क्या सच में भूत भागते हैं Reality of Mehandipur Bala ji 😬Real Incident | Vikas Divyakirti Sir hindi

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संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो भारत में भूत-प्रेत बाधाओं से मुक्ति दिलाने वाले धार्मिक स्थलों और उनके पीछे के मनोविज्ञान पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि कैसे प्लेसीबो प्रभाव, कैथारसिस और ट्रांस जैसी अवस्थाएं लोगों को अस्थायी राहत प्रदान करती हैं। वीडियो में यह भी जोर दिया गया है कि मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के लिए आधुनिक चिकित्सा उपचार अधिक प्रभावी हैं, लेकिन पारंपरिक तरीकों को पूरी तरह से खारिज नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने अतीत में लोगों को राहत दी है।

  • प्लेसीबो प्रभाव और कैथारसिस से मिलता है आराम।
  • मानसिक स्वास्थ्य के लिए आधुनिक चिकित्सा उपचार बेहतर।
  • पारंपरिक तरीकों को पूरी तरह से खारिज करना ठीक नहीं।

भूत-प्रेत और धार्मिक स्थल

भारत में कई धार्मिक स्थल हैं, जैसे बालाजी मंदिर और क्रिश्चियन मोनेस्ट्रीज, जहां लोग भूत-प्रेत बाधाओं से मुक्ति पाने के लिए जाते हैं। अक्सर, लोग मानते हैं कि उन पर भूत का साया है और वे मानसिक रूप से परेशान होते हैं। उन्हें विश्वास होता है कि इन स्थलों पर जाकर वे ठीक हो जाएंगे।

भूतों की छवि

भूतों की नकारात्मक छवि को बदलने की जरूरत है। भूत अच्छे भी हो सकते हैं, जैसे दादाजी की आत्मा जो अपने पोते से मिलने आती है। ब्लैक मैजिक और तंत्र-मंत्र में भूतों का इस्तेमाल दूसरों को परेशान करने के लिए किया जाता है, खासकर आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में।

मनोवैज्ञानिक पहलू

किसी व्यक्ति पर भूत-प्रेत का साया होने और मंदिर या मस्जिद में जाकर ठीक होने के पीछे दो मुख्य कारण हैं: प्लेसीबो प्रभाव और कैथारसिस। प्लेसीबो प्रभाव का मतलब है कि व्यक्ति को विश्वास है कि वह ठीक हो जाएगा, इसलिए वह ठीक हो जाता है। कैथारसिस का मतलब है कि व्यक्ति अपनी दबी हुई भावनाओं को बाहर निकालता है, जिससे उसे राहत मिलती है।

प्लेसीबो और नोसीबो प्रभाव

प्लेसीबो प्रभाव तब होता है जब किसी व्यक्ति को विश्वास होता है कि वह किसी दवाई या डॉक्टर से ठीक हो जाएगा, और वह वास्तव में ठीक हो जाता है। इसका उल्टा नोसीबो प्रभाव है, जिसमें अविश्वास के कारण व्यक्ति ठीक नहीं होता है। मेडिकल साइंस में, किसी भी दवाई या वैक्सीन का परीक्षण करते समय प्लेसीबो प्रभाव को ध्यान में रखा जाता है।

सांस्कृतिक चिकित्सा

डॉक्टर सुधीर कक्कड़ ने अपनी किताब "शमंस, मिस्टिक्स एंड डॉक्टर्स" में इन धार्मिक स्थलों को "साइकोलॉजिकल थिएटर" और "कल्चरल मेडिसिन" कहा है। हर संस्कृति ने बीमारियों के लिए अपने-अपने तरीके से इलाज ढूंढे हैं। आदिवासी क्षेत्रों में ट्राइबल मेडिसिन का इस्तेमाल होता है, जो शहरों में लागू नहीं होता है।

विरेचन और ट्रांस

बहुत सी महिलाएं घरों में अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाती हैं, इसलिए उन्हें कैथारसिस की जरूरत होती है। धार्मिक स्थलों पर उन्हें चिल्लाने और अपनी भावनाओं को निकालने की अनुमति मिलती है। इसके अलावा, वहां मौजूद माहौल और मंत्रोच्चारण से लोग ट्रांस जैसी अवस्था में चले जाते हैं, जिससे वे सुझावों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं।

अस्थायी राहत

धार्मिक स्थलों पर मिलने वाली राहत ज्यादातर अस्थायी होती है। लोगों को वहां ठीक होने का एहसास होता है, लेकिन यह दबाव के कारण भी हो सकता है। ट्रांस जैसी अवस्थाओं के बाद गहरी नींद आती है, जिससे व्यक्ति कुछ समय के लिए बेहतर महसूस करता है, लेकिन कुछ दिनों बाद समस्याएं फिर से शुरू हो जाती हैं।

आधुनिक चिकित्सा का महत्व

आज के समय में न्यूरोसाइंस और साइकेट्री उपलब्ध हैं, इसलिए मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के लिए डॉक्टर के पास जाना बेहतर है। झाड़-फूंक में कभी-कभी असली इलाज में देरी हो जाती है, जिससे स्थिति और खराब हो सकती है। पारंपरिक तरीकों का महत्व कल्चरल मेडिसिन के रूप में है, लेकिन उन पर पूरी तरह से भरोसा करना ठीक नहीं है।

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Transcript

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0:00 लेकिन हम देखते हैं आज भी भारत में ऐसे बहुत स्थान है जहां अलग-अलग रिलीजन के हिंदूज़्म में जैसे बालाजी हो गया या फिर बहुत सारी क्रिश्चियन मोनेस्ट्रीज हैं। उसमें होता यह है कि मान लीजिए एक आदमी को लगता है कि उसके ऊपर भूत का साया है। मैं फिर से कह रहा हूं कि उस व्यक्ति की मनोदशा सच में चिंताजनक है। वो परेशान है। वो मेंटली ठीक नहीं है। उसको कई लोगों ने ये कह रखा है कि भैया कितना ही बड़ा भूत हो। जैसे ही आप इस दरगाह में या इस मंदिर में वहां जो बाबा है ठीक कर ही देंगे उसको। जैसे ही वो वहां गया अचानक चिल्लाने लगा जोर-जोर से। हाथ पैर पटकने पाए। ये भी होता है तो ठीक होता है। एक्टिंग नहीं चल रही। सबसे पहली बात ये नहीं कहना है कि सब झूठ है। एक्टिंग चल रही है। आज से 5 साल पहले तक मेरी राय ये थी कि सिर्फ एक्टिंग चलती है। ऐसा कुछ नहीं होता। सर जैसा कि आपने अभी बताया कि अ जहां तक

0:45 भूत प्रेत को महसूस करने वाली वाला मसला है तो लोगों को साइकेट्रिस्ट के पास जाना चाहिए। लेकिन हम देखते हैं आज भी भारत में ऐसे बहुत स्थान हैं जहां अलग-अलग रिलीजन के हिंदूइज़्म में जैसे बालाजी हो गया या फिर बहुत सारी क्रिश्चियन मोनेस्ट्रीज हैं पंजाब में है और अलग- जगह काम कर रही हैं। अब ये एक बाबा बलजिंदर बाबा भी पकड़े गए जिनको पुलिस ने भी पकड़ा है। तो बहुत से लोग इसके असरदार होने का दावा भी करते हैं। तो यह पूरा मसला क्या है? और दूसरा इसी से संबंधित मेरा सवाल है कि कई बार लोग भूत प्रेत को बीमारी समझने के बजाय भूत प्रेतों से काम भी निकलवाना चाह रहे होते हैं। के जैसे तंत्र मंत्र हो गया, काला जादू हो गया। अच्छा वो तो काला जादू के सेंस में है ना? तो ये सारी चीज आज भी है और बार-बार हमें देखने को मिलती है। दो-तीन बातें हैं। एक तो ये एक फिल्म

1:31 मैंने देखी थी। क्या नाम था? भूतनाथ था। पता नहीं क्या नाम था। अमिताभ बच्चन मनी। हां अमिताभ बच्चन जिसमें जिसमें बड़ा अच्छा भूत था। तो भूत बुरे क्यों होते हैं? भूत अच्छे भी तो हो सकते हैं। एक तो भूतों का इमेज मेकओवर करने की जरूरत है। भूतों को लेकिन नेगेटिविटी बहुत ज्यादा है। वहां भूत का मतलब है कि दादा जी की मृत्यु हो गई है और दादा जी उसके बाद भी अपने पोते से मिलने के लिए आते हैं। एक आत्मा के रूप में आते हैं। तो भूत में विश्वास करें अविश्वास करें बाद की बात है। कम से कम इमेज तो ठीक रखो। केवल खराब ही क्यों करना है? भूतों से काम निकलवाने की जहां तक बात है वह ब्लैक मैजिक तंत्रमंत्र में अक्सर होता है कि हम किसी को परेशान करने के लिए उसके ऊपर भूत प्रेत का साया डायन वो सब करते हैं। सोर्सरी ब्लैक मैजिक विचक्राफ्ट बोलते हैं जिसको दुनिया भर में असर चलता

2:17 है। स्पेशली ट्राइबल और विलेज वाले एरियाज में ऐसा दिखता है। आपका जो मूल सवाल है कि किसी के ऊपर भूत प्रेत था वह किसी मंदिर में या किसी मस्जिद में या किसी क्रिश्चियन मिनिस्ट्री में गया पंजाब में या साउथ इंडिया में और ऐसे वीडियोस आपने देखे हैं कि वो ठीक भी हो गया है। बल्कि अगर आप किसी ऐसी जगह जाएंगे तो आप पाएंगे कि वहां बहुत सारे लोग अजीब सी हरकत कर रहे हैं। उसके बाद अचानक रिलीफ मिल गया उनको। ठीक होते हुए दिखते हैं। तो ऐसा क्यों होता है? इसके पीछे दो फैक्टर्स हैं। सबसे पहली बात यह नहीं कहना है कि सब झूठ है। एक्टिंग चल रही है। आज से 5 साल पहले तक मेरी राय यह थी कि सिर्फ एक्टिंग चलती है। ऐसा कुछ नहीं होता है। फिर जब इसको मैंने थोड़ा स्टडी करना शुरू किया। न्यूरो साइंस को थोड़ा पढ़ना शुरू किया तो

3:04 मैंने देखा कि कुछ लोगों ने भारत में कुछ लोगों ने भारत के बाहर इस पर खूब रिसर्च की है। भारत के जो सबसे अच्छे साइकेट्रिस्ट हुए उनमें से एक हैं सुधीर कक्कड़। तो डॉक्टर सुधीर कक्कड़ ने एक पूरी किताब इसी पर लिखी है। उसका नाम है शमंस मिस्टिक्स एंड डॉक्टर्स। इस नाम से किताब है उनकी। उन्होंने क्या किया कि जैसे बालाजी की बात आपने की उस पे भी स्टडी की। ऐसे ही एक दरगाह है जहां पर बहुत सारे मुस्लिम लोग जाते हैं ठीक होने के लिए। उसको भी स्टडी किया। ऐसे बहुत सारे प्लेसेस स्टडी किया कि उसका क्या इंपैक्ट होता है। जो उनके रिजल्ट्स हैं वह बहुत इंटरेस्टिंग है। ऐसे ही निमहंस आपने सुना होगा बेंगलुरु में जो है वो भारत का सबसे

3:51 अग्रणी संस्थान है मेंटल हेल्थ पे स्टडी करने वाला। उसने भी रिसर्च की है। अगर आप इन सबको पढ़ेंगे तो सही रिजल्ट आपको मिलेगा। जैसे कक्कड़ साहब ने यह कहा कि हम इन सबको अंधविश्वास नहीं मानेंगे। इन सबको हम कहेंगे कि जैसे ऑपरेशन थिएटर होता है वैसे एक साइकोलॉजिकल थिएटर है। उन्होंने शब्द दिया साइकोलॉजिकल थिएटर और एक कल्चरल मेडिसिन है। क्योंकि ध्यान रखना है आज तो हम बड़े शहरों में हैं। न्यूरोसाइंस है। साइकेट्री हमारे पास है। यह मुश्किल से पिछले 50 साल की बात भारत में है। दुनिया में 100 साल की बात है। दुनिया के बहुत सारे इलाकों में शहरों में भी और गांवों में तो हर जगह आज तक साइकेट्री नहीं है। न्यूरोसाइंस नहीं है। लोग बीमार हमेशा से होते आए हैं। तो हर संस्कृति ने अपने-अपने

4:36 तरीके से इलाज ढूंढे। इसलिए कक्कड़ साहब ने कहा कि यह कल्चरल मेडिसिन है। अगर आप ट्राइबल स्टडीज पढ़ेंगे तो वहां एक कांसेप्ट है ट्राइबल मेडिसिन। हर ट्राइब ने बीमारियों के लिए इलाज ढूंढे हुए हैं अपने-अपने। वो ट्राइबल मेडिसिन है। वो शहरों पे अप्लाई नहीं हो रही है। पर ट्राइब के लोगों में अप्लाई हो रही है किसी ना किसी मात्रा में। उसमें होता क्या है? उसमें होता यह है कि मान लीजिए एक आदमी को लगता है कि उसके ऊपर भूत का साया है। मैं फिर से कह रहा हूं कि उस व्यक्ति की मनोदशा सच में चिंताजनक है। वो परेशान है। वो मेंटली ठीक नहीं है। और क्योंकि उसको भूत के बारे में बचपन से पता है। उसको यह महसूस हो रहा है कि उसके ऊपर भूत हावी हो गया है। वो झूठ नहीं बोल रहा है। एक्टिंग नहीं कर रहा है। वो वहां पर गया। उसको कई लोगों ने यह कह

5:23 रखा है कि भैया कितना ही बड़ा भूत हो। जैसे ही आप इस दरगाह में या इस मंदिर में या इस क्रिश्चियन मिनिस्ट्री में पहुंचेंगे वहां जो बाबा हैं ठीक कर ही देंगे उसको। यह उसके मन में बार-बार बैठा हुआ है। विश्वास है। इस विश्वास को बोलते हैं प्लेसिबो। और प्लेसिबो का मतलब है क्योंकि मुझे विश्वास था कि मैं इस दवाई से या इस डॉक्टर से ठीक हो जाऊंगा। मैं उसके पास जाकर सच में ठीक हो जाऊंगा। इसको मनोवैज्ञानिक मतलब मेडिकल साइंस में प्लेसबो कहते हैं। इसका उल्टा होता है नोसबो। मुझे एकदम पता है कि बकवास है तो वो ठीक भी होगा तो मैं उससे ठीक नहीं होऊंगा क्योंकि अविश्वास बहुत ज्यादा है। अगर आपको कोविड की वैक्सीन पर घोर अविश्वास है

6:10 तो हो सकता है कि वैक्सीन लगाने के बाद भी आप ठीक ना हो। अगर आपको पूरा भरोसा है कोविड वैक्सीन से ठीक हो ही जाऊंगा तो हो सकता है कि वैक्सीन में पानी डाल लगा देंगे आपको तो भी आप ठीक हो जाएंगे। क्योंकि भरोसा था आपको बहुत ज्यादा। यह मेडिकल साइंस की हर रिसर्च में नियम होता है। आपको शायद पता है या नहीं पता है। कोई भी दवाई, कोई भी वैक्सीन जब बनती है, मान लीजिए 100 आपको टेस्ट केसेस कर रहे हैं। आप 100 पे टेस्ट करेंगे तो उन 100 में से 20 या 25 पे आप टेस्ट कैसे करते हैं? दवाई देंगे पर उसमें वह दवाई होगी नहीं। जिसको टेस्ट कर रहे हैं आप। केवल यह देखने के लिए कि जिनको सही में दवाई दी और जिनको दवाई कहकर कुछ नहीं दिया दोनों बराबर तो ठीक नहीं हो रहे। अगर बराबर हो रहे हैं तो दवाई किसी काम की

6:56 नहीं है। क्योंकि केवल भरोसे से ठीक हो रहे तो मनोविज्ञान का खेल हुआ। विज्ञान का खेल कहां हुआ? तो जब प्लेसिवो वाले सैंपल की तुलना में नॉन प्लेसिबो रियल मेडिसिन के सैंपल में रिजल्ट्स बहुत ज्यादा अच्छे होते हैं तब मानते हैं कि दवाई का असर है। अगर वो इक्वली ऑलमोस्ट इक्वल है तो असर नहीं मानते हैं। तो कक्कड़ साहब ने जो किताब लिखी उसमें निष्कर्ष क्या निकाला बाकी लोगों ने भी कि ये व्यक्ति है उसको भरोसा है कि मेरे ऊपर भूत है। वो मेंटली इल है। और उतना ही गहरा भरोसा है कि इस मंदिर में या इस मस्जिद में या इस दरगाह में या इस मिनिस्ट्री में जाकर ठीक हो जाऊंगा। जैसे ही वह वहां गया अचानक चिल्लाने लगा जोर-जोर से हाथ पैर पटकने लगा। यह भी होता है। वो ठीक होता

7:42 है। एक्टिंग नहीं चल रही। कुछ एक्टर्स हो सकते हैं हर जगह। सारे एक्टर्स नहीं होते हैं। कुछ जेन्युइन होते हैं लोग वहां। वो वहां जाते क्यों ऐसे करने लगता है? क्योंकि वहां जाते ही उसके कंट्रोल्स खत्म हो जाते हैं। उसको यह भरोसा है कि मैं ठीक होने वाला हूं। और विशेष रूप से बहुत सारी महिलाएं जो घरों के अंदर हैं जिनको एक्सप्रेशन का अधिकार नहीं है। कई लोग इसलिए परेशान है कि उनके मन में बहुत कुछ भरा हुआ है। कहीं बोल ही नहीं पाए जिंदगी में। इतना घुट गए कि बोल ही नहीं पा रहे हैं। उन्हें केवल कैथारसिस की जरूरत है। यानी अपनी भावनाएं निकालने की जरूरत है। लाइफ इन अ मेट्रो या मेट्रो इन दिनों में आपने देखा होगा एक सीन दोनों फिल्मों में है कि एक लड़की जो बहुत परेशान है उसका बॉयफ्रेंड लेके जाता है कि चिल्लाओ जोर से और चिल्लाने से रिलीफ मिल गया। इसको कथार्सिस कहते हैं कि मन फ्री

8:29 हो गया। अब यह जैसे ही वहां गए अच्छा जिस महिला को घर के अंदर चिल्लाना अलाउड नहीं है यहां अलाउड है क्योंकि यहां पर तो झाड़फूंक चल रही है और ओझा के हाथ में झाड़ू है अगर उसके सासससुर ने बोला कि चिल्ला के उनको भी टांग देगा साथ में तो वहां सब खौफ में है ये लड़की वहां सामने है बहू जनरली अब ये वहां चिल्ला के अपनी बात कर रही है सामने वाले व्यक्ति पे भरोसा है वो साथ में चिल्ला रहा है वो उसको कह रहा है कि भूत निकल बाहर निकल बाहर ये इतनी उसमें तल्लीन हो गई है कि जोर से चिल्ला रही है। पागलों की तरह हाथ पैर मार रही है। इसकी एक व्याख्या है प्लेसबो। एक व्याख्या है विरेचन या कैथारसिस कि जो भाव दबे हुए थे बाहर निकल गए। एक व्याख्या है ट्रांस। वहां बहुत सारे लोग हैं। सब एक ऐसी हरकत कर रहे हैं।

9:16 एक खास किस्म का मंत्रो उच्चारण चल रहा है। बहुत तेज आवाज में। वह आवाज, वह फ्लो ऐसा है कि उसमें दिमाग डूबने लगता है। क्रिटिकल थिंकिंग खत्म होने लगती है। उस समय सामने वाला व्यक्ति जो कहता है हम पे असर बहुत गहरा पड़ता है। हम वैसा ही करते हैं जैसा कह रहे हैं। और थोड़ी देर में ऐसा रियलाइजेशन होता है कि हम ठीक हो गए हैं। एकदम सही बात है। लेकिन लगभग सभी केसेस में यह ठीक होने का एहसास टेंपरेरी होता है। आपको वहां लग रहा है ठीक हो गए। एक दबाव भी होता है कि यहां पूरी दुनिया ठीक हो गई। मैं क्यों नहीं ठीक हो रहा? जैसे मैंने कई बार देखा कि मैं डॉक्टर के पास जब भी जाता हूं डॉक्टर ने कहा कि 10 दिन के बाद फिर से आ रहा हूं। मैं फिर से गया

10:02 और डॉक्टर ने 8-10 लोगों के सामने पूछा फायदा हुआ ना? मैं बोलता हूं हां फायदा हुआ। जबकि नहीं हुआ उतना फायदा। एक दबाव सा होता है कि आपके मुंह से निकलता है। हां फायदा हुआ। क्योंकि वह एक ऐसा माहौल है जहां आप थोड़ा सा पॉजिटिव राय देंगे। यह आपके ऊपर एक मानसिक दबाव रहता है। उस माहौल में सब पर दबाव है। फायदा हुआ भी है। चिल्लाने से, मन की बात निकल जाने से रिलीफ बड़ा गहरा मिला है। थकान सी दूर हो गई है। अभी व्यक्ति पेरेंट्स के साथ परिवार के साथ घर जा रहा है। गहरी नींद में चला गया है। क्योंकि ट्रांस जैसी अवस्थाओं के बाद नींद बड़ी गहरी आती है। अभी व्यक्ति एक दिन बढ़िया से सोया। उसके बाद उठा। पहले के तुलना में काफी ठीक है।

10:47 लेकिन 5 दिन 10 दिन होते फिर से वह चीजें होनी शुरू होती है। उस लेवल पर आने में टाइम लगता है पर एक समय का वो लेवल भी आता है। फिर लेके जाना पड़ता है। क्योंकि विश्वास है ही वहां गए। फिर से वो सब हुआ। फिर थोड़ा सा रिलीफ हुआ। ऐसे केसेस निमहंस को कक्कड़ साहब को भी बहुत कम या नहीं के बराबर मिले। जहां परमानेंट रिलीफ हुआ हो और टेंपरेरी रिलीफ की वजह क्लसीबो ज्यादा है और विरेचन कैथारसिस ज्यादा है। ट्रांस की अवस्था हिप्नोसिस जिसको बोलते हैं। हिप्नोसिस का मतलब है कि दिमाग किसी के कंट्रोल में आपके है और उसने आपको कहा कि तुम ठीक हो गए। भूत निकाल दिया मैंने बाहर। जैसे ही उसने कहा कि तुम्हारा भूत ये निकाला ये

11:33 निकाला बाहर हो गया। कुछ बाहर नहीं हुआ। पर इसको इतना भरोसा इस व्यक्ति पर है कि इसको लग गया कि बाहर हो गया भूत। निकला कुछ नहीं। पर क्योंकि इस व्यक्ति को भरोसा था कि मुझ पर भूत है और यह व्यक्ति भूत निकाल सकता है और उसने निकाल दिया है। इसको लग रहा है कि अब मैं फ्री हो गया। अब 5 दिन 10 दिन एकदम ठीक रहेगा। धीरे-धीरे फिर हो सकता है कि परेशानी हो। इसलिए यह ध्यान रखना है कि अब तो न्यूरोसाइंस है, साइकेट्री है हमारे पास। जब तक वह नहीं था तब तक इन्हीं लोगों ने गांवों के अंदर ट्राइबल पपुलेशन में रिलीजियस पॉपुलेशन में लोगों को राहत दी है तो एक सिरे से खारिज कर देना ठीक नहीं है लेकिन हां आज के जमाने में जब हमें पता लग ही गया है कि क्या दिक्कत हो रही है जब पता है कि मेडिसिंस क्या है तो मेडिसिंस बन गई हैं।

12:18 अब लगभग हर मेंटल डिसऑर्डर के लिए मेडिसिंस हैं हमारे पास रिलीफ मिलता है। तो ज्यादा अच्छा है कि अब लोग जाए डॉक्टर के पास और झाड़फूंक में दिक्कत यह भी है कि कभी-कभी झाड़फूंक करते-करते असली ट्रीटमेंट में देर हो जाती है और जब आप पहुंचते हैं असली ट्रीटमेंट के लिए तब तक इलाज करना संभव नहीं बचता है। इसलिए उनका महत्व है कल्चरल मेडिसिन के रूप में लेकिन आप उस भरोसे रहें यह ठीक नहीं

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