Somnath Temple: History, Significance & Invasions Explained | UPSC History | StudyIQ IAS

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संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो गुजरात के वेरावल में स्थित सोमनाथ मंदिर के इतिहास पर प्रकाश डालता है, जो भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से पहला माना जाता है। मंदिर के निर्माण, विनाश और पुनर्निर्माण की कई कहानियों को शामिल किया गया है, जिसमें महमूद गजनी के आक्रमण और स्वतंत्रता के बाद इसके पुनर्निर्माण जैसे महत्वपूर्ण घटनाएं शामिल हैं। यह मंदिर न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि भारतीय संस्कृति और विरासत के प्रतीक के रूप में भी महत्वपूर्ण है।

  • सोमनाथ मंदिर का प्राचीन इतिहास और धार्मिक महत्व
  • महमूद गजनी द्वारा मंदिर का विनाश और पुनर्निर्माण
  • स्वतंत्रता के बाद सरदार वल्लभ भाई पटेल द्वारा पुनर्निर्माण का आदेश
  • मंदिर के पुरातात्विक उत्खनन और वास्तुकला का विश्लेषण

सोमनाथ का इतिहास

सोमनाथ मंदिर, जो गुजरात के वेरावल में स्थित है, भारत के सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक हिंदू मंदिरों में से एक है। यह मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से पहला माना जाता है और इसका धर्म, संस्कृति, पौराणिक कथाओं और इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस मंदिर का पहला ढांचा किसी मानव ने नहीं, बल्कि स्वयं चंद्र देवता सोम ने बनाया था। ऐतिहासिक रूप से, 1951 में अपने अंतिम निर्माण से पहले, इसे कई बार नष्ट किया गया और विभिन्न शासकों द्वारा पुनर्निर्मित किया गया। मंदिर तीन प्रमुख भागों में विभाजित है: गर्भगृह, सभा मंडप और नृत्य मंडप। इसकी शिखर की ऊंचाई 150 फीट है और शिखर पर लगे कलश का वजन 10 टन है।

महमूद गजनी का आक्रमण

सोमनाथ मंदिर से जुड़ी सबसे कुख्यात घटना 1026 ईस्वी में हुई, जब महमूद गजनी ने भीमा प्रथम के शासनकाल में मंदिर पर आक्रमण किया और इसे लूट लिया। गजनी ने मंदिर के ज्योतिर्लिंग को तोड़ दिया और 20 मिलियन दीनार की संपत्ति लूट ली। हालांकि, कुछ इतिहासकारों का मानना है कि गजनी के आक्रमण के बाद मंदिर को 12 वर्षों के भीतर ही मरम्मत कर दिया गया था और 1038 तक यह फिर से एक सक्रिय तीर्थ स्थल बन गया था। अलबरूनी, जो महमूद गजनी के दरबार में एक विद्वान थे, ने भी इस आक्रमण की पुष्टि की और लिखा कि गजनी का उद्देश्य न केवल मंदिर को लूटना था, बल्कि एक सच्चे मुस्लिम के रूप में मूर्तिपूजा को समाप्त करना भी था।

पुनर्निर्माण और प्रतिरोध

1169 के शिलालेखों के अनुसार, कुमारपाल ने लकड़ी के मंदिर को उत्कृष्ट पत्थर के काम से बदल दिया और इसे रत्नों से जड़ दिया। 1299 में, अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने गुजरात पर आक्रमण किया और सोमनाथ मंदिर को फिर से लूट लिया। 1308 में, जालौर के राजा कान्हड़दे ने दिल्ली की सेना पर हमला करके सोमनाथ की मूर्ति को पुनः प्राप्त किया और हिंदू कैदियों को रिहा कराया। 1395 में, गुजरात के अंतिम गवर्नर जफर खान ने मंदिर को नष्ट कर दिया, और 1451 में, गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा ने मंदिर को अपवित्र कर दिया। 1665 में, मुगल सम्राट औरंगजेब ने सोमनाथ मंदिर को नष्ट करने का आदेश दिया। 1783 में, इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराया, जिसे आज पुराने सोमनाथ या अहिल्याबाई मंदिर के नाम से जाना जाता है।

ब्रिटिश राज और सोमनाथ

1842 में, ब्रिटिश भारत के गवर्नर-जनरल लॉर्ड एलेनबरो ने "गेट्स की घोषणा" जारी की, जिसके तहत उन्होंने अफगानिस्तान में काबुल की लड़ाई लड़ रही ब्रिटिश सेना को गजनी से चंदन की लकड़ी के द्वार वापस लाने का आदेश दिया। माना जाता था कि ये द्वार महमूद गजनी ने सोमनाथ मंदिर से लूटे थे। हालांकि, भारत आने पर, ये द्वार न तो गुजराती डिजाइन के थे और न ही भारतीय डिजाइन के, और वे चंदन की लकड़ी के बजाय गजनी के मूल देवदार के पेड़ों के थे। इसलिए, उन्हें सोमनाथ से प्रामाणिक नहीं माना गया। ये द्वार आज भी आगरा किले के शस्त्रागार में रखे हुए हैं।

स्वतंत्रता के बाद पुनर्निर्माण

स्वतंत्रता से पहले, वेरावल जूनागढ़ राज्य का हिस्सा था, जिसके शासक ने 1947 में पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला किया था। भारत ने इस विलय का विरोध किया और एक जनमत संग्रह आयोजित करने के बाद जूनागढ़ को अपने में मिला लिया। 12 नवंबर 1947 को, भारत के उप प्रधान मंत्री वल्लभभाई पटेल राज्य को स्थिर करने के लिए सेना को निर्देशित करने के लिए जूनागढ़ गए। उसी यात्रा में, उन्होंने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का आदेश दिया। गांधीजी ने इस कदम का समर्थन किया और कहा कि पुनर्निर्माण में लगने वाला पैसा जनता से एकत्र किया जाना चाहिए और मंदिर को राज्य से वित्त पोषित नहीं किया जाना चाहिए। 11 मई 1951 को, भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर के लिए स्थापना समारोह किया।

वास्तुकला इतिहास

सोमनाथ मंदिर स्थल पर सबसे बड़ा उत्खनन 1950-51 में किया गया था, जिसका नेतृत्व भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निदेशक बी.के. थापर ने किया था। थापर के अध्ययन ने 10वीं शताब्दी या उससे पहले के एक बड़े मंदिर के प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत किए। उन्होंने अनुमान लगाया कि पुराना मंदिर लगभग 9वीं शताब्दी का बना हुआ है। भारतीय मंदिर वास्तुकला के विद्वान ढाकी के अनुसार, यह निर्माण 10वीं शताब्दी में 960 से 973 ईस्वी के बीच हुआ था। उत्खनन में प्राचीन लिपि के साक्ष्य के साथ कई कलाकृतियाँ और खंडहर पाए गए, जो ब्राह्मी या उसके बाद की प्रोटोनागरी या नागरी लिपियाँ थीं। 1970 में, एम.के. धवलीकर और जेड.डी. अंसारी के नेतृत्व में सोमनाथ मंदिर के पास कुछ सोमनाथ पाटन स्थलों का उत्खनन किया गया। 1992 में, एम.के. धवलीकर और ग्रेगरी पोशल ने प्रभासपाटन पर अपनी पुरातात्विक खोजों के विश्लेषण की रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें सोमनाथ स्थल पर पूर्व-द्वितीय सहस्राब्दी ईसा पूर्व काल से ही प्राचीन मानव बस्तियों के प्रमाण मिले।

निष्कर्ष

सोमनाथ मंदिर ऐतिहासिक घटनाओं के साथ-साथ हिंदू धर्म के उत्थान और पतन का एक महत्वपूर्ण प्रतीक रहा है। कई विदेशी आक्रमणों और संरचनात्मक क्षति के बाद भी, इस मंदिर का एक सक्रिय तीर्थ स्थल बने रहना न केवल इस मंदिर के महत्व को दर्शाता है, बल्कि हिंदू धर्म के लचीले स्वभाव को भी दर्शाता है। इसके अलावा, इस मंदिर का पुनर्निर्माण समकालीन भारतीय समाज की सांस्कृतिक विरासत और सांस्कृतिक स्मृति को बनाए रखने के प्रयासों को भी दर्शाता है। सोमनाथ मंदिर के पर्यटन को बढ़ावा देने और स्थानीय आबादी के कल्याण को सुनिश्चित करने के लिए उस क्षेत्र में मौद्रिक निवेश एक बड़ा वरदान साबित होगा।

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0:01 स्टडी आईक्यू आईएएस आपका सिलेक्शन हमारा मिशन हिस्ट्री ऑफ़ सोमनाथ वेलकम टू स्टडी आईक्यू मेरा नाम है आदेश सिंह दोस्तों भारत में उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से लेकर पश्चिम तक अनेकों मंदिर हैं। यह मंदिर अलग-अलग देवी देवताओं को समर्पित है और अलग-अलग कालखंड में इनकी स्थापना हुई और इन सभी मंदिरों की अपनी एक अलग कहानी भी है। इन मंदिरों से लोगों की न सिर्फ आस्था जुड़ी हुई है बल्कि अनेकों परिवारों का पालन पोषण भी इनके द्वारा होता आ रहा है। ऐसा ही एक मंदिर स्थित है भारत के पश्चिमी छोर पर। जिसका एक लंबा इतिहास और दिलचस्प सफर रहा है। जी हां, हम बात कर रहे हैं

0:48 गुजरात के वेरावल में लोकेटेड फेमस और हिस्टोरिकल हिंदू टेंपल यानी सोमनाथ मंदिर या देवपाटन की। जिसकाेंस रिलीजन, कल्चर और मिथोलॉजी के साथ-साथ हिस्ट्री में भी काफी सिग्निफिकेंट रहा है। यह टेंपल हिंदूस के मोस्ट सीक्रेट पिल्गिमिट साइट्स में से एक है और इसे लॉर्ड शिवा के 12 ज्योतिर्लिंग्स में से सबसे पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। अक्सर जब हम मोन्यूमेंट्स की बात करते हैं तो उसको कब और किसने बनवाया इसका जिक्र जरूर होता है। पर गुजरात का यह सोमनाथ टेंपल अपने कंस्ट्रक्शन के मामले में एकदम यूनिक है। क्योंकि हिंदू मिथोलॉजी के अकॉर्डिंग सबसे पहले सोमनाथ टेंपल का स्ट्रक्चर किसी मानव ने नहीं बल्कि खुद लॉर्ड सोम या मून गॉड

1:33 ने कंस्ट्रक्ट किया था। हालांकि अगर हिस्टोरिकल पॉइंट ऑफ व्यू से भी देखें तो 1951 के अपने फाइनल कंस्ट्रक्शन से पहले इसे कई बार डिस्ट्रॉय किया गया और कई अलग-अलग रूलर्स ने इसे रिकंस्ट्रक्ट कराया। लेकिन अभी भी यह अनक्लियर है कि सोमनाथ टेंपल के फर्स्ट स्ट्रक्चर को एग्जजेक्टली कब बनाया गया जो फर्स्ट मिलेनियम के अर्ली सेंचुरी से नाइंथ सेंचुरी सीई के बीच माना जाता है। अगर बात करें स्ट्रक्चर की तो यह टेंपल थ्री मेजर पार्ट्स में डिवाइडेड है। यानी गर्भगृह, सभा मंडप और नृत्य मंडप। साथ ही इसकी पीक की ऊंचाई 150 फीट है और पीक पर लगे अर्न का वेट 10 टन है। इसके अलावा टेंपल का मेन फ्लैग 27 फीट की ऊंचाई का है। तो दोस्तों

2:20 आइए बिना किसी देरी के समझते हैं इस ग्रेट आर्किटेक्चरल मार्वल के दिलचस्प इतिहास को। हिस्ट्री ऑफ़ सोमनाथ। दोस्तों सोमनाथ की साइट एंशिएंट टाइम से ही एक पिल्गिमेट साइट रही है। जिसकी वजह थी इसका एक त्रिवेणी संगम होना यानी कपिला, हिरन और सरस्वती रिवर का कॉन्फ्लुएंस। और मिथोलॉजी के हिसाब से कहा जाता है कि जब एक कर्स के चलते मून गॉड सोम अपनी लस्टर यानी चमक खो देते हैं तब इसी साइट पर सरस्वती रिवर में नहाने से उन्हें अपना लस्टर वापस मिल जाता है। यानी जिसे हम वैक्सिंग और वेनिंग ऑफ मून के नाम से जानते हैं। इंटरेस्टिंग बात यह है दोस्तों कि इसी ट्रेडिशन के चलते इस टाउन का नाम प्रभास यानी लस्टर पड़ा। इस

3:07 टाउन के अल्टरनेटिव नेम्स जैसे सोमेश्वर या सोमनाथ भी इसी ट्रेडिशनल टेल से अराइज हुए हैं। हालांकि सोमेश्वर नाम का हिस्ट्री में मेंशन नाइंथ सेंचुरी के स्टार्टिंग से देखने को मिला। इसका मेंशन 85 से 833 एडी तक रूल करने वाले गुर्जर प्रतिहार किंग नागभट्टा 2 के रिकॉर्ड्स में मिलता है। जिसमें कहा गया है कि उन्होंने सौराष्ट्र में कई पिल्गमेट साइट्स विजिट की इंक्लूडिंग सोमेश्वर। हालांकि इस रिकॉर्ड पर हिस्टोरियन रोमिला थापर कहती हैं कि यह रिकॉर्ड्स टेंपल एकिस्टेंस को इंप्लाई नहीं करते हैं और उस समय तक यह बस एक पिल्गिमिज साइट मात्र ही था। हालांकि ऐसा माना जाता है कि पॉसिबबली चालुक्य किंग मूलराज ने सोम यानी मून गॉड

3:52 को डेडिकेटेड टेंपल्स पहली बार इस साइट पर 997 सीई में बनाए। लेकिन कुछ हिस्टोरियंस यह भी मानते हैं कि शायद मूलराज ने बस पहले से बने एक स्मॉलर टेंपल को रेनोवेट कराया होगा। 1950 के बाद हुए सोमनाथ साइट के एक्सकेवेशंस ने सोमनाथ टेंपल के अरर्लियस्ट नोन वर्जनंस के कुछ फैक्ट्स को रिवील किया। एक्सकेवेशंस में एक 10थ सेंचुरी टेंपल के फाउंडेशन स्टोंस मिले और साथ ही एक टेंपल के वेल डेकोरेटेड वर्जन के नोटेबल ब्रोकिंग पार्ट्स और डिटेल्स मिले। जिसे गुजराती हिस्टोरियन मधुसूदन ढाकी महमूद गजनी द्वारा डिस्ट्रॉय किया हुआ टेंपल मानते हैं। साथ ही एक्सकवेशन करने वाले आर्कियोलॉजिस्ट बी के थापर कहते हैं कि नाइंथ सेंचुरी में सोमनाथ पाटन पर

4:38 एक टेंपल स्ट्रक्चर डेफिनेटली था। हालांकि उससे पहले ऐसा कुछ नहीं था। द इन्व ऑफ़ महमूद ऑफ़ गजनी। सोमनाथ को लेकर सबसे इनफेमस इवेंट 2026 में हुआ। जब भीमा वन के रूल में टर्किश मुस्लिम रूलर महमूद ऑफ गजनी ने सोमनाथ टेंपल को रेड और प्लंडर किया। साथ ही टेंपल की ज्योतिर्लिंग को भी तोड़ दिया गया। और इस लूट में गजनी अपने साथ 20 मिलियन दीनार्स की वेल्थ ले गया। हालांकि 1038 एडी के गोवा के एक कदंब किंग के इं्रिप्शन पर रिलाई करते हुए रोमिला थापर मानती हैं कि26 के गजनी के रेड के बाद टेंपल की कंडीशन अनक्लियर है। क्योंकि यह इंक्रिप्शन टेंपल की कंडीशन या गजनी के रेड्स पर पजलिंगली

5:24 साइलेंट था। इस इं्रिप्शन से पता चलता है कि टेंपल को सिर्फ 12 इयर्स में क्विकली रिपेयर किया गया था और 138 आते-आते फिर से यह एक एक्टिव पिल्गमेट साइट बन गया था। रोमिला थापर इसका यह मतलब निकालती हैं कि गजनी रेड में टेंपल का कंप्लीट डिस्ट्रक्शन ना होकर शायद सिर्फ डेसीक्रेशन हुआ हो। खैर महमूद ऑफ गजनी की 126 एडी की इस रेड को 11th सेंचुरी के पर्शियन स्कॉलर अलबरूनी ने भी कंफर्म किया था। अलबरूनी महमूद ऑफ गजनी के कोर्टियर थे और उन्होंने 2017 से एडी के बीच कई ओकेशंस पर महमूद के ट्रूप्स को अकंपनी किया। इसके अलावा अलबरूनी रेगुलर इंटरवल्स में नॉर्थ वेस्ट इंडियन सबक्टिनेंट रीजन में भी रहे

6:10 थे। अलबरूनी के साथ-साथ 1226 सीई की इस रेड को और भी कई इस्लामिक हिस्टोरियंस जैसे गर्दीजी, इब्न जाफिर और इब्नतीर ने भी कंफर्म किया है। अल्बरूनी ने यह लिखा है कि महमूद ने सोमनाथ टेंपल को डिस्ट्रॉय किया और उसके रेड्स का मोटिव सिर्फ टेंपल को प्लंडर करना ही नहीं बल्कि एक ट्रू मुस्लिम के राइटस आइकनज्म को सेटिस्फाई करना भी था और महमूद जब वापस गजनी लौटा तो वो हिंदू टेंपल्स के कॉस्टली स्पॉइल से लेटन था। हालांकि अलबरूनी इन रेड्स को ऑब्लिकली क्रिटिसाइज करते हैं। जिसकी वजह थी इंडियन प्रोस्पेरिटी का रूइन किया जाना। रेड्स की वजह से सभी फॉरेनर्स को लेकर हिंदूस में एंटगनिज्म का डेवलप होना और साथ ही महमूद के ककरर्ड रीजन से हिंदू

6:58 साइंसेस के स्कॉलर्स का लार्ज स्केल पर डिपार्चर करना। बरूनी के अलावा साउथ एशियन हिस्ट्री और इस्लामिक स्टडीज स्कॉलर जमाल मलिक के अकॉर्डिंग 2026 में गुजरात के वेल नोन पिल्गमेज सोमनाथ टेंपल के डिस्ट्रक्शन ने महमूद की आइकॉन ऑफ इस्लाम के रोल को क्रिएट करने में मेजर रोल प्ले किया। साथ ही इस टेंपल का डिस्ट्रक्शन इस्लामिक आइकनिकलाज्म के पर्जन स्टोरीज में एक क्रूशियल टॉपिक बन गया। 11th सेंचुरी और उसके बाद के कई इस्लामिक हिस्टोरियंस ने अपनी पब्लिकेशंस में सोमनाथ के डिस्ट्रक्शन को एक राइटस एक्सेंपरी डीड के फॉर्म में इंक्लूड किया। एक तरफ जहां इस बात ने परर्शियन साइड को एपिक ऑफ कॉन्क्वेस्ट की कल्चरल मेमोरी के थ्रू इंस्पायर किया। और इन्हीं स्टोरीज और क्रॉनिकल्स ने महमूद को परर्शिया में

7:43 मुस्लिम्स के एक्सेंपरी हीरो और इस्लामिक वॉरियर के स्टेटस पर एलिवेट किया। तो वहीं सोमनाथ ने हिंदूज को अपने रिकवरी, रिबिल्डिंग की टेल्स और एपिक्स ऑफ रेजिस्टेंस के थ्रू इंस्पायर किया। हालांकि 1169 के एक इं्रिप्शन के रिकॉर्ड्स के अनुसार 1143 से 1172 एडी तक रूल करने वाले कुमारपाला ने वुडन टेंपल को रिप्लेस कर सोमनाथ टेंपल को एक्सीलेंट स्टोन वर्क के साथ रिबिल्ड किया और इसमें जूल्स स्टड कराए। लेकिन 1299 में अलाउद्दीन खिलजी की आर्मी को लीड करते हुए उल्लू खान ने गुजरात का इन्वेशन किया। और वाघेला किंग कर्ण को हराने के साथ ही सोमनाथ टेंपल को फिर से प्लंडर किया गया। जिसके बाद 15th सेंचुरी के कान्हाड़े प्रबंध और 17th सेंचुरी की नैनसी ख्यात

8:31 में लिखा मिलता है कि जालौर के जहामड़ा राजा रावल कान्हड़दे ने जालौर के नजदीक दिल्ली आर्मी पर अटैक करके सोमनाथ आइडल को रिकवर किया और हिंदू प्रिजनर्स को रिलीज कराया। लेकिन कई और सोर्सेस का मानना है कि आइडल को दिल्ली ले जाया गया था और वहां पर उसे मुस्लिम्स के पैरों से क्रश कराया गया। ऐसा क्लेम करने वाले सोर्सेस में अमीर खुसरो का खजनुल फतुब जियााउद्दीन बरनी का तारीख फिरोजी शाही और जीना प्रभा सूरी का विविध तीर्थकल्प जैसे कंटेंपररी और नियर कंटेंपररी सोर्सेस शामिल हैं। इसीलिए पॉसिबिलिटी यह भी हो सकती है कि सोमनाथ आइडल के कानदेव द्वारा रेस्क्यू की स्टोरी पोस्ट कंटेंपररी राइटर्स की एक फैब्रिकेशन हो। हालांकि यह पॉसिबिलिटी भी

9:16 बताई जाती है कि खलजी की आर्मी अपने साथ मल्टीपल आइडल्स को दिल्ली ले जा रही थी और शायद कानड़दे की आर्मी ने उसमें से एक को रिट्रीव कर लिया हो। खैर इसके बाद 138 में सौराष्ट्र के चोड़ास्मा किंग महिपाल वन ने टेंपल को रिबिल्ड कराया और 1331 से 1351 के बीच उनके बेटे खिंगरा ने यहां लिंगम को स्थापित कराया। हालांकि एक बार फिर 1395 में मंदिर को दिल्ली सल्तनत के अंडर गुजरात के लास्ट गवर्नर जफर खाना ने डिस्ट्रॉय किया और आने वाले कुछ ही सालों में फिर से 1451 में गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा ने टेंपल को डेसक्रेट किया। मुस्लिम रूलर्स के कंटीन्यूअस रैवेजेस झेलने वाला यह टेंपल मुगल पीरियड में भी

10:02 सेफ नहीं रहा। और 1665 में मुगल एपरर औरंगजेब ने बाकी टेंपल्स के साथ ही सोमनाथ टेंपल को भी डिस्ट्रॉय करने के ऑर्डर्स दिए। औरंगजेब ने साथ ही यह वार्निंग भी दी थी कि अगर हिंदूज ने टेंपल में वरशिप को दोबारा रिवाइव किया तो टेंपल को कंप्लीटली डिमोलिश कर दिया जाएगा। हालांकि नॉर्दर्न इंडिया में मराठा एक्सपेंशन के चलते कई डिटीररेटेड टेंपल्स को रिवाइव किया गया और 1783 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर ने सोमनाथ टेंपल को रिबिल्ड कराया। आज इस टेंपल को ओल्ड सोमनाथ या अहिल्याबाई मंदिर के नाम से जाना जाता है। जो मेन सोमनाथ मंदिर से 200 मीटर की दूरी पर स्थित है। दोस्तों इस तरह मिडिवल पीरियड में सोमनाथ मंदिर ने अनेकों आक्रमणों का

10:48 सामना किया। अब आगे देखते हैं ब्रिटिश राज के समय इसके इतिहास को। वैसे तो उस दौरान बहुत खास डेवलपमेंट नहीं हुए लेकिन ब्रिटिश राज के टाइम प्रोक्लेमेशन ऑफ द गेट्स एक फेमस इवेंट रहा। आइए जानते हैं इसके बारे में। ब्रिटिश राज एंड सोमनाथ। दोस्तों, 1842 में ब्रिटिश इंडिया के गवर्नर जनरल लॉर्ड एललेन ब्रर ने प्रोक्लेमेशन ऑफ द गेट्स इशू किया। जिसके तहत उन्होंने अफगानिस्तान में काबुल की बैटल फाइट कर रही ब्रिटिश आर्मी को यह ऑर्डर्स दिए कि वह गजनी होते हुए इंडिया आए और महमूद ऑफ गजनी के टम से सैंडलवुड गेट्स को वापस इंडिया लेकर आए। ऐसा माना जाता था कि यह गेट्स महमूद सोमनाथ टेंपल के प्लंडर के टाइम यहां से ले गया था। और एलन ब्र के इंस्ट्रक्शंस के चलते जनरल

11:34 विलियम न सेप्टेंबर 1842 में गेट्स को रिमूव कर लिया और सिक्स्थ जाट लाइट इनफेंट्री की एक पूरी रेजीमेंट को वो गेट्स इंडिया लाने के काम में लगाया गया। हालांकि इंडिया आने पर वो गेट्स ना तो गुजरात डिजाइन के पाए गए और ना ही इंडियन डिजाइन के। साथ ही वह गेट्स सैंडलवुड के ना होकर गजनी नेटिव देवदार ट्रीज के थे। जिसके चलते इन्हें सोमनाथ से ऑथेंटिक नहीं माना गया। हालांकि यह गेट्स आज भी आगरा फोर्ट के आर्सिनल स्टोर रूम में प्लेस्ड हैं। आइए अब आगे बढ़ते हैं और पोस्ट इंडिपेंडेंस पीरियड में हुए सोमनाथ टेंपल के रिकंस्ट्रक्शन की बात करते हैं। रिकंस्ट्रक्शन ड्यूरिंग 1950 टू 1951। दोस्तों, इंडिपेंडेंस के पहले वेरावल जूनागढ़ स्टेट का पार्ट था। जिसके रूलर ने

12:21 1947 में पाकिस्तान जॉइ करने का फैसला कर लिया था। इंडिया ने इस एक्सेशन को कंटेस्ट किया और एक रेफरेंडम ऑर्गेनाइज करने के बाद जूनागढ़ को एनेक्स कर लिया गया। जिसके बाद 12th नवंबर 1947 को इंडिया के डेपुटी प्राइम मिनिस्टर वल्लभ भाई पटेल स्टेट स्टेबलाइजेशन के लिए आर्मी को डायरेक्ट करने जूनागढ़ जाते हैं। उसी विजिट में उन्होंने एक बार फिर से सोमनाथ टेंपल के रिकंस्ट्रक्शन के ऑर्डर्स दिए। और इसके बाद जब पटेल, के एम मुंशी और कांग्रेस के बाकी लीडर्स सोमनाथ के कंस्ट्रक्शन के प्रपोजल को लेकर गांधी जी के पास पहुंचे तो गांधी जी ने इस मूव को सपोर्ट किया। साथ ही उनका कहना था कि रिकंस्ट्रक्शन में लगने वाला पैसा पब्लिक से कलेक्ट किया जाए और टेंपल को स्टेट से फंडेड नहीं होना चाहिए। जहां एक तरफ प्रोजेक्ट से एसोसिएट

13:09 होना गांधी जी ने खुद के लिए प्राउड मोमेंट बताया था तो वहीं रनोवेशन से पहले ही गांधी और पटेल की डेथ हो गई। जिसके बाद कंस्ट्रक्शन का काम फिर के एम मुंशी के अंडर कंटिन्यू रहा जो कि उस समय प्राइम मिनिस्टर पंडित जवाहरलाल नेहरू के कैबिनेट में फूड एंड सिविल सप्लाई मिनिस्टर थे। कंस्ट्रक्शन फेज में अक्टूबर 1950 में रूइंस को पुलडाउन किया गया। साथ ही टेंपल साइट पर प्रेजेंट मॉस्क को कंस्ट्रक्शन व्हीकल्स की हेल्प से कुछ किलोमी दूर शिफ्ट कर दिया गया। और फाइनली 11th मई 1951 को के एम मुंशी के इनविटेशन पर रिपब्लिक ऑफ इंडिया के फर्स्ट प्रेसिडेंट राजेंद्र प्रसाद ने टेंपल के लिए इंस्टॉलेशन सेरेमनी को परफॉर्म किया। दोस्तों इस हिस्टोरिकली सिग्निफिकेंट टेंपल की हिस्ट्री को समझने के लिए सोमनाथ

13:56 टेंपल साइट और कोस्ट लाइन को आर्कियोलॉजिकल एविडेंसेस के लिए कई बार एक्सकवेट किया गया। आइए समझते हैं इस मोन्यूमेंट के आर्किटेक्चरल हिस्ट्री को। आर्किटेक्चरल हिस्ट्री। दोस्तों सबसे मेजर एक्सकवेशन टेंपल के पोस्ट इंडिपेंडेंस रिकंस्ट्रक्शन के पहले 1950-51 में कंप्लीट किया गया। जिसे आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के डायरेक्टर्स में से एक बी के थापर लीड कर रहे थे। बी के थापर की स्टडी ने 10थ सेंचुरी या उससे पहले के एक लार्ज टेंपल के डायरेक्ट और सब्सटेंशियल एविडेंस प्रेजेंट किए। साथ ही थापर ने यह एस्टीिमेट किया कि ओल्डर टेंपल लगभग नाइंथ सेंचुरी का बना हुआ है। तो वहीं दूसरी तरफ इंडियन टेंपल आर्किटेक्चर के स्कॉलर ढाकी के अकॉर्डिंग यह कंस्ट्रक्शन 10थ सेंचुरी

14:43 में 960 से 973 सीई के बीच हुआ था। इसके अलावा थापर स्टडी में कई आर्टिफेक्ट्स और रूइंस एंशिएंट स्क्रिप्ट के एविडेंसेस के साथ पाए गए जो बेसिकली ब्राह्मी या उसके बाद की प्रोटोनागरी या नागरी स्क्रिप्ट्स थी। दोस्तों, एंशिएंट स्क्रिप्ट्स में मिले यह एविडेंसेस सोमनाथ पाटन की एंटीक्विटी को लगभग फर्स्ट मिलेनियम कंफर्म करते हैं। हालांकि दोबारा सोमनाथ टेंपल के पास कुछ सोमनाथ पाटन साइट्स को 1970 में एमके धावलीकर और जेड डी अंसारी की लीड में एक्सकवेट किया गया। इस बार कई लोकेशनेशंस पर डीपर डिगिंग्स की गई। जिसने ह्यूमन सेटलमेंट के फाइव पीरियड्स के एविडेंस रिपोर्ट किए। इसके बाद 1992 में एमके धावलीकर और इंडस वैली स्टडीज के लिए

15:29 फेमस आर्कियोलॉजिस्ट ग्रेगरी पोशल ने प्रभासपाटन पर अपनी आर्कियोलॉजिकल डिस्कवरीज की एनालिसिस की रिपोर्ट सबमिट की और इनकी एनालिसिस में सोमनाथ साइट प्री सेकंड मिलेनियम बीसीई पीरियड से ही एंशिएंट ह्यूमन सेटलमेंट के एविडेंसेस शो कर दी है। साथ ही उन्होंने इसमें एक पीरियड को प्री हरप्पन फेस के फॉर्म में भी डेट किया है। लेकिन यह डिस्कवरीज या तो सिरेमिक्स थी या वेयर्स और ज्वेलरी यानी उन्हें कोई भी एंशिएंट टेंपल पार्ट्स नहीं मिले थे। दूसरी तरफ चार्ल्स हरमन की क्रिटिकल रिव्यू के अकॉर्डिंग जो भी एविडेंसेस अवेलेबल थे उनमें से कोई भी प्री फर्स्ट मिलेनियम बीसीई एरा के सोसाइटी और कल्चर से डायरेक्ट लिंक्ड नहीं था। लेकिन वह कहते हैं कि इस बात के पर्सुएसिव एविडेंस मिलते हैं कि प्रभास

16:16 पाटन एक अर्ली हड़प्पन साइट थी। जहां सेडेंट्री फार्मिंग के साथ कैटल शिपिंग भी प्रैक्टिस की जाती थी। हालांकि इसके अलावा जो प्रभास पार्ट एंड माउंट्स एक्सकवेट किए गए वो 2000 से 1800 बीसीई के कंटिन्यूड पोस्ट हड़प्पन सेटलमेंट्स के एविडेंस शो करते हैं। कंक्लूजन। दोस्तों, यह थी कहानी इस फेमस मोन्यूमेंट की जो हिस्टोरिकल इंसिडेंट्स के साथ-साथ हिंदूइज़्म के फ्रीक्वेंट अप एंड डाउन का भी इंपॉर्टेंट सिंबल रहा। कई फॉरेन इन्वेजंस और स्ट्रक्चरल डैमेजेस के बाद भी इस टेंपल का एक एक्टिव पिल्गमेट साइट बने रहना ना सिर्फ इस मंदिर कीेंस को बल्कि हिंदूइज़्म के रेिलिएंट नेचर को भी रिप्रेजेंट करता है। इसके अलावा इस टेंपल के रिकंस्ट्रशंस, कंटेंपररी इंडियन

17:03 सोसाइटी के कल्चरल हेरिटेज और कल्चरल मेमोरी को बनाए रखने के एफर्ट्स को भी दिखाता है। दोस्तों, सोमनाथ टेंपल के टूरिज्म को बढ़ाने के लिए और लोकल पॉपुलेशन के वेलफेयर को इंश्योर करने के लिए उस रीजन में मॉनिटरी इन्वेस्टमेंट्स एक बड़े बूंद साबित होंगे। और प्रेजेंट गवर्नमेंट द्वारा इस दिशा में लिए जा रहे इनिशिएटिव्स वाकई प्रेज वर्दी हैं। स्टडी आईक्यू आईएएस आपका सिलेक्शन हमारा मिशन।

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