0:00 [संगीत] नमस्कार संसद टीवी में आपका स्वागत है। मैं हूं प्रतिबिंब शर्मा और आप देख रहे हैं ins। इनसाइट में आज हम बात करेंगे भारत और रूस के संबंधों को नए आयाम तक पहुंचाने के प्रयास की। [संगीत] भारत रूस संबंध आज सिर्फ पारंपरिक दोस्ती
0:46 तक सीमित नहीं है बल्कि ये ऊर्जा रक्षा व्यापार और वैश्विक रणनीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुके हैं। हाल ही में विदेश मंत्री एस जयशंकर और रूस के विदेश मंत्री सरगई लाो के बीच वर्चुअल कॉन्क्लेव में वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 बिलियन डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया गया। पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के बीच यह अपने आप में एक बड़ा रणनीतिक संकेत है। बात करेंगे विशेषज्ञों से। प्रभु दयाल पूर्व राजदूत हमारे साथ जुड़े हुए हैं वर्चुअली आपका बहुत-बहुत स्वागत है। डॉक्टर अंशु जोशी हैं प्रोफेसर स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज जेएनयू डॉक्टर अंशु आपका भी बहुत-बहुत स्वागत है। प्रभु दयाल जी वैसे तो भारत और रूस के संबंध की अगर
1:33 बात करें तो ऑल वेदर फ्रेंड्स माने जाते हैं। लेकिन जिस तरीके से पश्चिम एशिया में तना तनाव व्याप्त है और वहां पर युद्ध की स्थिति लगातार बनी हुई है। अगर उसको केंद्र में रखकर अह कल जो यह तय हुआ है कि 2030 तक हम लोगों को अपनी स्थिति को और भी बेहतर बनाना है और 100 बिलियन डॉलर तक द्विपक्षीय व्यापार को पहुंचाना है। कैसे देखते हैं इसे आप? प्रतिबिंब शर्मा जी पहले तो अपने शो में बुलाने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। आपका भी बहुत-बहुत धन्यवाद। बहुत दिनों बाद चर्चा कर रहे हैं हम। जी जी और जो ये टॉपिक आपने चुना है ये वाकई में बहुत महत्वपूर्ण है। देखिए भारत
2:21 और रूस के संबंध अब रक्षा साझेदारी से आगे बढ़कर ऊर्जा व्यापार और स्ट्रेटेजिक कोऑपरेशन के एक नए युग में प्रवेश कर चुके हैं। और आपने जैसा कहा कि जो पश्चिमी एशिया में हालात है उसके संदर्भ में तो ये बटरल रिलेशंस और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं। जैसा आपने जिक्र किया 2030 तक [गला साफ़ करने की आवाज़] बटरल ट्रेड को 100 बिलियन डॉलर तक पहुंचाने के लक्ष्य के साथ अब दोनों देश सस्ते क्रूड ऑयल परमाणु ऊर्जा और कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स पर
3:10 ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। देखिए रक्षा से आगे साझेदारी के कई प्रमुख स्तंभ है। जैसे मैंने कहा ऊर्जा सुरक्षा भारत रूसी क्रूड ऑयल का एक प्रमुख खरीदार बन गया जो भारत के कुल ऑयल इंपोर्ट्स का लगभग 35% है। रशिया की ऑयल फील्ड में भी भारतीय कंपनियों ने अरबों डॉलर का निवेश किया है। इसके अलावा देखिए व्यापार और विविधकरण दोनों देशों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। दोनों देश केवल रक्षा तक सीमित ना रहकर
3:58 एग्रीकल्चरल प्रोडक्ट्स, फर्टिलाइज़र्स, फार्मासटिकल्स और टेक्निकल एरियाज में भी व्यापार बढ़ा रहे हैं। इसके अलावा देखिए स्ट्रेटजिक कनेक्टिविटी आज के युग में बहुत ही इंपॉर्टेंट मुद्दा है। भारत और रूस के बीच जो संबंधों को मजबूत करने के लिए [नाक से की जाने वाली आवाज़] चेन्नई टू लेडीस्टक मैरिटाइम कॉरिडोर और इंटरनेशनल नॉर्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर पर काम चल रहा है। वो व्यापारिक समय और लागत को कम करेगा। देखिए एक और बहुत ही इंपॉर्टेंट एरिया है परमाणु
4:46 और अंतरिक्ष सहयोग। रूस भारत का प्रमुख परमाणु ऊर्जा भागीदार बन चुका है। और जैसे कुंडन कुलम प्लांट है उसमें हमारा कोऑपरेशन बहुत इंपॉर्टेंट है। इसी तरह रूस भारत के गगनयान मैन स्पेस मिशन में भी सहयोग कर रहा है। भू राजनीतिक तालमेल यानी जिओपॉलिटिकल कोऑर्डिनेशन भी बहुत इंपॉर्टेंट एरिया है। रूस जो है वो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की सदस्यता का समर्थन करता है और यूरेशियन रीजन में एक स्थिर भागीदार के रूप में कार्य करता है। इसके अलावा देखिए कुछ
5:32 ऑर्गेनाइजेशन है जैसे ब्रिक्स जो कि हम उसकी अध्यक्षता कर रहे हैं। रूस ने पूरा हमको समर्थन देने की बात कही है। इसके अलावा जी20 और एसओबी ऑर्गेनाइजेशन है बड़े इंपॉर्टेंट जिनमें हमारा कोऑपरेशन आगे बढ़ता जा रहा है। तो इन सब बातों की वजह से हमारे जो एरिया ऑफ़ कोऑपरेशन है बढ़ते जा रहे हैं। लेकिन देखिए चुनौतियों की भी कमी नहीं है। कुछ बड़ी इंपॉर्टेंट चुनौतियों है। एक तो देखिए व्यापार में असंतु असंतुलन है। रूस को होने वाले जो हमारे एक्सपोर्ट्स है उनकी तुलना में जो हमारे इंपोर्ट्स है रूस से वो बहुत ज्यादा है। टोटल बटरल ट्रेड
6:18 पिछले साल लगभग 69 बिलियन डॉलर था जिसमें करीब 64 बिलियन डॉलर तो हमने इंपोर्ट किया था। ज्यादातर क्रूड ऑयल और लगभग 5 बिलियन डॉलर का हमारा एक्सपोर्ट था। तो इसमें अभी कोई बहुत ज्यादा असंतुलन दिख रहा है। जी लेकिन डॉक्टर अंशु जिस बात का जिक्र कर रहे हैं कि क्रूड ऑयल जो है बड़ी मात्रा में हम लोगों ने लिया और व्यापार घाटे का भी जिक्र यहां पर प्रभु दयाल जी ने भी किया। लेकिन अगर क्रूड ऑयल अ लिए जाने को ही हम देख लें तो उसमें भी अह व्यापार घाटे की अगर द्विपक्षीय तौर पर देखें तो हो सकता है। लेकिन अगर यही क्रूड ऑयल किसी
7:04 और देश से लिया होता तो हमें काफी महंगा पड़ता। बिल्कुल प्रतिबिंब जी और भारत और रूस के जब हम संबंधों को देखते हैं तो पहले हमने एक तो हमारी जो स्पेशल स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप है स्पेशल एंड प्रिविलेज्ड स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप उसको हमें ध्यान में रखना चाहिए और 1947 के बाद से लगातार हमने देखा है कि रूस हमारा एक ऑल वेदर फ्रेंड साबित हुआ है। रक्षा सहयोग से लेकर के आर्थिक क्षेत्र में आकर के देखें। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के के हमारे अपने उद्देश्य को हम देखें। ग्लोबल साउथ को नेतृत्व की भूमिका दिलवाए जाने की बात को देखें। ग्लोबल इंस्टीटशंस में जब हम रिफॉर्म की बात करते हैं, उसको देखें। यूएनएससी में जो भारत एक परमानेंट सीट की मांग लंबे समय से कर रहा है इसको देखें और
7:52 इसके अलावा सस्टेनेबल डेवलपमेंट जैसे जो एसडीजीस हैं इसमें फिर फूड सिक्योरिटी एनर्जी सिक्योरिटी भी जुड़ जाते हैं। इन तमाम महत्वपूर्ण क्षेत्रों में रशिया हमारा एक बहुत महत्वपूर्ण टाइम टेस्टेड साझेदार बनके उभरा है। और जिस क्रूड ऑयल की के आदानप्रदान की आप बात कर रहे थे अह तो निश्चित रूप से अभी जो हमारे विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर और रशिया के विदेश मंत्री सरगई लावरोफ की बातचीत हुई है। एक वर्चुअल कॉन्फ्रेंस हुई है। इसमें ये तमाम जो मुद्दे हैं, तमाम जो बातें हैं, बिंदु हैं, ये साझा किए गए हैं। और आपसी जो व्यापार है, उसको अभी 68.7 बिलियन यूएसडी है। उसे 2030 तक 100 बिलियन यूएसडी किए जाने की बात है। और रशिया की तरफ से हम एक बड़े निवेश को भी एक्सपेक्ट करते हैं।
8:37 इसमें जब हम एनर्जी सिक्योरिटी को ले आते हैं या तेल और गैस जो हम रूस से लेते हैं, रशिया से लेते हैं उसको हम ले आते हैं तो ये बहुत महत्वपूर्ण बिंदु है प्रतिबिंब जी आपने बिल्कुल सही बात कही। यदि किसी और देश से हम इस क्रूड ऑयल को लेते तो हमें रशिया जिस कीमत पे ये क्रूड ऑयल दे रहा है उससे बहुत महंगा पड़ता। तो वहां जो एक हमारी बचत हुई है वो बहुत महत्वपूर्ण है और हम समय देखें कोविड-19 के तुरंत बाद हमने रशिया यूक्रेन युद्ध को शुरू होते हुए देखा और तब तक हमारी खाड़ी देशों पर पहले नंबर की एक डिपेंडेंसी थी जब हम ऑयल एंड गैस और एलपीजी मंगवाते थे उसकी इस समय 2021-22 से हमने रशिया को अपना सबसे प्राइमरी ऑयल एंड गैस का के हम उसके
9:22 परचेसर बने और हमने वहां से बहुत बड़ी मात्रा में ऑइल गैस एलपीजी आयात करना शुरू किया तो हमें एक बड़ा डिस्काउंट मिला। हमें 24 यूएसडी पर बैरल का डिस्काउंट रशिया ने देना शुरू किया। जिसकी वजह से इन चार वर्षों में हमारी बड़ी भारी बचत हुई है। अब जिस प्रकार की परिस्थितियां हैं जिस तरह से पश्चिमी एशिया में स्थितियां बनी हुई है। तो निश्चित तौर पर रशिया भी अपने नेशनल इंटरेस्ट को ध्यान में रखते हुए तेल और गैस की कीमतों को बिल्कुल बढ़ाएगा। लेकिन फिर भी यदि हम अन्य देशों की तुलना में अपने आप को देखें तो हम अभी भी एक बहुत विनविन सिचुएशन में हैं। और इस एक क्षेत्र में हम देखते हैं कि हालांकि हमारी लिस्ट लंबी है। बहुत सारे देशों से हम क्रूड ऑयल लेते हैं, एलपीजी लेते हैं। पर अभी भी रशिया पर हमारी प्राइमरी डिपेंडेंसी है और विशेष करके अभी जो ये
10:09 पश्चिमी एशिया का संकट शुरू हुआ। स्टेट ऑफ हार्मोंस को लेकर के जिस तरह से हमने स्थितियों को अह पनपते देखा, चुनौतियों को जिस तरह से पनपते देखा। हालांकि ये देखना सुखद है कि इसके बीच भी भारतीय जहाज जो है वो लगातार स्टेट ऑफ आर्मस क्रॉस करके एलपीजी लेकर के भारत सुरक्षित पहुंच रहे हैं। तो हमने फिर रशिया पर अपनी जो ये ऑयल एंड गैस वाला हमारा जो परचेस का प्रपोशन है वो बढ़ा दिया है। और दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु ये है प्रतिबिंब जी फिर अपनी बात को खत्म करूंगी कि अभी भी जिस तरह की स्थितियां है उसमें रशिया से हमें एक बहुत बड़ा आश्वासन है कि उनके मिलियंस ऑफ बैरल्स ऑयल या एलपीजी हमें जब भी चाहिए वो हिंद महासागर में हमारे लिए तैयार हैं। तो जिस प्रकार की स्थितियां देश में बनाने का प्रयास भी चल रहा था कुछ नकारात्मक एलिमेंट्स के द्वारा। तो मैं आपको यह बता
10:54 दूं कि रशिया हमारा वो साझेदार है, वो सहयोगी है जो हमारी ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में कंधे से कंधा मिलाकर हमारे साथ खड़ा हुआ है। प्रभु दयाल जी अगर हम रूस और भारत के संबंधों को देखें तो उसके केंद्र में रक्षा जो संबंध रहे हैं हमारे रक्षा के क्षेत्र में जो सहयोग रहा है वो केंद्र बिंदु रहा है। लेकिन हमने देखा कि पिछले कुछ वर्षों में थोड़ा सा वहां से जो है रक्षा सौदे होने थोड़े से कम हो गए हैं। तो इसीलिए कुछ लोग ये कह रहे हैं कि शायद ये कूटनीतिक बयान ज्यादा है। क्या आप भी ये मानते हैं कि जिस तरीके की परिस्थितियां अभी वैश्विक परिस्थितियां उत्पन्न हुई हैं। उसकी वजह से ये एक कॉन्क्लेव में एक बड़ा डिसीजन लिया गया
11:41 है। 100 बिलियन तक अपने अह व्यापार को 2030 तक पहुंचाने का। जी बिलकुल यह एक बहुत इंपॉर्टेंट डिसीजन है। देखिए ये जरूर है कि हमको रूस से जो तेल मिल रहा था वो इंटरनेशनल प्राइसेस से कम दामों पर मिल रहा था। रूस पे सेंशंस लगे थे। उसके मार्केट्स क्लोज थे। फिर भी हमारी यह कोशिश है कि यह जो ट्रेड इमंबैलेंस इतना ज्यादा है इसको हम कम करें। ये लगभग ट्रेड इमंबैलेंस इस वक्त 60 बिलियन डॉलर से ज्यादा है। हम बहुत कम एक्सपोर्ट कर पा रहे हैं। और अब ये कोशिश सरकार कर रही है कि किस तरह से हमारे
12:28 एक्सपोर्ट्स बढ़े। हम रूस को फार्मासटिकल्स, एग्रीकल्चरल प्रोडक्ट्स इस तरह की कई चीजें तो एक्सपोर्ट कर रहे हैं और अब हम ये कोशिश कर रहे हैं कि नए क्षेत्रों में भी हमारे एक्सपोर्ट्स बढ़े। ये एक मुश्किल है। इसके अलावा लेकिन लेकिन एक सवाल जो मैंने कहा कि डिफेंस सेक्टर में जिस तरीके का सहयोग लगातार बरसों से बना रहा है। क्या उसमें भी आपको लगता है कि कुछ नए आयाम जुड़ने वाले हैं आने वाले समय में? ये जरूर जुड़ सकते है। देखिए इंडिया ने अपनी डिफेंस प्रोक्योरमेंट को मल्टी एलाइनमेंट पे बेस किया। उसने मल्टीपल सोर्सेस से इंपोर्ट्स किए हैं। इजराइल एक बहुत बड़ा एक्सपोर्टर है हमको। फ्रांस, यूएस से भी हम ले रहे हैं। लेकिन जो रशिया
13:15 के साथ हमारे डिफेंस कोऑपरेशन के रिलेशंस हैं वो बहुत ही इंपॉर्टेंट है और जरूर हम अब ये देखेंगे कि किस तरह से और प्रोडक्ट्स रशिया से ले क्योंकि अब जो रिश्ते हैं वो एक दूसरे लेवल पे होते जा रहे हैं। देखिए जो पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर में हमने जो इनके रशिया से ऑब्टेन हमने किए एस400 एंटी मिसाइल डिफेंस सिस्टम वो बड़े कामयाब हुए बड़े सक्सेसफुल हुए और हालांकि अमेरिका ने इनके एक्सपोर्ट्स पे रश पे सेंश लगाए कि जो कंट्री एस400 एंटी मिसाइल डिफेंस सिस्टम लगाएगी उसप सेंश लगेंगे लेकिन इंडिया को एक्सेंशन मिला था हमारे लिए बहुत कामयाब हुए लेकिन लेकिन ये इससे आगे भी जो है इसको
14:02 अपग्रेड जो है करने पर भी जो है एक समझौता हो रहा है भारत और रूस के बीच वो कितना महत्वपूर्ण है? देखिए बहुत इंपॉर्टेंट है। किस तरह से आप अपने जो एक्वायर्ड सिस्टम्स है उनको और अपग्रेड करते हैं या जो न्यू सिस्टम्स ले रहे हैं वो फुल्ली अपग्रेडेड मिले। इस बात पे तो बहुत जोर दिया ही जाता है क्योंकि आजकल ये डिफेंस का जो मसला है ये इतना मुश्किल होता जा रहा है। देखिए हमारी नेबरहुड बड़ी कॉम्प्लेक्स हो गई है। चाइना तो है ही एक बड़ा ऐसा पावर जो कि हमको खतरा बना हुआ है। पाकिस्तान का भी खतरा कभी कम नहीं होता। तो इस वजह से हमारे जो
14:47 डिफेंस सिस्टम्स है जितने अपग्रेडेड मेल है और जो हमारे पास एकिस्टिंग डिफेंस इक्विपमेंट है रक्षा से जो हमने लिए हैं अगर वो भी और इंप्रूव हो जाते हैं तो ये बहुत अच्छा है। तो हमारी कोशिशें इसी दिशा में जी हां एक अंशु जी जिसका जिक्र प्रभु दयाल जी शुरू में कर चुके हैं कि कुंडलनकुलम जो न्यूक्लियर पावर प्लांट है वो कहीं ना कहीं दीर्घकालिक रणनीतिक सहयोग का एक सिंबल बन चुके हैं। एक प्रतीक बन चुके हैं। क्या आप भी इस बात से सहमत हैं? बिल्कुल पूर्णतः और प्रतिबिंब जी मैं एक मिनट पहले हम रक्षा सहयोग की बात कर रहे थे। उस आपके प्रश्न में कुछ उत्तर के रूप में बिंदु जोड़ देना चाहती हूं। जब हम रशिया और यहीं से फिर हमारा जो यह सिविल
15:34 न्यूक्लियर पूरा कोऑपरेशन है रशिया के साथ वो भी जुड़ता हुआ और नई दिशा लेता हुआ नजर आता है। रशिया के साथ हमारे जिस तरह के रक्षा सहयोग रहे प्रतिबिंब जी उसमें डिफेंस के साथ-साथ हम स्पेस कलबोरेशन को, टेक्नोलॉजी कलबोरेशन को और न्यूक्लियर कैलबोरेशन को जोड़ दें और हमारे जो कन्वेंशनल रिलेशंस थे वो एक सिंपल बयर सेलर फ्रेमवर्क था पहले। लेकिन हमने पिछले 10 से 15 वर्षों में इसे बदलते हुए देखा। जहां पर अब हम को प्रोड्यूसर और को मैन्युफैक्चरर की भूमिका में रशिया के साथ आए हैं। जिसमें ऐसे बहुत सारे फ्लैकशिप प्रोजेक्ट्स हैं। आप ब्रह्मोस मिसाइल्स को देख लीजिए हमारी। आप सुखई 30 एयरक्राफ्ट्स को देखिए। T90 टैंक्स को देखिए। फिफ्थ जनरेशन हमारे जो फाइटर एयरक्राफ्ट्स हैं उनको देखिए। हमारे जो मल्टी ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट्स हैं उनको देखिए। ऐसे बहुत
16:20 सारे सिस्टम्स और टेक्नोलॉजीस हैं जहां पर हम और रशिया साथ मिलकर के रिसर्च कर रहे हैं। डेवलप कर रहे हैं ऐसे रिसर्च मिसाइल सिस्टम्स और दूसरी टेक्नोलॉजीस और उनको को प्रोड्यूस कर रहे हैं। को प्रोड्यूस करके हम इन्हें दूसरे देशों को भी देने की बात कर रहे हैं। उदाहरण स्वरूप जब पुतिन दिसंबर में भारत की यात्रा पर आए थे तब हमारे माननीय प्रधानमंत्री और पुतिन ने मिलके इस बात को कहा था कि हम अपने यहां इस प्रकार के मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स लगाएंगे जहां पर हम इस तरह के सिस्टम्स बना के दूसरे देशों को देंगे। तो ये एक बहुत महत्वपूर्ण मैं कहूंगी कि नया माइलस्टोन जो है वो रक्षा सहयोग के क्षेत्र में जुड़ता हुआ दिखाई पड़ता है। और अब इसमें यदि हम मैं न्यूक्लियर सिविल एनर्जी के सेक्टर को जोड़ दूं, तो हमारा सबसे बड़ा पार्टनर है रशिया सिविल
17:06 न्यूक्लियर एनर्जी के क्षेत्र में। और उसी की सहायता से जो ये कुंदन कुलर न्यूक्लियर प्रोजेक्ट है ये चल रहा है और बहुत सफलतापूर्वक ये काम कर रहा है और इसके माध्यम से ये हमारा जो एक टारगेट है जिसमें हम अपनी न्यूक्लियर एनर्जी जनरेशन कैपेसिटी को 2047 तक जिसको कि हम विकसित भारत 2047 के विज़न में रखते हैं 100 गीगावाट तक बढ़ाने की जो बात है इसमें ये एक बहुत महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है और यहां रशिया हमारा एक बहुत बड़ा सहयोगी बन बनके इतने वर्षों से साथ में काम कर रहा है और कुंदमकुलम की तरह दूसरे ऐसे प्लांट्स को भी डेवलप करने की भारत में बात हुई है रशिया के साथ। इस तरह के एग्रीमेंट्स हुए हैं जब पुतिन आए थे और आज भी यह जो हमारे माननीय विदेश मंत्री और
17:53 रूस के विदेश मंत्री की बात हुई है इसमें यह एक बहुत महत्वपूर्ण बिंदु है जिसको कि साझा किया गया है। जी हां प्रभु जी यह कनेक्टिविटी और नए व्यापार मार्ग पर भी जो है इस पर भी विशेष रूप से जोर दिया जा रहा है इस साझेदारी को और ज्यादा मजबूत करने के लिए और इंटरनेशनल नॉर्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर चाबार पोर्ट के जरिए व्यापार बढ़ाने की एक कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। लेकिन ये जिस तरीके से तनाव व्याप्त है और ईरान और अमेरिका और इजराइल के बीच जिस तरीके के संबंध जो है खराब होते जा रहे हैं और युद्ध की स्थिति बनी हुई है उसको लेकर आप क्या कहेंगे? देखिए ये तनाव की स्थिति तो पूरी दुनिया
18:38 को नुकसान पहुंचा रही है। हमारे भी जो इंटरेस्ट है वो एडवर्सली इंपैक्ट हो रहे हैं। और जैसा आपने कहा इंटरनेशनल नॉर्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर जो कि चाबहार से शुरू होना है। वही अगर रुक गया है इस लड़ाई के वजह से तो जरूर ये एक समस्या हमारे लिए गंभीर है। लेकिन फिर भी हमने रूस के साथ कई तरह से जो अपना कनेक्टिविटी रिलेटेड कोपरेशन वो बढ़ाया। जैसे मसलन हमने एक उनके साथ एग्रीमेंट साइन किया जिसको कहते हैं री लॉस एग्रीमेंट। रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ़ लॉजिस्टिकल सपोर्ट जो 2025 में पिछले साल साइन हुआ था। एक मिलिट्री पैक्ट है रूस और इंडिया के बीच
19:23 में जिससे म्यूचुअल एक्सेस मिलता है मिलिट्री बेसिस को पोर्ट्स को एयर फील्ड्स को जिनसे रिफ्यूलिंग रिपेयर सप्लाई इस तरह का कोऑपरेशन होता है और इससे जो हमारी बटरल डिफेंस कोऑपरेशन है ये तो बढ़ती है लेकिन साथ ही साथ कनेक्टिविटी भी और तंदुरुस्त होती है तो इस तरह से जो हमारी ऑपरेशनल रीच है इंडोपेसिफिक रीजन में और आर्कटिक रीजन में यह बढ़ती है। तो इस वजह से भी मैं समझता हूं कि इस तरह का जो एक एग्रीमेंट है वो हमारे लिए कनेक्टिविटी के क्षेत्र में बहुत महत्वपूर्ण है। वैसे तो हम देख रहे हैं डॉक्टर अंशु कि भारत जो है पिछले कुछ वर्षों से अलग-अलग विरोधियों को भी एक साथ साधकर आगे बढ़ रहा
20:11 है और भारत की विदेश नीति में भारत पहले यह फैक्टर काम कर रहा है। लेकिन एक फैक्टर और भी है भारत और रूस के संबंधों में अ चीन क्या चीन का फैक्टर अ जो है कुछ आड़े नहीं आएगा या आपको लगता है कि रूस और भारत के जो संबंध हैं उसमें ये इतना ज्यादा महत्वपूर्ण फैक्टर नहीं है? रशिया के और हमारे जिस प्रकार के संबंध हैं तो एक सामान्य जो डिप्लोमेटिक या बटरल विपक्षीय संबंध होते हैं दो देशों के बीच के उससे कहीं ऊपर जाकर के जैसे मैंने कहा कि एक स्पेशल और प्रिविलेज्ड स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप है हमारी रशिया के साथ ऐसे कई देश हैं जिनके साथ हमारी स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप है। लेकिन रशिया के साथ एक
20:58 स्पेशल और प्रिविलेज्ड पार्टनरशिप है जिसके बहुत अलग-अलग डायमेंशंस हैं। और इस तरह की पार्टनरशिप कूटनीति में या विदेश नीति या हम वैश्विक राजनीति में देखें, तो प्रतिबिंब जीत तब डिवेलप होती है जब दोनों देशों के बीच में बहुत भरोसे की भावना हो और वो भरोसे की विश्वास की भावना रशिया और भारत के बीच में है। और यहां जब हम चीन के फैक्टर को लेकर के आते हैं तो बिल्कुल इस बात में कोई शकु नहीं है कि चीन और रशिया के आइडियोलॉजिकल लाइंस पर बहुत अच्छे संबंध हैं। लेकिन मैं आपको बताऊं कि जब भी इस बात को मैं हमेशा कहती हूं कि जब भी ऐसी कोई स्थितियां हमने बनती हुई देखी है जहां पर चीन और भारत सामने आए हैं तो रशिया के द्वारा जो हमको अलग-अलग सिस्टम्स रक्षा सहयोग के माध्यम से प्रोवाइड किए
21:44 जाते हैं उनके माध्यम से हमने हमेशा अपनी बॉर्डर्स को सिक्योर करने का काम किया है। वहां हमेशा हमारे काम आए हैं और चीन की तरफ से रशिया कभी भारत के सामने हमको खड़ा हुआ दिखाई नहीं दिया है। तो हम इस बात को बहुत अच्छे से समझे कि जो हमारे नेशनल इंटरेस्ट्स हैं और जो हमारे कन्वर्जेंसेस हैं वो रशिया और चीन के किस प्रकार के रिश्ते हैं इनसे बहुत आगे के हैं और यही कारण है कि कितनी उथल-पुथल हम अपने आसपास देख रहे हैं। हम देख रहे हैं कि किस तरह से कोविड 19 ने पूरी दुनिया को घेरा। रशिया यूक्रेन युद्ध लगातार चल रहा है। पश्चिम एशिया में किस प्रकार का संकट बना। हिंद प्रशांत क्षेत्र में चीन की वजह से किस तरह की स्थितियां बनती रहती हैं। इसके अलावा एक आतंकवाद की लड़ाई है जो पूरी दुनिया लड़ रही है। और इन तमाम परिस्थितियों में रशिया को आप इन तमाम
22:31 क्षेत्रों में जब देखें चाहे रक्षा सहयोग हो, ऊर्जा सहयोग हो, आप कृषि के क्षेत्र में देखें, तकनीक के क्षेत्र में देखें, स्पेस कलिबरेशन के क्षेत्र में देखें, व्यापार के क्षेत्र में देखें, पीपल टू पीपल कनेक्ट्स के क्षेत्र में देखें, सांस्कृतिक संबंधों के क्षेत्र में देखें, शिक्षा संबंधों के क्षेत्र में देखें तो हमेशा हमारे साथ सहयोग के नए अध्याय रशिया खोलता चला है। तो चीन के साथ हमारा जिस प्रकार का संबंध है वो भी अपने आप में कॉम्प्लेक्स इंटरडिपेंडेंस के माध्यम से ही हम समझा सकते हैं। क्योंकि जब व्यापार संबंधों की दृष्टि से देखते हैं तो दोनों देशों की निर्भरता है एक दूसरे के ऊपर। लेकिन जब हम जाते हैं तो अपने यदि हम अपनी आंतरिक सुरक्षा या अपनी बॉर्डर सिक्योरिटी की दृष्टि से देखते हैं तो निश्चित रूप से टेरिटोरियल डिस्प्यूट दोनों देशों के बीच में दिखाई पड़ते हैं। लेकिन इस एक फैक्टर
23:16 का रशिया और भारत के जो संबंध हैं उन पर कम से कम मैं चीन के तरफ जाते हुए तो किसी प्रकार का प्रभाव नहीं देखती और जब भी ऐसी कोई स्थितियां बनती हैं तो रशिया को या तो हम न्यूट्रल भूमिका में देखेंगे या फिर हम एक भारत के सहयोगी के रूप में देखेंगे। अह प्रभु जी, जब भी द्विपक्षीय संबंधों की बात होती है तो वो उसमें विश्वास जो है वो अह बहुत जरूरी होता है। कुछ और शक्तियां हैं जो लगातार हम देख रहे हैं पिछले कुछ वर्षों में भारत के साथ जो है दोस्ती गांठने का प्रयास कर रही हैं। लेकिन अलग-अलग अवसरों पर वहां पर विश्वास की कमी थोड़ी सी नजर आती है। लेकिन भारत और रूस के संबंध ऐसे हैं जो बरसों से विश्वास पर लगातार और मजबूत होते जा रहे हैं। उथलपुथल
24:01 का जिक्र किया डॉ. अंशु ने वैश्विक उथल-पुथल का। इस वैश्विक उथल-पुथल के इस समय में क्या भारत, रूस संबंध और पुरानी दोस्ती से आगे बढ़कर एक नई वैश्विक धुरी बन रहे हैं क्या या बन सकते हैं? जी जरूर। वैश्विक उथलपथल होने के बावजूद जो हमारे बटरल रिलेशंस है रशा के साथ वो तो कमजोर नहीं हुए हैं। देखिए रशिया ने हमारा हमेशा साथ दिया है और जितना भी वो हमारी जरूरतों को पूरा कर सकता है खासतौर पे डिफेंस क्षेत्र में या
24:48 एनर्जी सेक्टर में उसने आगे बढ़कर हमारी सहायता की है। तो ये जो बटरल रिलेशनशिप है ये टाइम टेस्टेड है और अलग-अलग परिस्थितियों में ये कायम रही है। तो जैसा आपने कहा उथलपुथल होने के बावजूद जो हमारे शेयर स्ट्रेटजिक इंटरेस्ट है वो कायम है और हालांकि देखिए चाइना पे रशिया की डिपेंडेंस कुछ बढ़ गई है और चाइना का इन्फ्लुएंस रशिया पे बढ़ता जा रहा है लेकिन इसके बावजूद जो भारत और रूस के बीच शेड स्ट्रेटजिक इंटरेस्ट है और जो रक्षा विरासत है वो इस साझेदारी को स्थिर बनाए
25:34 हुए हैं। इस वजह से यह रिश्ते कमजोर होते हुए नहीं लग रहे और तंदुरुस्त होते लग रहे। जी डॉक्टर अंशु समय समाप्त हो रहा है। सिर्फ एक लाइन में आपका उत्तर चाहूंगा। 100 बिलियन डॉलर का लक्ष्य सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि जिओपॉलिटिकल मैसेज भी है। हां या ना? बिल्कुल। एक बहुत बड़ा भू- राजनीति एक संदेश है कि जिस प्रकार की जिस प्रकार के फ्लक्स में हम रह रहे हैं वैश्विक राजनीति के परिदृश्य की दृष्टि से कहूं तो जिस तरह के युद्धों का संकट पूरी दुनिया झेल रही है इसमें ये दो देश मिलकर पूरे विश्व को यह संदेश दे रहे हैं कि हम युद्धों की तरफ नहीं बल्कि शांति की ओर और साझा विकास की ओर देखें। आपस में हाथ बढ़ाकर आगे बढ़े और यह जो एक पूरी वर्चुअल कॉन्फ्रेंस हुई है, इसमें जो महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं रशिया और भारत के बीच। तो ये पूरे विश्व को संदेश है वसुदेव कुटुंबकम की भावना का
26:20 भारत की विदेश नीति के दर्शक। थैंक यू डॉक्टर अंशु जोशी और प्रभु दयाल जी। बहुत-बहुत धन्यवाद जुड़ने के लिए और बहुत सारे बिंदुओं पर प्रकाश डालने के लिए। इनसाइट में आज के लिए इतना ही। इनसाइट में आपसे फिर भेंट होगी एक नए विषय के साथ। फिलहाल मुझे आज्ञा दीजिए। बने रहिए संसद टीवी के साथ। नमस्कार। [संगीत] संसद टीवी के और भी प्रोग्राम्स देखने के लिए सब्सक्राइब करें हमारा YouTube चैनल और हां इन्हें लाइक और शेयर करना ना भूलें।