0:00 एक तरीके से सारे भ्रष्टाचार के पीछे यही वजह है। मैं बहुत जान लगा के काम कर भी लूंगा तो उखाड़ क्या लूंगा। बदल क्या जाना है? जो कुछ भी नहीं करते हम पैसे का गबन या माल की चोर बाजारी उन्होंने कौन सा बड़ा परिवर्तन ला लिया दुनिया में तो हमारी जो पूरी व्यवस्था ही है ना जो पूरी भौतिक और सतही व्यवस्था स्था है।
0:47 भ्रष्टाचार उसको एक भ्रष्ट जवाब है। भ्रष्टाचार भी एक तरह का विद्रोह है पर भ्रष्ट विद्रोह है। भ्रष्टाचार कह रहा है कि तुमने बताया था कि वेलफेयर स्टेट है। इंडिया इस सपोज टू बी अ वेलफेयर स्टेट। और कोई भी इसमें इकाई हो सरकारी या गैर सरकारी उसका उद्देश्य क्या होता है? वेलफेयर और हम सब भली-भांति जानते हैं कि वेलफेयर हो नहीं रही है क्योंकि वेलफेयर तो हमारी ही नहीं हो रही ना। हम ही गवाह है कि वेलफेयर नहीं हो रही। हमारे ही भीतर खोखलापन है एक जिसको पता है कि कुछ बदल तो रहा नहीं है।
1:34 तो हम कहते हैं जब बदलना कुछ है ही नहीं तो हम अपना घर क्यों भूखा रखें? चलो माल उठा के अपना ही घर भर लो। नहीं तो आप एक आम आदमी की दशा सोचो ना। चाहे वह सरकारी दफ्तर में काम करता हो या किसी एनजीओ किसी संस्था में काम करता हो। वो पूरी ईमानदारी से काम कर रहा है। उसके आसपास के लोग हैं वो खाते पीते हैं खूब। यह जो पूरी ईमानदारी से काम कर रहा है। यह अपने आप को क्या बोल के समझाए? इसने कौन सा बड़ा परिवर्तन ला लिया दुनिया में? कुछ परिवर्तन आता है निश्चित रूप से आप अगर एक ईमानदार कर्मचारी हैं तो कुछ आप चीजें बदलोगे पर जो बदलाव आप ला भी पाए हो
2:21 आपका दिल जानता है कि वह बदलाव काफी नहीं है। आपका दिल जानता है कि वह बदलाव ऊपर ही है। भौतिक है, मटेरियल है और आप किसी और बदलाव के आकांक्षी हो। वो बदलाव तो आ ही नहीं सकता आपके काम से। ऐसा नहीं कि आप अगर भ्रष्ट नहीं रहोगे तो आप वो ला दोगे। आपकी जो वर्क डेफिनेशन है, आपकी जो जॉब प्रोफाइल है, आप उसके साथ शत प्रतिशत इंसाफ भी कर दो, तो भी आप वह बदलाव नहीं ला सकते। जो बदलाव सचमुच आना चाहिए। यही वजह थी कि मैंने ब्यूरोक्रेसी छोड़ी थी। मैंने कहा बात इसकी नहीं है कि मैं एक ईमानदार ब्यूरोक्रेट बन जाऊंगा। बात इसकी है कि मैं शत प्रतिशत ईमानदारी दिखाने वाला हूं। उसके बाद भी जो मैं अधिकतम कर पाऊंगा वह बहुत छोटा होगा।
3:10 और जब एक व्यक्ति ऐसा कुछ होता देखता है ना तो भ्रष्टाचार फिर बहुत आकर्षक विकल्प बन जाता है। कोई एक दिन की बात नहीं है। आपको 30-40 साल नौकरी करनी होती है। रोज घर वापस आके आप अपने आप को क्या तर्क दोगे? आप क्या बोलोगे? सिर्फ तनख्वाह के दम पर आपके यहां पर जो आपका सहकर्मी है उसकी अपेक्षा 10% या 20 या 25% आ रहा है। वो जितनी तनख्वाह लेता है उससे तीन गुना वो ऊपर से बनाता है। आप अपने आप को क्या तर्क देकर समझाओगे कि आप 1/3 या 1/ चौथाई में
3:58 गुजारा क्यों कर रहे हो? क्या समझाओगे? क्योंकि दुनिया में कोई वास्तविक परिवर्तन ना वो ला पा रहा है। ना आप ला पा रहे हो तो आप अपने आप को कैसे समझाओगे? आपकी पत्नी होंगे, आपके बच्चे होंगे, आपके मां-बाप होंगे। आप उन्हें कैसे समझाओगे? वो आप उनको बोलोगे देखो मैं पूरी ईमानदारी से निष्ठा से काम करता हूं। वो बेईमान है। तो क्या पूछेंगे? वो पूछेंगे वो बेईमान है। आप ईमानदार हो। आपने क्या उखाड़ लिया? आप दिखा दो ना कि आप कौन सा बड़ा परिवर्तन ला पाए हो। तो आप कहोगे हर आदमी अगर ऐसा सोचने लगे तो पूरा समाज ही बेईमान हो जाएगा। तो जानते हो अगर वह थोड़ा सा भी विचारशील होंगे तो क्या पूछेंगे? वो कहेंगे अगर हर आदमी
4:45 ईमानदार भी हो जाए तो भी क्या बदल जाएगा? आप जिस व्यवस्था में काम कर रहे हो उस व्यवस्था में समस्या यह नहीं है कि लोग बेईमान है। उस व्यवस्था में समस्या यह है कि व्यवस्था ही सतही है। एक भ्रष्ट व्यवस्था का पूरी ईमानदारी से पालन किया जाए तो क्या परिणाम आ जाना है? एक बेईमान व्यवस्था का पूरी ईमानदारी से पालन किया जाए तो क्या हो जाना है? इस व्यवस्था में कहीं मनुष्य की आंतरिक प्रगति के लिए कोई स्थान है? है क्या? कहीं तैनाती है। अच्छा गांव में
5:32 पानी की कमी है। कुछ करके जो भूमिगत जल का स्तर है देखना है वह कैसे बढ़ा दें। टैंक, कुआं यह सब करवा दें। और यह करवाने के बाद आप देखते हो कि कुआं तो आ गया और कुएं में जो तथाकथित निचली जातियों के लोग हैं उनको कह रहे हैं हम सब जब यहां से हट जाएंगे तो तुम आना और पानी लेने के बाद नहाने के बाद पहले यहां सफाई कर देना तो आपने तो बड़ा बढ़िया कुआं खुदवा दिया था और वो कुआं भी क्या बना जातिवाद के अग्रेशन का साधन तो आप क्या बोलोगे मैं मैं कोई समर्थन नहीं कर रहा हूं इस बात का मैं बस बता रहा हूं कि होता क्या है क्योंकि देखिए बहुत सारे आदर्शवादी नौजवान होते हैं
6:18 जो अपने करियर की नौकरी की शुरुआत करते हैं यही सोच करके कि हम समाज में कोई अच्छा परिवर्तन ला पाएंगे और आप साल दो साल के भीतर देखते हो कि वो पुरानी भ्रष्ट व्यवस्था के हिस्से बन चुके हैं। वो टूट जाते हैं। वो टूट इसलिए नहीं जाते कि उन्हें पैसे से ने लालच दे दिया। वो टूट इसलिए जाते हैं। वो कहते हैं अगर हम भ्रष्ट नहीं भी हैं तो बदल क्या रहा है? क्या बदल सकता है? मुझसे कहा था किसी ने जब मैंने इस्तीफा दिया। बोले अच्छा किया दे दिया। तेरी इज्जत बच गई। नहीं तो 2 साल में तुझे खुद ही निकाल देते।
7:04 मेरा सीनियर था एक वो आईपीएस में मेरे ही हॉस्टल से उसने बोला था ब्रदर जैसे तेरे लक्षण हैं कोई डिपार्टमेंट तुझे 2 साल से ज्यादा बर्दाश्त नहीं करेगा 2 साल में तुझे खुद ही निकाल देते अच्छा किया तूने रिजाइन कर दिया मटेरियलिज्म के साथ हमेशा चलता है सिनेसिज्म क्योंकि मटेरियल कभी छाती को ठंडक दे नहीं
7:49 पाता। तो एक आदर्श मटेरियल व्यवस्था भी मनुष्य को अंततः सनिक ही बनाती है। बल्कि वो जितनी आदर्श होगी, वह जितना ज्यादा त्रुटिहीन होगी, उतनी जल्दी आप सैनिक बनोगे। क्योंकि अगर व्यवस्था त्रुटिहीन है तो फिर अब उम्मीद करने को कुछ शेष नहीं रहा ना। अच्छी से अच्छी जो हो सकती थी व्यवस्था हमने यूटोपिया जमीन पर उतार दिया। उसके बाद भी मिला क्या? तो आप उतना ज्यादा सनिकल हो जाते हो। एक गलत व्यवस्था के भीतर एक सही आदमी बहुत सही काम भी करें तो भी परिणाम सही नहीं आता। और इस व्यवस्था में गलत क्या है? व्यवस्था में गलत यह है कि इसमें कहीं भी चेतना नाम
8:37 की वस्तु का संज्ञान ही नहीं लिया गया है। हम कहते हैं वी आर अ वेलफेयर स्टेट एंड व्हाट डस वेलफेयर कॉन्स्टिट्यूट ऑफ गुड क्लोथ्स? मटेरियल वेलफेयर पर कैपिटा इनकम जो बाकी चीज है जो जीवन का सार है उसको बोल देते हैं इट्स अ प्योरली पर्सनल मैटर अरे भाई वही असली [गला साफ़ करने की आवाज़] वेलफेयर है जिसको आपने खारिज कर दिया बोल के कि यह तो प्योरली पर्सनल है दैट्स नॉट प्योरली पर्सनल दैट शुड बी द रिस्पांसिबिलिटी ऑफ द स्टेट इटसेल्फ एंड बाय दैट आई डू नॉट मीन दैट द स्टेट शुड इंपोज बिलीफ्स जो हमारा शिक्षा तंत्र है इसको भीतरी
9:24 शिक्षा की भी जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी ताकि वेलफेयर का भलाई बढ़ोतरी शुभता का कल्याण का हम असली अर्थ समझ पाएं नहीं तो हम यही करेंगे कि कुआं खुदवा दो और ग्राम पंचायत को नई बिल्डिंग दे दो तालाब की सफाई करवा दो नहाए धोए क्या भया बस तालाब की सफाई तो करवा सरकार ने फिर जब तक बिल्कुल आधारभूत हम परिवर्तन नहीं ला देते व्यवस्था में। आप बस यही पाओगे कि बहुत सारे प्रतिभाशाली लोग अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल बस भ्रष्टाचार के नए-नए तरीके
10:09 खोजने के लिए कर रहे हैं। क्योंकि प्रतिभा तो है ही। प्रतिभा भी है और बुद्धि भी है। टैलेंट और इंटेलेक्ट दोनों है। लेकिन उसका इस्तेमाल किस लिए होने लगता है कि अब किन-किन तरीकों से हम अपने लिए पैसा और सुविधा बना सकते हैं। वो क्या करें? वो फ्रस्ट्रेटेड है ना। उसको पता है कि उसकी प्रतिभा अब सही दिशा में तो जा सकती नहीं। तो फिर उसका वो यही इस्तेमाल करता है। हर इंसान भीतर ही भीतर गुडनेस अच्छाई की तलाश में है। आप उसको ऐसा एक मौका देकर देखिए जहां उसको दिखाई दे कि वह जो कर रहा है उससे दुनिया
10:56 में अच्छाई बढ़ रही है। फिर देखिए कि वह भ्रष्टाचार को चुनता है या सदाचार को। मूर्ख बनना कोई नहीं चुनना चाहता। कोई यह नहीं चुनना चाहता कि वह अपना पेट काट के नौकरी करें और उससे अंजाम कुछ ना निकले आप उसको क्योंकि यह तो फिर निष्काम कर्म योगी ही कर सकता है और निष्काम कर्म योगी पेड़ से तो टपकेगा नहीं जब हमारी व्यवस्था निष्कामियों का निर्माण ही नहीं करती तो यह उम्मीद करना कि कोई यूं ही निष्कामी हो जाएगा। बहुत ज्यादा हो गया। हर व्यक्ति सकामी होता है। और वो यह तो चाहता ही है ना कि अगर वो मेहनत कर रहा है तो उस मेहनत का उसको सही अंजाम कहीं पर दिखाई दे। आप एक ऐसी
11:43 व्यवस्था बनाइए जिसमें उसको प्रमाण दिखाई दे कि मैंने काम करा और देखो उससे यह दुनिया में परिवर्तन आया हम तो वो फिर उसको दिखता है कि हां कुछ कर सकते हैं उसका कुछ परिणाम निकल सकता है आप लोग जो अभी सत्र के बाद बोला करते हो हम आप जो सबूत दे रहे हैं ना वो संस्था के लड़के लड़कियों के लिए बड़े जरूरी होते हैं क्योंकि मेहनत बहुत करते हैं। यह मेहनत करते हैं तो इनमें भी तनाव फ्रस्ट्रेशन सब आ जाता है। और जब दिखाई देता है कि देखो इस व्यक्ति पे हमने बहुत मेहनत करी इसको लेकर के आए संस्था से जोड़े रखे यह बात करी यह चीज भेजी यह फाइल
12:29 ऐसा वैसा और फिर दिखाई देता है कि जब वह वहां पर आकर के गवाही देता है कि आप मुझे लेकर के आए और उससे मेरी जिंदगी ऐसे ऐसे ऐसे ऐसे बदली है। तो फिर बात बनती है। वो प्रमाण मिलता नहीं। जब प्रमाण वो आम आदमी को मिलता नहीं तो फिर वो मेहनत भी करता नहीं। वो भ्रष्टाचार चुन लेता है।