक है। उस राम की बात हो रही है। उस राम की चार राम होते हैं। यह मैंने बहुत बार बोला। जानते हैं ना? यस। हम कि पहले राम है वो जो दशरथ घर जन्मे हैं। फिर दूसरे हैं फिर तीसरे हैं। तो जो चौथे राम हैं हम उनकी बात करते हैं। इसी तरीके से कृष्ण कौन हैं? वो नहीं कि जिनके बारे में आप किससे कहानियां

29:44 उड़ाएं? वो नहीं। जिनसे निष्काम कर्म का दर्शन मिलता है हमने उनको कृष्ण कहा और जो आखिरी बिंदु है मुक्ति का वो जो आखिरी ऊंचाई है जिसको पाया जा सकता है अपने भीतर उसको हमने राम कहा बस वो एक कहने की बात है उसको उसको वो राम वो नहीं है जिनको ये लोग लेकर के फिर रहे हैं और नारेबाजी कर रहे ना ना धर्म क्या है यह समझना पड़ेगा। धर्म रीति रिवाजों का पुलिंदा नहीं होता। धर्म अंधविश्वास और परंपराओं की धारा को नहीं

30:30 बोलते। हम सब भीतर से पैदा होते हैं। एक एक मूल अंधेरे अज्ञान के साथ। उसको हटाने को धर्म कहा जाता है। मैं अपना नाम क्या लिखता हूं? इसका धर्म से क्या रिश्ता है बाबा? मैं अपनी अपने अपने नाम के साथ वाल्मीकि लिखूं कि मिश्रा लिखूं इसका धर्म से क्या संबंध है? अब्राहम लिखूं कि मोहम्मद लिखूं इसका धर्म से क्या संबंध है? धर्म का संबंध तो यहां भीतर की छटपटाहट से होता है। आप बात समझ रही हैं? जितना आप समझतींगी उतना आपको दिखेगा कि यह दुनिया कितनी बेकार है। लोग कितने जाहिल

31:16 हैं। जब यह दिखाई देता है ना तो पहली बात इनकी बातों का बुरा लगना बंद हो जाता है। दूसरी बात एक प्रेरणा उठती है कि किस तरह इनको सुधारें। कैसे इनका कल्याण करें। हम अभी शुरुआत के लिए अभी शुरुआत के लिए हां समाज में जाकर सर उन बच्चों पर काम करना चाहती हूं जो आप देख रहे कहीं पर राम की जय हो

32:03 रहे समझा को भी बाबा साहब के आप अपनी बात WhatsApp पर रिकॉर्ड करके भेजेंगी? रिकॉर्ड कर दीजिए। भेज दीजिए। मैं उसको प्ले कर लेता हूं यहां पर। फिर से बोलिएगा। अच्छा आप आप जो बोल रही हैं ना एक बार मोबाइल में रिकॉर्डर भी ऑन कर लीजिए थोड़ा सा नहीं होता तो उसको भेज दीजिएगा। अच्छा अच्छा यही मोबाइल है हम अच्छा बोलिए

32:48 ये कह रही थी सर हां एक्चुअल न्यू जनरेशन आ रही है सर मैं तो 35 36 हूं और मेरा एक बेटा भी है वो जैसे आपको कॉल आ रही होगी। आपको उसको पिक करना है। कॉल आ रही है आपको? उसको कनेक्ट कर लीजिए। इन लोगों ने जितने सोचने समझने वाले लोग थे उनको धर्म से दूर कर दिया। जितनी पढ़ी लिखी आधुनिक लड़कियां हैं उनको

33:37 धर्म से दूर कर दिया और जो पूरा दलित वर्ग है उसको धर्म से दूर कर दिया। ये तीन लोग हैं जिनसे आप धर्म की बात नहीं कर सकते। आप जो इंटेलेक्चुअल्स हैं बुद्धिजीवी आप उनसे धर्म की बात करिए। आप उनसे बोलिए आप गीता पढ़ रहे हैं। वो सोचेंगे कि आप कुछ कट्टरपंथी टाइप हैं। वो समझेंगे कि आप राइट विंगी हैं। इसी तरीके से जो भी लड़की है जो एक खुले जीवन खुले समाज की ओर बढ़ना चाहती है। वो धर्म से बहुत दूर भागती है। क्योंकि उसने यह देखा है कि धर्म का मतलब ही है कि उसको जंजीरों से बांधा जाएगा।

34:27 और तीसरा वर्ग दलितों का। वह तो धर्म से एकदम ही दूर हो गए। और यह सारी कारस्थानी किसकी? कट्टरपंथियों की। जिन्होंने धर्म का मतलब यही बना दिया। पूरा किस्सा कहानी अंधविश्वास फलानी रूढ़ी फलानी परंपरा ये जादू ये टोना ये भूत ये प्रेत ये ऊंचा ये नीचा ये वर्जना है हमारे यहां ऐसा माना जाता है फलानी मान्यता है ये कर करके इन्होंने सबको धर्म से दूर फेंक दिया इनकी मूर्खताओं के मारे अब हालत यह है कि आप किसी को गीता भी नहीं बता सकते इनको लगता है गीता में भी अंधविश्वास है

35:13 और देखते नहीं इन्होंने गीता को कैसा मोनोपोलाइज कर लिया है। यह आते हैं। अभी रील्स की बात कर रही थी। यह आते हैं और बताते तो रहते हैं कि आज मैंने गीता पढ़ी और गीता में यह लिखा हुआ है। कि अपने दोस्तों से कभी बेवफाई मत करो और अपने दुश्मनों को कभी जिंदा मत छोड़ो। यह बताते हैं आकर के। कहेंगे राम राम भाई सारा ने और कहेंगे मैंने गीता पढ़ी और उसमें बता देंगे कि गीता में कब लिखा रोज झूठ बोलते हो कि मैंने गीता पढ़ी और गीता में यह लिखा है कहां लिखा है गीता में कौन से अध्याय में लिखा है गीता में कि दोस्तों से कभी दगा मत करना और

35:58 दुश्मनों को कभी जिंदा मत छोड़ना ये गीता में लिखा है और ऐसे तमाम है एक दो नहीं मतलब 50ों इन्होंने हर हर अच्छी चीज को मोनोपोलाइज कर लिया, कोऑप्ट कर लिया और अपने गंदे उद्देश्यों के लिए उसका इस्तेमाल कर लिया। नतीजा यह है कि होने यह जा रहा है कि जिसे हम सनातन धर्म कहते हैं उसमें बस यही यही बचेंगे। बाकी सब छोड़ के भाग जाएंगे। कहेंगे कि अपना तुम ही रखो। तुम्हें ही मुबारक हो। अब तुम ही इसको रखो। सब हट जाएंगे उससे। जी लक्ष्मी जी हमारे साथ हैं। लक्ष्मी जी आप बोलिए। हां तो सर बस यही था अभी जो आपने मुझे ज्ञान दिया वो मुझे सुन के बहुत अच्छा लगा अब वही मैं आपको बता रही थी कि जैसे हमारे

36:46 घर के बच्चे हैं या हमारे समाज के बच्चे अब उनसे बात करो उन बच्चों को भी सर कुछ नहीं पता उन्हें आधा आधा उनको बाबा साहब के बारे में पता है आधी नफरत उन्हें राम से है आधी नफरत उन्हें हिंदू सनातन धर्म से अब मैं उन्हें ये नहीं समझा पाती हूं कि आध्यात्मिक ज्ञान के लिए कैसे आप भगवान को याद करो वो किसी भगवान के रूप में राम को जानते हैं। जैसे हम अपने प्रधानमंत्री जी की बात करें। उन्होंने जो अयोध्या में मंदिर स्थापित किया है। उन्होंने उसके अर्जुभूति को वो उस राम को दिया है जो राम का हम सुनते आ रहे हैं कि इन्हने दलितों के साथ शोषण किया है। तो वो बिल्कुल एक्सेप्ट नहीं होती ये चीजें कि हम कैसे इस चीज को मतलब एक्सेप्ट कर ले। अब रामराज आएगा तो क्या वही चीजें वापस लौटेंगी?

37:32 शिक्षा का अधिकार छीन जाएगा। स्वतंत्रता छीनेगी। तो ये सर कैसे काउंसलिंग करें उनकी और दूसरा बाबा साहब को सर लास्ट जो बातें थी कि मैं जन्मा हूं हिंदू धर्म में लेकिन मैं मरूंगा नहीं तो ये चीजें हम कैसे बोले सर इतना बुरा तो उन्होंने मरना पसंद क्यों नहीं करा तो बिल्कुल ठीक बिल्कुल ठीक ही तो कहा था ना उन्होंने उन्होंने कहा था धर्म का जो स्वरूप समाज में प्रचलित है मैं इसमें बिल्कुल नहीं जीना चाहता ये बिल्कुल सही बात थी सच्ची बात थी ये एक दमदार विद्रोही की बात थी कि तुम लोगों ने जिस चीज को धर्म बोलकर प्रचलित कर रखा है मैं कोशिश करूंगा वो सुधरे सुधरे उन्होंने बहुत कोशिश करी और

38:19 बहुत सुधार वो ला भी पाए अपने जीवन काल में पर फिर देखा कि जितना चाहते हैं सुधार आए उतना आ नहीं रहा है तो मृत्यु से सिर्फ कुछ महीने पहले उन्होंने त्याग दिया बोले नहीं मैं तुम्हें सुधारने का पूरा प्रयत्न कर रहा था। तुम सुधरने को तैयार नहीं हो तो ठीक है। जो प्रचलित धर्म है वह तो हर जागृत आदमी को अस्वीकार कर ही देना चाहिए। सबको प्रचलित धर्म। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हम धर्म को ही अस्वीकार कर दें। मैं यह कह रहा हूं। प्रचलित धर्म को तो मैंने भी अस्वीकार कर दिया है। मैं कहां मानता हूं यह सब जो चला रहे हैं। तभी तो यह सब मुझे दिनरा पानी पी पी के गालियां देते हैं। जी जो कुछ इन्होंने धर्म के नाम पर चला

39:06 रखा है वह धर्म है ही नहीं। वो इनकी गुंडागर्दी है बस उसको नहीं मानना है। तो हमें क्या करना है? हमें धर्म का जो सही अर्थ है वो अपने जीवन में लेकर आना है और फिर समाज में भी फैलाना है। यह हमारा काम है। बात समझ रहे हैं? जी। यह सब तभी हो पाएगा। यह सब तभी हो पाएगा जब हम वास्तविक धर्म को समझें। नहीं तो कोई फायदा नहीं होगा कि आप पहले एक तरह के अंधविश्वास मानते थे। फिर आप दूसरे तरीके के रीति रिवाज मानना शुरू कर दो और कह दो कि मैंने धर्म परिवर्तन कर लिया। यह धर्म परिवर्तन थोड़ी हुआ है। यह तो अंधविश्वास परिवर्तन हुआ है कि पहले एक तरह की मान्यताओं में थे। अब दूसरी तरह की मान्यताओं में आ गए तो क्या परिवर्तित हुई हैं? मान्यताएं परिवर्तित हुई है। इससे

39:53 कुछ नहीं हो जाएगा। हमें वास्तविक धर्म तक पहुंचना है और उसका कोई विशिष्ट नाम नहीं होता। कोई विशेष नाम नहीं है। उसी वास्तविक धर्म को समझने के लिए हम एक छोर पर वेदांत को लेकर चल रहे हैं तो दूसरे छोर पर बौद्ध दर्शन को लेकर के चल रहे हैं। और आप अब सत्रों में रहती होंगी तो आपने देखा होगा कि जो बात अष्टाव गीता में निकल कर के आती है और वही बात शून्यता सप्त में निकल कर आती है। बिल्कुल सर। जैसे ही हम अंदर घुसते हैं ना ध्यान में तो समझ में यही आता है कि एक ही चीज है, एक ही पावर है। वो जो अंदर वाला

40:40 है ना वही सिर्फ धर्म है। ये जो बाहर वाला है इसको धर्म नहीं बोलिए। ये जो बाहर वाला है यह बदतमीजी है। बकवास है। इसको धर्म नहीं बोलते। यह तो इन लोगों की गुंडागर्दी है कि इन लोगों ने बाहर वाली जो चीजें हैं पारिथिक हां सतही चीजें इन्होंने इन्हीं चीजों को धर्म का नाम बना दिया कि हम फलाने कपड़े पहनते हैं इसका नाम धर्म है। हम फलाने दिन व्रत उपवास या रोजा रखते हैं। इसका नाम धर्म है। यह थोड़ी धर्म होता है। यह तो धर्म के साथ खिलवाड़ है, गुंडागर्दी है। जो अंदरूनी चीज है ना जिसका अभी आपने जिक्र करा वह अंदरूनी चीज ही सिर्फ धर्म

41:25 है। और उसी अर्थ में हमें धार्मिक होना भी है। वही सच्ची धार्मिकता है। सर मैं तो समझ गई बट अब मैं किसी और को भी इसी ज्ञान से जोड़ना चाहती हूं। तो उनके दिमाग के छू कैसे खोलूं मैं? ये पर्दा हटाऊं कैसे? देखिए हम आप एक ही नाव पर सवार हैं। हम आप भी गाली खाती हैं। हम भी गाली खाते हैं। तो आप भी वही करिए जो हम करते हैं। हम जी जी मुझसे जाति के आधार पर कुछ लोग बोलते हैं ब्राह्मण। हम

42:12 पर समाज से जो व्यवहार मिल रहा है उसके आधार पर जैसे कबीर साहब ने नहीं बोला था मैं दासन का दास अब तो ऐसा बन रहा जो पांव तले की घास तो वो दासन का दास बोलते थे अपने आप को मैं अपने आप को शूद्र अति शूद्र बोलता हूं तो हम और आप एक ही नाव में सवार हैं हम और उस नाव में हम हैं और आप और जो मूर्धन्य ज्ञानी थे संत कबीर जैसे वह सब लोग भी हैं। ठीक है जी सर। हां तो मिलजुल के चप्पू चलाएंगे और उस पार पहुंच जाएंगे। सर बिल्कुल हम घबराना नहीं है

43:00 और मूर्खों को बहुत भाव नहीं देना है। यस सर हम भागिएगा मत देवी जी बहुत श्रम कर रहा हूं आपके लिए ही ठीक है डटी रहिएगा मैं कोई एनलाइटेंड तो हूं नहीं तो मुझे भी इंस्पिरेशन की प्रेरणा की जरूरत पड़ती

43:46 रहती है। जिनके लिए मेहनत कर रहा हूं अगर वो टूटते दिखाई देते हैं, हटते दिखाई देते हैं तो फिर मेरी भी ऊर्जा कम होने लगती है। एक हताशा भी आती है थोड़ी और चिढ़ भी आती है। ऐसा भी भाव आता है कि क्यों करें? किसके लिए करें? खत्म करो सब कुछ। ठीक है। तो यह मेरी सारी मेहनत, सारा काम सब आपके लिए ही है। डटी रहिएगा।

44:32 बिल्कुल सर मैं तो चाह रही थी कि सबको पता हो लेकिन बस वही चीजें आती लेकिन मैं तो समझ में अच्छी चीजें और समझाने का प्रयास भी मेरा चल रहा है यहां पर सभी को कि एक दो चीजें फैला रहे धर्म गुरु उसकी ना सुने और जो सही चीज है वो पकड़े ऐसे विचित्र यह लोग हैं। सबसे पहले तो तुमने सदियों तक करा है गलत आचरण, करा है दुर्व्यवहार, करा है शोषण। मानो ना इस बात को। पहले तो मानने को तैयार नहीं। और

45:18 दूसरी बात जो अतीत में करते आए हो, इच्छा तुम्हारी यही है कि तुम आज भी वही काम करो। यह कैसे लोग हैं? और आत्मविश्वास कूट कूट के भरा हुआ है कि हम जो कर रहे हैं वही बिल्कुल ठीक है। समझाने जाओ, सुधारने जाओ तो सुनते नहीं। सुनते हैं पर बड़ा रेजिस्टेंस देते हैं। सर मार मार के दीवारों को तोड़ना

46:04 है। इतना विरोध करते हैं। दीवार तो टूटती है फिर लेकिन उसमें धार दिखाई देती है लहू की। और यह सब करके मिल क्या गया? मिला कुछ भी नहीं है। मिला यह कि वैज्ञानिक प्रगति में पीछे रह गए। मिला यह कि इतने युद्धों में पराजय मिली। कलाओं में पीछे हो। हर

46:49 तरह के मनुष्य के कृतित्व के क्षेत्र में पीछे हो। सिर्फ इसीलिए क्योंकि दिमाग में ठूस ठूस करके सड़ी हुई मान्यताएं भर ली है। जो जीने नहीं देती, खुल के सांस नहीं लेने देती। किसी तरह की क्रिएटिविटी नहीं होने देती। प्रतिभा को सामने नहीं आने देती। प्रेम का कोई स्थान ही नहीं है। तो कहां से फिर समाज आगे बढ़ेगा? कहां से फिर राष्ट्र आगे बढ़ेगा? संकुचित जीवन सड़ी हुई मान्यताएं।

47:34 और उसको नाम दे दिया है धर्म का। और जो वास्तविक धर्म है वह बताने जाओ। तो ये ईंट पत्थर मारते हैं, गाली गलौज करते हैं और सोशल मीडिया आ गया उस पे ट्रोलिंग करते हैं। हम बात करते हैं ना ज्ञानी की हम मुक्ति की बात करते हैं ना। आप का अज्ञान हट रहा है कि नहीं हट रहा है? उसको जांचने का एक अच्छा तरीका यह भी है कि जाति नाम का शब्द आपके दिमाग से कितना हटा। जितना आपके दिमाग से अज्ञान हटेगा उतना ही आपके दिमाग से यह जाति नाम का शब्द हटेगा। और जब तक आप जाति को महत्व दे रहे हो तो जितना महत्व आप जाति को दे रहे

48:21 हो उतना ही महत्व आप अपनी मूर्खता को दे रहे हो। कोई बोले कि मैं बिल्कुल अब ज्ञानी हो गया हूं। चेतना चढ़ गई है आसमान में मुक्त पुरुष हो गया हूं। लेकिन जातपात पर अभी पूरा व्यवहार है हमारा तो समझ लो पाखंडी है बस। तो अपने आप को जांचना हो नापना हो तो अपने दिन भर के घरेलू सामाजिक व्यवहार में नाप लीजिएगा कि जाति आपके लिए कितना अर्थ रखती है। कोई काम नहीं आई आपके गीता। व्यर्थ हो गए आप पर उपनिषद। अगर अभी भी आपको जाति महत्व की चीज लगती है

49:08 तो ध्यान धरने से, समाधि में बैठने से, माला जपने से, पाठ करने से कुछ नहीं होगा। अगर अभी भी यही लगता है कि मनुष्य के स्तर का निर्धारण तो उसकी जाति से, वर्ण से होता है। सब बेकार चला गया। और कितनी अजीब बात है कि जो लोग अपने आप को जितना धार्मिक बोलते हैं आमतौर पे वो उतने ज्यादा जातिवादी होते हैं। इसी से पता चलता है कि जो हमारा लोक धर्म है जो समाज में प्रचलित धर्म है वो कितना नकली है। हमारा धर्म अगर असली होता तो जैसे-जैसे आदमी धार्मिक होता जाता वैसे-वैसे उसके मन से जाती हटती जाती। पर

49:54 उल्टा है। कोई आदमी आपको मिले और कहे मेरा धर्म से कुछ लेना देना नहीं। मैं नास्तिक हूं। वह तो हो सकता है कि जातिवादी ना हो। लेकिन इस बात की संभावना बहुत कम है कि कोई आपको धार्मिक आदमी मिले। बोले मैं बड़ा धार्मिक हूं। चंदन टीका करता हूं। वो जातिवादी ना हो। इसकी संभावना बहुत कम है। इसका मतलब यही है कि धर्म नकली है हमारा। सच्चा धर्म तो जाति को लात मारता है। सच्चे धर्म में देह के लिए कोई स्थान नहीं। तो जो चीज देह के जन्म से मिलनी हो उसका क्या स्थान हो जाएगा? सच्चा धर्म तो बहुत वैज्ञानिक और तार्किक होता है। दो लोग जन्म लेते हैं। उनके शरीर में

50:40 अंतर ही कितना है? विज्ञान की दृष्टि से देखो। तो तो तुमने कैसे दोनों में भेद कर दिया कि एक जन्म से ऐसा है, एक जन्म से वैसा है। एक आदमी का खून तुम दूसरे आदमी को चढ़ा देते हो। जाति देखते हो क्या? एक का गुर्दा निकाल करके दूसरे में लगा देते हो तो जाति देखते हो। देखते हो? तो शरीर में तो नहीं अंतर होता। अध्यात्म से देखो तो भी कोई अंतर नहीं है। हम क्या हैं? चेतना। और सबकी चेतना एक जैसी है। किस अर्थ में? कि सब अपूर्ण है। और विज्ञान की दृष्टि से देखो तो हम सब शरीर हैं और शरीर और शरीर

51:25 में भी अंतर नहीं है। तो फिर अंतर है कहां? वज्र सूची उपनिषद कहता है कल्पना है। कल्पना जाति क्या है? कल्पना। कल्पना मात्र है। मिथ्या है जाति। ये उपनिषद बोलते हैं। ये ऋषियों ने सिखाया है। कि जाति से बड़ा झूठ दूसरा नहीं। ये ऋषियों ने सिखाया है। अब ये कौन से धर्म को मानने वाले लोग हैं जो कहते हैं कि जाति पर चलेंगे। ऋषि तो बोल गए जाति पे नहीं चलना है। पर समाज के बड़े स्वार्थ जुड़े हुए हैं जाति के साथ। ऋषियों ने समाज के स्वार्थों को तोड़ने की बहुत कोशिश की पर तोड़ नहीं पाए। समाज जीत गया। ऋषि हार गए।

52:17 समाज द्वारा विकसित शोषण का एक उपकरण है जाति प्रथा। धर्म इस प्रथा को तोड़ने का पूरा प्रयास करता है। वास्तविक धर्म। नकली धर्म इसी प्रथा को आगे बढ़ाता है। कितनी बार बोलूं यह बात 100 बार बोली जा चुकी है।

53:07 कबीर साहब बोलते हैं या जग काली कुकरी जे छेड़े ते खाए बोलते हैं ये जगत जो है ना इसको समझाने जाओ तो समझता कुछ नहीं बोलते उल्टे पलट के तुमको काट लेता है बोलते हैं यह जो जगत है यह काली कुतिया जैसा है इसको छेड़ोगे तो तुम्हें काट लेगा कितनी बार उन्होंने गाया है कि इतना समझा रहे हैं पर जजग बौराना यह नहीं समझता जो एंटी कास्ट बात है वो कोई आज की थोड़ी है कि अब हम आधुनिक हो गए हैं तो हम

53:53 जाति प्रथा का विरोध कर रहे हैं। वज्रसूची उपनिषद भी विरोध कर रहा था। जाति प्रथा किसकी है? समाज की है। उसका विरोध आदिकाल से हो रहा है। उपनिषदों ने भी जाति प्रथा का विरोध किया है। बुद्ध और महावीर ने भी जाति प्रथा का विरोध किया है। सब दार्शनिकों ने जाति प्रथा का विरोध किया है। संत कबीर ने भी जाति प्रथा का विरोध किया है। भक्ति मार्ग के सब संतों ने जाति प्रथा का विरोध किया है। कोई आज थोड़ी विरोध होना शुरू हुआ है कि आप कहें कि देखो पुराने जमाने में लोग जाति मानते थे और अब हम मॉडर्न हो गए हैं तो हम जाति नहीं मानते। हर समय पर जाति का विरोध हुआ है। लेकिन समाज का इतना स्वार्थ है जाति के साथ कि

54:38 वह जाति को छोड़ना नहीं चाहता। कई बार हमारे मन में छवि बैठ जाती है कि जाति का विरोध होना तो अभी शुरू हुआ है। नहीं अभी नहीं हुआ है। हमेशा से जाति का विरोध हो रहा है। लेकिन समाज का क्या स्वार्थ है? कि वाशिंग मशीन की जरूरत क्या है? कुछ लोगों को बता दो कि तुम्हारा काम ही है कपड़े धोना तो पुश्त दर पुश्त कपड़े धोते जाएंगे। हो गई ना सहूलियत। क्यों किसी तरह की मेहनत करें? शोध रिसर्च करें, अनुसंधान करें। क्यों नई टेक्नोलॉजी विकसित करें?

55:27 जो जो काम टेक्नोलॉजी से होते हैं उन उन कामों के लिए एक जाति बना दो। कपड़े साफ करने की एक जाति है। जूतों की एक जाति है। बाल काटने की एक जाति है। क्या करना है? इलेक्ट्रिक रेजर डेवलप करके। एक जाति बना दो। वो उसका काम ही है। वो बस बाल काटेगी। और आप काम बताओ ना। जो जो काम पुरुषार्थ से होने चाहिए, विज्ञान से होने चाहिए। चेतना की उपलब्धियों से और आविष्कार से होने चाहिए। उन सब कामों के लिए हमने क्या करा? करना क्या है? कुकिंग टेक्नोलॉजी में आविष्कार

56:13 करके। एक भयानक बहुत बड़ी जाति बना दो आधे मनुष्यों की। उसको बोल दो तुम्हारा काम है किचन में घुसे रहना। अब क्यों चाहिए डिशवाशर? औरत है तो। डिशवाशर का आविष्कार करने की जरूरत क्या है? औरत है तो क्या जरूरत है स्मोकलेस स्टोव का आविष्कार करने की? पहले पता है ना वो चूल्हे में बनता था और औरतें सब अंधी हो जाती थी। क्यों? वही धुआ। क्या जरूरत है टेक्नोलॉजी को आगे बढ़ाने

57:00 की? औरत को लगा रखा है वो कर रही है। और अगर वो औरत बेकार हो जाएगी तो बहुपत्नी प्रथा चला दो। एक औरत बेकार हो गई उससे कम उम्र की एक कुंवारी कन्या ले आओ। बढ़िया और अच्छा है। मजा आ गया। और बहाना और मिल गया कि यह तो अंधी हो गई है। तो इसलिए अब हम जाकर के एक शोडशी 16 साल की कन्या ब्याह लाए हैं। यह समाज का काम है। यह समाज का इसमें स्वार्थ रहा है बाबा। यह धर्म का काम नहीं है। समाज के काम को धर्म का काम क्यों समझ रहे हो? धर्म पर लांछन मत लगाइए। यह मत सोचिए कि जाति प्रथा धर्म से आ रही है। धर्म ने तो जान लगा दी है जाति प्रथा को तोड़ने के लिए। पर समाज के नेस्त स्वार्थ सस्ते में काम चल रहा है उसको

57:47 पैसा देने की भी जरूरत नहीं बहुत उसको बोलो कि तेरा पुश्तैनी काम है तू यही कर तू बना ही इसीलिए कोई लड़ने में बहुत ना उत्सुक हो तो भी उसको तलवार दे दो बोलो तू तो लड़ेगा जा अब फौज हारेगी कि नहीं हारेगी किसी के पास ना बुद्धि ना मेधा ना प्रतिभा ना रुझान पर उसको बोल दो कि तू तो फलाने वर्ण में पैदा हुआ है तो तू तो शिक्षक बनेगा ही बनेगा। अब वो कौन सी शिक्षा देगा?

58:41 तो कुल मिलाकर के देश का बंटाधार फोर्स फिटिंग कि तुम्हें यह काम करना ही करना है। दूसरे को पकड़ लिया तुम्हें यह काम करना ही करना है। अब वो उस काम के लिए उपयुक्त है कि नहीं है इसका कोई परीक्षण नहीं। जबरदस्ती ठूस दिया करो करो। ऐसे कोई समाज चलता है? और ये जो बात अभी आई उसको मैं चाहता हूं आप याद रखें। एंटी कास्ट मूवमेंट मॉडर्न नहीं है। एंटीकास्ट मूवमेंट उतने ही पुराने हैं जितने

59:28 उपनिषद। जो वेदांत पढ़ेंगे तो पाएंगे कि पहला एंटी कास्ट मूवमेंट तो वेदांत के अंदर ही घुसा हुआ है। वेदांत खुद पहला एंटी कास्ट मूवमेंट है और उसके बाद लगातार वह चलता ही रहा है। पर मूर्खों का हमेशा बहुमत रहता है। वो नहीं माने जो मध्यकालीन संत थे ज्यादातर जानते हैं ना उन वो सब ज्यादातर तथाकथित निचली जातियों के थे उत्तर भारत में ही नहीं दक्षिण में

1:00:13 भी आप आप तमिलनाडु के जो संत थे पांचवी से दसवीं 11वीं शताब्दी तक आप उनका पढ़ेंगे अलवार संत वगैरह तो आपको पता चलेगा यह सब जो भी जगा है उसने यही कहा है कि मुझे सच से प्यार है और जाति से घृणा है क्योंकि जाति माने देह देह माने बंधन मुझे मुक्ति से प्यार है

1:01:02 पूरब की तरफ जाएं तो वहां पर पश्चिम की तरफ थोड़ा वहां राजस्थान में मीराबाई हैं जो संत रैदास के चरणों में बैठ गई हैं। पंजाब की तरफ जाए तो वहां सिख गुरुओं की पूरी परंपरा ही है। पूरी श्रृंखला ही है। उन्होंने जाति को फाड़ कर फेंक दिया। गंगा के तटवर्ती इलाकों में आए तो वहां संत कबीर से बड़ा नाम दूसरा नहीं है। उनके सामने आप जाति की बात करते तो फिर पता चलता। महाराष्ट्र में जाएं तो वहां पर नामदेव हैं, तुकाराम है। वहां सुनिए बातें। आप जिधर को भी जाएंगे वहां जो भी

1:01:52 जागृत हुए हैं उनको जाति के आमूलचूल खिलाफ ही पाएंगे। लेकिन फिर भी हम ऐसे जबरदस्त लोग हैं कि हमने जाति छोड़ी नहीं। इतने समझाने वाले आए समझा समझा के सब थक गए पर हम नहीं हिल रहे।

1:02:37 जो पूरा इंडियन रेनसा था आधुनिक युगीन हां जो राजा राममोहन रॉय से शुरू होता है और बाबा साहब डॉ अंबेडकर तक आता है उसमें आप गिनोगे बल्कि और उसमें महात्मा ज्योतिबा फुले वहां से उसको शुरू मानना चाहिए और गिनोगे तो एक से एक अग्रणी व्यक्तित्व है और वो सब के सब क्या समझा रहे हैं कि ये मूर्खता है पर हम नहीं मान

1:03:23 रहे महात्मा गांधी बोल गए जिनको तुम कह रहे हो कि वो जन नीचे के हैं। मैं तुमसे कह रहा हूं कि वो जन सर पर बैठा हो वो हरिजन है। हरिजन मतलब समझ रहे हो कि तुम भगवान को पूजते हो ना। हां तो वो भगवान के स्तर के हैं। उनको सीधे यही मानो कि ये मालिक का बंदा है। हम नहीं सुधर रहे। लेकिन भारत का विभाजन हुआ। हम सोचते हैं कि वो सिर्फ हिंदू मुसलमान की बात है। सिर्फ हिंदू मुसलमान की बात थोड़ी

1:04:10 है। वो जितनी हिंदू मुसलमान की बात है। उससे ज्यादा वो दलितों के शोषण की बात है। इस्लाम भारत में फैला उसके बहुत कारण थे। पर एक कारण यह भी था कि जिनको हमने सता रखा था उन्होंने मुसलमान बनने में अपनी भलाई देखी। जाति ने भारत देश को कितने नुकसान पहुंचाए, कितने विभाजन करवाए और हम

1:04:58 अभी भी हम कहते हैं एक और हम कहते हैं कि हम राष्ट्रवादी हैं और दूसरी ओर हम कह देते हैं हम जातिवादी हैं। जो सच्चा राष्ट्रवादी होगा वो जातिवादी हो ही नहीं सकता। क्योंकि जाति तो राष्ट्र को तोड़ने का काम कर रही है। और यह आप पाते हैं कि नहीं कि जितने लोग ज्यादा नारा लगा रहे हो देशभक्ति का बहुत संभावना है कि यह लोग भयंकर जातिवादी भी होंगे। यह कौन सा राष्ट्रवाद है जो जातिवाद के साथ चल रहा है? बताओ तो जी

1:05:44 जाति ना पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान जाति ना पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान मोल करो तलवार का पड़ी रहन दो मान रे साधो पड़ी रहन दो मान जाति ना पूछो

1:06:30 साधु की पूछ लीजिए ज्ञान जाति ना पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान मोल करो तलवार का पड़ी रहने दो म्या रे साधो पड़ी रहन दो मान कबीरा कुआ एक

1:07:15 है पानी भरे अनेक कबीरा कुआ एक है पानी भरे करे अनेक बर्तन में ही भेद है पानी सब में एक रे साधु पानी सब में एक कबीरा कुआ एक है पानी पानी भरे

1:08:04 अनेक कबीरा कुआ एक है पानी भरे [संगीत] अनेक बर्तन में ही भेद है पानी सब में एक रे साधु पानी सब में [संगीत] एक एक बूंद एक मल एक चाम एक गुदा एक बूंद एक

1:08:50 कैमल एक चाम एक गुदा एक ज्योति से सब उत्पना कौन बामन कौन शूद रे साधु कौन बामन कौन [संगीत] शू एक बूंद एक मल मोर एक चाम एक गुदा [संगीत] एक बूंद एक मल एक चाम एक

1:09:41 गुदा एक ज्योति से सब उत्पना कौन बामन कौन शूद रे साधु कौन बामन कौन शोर [संगीत] हम्म [संगीत]

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