Kehke Rahega Kehne Wala With Kishore Ajwani: IIT-IIM से पढ़े प्रशांत क्यों बने Acharya Prashant

News18 India www.youtube.com

संक्षिप्त सारांश

इस वीडियो का विषय आचार्य प्रशांत के दृष्टिकोणों पर केंद्रित है, जो जीवन के गहरे अर्थ और मानवता के संघर्षों को उजागर करते हैं। वे बताते हैं कि हर व्यक्ति का जीवन में एक उद्देश्य होना चाहिए और वे अपने कार्यों के माध्यम से इसे पूर्ण करने का प्रयास कर रहे हैं।

  • जीवन का मकसद समझना आवश्यक है।
  • मानवता को दुःख और अन्याय से बचाने के लिए जागरूकता जरूरी है।
  • शिक्षण और ज्ञान के माध्यम से समाज का सुधार करना प्राथमिकता है।

आचार्य प्रशांत का परिचय

आचार्य प्रशांत जी अपने जीवन के उद्देश्य का वर्णन करते हैं, जिसमें वे कहते हैं कि व्यक्ति को यदि अपनी जिंदगी में किसी मकसद का अनुभव होता है, तो वह अपने आसपास के समाज के दुःख और अन्याय को पहचानता है। आज की दुनिया में बढ़ती विषमताएं और विनाश की गति उन्हें अपने मकसद को स्पष्ट करने के लिए प्रेरित करती हैं।

व्यक्तिगत मापदंड

वे मापदंडों की बात करते हैं कि कैसे व्यक्ति के भीतर जो अंधेरा है, उसे बाहर से पहचानना संभव नहीं है। बदलाव का माप केवल व्यक्ति की आत्मगवाही से ही हो सकता है। उनकी शिक्षाओं के माध्यम से लाखों छात्रों के जीवन में सकारात्मक बदलाव आया है।

गणनाएँ और निष्कर्ष

आचार्य प्रशांत जी अपने शिक्षण की सफलता को आँकड़ों के माध्यम से स्पष्ट करते हैं। डेढ़ लाख छात्रों की पहुंच और विभिन्न एप्लिकेशन डाउनलोड्स जैसी बातें उनके प्रभाव को दर्शाती हैं। उनका यह यथार्थ है कि शिक्षार्थियों को कोई डिग्री नहीं मिलती, फिर भी वे ज्ञान की तलाश में शिक्षण से जुड़े रहते हैं।

धर्म और अहंकार

आचार्य जी धर्म के महत्व पर बात करते हैं, जिसमें वे कहते हैं कि असली धर्म वह है जो व्यक्ति के अहंकार को विघटित करता है। धार्मिकता का असली लक्ष्य आत्मज्ञान और अहंकार का नाश होना चाहिए, न कि बाहरी मान्यताओं पर निर्भर रहना।

समाज में सुधार की आवश्यकता

समाज में बुराइयों का विश्लेषण करते हुए आचार्य प्रशांत यह बताते हैं कि कैसे जाति व्यवस्था और सामाजिक भेदभाव धार्मिकता के नाम पर जारी हैं। वे यह भी कहते हैं कि अगर समाज में असमानता और अन्याय है, तो आरक्षण की प्रणाली की आवश्यकता है ताकि पुराने बुराइयों का निवारण हो सके।

व्यक्ति की भूमिका

आचार्य प्रशांत उन लोगों को महत्वपूर्ण मानते हैं जो अपने भीतर सवाल उठाते हैं। वे यह कहते हैं कि विघटन और जागृति के रास्ते पर बढ़ने वाले व्यक्ति को अपना जीवन खुद संवारे हुए समझना होगा, न कि अंधविश्वासों का अनुसरण करना होगा।

अहंकार और ज्ञान

अहंकार का विश्लेषण करते हुए, वे यह बताते हैं कि मनुष्य अपने बोलचाल के व्यवहार में अहंकार का शिकार हो जाता है, जिससे उसे वास्तविक ज्ञान की दिशा और स्वाधीनता छोड़कर असत्य का सामना करना पड़ता है।

सच्चाई और झूठ

आचार्य जी यह स्पष्ट करते हैं कि सच्चाई सिर्फ एक शब्द नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहन अनुसंधान और आत्म-जागरूकता की आवश्यकता होती है। मनुष्य को अपनी सुख-शांति के लिए यह समझना होगा कि सुख का अनुभव अक्सर असत्य के साथ होता है।

सवाल-जवाब का महत्व

वे कहते हैं कि प्रश्न पूछना बहुत आवश्यक है। इससे न केवल छात्रों की समझ बढ़ती है, बल्कि वे अपने विचारों में भी गहराई लाते हैं। सवालों के माध्यम से ही व्यक्ति अपनी आत्मा के सत्य की खोज कर सकता है।

निष्कर्ष और भविष्य

आचार्य प्रशांत आगे आने वाले सुधारों और समाज में वास्तविकता को पहचानने की आवश्यकता पर बल देते हैं। उनका विश्वास है कि शिक्षित और जागरूक लोग समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।

Summarize any YouTube video in seconds

Get summaries like this one for any video, in your language, with the free Summ app.

Download on the Apple Store
Get it on Google Play

Transcript

YouTube Transcript Generator

0:00 कह के रहेगा कहने वाला। आज हमारे साथ जो शख्सियत हैं उनको आपने बहुत कुछ कहते हुए सुना है। परिचय के मोहताज नहीं है आचार्य प्रशांत जी। आचार्य जी आपको अपनी जिंदगी का मकसद मिल गया। आप अगर जिंदा हैं जिंदगी है आपके पास तो आप अपने आसपास की दुनिया को देखते हैं, लोगों को देखते हैं और अगर वहां आप बहुत दुख पाते हैं, अन्याय पाते हैं तो मकसद अपने आप सामने आ जाता है ना। खोजना नहीं पड़ता। सामने ही है। जैसी आज की हमारी दुनिया है और उसमें जितनी विषमताएं हैं विनाश की ओर

0:48 हम जिस तरह से बढ़ रहे हैं जिस गति के साथ तो मैं समझता हूं कि मुझे क्या हर व्यक्ति को मकसद स्पष्ट दिखाई देना चाहिए। बहुत कुछ है करने के लिए। दुनिया को समझने के लिए, खुद को समझने के लिए। वही काम कर रहा हूं। लोगों को समझा रहा हूं। वह कौन है और जब समझते हैं वह कौन है तो दुनिया में जो जरूरी है, जो सार्थक है वो करने लग जाते हैं। यही मेरे काम का मकसद है। ये कैसे आप मेजर कैसे करेंगे कि आपने आप जिस कोशिश में निकले वो सार्थक हुई? मेजर मतलब

1:34 मतलब क्वांटिटेटिवली आंकड़ों के तौर पर। हां मतलब अगर आप कह रहे हैं कि दुनिया जो है वो विनाश की तरफ जा रही है। तो विनाश की तरफ जाना जब रुक जाएगी तो वो आप मानेंगे कि आपकी कोशिश कामयाब रही। देखिए हमारा काम लोगों के साथ है। व्यक्तियों के साथ है। हम उनके भीतर जो चल रहा है जो अंधेरा है उसको हटाने का काम करते हैं। अब किसी के भीतर अंधेरा कितना कम हुआ। तो पहली बात तो यह कि इसको बाहर से साफसाफ जानना असंभव है। तो यह बात तो खुद उस व्यक्ति की गवाही ही बता सकती है कि उसके जीवन में कितना परिवर्तन आया है। और उस तरह की गवाहियां हमारे पास लाखों की तादाद में है। रोज ही आती हैं। शायद

2:20 करोड़ों की तादाद में होंगी। लेकिन अगर हम ठोस सबूत की बात करें जो इशारा करते हैं इंपैक्ट की तरफ कि असर पड़ रहा है कुछ हो रहा है तो ना जाने कितने ठोस सबूत मौजूद हैं। हमारी जो जो कम्युनिटी है जो हमारे छात्र कम्युनिटी है गीता कम्युनिटी वो बहुत कम समय में लगभग डेढ़ लाख छात्रों तक पहुंच गई है। बीच में दो लाख छात्रों तक भी चली गई थी। फिर हमने परीक्षा में और कई चीजों में कड़ाई करी तो अभी उसको हम थोड़ा नीचे लाए हैं और जो ऐप है जिस पर ये सब पढ़ाई होती है उसके 70 लाख से ज्यादा डाउनलोड्स हैं। हां ये आंकड़ा आपको अच्छा लगेगा। यह जो साल चल

3:07 रहा है 2026 इसमें लगभग 1 बिलियन मिनट के लाइव सत्र हमारे छात्र जो हैं वो देखने जा रहे हैं। अभी नहीं हुए हैं। अभी अक्टूबर ही चल रहा है। पर दो महीने और बचे हैं। उसके बाद 1 बिलियन मैं 1 मिलियन नहीं कह रहा हूं। मैं 1 बिलियन कह रहा हूं। और ये लाइव है। इनके अलावा लगभग आधा बिलियन सत्र और जो रिकॉर्डिंग्स के हैं। मिनट आधा बिलियन मिनट और जो रिकॉर्डिंग्स के हैं। और यह तब है जब इससे उनको कोई डिग्री नहीं मिलनी। कोई नौकरी नहीं मिलनी, कोई सर्टिफिकेट भी नहीं मिलना है। यह वो इसीलिए कर रहे हैं क्योंकि उनको फायदा हो

3:54 रहा है। उनको फायदा हो रहा है तो इसलिए देख रहे हैं। क्या फायदा? आप बताइए कि कोई व्यक्ति है जिसके पास बुद्धि है, तर्क है उसको यदि फायदा नहीं दिखेगा तो क्या वो बार-बार बार-बार आकर के एनरोल करेगा औरों को भी कराएगा? क्या फायदा अगर आप पूछेंगे ये आपके सामने ये चाय रखी हुई है। आप जानना नहीं चाहेंगे कि ये साफ है कि नहीं? आप जानना चाहेंगे। है ना? मतलब लायक है। हां कि यह साफ है कि नहीं है। जबकि आपके बाहर रखी है। आपके यहां जो रखा हुआ है आप जानना नहीं चाहेंगे वो साफ है कि नहीं। वो तो भीतर है। बस यही फायदा है और सबसे बड़ा फायदा है।

4:39 तो खुद के साथ अगर हर इंसान बेहतर जीने लगेगा तो फिर समाज अच्छा हो जाना चाहिए। अब गीता जो है ये सैकड़ों हजार साल से हो गए। यह अच्छा समाज क्यों नहीं दे पाई जब इतने साल से थी तो आपको कैसे पता कि जैसा आज समाज है भी ऐसा भी रहता यदि गीता ना होती इससे भी खराब हो सकता था हो सकता था नहीं होता ही हम कहां से आए हैं हम कहां से आए हैं ये तो बहुत साधारण सी बात है हम जंगल से आए हैं भाई हम जंगल से आए हैं। क्यों आज आपके सामने कोई भी उच्चतर मूल्य होता लॉर्ड ऑफ द फ्लाई नाम

5:26 की एक किताब है वो हमारे पाठ्यक्रम में थी 11वीं 12वीं में तो उसमें बच्चे हैं छोटे-छोटे हम वो इस बारे में थी कि इंसान की जो प्रकृति है वो उससे क्या करवा सकती है अगर उसे कोई सही बात दिखाने वाला दर्पण दिखाने वाला ना हो जिसमें वो जान पाए कि वो कैसा है। तो छोटे-छोटे बच्चे हैं। द्वितीय विश्व युद्ध की बात है और वो एक द्वीप है। वो वहां पर भटक जाते हैं। वो प्लेन से कहीं जा रहे थे। प्लेन उनका क्रैश हो जाता है। द्वीप पे उतर जाता है। बहुत छोटे हैं। पांच सात साल से ले 12 14 साल तक के और अंततः वो इतने बर्बर हो जाते हैं कुछ महीनों के अंदर ही। और ऐसी विभत्स वो वो घटनाएं अंजाम देने लगते हैं कि

6:14 उनमें से एक जो होता है वह मोटा उसको नाम पिगी दिया होता है। उसका सर काट के एक एक बांस पर वो टांग देते हैं और सर वहां कटा हुआ है। उस पर टंगा हुआ है। उसके चारों ओर बहुत सारी मक्खियां जमा हो गई हैं। और फिर वो बच्चे उसके चारों इर्दों इर्द-गिर्द नाच रहे हैं। और उसी से उस अह कहानी का उपन्यास का नाम आता है लॉर्ड ऑफ़ द फ्लाई। तो यही बताने के लिए था कि अगर ना होते साधु ना होते ज्ञानी ना होते समझाने वाले ना होती गीताएं तो हमारी क्या हालत होती? संत कबीर ने इसको बड़े सुंदर तरीके से कहा है। आग लगी आकाश में झरझर घिरे अंगार ना होते

6:59 जो साधुजन जल मरता संसार आप यह तो कहते हो कि आज दुनिया में इतने चोर उचक्के क्यों घूम रहे हैं? कृतज्ञता दिखा के हम क्यों नहीं कभी कह पाते कि अगर वो ना होते तो शायद हम सभी चोर उचक्के होते। लेकिन मस्त रहते हैं वो तो फिर मस्त रहेगा इंसान भी। इंसान मस्त नहीं रहता था ना क्योंकि पशुओं के पास बुद्धि नहीं है तो अहंकार भी नहीं है। मनुष्य के पास बुद्धि है और अहंकार भी है और ये जो अहंकार होता है इसको जब बुद्धि और मिल जाती है तो यह बहुत कातिलाना हो जाता है। तो इस अहंकार को ही आईना दिखाने का जो काम करे उसको धर्म कहते हैं और वही काम हम अपने मिशन में कर रहे हैं। अब आप बताइए खुद ही कि वह कितना जरूरी है और कितना नहीं।

7:46 आप कह रहे हैं यही धर्म है। तो फिर यह जो धर्म के नाम पर बाकी सब चल रहा है, यह क्या है? यह कुछ नहीं है। विश्वास पद्धतियां हैं। किस्से कहानियां हैं। यह ऐसा है कि जैसे कोई बहुत साफ चीज हो और बरसों की शताब्दियों की यात्रा में उस पर बहुत सारी धूल जम गई हो। हम केंद्र दिखाई ही ना पड़ता हो। धूल-धूल बस दिखाई पड़ती हो। और जो दूर से देख रहा हो, जो नरकटना आए, जो परीक्षण ना करे, वह बस उस धूल को ही उस चीज की सच्चाई समझ ले। भगवत गीता में कहते हैं श्री कृष्ण कि होती है आग

8:32 पर ना उससे ताप पता चलता बहुत और प्रकाश तो एकदम ही नहीं पता चलता क्योंकि धुआं छा जाता है और वो धुआ उसी आग से रहा है। लेकिन अगर आप दूर खड़े होकर के देख रहे हैं तो आपको आग दिखाई नहीं देगी। यही धर्म के साथ हुआ है। जो धर्म का केंद्र है उसका ताल्लुक सिर्फ और सिर्फ आत्मज्ञान से है। मैं स्वयं को जानू। मुझे पता चले मैं हूं कौन? मैं अहंकार का विगलन ही धर्म का एकमात्र और वास्तविक लक्ष्य है। उसके अलावा कुछ नहीं। तो अगर धर्म के केंद्र में केंद्र के ऊपर यह सब चढ़ गया तो क्या केंद्र धर्म का केंद्रीय तत्व जो है वो इतना ताकतवर ही नहीं था कि यह नहीं होने देता। एकदम दुर्बल है। एकदम दुर्बल है। क्योंकि बल

9:18 उसके पास होगा कि नहीं वह वह तत्व नहीं तय करता। वह आप तय करते हैं। रखी होगी यहां बहुत अच्छी चीज। पौष्टिक है। सुपाच्य है। पर मैं तय कर रहा हूं ना कि मैं उसको मूल्य दूंगा या चटपटे खाने को। वो बहुत वहां पर एक बहुत सुंदर पौष्टिक सुपाच्य चीज रखी हुई है जिससे बहुत अच्छा हो जाऊंगा मैं और बहुत सस्ती भी रखी हुई है और इधर कुछ रखा हुआ है चटपटा वो बहुत महंगा भी है। मैं तय करूंगा ना किसकी कीमत ज्यादा है। आप यह नहीं कह सकते यह पांच का है यह 500 का है। वो पांच का इसलिए क्योंकि मैं तय कर रहा हूं कि ₹5 से ज्यादा मैं इसके दूंगा नहीं। वो 500 का इसलिए क्योंकि वो कचरा है पर मैं तय कर रहा हूं कि मैं इसके 500 दूंगा। तो सत्य का मूल्य धर्म का मूल्य लगाने वाला भी तो अहंकार ही है ना आप और मैं और वास्तविक

10:06 धर्म अहंकार का विगलन करता है और धर्म का मूल्यांकन भी अहंकार को ही करना है। इन दोनों बातों को जोड़िए जरा क्या निकलेगा? वास्तविक धर्म अहंकार को क्षीण करेगा, दुर्बल करेगा, काटेगा, गलाएगा। और वास्तविक धर्म को सम्मान और मूल्य कितना देना है यह भी अहंकार को तय करना है। अरे भाई मैं क्यों वास्तविक धर्म को सामने लाऊंगा? उसे इज्जत दूंगा, उसको आदर दूंगा। अगर मुझे पता है वो मुझे गला देगा। तो हर घटिया चीज की हम ऊंची कीमत लगाते हैं और सच्चाई ऐसी है कि उसको कोई पूछने वाला नहीं। ये आप जैसे कहते हैं ना कि कंडीशनिंग का असर है। माइंड की कंडीशनिंग है। पर आप जो ये बता रहे हैं ये भी तो माइंड की कंडीशनिंग है। नहीं है। नहीं माइंड कुछ नहीं होता।

10:52 हम मस्तिष्क है। मस्तिष्क अपने काम करता रहता है। मस्तिष्क शरीर का वैसे ही हिस्सा है जैसे दिल जैसे फेफड़े जैसे आते हैं। अंग है वैसे एक ब्रेन है। एक अंग है। ब्रेन है और उसमें विचार उठते हैं। भावनाएं उठती हैं। उसमें तमाम तरह कि इलेक्ट्रोकेमिकल प्रक्रियाएं होती हैं। वही लगभग जैसे कि और शरीर में कहीं भी होती हैं। हां तो जब अहंकार जाकर के ब्रेन पर कब्जा कर लेता है तब वो सब निकलता है जिसको हम कहते हैं कि अरे भावनाएं हैं जो काबू में नहीं आ रही हैं। विचार हैं जो हिंसा की तरफ जा रहे हैं। यह सब होने लग जाता है। तो माइंड का अपने आप में कोई दोष नहीं है। माइंड का जो केंद्र है ना वो अहंकार बन बैठता है।

11:38 अहंकार जितना गड़बड़ होगा माइंड उतना ज्यादा भटका हुआ होगा। हम माइंड माइंड बोलते हैं उसको मैं क्यों टोकता हूं इसलिए क्योंकि माइंड की बात करके हम ईगो की माने अहंकार की बात करने से साफ बच निकलते हैं। आपने कहा कॉन्शियसनेस। कॉन्शियसनेस बहुत सीधी सी बात है। मैं हूं देखने वाला दृष्टा। आप मुझे अभी दिखाई दे रहे हैं। आप हैं दृश्य। ठीक है? यह जो फिनोमिना है हम यह जो घटित हो रहा है हम दोनों के बीच में दृष्टा और दृश्य के बीच में इसको कॉन्शियसनेस कहते हैं। जिसके एक सिरे पर हमेशा अहंकार ही बैठा होता है। द ईगो इज द कॉन्शियस वन। मैं कहूंगा मैं कॉन्शियस हूं। क्यों? क्योंकि मैं विषयता हूं। मैं सब्जेक्ट हूं। और मुझे यह सारे ऑब्जेक्ट्स

12:23 दिखाई दे रहे हैं। यह जो सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट का संबंध होता है, यह कॉन्शियसनेस कहलाता है। अगर मुझे कोई सब्जेक्ट प्रतीत ही नहीं हो रहा है। तो आप कह देंगे मैं अनकॉन्शियस हो गया। मैं अनकॉन्शियस हो गया। तो कॉन्शियसनेस हमेशा डलिस्टिक होती है। उसके दो छोर होते हैं। एक देखने वाला और दूसरा उसका दृश्य। यह कॉन्शियसनेस है। ऐसा नहीं हो सकता कि कोई मकसद ही ना हो हम हमारा यहां आने का इस दुनिया में या हम पता नहीं आए हैं या नहीं आए हैं। आपने बहुत खूबसूरत बात करी। आखिरी बात बिल्कुल यही है। इसीलिए धर्म का काम आपको कोई नया मकसद प्रयोजन उद्देश्य देना नहीं है। धर्म का काम है आपने जो मकसद पकड़ रखे हैं उनका परीक्षण करना। आप अभी तो एक काल्पनिक

13:10 बात कर रहे हैं कि क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हमारा कोई मकसद ही ना हो। पर अभी आप यहां से जाएंगे और अपने कई मकसदों के पीछे दौड़ेंगे। हम सब यही करते हैं। आम आदमी हैं। हमारी जिंदगी यही है। उद्देश्य, मकसद, कामनाएं यह करना है। यह लक्ष्य है, यह है। तो, हम तो मकसदों से भरे हुए लोग हैं ना। धर्म का काम है हमसे पूछना कि ये जो तुम्हारे मकसद हैं, यह तुम्हारे पास आए कहां से? क्या यह वास्तव में तुम्हारे हैं या उधार के हैं? आयातित है, आरोपित है, इंप्लांटेड है। तुम्हारे भीतर तुम्हारे किसी ने मकसद डाल दिए? और यह पूछने के बाद धर्म थोड़ा सा मुस्कुराता है और पूछता है और यह बताओ यह जिसको तुम मैं बोलते हो क्या यह भी तुम्हारा है? मकसद तो बाहरी है ही पराया है ही। जिसको आप मैं बोलते हो वो

13:55 भी पराया है। तो धर्म का काम आपको कोई नया मकसद देना नहीं होता। जो आपके फिलहाल के मकसद हैं, उद्देश्य हैं, कामनाएं हैं, आइडेंटिटीज, पहचाने हैं, उन्हीं की जांच पड़ताल करना धर्म है। और अंततः जब दिख जाता है कि ये सारे मकसद व्यर्थ हैं। तो फिर ऐसा नहीं कि कोई मकसद नहीं बचता। फिर कोई व्यक्तिगत मकसद नहीं बचता। क्या नहीं बचता? व्यक्तिगत मकसद। उसके बाद व्यक्ति काम करता तो है, मकसद होते हैं। पर वह यह नहीं कहेगा कि यह मकसद मेरे अपने हैं। हम संत कबीर की अभी बात कर रहे थे। कहते हैं सुखिया सब संसार है खाए और सोए। और दुखिया दास कबीर है जागे और रोए।

14:41 वो क्यों रो रहे हैं? वो तो संत हैं, महाज्ञानी हैं। उन्हें क्यों रोना पड़ रहा है? लोग तो इसलिए रोते हैं कि उनकी कामनाएं नहीं पूरी होती। व्यक्तिगत उनके लक्ष्य होते हैं। वह व्यक्तिगत उनके लक्ष्य व्यक्तिगत उनके स्वार्थ नहीं पूरे हो रहे तो लोग रोते हैं। वह क्यों रो रहे हैं? वह इसलिए रो रहे हैं क्योंकि वो दुनिया का दुख देख रहे हैं। अब ये उनका मकसद बन गया है। आपको कब अंदाजा हुआ ये? ये कोई एक बार की चीज नहीं होती कि हो जाए। इस एक बार की चीज का खंडन करना भी बहुत जरूरी है। क्योंकि वो कहते हैं ना एनलाइटनमेंट हो गई। आ हा हा वो मेरे देखे वैसी कोई चीज होती ही नहीं है। एनलाइटनमेंट देखिए ये अहंकार हमारी बात शुरू हुई। इसी पे सारी बात है इर्दगिर्द अहंकार के आता कहां से है?

15:28 बच्चा पैदा हुआ। पैदा होते ही मैं भाव रहता है। अहंकार माने हम यहां पे घमंड वगैरह की बात नहीं कर रहे हैं। इतना तो आप लोग सब समझ ही रहे होंगे। अहंकार से आशय है मैं भाव। अहंता आई एमनेस मैं हूं। हम अपनी अस्मिता का का एहसास मेरा होना यह कब आ जाती है? बच्चा पैदा होता है तभी उसमें रहती है। बल्कि गर्भ में होता है बच्चा तब भी उसको अपने होने का पता लगने लग जाता है जन्म से पहले। तो यानी कि अहंकार शरीर के साथ पैदा होने वाली कोई शय है। हम यह नहीं कह रहे कि वो शरीर का एक उत्पाद है। पर निश्चित रूप से वो शरीर के साथ समुतादित होता है। को

16:14 अराइज करता है। हम शरीर है तो अहंकार है। आपको ऐसा शरीर नहीं मिल सकता कि जिसमें मैं भाव ना हो। ठीक है? आप आप उदाहरण के लिए आप जानते हैं कि ये ये आप हैं और उसके बाद ये कुर्सी है। इतना पता है। सबको पता है। इतना बच्चे को ही पता होता है। ये मैं हूं ये पालना है। आप पालने को छुएंगे बच्चा प्रतिक्रिया शायद ना करे। पर आप बच्चे के शरीर को छुएंगे बच्चा प्रतिक्रिया करेगा। वो जान गया है कि ये मैं हूं। वो देह की तो यानी जब तक शरीर रहेगा यह मैं भाव रहेगा। क्योंकि वो शरीर के साथ ही आना है भाई। लगभग वैसे की जैसे जब तक शरीर रहेगा तब तक आंत रहेगी। हम यद्यपि ये उदाहरण पूरी तरह सटीक नहीं है क्योंकि आंत भौतिक होती है। अहंकार भौतिक नहीं है उस तरीके से। आप पेट खोलेंगे तो आंत दिख जाएगी। वो वो फिजिकल

16:59 हां आप खोलेंगे शरीर कहीं भी तो अहंकार नहीं दिखेगा कि ये अहंकार का एटम है या ये अहंकार की ग्रंथि नहीं दिखेगी। पर उदाहरण के लिए समझा रहा हूं। तो फिर यदि इनलाइटनमेंट से हमारा आशय यह होता है कि सदा के लिए अहंकार मिट गया तो शरीर रहते संभव नहीं है। हां अहंकार के विगलन की एक अनंत यात्रा जरूर की जा सकती है। जब तक शरीर है वो यात्रा चलती रहेगी। जब तक शरीर यात्रा चलती रहेगी और वो यात्रा सिर्फ एक दिशा में नहीं होती है। अहंकार माया है। आप कह दें कि मैंने इतना घटा दिया। आप अगले दिन सो के उठेंगे तो फिर थोड़ा और बढ़ जाता है। ठीक वैसे जैसे आप यह नहीं कह सकते कि आज आपने जाके व्यायाम कर लिया तो अब अगले हफ्ते तक व्यायाम करने की कोई जरूरत नहीं। किसी डिग्री की तरह नहीं

17:45 अहंकार की एक अहंकार का विगलन कि एक बार वो डिग्री हासिल कर ली तो अब जन्म भर रहेगी। अगर बेखबर हुए तो आप फिसलेंगे और गिरेंगे। आप ये नहीं कह सकते कि कल तो मैं होशमंद था ना तो मैं आज क्यों गिर रहा हूं। कल होश था तो कल बच गए। आज बेहोश हो जाओगे तो आज गिरोगे। तो कोई कोई फाइनल एनलाइटनमेंट जैसी तो आपको भी नहीं लगता कि आपकी कोई फाइनल एनलाइटनमेंट हुई है। भ ये डेली का किसी की नहीं हो सकती। किसी की नहीं हो सकती। लेकिन ये अपने प्रेम और अपनी ईमानदारी की बात है कि लगातार स्वयं पर नजर रहे और लगातार आदमी उसके उसके उसके विगलन की ओर उसको क्षीण करने की ओर बढ़ता रहे। हां उसको क्षीण करने का काम बहुत सारे महापुरुषों ने करा है। अभी हम संत कबीर की बात कर रहे थे।

18:30 अभी हम भगवत गीता की बात कर रहे थे। दुनिया भर का जो जो आध्यात्मिक और दार्शनिक साहित्य है वो हम अपनी गीता कम्युनिटी के छात्रों के साथ पढ़ते हैं। तो निश्चित रूप से यह वो लोग थे जिन्होंने अहंकार को निरंतर क्षीण करा। अपनी प्रतिबद्धता दिखाई। वह प्रतिबद्धता ही सब कुछ है। वह राह ही सब कुछ है जिस पर आपको लगातार बढ़ते जाना है। जो मंजिल की उम्मीद करेगा वो धोखा खाएगा। तो आप कह रहे हैं कि आप कोई मंजिल पे नहीं पहुंचे। आप आप महापुरुष हैं। नहीं बिल्कुल भी नहीं। आदमी आदमी बन जाए। आदमी इंसान बन जाए। क्या यही बहुत बड़ी बात है। हम में से ज्यादातर लोग अहंकारिक पशु बनकर के जीते हैं। मेरी एक उक्ति है

19:16 जो कि हमारे छात्रों को बहुत पसंद आती है। हम मालूम है क्या कहते हैं? हम कहते हैं फॉरगेट एनलाइटनमेंट बी ह्यूमन फर्स्ट। तुम्हें यह धोखा हो गया है कि तुम इंसान हो और अब तुम इंसान से उठकर के भगवान बनना चाहते हो कि साहब हम तो एनलाइटेंड हो जाएंगे। मैं कहता हूं तुम्हें धोखा हो गया है कि तुम इंसान हो। तुम पशुओं से बदतर हो। आध्यात्मिक यात्रा का उद्देश्य यह नहीं है कि तुमको भगवान बना दे। उसका उद्देश्य है कि तुमको इंसान बना दे। जानवर जानवरों से बदतर आपने कहा। जानवर नीचे क्यों है? वो तो मस्त रहते हैं, खुश रहते हैं। क्या पता वो इवोल्यूशन की हमसे ऊपर वाली स्टेज हो। जानवर हमसे नीचे हैं नहीं। संभावित रूप से हैं। मनुष्य में संभावना है पशुओं से बहुत ऊपर भी चले जाने की। दुर्भाग्य की बात है कि ज्यादातर

20:01 मनुष्य उस संभावना कभी इस्तेमाल नहीं करते। देखिए पशु का और मनुष्य का थोड़ा तुलनात्मक हम अध्ययन कर लेते हैं। पशु के पास शारीरिक अहंता तो होती है। उसका शरीर संस्कारित है। उसको पता है। अब आप शेर को बोलेंगे घास खाओ तो नहीं खा पाएगा। उसको जाकर के किसी को मारना है, खून बहाना है। इसी तरीके से बंदर को नहीं पूछना है मैं कौन हूं? मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? मकसद क्या है? वो सारी बातें कर रहे हैं। वो नहीं कहेगा कि मुक्ति कैसे मिल जाए? वो नहीं कहेगा कि क्या व्यक्ति इन्हीं बंधनों में फंसे रहकर जीने के लिए पैदा होता है। तो जानवरों के साथ समस्या ये है कि उनको यह प्रश्न उठते नहीं। ये समस्या है या नहीं ये समस्या है। ये समस्या है। ये समस्या है। तभी तो हम उन्हें पशु बोलते हैं ना। पशु माने जो बंधा हुआ है।

20:47 पशु क्या पता वो हमें हां ठीक है। हमें वो वो बोल सकते हैं। वो बोल सकते हैं। अभी हम ये देख रहे हैं कि वो खड़े कहां पर हैं। निष्पक्ष तौर पर। तो वो नहीं जान सकते कि जीवन क्या है? क्या नहीं है और इसीलिए जैसा उनका जीवन चल रहा था लाख साल पहले करोड़ों साल पहले वैसे ही उनका जीवन चलता रह जाता है। वो अधिक से अधिक शारीरिक पाश में बंधे हुए हैं। शारीरिक पाश में उनके पास मानसिक मनोवैज्ञानिक अहंकारिक अहंकार बहुत कम है। इसीलिए अहंकारिक पाश, पाश माने बंधन वो भी उनके पास बहुत कम है। अब मनुष्य के पास संभावना है कि वह या तो पैदा तो वह भी शारीरिक संस्कार लेकर के ही होता है। जैसे पशु पैदा होता है वैसे ही इंसान पैदा होता

21:33 है। इस मामले में कि शारीरिक पा शारीरिक संस्कार शारीरिक बंधन तो दोनों के पास है। मनुष्य क्या कर लेता है कि वो अपने शारीरिक बंधनों के ऊपर मानसिक बंधन भी लाद लेता है। और इस तरह मनुष्य पशुओं से भी बदतर हो जाता है। लेकिन मनुष्य के पास यह संभावना है कि वह अपने मानसिक बंधन को काट भी सके। तो उसको यह अपॉर्चुनिटी यह संभावना दी गई है कि तुम पशुओं से ऊपर उठ सकते हो। लेकिन उसको साथ ही साथ यह खतरा भी मौजूद है कि वो पशुओं से बहुत नीचे भी गिर सकता है। पशु जैसा पैदा होता है वैसा ही मरता है। आप यह नहीं कहोगे कि यह पापी कुत्ता है। कुत्ता कुत्ता ही पैदा हुआ था। कुत्ता कुत्ता ही मर गया। आप यह भी नहीं कहोगे कि यह देखो ये फलाना बैल जा रहा है

22:22 और यह बुद्धत्व को प्राप्त हो गया है। बैल बैल पैदा हुआ था। बैल ही वो मरेगा। तो पशु के पास ऊर्ध्वाधर तल पर उठने की कोई संभावना नहीं होती। गिरने की भी नहीं होती। यह उसका सौभाग्य है। ना वह उठ सकता है ना वह गिर सकता है। मनुष्य उठ भी सकता है, मनुष्य गिर भी सकता है। दुर्भाग्य से ज्यादातर लोग गिरने का फैसला करते हैं। इसलिए मैं कह रहा हूं कि ज्यादातर मनुष्य पशुओं से भी गिरे हुए होते हैं। तो ये जब अहंकार की आप बात करते हैं अब आप भी जिस तरीके से लोगों तक अपनी बात पहुंचाते हैं वो भी तो एक ब्रांडिंग के जरिए हो रही है। तो उस ब्रांडिंग वो अहंकार नहीं है जब आप एपी फ्रेमवर्क कहते

23:07 हैं। सिर्फ फ्रेमवर्क नहीं कहते या मतलब एपी एपी क्यों लगाते हैं? क्योंकि आप पूर्ण रूपेण अहंकार है। हां वो विशुद्ध अहंकार है। ईगो है। वो विशुद्ध अहंकार है। मैंने क्या कहा? जब तक शरीर रहेगा अहंकार रहेगा। पर अहंकार के पास यह विकल्प है कि या तो नीचे गिरे या ऊपर उठे। वह कभी भी मृत नहीं हो सकता, शून्य नहीं हो सकता। लेकिन वो क्षीण हो सकता है। और दूसरी ओर वो बहुत दीर्घकाय बहुत मोटा भी हो सकता है। मोटा अपने आप को फुलाता चलता है। कई तरीके की कहानियों से अहंकार कैसे फूलता है मान्यताओं से कहानियों से। मैं यह हूं, मैं वो हूं। मेरे साथ ऐसा हुआ था। मुझे आगे यह करना है। अतीत ऐसा है। भविष्य के ऐसे सपने हैं। यही सब बातें मेरी यह पहचान

23:55 है। इस तरीकों से मुझे वहां चोट मिली। मुझे आगे बदला लेना है। ये सब अहंकार की कहानियां इन्हीं को लेके वो फूलता है। तो अहंकार हमेशा रहेगा। बस वो यह कर सकता है कि वो अपना यह बोझा उतारता चले। हम संतों ने कहा है भूले मन समझ बूझ लाद लदनिया। अपना जो जो लाद रखा है उसको उतारते चलो। ट्रेवल लाइटली हल्के होते चलो। जब भी मनुष्य कोई कुछ करेगा वह वास्तव में करने वाला उसका अहंकार ही है। मैं कैसे अपवाद हो सकता हूं? मैं कैसे हो सकता हूं? प्रश्न यह है कि उस अहंकार की गुणवत्ता क्या है? वो क्या करना चाह रहा है? अब कबीर साहब हैं। उनकी हर साखी में, हर दोहे में उनका नाम आता है तो आप क्या बोलोगे?

24:41 तो वो अपनी ब्रांडिंग कर रहे हैं। भगवत गीता में श्री कृष्ण अपने आप को कहते हैं कि भाई तू मेरी शरण में आ जा मामेकम शरणम व्रज तो आप क्या बोलोगे? वो अपना व्यक्तिगत अहंकार दिखा रहे हैं कि बाकी सबको छोड़ तो यही बोलते हैं कि सारे धर्मों का त्याग करके अर्जुन मात्र मेरी शरण में आ जाओ। तो कोई बिल्कुल कह सकता है कि ये तो अपने आप को व्यक्तिगत रूप से सबसे श्रेष्ठ घोषित कर रहे हैं। इसी तरीके से आप आप किन्हीं भी संत कवियों के पास चले जाइए। उनकी रचनाओं में उनका अपना नाम मौजूद होता है। तो ये कोई व्यक्तिगत ब्रांडिंग हो रही है। नहीं ये कुछ व्यवहारिक कदम है जो उठाने पड़ते हैं ताकि उनकी जो रचना है उसकी शुद्धता बची रहे। एकदम याद करिए हमने शुरू में ही क्या कहा था कि धर्म बड़ी नाजुक चीज है। सत्य हम कह

25:27 देते हैं सत्य में उजते पर व्यवहारिक जगत में सत्य एक कोमल सुंदर फूल या नवजात बच्चे जैसा होता है। उसकी बड़ी रक्षा करनी पड़ती है। तो उसकी रक्षा करने के लिए कुछ व्यवहारिक कदम उठाने पड़ते हैं। तो उसमें यह सब बात आती है कि आपने अपना कोई दर्शन सामने रखा है तो आप उसके साथ अपना नाम रख देते हो एपी फ्रेमवर्क। नहीं रखोगे तो उसका वैसे ही दुरुपयोग हो जाएगा। जैसे इतने न जाने धर्म ग्रंथों को हुआ। कोई उसको उठा करके उसमें न जाने क्या मिला करके क्या-क्या कर सकता है। ये हुआ तो है इतिहास की पूरी धारा में हमने होते तो देखा है। श्रुति है। हम सनातन धर्म के केंद्र में श्रुति ग्रंथ आते हैं। उनको हमने पीछे छोड़ दिया। उसकी जगह हम और न जाने क्या-क्या पढ़ने लग गए और पीछे ही नहीं छोड़ा। हम बहुत अच्छे से जानते हैं कि उनमें हमने कितने बाहरी पराए

26:12 प्रक्षिप्त अंश ला के जोड़ दिए। तो जरूरी होता है कि ये जो नवजात शिशु है ये जो नन्हा कोमल फूल है इसकी रक्षा की जाए और रक्षा ही नहीं की जाए। ये जो बात है इसको आगे बढ़ाया जाए। उसके लिए जो व्यवहारिक कदम उठाने पड़ते हैं वो उठाए जाए। बात आगे बढ़ाने की आपने बात की। एक एक बड़ी वजह शायद मुझे लगता है आपकी बात ज्यादा लोगों तक पहुंचने की ये भी है क्योंकि एक आईआईटी आईआईएम का ब्रांड है और जैसे ही लोग सुनते हैं आईआईटी आईएम तो मान लेते हैं कि हां भाई आदमी पढ़ा लिखा और समझदार तो होगा ही तो जबकि वो सिर्फ एक एग्जाम क्लियर करने की बात है आपने एग्जाम क्लियर किया कई लोगों को मौका नहीं मिला होगा वो नहीं कि उन्होंने किया कई लोग नहीं कर पाए तो यह

26:57 अह ये ये भी तो समाज में कमजोरियां ही है ना कि इस तरह का ब्रांड लगा देना किसी के साथ कि भाई इस कॉलेज से निकले इसलिए हो सकता है आप आईआईटी आईएम से नहीं होते तब भी आप यही बात कर पाते। भारत में उल्टा चलता है। हम आप ज्यादातर उन लोगों को देखिए जो धर्म हम के ऊंचे शिखरों पर आज जमकर बैठे हुए हैं। ज्यादातर उन लोगों को देखिएगा और बताइएगा कि क्या वो आईटीआईएम है? लोग अगर आईटीआईएम देख रहे होते तो ऐसों के पास क्यों जाते जो छठी फेल हैं? नहीं वह दूसरे वाले लोग हैं। यह आईआईटीआईएम के पास वो लोग जा रहे हैं जो खुद एमबीए वगैरह नहीं नहीं ऐसा नहीं है। मेरे पास बहुत साधारण वर्ग से लोग आ रहे हैं। ऐसा नहीं है कि मेरे पास कोई इलीट इंटेलेक्चुअल्स

27:42 सी आ रहे हैं। आपने जो उदाहरण दिया वो एकदम उल्टा पड़ रहा है। हम आप ये सारे लोगों को देखिए जिनको आप कहोगे कि ये धर्म के प्रतिनिधि हैं। सारी भीड़ तो वहां लग रही है। मुझसे कई कई कई गुना ज्यादा लोग आपको वहां पर मिलेंगे। लोगों में अगर आईआईटी आईएम की कद्र होती तो वो यहां होते ना वहां क्यों होते? आईआईटीआईएम से उल्टा पड़ता है। मुझ पर आक्षेप लगाया जाता है। आप किसी धार्मिक परंपरा से तो आते नहीं। आप किस आश्रम से आए हैं? आपके गुरु कौन है? वो तो वो लोग लगाते हैं ना जो उस नहीं ये सभी पूरा समाज लगाता है क्योंकि ये पूरा समाज ऐसा है। तभी तो मुझे काम करने की जरूरत पड़ रही है। ये समाज सही होता। तो मैंने टेक्नोलॉजी और मैनेजमेंट और यूपीएससी ये इसलिए थोड़ी करा था कि मैं एक दिन बैठकर के लोगों को गीता पढ़ाऊंगा। फिर समाज की दुर्दशा देखी तो मैंने कहा यही सबसे जरूरी काम है यही करना पड़ेगा जो

28:28 टेक्नोलॉजी का काम है वो करने के लिए और भी सक्षम लोग हैं मैनेजमेंट के लिए और भी लोग हैं पर यह काम कोई करने वाला नहीं है तो मुझे अपने हाथ में लेना पड़ेगा आज की दुर्दशा देखिए आपको इसमें मजा आने लगा है ऐसा भी तो हो सकता है मजा कहां से आ जाएगा आप मैं वहां पर होता जो आम कामनाएं होती हैं हर आदमी की होती हैं वो कामनाएं पूरी कर रहा होता आप मुझे आज देख रहे हैं आप मुझसे 23 साल बाद मिलने आए हैं मेरे एमबीए के क्या आपको पता पता है कि उसके बाद की मेरी 15 साल की यात्रा कैसी रही थी? क्या मजेदार रही थी? नहीं पर नहीं हो सकता है दुनिया की नजर में मजेदार ना हो। आपको मजा आ रहा हो लोगों को कई चीजों में अगर मुझे मजा आ रहा हो तो इसी से सिद्ध हो जाता है कि मैंने जो काम करा उसका आईआईटी आईएम से कोई ताल्लुक नहीं था। उसका मेरे व्यक्तिगत संतोष से मेरी व्यक्तिगत ईमानदारी से ताल्लुक था। कि मैंने कहा कि

29:13 कोई नहीं आ रहा है मुझे सुनने के लिए तो भी जो सच्चा काम है वो मुझे करने दो। और इस सच्चाई के कारण मेरे पास लोग आए हैं। आईटीआईएम की वजह से आपकी बात अगर मैं मान भी लूं कोई आ भी जाएगा तो टिकेगा नहीं। मैं उनसे रोज बात कर रहा हूं। वो मुझे रोज परख रहे हैं और मेरी सारी बात जिज्ञासा पर प्रश्नों पर प्रयोग परीक्षण पर आधारित है। मैं कहता हूं दुनिया को परखो। खुद को परखो और जो तुम्हें खुद को परखने को कह रहा है उसको भी परखो। आप भी तो बैठकर मुझे परख ही रहे हैं ना। तो आईआईटी आईएम होने से ऐसा थोड़ी होगा कि आप कहेंगे कि नहीं नहीं नहीं आपके पास वो 23 साल या 25 साल पुरानी डिग्रियां हैं। आपने तब ये किया था यूपीएससी क्लियर किया था तो आप जो भी बोल रहे हैं महाराज वो सर्वमान्य है। ऐसा तो कुछ नहीं है। मेरी तो रोज परीक्षा होती

29:58 है। जितनी किसी आम आदमी की नहीं होती। जितनी ना तो यूनिवर्सिटी में बैठे फिलॉसफी के प्रोफेसर्स की होती। जितनी ना तथाकथित बाबाओं की होती। सबसे ज्यादा परीक्षा मेरी ही होती है। मुझे उस परीक्षा से रोज गुजरना पड़ता है। 25 साल पहले मैंने जो परीक्षा उत्तीर्ण की थी वह मेरे काम नहीं आ रही है। मैं आज आपके सामने बैठकर जो परीक्षा उत्तीर्ण कर रहा हूं वो मेरे काम आ रही है। वो 25 साल पहले वाला प्रशांत वो तो प्रशांत रहे होंगे। वो प्रशांत आचार्य प्रशांत के सामने अगर आज बैठ जाए इस कुर्सी पर मेरी जगह तो उससे आप क्या कहेंगे? वो खुश होगा। मैं उसे कहूंगा कि इसको अगर इसके जैसा कोई तुम्हारी उम्र में मिला होता तो इसके लिए मैं अपनी जान दे देता।

30:43 वो खुश होगा आपको देख के। जरूरी नहीं है वो क्योंकि मेरे सामने जो भी आता है मैं सबसे पहले उसकी खुशियों पर ही सवाल उठाता हूं। तो वो मुझे देख के खुश नहीं होते हैं। मैं तो पूछता हूं कि क्या है जिसकी ओर भरे जा रहे हो? क्या तुम्हारी कामनाएं हैं? क्या सोचते हो कि पा लोगे तो सुख मिल जाएगा। आओ उसको परखते हैं। मैं नहीं कहता कि वो गलत है। पर आओ परखते हैं। और परखने का काम तुम खुद करोगे। मैं बस एक माहौल बनाऊंगा जिसमें तुम परख पाओगे। मैं तुम्हें आईना दिखाऊंगा। आंखें तुम्हारी होंगी, चेहरा तुम्हारा होगा। तुम्हें ही देखना है। हां, इस आईने को देखने के बाद अगर तुम भाग जाते हो तो तुम मुझसे नहीं भागे हो। तुम उससे भागे हो जो तुम्हें इस आईने में दिखाई दिया है। यही बात मैं उस प्रशांत से भी बोलता। लेकिन एक बात पक्की है जैसा वो था मुझे जैसी उसकी स्मृति है आईआईटी वाले प्रशांत की हम उसको अगर इसके जैसा कोई

31:31 मिला होता तो बहुत आसान हो जाती जिंदगी उसके लिए मुझे बहुत भटकना पड़ा मुझे बहुत ज्यादा संघर्ष करना पड़ा अब जाकर के मीडिया की नजरों में आने लग गया हूं अज्ञातवास था बहुत लंबा अज्ञातवास था मैं बहुत लोगों को छोड़ दीजिए जो मेरे बैच के मेरे साथी थे। मैं उनसे भी कटा हुआ था और यह वह समय होता है जब आम आदमी अपनी जिंदगी देख रहा होता है। करियर देख रहा होता है। कहां-कहां आगे बढ़ रहा होता है। ये सब कर रहा होता है। इसलिए कटे हुए थे कि देखना नहीं चाहते थे वो। नहीं मैं मैं समझ रहा था। मैं पढ़ रहा था। मैं एक छोटे समूह के साथ होता था। उनसे बातें करता था। मुझे कोई जल्दी नहीं थी कि मैं बड़ा हो जाऊं। बड़ा मिशन चला दूं। लोगों के सामने आ जाऊं। मैं पहले ईमानदारी और वो लोग भी आपसे संपर्क करने की कोशिश

32:17 नहीं करते थे। देखिए उस समय पर WhatsApp ग्रुप्स वगैरह इतने ज्यादा चलते नहीं थे। हम तो ईमेल वाली चीज थी या कोई फोन कर ले तो और वो सब ज्यादा तब होता है जब कामनाओं के तार जुड़े होते हैं आपसे। दो चार जो मेरे निकट के दोस्त थे उनसे बातचीत होती रहती थी। बाकी गेट टुगेदर्स हैं, रीयनियंस हैं ये सब हो रहा है या कि नेटवर्किंग है। इससे मैं बिल्कुल दूर चला गया था। तो बहुत कम संपर्क रह गया था। दो-चार लोगों को छोड़कर के जो अपने बहुत निजी दोस्त होते हैं उनको छोड़ कर के। वो निजी दोस्त नहीं कहते थे कि क्या कर रहे हो? अरे खूब कहते थे रोज कहते थे। कहते थे क्या तुम्हारा पोटेंशियल था? क्या तुम्हारा टैलेंट था? भारत में तीन आई होते हैं। हम आईआईटी आईएम आईएस हां बोलते थे कि सब निकालने के बाद अब तुम

33:03 ये कहां भटक रहे हो? ये कौन सी किताबें पढ़ रहे हो? बहुत सारी किताबें तो मैं वो पढ़ रहा होता था जो आसानी से मिलती नहीं थी। हम किताबें लाने के लिए 5 700 कि.मी. जा के कहीं पर रुक के दो चार दिन वह किताब लेकर के आता था। क्योंकि जो मूल ग्रंथ है वह मिलता नहीं था। और मेरी दीदी यह थी कि मुझे मूल बात तक पहुंचना है। और और ऐसा कोई उतावलापन नहीं था कि आचार्य कहलाऊं और करोड़ों लोगों तक पहुंचूं और ये हो और वो हो। इसीलिए लगभग 40 42 की उम्र तक भी बहुत कम लोग मुझे जानते थे। क्योंकि मैंने कोई बहुत कोशिश ही नहीं की कि इतना मैं प्रचार करूं अपना। आज तो बदनामी भी होती है कि प्रचार बहुत करते हैं। प्रचार बहुत करते हैं। कोई यह नहीं पूछता कि अगर प्रचार ही करना होता तो तब करते ना

33:49 जिस ऐज में लोग एंटरप्रेन्योरशिप करते हैं और स्टार्टअप्स चलाते हैं। जिस ऐज में जवान कामनाओं का उबाल रहता है। तब तो यह आदमी कहीं छुप कर बैठा हुआ था। हिमालय पर जाकर के 5 10 20 लोगों के साथ अपने छोटे-छोटे शिविर लगाता था। दो दिन को जाता था। वहां 10 दिन के लिए पड़ा रहता था। जब इंसान में महत्वाकांक्षा होती है तब तो इस बंदे ने कुछ करा नहीं हमारे सामने नहीं आता है। अब सामने क्यों आ रहा है? अब सामने इसलिए आ रहा है क्योंकि दिखाई पड़ रहा है कि तुम्हारी एक जरूरत है जिसको मैं पूरा कर सकता हूं। मैं तुम्हारे लिए तुम्हारे सामने आ रहा हूं। मैं प्रचार कर रहा हूं। तुम्हारे पीछे जा रहा हूं। तुम्हारी खातिर तुम्हें बचाने के लिए। अब वो कहते हैं आपको कि सही थे आप? कौन? जो लोग कहते थे कि क्या कर रहे हो? हां। जिनको पता है कि क्या कर रहा हूं जो आए

34:36 हैं जिन्होंने मेरी किताब पढ़ी है सत्र सुना तो उनको तो पता है ही बाकी जो अब कहने लग जाए कि तुम सही हो वो ज्यादातर इसलिए कहते हैं क्योंकि उनको लगता है कि अब सांसारिक अर्थ में भी सफलता मिल गई है तो वो ये देख के कहते हैं कि हां हां बढ़िया किया बढ़िया किया 10 15 साल पहले या 20 साल पहले कोई नहीं कह रहा था कि बढ़िया किया तब तो यह होता था कि अपनी जिंदगी खराब कर ली इसने सब छोड़छाड़ करके ये देखो क्या कर रहा है? ये कौन से ये स्पिरिचुअलिटी ये फिलॉसफी ये लिटरेचर ये पढ़ा हुआ है ना पैसा कमा रहा है ना कपड़ों का ख्याल है ना शरीर का ख्याल है बीमार हो जाता है। कोई इसे जानने वाला नहीं कोई सुनने वाला नहीं। ये बार-बार सुनने को मिलता था कि प्रशांत क्या तुम्हारा टैलेंट था? क्या तुम कर सकते थे? और ये तुम कहां ये छोटी-छोटी चीज में छोटे-छोटे लोगों के बीच में फंस गए हो। ये क्या कर रहे हो? ये

35:22 बहुत सुना है। मैंने 10 साल 15 साल सुना है। तो ये सांसारिक अर्थ में जो सफलता है वो गलत क्यों है? नहीं गलत नहीं है। बस बात यह है कि उस संसार से आपका रिश्ता क्या है? मैं भी सफलता पाना चाहता हूं। पर उस रिश्ते की जो मैंने परिभाषा रखी है वो बहुत साफ है। मेरी सफलता इसमें है कि आप ऊपर उठे और एक सफलता ये हो सकती है कि आप यहां आए हो तो आपको लूट ही लूंगा। हम तो सफलता गलत नहीं है। सफलता की परिभाषाएं गलत होती हैं। धर्म वो है जो आपको सफलता की सही परिभाषा सिखाए। तो कितने आप ये नहीं देखते कि कितने लोगों को आपने ऊपर उठाया। वो क्यों नहीं देखते अभी शुरुआत में ही तो आंकड़े आपके साथ नहीं तो मतलब वो मैं जो आपने बताया वो वो उसको आप पैमाना मानते हो बिल्कुल वो बिल्कुल पैमाना है ना अगर इतने लोग हैं जिनको दुख है तो गिनती तो करनी

36:09 पड़ेगी ना कि कितनों को बचा पाए और वो गिनती ही है जो जो मैं साफ कहूंगा एनलाइटेंट तो हूं नहीं मुझे तनाव में भी रखती है हम कि इतनी बड़ी पृथ्वी है और इतना कम समय बचा है और अभी इतने लोगों तक पहुंचना बाकी है अंधेरा बहुत गहरा है और मेरे पास एक बहुत छोटा सा दिया है तो और बाकी इतने आचार्य प्रशांत क्यों नहीं बना देते जो फिर यह और मैसेज पहुंचे। एक को बनने में लगे हैं 25 साल। दूसरों की तैयारी चल रही है। पर क्या बोला था? सत्य नवजात शिशु जैसा होता है। हां। धीरे-धीरे रे मना धीरे सब कुछ होए और माली सींचे 100 घड़ा ऋतु आए फल होए। तो वक्त लग रहा है। बहुत बहुत मेहनत लग रही है। उद्देश्य तो

36:54 यही है कि किसी आचार्य प्रशांत की कोई जरूरत ही ना रहे आगे। हर व्यक्ति स्वयं अपने लिए एक आचार्य बन जाए। अपदीपो भव मेरे जैसे किसी की कभी कोई जरूरत ही ना पड़े। तो ये नहीं जैसे कई लोग कहते हैं ना कि ये ऐसा तब होता है जब कोई नाकाम इश्क होता है। आपका कोई नाकाम इश्क था क्या? था क्या? आज भी है। लेकिन जैसे हमने कहा कि सफलता की परिभाषा समझनी जरूरी है। वैसे ही इश्क की परिभाषा जरूरी है। हम सब आशिक ही पैदा होते हैं। हम सब आशिक ही पैदा होते हैं। आशिक कौन है? आशिक कौन है जिसको अपने महबूब से दूरी बर्दाश्त नहीं होती। बच्चा पैदा होते ही क्यों रोता है? आदमी कोई भी क्यों नहीं

37:41 चैन से जी पाता, खा पाता, सो पाता। क्योंकि कोई है जिससे हमारी दूरी है। ज्ञानियों ने कहा है कि प्रत्येक मनुष्य विरह में है। कोई है जो हमसे दूर है। कौन है जो हमसे दूर है? वही जो होने के लिए हम पैदा हुए हैं। वही जो हमारी उच्चतम संभावना है। तो आशिक तो मैं हूं ही। और ये जो इश्क शब्द है, प्रेम शब्द है, यह मेरे दर्शन के बड़े केंद्र में है। लोग सोचते हैं कि यहां तो ज्ञान की बात चल रही है। नहीं, यहां प्रेम की ही बात चल रही है। यहां प्रेम की ही बात चल रही है। और वो प्रेम अगर नहीं है, तो ज्ञान काम भी नहीं आता है। प्रेम का अर्थ होता है मैं अपना शुभेच्छु खुद हुआ। जैसे किसी से प्रेम करते हैं तो उसका कल्याण चाहते हैं ना। तो प्रेम की पहली परिभाषा यह है कि मैं अपना

38:26 कल्याण चाहूं। हम अपना ही भला नहीं चाहते। तो प्रेम तो बहुत बहुत जरूरी है। नाकाम हां नाकाम इस अर्थ में कि वह जो मंजिल है उस तक कभी पूरी तरह पहुंचा नहीं जा सकता। तो थोड़ी तो दूरी हमेशा बनी रह जाएगी। लेकिन उस दूरी के कारण कशिश भी आकर्षण भी आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा भी लगातार बची रह जाती है। वो प्रेम ही जीवन की यात्रा है। और कुछ हद में आपने बिल्कुल सही कहा कि वो आखिरी सांस तक रह तो नाकाम ही जाना है। मनुष्य योनि में पैदा हुए हो तो वो नाकामी बर्दाश्त करनी पड़ेगी। नहीं मतलब कोई लड़की नहीं थी। लड़की देखिए आधी आबादी दुनिया की लड़कियों की ही है। तो अगर यहां बैठा कोई भी पुरुष यह कहेगा कि उसके जीवन में कभी कोई स्त्री महिला

39:14 लड़की नहीं आई तो या तो उसके साथ कुछ समस्या है या फिर वो बड़ा पाखंडी है। झूठ बोल रहा है। तो मुझे क्या पड़ी है ये कहने की कि मेरे जीवन में कभी कोई लड़की आई ही नहीं। कोई साधारण इंसान हूं। जैसे सबके आते हैं वैसे ही आए थे। लेकिन ये जो एक होता है ना एक परिवार होता है जब पत्नी होती है बच्चे होते हैं जो जो साथ में जो इमीडिएट फैमिली जिसको कहते हैं वो कहते हैं ईगो को चेक में रखती है वो आपके पास नहीं है तो फिर ईगो कैसे चेक में रहता है दुर्योधन की ईगो को धृतराष्ट्र चेक में रख रहे थे या गांधारी चेक में रख रही थी कृष्ण बच्चे पत्नी तो रख लेते

40:00 रख रहे थे क्या सच सचमुच कर्ण कर्ण दुर्योधन की ईगो को चेक में रख रहे थे। दुशासन और शकुनी दुर्योधन की ईगो को चेक में रख रहे थे। तो ये धारणा कि नहीं नहीं नहीं इंसान के अहंकार को घर वाले थोड़ा थोड़ा कम रखते हैं। ये धारणा बड़ी गड़बड़ है। घर वालों का तो कुछ हद तक स्वार्थ होता है कि इस व्यक्ति का एक अहंकार एक भ्रम इसका भीतरी एक अंधेरा बचा रहे। हम संत कहते हैं कि जब आप साधु दरस को जो चले यह अटकावे आनी और ये कौन-कौन है जब गिनाते हैं कहते हैं कि मात-पिता सुत बांधवा आलस बंधु का माने

40:45 आनाानी कहते हैं साधु दर्श को जब चले ये अटकावे यानी कि आप अगर साधु दर्शन को जाएंगे जहां अहंकार कम होता है तो यह लोग हैं जो आपको रोकेंगे मात पिता सुत मैं नहीं कह रहा हूं ये ज्ञानी ियों ने बात कही है तो यह सोचना कि परिवार अहंकार को कम करता है। नहीं आपके अहंकार को वो लोग कम करते हैं जिनके साथ आपने रिश्ता ही ईमानदारी का बनाया हो। परिवार में भी ईमानदारी का रिश्ता हो सकता है और हम चाहते हैं कि ऐसे परिवार बने जिसमें परिवारजनों के मध्य वास्तविक प्रेम का और ईमानदारी का रिश्ता हो। तो आपका है ईमानदारी का रिश्ता। बिल्कुल जिनके लिए आप आचार्य प्रशांत नहीं। सिर्फ प्रशांत नहीं मैं आचार्य प्रशांत हूं तो उससे ईमानदारी कम कैसे हो जाती है? मेरी गीता कम्युनिटी है। लाखों लोग हैं। ये कोई मुझे ढील नहीं देते। ये मेरे साथ जरा भी रियायत नहीं करते। ये कड़े से कड़े सवाल करते हैं मुझसे। तो मैं तो कहता हूं ये

41:32 परिवार है मेरा। आओ मुझसे पूछो। नहीं पूछते तो बल्कि मैं कई बार डांट देता हूं। मैं कहता हूं ये सब नहीं चलेगा। आचार्य जी प्रणाम वगैरह। पांव झुक के छूने लग जाते हैं। पांव छूना मना है। मैं कहता हूं हाथ मिला लो। गले मिल लो। लेकिन यह सब नहीं होगा कि मैंने जो बात बोल दी वो तुमने बस मान ली। तुम्हें अपने जीवन को खुद परखना है। तुम परखने वाले हो मेरी भी बात को। अगर तुम ऐसे माने ले रहे हो कि तुमने बस मान्यता बना लिया, धारणा बना लिया तो अंधविश्वास बना लिया तुमने मेरी बात को। तुम्हें परखना होगा। वो मुझे परखते हैं। मैं लगातार उनको परखता रहता हूं। रोज उनकी परीक्षा होती है। रोज माने जब भी मैं सत्र नहीं ले रहा लाइव तो तब उनकी लगातार परीक्षा होती है। अभी कल रात को भी उनकी परीक्षा हुई थी। और परीक्षा ऐसी होती है कि जिसमें छह विकल्प होते हैं हर प्रश्न के। छह में एक भी सही हो सकता है। छह में

42:18 छह भी सही हो सकते हैं। छह में दो भी सही हो सकते हैं। छह में पांच भी सही हो सकते हैं। सही विकल्प नहीं चुनोगे तो भी नंबर कटते हैं। गलत विकल्प चुनोगे तो भी नंबर कटते हैं। एमसीक्यू नेगेटिव मार्किंग है। सिर्फ नेगेटिव मार्किंग वाले नहीं है। एमसीक्यूस विद ऑल परम्यूटेशंस कॉम्बिनेशंस पॉसिबल। और नतीजा यह होता है कि हमारी जो दो तिहाई कम्युनिटी है आधे से ज्यादा जो हमारा छात्र वर्ग है उन बेचारों के नेगेटिव में भी नंबर आ जाते हैं। तो जब नेगेटिव में नंबर आते हैं तो किसी को अच्छा तो लगता नहीं है ना। फिर वो भी आकर मुझे परखते हैं। हमारी तो सारी बातचीत ही प्रश्नोत्तरी के तौर पर होती है। क्यूएनए फॉर्मेट है। आओ पूछो। और एक पूछता है दूसरा उस पे फिर प्रति प्रश्न करता है काउंटर क्वेश्चन करता है पूरी एक श्रृंखला बन जाती है तो ऐसा कुछ नहीं है कि मुझसे

43:05 खरा सवाल बस वही कर सकता है मैं जिसके लिए प्रशांत हूं और जिसके लिए आचार्य प्रशांत हूं वो वो खरा नहीं कर सकता बल्कि बात शायद उल्टी है जिसके सामने मैं आचार्य बनकर खड़ा हो गया उससे अब मेरा रिश्ता सफाई का होगा और जिसके साथ मैं कह दूं कि साहब रक्त संबंध है इसलिए तुम मेरे हो तो रक्त संबंधी तो बहुत रहे आते रक्त संबंधियों के साथ ईमानदारी का और खरेपन का रिश्ता हो जरूरी नहीं है। बल्कि देखने में यह आता है कि जो हमारे छात्र बन जाते हैं कई बार उनके पूरे परिवार हैं जो आ जाते हैं हमारी कम्युनिटी में और फिर वो कहते हैं कि अब हम में आपस में परिवार में माहौल ही बदल गया है। पति-पत्नी के बीच में रिश्ता साफ हो गया है। सुंदर हो गया है। प्रेमपूर्ण हो गया है। बाप बेटे के बीच में रिश्ता साफ हो गया है। वो रिश्ता

43:50 साफ होता है धर्म के पास आकर के। आपने जो प्रश्न पूछा उसमें यह भाव था कि अगर निजी रिश्ता है जिसमें एक दूसरे से फर्स्ट नेम बेसिस पर बात कर रहे हैं कि मैं प्रशांत वो सुनीता तब तो खराबन रहेगा लेकिन जैसे ही कह दिया आचार्य माने जैसे ही वहां पर धर्म आ गया तो वहां पर कुछ नकली आ जाएगा पाखंड हो जाएगा आपकी बात सही है। अगर पाखंड की नियत हो लेकिन अगर आचार्य के आने से वास्तविक धार्मिकता आती है तो उससे रिश्ते में खरापन आता है। सफाई आती है। एमसीक्यू की आपने बात की तो आपको आप भी देखते होंगे यह सब जो चल रहा है एक कॉम्पिटिटिव एग्जाम लोग आप तो आईआईटी आईएमआईएस आप ने उस समय

44:37 कर लिया अब जो भी चल रहा है ये कोचिंग सेंटरों का एक पूरी इंडस्ट्री है और एक इस देश में एक युवा की जिंदगी का बहुत बड़ा हिस्सा इस पूरे कामझाम में निकल जाता है और फिर वो पेपर लीक हो जाते हैं। फिर वो प्रोटेस्ट हो जाते हैं। ये क्या क्या अंत है इसका? कोई अंत नहीं है। कोई अंत नहीं है। यही मनुष्य जीवन की विडंबना है ना। इसका कोई अंत नहीं है। मृत्यु है। मृत्यु कुछ नहीं है। यही करते रहोगे। जिनों जिनसे पेपर पास नहीं हुआ। चाहे उनमें क्षमता की कमी हो, प्रतिभा की कमी हो या उनके साथ अन्याय हो गया हो, पेपर लीक हो गया हो, कोई वजह हो। स्थितियां अनुकूल नहीं थी। कोई वजह हो। उनकी हालत उनसे कोई बहुत बदतर थोड़ी होती

45:22 है जिन्होंने पेपर पास कर लिया। उनको तो ऐसा लगता है ना? लगता है उस वक्त लगने का क्या है? हमें तो कुछ भी लगता है। आदमी नशे में हो तो उसको लगता है आठ उंगलियां हैं। लगने से क्या हो जाता है? तो मनुष्य जीवन की विडंबना यही है कि हमें कुछ पता नहीं हम कौन है। हमारे लक्ष्य कहां से आ रहे हैं? मैं किसी एग्जाम को लिख क्यों रहा हूं। मैं किसी कामना के पीछे भाग क्यों रहा हूं। किसी चीज को, किसी ऑब्जेक्ट को मैंने अपना लक्ष्य बना कैसे लिया? मुझे कैसे पता कि कोई काम करना जरूरी है, कोई मंजिल पानी जरूरी है? मैं एक प्रश्न अक्सर पूछा करता हूं। मैं पूछता हूं अगर तुम्हें कोई बताता नहीं कि क्या करना है? तो क्या तुमने वही सब कुछ किया होता जो तुमने किया? और बताने से मेरा आशय यह नहीं कि राह दिखाई, प्रकाश दिखाया।

46:10 बस बता दिया कि ऐसे करना होता है। एक तरह से आदेश दे दिया कि अगर तुमको यह सब अपने माहौल से नहीं मिला होता तो तुम करते। फिर इसी का मैं एक और आपने खुद किया आईआईटी आईएमआईएस बिल्कुल करा बिल्कुल मैं खुद एक उदाहरण हूं। मैं आम आदमी हूं। मैं आप लोगों से ही उठा हूं। हां तो ये बताया जाता है ना कि भ जिंदगी इतनी बढ़िया हो जाएगी एक बार बस आईआईटी से निकल जाओ। हां हां हां हां हां तो अगला जो उसमें फिर मैं और प्रश्न पूछता हूं जो तीखा पड़ता है कि अपनी जिंदगी के जो सबसे बड़े-बड़े फैसले हैं वो लिखना जरा जिनको तुम कहते हो कि ये हैं असली फैसले ये करना ये करना पूछता हूं अगर समाज में यह सब फैसले ना लिए जा रहे होते पहले से तो क्या तुम भी यह फैसले लेते अगर तुम्हें ना बोला गया होता इन तरीकों से जीना है तो क्या तुम अपने विवेक अपनी

46:56 प्रज्ञा पर चलकर के यह सब कुछ करते और बिल्कुल सभागार में सन्नाटा खींच जाता है। उत्तर आता है कि नहीं नहीं नहीं हमने तो जो कुछ करा है वह दूसरों की देखादेखी करा है। दूसरों ने बता दिया और हमें कभी यह छूट भी नहीं दी गई कि तुम इन मुद्दों पर सवाल उठा पाओ। पैदा होते ही आपकी जाति तय हो जाती है। धर्म तय हो जाता है। आप स्कूल में जाते हैं वहां सिलेबस पहले ही किसी और ने तय कर रखा होता है। आप बड़े होकर के क्या करेंगे? वह भी बताने के लिए इतनी सारी ताकतें हैं जो लगातार आपके कान में चिल्ला रही हैं। अब 25 के हो गए हो तो यह करना है। अब इतना करना है। अब यह होना चाहिए। अब बच्चों को स्कूल में डाल दो। अब ये कमाओ। अब इतना घर ले लो। उसकी ईएमआई दे दो। अब बूढ़े हो जाओ। फिर बच्चों की अब शादी कर दो। सबको चाहिए ना कि कोई बता दे। हां। सबको चाहिए। कोई बता दे क्या करना है।

47:42 नहीं नहीं सबको बता रखा है। बस एक चीज नहीं बताई गई है कि तुम्हें जरूरत ही नहीं थी कि कोई तुम्हें बताए। वह बच्चा बेचारा असहाय है, दुर्बल है। आप उसको इतना कुछ पहले ही बता देते हो। तुम इस जाति के हो, इसलिए श्रेष्ठ हो या तुम इस जाति के हो इसलिए अश्रेष्ठ हो। नहीं अगर जरूरत ही नहीं तो आपके पास भी क्यों आए लोग? मेरे पास कुछ सीखने नहीं आते। कुछ छोड़ने आते हैं। जो उनको पहले से बता दिया गया है। उसका खंडन सुनने आते हैं। वेदांत की पूरी प्रक्रिया ही नकार की है। नीति नेति की है। मैं उन्हें कुछ नहीं देता। मैं कहता हूं मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ नहीं है। आचार्य प्रशांत की शिक्षाएं जैसी कोई चीज होती ही नहीं। मैं तुम्हारे सामने बस दर्पण रखता हूं जिसमें तुम देख पाओ कि तुम्हारे चेहरे में कितना कुछ उधार

48:28 का है और फिर तुम्हें लगे कि उधार की चीज ठीक नहीं तो उसको त्याग देना। मैं उन्हें कुछ नहीं देता। मेरे पास इसलिए नहीं आते कि मैं भी उन्हें कुछ बताऊं कि नहीं ऐसे करो, ऐसे जियो, ऐसा खाओ, ऐसा पहनो, इतने बच्चे करो कि नहीं करो, ये नौकरी करो। कोई रास्ता नहीं दिखाता। मैं कौन होता हूं किसी को रास्ता दिखाने वाला? मैं तो बस कह रहा हूं कि तुम न जाने कितने रास्तों पर पहले ही चल रहे हो। क्या मैं आकर उन रास्तों पर थोड़ा प्रकाश डाल सकता हूं? ताकि तुम्हें पता चले कि किन रास्तों पर चल रहे हो ताकि तुम्हें पता चले कि तुम यह बार-बार किन पत्थरों से टकरा कर गिर रहे हो और तुम्हारा जीवन इतना जख्मी क्यों है? मैं प्रकाश की तरह आता हूं। किसी विषय की तरह नहीं आता। मेरे पास कोई सीख, कोई सिद्धांत, कोई डॉक्ट्रिन नहीं है। मैं उन्हें बस प्रेरित करता हूं कि आंखें खोलो। प्रकाश संभव है। तुम स्वयं जान सकते हो, स्वयं जी सकते हो। नहीं। जैसे जैन धर्म के बारे में तो मैं

49:14 ज्यादा जानता नहीं। मैं तो खैर किसी भी धर्म के बारे में ज्यादा नहीं जानता। लेकिन उसमें कहा जाता है कि अ जैन धर्म में बच्चों को यह बोला जाता है कि कोई आपको बचाने नहीं आने वाला। कोई भगवान आपके लिए कुछ नहीं कर देगा। करना आपको खुद ही पड़ेगा। तो वो सिद्धांत भी लगभग वैसा ही है या नहीं? देखिए ये बात मात्र जैन धर्म में नहीं बोली जाती। ये बात धर्म का ही सार है। जैन धर्म में तो है ही। यह बात धर्म मात्र का ही सार है। तो इतने साल से बता रहे हैं। किसी को समझ में क्यों नहीं आया? सब यही बता रहे हैं कि क्यों तुम यहां पर उलझे हुए हो और दूसरों की बातें सुन रहे हो और ये सामाजिक और शारीरिक बंधनों में फंसे हुए हो। धर्म मात्र का सार मुक्ति

50:01 है। और मुक्ति का अर्थ एक नया ताजा धार्मिक बंधन नहीं होता। मुक्ति माने मुक्ति होता है। धर्म वास्तव में क्या है? विद्रोह है क्योंकि बच्चा पैदा ही बंधन में होता है शारीरिक और आगे उसे और मिल जाते हैं सामाजिक और मनोवैज्ञानिक बंधन। यह बंधन ना हो तो धर्म की कोई जरूरत भी नहीं है। धर्म इन सब बंधनों के प्रति विद्रोह है। धर्म डायनामाइट है कि ये जो बेड़ियां तुमने बांध रखी हैं इनको ब्लास्ट कर दो। तो धर्म अपने आप में आपको कोई गहना नहीं पहना देगा। धर्म अलग से कोई मान्यता नहीं दे देगा। मुझे मालूम है आपका संशय कहां से आ रहा है? क्योंकि हम तो धर्म के नाम पे मान्यताएं ही देखते हैं पूरे समाज में। लेकिन धर्म मान्यता नहीं है। धर्म ऐसा नहीं है कि पुरानी बेड़ी हटा दो और यह नई धार्मिक बेड़ी पहन लो और इसको बोल दो ये आभूषण है। गहना है। ये नहीं है धर्म। धर्म

50:47 विस्फोट है कि पुरानी सारी तुम्हारी जंजीरें कट जाएं, फट जाए, गल जाएं और तुम उन्मुक्त आकाश में उड़ सको। ये धर्म है। धर्म आपको कोई कोई कमांडमेंट देने के लिए नहीं होता है। जैसे हम कहते हैं ना इस धर्म की ये शिक्षा, यह धर्म की यह शिक्षा। वो वास्तव में धर्म के प्रति अनभिज्ञता का प्रमाण है। तो अब देखिए आपने कहा कि हर वर्ग से लोग आ रहे हैं। हर वर्ग में यह लोग समझ रहे हैं। देश की इतनी बड़ी समस्या तो गरीबी है। इतने सालों से रही है। अब जिसको खाने को नहीं है। जिसको रोजगार नहीं है वो क्या सोचेगा इन सब बारे में इन सब चीजों के बारे में? देखिए दो वजहें होती हैं। दो वजह होती हैं कि किसी के पास विपन्नता हो। बिल्कुल। ठीक है?

51:33 पहली बात तो हम बात कर रहे हैं विपन्नता से ऊपर उठने की। हम हम धनाड्य होने की, अमीर होने की बात नहीं कर रहे हैं। मैं जो उत्तर देने जा रहा हूं उसमें। अमीर होना बहुत सारा पैसा अपने पास ही इकट्ठा कर लेना और खुश होना कि अब मेरे पास 10 20, 50 करोड़ हो गया और ये सब है। हम उसकी बात नहीं कर रहे हैं। जब आप गरीब ही कहते हैं तो आपका आशा होता है उनसे जिनके पास आपने कहा खाने को भी नहीं है। हां मतलब जरूरत जो जिसकी जरूरत जिसको हम कहेंगे वाजिब जरूरतें उसकी वो भी नहीं पूरी हो रही है। तो क्यों नहीं पूरी हो रही है? मैं मैं पूछना चाहता हूं। अकाल पड़ा नहीं हुआ है। ऐसा नहीं है कि बारिश नहीं हुई है तो कोई दैवीय कारण है जिसकी वजह से आदमी बिल्कुल कहे कि भूकंप आ गया कुछ और हो गया। ऐसा तो कोई बहुत हमें खास देखने को नहीं मिलता। ऐसा भी नहीं है किसी विदेशी शक्ति का आधिपत्य है तो हम

52:19 कहें कि हम क्या करें दूसरों ने आकर के उपनिवेश बना लिया है तो हम कुछ कर नहीं सकते। ने वो कहते हैं वो पहले बना लिया था तब अब तक झेल रहे हैं। जिन्होंने बनाया था पहले उन्होंने हमारे साथ ना जाने और कितने मुल्कों को आजादी दी लगभग उसी साल और आज वो आर्थिक तल पर भी हमसे बहुत आगे खड़े हैं। पूरा साउथ ईस्ट एशिया आप देख लीजिए। तो वो आज हमसे बहुत आगे खड़े हैं। तो ये कहना है कि हम अंग्रेजों के नीचे थे। इसीलिए हम आज तक भी गरीब हैं। ये बात भी सही नहीं है। तो प्राकृतिक कारण नहीं, दैय कारण नहीं, कोई विदेशी किसी ताकत का प्रभुत्व नहीं। तो सवाल ये उठता है कि भारत आज भी क्यों इतना गरीब है? आजकल तो इसलिए कहते हैं कि वो नेहरू जी कर गए। हां। तो उस समय पर जो पूरा हमारा जो ग्रोथ रेट था मालूम है उसको क्या बोला जाता था?

53:04 हिंदू रेट ऑफ़ ग्रोथ हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ। तो जो अर्थव्यवस्था में जीडीपी की वृद्धि की दर है और धर्म इनमें किसी को कुछ ना कुछ रिश्ता तो दिखाई दिया। मैं मैं उसको 3.5% को जीडीपी की प्रतिवर्ष वृद्धि दर को मैं उसको थोड़ा अपमानजनक मानता हूं कि उसको हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ बोला गया क्योंकि उसमें कहने का भाव ये था कि साहब आप हिंदू हो तो इससे ज्यादा तेजी से आप आगे बढ़ोगे नहीं। लेकिन यहां मैं सहमत हूं कि धर्म में और अर्थव्यवस्था में रिश्ता है। वरना वरना जीडीपी ग्रोथ की दर को धर्म से जोड़कर के व्यक्त नहीं किया जाता। कोई तो बात होगी। यद्यपि वो जिस तरीके से व्यक्त किया गया मैं उससे बिल्कुल सहमत नहीं हूं। मैं कह रहा हूं अपमानजनक है वो। कोई तो बात होगी ना। मैं आ रहा था अभी

53:49 ऋषिकेश से वापस आ रहा था। अभी कुछ दिन पहले की बात है। बरसात के दिन थे। मेरे सामने बाइक चल रही है। काले रंग की बाइक है। उस पर दो लड़के बैठे हुए हैं। दोनों ने काले ही कपड़े पहन रखे हैं। उनकी टेल लाइट नहीं है। उनके पास कोई इंडिकेटर नहीं है। बारिश हो रही है। उन्होंने हेलमेट नहीं पहन रखा है। और वो मेरी गाड़ी चल रही है। उसके आगे बाइक ऐसेसे कर रहे हैं। मुझे भरोसा है उनके पास मेडिकल इंश्योरेंस भी नहीं है। उन्होंने नहीं कराया। यद्यप अब बहुत सस्ता हो गया है। हेलमेट पहन नहीं रखा है। काले कपड़े पहन रखे हैं। इंडिकेटर नहीं है। टेल लाइट नहीं है। बारिश हो रही है। सड़क फिसलन भरी है और आप एक गाड़ी के आगे और हो सकता है उस गाड़ी के ड्राइवर को भी इतनी तेज बारिश थी कि कुछ दिखाई ना दे रहा हो। साफ-साफ। आप ऐसे-ऐसे कर रहे हैं। अगर ये दोनों लड़के गिरेंगे और अस्पताल

54:37 जाएंगे तो क्या इनके परिवार के पास यह पैसा है या इनके खुद के पास इतना पैसा है कि ये बच पाएंगे या कि यह जो आर्थिक बोझ आने वाला है इसको कोई वहन कर पाएगा? मैं एक उदाहरण दे रहा हूं। तो आप समझिएगा कि वो गरीबी की दिशा में कैसे इशारा करता है। बाइक है। बाइक में टेल लाइट नहीं है। हेलमेट नहीं है और यह करा जा रहा है और इंश्योरेंस भी नहीं है। और रात में करीब 1 2:00 बजे का वक्त है। ये क्या हो रहा है? कहीं हम अपनी गरीबी के लिए खुद भी जिम्मेदार तो नहीं हैं। मैं विक्टिम ब्लेमिंग नहीं कर रहा हूं क्योंकि मेरी इस बात को छोटा सा काट करके इसकी क्लिप निकाल करके उसका अनर्थ करना और बदनाम करना बहुत आसान हो जाने वाला है। लेकिन जो सच है उसे कहा जाना चाहिए। क्या वास्तव में भारत में

55:26 इस वक्त अवसरों की इतनी कमी है कि कोई आदमी 2 जून की रोटी भी ना कमा पाए। अमीरी की बात नहीं कर रहा। वो एक अलग चीज है। वो अलग मुद्दा है। लेकिन ऐसा कि मैं कहूं कि मेरे पास साहब पहनने को कपड़ा भी नहीं है। क्या वास्तव में अफसरों की इतनी कमी है? या कहीं ना कहीं हम ईमानदारी से यह भी मानेंगे कि खोट हमारे भीतर भी है। मैं दिन भर मेहनत करता हूं। मुझे बड़ा बुरा लगता है। यहां काम चल रहा था अभी तो मजदूर लगे हुए थे। वो दिन की दहाड़ी कमा रहे हैं और वो वापस जा रहे हैं और उससे देसी कच्ची शराब पी के जितना उन्होंने कमाया है उसका आधा उसमें उड़ा दे रहे हैं और फिर अपनी बीवी से लड़ रहे हैं बच्चों को मार रहे हैं। वो बच्चे की स्कूल फीस नहीं दे रहा है। बच्चे की स्कूल फीस हमने पता चला हमने अलग से दी। क्यों? क्योंकि वो दिन भर मेहनत करता है। हाड़ अपना जलाता है। पसीना

56:12 बहाता है और फिर जाकर शराब पी के धुत लेट जाता है। क्या वास्तव में गरीबी का जिम्मेदार सिर्फ कोई बाहरी कारण है? सिस्टम जिम्मेदार नहीं है। बिल्कुल जिम्मेदार है सिस्टम। क्या सिर्फ सिस्टम जिम्मेदार है? और क्या हम सिस्टम को दोष देते रह सकते हैं? क्योंकि परिस्थितियों पर हमारा तो कोई नियंत्रण होता नहीं ना। कौन कहां पैदा हुआ, किस देश में पैदा हुआ? ये सब संयोग की बातें हैं। क्या हम उनको ही दोष देते रहें? या कि हम अपने गिरेबान में भी झांकेंगे। हम खुद भी दर्पण देखेंगे। ये दर्पण दिखाने का काम धर्म का है। इसीलिए धर्म को मैं पावर्टी का भी एंटीडोट कहता हूं। जिसके जीवन में धार्मिकता आ गई और धर्म धर्म के साथ जो मान्यताएं जुड़ गई हां वो कारण हो सकता है। बिल्कुल बिल्कुल अब आप यह बताओ अभी अब

56:57 हमारा ये पूरा चल रहा है फेस्टिव सीजन चल रहा है ना इसमें आप देखिए किस-किस तरीके से पैसा उड़ाया जा रहा है। आप बताइए क्या है? क्या वास्तव में एक निम्न मध्यम वर्ग के परिवार की ये वरीयताएं होनी चाहिए जिस तरीके से पैसे उड़ाए जा रहे हैं और समय लगाया जा रहा है। ऐसा होना चाहिए क्या? लड़कियां हैं। उनकी भ्रूण हत्या देखिए। भारत की आबादी में अब अभी हम करने जा रहे हैं जनगणना। वही तो अब कहते हैं कि साहब 5000 साल पुरानी संस्कृति है। इतने हमारे संस्कार हैं। कहां है ये संस्कार? क्या कर रहे हैं ये? 5000 साल पुराने जो ग्रंथ हैं वो तो कोई पढ़ना नहीं चाहता। आप सड़क पे जाइए आम आदमी से कहिए कि चार उपनिषद के नाम बता दो वो नहीं बता पाएगा। ये जिस संस्कृति पे चल रहा है हमारा समाज। ये 5000 साल पुरानी

57:42 नहीं है। यह बहुत हालकी है। ये यह तो समझिए कि मुगलिया काल और अंग्रेजों की काल की है जिसको यह बोल देते हैं हमारी प्राचीन संस्कृति है जो सचमुच हमारी है उससे तो आम आदमी का परिचय ही नहीं है उनसे पूछिए श्रुति क्या है उनसे कहिए वृद्धारण्यक उपनिषद श्वेताश्वत उपनिषद वो वो उच्चारित ना कर पाएं तो जो वास्तव में हमारा है वास्तव में पुराना है उसको तो हमसे दूर कर दिया गया है धर्म के नाम पर लोग जाकर के बैठते हैं धर्म गुरुओं के यहां पर क्या वास्तव में उन्हें हमारे मौलिक ग्रंथों से परिचित कराया जा रहा है क्या कहा जा रहा है आओ बैठो और ये हैं हिंदू धर्म के केंद्रीय ग्रंथ इन्हें हम साथ बैठकर पढ़ेंगे जैसे पढ़ा जाता है एक क्लासरूम की तरह पढ़ेंगे और फिर जांचेंगे कि तुम लोग कितनी बात समझ में आई तो जो

58:27 वास्तव में हमारा था हम कहते हैं वैदिक हमारा धर्म है कितनों का परिचय है वेद वेदांत से कहां पढ़ाया जा रहा है वेद वेदांत बल्कि वहां पर जाकर के और दुनिया भर की बातें हो रही हैं मनोरंजन हो रहा है धर्म के नाम पर ये सब चल रहा है और उसमें पैसा भी खूब लग रहा है आम आदमी का और आम आदमी तैयार है पैसा लगाने के लिए कर्जा कर्जा ले ले के रूढ़ियों का प्रथाओं का पालन किया जा रहा है और उसके बाद आप कर्जा चुका नहीं पाते हो। आपकी गरीबी और बढ़ती है। कई बार आत्महत्या तक की नौबत आ जाती है। मैं जानना चाहता हूं कि क्या वास्तव में सिर्फ बाहरी स्थितियां ही जिम्मेदार हैं हमारी गरीबी की। हमारे ही साथ-साथ जो देश आजाद हुए अभी हमने बात करी साउथ ईस्ट एशिया की वो कैसे इतना आगे निकल गए? क्योंकि उन्होंने दो चीजों पर बहुत ध्यान दिया। एक शिक्षा एक स्वास्थ्य।

59:15 इसमें से शिक्षा मेरी रुचि का विषय है। हमने शिक्षा पर ध्यान ही नहीं दिया। हम अंधविश्वासी रह गए। हम मान्यताओं में पड़े रह गए। नहीं तो वो कहते हैं नेहरू जी तो कह रहे थे साइंटिफिक टरामेंट टॉप डाउन पॉलिसी ले ली ना। उन्होंने कहा साइंटिफिक टेंपरामेंट का मतलब ये है कि ऊंचे ऊंचे भवन बनाओ। कि बड़े बां उन्होंने कहा बांध है वो आधुनिक भारत के मंदिर हैं। आईआईटी आईएम आईएससी ये सब बनाओ। तो उन्होंने टॉप डाउन अप्रोच ले ली। उन्होंने ट्रिकल डाउन एक तरह से अप्रोच ली यदि वो वो कैपिटलिस्ट नहीं है पर ट्रिकल डाउन उनकी अप्रोच पर जरूर लागू होता है। प्राथमिक शिक्षा को जो ध्यान और जो बजट जाना चाहिए था वो नहीं गया। नतीजा क्या हुआ? वो कहते हैं वो स्टेट लिस्ट में चला गया। कॉनकरेंट लिस्ट में एजुकेशन बाद में आई। वो स्टेट लिस्ट में चला गया। वो सेंट्रल लिस्ट में चला गया।

1:00:00 उस समय पर देखिए। सब जो राज्य सरकारें थी वो भी नेहरू जी की ही थी। हां। तो तो ऐसा नहीं है कि वो स्टेट लिस्ट की बात थी कि केंद्र कुछ कर नहीं सकता था और कॉन्करेंट लिस्ट है तो कॉकरेंट पर तो फिर केंद्र का भी हक होता है। तो बाद में आया। हां तो तो करा जा सकता था लेकिन करा नहीं गया क्योंकि क्योंकि उनकी नजर ऊंचाइयों पर थी। उन्होंने कहा हमें हैवी मशीनरी चाहिए। हमें ऐसे संस्थान चाहिए लगता है उस उस वक्त के लिए वो सही भी होगा। उनकी बात बिल्कुल सही थी। हमें हैवी मशीनरी चाहिए। हमें आईटी, आईएम, आईएससी चाहिए। लेकिन हमें साथ-साथ प्राइमरी एजुकेशन भी चाहिए थी। वो चूक रह गई। और वो चूक सिर्फ उसी समय नहीं रह गई। हम क्यों सिर्फ नेहरू जी का ही नाम ले रहे हैं? वो चूक चलती ही आ रही है। आज तक चलती आ रही है। आज भी हमारी जो जो प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था है, प्राथमिक माध्यमिक सब ये

1:00:47 एकदम बिल्कुल जजर दुर्दशा में है। तो वो हमारे साथ हुआ है। वो आप फिर नतीजा ये होता है कि वो नीचे से जो छात्र खड़ा होता है वो ऊपर पहुंचता है उसको आप एक उच्चतर शिक्षा दे भी दीजिए। तो भी उसके भीतर बहुत व्यर्थ तरीके की मान्यताएं और संस्कारों के नाम पर कचरा जमा हो चुका होता है। और यही सब आगे चलकर के फिर गरीबी का कारण बनता है। तो मैं नहीं इंकार कर रहा कि गरीबी के बाहरी कारण भी होते हैं। ठीक है? मैं नहीं इंकार कर रहा हूं कि अब सरकार किसी क्षेत्र में कुछ काम ही ना करे। वहां लोग गरीब हो तो निश्चित रूप से सरकार को भी दोष दिया जाना चाहिए। किसी क्षेत्र में ऐसी लूटपाट हुई है पिछले कई सालों में कि वहां कुछ बचा ही नहीं है संसाधन के नाम पर, कैपिटल के नाम पर तो निश्चित रूप से उस लूटपाट को भी दोष दिया जाना चाहिए। मैं तो यह पूछ रहा हूं कि एक

1:01:33 बात बताओ दूसरों को दोष देने से हम बेहतर हो जाएंगे क्या? दूसरों को दोष देने से हमारी गरीबी दूर हो जाएगी। रिजर्वेशन को लोग बोलते हैं कि साहब रिजर्वेशन एक बड़ी वजह है जिससे जाति व्यवस्था भी सीमेंट हो रही है और इंसाफ भी नहीं हो पा रहा। देखिए आरक्षण की व्यवस्था शुरू किनहीं वाजिब कारणों से हुई थी। सबसे पहले हमें स्वीकार करना पड़ेगा। क्यों कह रहा हूं? क्योंकि हम अभी भी अपने अतीत और इतिहास के तथ्यों को साफ-साफ स्वीकारने से हिचकते हैं। सबसे पहले तो स्वीकारना पड़ेगा। जो वास्तविक मूल वैदिक धर्म है उसके दर्शन में वेदों का हिस्सा है वेदांत कोई अलग सी बात नहीं है। वेदांत वेद ही

1:02:19 है। उसमें जाति कहीं आती नहीं बल्कि साफ-साफ जाति का खंडन भी किया गया है। यह अजीब बात है। जाति का समर्थन तो छोड़ो। जाति का खंडन भी किया जा रहा है। कैसे किया जा रहा है? खंडन करने के लिए वह कोई चीज़ उपस्थित होनी चाहिए। तभी तो खंडन किया जाएगा ना। इससे पता क्या चलता है? इससे पता यह चलता है कि जो बाहरी समाज था उसमें किसी ना किसी प्रकार का भेद वर्ण भेद वर्ग भेद कुछ चलता था। कुछ ऊंचनीच कुछ ऊंचनीच ही तो चलती थी। उसके कुछ कारण रहे होंगे। हम और जो वैदिक ऋषि हैं वो ये सब देख रहे थे। तो उसके विरोध में वह कह रहे हैं कि भाई यह सब बातें व्यर्थ हैं। वो तो आपका देह

1:03:05 भाव ही मिटाना चाह रहे हैं। जाति को तो हम कहते हैं कि साहब जाति देह की है। मैं जिसके घर में जिसकी देह से पैदा हुआ हूं उसकी जाति मेरी जाति हो गई। अगर वेदों का दर्शन कह रहा है कि तुम देह हो ही नहीं। ना हम देहास्म का नारा है। तो कहां से जाति बड़ी बात हो गई? कहां से जाति मान्य बात भी हो गई। बड़ी-छोटी भी नहीं मान्य बात भी हो गई। तो वहां से शुरुआत हुई है जहां पर जाति बिल्कुल मूर्खता की बात समझी जाए। लेकिन मनुष्य का अहंकार उसको किसी ना किसी तरीके से दूसरों का शोषण करना है। कभी वर्ग के नाम पर, कभी वर्ण के नाम पर, कभी लिंग के नाम पर, कभी रंग, कभी भाषा के नाम पर, कभी किसी और नाम पर। नाम आते जाते रहते हैं। एक नियत है, एक वृत्त है कि

1:03:52 दूसरे का शोषण कर लूं। यही तो अहंकार है ना कि उसको दबा करके किसी तरह अपना उल्लू सीधा कर लूं। तो ये जो जाति चीज है सबसे पहले तो ये हमें समझना पड़ेगा कि ये इतिहास का एक विकार है। यह कोई ऐसी चीज नहीं है कि जो धर्म की मुख्यधारा में है या धर्म के केंद्र से उठी है। नहीं बिल्कुल भी नहीं। बिल्कुल नहीं। यह सामाजिक है, धार्मिक नहीं है। समाज चल रहा है जाति पे। जिन्हें दिख रहा है कि जाति गड़बड़ है वो लगातार बोलते आए कि जाती चीज नहीं ठीक है। अब समाज उन लोगों की बात ही ना सुने तो ये क्या करें? ये लगभग ऐसी बात है कि मैं शिक्षक हूं। यहां पर ऐसे ये सब कक्षा है, क्लास है मेरी, स्टूडेंट्स हैं और बाहर हुड़दंग मचा हुआ है। मैं वहां हुड़दंगियों को समझा रहा हूं कि तुम भी आओ साथ बैठकर के पढ़ो। और मैं यहां वापस आता हूं। देखता

1:04:37 हूं कि यह जिनको पढ़ा रहा था, यह भी भाग गए हुड़दंगियों के साथ। और इन सब चीजों का दोष किसको दिया जाए? मुझे दिया जाए। कहा जाए तुम शिक्षक हो ना? तो ये सारा हुड़दंग तुमने करवाया है। भाई शिक्षक तो चाहता था कि हुड़दंग बंद हो। पर जो हुड़दंग कर रहे हैं वो शिक्षक की बात ही ना सुने। वो अहंकार की बात सुने क्योंकि हर इंसान होता ही ऐसा है। तो शिक्षक इसमें क्या कर ले और शिक्षक की किताब का इसमें क्या दोष है? जो शिक्षक किताब पढ़ाने आया है ये सब स्टूडेंट्स जाकर फेल हो गए। तो उन्होंने किताब जलानी शुरू कर दी कि साहब इस किताब का ही दोष है। तुमने वो किताब पढ़ी ही कब है? तुमने कब पढ़ी भगवत गीता ईमानदारी से? तुमने कब पढ़े धर्म के मौलिक ग्रंथ ईमानदारी से? वो जलाते हैं मनुस्मृति। मनुस्मृति स्मृति ग्रंथ है। हम श्रुति की बात कर रहे हैं और स्मृति तो परिभाषा से ही स्मृति में आती हैं। यह सारी स्मृतियां जिसको आप कहते हो

1:05:23 धर्मशास्त्र हैं, धर्म ग्रंथ हैं और पुराण हैं और जो इतिहास ग्रंथ हैं ये सब स्मृति के अंतर्गत आते हैं। स्मृति को तो माना ही जाता है कि इंसान ने बनाई है। सामाजिक इसके सरोकार हैं। और इसको कभी भी छोड़ा भी जा सकता है। खासकर तब जब स्मृति का टकराव हो जाए श्रुति के साथ। सनातन धर्म स्मृति ग्रंथों का केंद्रीय रूप से धर्म नहीं है ना भाई। हमारा श्रुति का धर्म है। तो फिर क्यों चल रही थी जाति व्यवस्था? इसलिए चल रही थी क्योंकि इंसान को शोषण करना अच्छा लगता है। इतनी सीधी सी बात है। आप यह बताइए कि कहीं लिखा हुआ है क्या कि आपको अपने पड़ोसी का शोषण करना है। पर हम करते हैं ना उसके दरवाजे के सामने आके पार्किंग कर देते हैं। वो तो चल रही थी। अभी भी चल रही है ना? हां। अभी भी चल रही है क्योंकि इंसान आज भी वही है। इंसान पैदा ही ऐसा होता है कि

1:06:09 उसे दूसरों का शोषण करना है। आपको कोई मिल जाता है सड़क पर आप जाकर के बेचारी बुढ़िया है वो चार रख के सब्जियां बेच रही है। उसके ऊपर चढ़ जाते हैं और पैसा कम कर और पैसा कम कर उससे मोलभाव करते हैं। हमें शोषण करना अच्छा लगता है। खासकर जो थोड़ा नीचे का हो गरीब हो स्त्री हो उसका शोषण करना बस हमें पसंद है। दुनिया में सबको पसंद है। और वो जो करना है उसके लिए धर्म बहुत अच्छा कवच बन जाता है। मैं यूं ही जाकर के वह जो वहां स्त्री बैठी है उसका शोषण करूं कि और पैसे कम कर यह कर तेरी सारी सब्जी नहीं तो उठा ले जाऊंगा। तो थोड़ी नैतिक मुझे अड़चन हो जाएगी कि अरे तुम एक बेबस बुढ़िया का शोषण कर रहे हो। लेकिन मैं कह दूं कि मेरा धर्म कहता है शोषण करो तो अब मुझे नैतिकता से भी छुटकारा मिल गया। अब मैं कहूंगा देखो ये धार्मिक बात है कि मुझे तेरा शोषण करना है। अहंकार ने धर्म का दुरुपयोग किया।

1:06:56 अहंकार ने धर्म को विकृत किया। अहंकार ने श्रुति को छोड़ के स्मृति के उन हिस्सों को पकड़ लिया जो शोषण में सहायक हो सकते थे। तो अभी अभी भी चल रहा है। तो फिर इसीलिए तो कह रहे हैं कि रिजर्वेशन की अभी भी जरूरत है। हां। तो इसीलिए मैं उसका जो इतिहास है उसको समझने पर जोर देता हूं। वो शोषण जबरदस्त तरीके से हुआ है। सबसे पहले तो ये मानना पड़ेगा हमको कि कि धर्म के नाम पर शोषण, जातिभेद और जबरदस्त तरीके का जातिभेद और और स्त्रियों के साथ अन्याय ये सब धर्म के नाम पर अभी खत्म नहीं हुआ है। हां बिल्कुल इसीलिए तो इतने कानून बनाने पड़े। इसीलिए तो इतने समानता के अधिकार देने पड़े। इसीलिए तो फिर दहेज विरोधी भी कानून इतने बनाने पड़ रहे है और एक के बाद एक सिर्फ संविधान ही नहीं उसके बाद और कई भी लॉज आते रहते हैं लगातार। क्यों करना

1:07:43 पड़ रहा है? क्योंकि गड़बड़ है तभी तो करना पड़ रहा है। तो रिजर्वेशन तो फिर रहेगी। हां वो इसलिए दिया गया था ताकि जो इतिहास की विकृति है उसको ठीक किया जा सके। लेकिन आरक्षण के साथ भी दो तरह की समस्याएं हो सकती है और इनके खिलाफ सावधान रहने की जरूरत है। पहला तो ये कि आरक्षण यदि सफल रहा है तो आज वो स्थितियां नहीं है कम से कम कुछ लोगों के लिए जो आज से मान लीजिए 75 साल पहले थी। तो अगर मैं अभी भी इस बात को लेकर के आश्वस्त हो जाता हूं कि मुझे तो आरक्षण मिल जाएगा। तो इस नाते देखो मेरे लिए जीवन थोड़ा आसान हो गया। तो मैं अपनी ही संभावना के साथ नाइंसाफी कर रहा हूं। क्योंकि देखिए आप जब संघर्ष करते हैं ना

1:08:29 तभी निखरते हैं। तभी निखरते हैं। आरक्षण का सहारा दिया गया। इसलिए दिया गया क्योंकि अतीत में सचमुच नाइंसाफी हुई थी। क्योंकि आप सचमुच कमजोर हैं। दुर्बल हैं। नहीं लेकिन आरक्षण का सहारा तो शिक्षा और रोजगार में है ना। समाज में तो आरक्षण का सहारा नहीं है। सामाजिक तो चल ही रहा है। बिलकुल और वह काम कोई आरक्षण मिटा नहीं सकता। जो समाज का रुख है, रवैया है, भेदभाव पूर्ण वहां पर आरक्षण सहयोगी कम हो पाएगा। थोड़ा सा होता है क्योंकि मान लीजिए आरक्षण से आप किसी ऊंचे सरकारी पद पर पहुंच गए तो समाज की भी आपके प्रति फिर दृष्टि थोड़ी बदल जाती है। तो उस हद तक तो होता है। शादी लेकिन फिर भी नहीं करते लोग। शादी फिर भी नहीं करते लोग। बिल्कुल ठीक कहा। तो वो काम तो फिर धर्म ही कर सकता है। वो धार्मिक सुधार का काम है। वही काम हम करने की कोशिश कौन करेगा? ये बाबा लोग जो हैं आपके सामने जो व्यक्ति बैठा है वो कर रहा

1:09:15 है। वो कर रहा है। तो ये बाबा लोग क्यों नहीं कर रहे? यह भी तो धर्म के अब ये अब ये आप बाबा लोगों से पूछिए कि उनका कुछ धर्म से नाता है भी या नहीं? उनका तो फिर वो क्यों धर्म धर्म गुरु क्यों कहलाते हैं? फिर वो कहलाते नहीं है। आप कहते हैं मुझे कुछ बेचना है। मुझे अगर यह कह करके इसको बेचने में सहूलियत होती है कि बिल्कुल असली पनीर है और ₹10 किलो दूंगा तो आप खरीद लेते हो ना। चलिए अच्छा ये तो ये तो जो प्रचार करने वाले बाबा हुए जो बाकी जो ये अखाड़े हैं जो परंपरा से चले आ रहे हैं या शंकराचार्य हैं जो परंपरा से चले आ रहा है पूरी जो एक सिस्टम चला रहा है वो तो बोल सकते हैं अब वो क्यों नहीं बोलते ये तो आपको उनसे ही पूछना पड़ेगा लेकिन एक बात पक्की है नहीं लेकिन उनको बोलने के लिए उन उनसे

1:10:02 बुलवाने के लिए मांग होनी चाहिए फिर अगर समाज ना ना बिल्कुल उल्टा बिल्कुल उल्टा वास्तविक शिक्षक कभी वो नहीं बोलेगा जो उससे बुलवाने की मांग है। मैं कभी वो नहीं बोलता जो मेरे छात्र मुझसे मांग करते हैं कि हम यह सुनना चाहते हैं अब ये बोल दीजिए। मैं तो उससे उल्टा बोलता हूं। अगर मैं किसी की मांग की पूर्ति कर रहा हूं तो मैं दुकानदार हो गया। अब वो मेरा ग्राहक हो गया। वो मेरा छात्र नहीं रहा। दिक्कत यही है कि आप धर्मुरु बन जाते हो ना तो भी कहीं ना कहीं आपके भीतर विक्रेता दुकानदार मौजूद होता है क्योंकि आपको ग्राहकों से मुनाफा निकालने का लोभ होता है और तब आप सच्चाई नहीं बोल पाओगे। कई बार तो इसलिए नहीं बोल पाते क्योंकि खुद भी पता नहीं होती। बहुत सारे लोग जो जो

1:10:47 धर्म गुरु वगैरह अपने आप को कहते हैं उन्होंने खुद नहीं पुराने ग्रंथ पढ़े हुए तो वो बताएंगे क्या दूसरों को? लेकिन बहुत ऐसे हैं जिन्होंने पढ़े हैं जो सच्चाई जानते हैं। पर उनको पता है कि ये सच्चाई कड़वी है। उनको पता है कि ये सच्चाई अगर हम अपने लोगों के सामने रखेंगे ये जो जन समुदाय भक्तों की भीड़ आ जाती है उसको ये सब बताएंगे तो ये सब भाग जाएंगे। इनकी मांग दूसरी है। ये चाहते हैं कि इनके ही जो पुराने रुख हैं, परंपराएं हैं, धारणाएं हैं मैं उनकी ही पुष्टि करता रहूं। और मैं उसके खिलाफ बोलूंगा तो ये भाग जाएंगे। तो वो डर के मारे हिम्मत ही नहीं कर पाते सच्चाई बोलने की। तो आप ही आप ही करेंगे और आप कह रहे हैं कि अब आपको खुद करने में 25 साल लग गए तो फिर ऐसे तो धीरे-धीरे करके आप जैसे लोग कितने आएंगे? समाज सुधारक आए। उपाय क्या है? आप साथ दीजिए मेरा। अगर मैं इकलौता कम पढ़ रहा हूं तो आइए आप मुझसे

1:11:32 जुड़िए। पहले उपाय क्या है? क्योंकि ये जाति व्यवस्था जो है सामाजिक स्तर पर दूर करना वो ज्यादा जरूरी है। पहले तब जाके आरक्षण हटाने की मांग होगी। दोनों एक साथ चलेंगे। हम आरक्षण की व्यवस्था किसी कारण से दी गई थी। हम वह कारण जिस हद तक आज भी वैध है उस हद तक आरक्षण चलता रहेगा हम और दूसरी बात सिर्फ आरक्षण से जो जातिगत भेदभाव है वो खत्म नहीं हो जाता उसके लिए आपको समाज सुधार भी करना पड़ेगा और वो जो वास्तविक समाज सुधार है उसके लिए आपको वास्तविक धर्म की जरूरत है तो संविधान को और गीता को एक साथ काम करना पड़ेगा या धर्म छोड़ने की जरूरत है नकली धर्म छोड़ने की निसंदेह जरूरत है धर्म के नाम पर अगर आप कुरीतियां ही ढो

1:12:19 रहे हैं तो छोड़ दीजिए ऐसे धर्म को। नकली धर्म को छोड़ना ही वास्तविक धर्म की शुरुआत है। तो और ये जो हिंदू मुसलमान होता रहता है तो वो भी तो इसीलिए होता है क्योंकि आप समझ ही नहीं पाते कि धर्म का का केंद्रीय तत्व क्या है? आप सोचते हो जो ऊपर ऊपर के भेद हैं वही तो धर्म है और यह बात दुनिया के हर पंथ हर समुदाय हर संप्रदाय पर लागू

…

Share

YouTube Video Summaries