संक्षिप्त सारांश
यह वीडियो लक्ष्यों को प्राप्त करने में बार-बार विफल होने के कारणों पर प्रकाश डालता है। यह बताता है कि अक्सर हमारे लक्ष्य आंतरिक रूप से प्रेरित होने के बजाय बाहरी प्रभावों से निर्धारित होते हैं, जिससे उनके प्रति समर्पण बनाए रखना मुश्किल हो जाता है। आचार्य प्रशांत आत्म-अवलोकन, अकेले समय बिताने और उन लक्ष्यों का पीछा करने के महत्व पर जोर देते हैं जो हमारे मूल्यों और इच्छाओं के साथ संरेखित हों।
- लक्ष्य बाहरी प्रभावों से नहीं, बल्कि आंतरिक मूल्यों से प्रेरित होने चाहिए।
- आत्म-अवलोकन और अकेले समय बिताने से स्वयं की गहरी समझ विकसित होती है।
- सच्चे लक्ष्यों के प्रति समर्पण स्वाभाविक रूप से आता है, जबकि बाहरी रूप से थोपे गए लक्ष्यों के लिए प्रेरणा की आवश्यकता होती है।
परिचय: लक्ष्यों को प्राप्त करने में विफलता
आचार्य प्रशांत एक प्रश्न का उत्तर देते हुए बताते हैं कि लोग अक्सर यह जानते हुए भी कि उनके लिए क्या अच्छा है, उसे प्राप्त करने में विफल क्यों होते हैं। वे कहते हैं कि लोग नए लक्ष्य निर्धारित करते हैं, जोश में आते हैं, योजनाएँ बनाते हैं, लेकिन कुछ समय बाद सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। वे पूछते हैं कि ऐसा क्यों होता है कि कई सालों से थोड़ी-बहुत सफलता मिलने के बावजूद लोग उच्चतम स्तर तक नहीं पहुँच पाते।
लक्ष्यों की जिम्मेदारी
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि लोग अपने लक्ष्यों की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं होते। वे पूछते हैं कि क्या लोगों ने उन लक्ष्यों की जिम्मेदारी ली है जो उन्होंने आज तक बनाए हैं। वे कहते हैं कि प्रेम में जो कुछ आता है, व्यक्ति कृतज्ञ अनुभव करता है और उसकी जिम्मेदारी लेने को तैयार रहता है, जबकि दबाव में और भ्रम में जो कुछ आएगा, उसकी जिम्मेदारी कोई नहीं लेना चाहेगा।
लक्ष्यों का स्रोत
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि अगर कोई लक्ष्य इधर-उधर के प्रभावों के कारण या मन की किसी लहर के चलते बना लिया गया है, तो व्यक्ति उस लक्ष्य के साथ इंसाफ नहीं करेगा। वे पूछते हैं कि उस लक्ष्य में व्यक्ति का सरोकार कितना है, उस लक्ष्य में उसकी आंतरिक आत्मीयता कितनी है, वह लक्ष्य उसका है ही कितना। वे उदाहरण देते हैं कि अगर चाचा और ताऊ ने मिलकर किसी को दुकान खुलवा दी और महीने की 10 लाख बिक्री का लक्ष्य दे दिया, तो व्यक्ति कुछ समय तक तो मेहनत करेगा, लेकिन उसके बाद वह दुकान पर ही सोने लगेगा, क्योंकि दुकान उसकी नहीं है, माल उसका नहीं है, इरादा उसका नहीं है।
समर्पण का अभाव
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि आमतौर पर हमारे जीवन के सब लक्ष्य ऐसे ही आते हैं, इसलिए हम समर्पित नहीं हो पाते। वे कहते हैं कि कई बार पति-पत्नी भी ऐसे ही आते हैं, चाचा, ताई, ताऊ इन सब ने मिलकर के पति दिला दिया या पत्नी दिला दी, फिर हमें भीतर-भीतर बड़ी रहती है कि पत्नी श्री या पति श्री के प्रति हम समर्पित नहीं हो पाते। वे कहते हैं कि जो कुछ तुम्हारे हृदय से आया है, उसकी जिम्मेदारी तुम हंसते-हंसते उठाओगे और कृतज्ञता के साथ उठाओगे, लेकिन जो तुम्हारे हृदय से नहीं आया, उसकी जिम्मेदारी उठाओगे तो बोझ ही लगेगी।
लक्ष्यों में आत्मा का अभाव
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि हमारे लक्ष्यों में दम नहीं होता, क्योंकि हमारे लक्ष्यों में आत्मा नहीं होती, हमारे लक्ष्य हमारे नहीं होते, इसीलिए हमारे कोई लक्ष्य पूरे नहीं होते। वे कहते हैं कि जब हमारे लक्ष्यों में हमें हार मिलती है, तो हम यह नहीं कहते कि लक्ष्य बनाने की पूरी प्रक्रिया ही गड़बड़ है, हमें उसे दोहराना होगा, समझना होगा बात क्या है। हम कहते हैं कि हम नया लक्ष्य बनाएंगे और इस बार दूने संकल्प के साथ जुटेंगे, तो ठीक है, इस बार दूनी चोट पड़ेगी, इस बार दूनी हार मिलेगी और फिर ऐसे हारते-हारते पांच-दस साल में हारने की आदत हो जाती है, जीवन हार का अभ्यस्त हो जाता है, फिर हमें बुरा लगना भी बंद हो जाता है, फिर हम लक्ष्य बनाते हैं और सो जाते हैं, सुबह उठकर कहते हैं हारे कि नहीं हारे अभी तक।
लक्ष्य की योग्यता
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि लक्ष्य बनाने के लिए जिस वस्तु को लक्ष्य कर रहे हो, वह इस लायक भी तो हो ना कि उसके पीछे जाओ, उसके पीछे श्रम करो, समय लगाओ। वे पूछते हैं कि जिस चीज के पीछे जा रहे हो, उसमें तुम्हारा क्या पाओगे, क्या क्यों किसके लिए, काहे को। वे कहते हैं कि ये अच्छे सवाल हैं, नहीं पूछने चाहिए, खासतौर पर युवा लोगों को, उन्हीं को सबसे ज्यादा लक्ष्य दिए जाते हैं, अब तू यह कर, अब तू ऐसा घोड़ा बन जा, उधर को दौड़ जा। वे कहते हैं कि तुरंत पूछो क्या, काहे को।
दिल का हाल
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि तर्क करने के लिए सबसे पहले अपने दिल का हाल कुछ पता तो हो। अब यह पता ही नहीं है कि दिल में खास क्या है और घास क्या है। वे कहते हैं कि अपने आप से बिल्कुल अनजान, अपनी कुछ खबर ही नहीं, क्योंकि जिस माहौल में रह रहे हैं, उसमें अपने साथ समय गुजारने का कोई प्रचलन ही नहीं, आत्म-अवलोकन का कोई महत्व ही नहीं। खाली समय मिला है तो क्या करना है, चलना मोहल्ला घूम के आते हैं, बाजार देख के आते हैं, या कहीं नहीं जाना तो चलना टीवी देखते हैं, खुद को नहीं देखना है, अपनी हालत क्या है, उससे बिल्कुल बचकर रहना है।
आत्म-जागरूकता का अभाव
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि अपनी हालत का कुछ पता नहीं, टीवी देखना है हर समय। टीवी देख के तुम्हें अपने बारे में क्या पता चल गया? टीवी वाला पानी पी रहा है, तुम्हारा पेट भरेगा? वे कहते हैं कि बाजार जा रहे हो, वहां दुकानें देख रहे हो, दुकानों में विविध माल है, तुम्हारा क्या? वे कहते हैं कि इस बात पर कोई जोर ही नहीं है, कोई सिखा ही नहीं रहा, मां-बाप बच्चों को प्रोत्साहित ही नहीं कर रहे कि बेटा डायरी लिखा करो, बेटा शांति से बैठकर के मन की बात सुनना सीखो और फिर दूसरों में बांटना भी सीखो, बताना भी सीखो।
शोर और अशांति
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि समय मिल गया है तो क्या करो, अलेक्सा पार्टी म्यूजिक। वे कहते हैं कि तुम तो नाचो, अलेक्सा साइलेंस भी कुछ होता है। वे कहते हैं कि शादियां होती हैं तो आजकल एक धंधा चला है जिसमें दो-तीन महीने पहले से वह घर-घर आकर नाचना सिखाते हैं, पूरे खानदान को। घर के जितने जवान होते हैं, वो सलमान खान, रितिक रोशन इत्यादि बनेंगे, वृद्धा जया भादुड़ी बनेंगी, मरियल ताऊ जी अमिताभ बच्चन बनेंगे, पूरा खानदान नाचेगा। वे कहते हैं कि ऐसे में किसी को क्या पता चलेगा कि भीतर क्या है?
लक्ष्य और आत्म-ज्ञान
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि जब अपना नहीं पता तो अपने लक्ष्य का नहीं पता होता। वे कहते हैं कि लक्ष्य यूं ही थोड़ी होता है, लक्ष्य किसी के लिए होता है ना। जो शेर का लक्ष्य है, वह गाय का लक्ष्य नहीं हो सकता ना। वे कहते हैं कि अगर आपको पता ही नहीं है कि आप शेर हैं कि गाय हैं, तो अपना आप लक्ष्य निर्धारित करेंगे कैसे?
समाधान: आत्म-अवलोकन और सही संगति
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि या तो अकेले समय गुजारना सीखिए या उनके साथ समय गुजारना सीखिए जो दर्पण जैसे हों कि उनके सामने बैठे तो उन्होंने आपको आपका हाल दिखा दिया। वे कहते हैं कि भीड़ में कम समय गुजारे, शोर में कम समय गुजारे। वे कहते हैं कि टीवी, बाजार, सिनेमा इन सबके प्रति थोड़ा सतर्क रहें। वे कहते हैं कि मूवीज वह देखिए जो आपको आपसे थोड़ा रूबरू कराएं। ऐसी पिक्चर मत देखने जाइए जो आपको किसी वैकल्पिक स्वप्न जगत में ले जाए और आपको भी लगे कि हां आप भी तो मॉरीशस की बीच पर सुंदरियों के साथ नाच रहे हैं।
सही लक्ष्य का निर्धारण
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि फिर लक्ष्य सही निर्धारित करोगे, फिर लक्ष्य तुम्हारे बोध से निकलेगा, तुम्हारी होशियारी से निकलेगा, समझ से निकलेगा। वे कहते हैं कि अब उस लक्ष्य के प्रति तुम बहुत लंबे समय तक समर्पित रह पाओगे, क्योंकि तुम्हें पता है कि वह चीज जरूरी है, तुमने खुद जाना है कि वह चीज जरूरी है।
प्रेरणा की आवश्यकता
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि अगर आप अपने लक्ष्यों में बार-बार असफलता पाते हैं तो इसकी वजह संकल्प शक्ति, विल पावर इत्यादि का अभाव नहीं है, इसकी वजह यह है कि आपके लक्ष्य ही गलत हैं। वे कहते हैं कि सही लक्ष्य तो प्रेम प्रसंग की तरह होता है, वह पकड़ लेता है, आप उसे फिर छोड़ना भी चाहोगे, वह आपको नहीं छोड़ेगा।
मोटिवेशनल गुरु
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि यह गजब मत कर लीजिएगा कि अगर लक्ष्य में सफलता नहीं मिल रही तो किसी मोटिवेशन की दुकान में जाकर बैठ गए। वे कहते हैं कि वहां बताया जाता है कि कैसे अपनी इच्छाएं पूरी करनी हैं, कैसे अपने लक्ष्य को हासिल करना है, बिना कभी यह पूछे कि तेरा लक्ष्य है क्या। वे कहते हैं कि कोई बनना चाहता हो हत्यारा और वह जाए किसी मोटिवेशनल गुरु के सामने खड़ा हो जाए, कहे कि लक्ष्य एक बनाया है लेकिन पूरा नहीं हो पा रहा है, बड़ा आलस आता है, भीतर से इच्छा नहीं उठती है और गुरुदेव अपनी सब अदाओं के साथ उसको बिल्कुल आश्वस्त कर दे यू कैन डू इट।
जागरूकता की शक्ति
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि जो करना चाहते हो अगर वो ठीक है तो किसके रोके रुक पाओगे तुम। वे कहते हैं कि दुनिया में सबसे बड़ी ताकत होती है एक जगे हुए आदमी का जागरण, उसे कोई नहीं रोक सकता। तुम उसे मार सकते हो, रोक नहीं पाओगे। जो जग गया, जो समझ गया कि क्या जरूरी है, उसको अगर रोकना चाहते हो तो उसको समझाने मत चले जाना, उसको सीधे गोली मार देना, वही अकेला तरीका है उसको रोकने का। वे कहते हैं कि जिसको तुम पाओ कि तुम्हें उत्साहित करना पड़ता है, प्रेरित करना पड़ता है, मोटिवेट करना पड़ता है, उसको जान लो कि ये धक्का खाने वाली गाड़ी है, कितना धक्का मारेंगे, ये फिर चार कदम जाकर रुक जाएगी।

